हरिद्वार में जब कांवड़ मेला चलता है तब किसी न किसी वजह से वह चर्चा में बना ही रहता है। कांवड़ियों और उनके मार्ग में पड़ रहे दुकानदारों पर सबका ध्यान होता है पर हरिद्वार के फ्लाईओवरों, पुलों के नीचे रह रहे बेघर लोगों के साथ घाटों पर शिव भक्तों से जुड़े सामान बेचने वालों की किसी को सुध नही रहती है।
कैसे जीते हैं फ्लाईओवर के नीचे रहने वाले।
हरिद्वार में कांवड़ियों की फ़ौज के बीच रिक्शा चालकों का काम ठप पड़ा रहता है।
रात ढाई बजे शराब पीकर बैरागी कैंप में गंगा किनारे सो गए रवि की सुबह पांच बजे जब नींद खुली तो वह पास के फ्लाईओवर के नीचे बने अपने ठिकाने की ओर चल दिए।
फ्लाईओवर के नीचे रवि जैसे सात आठ लोग और भी रहते हैं, इनमें से रवि की दोस्ती अपने जैसे ही एक और रिक्शाचालक राजेश से है। फ्लाईओवर के नीचे रहने वाले बाकी लोगों में कोई भीख मांग कर अपना पेट पालता है तो कोई पास ही मंगलवार को लगने वाले भंडारे से पूरे हफ्ते का खाना इकट्ठा कर लेता है।
अपनी कहानी बताते रवि कहते हैं कि उनका घर लक्सर के पास ही एक गांव में था। तीन भाइयों में उनका एक भाई बस नशा करता है, एक देहरादून में मजदूरी और तीसरे वह खुद हैं। गांव में उनकी पांच बीघा जमीन थी, जो मां को कैंसर होने पर बिक गई थी। मां के गुजरने के बाद उनके सब्जी बेचने वाले पिता का भी देहांत हो गया था, तब से ग्रेजुएट रवि हरिद्वार में रोज़ के पचास रुपए पर रिक्शा किराए पर लेकर इसे चलाते हैं। वह कहते हैं कि रिक्शे से वह दिन भर में तीन सौ से लेकर हजार रुपए तक भी कमाई कर लेते हैं।
सरकारी ऑफिसों के तामझाम से बचने वाले लोग।
लगभग चालीस साल के दिखने वाले राजेश बदायूं के हैं और उनके माता पिता कोई भी जीवित नही हैं। वह कहते हैं कि उनका प्रधानमंत्री जन धन योजना खाता खुला हुआ है लेकिन उसमें कितने रुपए हैं यह देखने वह काफी समय से बैंक नही गए हैं। राजेश कहते हैं कि उन्हें सरकार की बेरोजगारी भत्ता योजना व कई अन्य योजनाओं की ख़बर तो रहती है पर उन्हें प्राप्त करने के लिए सरकारी ऑफिसों के चक्कर लगाने पड़ेंगे, तो वह इन सब के पीछे पड़ते ही नही। राजेश कहते हैं कि हम दोनों भविष्य की परवाह किए बग़ैर अपनी रोज़ की कमाई शराब, खाने में खर्च कर देते हैं।
केवाईसी करवाना इनके लिए मुसीबत।
इन्हीं के साथ रहने वाले पंचकूला के ओम कुमार कहते हैं कि उन्होंने बठिंडा में मिठाई की दुकान में कई साल काम किया था और वह रिक्शा भी चलाते थे। तीन साल पहले शरीर में काम करने की हिम्मत नही रही तो हरिद्वार चले आए। दुकानों में साफ सफाई करने के बाद दुकानदार उन्हें बीस तीस रुपए दे देते हैं, जिससे उनका खर्चा चल जाता है। ओम कुमार के पास फोन नही है, उनका बैंक खाता भी है लेकिन उन्हें नही पता कि वह चल भी रहा है या नही क्योंकि उन्होंने उसकी केवाईसी नही करवाई है। ओम ने बताया कि 2014 में उन्हें डॉक्टर ने बताया कि उनके फेफड़े अस्सी प्रतिशत खराब हो गए हैं, इसके बावजूद वह अभी तक जीवित हैं। वह कहते हैं कि अब यहां हरिद्वार में अपना इलाज करवाने के लिए उनके पास रुपए नही हैं और सरकारी अस्पताल में भी वह ज्यादा रुपए खर्च होने के डर की वजह से नही गए हैं।
महंगाई के इस दौर में बच्चों के स्कूल की फीस और सिलेंडर।
बैरागी कैम्प घाट में कांवड़ मेले के दिनों कमाई की उम्मीद से कांवड़ भक्तों से जुड़ी सामग्री के लिए लकड़ी की तख़्त में दुकान चलाने वाले शिवकुमार से सुबह चार बजे हमारी बात हुई, मच्छरों से परेशान होकर गंगा घाट में बैठ गए शिवकुमार कहते हैं कि वह कनखल रोड में स्थित एक आश्रम में हजार रुपए का कमरा लेकर किराए पर रहते हैं। उनके दादाजी हरिद्वार के ही किसी गांव से शहर आ गए थे और दुधारू पशुओं के लिए घास काटते थे। फिर उनके पिता रिक्शा चलाने लगे, आठवीं तक पढ़ने के बाद शिवकुमार ने साइकिल बनाने का काम सीखा। शिवकुमार ने बताया कि इस समय उनकी उम्र लगभग 55 साल है और शादी के बाद से ही हर साल कांवड़ मेले के दौरान, वह यहां घाट पर दुकान लगाते हैं। लड़की की शादी कराने के बाद बच्चा जनते मौत हो गई थी, उसकी शादी में उन्होंने अपने जीवन भर की कमाई तीन से चार लाख रुपए लगा लिए थे और अब वह रुपए कमाने के लिए फिर से मेहनत कर रहे हैं।
शिवकुमार कहते हैं कि साइकिल रिपेयरिंग की दुकान से वह महीने के तीन हजार रुपए लगभग कमा लेते हैं, उनकी पत्नी भी आश्रम में तीन हजार रुपए वेतन में साफ सफाई का काम करती है। एक लड़की गुजर जाने के बाद उनके अभी दो बच्चे हैं, जिनकी स्कूल की फीस साल की लगभग दस हजार रुपए है। गैस का दाम हजार रुपए के आसपास और सब्जियों के दाम भी आजकल आसमान छूने की वजह से घर चलाने में परेशानी होने की बात भी वह स्वीकार करते हैं, उन्हें कांवड़ मेले में लगाई इस छोटी से दुकान से सात से आठ हजार रुपए कमाई की उम्मीद है।
शिवकुमार ने आगे बताया कि उनका प्रधानमंत्री जन धन योजना खाता है, जिसमें उन्होंने सौ रूपए जमा किए हुए हैं। हाल ही में आयुष्मान कार्ड से उन्हें सरकारी अस्पताल में पत्नी के इलाज में मदद मिली थी।
हिमांशु जोशी।
@himanshu28may