Tuesday, June 16, 2020

मानसिक स्वास्थ्य : सकारात्मक विचारों से ही दूर किया जा सकता है अवसाद।

सुशांत की आत्महत्या के बारे में जितनी चर्चा इस देश में हो रही है वो लाज़मी भी है क्योंकि इस देश में नेता, अभिनेता और क्रिकेटरों को ही अधिकतर चर्चाओं में जगह मिलती है और कोई बड़ी घटना हो तो उसे चाय की दुकानों, ऑफिसों और कॉलेजों की चर्चाओं में इतनी तवज्जो नही मिलती।

इस बात पर मैं इसलिए बात कर रहा हूं क्योंकि अभिनेता की आत्महत्या के दो-तीन दिन बाद ही मैंने उतराखण्ड और उत्तर प्रदेश में दो बच्चों की आत्महत्या की खबर सुनी और दोनों ने अपनी जान देने से पहले सुशांत की मौत के बारे में अपने परिवार से चर्चा की थी।

अवसाद किसी को भी अपनी चपेट में ले सकता है फिर कोई अपनी किशोरावस्था में हो, कोई युवावस्था में हो या कोई प्रौढ़ावस्था में।

मुझे लोगों के द्वारा इनकी आत्महत्या को लेकर आपस में किए जा रहे सवालों से शायद ही कोई फर्क पड़ा हो क्योंकि मैं खुद इस दौर से गुज़र चुका हूँ।

बात उन दिनों की है जब मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई शुरू ही की थी। मैं युवावस्था में था और मुझे अपनी एक सहपाठी से प्रेम हो गया। मैंने नए सपने देखने शुरू कर दिए थे और मैं खुश था। हमारे बीच एक अच्छी समझ थी और यह सब दो साल तक चला। इस बीच लड़की की माँ ने उसका रिश्ता कहीं और तय कर लिया और शायद उसे भी एक अंधकार भरे भविष्य को निहार रहे पत्रकारिता के छात्र से ज्यादा व्यापार में अपने पैर जमा चुके जीवनसाथी का चुनाव करने में कोई दिक्कत नही हुई।

मैं तब दिल्ली में ही रह कर पत्रकारिता के क्षेत्र में खुद को स्थापित करने की कोशिश कर रहा था।
अपनी ओर से मैंने उसे मनाने के सारे प्रयास किए और यह सब मैं उसे दुख दिए बिना करना चाहता था।

मुझे रात भर नींद नही आती थी बस उसका चेहरा ही मस्तिष्क में घूमते रहता था। मैं खुद को भूल गया था। दिन भर उसे मैसेज करना, उसके फोन का इंतज़ार करना बस मेरा यही काम था। मैं चार- पांच महीने तक उसके सामने गिड़गिड़ाता रहा।
एक दिन जब मैंने पहली बार उसे उसके होने पति के साथ देखा तो आईटीओ मेट्रो के बाहर सड़क पर डीटीसी के आगे आने के विचार से बैठ गया। बहुत बार मेट्रो के आगे कूदने के विचार आए। अपने कमरे में आधी रात में रोते हुए मैंने चादर से फंदा तक बनाया।

इन सब के बीच मुझे हिम्मत मिलती थी तो अपने माता-पिता के बारे में सोचकर। यह सोचकर मैं आत्महत्या का विचार छोड़ देता था कि मेरा शव देखने के बाद मुझे लेकर हज़ारों सपने संजोए मेरे माता पिता का क्या होगा।
मुझे अपने वो सम्बन्धी और मित्र याद आते थे जो मुझे निश्चल भाव से प्रेम करते हैं।

यह जीवन एक बार मिलता है और इंसान अब तक यह नही जान पाया है कि मृत्यु के बाद की वास्तविकता क्या है।
जीवन अनमोल है यहाँ जन्म लेने वाला हर मनुष्य अपने भविष्य के सपने सँजोता है।
मुझे कुछ साल पहले की बरेली में सर्दियों की एक सुबह याद आती है जब मैंने सड़क किनारे एक शव लटका देखा था। मुझे अब भी याद है कि उसने स्वेटर पहनी हुई थी शायद उसे अंतिम समय तक अपने शरीर, अपने स्वास्थ्य की चिंता थी। शायद उसका पहले से आत्महत्या करने का कोई इरादा ना रहा हो और अवसाद में आ उसने यह निर्णय जल्दबाजी में लिया हो।

आज मैं जीवित हूँ, मेरे लेख विभिन्न समाचार पॉर्टलों पर आते हैं। क्षेत्रीय अखबारों के संपादकीय में मेरे आलेख छपते हैं। मेरे जो स्वप्न थे मैं उन्हें पूरे कर रहा हूँ। मैं गांधीजी के विचारों को पढ़ता हूँ  मैं यह पढ़ता हूँ कि कैसे कलम की वजह से इस देश में सामाजिक और आर्थिक क्रान्ति आयी। मेरे हितैषी मेरे हर आलेख को पढ़ मुझे उस पर प्रतिक्रिया देते हैं।
मेरे पत्रकारिता के गुरु मुझ पर गर्व करते हैं।

मुझे विज्ञान की कम जानकारी है मुझे तो यह भी नही पता कि मैं अवसाद से घिर चुका था पर आज मैं खुश हूँ। अपने जीवन के हर पल का आनंद ले रहा हूँ। मैं पूरे विश्व में घूमना चाहता हूँ और इस धरती की खूबसूरती का आनन्द लेना चाहता हूँ।
शायद यह मेरी मानसिक मजबूती ही थी कि मैं अवसाद से बाहर आया। मैंने अपनी स्थिति के बारे में कभी किसी से बात नही की थी पर मुझे अपने दोस्तों और परिवार से बात करके अच्छा लगता था।

आज भी बहुत से लोग इस कोरोना काल में बेरोजगार हो गए हैं। काम धंधा चौपट होने की वजह से बहुत से लोग अवसाद से घिर गए हैं। घर में बंद हो बच्चे भी तनाव से गुज़र रहे हैं। युवाओं को अपने भविष्य की चिंता है।
 पर हर समस्या का समाधान होता है, कल भी सुबह होगी और कल भी चिड़ियाएँ चहचहाएंगी। 
विराट के हर शॉट में हर भारतीय जश्न मनाएगा और अमिताभ जी के कौन बनेगा करोड़पति को हम अपने परिवार के साथ बैठकर देखेंगे।

Saturday, June 13, 2020

भ्रांतियों को तोड़कर ही बढ़ाया जा सकता है महादान रक्तदान : रक्त दो और विश्व को एक स्वस्थ स्थान बनाओ।

● रक्तदान के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए विश्व रक्तदाता दिवस मनाया जाता है।
● रक्तदान स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है।
● समाज में रक्तदान को लेकर बहुत से ऐसे मिथक हैं जो रक्तदान पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं।
● रक्तदान को बढ़ावा देने के लिए समाज में हर किसी की भागीदारी आवश्यक है।

आपके यह आलेख पढ़ने से पहले मैं एक स्वीकरोक्ति करना चाहता हूँ। इस आलेख को लिखने के लिए अध्ययन करने से पहले रक्तदान को लेकर अपनी कुछ भ्रांतियों की वजह से मैंने सिर्फ एक बार अपने मित्र को आपात स्थिति में रक्तदान किया है और उसके बाद मुझे अपने स्वास्थ्य को लेकर अपने परिवार की तरफ से बहुत खरी खोटी सुनने को मिली थी  पर मुझे उम्मीद है कि इस आलेख को पढ़ने के बाद मेरा परिवार, मैं और आप सब रक्तदान के लिए प्रेरित होंगें।
रक्त समूह के जनक ऑस्ट्रियाई रोगविज्ञानी कार्ल लैंडस्टेनर जिनका जन्म 14 जून 1869 में हुआ था की याद में वर्ष 2005 से विश्व स्वास्थ्य संगठन हर वर्ष उनके जन्मदिवस पर विश्व रक्तदाता दिवस मनाता है। इस वर्ष विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसका विषय ' सुरक्षित रक्त, बचाए जीवन ' रखा है और इस बार विश्व रक्तदाता दिवस का नारा है ' रक्त दो और विश्व को एक स्वस्थ स्थान बनाओ '।
यह दिन उन रक्तदाताओं को धन्यवाद देने के लिए मनाया जाता है जो निस्वार्थ भाव से रक्त देकर दूसरों की जान बचाते हैं। 
इस दिन का प्रयोग कर रक्तदान को लेकर यह जागरूकता फैलायी जाती है कि हर जरूरतमंद को सुरक्षित रक्त प्राप्त हो। ऐसे लोगों को प्रोत्साहित किया जाता है जिन्होंने आज तक रक्तदान नही किया है।
विश्व रक्तदाता दिवस के दिन सभी देशों को यह याद दिलाया जाता है कि विश्व में हमेशा रक्त की पर्याप्त आपूर्ति बनी रहे और समय पर इसकी पहुंच सब तक हो।
सुरक्षित रक्त तक अब भी बहुत कम लोगों की पहुंच है और निम्न और मध्यम आय वाले लोग इसके लिए संघर्ष करते हैं।
विश्व रक्तदाता दिवस का एक उद्देश्य क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सरकारी और जिम्मेदार संगठनों द्वारा सुरक्षित रक्त उपलब्धता पर निवेश करने और राष्ट्रीय रक्त कार्यक्रमों को मजबूत करने का भी है।

