Tuesday, July 23, 2024

कांवड़ मेले के साथ धर्म नगरी का एक और चेहरा।

हरिद्वार में जब कांवड़ मेला चलता है तब किसी न किसी वजह से वह चर्चा में बना ही रहता है। कांवड़ियों और उनके मार्ग में पड़ रहे दुकानदारों पर सबका ध्यान होता है पर हरिद्वार के फ्लाईओवरों, पुलों के नीचे रह रहे बेघर लोगों के साथ घाटों पर शिव भक्तों से जुड़े सामान बेचने वालों की किसी को सुध नही रहती है।

कैसे जीते हैं फ्लाईओवर के नीचे रहने वाले।

हरिद्वार में कांवड़ियों की फ़ौज के बीच रिक्शा चालकों का काम ठप पड़ा रहता है। 
रात ढाई बजे शराब पीकर बैरागी कैंप में गंगा किनारे सो गए रवि की सुबह पांच बजे जब नींद खुली तो वह पास के फ्लाईओवर के नीचे बने अपने ठिकाने की ओर चल दिए।
फ्लाईओवर के नीचे रवि जैसे सात आठ लोग और भी रहते हैं, इनमें से रवि की दोस्ती अपने जैसे ही एक और रिक्शाचालक राजेश से है। फ्लाईओवर के नीचे रहने वाले बाकी लोगों में कोई भीख मांग कर अपना पेट पालता है तो कोई पास ही मंगलवार को लगने वाले भंडारे से पूरे हफ्ते का खाना इकट्ठा कर लेता है।

अपनी कहानी बताते रवि कहते हैं कि उनका घर लक्सर के पास ही एक गांव में था। तीन भाइयों में उनका एक भाई बस नशा करता है, एक देहरादून में मजदूरी और तीसरे वह खुद हैं। गांव में उनकी पांच बीघा जमीन थी, जो मां को कैंसर होने पर बिक गई थी। मां के गुजरने के बाद उनके सब्जी बेचने वाले पिता का भी देहांत हो गया था, तब से ग्रेजुएट रवि हरिद्वार में रोज़ के पचास रुपए पर रिक्शा किराए पर लेकर इसे चलाते हैं। वह कहते हैं कि रिक्शे से वह दिन भर में तीन सौ से लेकर हजार रुपए तक भी कमाई कर लेते हैं।

सरकारी ऑफिसों के तामझाम से बचने वाले लोग।

लगभग चालीस साल के दिखने वाले राजेश बदायूं के हैं और उनके माता पिता कोई भी जीवित नही हैं। वह कहते हैं कि उनका प्रधानमंत्री जन धन योजना खाता खुला हुआ है लेकिन उसमें कितने रुपए हैं यह देखने वह काफी समय से बैंक नही गए हैं। राजेश कहते हैं कि उन्हें सरकार की बेरोजगारी भत्ता योजना व कई अन्य योजनाओं की ख़बर तो रहती है पर उन्हें प्राप्त करने के लिए सरकारी ऑफिसों के चक्कर लगाने पड़ेंगे, तो वह इन सब के पीछे पड़ते ही नही। राजेश कहते हैं कि हम दोनों भविष्य की परवाह किए बग़ैर अपनी रोज़ की कमाई शराब, खाने में खर्च कर देते हैं।

