Wednesday, September 28, 2022

फिल्मों पर बनी एक फ़िल्म है 'चुप'

फिल्म समीक्षक इरीन थिरर ने न्यूयॉर्क डेली न्यूज़ अखबार के लिए साल 1928 में पहली बार फिल्मों को उत्कृष्ट, अच्छी, औसत, बुरी श्रेणी में बांटते हुए स्टार देना शुरू किया था।

मनोवैज्ञानिक रोमांच से भरी फिल्म 'चुप' फूलों की दुकान वाले डैनी की कहानी है जो फिल्म समीक्षकों के इन्हीं स्टार्स से चिढ़ता है। फिल्म में एक के बाद एक फिल्म समीक्षकों के मारे जाने के साथ ही डैनी की लव स्टोरी भी चलती है ,जो दर्शकों को फिल्म से जोड़ कर रखती है।

छा गए दुलकर, पुरानी छवि से बाहर निकलते सनी देओल और नई छवि बनाती श्रेया धनवंतरी 

डैनी बने अभिनेता दुलकर सलमान तमिल, तेलुगु, मलयालम, हिंदी फिल्मों में दिखते रहे हैं। दक्षिण भारतीय सिनेमा में कई सारे पुरस्कार जीतने वाले दुलकर ने 'चुप' में बेहतरीन काम किया है। खुद से बात करते डैनी के किरदार में दुलकर पूरी तरह खो गए हैं और आने वाले दिनों में हम उन्हें कई बड़ी हिंदी फिल्मों में देख सकते हैं।

फिल्म में सनी देओल पुलिस ऑफिसर के किरदार में दिखे हैं। इस बार उन्होंने अपनी गुस्सेल छवि पर नियंत्रण रख, दर्शकों को विविधता भरा सनी देओल दिखाने की कोशिश करी है और उनकी यह कोशिश बॉलीवुड में उनके दम तोड़ते कैरियर को जरूर नई जान देगी।

अभिनेत्री श्रेया धनवंतरी 'स्कैम 1992' वेब सीरीज़ से चर्चा में रही हैं और इस फ़िल्म में उनका किरदार एक युवा पत्रकार से ज्यादा डैनी की गर्लफ्रैंड होने पर ज्यादा केंद्रित रहा है। 'गया गया गया' गीत में वह खूबसूरत लगी हैं। 
यह गीत सुनने भी बड़ा प्यारा है।

फ़िल्म में पूजा भट्ट और सरन्या पोंवंनन जैसे बड़े नाम भी हैं, जिनका काम भी ठीक रहा है।
श्रेया, दुलकर सलमान के साथ फ़िल्म के अन्य कलाकारों ने जो भी ड्रेसेज़ पहनी हैं उनमें वह सही जमे हैं।

कुछ नया करते रहे हैं निर्देशक आर बाल्की, फ़िल्म में सिनेमा पर विशेष संवाद

'पा' और 'की एन्ड का' जैसी प्रयोगधर्मी फिल्म तो 'पैडमैन' जैसी सामाजिक फिल्म बनाने वाले निर्देशक आर बाल्की इस बार सिनेमा और सिनेमा समीक्षकों का महत्व समझाती फ़िल्म हमारे सामने लाए हैं। निर्देशक की नज़रों में सिनेमा क्या है, यह हम फ़िल्म के संवादों 'जिंदा फील करने के लिए सिनेमा चाहिए' और 'पेन (pain) इज़ द मोस्ट पॉवरफुल फ्यूल फ़ॉर एन आर्टिस्ट' से समझ सकते हैं।
आर बाल्की ने एक ढर्रे पर चली आ रही सिनेमा के बीच नया प्रयोग किया है। सोशल मीडिया और बाइक के शौक में डूबे युवाओं के इस जमाने में उनकी फिल्म का मुख्य पात्र साइकिल में घूमता है और नायिका को भी उसमें ही घुमाता है। 
नायिका के 'हे तुम सोशल मीडिया पे क्यों नही हो' पूछने पर नायक का जवाब होता है 'क्योंकि मैं आपके सामने हूं'।

हत्या के अलग अलग तरीकों और घटनास्थल के दिल दहला देने वाले दृश्यों से भी निर्देशक अपनी निर्देशन कला का नमूना दिखाते हैं।

फ़िल्म के बहुत से संवाद बेहद दमदार हैं और दर्शकों को फिल्मी जगत की सच्चाई से बेहद ही करीब से वाकिफ कराते हैं। जैसे 'पिक्चर रिव्यूज से थोड़ी चलती है, पिक्चर चलती है वर्ड ऑफ माउथ से'।
 
महानायक का संवाद, एक तीर दो निशाने 

चुप में बॉलीवुड के महानायक और आर बाल्की के पसंदीदा अभिनेता अमिताभ बच्चन भी दिखाई दिए हैं।
फिल्म समीक्षाओं पर उनका एक महत्वपूर्ण संवाद यह है कि समाज को आलोचक की सख्त आवश्यकता है। क्रिटिकिंग इज़ का मस्ट फ़ॉर सोसाइटी, फॉर प्रोग्रेस इन एनी फील्ड। अपनी खूबियों की शाबाशी सबको अच्छी लगती है लेकिन सच्ची शिक्षा तब मिलती है, जब कोई आपको अपनी खामियों का अहसास दिलाता है। बेहतर होने की राह दिखाता है।

अमिताभ द्वारा समीक्षा पर बोली गई यह पंक्तियां दर्शकों को आज के दौर में पत्रकारिता का महत्व समझाने का कार्य भी करती हैं। यह दर्शकों को समझाती है कि सिर्फ सच दिखाने वाली पत्रकारिता ही इस देश को बेहतरी के मार्ग पर लेकर जा सकती है।

लाइट्स और बैकग्राउंड स्कोर के दम पर बनी ये फिल्म याद रखी जाएगी

किसी मनोवैज्ञानिक रोमांच वाली फ़िल्म में दर्शकों को प्रभावित करने के लिए लाइट्स और बैकग्राउंड स्कोर का बड़ा महत्व होता है, इस फिल्म में इन दोनों से दर्शक प्रभावित होते हैं। अमन पन्त ने बैकग्राउंड स्कोर पर कमाल का काम किया है और उनके द्वारा इस्तेमाल की गई कुछ आवाज़ें फ़िल्म के अंत तक दर्शकों के दिमाग में गूंजती रहेंगी। 
लाइट्स के जरिए फ़िल्म के कई दृश्यों का रोमांच बढ़ाया गया है तो मुंबई की खूबसूरती से कभी कभी मन को शांत भी रखा गया है।
फिल्म के पटकथा लेखन में बैकग्राउंड स्कोर की अति न लगे, इस पर विशेष ध्यान दिया गया है।

फिल्मों पर बनी इस फिल्म को देखने के लिए सिनेमाघर तक पहुंचा जा सकता है।

हिमांशु जोशी
@himanshu28may



Tuesday, September 27, 2022

हाय पैसा हाय पैसा

हरिद्वार के मंगलौर में रहने वाले रामधारी का लड़का गिरधारी बचपन से ही पैसे की पीछे दौड़ लगाता था।

गिरधारी का दोस्त चकरु- "ए गिरधारी मेरे माचिस के डिब्बों में एक तिल्ली और दो सन्दूक हैं, अपनी दिखा।"
गिरधारी- "बेटा चकरु तुम दो सन्दूक तो हम तीन बंदूक हैं, निकालो हमारे पांच सौ रुपए।"

सातवीं में पढ़ने वाला गिरधारी स्कूल कम जाता था और
पैसा पैसा कहते हुए दिन भर गांव के पास रुड़की वाले वर्मा जी के बाग में दिन भर अपने बिगड़ैल दोस्तों के साथ माचिस के डिब्बे वाले खेल से पैसा कमाता। 

गिरधारी की मां चंपावती उसे दुनिया का सबसे अच्छा बेटा मानती थी, आखिर मानती भी क्यों न। गिरधारी ने ग्यारह साल की उम्र में ही अपने घर में खुद की कमाई से रेडियो, कुर्सी जोड़ लिए थे।

रामधारी को रुड़की जाने पर ही दिहाड़ी मिलती थी, कई बार वो रुड़की में ही अपने अन्य साथियों के साथ सड़क किनारे सो जाता था, इन परिस्थितियों में उसे अपने बेटे गिरधारी के बारे में ज्यादा सोचने का वक्त भी नही था।

वक्त बीतता गया, गिरधारी की पैसे की भूख बढ़ती जा रही थी। दसवीं में पहुंचते गिरधारी गांव के नए जुआरियों का मुखिया बन गया था, साथ ही उसने मंगलौर से रुड़की जाने वाली गाड़ी में क्लीनर का काम भी शुरू कर दिया।

स्कूल में कम और गाड़ी में लटके हुए ज्यादा दिखने वाला गिरधारी अपने कान में सवारियों से मिले नोटों को घुमा कर रखता और इन रंगबिरंगे नोटों की खुशबू उसे और पैसा कमाने के लिए प्रेरित करती।

"चकरु हमने सुना है ये गांव की लकड़ी रुड़की में बहुत महंगी बिकती हैं, चल आज से सांझ ढलते ही सेकल में इन्हें वहीं पहोंचा दिया करेंगे" गिरधारी बोला।
"गुरु जैसा तू कहे" बचपन से ही गिरधारी की पैसा कमाने की कला का कायल चकरु हमेशा उसकी हां में हां ही मिलाता था।

लकड़ी बेचकर और जुआं खेलकर पैसा कमाने वाला गिरधारी आज रुड़की से सूट बूट पहन नई स्पलेंडर बाइक खरीद कर आया था। उसकी मां चंपावती ये देख फूली नही समा रही थी, कमज़ोर देह के हो चुके रामधारी को तो शुरु से ही इन सब मोहमाया से मतलब नही था तो वह एक तरह बैठे हुक्का गुड़गुड़ाने में व्यस्त थे।
गिरधारी को इस भेष में देख गांव भर में कानाफूसी तो थी पर जमींदार साहब के घर, गांव में अपनी बाइक के बाद दूसरी बाइक आने की खबर से सबसे ज्यादा कौतूहल था। जमींदारनी की नज़र छत पर चढ़ गिरधारी के घर की तरफ ही गढ़ी हुई थी।
इन गरीबों के पन्नी से ढके एक लाइन में बने कच्चे मकान अलग ही चमकते थे, पर इनके बीच महंगे तिरपाल वाला गिरधारी का घर अलग ही दिखता था।

चकरु की मेहनत और गिरधारी का दिमाग जैसे जैसे बढ़ रहे थे। वैसे वैसे गिरधारी के पैसे की भूख भी बढ़ने लगी। चौड़ी छाती, लंबा कद, घुंघराले बाल, घनी मूंछो वाला गिरधारी अब 24 साल का आकर्षक युवा हो चला था। पैसा पैसा करता वो कई सारे गैरकानूनी काम करने लगा था, जिसमें नशा, तस्करी और मानव तस्करी जैसे काम शामिल थे।

एक रात गांव के ही ढाबे में चकरु के साथ पैग बनाते गिरधारी बोला "यार चकरु मुझे थोड़ा और पैसा मिल जाए तो रुड़की में घर बन जाए। बापू तो रहे नही, अब शहर में घर बना कर मां को वहीं रखता हूं।
वहीं शादी भी कर लूंगा और तू भी साथ ही रह लेगा।"