भारत का पहला ब्लड बैंक मार्च 1942 को रेड क्रॉस के संचालन में कोलकाता में खोला गया था।
अब भारत में रक्तदान बहुत से संगठनों और अस्पतालों द्वारा रक्तदान शिविरों के माध्यम से होता है।
 रक्तदाता अस्पतालों में स्थित ब्लड बैंक और सीधे प्राप्तकर्ता को भी रक्त देते हैं।
भारत में 18-65 वर्ष की उम्र के बीच के लोग रक्तदान कर सकते हैं। 
रक्तदाता का वज़न 45 किलोग्राम से ऊपर होना चाहिए।
रक्तदाता शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होना चाहिए।
रक्तदाता ने शराब का सेवन ना किया हो।
रक्तदाता रक्तदान से फैलनी वाली सभी बीमारियों से मुक्त हो।
 एक बार रक्तदान करने के बाद पुरुष 90 दिन व महिलाएं 120 दिन बाद फिर से रक्तदान कर सकती हैं।

राष्ट्रीय रक्त आधान परिषद के अनुसार रक्तदान के बाद उपयुक्त मात्रा में तरल पदार्थ पीना चाहिए और कोई भारी काम करने से बचना चाहिए।
रक्तदाता को रक्तदान के तुरंत बाद धूम्रपान और ड्राइविंग से बचना चाहिए।
रक्तदान के बाद लगे बैंडेज को 6 घण्टे बाद ही निकालना चाहिए और किसी भी प्रकार की समस्या आने पर ब्लड बैंक से सम्पर्क करना चाहिए।

अमेरिकन जनरल ऑफ एपिडेमियोलॉजी द्वारा किए गए एक अध्ययन में फिनलैंड के ऐसे 2682 पुरुषों के नमूने लिए गए जिन्होंने साल में कम से कम एक बार रक्तदान किया था।
उनमें रक्तदान ना करने वाले लोगों से दिल का दौरा पड़ने का जोखिम 88% कम था।
रक्तदान करते रहने से शरीर में आयरन की मात्रा सन्तुलित रहती है।
रक्तदान करने से रक्तदाता के रक्त का विश्लेषण निःशुल्क हो जाता है और उसे अपने शरीर में हेपेटाइटिस, एचआईवी जैसी गम्भीर बीमारियों के होने या ना होने के बारे में जानकारी उपलब्ध हो जाती है।

रक्तदान करने से रक्तदाताओं को इसके शारीरिक और मानसिक लाभ भी मिलते हैं। रक्तदान कर गर्व का अनुभव होता है और रक्तदाता के आत्मविश्वास में भी वृद्धि होती है।

इसके बाद भी भारत में स्वैच्छिक रक्तदान करने वालों की संख्या बहुत कम है और देश के ब्लड बैंकों में रक्त की कमी बनी हुई है।
  इंडियन जनरल ऑफ मेडिकल एथिक्स की एक
रिपोर्ट के अनुसार स्वैच्छिक रक्तदान को प्रोत्साहित करने के लिए समाज में रक्तदान को लेकर जो मिथक हैं उन्हें तत्काल खत्म किए जाने की जरूरत है।
किसी की निरक्षरता, रोज़गार की स्थिति और आर्थिक सामाजिक स्थिति भी रक्तदान के मिथकों को लेकर उत्तरदायी है।
बीमारी, चक्कर आना, वज़न कम, उच्च रक्तचाप, मोटापा, दौरे, यौन रोगों का डर भी रक्तदान के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण बनाता है।

भारत में वर्ष 1996 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार स्वैच्छिक रक्तदान को बढ़ावा देने, सुरक्षित रक्त आधान सुनिश्चित करने, रक्त केन्द्रों को बुनियादी ढांचा प्रदान करने, मानव संसाधन विकसित करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय रक्त आधान परिषद का गठन किया गया था और पेशेवर रक्तदान पर रोक लगा दी गयी थी।
भारत सरकार ने अप्रैल 2002 में राष्ट्रीय रक्त नीति को अपनाया। जिसका उद्देश्य पर्याप्त और सुरक्षित रक्त की आपूर्ति के लिए आसान पहुंच को सुनिश्चित करना और एक राष्ट्रव्यापी प्रणाली विकसित करना है।

राष्ट्रीय रक्त आधान सेवा अधिनियम 2007 के अंतर्गत भारत में पैसे के बदले रक्त बेचना अपराध है।
बीबीसी की वर्ष 2015 की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में रक्तदान का एक बहुत बड़ा अवैध बाज़ार अब भी चल रहा है।
रक्तदान ना करने का एक सबसे बड़ा कारण यह भी है कि लोगों के मन में रक्तदान संगठनों की विश्वनीयता पर भी सवाल होते हैं ।
अधिकतर लोग सिर्फ अपने परिचितों को ही रक्तदान करते हैं।

एशियन जनरल ऑफ ट्रांसफ्यूजन सांइस के रक्तदान सम्बन्धित शोध पर रक्तदान अधिक करने के लिए जो अनुशंसाएं की गई है उसमें से प्रमुख है कि जनता के मन में रक्तदान से सम्बंधित जो ज्ञान है उसमें सुधार की आवश्यकता है।
विद्यालयों के पाठ्यक्रमों में स्वैच्छिक रक्तदान को प्रभावित करने वाले खतरों को बारे में पढ़ाया जा सकता है।
एक बार रक्त देने के बाद रक्त बीमा योजना शुरू की जा सकती है।

मेरे विचार से रक्तदान का अवैध बाज़ार कोई बड़ी समस्या नही है क्योंकि कालाबाज़ारी उसी चीज़ की होती है जो कम मात्रा में उपलब्ध होती हैं और यदि लोगों के बीच रक्तदान को लेकर जागरुकता फैलायी जाएगी तो यह समस्या खुद ही सुलझ जाएगी।
रक्तदान एक महान कार्य है यह सभी को समझाना होगा।
इसके लिए नेताओं, गैर सरकारी संगठनों और आम जनता की भागीदारी आवश्यक होगी। 
गूगल प्लेस्टोर पर रक्तदान से सम्बंधित अधिक आसान एप बनाने होंगे। सोशल मीडिया पर इसके अधिक प्रचार प्रसार की आवश्यकता है। 
इस बार कोरोना की वजह से हम विश्व रक्तदाता दिवस के बारे में सरकार से ऑनलाइन ही रक्तदान को लेकर अभियान चलाने की उम्मीद रख सकते हैं।

Wednesday, June 10, 2020

पलायन की समस्या पर एक उम्मीद की किरण है कोरोना महामारी।

सार
● कोरोना की वजह से बेरोजगार हो लाखों प्रवासी अपने जन्मस्थान वापस लौटे हैं।
● आज़ाद भारत में जैसे-जैसे परिवहन और संचार साधन उन्नत हुए थे पलायन की समस्या गम्भीर होते गयी।
● भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान कम होने के कारण ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन की समस्या गम्भीर होते गयी।
● कोरोना से त्रस्त भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी में लाने के लिए गांधी जी के स्वदेशी अपनाओ और मोदी जी के लोकल पर वोकल विचारों पर चलना होगा।

विस्तार

चीन के वुहान शहर से शुरू हुयी कोरोना महामारी दिसंबर 2019 के अंत में पूरे विश्व में फैलनी शुरू हो गयी थी। भारत के केरल राज्य में 30 जनवरी 2020 को कोरोना का पहला मामला सामने आया था। कोरोना की गम्भीरता को देखते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने 22 मार्च को जनता कर्फ़्यू की घोषणा की थी।
 उसके बाद भारत में लॉकडाउन की शुरुआत हुई पहला लॉकडाउन 21 दिन का था जो 24 मार्च से शुरु हुआ ।

इसमें देश की अंदर होने वाली हर तरह की धार्मिक, आर्थिक, मनोरंजन गतिविधियों पर विराम लगा दिया गया था। सार्वजनिक परिवहन के सारे साधन बन्द कर दिए गए।

उसके बाद दूसरा लॉकडाउन 19 दिन दिन का था जो 15 अप्रैल से शुरू हुआ। बेरोजगारी और फ़ेक न्यूज़ की वजह से बहुत से प्रवासी पैदल ही अपने घर लौटने लगे।

तीसरा और चौथा लॉकडाउन क्रमशः 4 और 18 मई से शुरू हुए दोनों की अवधि दो-दो हफ्ते की थी। प्रवासियों को उनके घर वापस लाने के लिए विशेष ट्रेनें चलायी गयी।