केवाईसी करवाना इनके लिए मुसीबत।

इन्हीं के साथ रहने वाले पंचकूला के ओम कुमार कहते हैं कि उन्होंने बठिंडा में मिठाई की दुकान में कई साल काम किया था और वह रिक्शा भी चलाते थे। तीन साल पहले शरीर में काम करने की हिम्मत नही रही तो हरिद्वार चले आए। दुकानों में साफ सफाई करने के बाद दुकानदार उन्हें बीस तीस रुपए दे देते हैं, जिससे उनका खर्चा चल जाता है। ओम कुमार के पास फोन नही है, उनका बैंक खाता भी है लेकिन उन्हें नही पता कि वह चल भी रहा है या नही क्योंकि उन्होंने उसकी केवाईसी नही करवाई है। ओम ने बताया कि 2014 में उन्हें डॉक्टर ने बताया कि उनके फेफड़े अस्सी प्रतिशत खराब हो गए हैं, इसके बावजूद वह अभी तक जीवित हैं। वह कहते हैं कि अब यहां हरिद्वार में अपना इलाज करवाने के लिए उनके पास रुपए नही हैं और सरकारी अस्पताल में भी वह ज्यादा रुपए खर्च होने के डर की वजह से नही गए हैं। 

महंगाई के इस दौर में बच्चों के स्कूल की फीस और सिलेंडर।

बैरागी कैम्प घाट में कांवड़ मेले के दिनों कमाई की उम्मीद से कांवड़ भक्तों से जुड़ी सामग्री के लिए लकड़ी की तख़्त में दुकान चलाने वाले शिवकुमार से सुबह चार बजे हमारी बात हुई, मच्छरों से परेशान होकर गंगा घाट में बैठ गए शिवकुमार कहते हैं कि वह कनखल रोड में स्थित एक आश्रम में हजार रुपए का कमरा लेकर किराए पर रहते हैं। उनके दादाजी हरिद्वार के ही किसी गांव से शहर आ गए थे और दुधारू पशुओं के लिए घास काटते थे। फिर उनके पिता रिक्शा चलाने लगे, आठवीं तक पढ़ने के बाद शिवकुमार ने साइकिल बनाने का काम सीखा। शिवकुमार ने बताया कि इस समय उनकी उम्र लगभग 55 साल है और शादी के बाद से ही हर साल कांवड़ मेले के दौरान, वह यहां घाट पर दुकान लगाते हैं। लड़की की शादी कराने के बाद बच्चा जनते मौत हो गई थी, उसकी शादी में उन्होंने अपने जीवन भर की कमाई तीन से चार लाख रुपए लगा लिए थे और अब वह रुपए कमाने के लिए फिर से मेहनत कर रहे हैं।

शिवकुमार कहते हैं कि साइकिल रिपेयरिंग की दुकान से वह महीने के तीन हजार रुपए लगभग कमा लेते हैं, उनकी पत्नी भी आश्रम में तीन हजार रुपए वेतन में साफ सफाई का काम करती है। एक लड़की गुजर जाने के बाद उनके अभी दो बच्चे हैं, जिनकी स्कूल की फीस साल की लगभग दस हजार रुपए है। गैस का दाम हजार रुपए के आसपास और सब्जियों के दाम भी आजकल आसमान छूने की वजह से घर चलाने में परेशानी होने की बात भी वह स्वीकार करते हैं, उन्हें कांवड़ मेले में लगाई इस छोटी से दुकान से सात से आठ हजार रुपए कमाई की उम्मीद है। 
शिवकुमार ने आगे बताया कि उनका प्रधानमंत्री जन धन योजना खाता है, जिसमें उन्होंने सौ रूपए जमा किए हुए हैं। हाल ही में आयुष्मान कार्ड से उन्हें सरकारी अस्पताल में पत्नी के इलाज में मदद मिली थी।

हिमांशु जोशी।
@himanshu28may


Friday, July 5, 2024

अस्कोट- आराकोट यात्रा : नदियों से गंदगी हटाने और जंगल में ग्रामीणों के अधिकारों की पैरवी करती एक यात्रा।

उत्तराखंड में ऐतिहासिक अस्कोट- आराकोट यात्रा पद्मश्री से सम्मानित डॉक्टर शेखर पाठक के मार्गदर्शन में छठी बार हो रही है। यात्रा से जुड़े यात्रियों ने यमुनोत्री से जुड़ी ऐसी जानकारी साझा की है, जिसे सुनकर हमें अपनी नदियों के रखरखाव के बारे में नए सिरे से सोचना होगा। इसके साथ ही उत्तराखंड के जंगलों में आग की समस्या का समाधान भी जंगलों में ग्रामीणों के अधिकारों से ही होता दिख रहा है।