कुछ दिनों बाद नशे की तस्करी से गिरधारी मोटा पैसा कमा रहा था और अब उसने चकरु को हिस्सा देना कम कर दिया था। 
नई अल्टो कार खरीद, गले में सोने की मोटी चैन पहने गिरधारी ने मंगलौर की कच्ची सड़क में खूब धूल उड़ाई और फिर मां को कार बैठाकर रुड़की में घर बनाने के लिए खरीदा नया प्लॉट भी दिखा दिया।

जल्द पैसा कमाने की चाह रखने वाले मंगलौर के युवाओं में गिरधारी से अच्छा उदाहरण और कोई न था, उनके लिए वो आदर्श बन गया था।

 चकरु अब धीरे-धीरे पैसों के पुजारी गिरधारी से जलने लगा था, पुलिस ने नशीली वस्तुओं के व्यापार पर लगाम कसने के लिए नशे के सौदागरों पर अच्छा खासा इनाम रखा हुआ था।
पुलिस के इनाम का लालच और गिरधारी का घमंड चकरु को अपने लँगोटिया दोस्त का दुश्मन बना गया।
चकरु ने चरस लेकर शहर जा रहे गिरधारी की पुलिस से मुखबिरी कर दी।

मंगलौर से रुड़की जाने वाली सड़क के दोनों तरफ पेड़ थे, पुलिस अपनी जीप को ओट में लगाए गिरधारी का इंतजार कर रही थी।
अल्टो कार में गिरधारी कान के ऊपर दो हज़ार का नोट मोड़ कर फंसाया हुआ, अपनी धुन में मग्न होकर चला आ रहा था। पुलिस ने उसे रुकने का इशारा किया तो उसने गाड़ी और तेज़ भगा दी।

अगले दिन तेज़ बरसात हो रही थी,
चकरु अस्पताल के बाहर एक कोने में खड़ा गिरधारी की मां को संभाल रहा था। गिरधारी की लाश पोस्टमार्टम के लिए ले जाई जा रही थी, जीवन भर पैसे के पीछे भागने वाले गिरधारी के कान में अब भी दो हज़ार का नोट फंसा हुआ था और इंस्पेक्टर खुम्मन ने चकरु की तरफ आकर उसके हाथ में गिरधारी की मुखबिरी का इनाम एक लाख रुपए पकड़ा दिए। 

इस दुनिया में अकेली रह गई चंपावती इस खेल को कहां समझती , उसकी बूढ़ी हो चुकी आंखे तो बस अपने बेटे को आखिरी बार देख लेना चाहती थी।

हिमांशु जोशी

Friday, September 23, 2022

निर्देशक

कहानी

पात्र

अभिनय

छायांकन

म्यूज़िक

Saturday, September 17, 2022

तेरी याद साथ है

खिड़की के उस पार सामने तार पर कबूतर का जोड़ा चोंच से चोंच मिला रहा है।
 
साल 2017 हां, शायद सत्रह ही, तुम अपने ऑफिस की खिड़की के बाहर ऐसे ही बैठे कबूतर के जोड़े की तस्वीर मुझे भेज रही थी।

उस लाल रंग की इमारत में स्लेटी रंग के कबूतर का जोड़ा अपनी मोहब्बत की दास्तान लिख रहा था। उनके साथ एक और मोहब्बत की दास्तां लिखी जा रही थी, हमारी दास्तान।

तुम और मैं ऐसे ही तो थे, मन मस्तिष्क से एक। एक दूसरे के लिए समर्पित।

 इन शब्दों को पिरोना मैंने तुमसे ही तो सीखा है। 
तुम्हारे अखबारों, मैगज़ीनों में लिखे आर्टिकल।

मेरे लंबे लंबे वाट्सएप मैसेज, जिन्हें पढ़ तुम बैचैन हो उठती थी। 
बैचेन आज भी होती हो पर आज हालात कुछ और हैं।
आजकल मेरा लिखा कुछ भी पढ़ती हो तो यही कहती हो। 'सीखा किससे है'?

तुम्हीं तो प्रेरणा हो।  तुमने जो दर्द दिया वो अब भी मेरे दिल के किसी कोने से निकलकर दिमाग में उतर आता है और फिर कुछ भी लिखता हूं तो उसमें दिल और दिमाग साथ ही शामिल हो जाते हैं।

कॉलेज के शुरुआती दिन ही थे, जब एक दिन तुम अपनी सहेली के साथ पहली बार मुझे दिखी थी। वाट्सएप ग्रुप में एक दूसरे की बातों का जवाब देते देते कब हम एक दूसरे के साथ चैटिंग करने लग गए पता ही नही चला। पहले पहले एक दूसरे को जानने के लिए लिखे ये मैसेज, किसी फिल्मी कहानी की तरह अपना रंग बदलते रहे।

मुझे याद है जब तुम्हें मैंने पहली बार कॉल की थी । 25 दिसम्बर 2016।
तुम्हारे घर, पिछली जिंदगी के बारे में जानने के बाद कब तुमसे दिल लग गया पता ही नही चला।
तुमने भी अपनी जिंदगी के खालीपन को मुझसे भर लिया था। 
तुम्हारी हर याद हमेशा मेरे साथ है, बिल्कुल सामने। मानो किसी टेलीविजन पर चलती हुई। 

बहुत खूबसूरत लग रही थी तुम उस दिन, जब हम पहली बार साथ घूमने नैनीताल गए थे। 
भीगे खुले बालों के साथ तुम मेरे सामने आई और फिर सामने बैठे तुम्हें निहार रहा था तो मुस्कुराने पर हमेशा की तरह तुम्हारी नाक के दोनों तरफ निकल आई लकीरें। ये सब मेरी धड़कनें अब भी बढ़ा देते हैं।

उसी दिन पहली बार महसूस भी हुआ था कि किसी लड़की का साथ होना सिर्फ 'मजा' लेना भर नही होता, एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी का अहसास भी होता है। ये अहसास जब तक हम साथ रहे तब तक बने रहा और शायद इसी जिम्मेदारी ने हम दोनों को एक दूसरे के इतने करीब पहुंचा दिया।
 मेरे विचारों में ये रिश्ता आज भी ठीक वैसा ही है जैसा हीर रांझा, रोमियो जूलियट का रहा होगा।

इतना सब पढ़ने के बाद कोई सोचेगा कि सब ठीक था तो, अलग क्यों। 
मैं तुमसे कहता था न कि हमारी कहानी किसी बुलेट ट्रेन की तरह भाग रही है, बहुत तेज़। शायद तब मैं अकेले बैठ सोचता भी था 'कहानी लिखुंगा हम दोनों की, नाम.... 'बुलेट ट्रेन' ठीक रहेगा'।

आज जब भी मेरे मस्तिष्क में तुमसे दूर होने के दिनों की स्मृतियां जब नृत्य करने लगती हैं तो लगता है कि पूरे शरीर की रक्त धमनियां इस नृत्य से थक कर चूर हो रही हैं, मैं खुद को पेड़ से गिरे उस पत्ते की तरह महसूस करने लगता हूं जो टूट कर अंधड़, बारिश की वजह से पीला फिर काला से पड़ने लगा है। शायद प्रेम की अमर कथाओं में इसे ही किसी प्रेमी का प्रेम में तड़पना कहा गया है।

एक स्त्री का जीवन बहुत सी जिम्मेदारियों का घर होता है। घर में भतीजी, मम्मी, बहन, नानी सबको साथ जोड़े रखना तुम्हारी जिम्मेदारी थी।
बिना बाप की बेटी के लिए इस दुनिया में अकेले रहना कितना मुश्किल है ये मैंने तुमसे ही जाना।

तुम जब पहली बार अपनी मम्मी के साथ उसे देखने गई तो मैं सब कुछ भूल गया था, क्या कुछ नही कहा तुमसे। फिर भी तुम हमेशा मेरे साथ थी।
 तुम्हारा सर मेरे कंधों पर ही अपना सुकून ढूंढता था, कई बार उसे मेरे नाम से बुला लेती थी। 

कैसे तुम्हें, तुम्हारी यादों को गुनहगार ठहराऊं! तुमने तो एक दिन मेरी आँखों मे आंख मिला खुद कह डाला था 'मना कर दूं, अपने घर, कह दूंगी के मुझे नही करनी उससे शादी'

मैं चुप था, नही चाहता था कि हमारा रिश्ता तुम्हें कभी कोई दुख दे। क्या मैं तुम्हें कभी कोई दुख दे सकता था!

तुम्हारी शादी से कुछ दिन पहले हमारी बात होती रही पर फिर 'शौर्य' के पैदा होने पर तुमने मुझे उसकी तस्वीर भेजी थी। 
तुम्हारी तरह ही है वो, वहीं आंखें, वही मासूमियत। 

अब हमें पता है कि हम दोनों की मंजिल तो एक है, पर रास्ते अलग हैं। इस यात्रा में तुम्हारा सहयात्री कोई और है , मेरा सहयात्री कोई और।

फिर भी आज मैं खुश हूं क्योंकि इस स्मार्टफोन वाली जिंदगी में जहां भी रहूं, तेरी याद साथ ही है।
अब इस स्मार्टफोन की वजह से ये विरह भी इतना नही सालता।
 जब याद आए तो महबूब की तस्वीर निहारी जा सकती है और तुम्हारी जिंदगी की कहानी भी वाट्सएप स्टेटस बताते ही रहता है।
 शायद तुम भी मेरी तरह इसमें खुश रहती होगी या नही भी। 

Wednesday, September 14, 2022

हिंदी के प्रसार के लिए इसे रोजगार की भाषा बनाना होगा।

 14 सितम्बर 1949 को हमारे देश की संविधान सभा ने एक मत से निर्णय लिया कि हिन्दी भारत की राजभाषा होगी. इस महत्वपूर्ण निर्णय के बाद हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा के अनुरोध पर 1953 से देशभर में 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा.

यूनाइटेड नेशंस में हिंदी का प्रयोग बढ़ाने के प्रयासों के लिए हाल ही में भारत ने 8 लाख डॉलर का योगदान किया है. 
इंडियन मिशन ने कहा कि भारत सरकार यूएन में हिंदी के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास करती रही है. इन प्रयासों के तहत करीब चार साल पहले वर्ष 2018 में यूएन के डिपार्टमेंट ऑफ पब्लिक इंफॉर्मेशन के साथ मिलकर भारत ने Hindi@UN प्रोजेक्ट शुरू किया था. इसका लक्ष्य यूनाइटेड नेशंस की पहुंच हिंदी भाषा में बढ़ाने का है और दुनिया भर के लाखों हिंदी भाषी लोगों को वैश्विक मुद्दों को लेकर जागरूक करना है.


भारत सरकार द्वारा हिंदी के प्रचार प्रसार का यह प्रयास सालों से हो रहा है, हिंदी को विश्व भाषा बनाने की बात की जाती पर वास्तविकता यह है कि हिंदी अब तक अपने देश में ही लोकप्रिय नही हो पाई है.
हिंदी को देशभर लागू कराने का प्रयास विवाद का विषय भी रहा है. पिछले कुछ दिनों से कुछ बड़ी हस्तियां भी इस विवाद में उतरी हैं , पर वो सब हिंदी की जमीनी हकीकत से अनजान लगते हैं. भारतीयों ने अधिकतर कामकाजों में एक विदेशी भाषा को तो प्राथमिकता दी है पर हिंदी भाषा जो अधिकतर लोगों द्वारा समझे, बोले जाने की वजह से देश के विकास में सहायक है, उसे विवाद का विषय बना दिया है.