 कोई भी देश अपनी आर्थिक गतिविधियों को अधिक समय तक नही रोक सकता। धीरे-धीरे कोरोना के साथ जीने की आदत डालते हुए सभी रूकी गतिविधियों को फिर से शुरू करने की शुरुआत हुयी।
1 जून से पांचवा लॉकडाउन चल रहा है जिसकी अवधि 30 दिन की है।
भारत सरकार ने कोरोना संक्रमण को सामुदायिक संक्रमण बनने से रोकने के बहुत प्रयास किए पर जनता ने इसे गम्भीरता से नही लिया।
 19 मई 2020 को संक्रमितों का आंकड़ा एक लाख पार कर गया और 3 जून को देखते ही देखते यह आंकड़ा दो लाख की संख्या पार कर गया।

लॉकडाउन की शुरुआत के बाद से ही गरीब भारत की बहुत सी दर्दनाक तस्वीरें हमारे सामने आयी जिसमें मज़दूरों की नींद में रेलवे पटरी पर लेटने के बाद ट्रेन से कटकर हुयी मौत और उनकी बिखरी हुई चप्पलों की तस्वीर सबसे मुख्य थी।
घर लौटने के लिये एकत्रित हुए प्रवासियों की पुलिस पर पथराव की खबरें आयी। राज्यों ने इतनी ज्यादा संख्या में घर लौटते प्रवासियों को रोकने के लिए अपनी सीमाएं तक सील कर दी।
मज़दूरों की सड़क हादसों में मौत की तस्वीरें हो या घर वापसी के लिए सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल पैरों में पड़े छालों की तस्वीर। 
साइकिल में अपने पिता को बैठाकर घर वापस लायी बेटी की तस्वीर और रेलवे स्टेशन पर अपनी मृत माँ के पल्लू से खेलते बच्चे की तस्वीर। 
सबने हमें विचलित किया और विकासशील भारत की सबसे दर्दनाक तस्वीर हमारे सामने ला कर हर भारतीय को अंदर तक झकझोर दिया।
सरकार के साथ देश के बहुत से लोग भी कलयुग के भगवान बन कर प्रवासियों की मदद के लिये आगे आये।

पलायन एक समस्या 

एक महामारी ने देश की बुनियाद को कैसे हिला दिया इसको जानने के लिए हमें प्रवासियों की समस्याओं को समझना होगा। सालों से चली आ रही पलायन की समस्या के कारण ही आज भारत इस स्थिति से गुज़र रहा है।
जब किसी की गिनती अपने जन्मस्थान से अलग स्थान पर हो तो उसे प्रवासी कहा जाता है।
अग्रज़ों के समय भारत में संचार और परिवहन के अच्छे साधन नही थे।
स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद जैसे-जैसे परिवहन और संचार के साधनों में सुधार हुआ भारत में पलायन की शुरुआत भी हो गयी।
 1960 के आस पास अच्छे जीवन स्तर की तलाश में कई भारतीय इंजीनियर, डॉक्टर अमेरिका, कनाडा और इंग्लैंड चले गए।
1970 के आसपास खाड़ी देशों में अकुशल श्रमिकों की आवश्यकता हुई तो भारत से बहुत से लोग वहां चले गए।
1990 के आसपास बहुत से भारतीय न्यूज़ीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी जैसे देशों में जाकर बस गए।

आज़ादी के बाद बढ़ती आबादी के लिए कृषि योग्य भूमि कम पड़ने लगी तो ग्रामीण गाँव छोड़ने लगे। तीस-तीस किलोमीटर पैदल चल विद्यालय जाने वाले छात्र युवा होकर रोज़गार की तलाश में प्रवासियों की गिनती में शामिल होते चले गए।
पंजाब में खेती और उद्योगों के लिए श्रम शक्ति की जरूरत थी। 
चाय बागानों में और चीनी उत्पादन के लिए अकुशल श्रमिकों की जरूरत थी। 
प्रवासियों की यह संख्या समय के साथ बढ़ती गयी। वर्ष 2001 की गणना के अनुसार भारतीय आबादी की तीस प्रतिशत आबादी प्रवासी थी।
कोरोना के बाद लाखों की संख्या में प्रवासी वापस अपने जन्मस्थान आ चुके हैं । वर्षों बाद भी प्रवासी बनने के कारण जस के तस हैं।
उनके बिना उद्योगों का फिर से चलना मुश्किल होगा। यह प्रवासी ही गरीबी से लड़ता है और अपने परिवार का पालन पोषण करता है।
अर्थव्यवस्था को प्रवासियों की ही आवश्यकता है।

सांख्यकी एवम कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार भारत के सबसे ज्यादा पांच गरीब राज्य बिहार, उत्तर प्रदेश, मणिपुर, झारखंड और असम हैं।

कृषि में पिछड़कर लड़खड़ाती भारतीय अर्थव्यवस्था

ताज़ा आंकड़ों के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान मात्र पन्द्रह प्रतिशत रह गया है।
 वर्ष 1967 में भारत में हरित क्रांति की शुरुआत हुई थी। इससे कृषि क्षेत्र में विकास हुआ था। उन्नतशील बीज, बेहतरीन सिंचाई सुविधा , कृषि में नयी तकनीक, बहुफसली फसल, कृषि के लिए मृदा परीक्षण इसकी विशेषता थी। 
जैविक खेती को बढ़ावा देना चाहिए जिससे भूमि की उर्वरक क्षमता बनी रहे।
पर कृषि में नए प्रयोग होने बन्द हो गए हैं। कृषि आधारित विश्वविद्यालयों की हालत खराब होते चली गयी है। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश की तरह ज़ीरो बजट खेती जैसे प्रयोग और राज्यों में नही किए जा रहे हैं।
कृषि कुछ फसलों तक ही सीमित रही। 

पिछले कुछ वर्षों से पानी की समस्या बढ़ती गयी है।
इसके लिए वर्षा जल संचयन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए और भू जल पर निर्भरता कम होनी चाहिए।
राष्ट्रीय किसान नीति 2007 में जल संरक्षण को लेकर कहा गया है कि एक जल साक्षरता अभियान को शुरू किया जाएगा पर ग्रामीण इलाकों में वर्षा जल संचयन को लेकर जागरूकता ना के बराबर है।

कई राज्य अपने प्राकृतिक संसाधनों का सही प्रयोग करने में नाकामयाब रहे हैं और इन संसाधनों में धनी होने के बाद भी पलायन की समस्या से जूझ रहे हैं। इनमें झारखंड और उत्तराखंड प्रमुख हैं।

यूएन के अनुसार जंगल गरीबी हटाने में मदद कर सकते हैं।
लकड़ी से बने सामान, जंगल में मिलने वाली औषधियां, रस्सियां बनाना, मशरूम उत्पादन, शहद और फलों का व्यापार कुछ ऐसे कार्य हैं जिनको करने के बाद जंगल से भी अपनी आजीविका चलायी जा सकती है।
जंगल का प्रयोग करने के लिए ज्यादा अधिकार दिए जाने की आवश्यकता है। अधिक से अधिक वृक्षारोपण पर ज़ोर दिया जाना चाहिए। ऐसे एनजीओ बनाने चाहिए जो ग्रामीणों को गरीबी से लड़ने के लिए जागरूक करें।

पलायन की वजह से नगरों की स्थिति भी खराब हुई है। एसोचेम के आंकड़ों के अनुसार यूपी से साल 2001 से 2011 के बीच करीब 59 लाख लोगों ने पलायन किया।
यूएन के अनुसार साल 2020 के अंत तक विश्व की पचास प्रतिशत आबादी शहरों में रहने लगेगी।
औद्योगीकरण और आधुनिकता इसकी मुख्य वज़ह हैं।
नगरों में फुटपाथ पर कब्ज़ा, पानी और बीजली की समस्या आम है। पीने का साफ पानी उपलब्ध नही है।
लोगों के पास रहने की जगह नही है। जगह-जगह मनुष्यों का मल भरा रहता है।
वर्ल्ड बैंक के अनुसार मुम्बई की आधी आबादी झुग्गियों में रहती है।

औद्योगीकरण भारत को गर्त में ले जा रहा है। कोरोना महामारी नही आती तो शायद यह कभी पता नही चलता कि इतने प्रवासी सिर्फ सांस लेने लायक स्थिति में ही शहरों में रह रहे हैं। मेट्रो और लोकल ट्रेन में लद कर रोज़ खुद को ढोने वाले प्रवासियों के पास सिर्फ एक महीने भी कोरोना जैसी महामारी से लड़ने की शक्ति नही है।
इसे आज तक की सरकारों की असफलता ही कहा जायेगा कि वह पलायन को रोकने में नाकामयाब रहे।