मनमोहन चिलवाल रिटायर्ड बैंक कर्मी हैं और नैनीताल में रहते हैं. मनमोहन ने इससे पहले दो बार यात्रा में आंशिक तौर पर हिस्सा लिया था लेकिन इस बार वह पहली बार पूरी यात्रा में शामिल हो रहे हैं। यमुनोत्री पहुंचने के लिए उन्होंने दल के अन्य छह सदस्यों के साथ उत्तरकाशी से असी गंगा घाटी, डोडीताल, दरवा टॉप, सीमा बुग्याल, हनुमान चट्टी का रास्ता चुना। अगोड़ा गांव से यमुनोत्री तक यह पैदल रास्ता करीब 51 किलोमीटर है। मनमोहन कहते हैं इसमें उन्होंने 3800 मीटर की अधिकतम ऊंचाई को भी पार किया। सुबह 8 बजे अगोड़ा से शुरू हुआ यह रास्ता बुग्याल का रास्ता था, बुग्याल में ऊंचे नीचे रास्ते होते हैं और यह घास से भरे होते हैं। इनमें विभिन्न प्रकार के फूल भी थे, जैसे पोटेंटिला, स्नेक लिली, ब्रह्म कमल, अतीस, सफेद बुरांश, प्रिमुला आदि थे।

मनमोहन कहते हैं कि इस रास्ते मे हम घने कोहरे की वजह से कई बार भटके और कभी- कभी तो कोहरा इतना घना था कि वह अपने से 20 मीटर की दूरी पर खड़े साथी को भी नही देख पा रहे थे। ढाई घण्टे रास्ता भटकने के बाद उन्होंने सही रास्ता देखा। आगे वह कहते हैं कि अब तेज़ चलते हुए उनका दल रात करीब 9 बजे हनुमान चट्टी पहुंचा। वहां एक ढाबे में रात्रि विश्राम करने के बाद सुबह 8 बजे वह यमुनोत्री के लिए रवाना हुए, करीब 10 बजे यमुनोत्री पहुँचने पर उन्होंने देखा कि बाजार का कचरा नदी में फेंका जा रहा था, साथ ही सफाई कमर्चारी घोड़े की लीद भी नदी में ही झाड़ रहे थे। यही पानी आगे चलकर यमुना की मुख्यधारा में शामिल होता है और कई राज्य यही पानी पीते हैं। अपनी बात आगे बढ़ाते मनमोहन कहते हैं कि साल 1991 में जब वह पहली बार यमुनोत्री गए थे, तब नदी का पानी बहुत साफ था। अब उन्होंने एक नई बात वहां यह देखी कि महिलाओं की साड़ी, धोती भी नदी में प्रभावित की जा रही थी, जिसकी वजह से यमुनोत्री के स्त्रोत पर ही इन कपड़ों का बड़ा ढेर लग गया था।

हर्ष काफर ने कहा जो सक्षम उनके लिए घोड़ा क्यों!

उत्तराखंड में युवाओं के बीच सोशल मीडिया पर खासे लोकप्रिय हर्ष काफर भी इस साल अस्कोट- आराकोट यात्रा में हिस्सा ले रहे हैं। यात्रा में चलते हुए वह अपने अनुभवों को सोशल मीडिया पर साझा भी कर रहे हैं। उन्होंने फेसबुक पर इसी मुद्दे को लेकर पोस्ट करते लिखा-

 'यमुनोत्री में नहाने के बाद 
अपनी साड़ियाँ चढ़ा देती है नारी
मुझे बस ये जानना है
ये परंपरा कहाँ से शुरू हुई प्यारी।