 हाल ही में फ़िल्म निर्देशक, अभिनेता किच्चा सुदीप ने एक इंटरव्यू में कहा था, 'पैन इंडिया फिल्में कन्नड़ में बन रही हैं, मैं इस पर एक छोटा सा करेक्शन करना चाहूंगा. हिंदी अब नेशनल लैंग्वेज नहीं रह गई है. आज बॉलीवुड में पैन इंडिया फिल्में की जा रही हैं. वह (बॉलीवुड) तेलुगू और तमिल फिल्मों का रीमेक बना रहे हैं, लेकिन इसके बाद भी स्ट्रगल कर रहे हैं. आज हम वे फिल्में बना रहे हैं जो दुनिया भर में देखी जा रही हैं.' 

किच्चा के इस बयान के बाद अजय देवगन ने हिंदी के समर्थन में हिंदी को राष्ट्रीय भाषा बताते हुए यह ट्वीट किया.
अजय की रोज़ी रोटी हिंदी सिनेमा से चलती है तो उनका हिंदी के समर्थन में आना बनता है पर यहां वह हिंदी को राजभाषा की जगह राष्ट्रीय भाषा कह गए.

हिंदी के प्रसार को लेकर कुछ ऐसा ही बयान कुछ दिन पहले देश के गृहमंत्री अमित शाह की तरफ से आया था.
संसदीय राजभाषा समिति की 37वीं बैठक में गृह मत्री अमित शाह ने कहा था कि अलग-अलग राज्यों के लोगों को आपस में अंग्रेजी की जगह हिंदी में बात करनी चाहिए.

गृहमंत्री और अजय का हिंदी के समर्थन में दिया गया बयान जमीनी स्तर पर देश की राजभाषा की स्थिति के साथ न्याय करता नही जान पड़ता है.

किच्चा सुदीप भी अपनी जगह कहीं न कहीं सही ही हैं.
उत्तर भारत के लोग के लिए हिंदी पहली भाषा है तो दक्षिण, पूरब और पश्चिम में हिंदी दूसरे और तीसरे नम्बर पर खिसक जाती है.

हिंदी देश की राजभाषा है इसलिए सरकारी विभागों में हिंदी अनुभाग आवश्यक है और बहुत से सरकारी काम हिंदी में होते हैं लेकिन उस हिंदी को समझना अक्सर आम हिंदीभाषी के लिए भी टेढ़ी खीर साबित हो जाता है.
उदाहरण के लिए हम अमित शाह के मंत्रालय की ही वेबसाइट का छोटा सा उदाहरण अपने पाठकों के सामने रखते हैं तो इसके होमपेज https://www.mha.gov.in/hi
में लिखे कुछ शब्दों को समझने के लिए हम गूगल का रुख करने पर मजबूर हो जाते हैं.
जैसे 'भित्ति चित्र' जिसे साधारण भाषा में दीवार पर बनाया गया चित्र भी कहा जा सकता था. साथ ही इसमें हमें 'अंतर्विष्ट' और 'उपबंध' जैसे कठिन शब्द भी दिखाई पड़ते हैं.

ज्यादातर कार्यालयों की हिंदी भाषा आमजनों के लिए समझनी मुश्किल ही बनी रहती है.



हिंदी भाषी लोगों को छोड़ दें तो अन्य के लिए तो हिंदी अनजान भाषा ही है.
भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण से जुड़े एक मामले में साल 2011 के अंत में गुजरात हाईकोर्ट ने कहा था कि गुजरातियों के लिए हिंदी भाषा एक अनजान भाषा है.

अपनों में ही बेगानी हिंदी

सिविल सेवा परीक्षा और एनटीए नेट जैसी महत्वपूर्ण परीक्षा में हिंदी माध्यम में परीक्षा दे रहे छात्रों से यह कह दिया जाता है कि हिंदी अनुवाद गलत होने की स्थिति में अंग्रेज़ी में लिखे को सही माना जाएगा.

सिविल सेवा परीक्षा परीक्षा में वर्ष 2010 तक, हिंदी माध्यम के उम्मीदवारों में कम से कम तीन या चार उम्मीदवारों द्वारा शीर्ष 10 रैंकिंग प्राप्त की जाती थी. अब यह आंकड़ा शीर्ष 300 में भी नही है.

हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए इसे रोजगार की भाषा बनाना जरूरी है

कार्यालयों और शिक्षा क्षेत्र में बढ़ावा देने के साथ ही हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए उसे रोज़गार की भाषा बनाना भी जरूरी है.

अमर उजाला के साथ ज़ूम मीटिंग में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर श्योराज सिंह बेचैन कहते हैं कि विज्ञान ,मेडिकल और कानून की पढ़ाई हिंदी में की जाएगी, तभी रोजगार की संभावनाएं बढ़ेंगी. अंग्रेजी के प्रति मोह के कारण हिंदी की अपेक्षा हुई है. अंग्रेजी स्कूलों में हिंदी बोलने में फाइन लगता है, कई जगह हिंदी बोलने पर मानसिक तौर से भी हीन संभावना महसूस की जाती है.
लोगों को एमए हिंदी बताने में शर्म महसूस होती है इसलिए एमए साहित्य कह दिया जाता है. विदेशी छात्र हिंदी को अधिक जिम्मेदारी से सीखते हैं.
 सुरीनाम में हिंदी के विस्तार कारण फिल्मों और अखबारों को बताया गया.

भारत में भी हिंदी फिल्म और अखबारों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. हैदराबाद की रहने वाली और हिंदी विषय में शोध कर रही उषा यादव भी प्रोफ़ेसर बेचैन की तरह ही हिंदी अखबारों को बढ़ावा देने की आवश्यकता महसूस करती हैं. वह कहती हैं कि वैकल्पिक हटा कर हिंदी को अनिवार्य बना देना चाहिए.

यह सच है कि वक्त के साथ हिंदी प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, यूट्यूब ,व्हाट्सएप कई जगह लोगों को रोजगार दे रही है. कोरोना काल में इंटरनेट का प्रयोग कर हिंदी से रोजगार प्राप्त करने वालों की संख्या बढ़ी है.

मीडिया के साथ-साथ अध्यापन ,विज्ञापन ,अनुवादक और पर्यटन के क्षेत्र में हिंदी में रोज़गार की अथाह संभावना हैं.
विदेशी साहित्य के साथ-साथ देशी साहित्य का भी हिंदी अनुवाद उपलब्ध नहीं है, जिस कारण हम अपने ही साहित्य से अपरिचित हैं. देश में अंग्रेजी, हिंदी ,गुजराती पंजाबी या कोई भी अन्य भाषा पूरी तरह से प्रचलन में नहीं है. यदि सब जगह एक ही भाषा प्रचलन में होगी तो लोगों को भी विविध विषयों और साहित्य का ज्ञान एक ही जगह उपलब्ध हो जाएगा. हिंदी अधिकतर लोग समझते हैं इसलिए इन सब में बढ़ावा दिए जाने को लेकर यह बेहतर विकल्प है.

कई जगह अंग्रेजी के बिना काम नहीं तो उसका विकल्प क्या हो सकता है, इस जवाब को ढूंढने के लिए हम महाराष्ट्र में रह तकनीक के क्षेत्र में सालों से काम कर रहे कपिल जोशी से सम्पर्क कर इसका जवाब पाते हैं.
कपिल कई तकनीकी संस्थानों में कैंपस सिलेक्शन के लिए जाते रहते हैं, कपिल कहते हैं कि वह कम्पनी में आने के लिए किसी के द्वारा दिए जा रहे साक्षात्कार के समय यह ध्यान रखते हैं कि उसे कंपनी में आने के बाद कम से कम संचार के साधनों का प्रयोग करने लायक अंग्रेजी तो आती ही हो क्योंकि मेल आदि जैसे कार्यों को समझने के लिए अंग्रेजी तो आवश्यक ही है बाकी का काम हिंदी में चल सकता है.

इस बात का यह निष्कर्ष भी निकलता है कि यदि प्रथम और द्वितीय भाषा के रूप में हिंदी का प्रचलन बढ़ाना है तो देश के अंदर संचार के साधनों में हिंदी को पूरी तरह से मिलाना आवश्यक है और जहां विदेशों से संचार किया जाता है, वहां भी धीरे-धीरे हिंदी की महत्ता बढ़ाई जाए.

हिमांशु जोशी.

Tuesday, September 13, 2022

हिंदी दिवस पर आरपीआई की पोटली से हिंदी के प्रचार पर निकले कुछ विचार

देश आजाद होने के बाद 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से निर्णय लिया कि हिन्दी भारत की राजभाषा होगी। इस महत्वपूर्ण निर्णय के बाद हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा के अनुरोध पर 1953 से देशभर में 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

भारत की राष्ट्रभाषा न बन सकने वाली हिंदी अभी देश की राजभाषा है। राजभाषा होने के कारण सरकारी विभागों में हिंदी अनुभाग आवश्यक है और बहुत से सरकारी काम हिंदी में होते हैं। ऐसा इसलिए किया गया है ताकि लोग हिंदी को ज्यादा समझें और इसकी तरफ आकर्षित हों।
लेकिन उस कार्यालयी हिंदी को समझना अक्सर आम हिंदीभाषी के लिए भी टेढ़ी खीर साबित हो जाता है।
हिंदी भाषा के प्रसिद्ध विशेषज्ञ डॉ सुरेश पंत भी कार्यालय हिंदी पर कहते हैं कि कार्यालयी हिंदी तो आसान होने ही चाहिए।

कार्यालयी हिंदी का इतना जटिल होने का सवाल रेडियो प्लेबैक इंडिया के वाट्सएप ग्रुप में उठा और आरपीआई के लगभग सभी सदस्यों ने इस पर अपनी राय रखी थी।

हिंदी के लोकप्रिय लेखक अनुराग शर्मा कार्यालयी हिंदी के मुश्किल लगने के सवाल पर आरपीआई को दिए अपने साक्षात्कार में कहते हैं कि
'वह मुश्किल इसलिये लगती है क्योंकि कार्यालयी हिंदी का मतलब किताबी अंग्रेज़ी का बेतुका हिंदी अनुवाद रह गया है।'