 औद्योगीकरण पर महात्मा गाँधी जी के विचार 

महात्मा गाँधी जी ने अपने बीज ग्रन्थ 'हिन्द स्वराज्य' में औद्योगीकरण की ओर इशारा करते हुए कहा था कि मशीनें यूरोप को उजड़ने में लगी हैं और वहाँ की हवा अब हिंदुस्तान में चल रही है।
बम्बई के मिलों में जो मज़दूर काम करते हैं वह गुलाम बन गए हैं।
जब ये सब चीज़े यन्त्र से नही बनी थी तब हिंदुस्तान क्या करता था।
स्वदेशी पर मोदीजी ने लोकल पर वोकल का विचार दिया है। गाँधी जी ने शताब्दी पूर्व ही इस बात को समझ लिया था।
'यंग इंडिया' में उन्होंने कहा था कि मैं भारत के जरूरतमंद करोड़ो निर्धनों द्वारा काते और बुने गये कपड़ो को खरीदने से इंकार करना और विदेशी कपड़ों को खरीदना पाप समझता हूँ, भले ही वह भारत के हाथ के कते कपड़ो की तुलना में कितने ही बढ़िया किस्म का हो।

आज हम चीन के बने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और अन्य सामानों का विरोध कर रहे हैं पर हम भारतीय उत्पादों की गुणवत्ता पर प्रश्न भी उठाते हैं। हमें इस पर गाँधी जी की कही इन बातों को समझना होगा।
 गुणवत्ता से समझौता कर अपने आज़ाद भारत को चीन और अमेरिका जैसे शक्तिशाली देशों से आगे निकालना होगा।
उत्पादों की गुणवत्ता तो एक बार विकसित राष्ट्र बनते ही खुद बढ़ जायेगी।

ग्रामीण क्षेत्रों के विकास और बेरोजगारी दूर करने के लिए सरकार द्वारा बहुत सी योजनाएं चलाई गई हैं। 

वर्ष 1999 में स्वर्णजयंती ग्राम स्वरोजगार योजना शुरू की गयी इसी योजना को बाद में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन वर्ष 2011 और दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना वर्ष 2014 कहा गया। जिसका उद्देश्य ग्रामीण गरीब परिवारों को देश की मुख्यधारा से जोड़ना और विभिन्न कार्यक्रमों के जरिए उनकी गरीबी दूर करना है।

वर्ष 2000 में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना शुरू की गई थी। गांवों के विकास में सड़क की महत्वत्ता को देखते हुए इसका उद्देश्य ग्रामीण इलाकों में 500 या इससे अधिक आबादी वाले सड़क संपर्क से वंचित गांवों को बारह मासी सड़क से जोड़ना है।

2001 में सम्पूर्ण ग्रामीण स्वरोजगार योजना को शुरू किया गया जिसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य सुरक्षा के साथ-साथ दिहाड़ी रोज़गार के अवसर बढ़ाने के लिये स्थायी सामुदायिक परिसम्पत्तियों का निर्माण करना है।

2005 में महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम जिसे मनरेगा नाम से जाना जाता है को शुरू किया गया।इस योजना में प्रत्येक वित्तीय वर्ष में किसी भी ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्यों को 100 दिन का रोज़गार उपलब्ध कराया जाता है।

कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों के अधिक समग्र एवं समेकित विकास को सुनिश्चित करने के लिए कृषि जलवायुवीय, प्राकृतिक संसाधन और प्रौद्योगिकी को ध्यान में रखते हुए गहन कृषि विकास करने के लिए राज्यों को बढ़ावा देने हेतु एक विशेष अतिरिक्त केंद्रीय सहायता योजना की शुरूआत भारत सरकार ने वर्ष 2007-08 राष्ट्रीय कृषि विकास योजना की शुरूआत की थी जो तब से प्रचलन में है।

लोकल पर वोकल 

अब जब प्रवासी अपने अपने राज्यों में वापस आ चुके हैं तो वहाँ की सरकारों को यह प्रयास करना चाहिए कि उनकी कुशल और अकुशल श्रमिक शक्ति अब उनके राज्यों में ही रहे और खुद प्रवासियों को भी ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार के अवसर ढूंढने होंगे।
खादी ग्रामोद्योग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए पर इसके लिये सिर्फ ट्विटर पर हैशटैग #localforVocal अभियान चलाने से कुछ नही होगा देश की जनता को भी खादी वस्त्रों को अपनाना होगा। 
ग्रामीण कुटीर उद्योगों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। यह वह उद्योग हैं जिन्हें घर के सदस्यों द्वारा सीमित संसाधनों में खुद शुरू किया जा सकता है।
अगरबत्ती, नमकीन, मोमबत्ती, मसाले, पापड़ , चूड़ी , साबुन , सॉस और झाड़ु बनाने के कार्य इसमें शामिल है।
फर्नीचर बनाकर और टेलरिंग करके भी अच्छे पैसे कमाए जा सकते हैं।
बेकरी का काम शुरू कर अन्य लोगों को भी रोज़गार दिया जा सकता है। 
ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ पीने के जल की कमी है वाटर आरोह का प्लांट लगा कर भी अच्छा धन कमाया जा सकता है।
शहरों में जगह की कमी होने के कारण उत्पादों के भंडारण के स्थान की कमी है और ग्रामीण क्षेत्रों में गोदाम बनाकर अच्छा धन अर्जित किया जा सकता है ।

होटल क्षेत्र में बाहर काम कर रहे प्रवासी खुद के ढाबे खोल अपने मालिक खुद बन सकते हैं।
मुर्गी और मत्स्य पालन स्वरोज़गार के सबसे उत्तम साधनों में से एक है। 
दुग्ध उत्पादन के लिए पशु पालन कर स्वावलंबी बना जा सकता है।

भारत सरकार को नवीकरणीय ऊर्जा के विकास पर कार्य करना होगा। नवीकरणीय ऊर्जा वह है जिसे प्रकृति में नियमित रूप से बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है और यह प्रकृति में बहुतायत मात्रा में उपलब्ध है।

इरोना ( अंतराष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी )  अंतराष्ट्रीय स्तर पर नवीकरणीय ऊर्जा के विकास पर कार्य करती है और भारत में यह कार्य नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय का है।

अमेरिका और चीन ने नवीकरणीय ऊर्जा के संसाधनों पर तेज़ी से कार्य किए हैं और इनका प्रयोग कर रोज़गार के बहुत से नए अवसर पैदा किए हैं।

पवन ऊर्जा से चलने वाली हवा टरबाइन अपने खेतों में लगवाकर किसान उससे अच्छा किराया कमा सकते हैं और इससे फसलों में भी कोई व्यवधान नही आता है।
हवा टरबाइन के टेक्नीशियनों की भी बहुत आवश्यकता है। इस क्षेत्र में युवाओं के लिये रोज़गार के बहुत से अवसर हैं।

जलशक्ति ऊर्जा जो नदी और बहते पानी से उपलब्ध होती है यह भी ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार का अच्छा साधन साबित हो सकती है। इईएसआई जो पर्यावरण पर अध्ययन करने वाली एक अमेरिकी संस्था है के अनुसार चीन में जलशक्ति ऊर्जा का सही उपयोग कर रोज़गार पाने वालों की संख्या तीन लाख आठ हज़ार है वही भारत में इसकी संख्या तीन लाख सैंतालीस हज़ार है।

भूतापीय ऊर्जा जिसे पृथ्वी के अंदर संग्रहित ताप से प्राप्त किया जाता है उसमें चीन में वर्तमान समय में 2500 लोगों ने रोज़गार प्राप्त किया है और भारत में यह संख्या ना के बराबर है।

बायोगैस जिसे जीवाश्म ईंधन से बनाया जा सकता है और जो बहुत ही सस्ते दामों में उपलब्ध है। इईएसआई के अनुसार चीन में उससे 1,45,000 रोज़गार उपलब्ध हैं और भारत में उससे सिर्फ 85,000 रोज़गार उपलब्ध हैं।

सौर ऊर्जा का उपयोग चीन ने बहुतायत मात्रा में किया है और भारत का चीन से पिछड़ने का मुख्य कारण यह भी है कि चीन ने नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग सुनियोजित तरीके से किया है। सौर ऊर्जा दो प्रकार से उपयोग की जाती है।
-सोलर हीटिंग और कूलिंग
-सोलर पैनल
सोलर हीटिंग और कूलिंग में तापीय ऊर्जा का प्रयोग किया जाता है। मुख्यतः पानी गर्म करने में इसका प्रयोग किया जाता है। चीन ने छह लाख सत्तर हजार लोगों को इससे रोज़गर उपलब्ध कराया तो भारत सिर्फ बीस हज़ार सात सौ लोगों को रोजगार दिलाने में सफल हुआ है।
सोलर पैनल में प्रकाश ऊर्जा का प्रयोग किया जाता है। विद्युत बल्ब, पंखे आदि चलाने में इसका प्रयोग किया जाता है। भारत ने इसके विकास के लिये राष्ट्रीय सौर मिशन चलाया है पर फिर भी इसके प्रयोग में भारत अपने प्रतिद्वंद्वी चीन से कहीं पीछे है। इईएसआई के अनुसार चीन ने 21,94,000 लोगों के लिए सोलर पैनल के ज़रिए रोजगार के अवसर पैदा किये तो भारत इसमें सिर्फ 1,15,000 अवसर पैदा कर चीन से कहीं पीछे था।