इस विषय पर हमने पहली बार यह यात्रा कर रहे हर्ष काफर से बातचीत करी, वह कहते हैं कि हनुमानचट्टी से जानकी चट्टी की तरफ जाने के बाद यमुनोत्री का ट्रैक शुरू होता है। वहां खाने की, घोड़ों की लीद की बदबू आ रही थी। आगे बात करते हर्ष कहते हैं कि सिर्फ असहाय लोगों को ही घोड़ा मिलना चाहिए। जानकी चट्टी से यमुनोत्री लगभग 5 से 6 किलोमीटर ही होगा इसलिए जो चल सकते हैं ऐसे सक्षम लोगों के लिए घोड़ा नही चलवाया जाना चाहिए। घोड़ों के अनियंत्रित तरीके से चलने की वजह से पैदल यात्रियों को बड़ा खतरा रहता है। इसके साथ ही साड़ियों को नदी में फेंकने के नए चलन पर भी वह सवाल उठाते हैं।

हरीश पाठक 'पहाड़' प्रकाशन के प्रबन्धक हैं, वह साल 1974 से हर दस साल में होने वाली ऐतिहासिक अस्कोट- आराकोट यात्रा के पचासवें वर्ष में भाग ले रहे हैं। हरीश कहते हैं कि यह उनकी दूसरी अस्कोट- आराकोट यात्रा है। अपनी अब तक की लगभग 1100 किलोमीटर की यात्रा के अनुभव में पड़े यमुनोत्री पड़ाव पर बात करते हरीश कहते हैं कि यमुनोत्री हमारा धार्मिक स्थल है और वहां से यमुना नदी का उद्गम होता है। जब हम सात यात्रियों का दल, मुख्य दल से अलग यात्रा करते वहां पहुंचा तो हमने देखा कि यमुनोत्री बाजार में गंदगी भरी पड़ी है। घोड़े, यात्रियों को कंधे में ले जाते नेपालियों, यात्री वाहनों से बाजार में चलने की जगह नही थी। हरीश कहते हैं कि इसका समाधान घोड़ों के लिए एक अलग स्टैंड बना कर, वहीं से यात्रियों को बैठा कर किया जा सकता है। इसके आगे लगभग छह किलोमीटर दूर तीर्थ स्थान तक पहुंचने के लिए हम नदी के किनारे चलते हैं, तब हम देखते हैं कि उस रास्ते में घोड़ों की वजह से नदी में गिरने और चोट लगने का भय बना रहता है। मैंने घोड़ों को लीद करते देखा और उसको देख मुझे यह समझ नही आया कि इस गंदगी का सही निस्तारण कैसे किया जाता होगा क्योंकि वहां उसके लिए कोई डस्टबिन या उसे अलग से इकट्ठा करने की जगह नही थी। हरीश कहते हैं यमुनोत्री के नजदीक पहुंच कर हमें यमुना में धोती, साड़ियां दिखती हैं और थोड़ा आगे चलते यमुना के हिस्सों में इनका ढेर भी नजर आता है। वहां स्थानीय लोगों से पूछने पर पता चला कि पहले यह कपड़े नदी नही फेंकी जाती थी, कुछ सालों पहले ही इसकी शुरुआत हुई है। हरीश कहते हैं उन कपड़ों को नदी में फेंकना ही है तो यमुनोत्री मंदिर के रखरखाव करने वालों द्वारा इसका निस्तारण किया जाना चाहिए।