इसी विषय पर पॉडकास्ट की दुनिया में अपना परचम लहराने वाले समीर गोस्वामी आरपीआई वाट्सएप ग्रुप में लिखते हैं 'भाषा संवाद का एक माध्यम है न कि अहम दिखाने का, आवश्यक यह नहीं कि आप किस भाषा में संवाद कर रहे हैं आवश्यक यह है कि जो संदेश आप पहुँचाना चाह रहे हैं ,वह भाव सहित दूसरे तक पहुँचना चाहिये। भारत बहुभाषी देश है इसलिये यह थोड़ा आवश्यक हो जाता है कि सर्वमान्य एक भाषा हो ताकि संवाद सहजता से हो सके और उसके लिये हिंदी उपयुक्त भाषा प्रतीत होती है। बाकी हर भाषा में इतने कठिन शब्द हैं कि उनके प्रयोग से हम उस भाषा में सहज किसी भी व्यक्ति को असहज कर सकते हैं। एक उन्नत भाषा वही होती है जो सहज संवाद करने में सक्षम हो। अंग्रेजी विश्व स्तर पर स्वीकार्य हो रही है क्योंकि उसने अपने को सहज रखा है और लचीला भी। अंग्रेज़ी ने अपने को विश्व स्तर पर स्थापित करने के लिये उन शब्दों को अपनाने में कोई कोताही नहीं बरती जो स्थानीय या वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य थे। गुरु, चीता, कर्म, पैजामा, योगा, रायता, रोटी जैसे तमाम ऐसे शब्द हैं जो अंग्रेज़ी ने स्वीकार किये हैं। रेल या ट्रेन अंग्रेज़ी भाषा का शब्द है और उद्गम भी, हिंदी चाहती तो इसे ऐसे ही स्वीकार कर सकती थी लेकिन अपने को अलग और उन्नत दिखाने कि लिये किसी विद्वान द्वारा लोहपथगामिनी को हिंदी शब्दकोश में जोड़ दिया। इस ब्रह्माण्ड में किसी भी विकासोन्मुखी द्रव्य का आस्तित्व जब ही कायम रह सकता है जब वो लचीला हो, ये बात सभी पर लागू होती है चाहे वो मनुष्य हो, पेड़ और चाहे भाषा। हम "मार्क टेलर" को मार्क टेलर के नाम से पुकारेंगे तो उचित होगा बेवजह हिंदी को उन्नत दिखाने के चक्कर में अगर हम उसे "निशान दर्जी" के नाम से पुकारेंगे तो हमारी भाषा और हम ही हंसी के पात्र बनेंगे मार्क टेलर नही।'

हिंदी दिवस पर 14 सितंबर को रेडियो प्लेबैक इंडिया के अंतर्गत मेन्टज़ा ऐप पर 'मनमशीन' चैनल में कवि और लेखक शरद कोकास, कवि और प्रोडकास्टर प्रज्ञा मिश्र और डॉ वसुधा मिश्र द्वारा 'मन हिंदी है'  विषय पर एक रोचक वार्ता प्रस्तुत की गई ।

प्रतिभागियों ने बताया कि मनुष्य के विचार करने की पद्धति भाषा से ही उत्पन्न हुई है , न केवल व्यक्त करने के लिए बल्कि विचारों के मन में आने के लिए भी भाषा का होना जरूरी था। 
भाषा के बिना मनुष्य सोच भी नहीं सकता है क्योंकि वह शब्दों में ही सोचता है ।

हिंदी के परिप्रेक्ष्य में विस्तार से बताते हुए उन्होंने कहा कि 14 सितंबर 1976 को राजभाषा अधिनियम के अनुसार भारत मे हिन्दी बोले लिखे व समझे जाने के आधार पर भारत को क , ख और ग क्षेत्रों में विभाजित किया गया। जहां हिंदी प्रमुखता से बोली लिखी वह समझी जाती है वे 'क' क्षेत्र कहलाते हैं , जहां हिंदी समझी जाती है और कुछ क्षेत्रों में बोली भी जाती है वह 'ख' क्षेत्र कहलाते हैं  तथा जिन प्रदेशों में की भाषा हिंदी से इतर अन्य प्रांतीय भाषा है वे 'ग' क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं ।

भाषा के मनोविज्ञान के संबंध में उन्होंने कहा की भाषा के मनोविज्ञान के अंतर्गत तीन चीजें प्रमुख होती हैं जिज्ञासा, अनुकरण और अभ्यास।
 यदि हमें आदिम मनुष्य ने भाषा कैसे सीखी यह जानना है तो हम एक छोटे बच्चे को जन्म से लेकर 10 वर्ष की उम्र तक बढ़ता हुआ देख ले हमें समझ में आ जाएगा।

हिंदी के परिप्रेक्ष्य में भाषा  की विशेषताओं के संबंध में बताया गया कि भाषा अनुकरण करती है, भाषा और उसके प्रयोग से आपके व्यक्तित्व का पता चलता है । भाषा अपने आप में अन्य भाषाओं के शब्दों को समाहित करती है और समृद्ध होती है। किसी भी भाषा में लिखा गया साहित्य उस भाषा का सब उत्कृष्ट उदाहरण होता है इसीलिए साहित्य सृजन में भाषा का ध्यान रखना बहुत आवश्यक है ।

 हिंदी का विकास भी अन्य भाषाओं की तरह ही हुआ है लेकिन आज हिंदी न केवल समाज की, संपर्क की ,बल्कि व्यापार की, विज्ञापनों की और बाजार की भी प्रमुख भाषा है। 
 आज ऐसा कोई प्रदेश नहीं है जहां हिंदी समझने वाले या बोलने वाले लोग ना हो ।

आरपीआई की तरफ से हिंदी दिवस के दिन का सबसे बड़ा सरप्राइज हिंदी साहित्य जगत की बड़ी नाम सुप्रिया पुरोहित की तरफ से किए गए कार्यक्रम थे। उन्होंने आरपीआई के बैनर तले मेन्टज़ा पर पांच कार्यक्रम किए, जिनको सुनने के लिए हमारी साइट पर कार्यक्रम के लिंक को चटकाया जा सकता है।

रात साढ़े दस बजे हिंदी दिवस पर अंतिम कार्यक्रम 'हिंदी दिवस के दिन हिंदी पर विशेष चर्चा था'। इस कार्यक्रम में विद्यालयों में अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव पर चर्चा की गई। हिन्द युग्म प्रकाशन के वसीम अकरम द्वारा कुछ ऐसे विचार रखे गए कि हर श्रोता 'ओ मॉय गॉड' बोलने पर मजबूर हो गया।

आरपीआई ब्लॉग टीम।

हिंदी दिवस पर हिंदी के प्रचार प्रसार पर विचार।

 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी अब भारत की राजभाषा होगी। इस निर्णय के बाद हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा के अनुरोध पर वर्ष 1953 से देशभर में 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

भारत में तमिलनाडु के विरोध की वजह से हिंदी कभी राजभाषा से राष्ट्र भाषा नही बन सकी।
इसी विरोध को आगे बढ़ाते हुए हिंदी दिवस से ठीक पहले कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने कर्नाटक सरकार को हिंदी दिवस के विरोध में पत्र लिखा है कि बिना किसी कारण राज्य के टैक्सपेयर्स के पैसों का इस्तेमाल करके हिंदी दिवस नहीं मनाना चाहिए।

महात्मा गांधी भी नही चाहते थे कि हिंदी की वजह से प्रांतीय भाषा दब जाएं।

महात्मा गांधी भी इस बात को शायद अच्छी तरह समझते थे कि प्रांतीय भाषाओं को साथ लेकर ही हिंदी का प्रचार प्रसार किया जा सकता है। उन्होंने नवजीवन समाचार पत्र में दिनांक 23/08/1928 को लिखा था कि 'जो बात मैंने अनेक बार कही है, उसे यहां फिर दोहराता हूँ कि मैं हिंदी के जरिए प्रांतीय भाषाओं को दबाना नहीं चाहता, किंतु उनके साथ हिंदी को भी मिला देना चाहता हूँ, जिससे एक प्रांत दूसरे के साथ अपना सजीव संबंध जोड़ सकें. इससे प्रांतीय भाषाओं के साथ हिंदी की भी श्री- वृद्धि होगी।' 

महात्मा गांधी हिंदी भाषा को पूरे देश को एक साथ जोड़ने का बेहतरीन जरिया इसलिए समझते थे क्योंकि भारत में अगर किसी भाषा को सबसे ज्यादा समझने और बोलने वाले लोग हैं तो वह भाषा हिंदी ही है।

भारत की राष्ट्रभाषा नही बन सकने वाली हिंदी अभी देश की राजभाषा है। राजभाषा होने के कारण सरकारी विभागों में हिंदी अनुभाग आवश्यक है। ऐसा इसलिए किया गया है ताकि लोग हिंदी भाषा को ज्यादा समझें और इसकी तरफ आकर्षित हों।
लेकिन कार्यालयी हिंदी को समझना अक्सर आम हिंदी भाषी के लिए भी मुश्किल हो जाता है।

हिंदी भाषा के प्रसिद्ध विशेषज्ञ डॉ सुरेश पंत इस कठिन कार्यालयी हिंदी पर कहते हैं कि कार्यालयी हिंदी तो आसान होनी ही चाहिए।

कार्यालयी हिंदी को छोड़ दें तो प्राइवेट संस्थानों में मेल व अन्य पत्राचार अंग्रेजी में ही होते हैं।
प्राइवेट संस्थानों की इस परंपरा को तोड़ने के लिए वरिष्ठ पत्रकार नीलेश मिश्रा ट्वीट करते हैं कि 'क्या मार्केटिंग की ईमेल हिंदी में आना आपको मंज़ूर है?
क्या कॉरपोरेट मीटिंग में हिंदी बोला जाना आपको अखरता है?
फिर से हिंदी दिवस आ रहा है। एक नई शुरुआत करिए। जो साथी सिर्फ़ हिंदी जानते हैं वो कमतर महसूस किए बिना आपको ईमेल हिंदी में कर पाएँ, इसकी शुरुआत करिए।'

हिंदी के लोकप्रिय लेखक अनुराग शर्मा कार्यालयी हिंदी के मुश्किल लगने के सवाल पर कहते हैं कि
'वह मुश्किल इसलिये लगती है क्योंकि कार्यालयी हिंदी का मतलब किताबी अंग्रेज़ी का बेतुका हिंदी अनुवाद रह गया है।'

 मशहूर युट्यूबर समीर गोस्वामी कहते हैं 'भाषा संवाद का एक माध्यम है न कि अहम दिखाने का, आवश्यक यह नहीं कि आप किस भाषा में संवाद कर रहे हैं आवश्यक यह है कि जो संदेश आप पहुँचाना चाह रहे हैं ,वह भाव सहित दूसरे तक पहुँचना चाहिये। भारत बहुभाषी देश है इसलिये यह थोड़ा आवश्यक हो जाता है कि सर्वमान्य एक भाषा हो ताकि संवाद सहजता से हो सके और उसके लिये हिंदी उपयुक्त भाषा प्रतीत होती है। बाकी हर भाषा में इतने कठिन शब्द हैं कि उनके प्रयोग से हम उस भाषा में सहज किसी भी व्यक्ति को असहज कर सकते हैं। एक उन्नत भाषा वही होती है जो सहज संवाद करने में सक्षम हो। अंग्रेजी विश्व स्तर पर स्वीकार्य हो रही है क्योंकि उसने अपने को सहज रखा है और लचीला भी। अंग्रेज़ी ने अपने को विश्व स्तर पर स्थापित करने के लिये उन शब्दों को अपनाने में कोई कोताही नहीं बरती जो स्थानीय या वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य थे। गुरु, चीता, कर्म, पैजामा, योगा, रायता, रोटी जैसे तमाम ऐसे शब्द हैं जो अंग्रेज़ी ने स्वीकार किये हैं। रेल या ट्रेन अंग्रेज़ी भाषा का शब्द है और उद्गम भी, हिंदी चाहती तो इसे ऐसे ही स्वीकार कर सकती थी लेकिन अपने को अलग और उन्नत दिखाने कि लिये किसी विद्वान द्वारा लोहपथगामिनी को हिंदी शब्दकोश में जोड़ दिया। इस ब्रह्माण्ड में किसी भी विकासोन्मुखी द्रव्य का आस्तित्व जब ही कायम रह सकता है जब वो लचीला हो, ये बात सभी पर लागू होती है चाहे वो मनुष्य हो, पेड़ और चाहे भाषा। हम "मार्क टेलर" को मार्क टेलर के नाम से पुकारेंगे तो उचित होगा बेवजह हिंदी को उन्नत दिखाने के चक्कर में अगर हम उसे "निशान दर्जी" के नाम से पुकारेंगे तो हमारी भाषा और हम ही हंसी के पात्र बनेंगे मार्क टेलर नही।'