प्रकृति का नियम है कि जो एक बार ऊपर उठता है वह नीचे भी आता है। कोरोना का यह बहाव भी अवश्य खत्म होगा पर देखना यह होगा कि हम भारतीय उस बहाव से खुद को संभाल पायेंगे या उसमें बह कर अपने आने वाले भविष्य को भी बर्बाद कर देंगे।



Saturday, June 6, 2020

7 जून संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस : ताकि फिर से कोरोना जैसी महामारी पैदा ना हो।

सार
● खाद्य सुरक्षा को कभी गम्भीरता से नही लिया गया है।
● दूषित खाने से प्रतिवर्ष लाखों लोगों की जान जाती है।
● खाने की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
● उपभोक्ताओं का अधिकार है कि उन्हें सुरक्षित खाना प्राप्त हो ।

विस्तार

आज दूसरा विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस मनाया जा रहा है। जिसका विषय है 'खाद्य सुरक्षा हम सभी का कार्य है'।
वर्ष 2019 में संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया का ध्यान दूषित खाने और पानी से सेहत को हो रहे नुकसान की ओर खींचने के लिए इसकी शुरुआत की थी।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दूषित खाने की वजह से दो सौ से ज्यादा गम्भीर बीमारियां हो सकती है जिनमें कैंसर और डायरिया शामिल हैं।
खाद्य सुरक्षा का अगर गम्भीरता से ध्यान रखा गया होता तो आज विश्व जानवरों से मनुष्य के शरीर में आयी कोरोना जैसी गम्भीर महामारी से नही लड़ रहा होता।

विश्व में हर दस में से एक व्यक्ति दूषित खाने की वजह से बीमार होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार विश्व में हर साल दूषित खाने की वजह से 4,20,000 लोगों की जान जाती है।
दूषित खाने का सबसे ज्यादा प्रभाव पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों पर पड़ता है।


वर्तमान में हमें प्राप्त होने वाला खाना सुरक्षित नही है ।
मुर्गी पालन में मुर्गियों को प्राकृतिक तरीके से बड़ा होने में समय लगता है और उन्हें जल्दी बड़ा करने के लिए मानव के लिए घातक सिद्ध होने वाले रसायनों का प्रयोग किया जाता है।
कृषि में बहुत सी सब्जियों को समय से पहले बड़ा करने के लिए मनुष्यों के लिये नुकसानदायक रासायनिक खादों का इस्तेमाल किया जाता है।
प्रदूषण भी हमारे खाद्यान्न को बुरी तरह प्रभावित करता है। उद्योगों से निकलने वाले रसायन कृषि भूमि में मिल जाते हैं फिर उस भूमि से उत्पादित होने वाले खाद्यान्न हमारी सेहत पर बेहद विपरीत असर डालते हैं।
रसायन मिश्रित दुग्ध उत्पाद बच्चों के स्वास्थ्य लिए बहुत ही हानिकारक होते हैं।

दूषित खाने की वजह से फूड पॉयजनिंग हो जाती है। बासी खाना और गन्दा पानी फूड पॉयजनिंग होने का मुख्य कारण हैं। गन्दे हाथों से खाना खाने, खाना बनाते वक्त गन्दे पानी का इस्तेमाल करने से भी फूड पॉयजनिंग होती है। 
खाने का सामान ढका ना होने की वजह से या पुराना हो जाने की वजह से उसमें बैक्टीरिया व सूक्ष्म जीव पनप जाते हैं और कुछ घण्टे बाद ही इसका असर दिखना शुरू हो जाता है। इसका मुख्य लक्षण है उल्टी का महसूस होना। पेट दर्द व पेट खराब भी हो जाता है। फूड पॉयजनिंग की वजह से कभी-कभी व्यक्ति की मौत भी हो सकती है।

खाने की स्वच्छता पर ध्यान देना आवश्यक है और कोरोना काल में तो स्वच्छता का महत्व और भी बढ़ गया है।
खाना बनाने से पहले बीस सेकेंड तक अपने हाथ साबुन से धोने चाहिए।
सभी सब्ज़ियों और फलों को बहते पानी के नीचे खंगाले और सूखे कपड़ों से उन्हें सुखाएं। इन्हें साबुन और डिटर्जेंट से नही धोना चाहिए।
खाने को अच्छे से पकाकर ही खाना चाहिए।
जब कच्‍चा मांस खरीदते हैं तो उसे फ्रीज में दूसरे फल- सब्जियों के साथ नही रखना चाहिए। उस मांस को काटने के लिए जिस चाकू और दूसरे बर्तनों का इस्तेमाल किया गया है उन्हें अच्छे से धोना चाहिए।
अंडों को खुले में ना रखकर फ्रीज़ में रखना चाहिए।
खुले में मिलने वाले खाने और फ़ास्ट फूड से दूर रहना चाहिए।

किसानों को सुरक्षित खाने के उत्पादन के लिए सुरक्षित तरीका अपनाना चाहिए। उपभोक्ताओं का अधिकार है कि उन्हें सुरक्षित खाना प्राप्त हो।
यूएन के वर्ष 2030 के सतत विकास लक्ष्य के तीस लक्ष्यों में से दो स्वास्थ्य सुधार और भुखमरी खत्म करना खाद्य पदार्थों की सुरक्षा से ही पूरे हो सकते हैं।
सरकार को यह निर्धारित करना चाहिए कि सभी को सुरक्षित और पौष्टिक आहार मिले। भारत में इसके लिए खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग कार्य करता है।

विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस पर लोगों को खाद्य पदार्थों को लेकर जागरूक करने की आवश्यकता है। कोरोना काल में भी सभी विद्यालयों, कॉलेजों को अपने विद्यार्थियों से इस पर वेब संगोष्ठी कर चर्चा करनी चाहिए।
एक अभियान चलाकर ट्विटर, इंस्टाग्राम, फेसबुक पर #foodsafety नाम से हैशटैग बना खाद्य सुरक्षा की महत्वत्ता से सबको परिचित कराना चाहिए।
सरकार को भी इस ओर विशेष ध्यान दे कर खाद्य सुरक्षा को लेकर विज्ञापन प्रसारित करने चाहिए।

Friday, June 5, 2020

कोरोना से बड़ी महामारी : हॉर्न ओके प्लीज़

सार
● भारत में सड़क हादसों से हर वर्ष सैंकड़ों लोग मारे जाते हैं।
● वाहनों की तेज़ गति भारत में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं का मुख्य कारण है।
● सार्वजनिक वाहनों का सफर ज्यादा सुरक्षित है।
● चालकों में वाहन चालन सम्बन्धी नियमों की जानकारी का अभाव है।
● सड़क सुरक्षा उपायों का पालन कर इन दुर्घटनाओं को रोका जा सकता है।

विस्तार

कोरोना काल में देश के हर हिस्से में त्राहि त्राहि मची हुई है पर वर्षों से इससे भी बड़ी एक महामारी देश में फैली हुई है। जिसकी गम्भीरता से देश का हर नागरिक परिचित तो है पर कोरोना में मास्क लगाए घूमने वाली जनता ने कभी इस महामारी का इलाज नही ढूंढा है।
इस महामारी से पूरे भारत में एक दिन औसतन 450 मौतें होती हैं।

भारतीय सड़क परिवहन मंत्रालय के वर्ष 2018 के सड़क हादसों के आंकड़े से इनकी भयावहता का अनुमान लगाया जा सकता है। जिसके अनुसार वर्ष 2018 में लगभग डेढ़ लाख लोगों ने सड़क हादसों में अपनी जान गंवायी थी।
सड़क पर वाहन चलाने की बात हो तो सीधी सड़क को सबसे सुरक्षित माना जाता है पर आंकड़ों के अनुसार उन डेढ़ लाख लोगों में से 97 हज़ार चालकों ने सीधी सड़क पर ही अपनी जान गंवाई थी। मोड़ों पर अपनी जान गंवाने वाले 20 हज़ार चालक थे।
वर्ष 2018 के आंकड़ों के अनुसार तमिलनाडु, कर्नाटक और हरियाणा में सबसे ज्यादा सड़क हादसे हुए थे।
राष्ट्रीय राजमार्गों और राज्य मार्गों से अधिक सड़क हादसों का दर अन्य मार्गों में घटित सड़क हादसों का है।

पुरुषों को वाहन चलाने में अधिक निपुण समझा जाता है और वाहन चालन में महिलाओं से अधिक संख्या पुरुषों की ही है। सड़क हादसों में मरने वाले 85 फीसदी पुरुष थे।
सड़क पर चलते हुए हम किसी उम्रदराज चालक की धीमी गति का उपहास उड़ाते हैं पर आंकड़ो के अनुसार तेज़ गति के कारण ही सबसे अधिक सड़क हादसे होते हैं। इन आंकड़ों के अनुसार डेढ़ लाख में से 98 हज़ार लोगों ने तेज़ गति के कारण ही अपनी जान गंवायी थी और उसमें 25-45 आयु वर्ग के युवा सबसे अधिक थे।