जंगलों पर ग्रामीणों के अधिकार से ही बचेंगे जंगल।

48 वर्षीय खेमराज सिंह ज्याड़ा डख्याट गांव में खेतीबाड़ी करते हैं, गांव के जंगल के बारे में बात करते वह कहते हैं कि गांव के  जंगल पर पूरा अधिकार ग्रामीणों का ही है। ग्राम वन पंचायत समिति डख्याट समिति का सरपंच होता है, जिसका चुनाव पांच साल में होता है और यह चुनाव प्रशासनिक अधिकारियों की देखरेख में होता है। इस बार जब मई जून और अब भी बड़कोट और आसपास पानी की दिक्कत हुई तो हमारे गांव के चार पानी के स्त्रोत सूखे नही और आस पास के गांव भी यहां से पानी ले गए। पहाड़ की बाकी जगह के लोग इस गर्मी में रजाई छोड़ते गए तो हमारे यहां मौसम इतना ठंडा रहा कि रात में हम रजाई ओढ़ के सोते हैं। खेमराज कहते हैं कि गांव वालों के लिए इस जंगल की लकड़ी, चारा पत्ती काटना मना है। हर पांच साल में वन पंचायत समिति की निगरानी में लकड़ियों की काट छांट की जाती है। जंगल में अगर रात के बारह बजे भी आग लग रही होती है, तो हम उसकी आग बुझाने जाते हैं।

ठडुंग गांव में जंगल देता है पानी तो ग्रामीण करते रहे हैं उसकी सुरक्षा।

जंगल में ग्रामीणों के अधिकारों की महत्वता का अंदाज़ा हम ठडुंग गांव में जाकर जगमोहन सिंह राणा के साथ बातचीत करते भी लगा सकते हैं। जगमोहन कहते हैं कि हमारा गांव लाल धान की खेती के लिए मशहूर है और हमारे यहां पानी का स्रोत ही अच्छी खेती की वजह है। गांव के ठीक ऊपर बांझ के पेड़ों का जंगल है और उसकी हम पूरी तरह से रक्षा करते हैं। गांव में 7-8 लोगों की टीम बनी है जो जंगल में आग लगने पर वन विभाग के साथ आग बुझाने में मदद करती है।

हिमांशु जोशी।

Wednesday, July 3, 2024

स्वील

यात्रा का पड़ाव स्वील गांव में पहुंचने पर हमें मनमोहन सिंह चौहान मिलते हैं। वह कहते हैं कि हमारा गांव कमल सेराई पट्टी में आता है। पट्टी के बारे में ज्यादा जानकारी देते वह कहते हैं पट्टी से अर्थ है कि सरकारी आंकड़ों में बीस पच्चीस गांव एक पट्टी में आते हैं।

आज स्वील में रुद्रेश्वर महादेव मेला लग रहा है। 
यह मेला जून जुलाई में लगता है।
 इस साल बजलाड़ी थान से महाराज बाहर निकल कर पश्चिम के कंडाव थान और देवसारी थान के तीस गांवों का भ्रमण करेंगे। मनमोहन ने बताया थान का अर्थ है कि चौदह गांव लगभग एक मंदिर की पूजा करते हैं। रुद्रेश्वर महाराज देवता चार थान के देवता हैं। हर साल देवता का निवास  अलग अलग थान में होता है।

इन दो महीनों में महाराज  जिस जिस गांव जाएंगे, वहां उस दिन मेला लगेगा। इसमें गांव से बाहर रहे सभी लोग अपने अपने गांव आकर पूजा पाठ करते हैं।

पहली रात को महाराज की पालकी में एक चांदी का बॉक्स रखा जाता है, यह गोलाकार बॉक्स पौराणिक काल से ही देवता के साथ है। पालकी मंदिर में रहती है, जिसमें देवता के साथ रुद्रेश्वर महादेव कमेटी के लोग रहते हैं। अगली सुबह आठ बजे मूर्ति दर्शन हेतु बॉक्स से बाहर निकाल कर देवस्थान (पीड़ा) पर रखी जाती है। लगभग दो ढाई हजार लोग इसके दर्शन करते हैं।

दिन में तीन बजे के लगभग महाराज की मूर्ति फिर बॉक्स में रख दी जाती है और पालकी सजाई जाती है। इसके बाद महाराज जी की पालकी मंदिर के प्रांगड़ में रखकर पूजा की जाती है। फिर दो- दो कर लोग पालकी को कंधे में रखकर ढोल नगाड़ों के साथ पालकी को नचाते हैं।

इसके बाद देवता को नाचते गाते दूसरे गांव के लिए विदा कर दिया जाता है।

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...