कार्यालयों और शिक्षा क्षेत्र में बढ़ावा देने के साथ ही हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए उसे रोजगार की भाषा बनाना भी जरूरी है।

विज्ञान ,मेडिकल और कानून की पढ़ाई हिंदी में की जाएगी, तभी रोजगार की संभावनाएं बढ़ेंगी।

 हिंदी भाषा प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सोशल मीडिया व अन्य कई जगह लोगों को रोजगार दे रही है। कोरोना काल के बाद से भी इंटरनेट का प्रयोग कर हिंदी से रोजगार प्राप्त करने वालों की संख्या बढ़ी है।
हिंदी किताब 'रेत समाधि' के अनुवाद को प्रतिष्ठित बुकर पुरस्कार मिलना भी तो हिंदी में अपार संभावनाओं की तरफ संकेत करता है।

हिमांशु जोशी.
@himanshu28may

Monday, September 12, 2022

गीतों और वीएफएक्स के लिए याद रखा जाएगा ये 'ब्रह्मास्त्र'

अमिताभ बच्चन की दमखम वाली आवाज के साथ शुरु हुई फिल्म , रणवीर कपूर के जरिए दर्शकों को ब्रह्मास्त्र से जुड़ी एक काल्पनिक दुनिया में ले जाती है। फिल्म की कहानी बॉलीवुड के उसी पुराने फॉर्मूले पर आधारित है जहां एक गरीब नायक, अमीर नायिका के साथ अपने जीवन में कुछ अलग करता है। जिसकी वजह से वह फिल्म के खत्म होने तक दर्शकों का हीरो कहलाता है।
 बॉलीवुड के इसी पुराने फॉर्मूले के अंदर ब्रह्मास्त्र फिल्म में तकनीक का मिश्रण कर दिया गया है, जो देखने में नया है और शायद बॉलीवुड के दर्शक हॉलीवुड की फिल्मों में ये सब देखने के बाद अपनी फिल्मों में भी इसे अच्छी गुणवत्ता के साथ सालों से देखना चाहते थे।

वानर अस्त्र के साथ शाहरुख खान की छलांग वाला दृश्य वीएफएक्स के जादू का असर है। यह ब्रहास्त्र फिल्म को किसी भी बड़ी हॉलीवुड फिल्मों के बराबर ले आता है।

ब्रह्मास्त्र फिल्म वीएफएक्स के अपने प्रयोग के साथ अपने गीतों के लिए याद की जाएगी। 

निर्देशक अयान मुखर्जी ने जब भी रणवीर को लेकर फिल्म बनाई है, उसके गाने दर्शकों की जुबां पर हमेशा से चढ़ते आ रहे हैं। साल 2009 में आई 'वेक अप सिद' और साल 2013 की 'ये जवानी है दीवानी' इसकी उदाहरण हैं। 
लाजवाब बैकग्राउंड म्यूज़िक वाली फिल्म ब्रह्मास्त्र के गाने हिंदी और तेलुगु भाषा में यूट्यूब पर धमाल मचा रहे हैं। 'केसरिया' गीत को सबसे ज्यादा पसंद किया जा रहा है तो 'देवा देवा' भी कम नही है, इसे अभी शुरु हुए इस सीजन के इंडियन आइडल में बैकग्राउंड म्यूजिक के तौर पर भी सुना गया है। 'डांस का भूत' गाना अपनी कोरियोग्राफी के लिए हिट हो रहा है। 
इस गाने में ही रणवीर का रावण के पुतले के आगे आने वाला दृश्य फिल्म के शानदार छायांकन की एक झलक है। एक ऐसा ही दृश्य जिसमें वाराणसी में गंगा किनारे खड़ी नाव के पीछे दीए जल रहे हैं, दर्शकों का मन मोह लेता है।

रणवीर, आलिया और मौनी ने किया प्रभावित

रणवीर कपूर फिल्म की शुरुआत से ही अपने किरदार में डूबे हुए लगते हैं, एक साधारण व्यक्ति से कई सारी शक्तियों को प्राप्त करने वाले सुपरहीरो के सफर को उन्होंने पूरी शिद्दत के साथ निभाया है। आलिया भट्ट कैमरे के सामने अपने चेहरे के भावों को कुछ इस तरह प्रकट करती हैं कि वह दर्शकों के दिल में कब उतर जाती हैं, दर्शकों को इसका पता भी नही चलता।
छोटे पर्दे से बड़े पर्दे का सफर तय करने वाली मौनी रॉय एक नकारात्मक किरदार के रूप में कई बार अपने सामने खड़े कलाकार पर भारी पड़ी हैं।
 अमिताभ बच्चन हर फिल्म में अपने संवादों के जरिए ही असर छोड़ते आए हैं पर यहां उनके लिए अच्छे संवादों का न होना ही उन्हें साधारण बनाता है, नागार्जुन और डिंपल कपाड़िया को कैमरे पर कम ही वक्त मिला है पर जितना मिला उसके लिए वह याद रहते हैं।

फिल्म के एक्शन सीन दर्शकों को फिल्म देखते मुट्ठी भींच देने पर मजबूर कर देंगे। फिल्म में कलाकारों द्वारा पहने गए परिधान अच्छे लगते हैं और खासतौर पर आलिया भट्ट बहुत ही खूबसूरत लगी हैं।

संवाद औसत तो पटकथा लेखन में भी कुछ कमी रह ही गई

फिल्म का संवाद लेखन, औसत कहा जा सकता है। शाहरुख द्वारा बोला गया संवाद 'वो शिकार ही क्या जिसमें थोड़ा शोर न हो' ठीक है तो अमिताभ द्वारा बोला गया संवाद 'एक आदमी की पहचान उसके हुलिए से नही होती, अंदर की शक्ति से होती है' औसत ही है।
'लाइट को समझा नही जाता बस महसूस किया जाता है' संवाद फिल्म के साधारण संवादों का एक और उदाहरण है।

ब्रह्मास्त्र के पटकथा लेखन में काफी रिसर्च किया गया होगा। पात्रों और अस्त्रों के नाम पर, उन अस्त्रों के काम पर खूब शोध किया हुआ लगता है। 
इस काल्पनिक दुनिया को बुनते समय आलिया और रणवीर के बीच का रिश्ता इस तरह लिखा गया है कि यह दर्शकों को कभी-कभी उबाने लगता है। आलिया भट्ट के किरदार को बिना ज्यादा सोचे समझे प्रेम के प्रति इतना समर्पित दिखाना ,आज की पीढ़ी के दर्शकों को इतना ज्यादा समझ नही आएगा। दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है, जब यह फिल्म 2019 में रिलीज होनी थी तब शायद इस बिना सोचे समझे वाले प्रेम समर्पण को पचाना आसान होता पर आज नही।

रणवीर मोह की वजह से अन्य पात्र कहीं खो गए

अगर हम इस फिल्म के पात्रों की सीधी तुलना हॉलीवुड की मशहूर श्रृंखला 'अवेंजर्स' के साथ कर दें तो दर्शक अवेंजर्स के हर पात्र से एक रिश्ता सा महसूस करते हैं पर ब्रह्मास्त्र में निर्देशक अपने रणवीर कपूर मोह से बाहर नही निकल पाए। अमिताभ बच्चन, नागार्जुन, डिंपल कपाड़िया, आलिया भट्ट जैसे बड़े कलाकारों के द्वारा निभाए गए पात्र इसी वजह से दर्शकों की पसंद नही बन पाते। फिल्म के अगले भाग 'देव' में हम फिल्म मेकर्स द्वारा इस क्षेत्र में बेहतरी की उम्मीद रख सकते हैं।

हिमांशु जोशी
@himanshu28may

Sunday, September 11, 2022

वो बचपन की यादें

बचपन! कब से मानूं!! तब से जब से होश संभाला या तब तक जब से जिम्मेदारी लेनी शुरू की।

बचपन के दोस्तों से जोड़ूं या बचपन की यादों से जोड़ूं। उनसे जोड़ूं जो बचपन में थे आज नही हैं या उनसे जोड़ूं जो आज होकर भी साथ नही हैं ।

क्रिकेट हां, इससे मेरे बचपन की हर डोर जुड़ी है। होश संभालने से लेकर अपनी जिम्मेदारी लेने तक।
इस क्रिकेट ने मुझे दुनिया से जोड़ा और सामाजिक बनाया। आज के बच्चों को फोन से चिपका देखता हूं तो इनके भविष्य को लेकर कई सवाल मन में उमड़ आते हैं। बच्चे हां दो भाई थे वो। मेरे पड़ोस में नए ही आए थे और घर जैसे ही हो गए। मैं सातवीं कक्षा में था और वो दोनों भाई दीपक, विक्की चौथी और दूसरी में।

क्रिकेट की छह सात लोगों की हमारी टीम में फील्डिंग करने के लिए हमें दो नए खिलाड़ी मिल गए थे।

दीपक के पापा गोपाल अंकल रोडवेज में ड्राइवर थे और ड्यूटी में रहते उन्हें विक्की से ज्यादा दीपक की ज्यादा चिंता लगे रहती थी।मुझसे कई बार कहते 'यार हिमांशु इसे समझाया कर, पढ़ाई में मन नही लगाता। विक्की तो ठीक है'।

क्रिकेट में मुंह खोल के बॉलिंग कराने वाला दीपक एक औसत खिलाड़ी ही था पर विक्की के तगड़े छक्के हमें प्रभावित करते थे। विक्की ज्यादातर मेरी टीम में ही रहता और दीपक विपक्षी।

इस बीच आइपीएल की शुरुआत हुई और गांगुली फैन दीपक ने अपनी टीम कोलकाता नाइट राइडर्स का सपोर्ट करना शुरू कर दिया था। मेरे पापा का वो स्कोर कार्ड था।
नीली कमीज और खाकी पेंट में साइड की मांग निकाल बाल बनाए दीपक सुबह सुबह 'अंकल नमस्ते । कल तो मुंबई जीत गई, कल साउथ अफ्रीका हार गई' जैसी खबरें जोर से चिल्लाता सुनाई पड़ता था।
कई बार दीपक के घर में बाहर वाले कमरे पर हम साथ बैठकर मैच देखते थे।

वक्त गुजरता गया, मैं स्कूल खत्म कर कॉलेज के लिए घर से दूसरे शहर चला गया। घर आता तो मम्मी से दीपक के शराब पीकर घर में लड़ने झगड़ने के किस्से अक्सर सुना करता था मेरा बचपन खत्म हो रहा था तो दीपक भी युवा हो रहा था, कभी कभी क्रिकेट खेलने जाते तो मैं उससे उसके नशे के आदत के बारे में बात करता तो वो यूंही कह देता 'यार हिमांशु दा , बस ऐसे ही थोड़ा शौक के लिए लगा लेता हूँ'।