वाहनों की गति सीमा को 70 किमी प्रति घण्टे पर बांधकर इन सड़क दुघर्टनाओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
बढ़ते औद्योगीकरण व सुधरते जीवन स्तर ने निजी वाहनों की संख्या में पिछले कुछ वर्षों में तेज़ी से इज़ाफ़ा किया है और उपलब्ध होते हुए भी सार्वजनिक वाहनों का प्रयोग कम किया जाता है। वर्ष 2018 के आंकड़ों से पता चलता है कि सार्वजनिक वाहनों में दोपहिया और हल्के वाहनों से दुघर्टना का खतरा कम होता है।

सड़क हादसों के मुख्य कारण

ड्राईविंग लाइसेंस मिलने की आसान प्रकिया के कारण अप्रशिक्षित वाहन चालक सड़क पर उतर कर अन्य वाहनों के लिये खतरा बन जाते हैं। हाईवे पर हल्के और धीरे चलने वाले वाहनों को अपनी बायीं ओर चलना चाहिए पर ऐसे चालक अपनी लेन के मध्य और दायीं ओर तेज़ गति में चलते हैं।
सड़क कानून पालन का सख्ती से पालन ना करवाए जाने के कारण बहुत से नाबालिग सड़क पर खतरनाक तरीके से वाहन चलाते दिख जाते हैं।
युवाओं को महंगी और शक्तिशाली इंजन की बाइकों को चलाने का शौक़ होता है। बाइकों में पीछे से आते वाहनों को देखने के लिए प्रयोग में आने वाले शीशों को निकालकर और सिर की सुरक्षा के लिये प्रयोग में आने वाले हेलमेट का प्रयोग ना कर बहुत से बाइक चालक अपनी जान से हाथ धौ बैठते हैं।

 तेज़ गति में चलते वाहन ट्रैफिक सिग्नलों पर रेड लाइट तोड़कर दुर्घटनाओं में शामिल होते हैं तो बहुत से वाहन सड़क पर लगे बैरियरों से टकरा जाते हैं। गलत दिशा में चलते वाहन भी बहुत सी दुर्घटनाओं के लिये जिम्मेदार होते हैं।
चार पहिया वाहन चालक सीट बेल्ट का प्रयोग नही करते हैं जो दुर्घटना होने पर उनके लिये जानलेवा साबित होता है। वाहन चलाते समय मोबाइल का प्रयोग करने की वजह से कई दुर्घटनाएं होती हैं।
वाहन के इंडिकेटरों का प्रयोग ना करने के कारण या गलत इंडिकेटर प्रयोग के कारण भी कई वाहन दुर्घटनाग्रस्त होते हैं।

शराब पीकर वाहन चलाने पर चालकों की सही समय पर निर्णय लेने की क्षमता समाप्त हो जाती है जिस कारण जरूरत पड़ने पर वाहन चालक सही समय पर ब्रेकों का इस्तेमाल करने में असमर्थ हो जाता है और तेज़ गति में अपनी लेन से हटकर वाहन चलाने पर अन्य लोगों के लिए भी खतरा बन जाता है।

सम्बंधित विभागों के लचीलेपन की वजह से अपनी समयावधि पार कर चुके कामचलाऊ वाहन भी सडकों पर दौड़ते दिखते हैं। इनमें से बहुत से वाहनों का प्रयोग सवारियों को ढोने के लिए भी किया जाता है।
सड़क पर अतिक्रमण तब तक नही हटता जब तक उसकी वजह से बहुत से वाहन दुर्घटनाग्रस्त ना हो जाएं।

ख़राब गुड़वत्ता से बनी सड़कों पर समय से पहले ही गहरे गड्ढे बन जाते हैं और उसके आस-पास के लोग भी उनसे होने वाली दुघर्टनाओं पर उन गड्डों को भरने की जगह मूकदर्शक बन सरकार द्वारा उन्हें भरने का इंतज़ार करते हैं।

बहुत से ड्राइवर हाई और लो बीम की सही जानकारी नही रखते हैं और ना ही इनका प्रयोग करते हैं। लम्बी दृश्यता के लिये हाई बीम का प्रयोग किया जाता है।
 रात्रि में सामने से गाड़ी आने पर लो बीम कर उसको अच्छी दृश्यता दी जाती है क्योंकि हाई बीम की वजह से अंधेरे में सामने से आने वाले वाहन चालक को कुछ देर की लिए कुछ नही दिखता है । 
शहरों में लो बीम और हाईवे में हाई बीम का प्रयोग किया जाना चाहिए।

सड़क पर चल रहे अधिकतर चालकों को सड़क पर बनी पीली और सफेद लाईनों की सही जानकारी नही होती है। यह लाइनें क्षेत्र की आबादी और सड़क की भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रख कर बनाई जाती हैं।

सड़क पर टूटी सफेद लाइनों का अर्थ होता है कि यदि सुरक्षित है तो आप उस पर लेन बदल सकते हैं, ओवरटेक कर सकते हैं और यू टर्न ले सकते हैं।


लम्बी सफेद लाइन का अर्थ है कि आप उस सड़क पर ओवर टेक नही कर सकते और ना ही आप वहाँ यू टर्न ले सकते हैं।


टूटी पीली लाइन का मतलब है कि आप इस लाइन पर सावधानी के साथ ओवरटेक और यू टर्न ले सकते हैं।


लम्बी पीली लाइन में आप दूसरी गाड़ियों को ओवरटेक तो कर सकते हैं पर पीली लाइन को पार करना मना होता है। यह नियम अलग-अलग राज्यों के लिये अलग-अलग भी हैं ।


सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के उपाए

ट्रैफिक पुलिस सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए सड़क पर चलने के नियमों का पालन करवाती है। कोरोना काल में हम पुलिस कर्मियों को योद्धाओं के रूप में देख ही चुके हैं पर ट्रैफिक पुलिस को बहुत से बाहरी दबाव में भी काम करना पड़ता है, जैसे सड़क पर गलत चलते हुए लोग अपनी गलती के बाद भी पुलिस से अनावश्यक रूप से उलझ जाते हैं।
यदि इन अनावश्यक दबावों से पुलिस को मुक्त रखा जायेगा तो सड़क दुर्घटनाओं में आसानी से कमी लायी जा सकती है।

मोटर यान संशोधित बिल 2019 में ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर जुर्माने और सजा को और भी कड़ा कर दिया गया है जिससे भविष्य में इन दुघर्टनाओं में कमी की उम्मीद की जा सकती है।

सड़क पर चल रहे पैदल राहगीरों के साथ होने वाले हादसों को सड़क के दोनों ओर अधिक से अधिक फुटपाथ बना कर कम किया जा सकता है। सड़क पार करने के लिये जेब्रा क्रॉसिंग का प्रयोग किया जाना चाहिए।
 ज्यादा भीड़भाड़ वाली जगह पर फुटओवर ब्रिज बनाए जाने चाहिए। साइकिल में चलने वालों के लिए पुरे भारत में चंडीगढ़ की तर्ज़ पर अलग लेन बनायी जा सकती हैं।

प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में हो रहे इन हादसों को रोकने के लिए जनता को स्वंय भी जागरूक होना होगा ।

Thursday, June 4, 2020

5 जून विश्व पर्यावरण दिवस : इस बार जैव विविधता का जश्न मनाएं। : कोरोना काल से कुछ सीख धरती को स्वर्ग बनाएं।


सार
●इस बार विश्व पर्यावरण दिवस का विषय है 'पृथ्वी की जैव विविधता का जश्न मनाएं'।
●पृथ्वी सम्मेलन और क्योटो प्रोटोकॉल के कुछ ख़ास परिणाम प्राप्त नही हुए थे।
●कोरोना काल में प्रदूषण कम हुआ है।
●गाँधी जी के आदर्शों पर चल प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सकता है।

विस्तार

जिस पर्यावरण में मनुष्य रह रहा है उसकी सुरक्षा की महत्वता मनुष्य को समय-समय पर याद दिलाते रहने के लिये विश्व पर्यावरण दिवस मनाने की शुरुआत की गयी थी और 5 जून 1974 में पहला संयुक्त राष्ट्र विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया था।

वर्ष 1987 में इसके केंद्र बदलते रहने का सुझाव दिया गया था। इस बार विश्व पर्यावरण दिवस का विषय है 'पृथ्वी की जैव विविधता का जश्न मनाएं' और इसका केंद्र कोलम्बिया में है जिसमें उसका साझेदार जर्मनी होगा ।
एंडीज की पर्वत श्रृंखला, अमेज़न के घने जंगल, कैरेबियन सागर और प्रशांत महासागर के तटों के साथ कोलम्बिया सर्वाधिक जैव विविधता वाले देशों में से एक है। 