अब मैं नौकरी लग चुका था और दीपक भी हल्द्वानी में कॉलेज पढ़ते हुए किसी होटल पर काम कर रहा था। शायद रिसेप्शन पर रहता था। एक दिन खबर मिली कि जंगलों के बीच दोस्तों के साथ ब्यानधुरा मंदिर जाते दीपक की मृत्यु हो गई। कारण कभी सामने नही आ पाया।
 मैं दीपक के गुजर जाने के बाद उनके घर में पहली बार गया तो दीपक की मम्मी से नजरें नही मिला सका था। उनकी आंखें बहुत उदास सी थी, शायद वो मुझमें अपने बुझे दीपक की तलाश में थी।

अब विक्की भी बड़ा हो गया था और हल्द्वानी से बीसीए के बाद दिल्ली में नौकरी करने लगा था। वहीं उसने अपने ऑफिस की एक सहयोगी से शादी भी कर ली थी।

दीपक के जाने के बाद गोपाल अंकल टूट गए थे,मेरे बचपन के दिनों में गोल मटोल रहे गोपाल अंकल अब डाइबिटीज की वजह से कमजोर होने लगे थे।
मुझे बचपन में उनके परिवार के साथ बालाजी मंदिर की यात्रा हमेशा याद रहती थी। हमारे घर में कोई भी फंक्शन होता तो गोपाल अंकल मेजबान की भूमिका में रहते थे।
एक दिन मम्मी ने फोन पर बताया कि गोपाल अंकल भी हार्ट अटैक की वजह से इस दुनिया से चले गए।

अब बचपन में मासूम से चेहरे वाला विक्की घर का कमाने वाला एकमात्र व्यक्ति बन गया था। 
मां के रहते अब शादी ब्याहों के निमंत्रण विक्की के नाम पर आने लगे। 
उसके द्वारा शराब पीकर पत्नी के साथ मारपीट और लड़ाई की खबरें भी सुनने लगा था।

कोरोना की वजह से विक्की लगभग दो साल से घर पर है। वो घर से ही काम करता है।
उस छोटे विक्की की अब एक छोटी सी प्यारी बिटिया भी है।
मैं महीनों बाद कल उससे मिलने गया, शायद वो अब घर में लड़ाई नही करता। इसी बीच उसने बताया कि उसे अगले महीने दिल्ली वापस लौटना है। पत्नी और बेटी के साथ मम्मी भी वहीं रहेंगी और वो इस घर को बेचकर दिल्ली में फ्लैट ले लेंगे।

विक्की से मैंने बस इतना कहा कि इस घर में तुम्हारी बहुत सी यादें हैं। कोशिश करना कि घर मत बेचना कभी कभी आते रहना।

उसके घर से बाहर आने पर सब कुछ मेरी आँखों के सामने घूमने लगा, उसका बचपन, मेरा बचपन, क्रिकेट का मैदान। 
वक्त बदल जाता है, बचपन भी बस याद बन कर रह जाता है। ठीक दीपक के कमरे की उस टीवी की तरह जिसकी जगह अब एलईडी टीवी ने ले ली थी।

Saturday, September 10, 2022

कुछ करने से पहले सोचने के लिए कहती ये 'होली काऊ'

'होली काऊ' नाम बॉलीवुड के दर्शकों को फिल्म के प्रति आकर्षित करने में कामयाब नही होता दिखता पर यह नाम 'डोंट जज ए बुक बाय इट्स कवर' कहावत को इस फिल्म पर सही साबित कर जाता है.

निर्देशक साई कबीर ने होली काऊ को कुछ इस तरह से बनाया है कि इसे देखते लगता है मानो आपकी आंखों के सामने कोई नाटक चल रहा हो और उसके एक से एक दृश्यों के बाद पर्दा गिरते-उठते जा रहा है.
फिल्म 'रिवॉल्वर रानी' के अपने निर्देशन से पहचाने जाने वाले साई कबीर ने इस फिल्म में संजय मिश्रा के साथ दर्शकों को भी सिर्फ दरवाजे की आवाज भर से ही डराने में कामयाबी पाई है.
फिल्म के एक दृश्य में हिन्दू जैसा दिखने के लिए संजय मिश्रा द्वारा निभाया गया किरदार सलीम मजबूरी में अपनी आंखों का सुरमा मिटाता है, इस दृश्य को दिखाकर साई कबीर अपने दौर के श्रेष्ठ निर्देशकों की सूची में शामिल हो गए हैं.

फिल्म मात्र डेढ़ घण्टे की है और मोबाइल के माध्यम से फैलाई जा रही नफरत पर लिखी यह कहानी बड़ी तेज गति से भागती है. अपनी खोई गाय को ढूंढने निकले सलीम के हर अगले कदम को दर्शक बड़े गौर से देखते जाते हैं.

बड़े भारी संवाद लिए हुए है फ़िल्म

फिल्म अपने संवादों के जरिए बार-बार हमें झकझोरती रहती है.
'वो वक्त नही रहा अब' संवाद देश के आज के हालात पर सटीक बैठता है.
' मामला पॉलिटिकल है ' संवाद फिल्म में दो-तीन बार बोला गया है और सच्चाई के करीब भी है.

'विद्युत विभाग में हूं, एई हूं, चार घर में मीटर पर रेड मारूंगा न, दो हजार मिल जाएंगे' संवाद हमारे देश की अफसरशाही पर करारा व्यंग्य है.

फिल्म के बीच में संजय मिश्रा का एक और संवाद है 'मैं सफीना और शाहरुख, तीनों. अपना भोपाल, अपना जावेद, अपना सैयद. पर पता नही क्यों नही गए. ऐसा क्या था, मेरे शहर की मिट्टी में'.

इसके बाद फिल्म का अंत हमें सन्न कर देता है. आज के दौर में मीडिया और पुलिस की भूमिका पर सवाल छोड़ते हुए फिल्म का अंत हमें अपने द्वारा अपनाए गए रास्ते पर चलने से पहले एक बार रुककर सोचने के लिए कहता है.
फिल्म का पटकथा लेखन कसा हुआ लगता है.

छा गए संजय मिश्रा

होली काऊ में बहुत से कलाकार हैं और उनमें से चार कलाकार ऐसे हैं जो दर्शकों के दिलोदिमाग में छा जाते हैं.
संजय मिश्रा किसी फिल्म में मुख्य किरदार के रूप में कम ही दिखते हैं पर यहां उन्होंने ऐसा करते हुए अपने जीवन का सबसे बेहतरीन काम किया है. लगभग तीन दशक से टेलीविजन और फिल्मों की दुनिया में जमे हुए संजय इस फिल्म में अपनी अलग ही चाल-ढाल में रहते, सामाजिक व्यंग्य करते कमाल लगे हैं. मनोरंजन जगत में दो दशक पुराने 'मिर्जापुर' फेम मुकेश एस भट्ट ने भी इस फिल्म में संजय मिश्रा का बखूबी साथ दिया है. 
तिग्मांशु धूलिया और सादिया सिद्दीकी को संजय मिश्रा और मुकेश की तुलना स्क्रीन पर इतना वक्त नही मिला पर फिर भी उन्होंने अपने अभिनय से फिल्म में जान डाली है.
नवाजुद्दीन सिद्दीकी फिल्म में बस चेहरा दिखाने के लिए लाए गए हैं.

मोबाइल से देखकर बहुत कुछ गलत सीखते हैं लोग

आज के समय में मोबाइल का लोगों पर कितना गलत असर पड़ रहा है, यह शायद इस फिल्म से पहले किसी और फिल्म में इतनी अच्छी तरह से नही दिखाया गया है.
फिल्म के एक दृश्य में पण्डित बने मुकेश एस भट्ट , फोन चलाते मुस्लिम व्यक्ति बने संजय मिश्रा से कहते भी हैं 'अबे क्या देख रहा है, बंद कर उसको. दिमाग खराब हो जाएगा.'

फिल्म यह भी दिखाती है कि कैसे कुछ भारतीयों की मजबूरी का फायदा उठाकर उनका ब्रेन वॉश किया जाता है और फिर उन्हें आतंकवादी बनने पाकिस्तान भेज दिया जाता है.

छायांकन से एक कदम पीछे गीत संगीत

फिल्म का छायांकन बढ़िया है. दर्शकों को मध्यप्रदेश की गलियां ज्यों की त्यों दिखाई गई हैं. नवाजुद्दीन सिद्दीकी की एंट्री वाला दृश्य दिखने में प्रभावित करता है. लाइट्स का प्रयोग अच्छा किया गया है. पेड़, मकान भी कहानी का हिस्सा लगते हैं.

गीत संगीत के मामले में ये फिल्म औसत कही जा सकती है. 'चल चल बुलयां, मदारी और गैया कहां' गानों को फिल्म की कहानी आगे बढ़ाने के लिए रखा गया है और उस पर ये फिट भी बैठते हैं.
 
हिमांशु जोशी
@Himanshu28may

Friday, September 9, 2022

अंग्रेज गुलाम

राष्ट्रीय शोक


पागल हैं, गुलाम ही हैं अब तक। तभी तो 'सरदार उधम' को ऑस्कर में भेजने की हिम्मत नही हुई। कॉमनवेल्थ अभी भी भेजते हैं

Thursday, September 8, 2022

'कश्मीरनामा' जैसी चर्चित किताब प्रकाशित करने वाले राजपाल प्रकाशन से छपकर आई 'एक देश बारह दुनिया' का कवर डिजाइन बड़ा प्रभावित करने वाला है. इसके आवरण चित्र में भारत के ग्रामीण क्षेत्रों की तस्वीर दिखाई देती है. पिछले आवरण में कुछ महत्वपूर्ण लोगों की किताब पर टिप्पणी हैं और लेखक के पत्रकारिता जीवन के साथ यह भी बताया गया है कि इस किताब से पहले उनकी दो पुस्तकें 'तहकीकात' और 'उम्मीद की पाठशाला' भी प्रकाशित हो चुकी हैं.

प्रस्तावना में लेखक ने इस किताब को लिखने की वजह बताते हुए लिखा है कि वह चाहते हैं कि उनके लेखन से आम लोग मूलभूत मुद्दों के प्रति सजग और संवेदनशील बनेंगे. लेखक ने प्रस्तावना में इस किताब के बारे में यह बताया है कि किताब बारह रिपोर्ताज पर आधारित दस्तावेज है, जो उन्होंने पत्रकारिता के दौरान लिखे थे.

पहली रिपोर्ट 'वह कल मर गया' अपने नाम से ही पाठकों की रुचि खींच लेती है. शीर्षक के नीचे घटना की जगह बताना भी पाठकों के मन में क्षेत्र विशेष की छवि बना देता है.

'घर के नाम पर माटी, घास और कमजोर लकड़ियों की चारदीवारी के बूते खड़ी पतरी की छत तो है, लेकिन उसके अंदर भयावह खालीपन पसरा है' पंक्ति ठीक ऐसे ही घर की तस्वीर पाठकों की आंखों के सामने लाकर उनके दिल को पसीज देगी.

सड़क पर उतरने की गम्भीरता समझनी होगी।

टाटा संस के पूर्व चेयरमैन साइरस मिस्त्री की कार एक्सीडेंट में हुई मौत से हमारे समाज में सड़क सुरक्षा पर रहने वाली चुप्पी कुछ दिनों के लिए टूटी है.