जैव विविधता से तात्पर्य है कि इसमें अलग-अलग तरह के प्राणी और पेड़-पौधे एक साथ रहते हैं। इसमें सब एक दूसरे ओर निर्भर और उपयोगी हैं। यह सब पृथ्वी के वातावरण को बेहतर बनाने में अपना अमूल्य योगदान देते हैं। जैव विविधता जितनी समृद्ध होगी उतना सन्तुलित हमारा वातावरण होगा। कोरोना जैसी महामारी भी इसी से छेड़छाड़ का परिणाम है।
जैव विविधता की सुरक्षा करके ही सतत् विकास का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। सतत् विकास का अर्थ है वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं से समझौता किये बिना पूरा करना।

वर्ष 2019 के संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन में एक सोलह साल की लड़की ग्रेटा थंबर्ग ने विश्व नेताओं को उनके जलवायु परिवर्तन के अब तक के प्रयासों पर लताड़ते हुए कहा था कि आपने अपने खोखले शब्दों से मेरे सपने और मेरा बचपन चुरा लिया है।

पर्यावरण में बढ़ते प्रदूषण की चिंता के कारण वर्ष 1992 में ब्राज़ील के रियो डी जेनेरियो में विश्व के 172 देशों ने पृथ्वी सम्मेलन का आयोजन किया था और वर्ष 1997 में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन की अधिकता की वजह से हो रहे जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए जापान के क्योटो में क्योटो प्रोटोकॉल हुआ था पर यह प्रयास पर्यावरण में सुधार लाने में पूरी तरह सफल नही हुए।

यूएन की एक रिपोर्ट के अनुसार मानवीय गतिविधियों के कारण दस लाख प्रजातियों पर विलुप्ति का खतरा मंडरा रहा है। बढ़ता औद्योगीकरण प्रदूषण के लिए जिम्मेदार है, मनुष्य ने विकास के लिए और अच्छे जीवन स्तर के लिये पर्यावरण का विनाश किया है।
 हवा में उड़ते जहाज़ों , उद्योगों , वाहनों से निकलने वाले धुंए के कारण वायु प्रदूषण जन्म लेता है। 
उद्योगों से निकलने वाले हानिकारक रसायनों, मनुष्य की गंदगी से जल प्रदूषण जन्म लेता है।

मनुष्य ने अपने जीविकोपार्जन के लिये प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन किया है। मनुष्य की गतिविधियां पारिस्थितिक तंत्र को बिगाड़ रही हैं। हाल ही में भारत में आए निसर्ग, अम्फान जैसे तूफ़ान और ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में लगी भीषण आग इसी का परिणाम हैं।

गांधी जी ने शायद मनुष्य के इस विकास के पीछे की इस दौड़ को और उससे पर्यावरण को होने वाले नुकसान को बहुत पहले ही भांप लिया था। अपनी पुस्तक 'हिन्द स्वराज्य' में उन्होंने औद्योगीकरण पर चोट करते हुए कहा था कि मशीनें यूरोप को उजाड़ने में लगी हैं और वहाँ की हवा अब हिंदुस्तान में चलने लगी है। यन्त्र आज के सुधार की मुख्य निशानी है और वह महापाप है जैसा मैं साफतौर पर देख सकता हूँ।
'की टू हेल्थ' पुस्तक में गांधी जी ने खुले तारों के नीचे सोने की आदत डालने की बात कही थी। यह उन्होंने शुद्व हवा की वजह से बोला था पर आज नगरीकरण और वायु प्रदूषण की वज़ह से कितने लोग खुली हवा में सोते हैं यह जानने के लिये हमें पुराने भारत को ढूंढ़ कर उस पर अध्ययन करना होगा।

आज कोरोना काल में अधिकांश मानवीय गतिविधियां रुकी होने के कारण पर्यावरण में चमत्कारिक सुधार देखने को मिल रहे हैं वर्षों बाद दूर की पर्वत श्रृंखलाओं को साफ देखा जा रहा है, गंगा का जल इतना साफ कभी नही देखा गया।

वृक्ष लगाओ धरती बचाओ।
नदियां पूज्यनीय हैं तो उनको वस्त्र, अन्य गंदगी डालकर गंदा मत कीजिए।

विश्व नेताओं के साथ-साथ हमें भी इस विश्व पर्यावरण दिवस में पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को फिर से याद करना होगा और अपने आने वाले कल को सुरक्षित करने के लिये आज ही से प्रयास शुरू करने होंगे।

Tuesday, June 2, 2020

अमर उजाला में मेरा ब्लॉग पेज़।

ब्लॉग पेज़

शान की सवारी : 3 जून विश्व साइकिल दिवस पर विशेष

3 जून 2018 में संयुक्त राष्ट्र ने साईकिल उपयोग को बढ़ावा देने के लिये पहली बार विश्व साईकिल दिवस मनाने की शुरुआत की थी। आज यह तीसरी बार मनाया जा रहा है। इस बीच मुझे कुछ महीने पुराना किस्सा याद आ गया ।
कोरोना काल से पहले मुंबई से स्थान्तरित हो चंडीगढ़ आये अपने भाईसाहब से मेरी चंडीगढ़ के परिवहन साधनों पर चर्चा हो रही थी। चंडीगढ़ में मुंबई लोकल की तरह परिवहन का सस्ता और सुलभ साधन नही है। कार, स्कूटी के विकल्प पर विचार किया जा रहा था पर चीनियों से उपहार में आयी कोरोना महामारी ने देश की सभी योजनाओं की तरह हमारी भी इस योजना पर पानी फेर दिया।
सार्वजनिक परिवहन में कोरोना संक्रमण के खतरे को देखते हुए काम पर जाने के लिये भाईसाहब ले आए एक चमचमाती नई साईकिल।
कोरोना काल न होता तो शायद उनकी इस पाषाण युग की पसंद का मैं जम कर उपहास बनाता पर वक़्त की नज़ाकत को भांपते हुए मुझे उनकी समझदारी से ईर्ष्या होने लगी। कोरोना से एकमात्र बचाव सामाजिक दूरी के लिये इससे अच्छा परिवहन साधन और कुछ हो ही नही सकता।

यूरोपीय देशों में 18वीं शताब्दी के दौरान जन्म ले चुकी साईकिल का रखरखाव बहुत ही आसान है। साईकिल की चेन में समय-समय पर तेल डालते रहने, पहियों में समय से हवा भरते रहने, समय-समय पर साईकिल के नट बोल्टों को कस कर, उसके ब्रेकों का ध्यान रख, समय से साईकिल की सफाई कर उसे जंग मुक्त रख कर और पहिये का पंक्चर बनाने का ज्ञान रख साईकिल को लम्बे समय तक प्रयोग में लाया जा सकता है।

मोटरसाईकिल, कारों के दाम समय के साथ आसमान छूने लगे पर साईकिल अब भी बेहद ही किफायती दाम में मिल जाती है। 
गरीब इसे लेकर घरेलू सामान बेचने के लिये फेरी लगाकर या इससे सम्बन्धित कोई अन्य स्वरोज़गार अपना कर अपने परिवार का भरण-पोषण आसानी से कर सकता है।
सुबह फैक्ट्री जाने के लिये साईकिल की सवारी करते सड़कों पर लम्बी श्रृंखला में जाते मज़दूरों के लिये उनका यह वाहन वरदान है।

लॉकडाउन में हम यह देख चुके हैं कि बिना वाहनों और फैक्ट्रियों के चले यह हवा कितनी शुद्ध रहती है।
साईकिल के प्रयोग से पृथ्वी के लिये गम्भीर होते जा रहे वायु प्रदूषण की इस समस्या पर लगाम लगायी जा सकती है।

बुज़ुर्ग, जवान और बच्चें हर आयु वर्ग के लोग साईकिल की सवारी कर खुद को चुस्त और दुरस्त रख सकते हैं। साईकिल की सवारी मनुष्य को मानसिक और शारीरिक रूप से मज़बूत बनाने का कार्य करती है। इसमें अन्य व्यायामों की तरह ना चोटिल होने का डर है औऱ ना ही इसे चलाने में किसी विशेष तकनीकी ज्ञान की जानकारी की आवश्यकता।
रोज़ाना साईकिल चलाने से शरीर की मांसपेशियां मज़बूत होती हैं और शरीर में वसा भी नही बनता।
उच्च रक्तचाप और ह्रदय रोगों को साईकिल की सवारी पीछे छोड़ देती है। शोध में सामने आया है कि निरंतर साईकिल चलाने वालों को मधुमेह और ह्रदयाघात का खतरा अन्य लोगों से कम रहता है।

यह सच है कि साईकिल को वक़्त ने चुनौती दी है। सड़क पर दोड़ती बसें, ट्रक, कार, महंगी मोटरसाईकिल साईकिल चलाने वाले को रफ़्तार में कहीं पीछे छोड़ देती हैं। इस तेज़ रफ़्तार के साथ चल रही ज़िंदगी में हर किसी को वक्त की कमी है। मनुष्य ने विकास के पीछे अंधी दौड़ लगायी हुई है। उसमें साईकिल के सफ़र में लगता ज्यादा समय मनुष्य को चुभने लगता है।
पर कोरोना ने दिखा दिया है कि कैसे प्रकृति मनुष्य की रफ़्तार को कभी भी रोक सकती है और वैसे भी मेट्रो स्टेशनों की भीड़, बसों की दमघोंटू भीड़ और असुरक्षित तेज़ दौड़ती मोटरसाईकिलों से दूर एक साईकिल के सफ़र का आनन्द ही कुछ और है। साईकिल चलाते ना ऑटो का कानफोड़ू संगीत है ना एक दूसरे को घूरते सफ़र करते लोगों के बनावटी चेहरे। वहाँ है तो सिर्फ आपका सुधरता स्वास्थ्य और आपकी खुद से होती बात जो आज के सामाजिक परिदृश्य में कहीं खो सी गयी है।