इस दुर्घटना पर केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली के मुख्य वैज्ञानिक एस वेलमुरुगन ने पीटीआई-भाषा को दिए एक इंटरव्यू में कहा, "राष्ट्रीय राजधानी में कुछ हिस्सों में सड़क के डिजाइन में असंगति देखी जा सकती है. जिसमें पूर्वी और पश्चिमी एक्सप्रेसवे, बाहरी रिंग रोड और रिंग रोड शामिल हैं. मिसाल के लिए, कुछ बिंदुओं पर 6-लेन की सड़क 4-लेन में सिमट जाती है. विभिन्न स्थानों पर असमान सतहों को भी देखा जा सकता है. ये मुद्दे वाहन चलाने के दौरान खतरा पैदा करते हैं और इन्हें दूर किया जाना चाहिए."
 उन्होंने आगे कहा कि रविवार की दुर्घटना से तीन अहम बातें निकलती हैं कि सड़कों, विशेष रूप से राजमार्गों को सुसंगत तरीके से बनाया जाना चाहिए.
सड़क पर पर्याप्त संकेत चिह्न होने चाहिए और पीछे बैठे व्यक्ति के लिए सीट बेल्ट पहनने के कानून को लागू किया जाना चाहिए.
वेलमुरुगन ने पीछे बैठे व्यक्ति को सीट बेल्ट पहनने और शहर की सड़कों पर तेज रफ्तार से वाहन चलाने वाले लोगों के खिलाफ कानूनों को सख्ती से लागू करने का भी आह्वान किया.


इस दुर्घटना के बाद केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने भी कहा है कि कार में बैठने वाले सभी लोगों के लिए अब सीट बेल्ट लगाना अनिवार्य होगा. ऐसा नहीं करने पर जुर्माना लगाया जाएगा.  उन्होंने यह भी बताया कि इसे लेकर उनके मंत्रालय की तरफ से अगले दो तीन दिन में एक नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया जाएगा.

साइरस मिस्त्री की मृत्यु के बाद फिर से ध्यान खींचती सड़क दुर्घटनाएं

भारतीय सड़क परिवहन मंत्रालय द्वारा वर्ष 2018 में सड़क हादसों पर जारी किए गए आंकड़ों से इन हादसों की भयावहता का अनुमान लगाया जा सकता है. इनके अनुसार वर्ष 2018 में लगभग डेढ़ लाख लोगों ने सड़क हादसों में अपनी जान गंवायी थी.

सड़क पर वाहन चलाने की बात हो तो सीधी सड़क को सबसे सुरक्षित माना जाता है पर इन आंकड़ों के अनुसार मरने वाले डेढ़ लाख लोगों में से 97 हज़ार चालकों ने सीधी सड़क पर ही अपनी जान गंवाई थी.
 तमिलनाडु, कर्नाटक और हरियाणा में सबसे ज्यादा सड़क हादसे हुए थे.
सड़क हादसों में मरने वाले 85 फीसदी पुरुष थे.

सीट बेल्ट न पहनने के अलावा भी सड़क हादसों के हैं बहुत से कारण.

पुलिस द्वारा सड़क कानून का सख्ती से पालन ना करवाए जाने की वजह से कई नाबालिग सड़क पर खतरनाक तरीके से वाहन चलाते दिखते रहते हैं, कई लोग बगैर हेलमेट और दोपहिया वाहन में तीन सवारी चलते हैं. ये खुद के साथ दूसरों की जान के लिए भी खतरा बन जाते हैं.
वाहनों का अपनी लेन में न चलना वाहन दुर्घटनाओं के मुख्य कारणों में शामिल है.

ड्राईविंग लाइसेंस मिलने की आसान प्रकिया सड़क दुर्घटनाओं का एक बड़ा कारण है. इस वजह से अप्रशिक्षित वाहन चालक सड़क पर उतर कर अन्य वाहनों के लिये खतरा बन जाते हैं.

हमारे देश की सड़कों पर अपनी समयावधि पार कर चुके कामचलाऊ वाहन भी बेरोकटोक दौड़ रहे हैं. सामान लादने के साथ इनमें से बहुत से वाहनों का प्रयोग सवारियों को ढोने के लिए भी किया जाता है, जो बहुत ही खतरनाक है.
सड़कों पर अतिक्रमण के साथ सड़कों की खराब गुणवत्ता के कारण बने गड्ढे भी इन हादसों के लिए जिम्मेदार हैं.

हाल ही के दिनों में सड़क पर आवारा पशुओं की वजह से सड़क दुर्घटनाओं में इजाफा हुआ है, अकेले हरियाणा में ही पिछले पांच सालों के अंदर आवारा पशुओं की वजह से लगभग 900 लोगों ने सड़क दुर्घटना में अपनी जान गंवाई. आवारा पशुओं के गले में रेडियम पट्टी बांधकर और वाहनों की गति नियंत्रित रख इन दुर्घटनाओं पर कुछ हद तक लगाम लगाई जा सकती है.

सड़क पर बनी लाइनों के बारे में नही जानते बहुत से चालक


सड़क पर गाड़ी दौड़ा रहे अधिकतर चालकों को सड़क पर बनी पीली और सफेद लाईनों की सही जानकारी नही होती है. यह लाइनें क्षेत्र की आबादी और सड़क की भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रख कर बनाई जाती हैं.



सड़क पर टूटी सफेद लाइनों का अर्थ होता है कि यदि सुरक्षित है तो आप उस पर लेन बदल सकते हैं, ओवरटेक कर सकते हैं और यू टर्न ले सकते हैं.



लम्बी सफेद लाइन का अर्थ है कि आप उस सड़क पर ओवर टेक नही कर सकते और ना ही आप वहाँ यू टर्न ले सकते हैं.



टूटी पीली लाइन का मतलब है कि आप इस लाइन पर सावधानी के साथ ओवरटेक और यू टर्न ले सकते हैं.

लम्बी पीली लाइन में आप दूसरी गाड़ियों को ओवरटेक तो कर सकते हैं पर पीली लाइन को पार करना मना होता है. यह नियम अलग-अलग राज्यों के लिये अलग-अलग भी हैं.

सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाने के अन्य उपाय.

बढ़ते औद्योगीकरण व सुधरते जीवन स्तर ने निजी वाहनों की संख्या में पिछले कुछ वर्षों में तेज़ी से इज़ाफ़ा किया है और इसी वजह से अब जनता द्वारा सार्वजनिक वाहनों का प्रयोग कम किया जाता है.
 वर्ष 2018 के आंकड़ों से पता चलता है कि सार्वजनिक वाहनों में दोपहिया और हल्के वाहनों से दुघर्टना का खतरा कम होता है.

  साइकिल में चलने वालों के लिए पुरे भारत में चंडीगढ़ की तर्ज़ पर अलग लेन बनायी जा सकती हैं.
 
नियम में सख्ती लाने से कार में तो सीटबेल्ट लग जाएगी पर जो लोग प्राइवेट व सरकारी बस में ही घर से आना-जाना करते हैं, उनके लिए भी बसों में सुरक्षा उपाए लगवाना अनिवार्य करवाना होगा.

हिमांशु जोशी
@himanshu28may

Tuesday, September 6, 2022

एक किताब, जो बच्चों का भविष्य बना देगी।

आज देश में बेरोजगारी दर बढ़ते ही जा रही है। इसे देख आपको लगता नही कि इसका कारण कहीं न कहीं बच्चों पर जबरदस्ती गृहकार्य और अंग्रेजी लादी हुई हमारी यह प्रौढ़ हो चुकी शिक्षा व्यवस्था है।
 एक ही ढर्रे पर चलती जा रही शिक्षा व्यवस्था, विद्यार्थियों को विभिन्न अवसर प्रदान करने में अक्षम है।
हमारी शिक्षा व्यवस्था डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, चार्टर्ड अकाउंटेंट, शिक्षक तैयार करने तक ही सीमित रह गई है।
बच्चों को चित्रकार, कलाकार, कथाकार, कलमकार, किसान, प्लम्बर, मैकेनिक, खिलाड़ी बनाने के बारे हम सोचते तक नही।
देश अब सरकारी और प्राइवेट स्कूल वाले बच्चों के रूप  में दो भागों में बंट रहा है। हम सरकारी स्कूलों को समस्या के तौर पर देखने लगे हैं पर सरकारी शिक्षकों की समस्याएं हमें नही दिखती।

चर्चित उपन्यास 'फिर वही सवाल' के लेखक दिनेश कर्नाटक शिक्षा में बदलावों की इन्हीं चुनौतियों पर बात करने के लिए अपनी नई किताब 'शिक्षा में बदलाव की चुनौतियां' लेकर हमारे सामने आए हैं।

बड़ा ही प्रभावी है किताब का आवरण चित्र

काव्यांश प्रकाशन से छपकर आई इस किताब का आवरण चित्र डॉ मनोज रांगड़ और विनोद उप्रेती द्वारा तैयार किया गया है।


खिड़की के अंदर से बाहर झांकते बच्चे के इस चित्र में हमें बच्चों द्वारा अपने भविष्य को लेकर संजोयी गई बहुत सी उम्मीदें दिखती हैं।

पिछला आवरण चित्र बच्चों के लिए 'कुछ कर के सीखना' सन्देश देता महसूस होता है।

अनुक्रम से मालूम चलता है कि यह किताब शिक्षा के सवालों पर आधारित 29 लेखों का संग्रह है। लेखों के अलग-अलग विषय पर केंद्रित होने की वजह से आप किताब का जो पन्ना खोल कर पढ़ते हैं, उसी में रम जाते हैं।

किताब के लिए लेखक ने अपना पूरा शिक्षकीय अनुभव लुटा दिया है।

पहले लेख 'शिक्षा के स्वरूप का सवाल था जे. कृष्णमूर्ति' के जरिए लेखक ने हमारे देश में शिक्षा के स्वरूप पर चर्चा छेड़ी है। लेख की भाषा सरल है और जे. कृष्णमूर्ति के विचार पढ़ने के बाद हम काफी हद तक यह समझने में सफल हो जाते हैं कि आज बच्चों में सृजनशीलता की भावना को प्रेरित किया जाना आवश्यक है।
'क्या हम अपने विद्यार्थियों को जानते हैं' लेख में लेखक ने बड़ी ही खूबसूरती से बैंकों और 'प्रथम' संस्था से मिली सीख को विद्यार्थियों पर आजमाने की सलाह दी है। लेखक अपने शिक्षकीय अनुभव के बारे में बताते हैं जो बड़ा ही रोचक लगता है। इस लेख में लेखक ने अपने विद्यार्थियों के बारे में जो आंकड़े जुटाए हैं, वैसे आंकड़े शायद ही बहुत अधिक शिक्षक जुटाने की जहमत उठाते हों।

देश की मौजूदा परिस्थितियों को समझने के लिए यह लेख पढ़ा जाना बेहद जरूरी है। इसकी कुछ पंक्तियां-

 'जहां 9वीं कक्षा तक सभी बच्चे आपस में घुल मिलकर रहते थे। वहीं 10वीं में मुस्लिम बच्चे एक साथ बैठने लगते थे'।

'अर्थात 39 बच्चे ऐसी बदतर स्थितियों में रह रहे थे जिनके रहते पढ़ाई में ध्यान देने की बात करना उनके साथ नाइंसाफी होगी'।

लेख के अंत में लेखक साल 1932 में गिजूभाई द्वारा किए गए प्रयोगों को भी याद करते हैं।

देश में दो तरह की दुनियाओं का निर्माण हो रहा है।

अगले लेख में लेखक ने अपने स्कूली दिनों और आज के दिनों में पब्लिक स्कूलों और सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के बारे में लिखा है। इनके बच्चों के बीच बढ़ रहे अंतर को हम 'इससे देश में दो तरह की दुनियाओं का निर्माण हो रहा है। उस अनिवार्य संघर्ष की पृष्ठभूमि बनती जा रही है, जिससे हम देश के कई हिस्सों में जूझ रहे हैं.' पंक्ति से समझ सकते हैं।

'जानने और समझने की चुनौती' लेख में लेखक एम्स, आईआईटी का हवाला देते हुए लिखते हैं कि 'हमारे देश में जिन सेवाओ को हमारे हुक्मरान जिम्मेदारी से चलाना चाहते हैं, वे पूरी मुस्तैदी से चल रही हैं और अच्छा काम कर रही हैं'।

जब तक पाठक इसे समझते हैं तब तक सरकारी स्कूलों में स्कूल बस की व्यवस्था वाला प्रश्न पाठकों के सामने शिक्षा व्यवस्था का पूरा चेहरा ही बेनकाब करता दिखता है।
साथ ही साथ लेखक ने स्कूलों में अंग्रेज़ी पढ़ाए जाने पर भी कुछ महत्वपूर्ण लोगों के कथनों के सहारे अपने विचार व्यक्त किए हैं।

किताब पढ़ते अब आपके मन में यह विचार जरूर आने लगेगा कि स्कूलों में अपना जीवन रमा देने वाले लेखक जैसे शिक्षकों से ही अगर शिक्षा व्यवस्था की नीतियां बनवानी शुरू कर दी जाएं तो देश के स्कूलों की हालत बदलते देर नही लगेगी।

किताब में शिक्षा से जुड़े हम महत्वपूर्ण विचार शामिल हैं।

इस किताब में लेखक ने शिक्षा से जुड़े लगभग सभी महत्वपूर्ण विषय सम्मिलित कर लिए हैं, अगला लेख ट्युशन पर है।
इसकी शुरुआती पंक्तियां ही एक ऐसा सच हमारे सामने ले आती हैं, जिससे परिचित होने के बाद भी आमजन कुछ नही करता। 'देखते ही देखते हमारे देश में बच्चों को पढ़ाना एक महंगा काम बन गया है। जिस रकम से आम लोग अपने जीवन को बेहतर बना सकते थे ,उसे 'शिक्षा के व्यापारी' बड़ी धूर्तता से उनसे छीन ले रहे हैं'।

किताब की हर पंक्ति बड़ी महत्वपूर्ण है और शिक्षा को लेकर आंख खोलने वाले विचार हमारे सामने रखती रहती है। 'बच्चे इसलिए नहीं पढ़ते क्योंकि उन्हें अपने मां-बाप पढ़ते हुए नहीं दिखाई देते' इसका प्रमाण है।

 पृष्ठ 64 और किताब में कई अन्य जगह भी लेखक ने सरकारी स्कूलों के शिक्षकों की समस्या लिखी हैं, जिन्हें समझना बेहद जरूरी है।

'उन दिनों घर में किताबों की तादाद बढ़ने पर सिर्फ किताबों की वजह से छत पर एक कमरा बनवाया ताकि वे वहां सुरक्षित रहें' पंक्ति लेखक के किताबों के प्रति शौक को दर्शाने के साथ, पाठकों के मन में भी किताबों के प्रति रुचि को जगाती है।
लेखक किताब में शिक्षा के सुधार पर कई बार राष्ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 का हवाला देते हैं।

शिक्षक बच्चों की पिटाई क्यों करते हैं।

लेखों को आगे पढ़ते, मनुष्य मारपीट क्यों करता है! जैसे प्रश्न का जवाब बड़ा ही स्पष्ट दिखाई देता है।
'एक ऐसा तैयार जवाब जिसके लिए न तो दिमाग पर जोर देने की जरूरत होती है, न किसी तरह का उपाय करने की'।
 इस जवाब को शिक्षक द्वारा बच्चों की पिटाई से जोड़कर लेखक बच्चों की पिटाई पर पाठकों को एक शिक्षक की मानसिकता समझाने में कामयाब रहे हैं।

प्राइवेट स्कूलों का जाल हो या अंग्रेजी की विवशता, किताब सब समझाती है।

'अगर देशभर के प्राइवेट स्कूलों द्वारा अभिभावकों से ली गई फीस के औचित्य की जांच की जाए तो या देश का सबसे बड़ा घोटाला या संगठित लूट होगी' पंक्ति से लेखक ने इस विषय की गम्भीरता की तरफ इशारा किया है।
स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था को मेट्रो को तरह मजबूत करने का उदाहरण पढ़ने में नया और प्रभावी जान पड़ता है।

अंग्रेजी थोपने को लेकर किताब के एक लेख में लिखी पंक्ति 'हकीकत तो यह है भाषा व्यवहार तथा जरूरत से सीखी जाती है. हमारे पर्यटन केंद्रों के अनपढ़ गाइड तथा वेटर इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं'। अंग्रेजी थोपने के हिमायती लोगों की आंखें खोल सकती हैं।

किताब शिक्षा के क्षेत्र की हर समस्याओं, चुनौतियों से पाठकों को अवगत कराने में कामयाब रही है।

किताब में लिखे सुझाव बच्चों का भविष्य बना सकते हैं।

जैसे फिल्मों में एक न एक सीन बहुत जबरदस्त होता है, ठीक वैसा ही इस किताब के अंतिम भाग 'शिक्षा प्रश्नोत्तरी' से पहले का लेख "शिक्षा पर 'प्रथम' की चौंकाने वाली रिपोर्ट" भी है। इस लेख को पढ़ आप शिक्षा क्षेत्र में चल रहे 'खेल' को समझने लगेंगे।

एनसीआरटी के हालिया सर्वे में एक बात सामने आई है कि स्कूली छात्रों में चिंता का मुख्य कारण परीक्षाएं और परिणाम हैं। यदि किताब ध्यान से पढ़ी जाए और इसमें लिखे सुझावों को स्कूली शिक्षा में लागू किया जाए तो हम स्कूली छात्रों का बचपन और भविष्य खराब करने के दोषी बनने से बच सकते हैं।

हिमांशु जोशी
@himanshu28may

Saturday, September 3, 2022

दिल तो बच्चा है जी

रामचरण जी अपनी खाट पर लेटे हुए थे। कमरे की दीवारों पर उनके चार जोड़ी कपड़े टँगे हुए थे, उन कपड़ों में कमरे में लगा सफेद चूना लग जाता था। जिन्हें पहनते वक्त रामचरण जी कपड़े को झाड़ लिया करते। 

कोई बाहरी व्यक्ति 78 साल के हो चले रामचरण जी से मिलने आता ,तो उसकी नाक में कमरे से अटैच टॉयलेट से होकर आती तेज दुर्गंध प्रवेश कर जाती थी।
 लेकिन थोड़ी देर में वह उस दुर्गंध और कमरे की सीलन वाली दुर्गंध का आदी हो जाता था।

 खाट, गैस चूल्हे और कपड़ों के साथ रामचरण जी के कमरे में एक और चीज़ हर आगुन्तक का ध्यान अपनी और खींचती थी।  वह होती थी ,रामचरण जी के लैपटॉप में चलती बच्चों की फिल्में और वीडीयो गेम। 
कोई मेहमान रामचरण जी से पूछता कि " रामचरण जी अब इस बुढ़ापे में भी लैपटॉप में गेम खेलते, फिल्में देखते अपनी आंख क्यों फोड़ते हो?
 तो रामचरण जी कहते, "बस इससे बचपन याद आ जाता, उम्र हो गई पर क्या करें दिल तो बच्चा है न जी"

रामचरण जी इंफोसिस से रिटायर थे और उनके दोनों बच्चे नवीन, सुकेश आईआईटी खड़कपुर से पढ़ने के बाद अब अमरीका ही बस गए थे। 

पत्नी स्वाति के कैंसर का इलाज कराते-कराते रामचरण जी का घर- बार सब बिक गया था पर वो स्वाति को बचा न पाए । बचे हुए पैसों से अब वो यही जिंदगी बसर कर रहे थे, उन्हें बच्चों के वापस पलटकर न देखने का दुख तो था पर वो दिन भर खुद को इतना व्यस्त रखते कि उन्हें आंसू बहाने का समय नही मिलता। मोबाइल से दूर ही रहने वाले रामचरण जी के कुछ पुराने मित्र उनसे मिलने चले आते थे तो वह उनसे दुनिया की खबर ले लेते। 

लैपटॉप में बच्चा बने बने रामचरण जी को एक दिन याद आया कि कैसे वो बचपन में मारियो गेम की हर स्टेज पार कर लेते थे। 

रामचरण जी ने अपने दिल के बच्चे को याद करते फैसला ले लिया था कि वह अब बच्चों के लिए कोई नया गेम बनाएंगे। रामचरण जी कम्प्यूटर की दुनिया से अनजान बिल्कुल नही थे। 

बूढ़ा शेर हथियार छोड़ा था, शिकार करना उसे अब भी याद था। अपनी नाक तक चश्मा ला लैपटॉप के सामने बैठे रामचरण जी लगातार एक हफ्ते कोडिंग कर नया गेम बनाने में जुटे रहे।


नवीन भाई जल्दी जल्दी 'आज तक' लगाओ। सुकेश ने अपने ही शहर न्यूयॉर्क में रहने वाले भाई नवीन को फोन लगाते हुए कहा।

पत्रकार- तो रामचरण जी आज आपका बनाया गेम 'दिल तो बच्चा है जी' पूरी दुनिया में छाया हुआ है। कैसे आपको इसे बनाने का विचार आया।

रामचरण जी- मैं अकेला हो गया था, बिल्कुल अकेला। एकल परिवारों में बुजुर्गों के लिए कोई जगह नही है। फिर हमारे देश में बूढ़ों की कोई इतनी पेंशन भी तो नही है कि को बेहतर जिंदगी जी सके।
इसलिए मैंने फैसला लिया मैं लोगों को सीख दूंगा कि अपने अंदर के बच्चे को कभी मत मरने दो। वही है जो आपको हौंसला देता है कुछ कर गुजरने का।

पत्रकार- अपने गेम के बारे में कुछ बताइए
रामचरण जी- अरे हाँ, मैं भी भावुक हो गया। मेरे दिल इस गेम का हीरो है। एक बच्चा जो आठ स्टेज पार करता है। हर स्टेज में जीवन के दस साल हैं, उसके संघर्ष है। उम्मीद है इन्हें समझ कोई बेटा अब अपने माता पिता को अकेला नही छोड़ेगा।

पत्रकार- इस गेम बनाने के बाद आपको जो 1000 करोड़ रुपए मिले हैं उनका आप क्या करेंगे?
रामचरण जी- कुछ नही बस और गेम बनाऊंगा।

नवीन और सुकेश की आंखों में आंसू थे।


आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...