साईकिल सवारों के लिये मुख्य सड़क से अलग लेन का निर्माण इस सफर को सड़क पर तेज़ दौड़ते वाहनों से सुरक्षित बना सकता है। साईकिल सवारी के दौरान हेल्मेट का प्रयोग अनिवार्य करना चाहिए और इस विश्व साईकिल दिवस के दिन सरकार को बिना किसी देरी के साईकिल की सवारी को शान की सवारी बनाने पर गम्भीरता से विचार करना शुरू कर देना चाहिये।

Monday, June 1, 2020

घुटनों पर आता लिंकन का महान अमेरिका

महामारी कोरोना की वजह से एक लाख से ऊपर हो चुकी मौतों से पहले ही जूझ रहे अमेरिका में अब नस्लीय मौत के कारण हो रहे विद्रोह की वजह से संकट और गहरा गया है।

मिनिपोलिस में बेहतर ज़िंदगी की तलाश के लिए टेक्सास से मिनिपोलिस आये एक अश्वेत अमेरिकी नागरिक जॉर्ज फ्लॉयड को नकली डॉलर चलाने के प्रयास में पकड़ा गया था। एक राह चलते व्यक्ति के द्वारा बनाई गई नौ मिनट की वीडियो में दिख रहा है कि मिनिपोलिस के एक पुलिस कर्मी डरेक चाउवीन ने जॉर्ज फ्लॉयड की गर्दन को अपने घुटनों से दबाया हुआ है और जार्ज फ्लॉयड उसमें अपने चारों ओर घिरे पुलिस कर्मियों से कह रहा है कि उसे साँस लेने में कठिनाई हो रही है।
उसकी मृत्यु के बाद से पुलिस हिरासत में हुई इस मौत का विरोध पूरे अमेरिका में फ़ैल गया है और अब इस विरोध ने हिंसक रूप ले लिया है।

यह विरोध सिर्फ एक दिन हुई घटना की वज़ह से नही हो रहा है इसकी चिंगारी अमेरिका में काफी सालों से भड़क रही है। 
4 जुलाई 1776 में अमेरिका को स्वतंत्रता मिल गयी थी। 
पर अफ्रीका से लाये गये अश्वेत गुलामों को दासता से मुक्ति नही मिली थी। उनसे घर के सारे कार्य कराए जाते थे, खेती में भी अश्वेतों से कार्य कराया जाता था और उनका शारीरिक शोषण आम बात थी। आज़ादी के बाद उनको अधिकार देने की बात शुरू हो गयी थी पर उत्तर और दक्षिणी अमेरिका में इस बात को लेकर मतभेद था। दक्षिणी राज्यों की बढ़ती नाराज़गी को कम करने के लिये वर्ष 1850 में भगोड़ा दास कानून लाया गया जिसमें मालिक से भाग चुके अश्वेतों को पकड़कर वापस लाया जा सकता था। उत्तर और दक्षिण राज्यों के बीच इन्हीं मतभेदों की वजह से 1861-1865 के बीच गृह युद्ध चला। अब्राहम लिंकन ने इन सभी आपसी मतभेदों को खत्म कर मुक्ति उद्धघोषणा लाने के बाद गृह युद्ध समाप्त कराया।
उसके सौ साल बाद भी अमेरिकी समाज में अश्वेतों की स्थिति में कुछ खास सुधार नही आये और ना ही उन्हें श्वेतों के समान अधिकार प्राप्त हुए इसी के परिणाम स्वरूप वर्ष 1955-68 तक मार्टिन लूथर किंग की अगुवाई में अमेरिका में अफ्रीकी अमेरिकी नागरिक अधिकार आंदोलन चला। इसी आंदोलन के बीच 1963 में अपने दिये गये एक भाषण में मार्टिन लूथर किंग ने कहा था कि आज मुक्ति उद्घोषणा के सौ साल बाद भी अश्वेत अमेरिकी अपने देश में ही खुद को निर्वासित पाता है और समाज के कोनों में सड़ रहा है। उन्होंने कहा था कि मेरा एक स्वप्न है कि भविष्य का अमेरिका ऐसा हो जहाँ मेरे बच्चे अपने रंग से नही अपने काम और चरित्र से पहचाने जाएं।
उसके बाद भी वर्ष 1919 में शिकागो दंगे हुए, 1992 में लांस एंजेल्स दंगों ने अमेरिका पर दाग लगाया।

साल 2014 जुलाई में ठीक इसी तरह का वीडियो सामने आया था जब न्यूयॉर्क में एक अश्वेत पिता एरिक गार्नर को पुलिस द्वारा इसी तरह मारा गया था।

वर्ष 2014 में ही अमेरिका के क्लेवलेंड, ओहियो में एक बारह वर्षीय बच्चे तामिर राइस को पिस्तौल लेकर घूमने की सूचना पर पुलिस कर्मियों ने गोली मार दी जिससे उसकी मौत हो गयी थी। जाँच में पाया गया कि बच्चे के पास वह पिस्तौल नकली थी।

इसी साल 23 फरवरी में अहमद अरबरी नामक अश्वेत अमेरिकी को जॉगिंग करते हुए उसके घर के पास ही लुटेरा समझ कर श्वेत पिता-पुत्र ने मिलकर गोली मार दी थी।

अमेरिकी अखबार 'द गार्जियन' द्वारा कराए गये एक सर्वे के अनुसार अमेरिका में पुलिस द्वारा प्रति दस लाख लोगों में मारे गये 7.13 लोग अश्वेत होते हैं वही मारे गये श्वेतों की संख्या 2.91 है। अमेरिका में पुलिस द्वारा एक साल में एक हज़ार लोग मारे जाते हैं।

बराक ओबामा जब अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने थे तब यह लगा था कि अब नस्लीय भेदभाव वाला अमेरिका पीछे छूट गया है पर ट्रम्प के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद स्थिति और बदतर हो गयी। ट्रम्प का नस्लीय भेदभाव से पुराना नाता रहा है।
1973 में ट्रम्प पर आरोप लगे थे कि उन्होंने रंग के आधार पर अपने फ़्लैट किराए पर दिए थे। अश्वेतों को अपने फ़्लैट किराए पर देने से उन्होंने साफ मना कर दिया था।
1980 में किप ब्राउन जो ट्रम्प बिल्डिंग के पुराने कर्मचारी थे उन्होंने ट्रम्प पर यह आरोप लगाया था कि जब ट्रम्प कैसिनो में आते थे तो अश्वेतों को वहाँ से हटने के लिए कहा जाता था।
वर्ष 1989 में बलात्कार के आरोप में सजा होने के बाद मुक्त हो चुके पाँच अश्वेत नागरिकों पर ट्रम्प ने 2016 में बयान दिया था कि वह अब भी मानते हैं कि वो पांचों दोषी थे।
2015 में मेक्सिकन अप्रवासियों को ट्रम्प ने अपराधी, बलात्कारी और नशे का कारोबार करने वाला कहा था।
2016 में उन्होंने अश्वेतों को गरीबी में जीने वाला कहा था। ट्रम्प हमेशा से ओबामा के विरोधी भी रहे हैं।

मिनिपोलिस पुलिस ने पिछले साल ट्रम्प की एक रैली में 'कॉप्स फ़ॉर ट्रम्प' नारे की टीशर्ट पहन कर उनका स्वागत किया था। नस्लीय भेदभाव के खिलाफ हो रहे इन विरोधों के बीच ट्रम्प ने ट्विट कर इन प्रदर्शनकारियों को ठग्स(डाकू, अपराधी) कहा है।
जिसे ट्विटर ने हिंसा भड़काने वाला ट्वीट कहा है।
व्हाइट हाउस के सामने यह प्रदर्शन इतना बढ़ गया था कि सुरक्षा कारणों से ट्रम्प को बंकर में ले जाया गया।

अब देखना यह होगा कि जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के बाद हो रहे यह प्रदर्शन भविष्य के अमेरिका में कुछ बदलाव ला पाएंगे या नही। कोरोना की वजह से पहले ही आर्थिक रूप से टूट रहे अमेरिका को अपनी विश्व महाशक्ति की छवि बरकरार रखने के लिये गोरे काले के इस तिलिस्म को तोड़कर हर नागरिक को एक ही नज़र से देखना शुरू करना होगा।
मार्टिन लूथर किंग ने श्वेत अश्वेत की धारणा मुक्त जो अमेरिका देखा था वह तभी सम्भव हो पायेगा।




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