Tuesday, September 13, 2022

हिंदी दिवस पर आरपीआई की पोटली से हिंदी के प्रचार पर निकले कुछ विचार

देश आजाद होने के बाद 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से निर्णय लिया कि हिन्दी भारत की राजभाषा होगी। इस महत्वपूर्ण निर्णय के बाद हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा के अनुरोध पर 1953 से देशभर में 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

भारत की राष्ट्रभाषा न बन सकने वाली हिंदी अभी देश की राजभाषा है। राजभाषा होने के कारण सरकारी विभागों में हिंदी अनुभाग आवश्यक है और बहुत से सरकारी काम हिंदी में होते हैं। ऐसा इसलिए किया गया है ताकि लोग हिंदी को ज्यादा समझें और इसकी तरफ आकर्षित हों।
लेकिन उस कार्यालयी हिंदी को समझना अक्सर आम हिंदीभाषी के लिए भी टेढ़ी खीर साबित हो जाता है।
हिंदी भाषा के प्रसिद्ध विशेषज्ञ डॉ सुरेश पंत भी कार्यालय हिंदी पर कहते हैं कि कार्यालयी हिंदी तो आसान होने ही चाहिए।

कार्यालयी हिंदी का इतना जटिल होने का सवाल रेडियो प्लेबैक इंडिया के वाट्सएप ग्रुप में उठा और आरपीआई के लगभग सभी सदस्यों ने इस पर अपनी राय रखी थी।

हिंदी के लोकप्रिय लेखक अनुराग शर्मा कार्यालयी हिंदी के मुश्किल लगने के सवाल पर आरपीआई को दिए अपने साक्षात्कार में कहते हैं कि
'वह मुश्किल इसलिये लगती है क्योंकि कार्यालयी हिंदी का मतलब किताबी अंग्रेज़ी का बेतुका हिंदी अनुवाद रह गया है।'

इसी विषय पर पॉडकास्ट की दुनिया में अपना परचम लहराने वाले समीर गोस्वामी आरपीआई वाट्सएप ग्रुप में लिखते हैं 'भाषा संवाद का एक माध्यम है न कि अहम दिखाने का, आवश्यक यह नहीं कि आप किस भाषा में संवाद कर रहे हैं आवश्यक यह है कि जो संदेश आप पहुँचाना चाह रहे हैं ,वह भाव सहित दूसरे तक पहुँचना चाहिये। भारत बहुभाषी देश है इसलिये यह थोड़ा आवश्यक हो जाता है कि सर्वमान्य एक भाषा हो ताकि संवाद सहजता से हो सके और उसके लिये हिंदी उपयुक्त भाषा प्रतीत होती है। बाकी हर भाषा में इतने कठिन शब्द हैं कि उनके प्रयोग से हम उस भाषा में सहज किसी भी व्यक्ति को असहज कर सकते हैं। एक उन्नत भाषा वही होती है जो सहज संवाद करने में सक्षम हो। अंग्रेजी विश्व स्तर पर स्वीकार्य हो रही है क्योंकि उसने अपने को सहज रखा है और लचीला भी। अंग्रेज़ी ने अपने को विश्व स्तर पर स्थापित करने के लिये उन शब्दों को अपनाने में कोई कोताही नहीं बरती जो स्थानीय या वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य थे। गुरु, चीता, कर्म, पैजामा, योगा, रायता, रोटी जैसे तमाम ऐसे शब्द हैं जो अंग्रेज़ी ने स्वीकार किये हैं। रेल या ट्रेन अंग्रेज़ी भाषा का शब्द है और उद्गम भी, हिंदी चाहती तो इसे ऐसे ही स्वीकार कर सकती थी लेकिन अपने को अलग और उन्नत दिखाने कि लिये किसी विद्वान द्वारा लोहपथगामिनी को हिंदी शब्दकोश में जोड़ दिया। इस ब्रह्माण्ड में किसी भी विकासोन्मुखी द्रव्य का आस्तित्व जब ही कायम रह सकता है जब वो लचीला हो, ये बात सभी पर लागू होती है चाहे वो मनुष्य हो, पेड़ और चाहे भाषा। हम "मार्क टेलर" को मार्क टेलर के नाम से पुकारेंगे तो उचित होगा बेवजह हिंदी को उन्नत दिखाने के चक्कर में अगर हम उसे "निशान दर्जी" के नाम से पुकारेंगे तो हमारी भाषा और हम ही हंसी के पात्र बनेंगे मार्क टेलर नही।'

हिंदी दिवस पर 14 सितंबर को रेडियो प्लेबैक इंडिया के अंतर्गत मेन्टज़ा ऐप पर 'मनमशीन' चैनल में कवि और लेखक शरद कोकास, कवि और प्रोडकास्टर प्रज्ञा मिश्र और डॉ वसुधा मिश्र द्वारा 'मन हिंदी है'  विषय पर एक रोचक वार्ता प्रस्तुत की गई ।

प्रतिभागियों ने बताया कि मनुष्य के विचार करने की पद्धति भाषा से ही उत्पन्न हुई है , न केवल व्यक्त करने के लिए बल्कि विचारों के मन में आने के लिए भी भाषा का होना जरूरी था। 
भाषा के बिना मनुष्य सोच भी नहीं सकता है क्योंकि वह शब्दों में ही सोचता है ।

हिंदी के परिप्रेक्ष्य में विस्तार से बताते हुए उन्होंने कहा कि 14 सितंबर 1976 को राजभाषा अधिनियम के अनुसार भारत मे हिन्दी बोले लिखे व समझे जाने के आधार पर भारत को क , ख और ग क्षेत्रों में विभाजित किया गया। जहां हिंदी प्रमुखता से बोली लिखी वह समझी जाती है वे 'क' क्षेत्र कहलाते हैं , जहां हिंदी समझी जाती है और कुछ क्षेत्रों में बोली भी जाती है वह 'ख' क्षेत्र कहलाते हैं  तथा जिन प्रदेशों में की भाषा हिंदी से इतर अन्य प्रांतीय भाषा है वे 'ग' क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं ।

भाषा के मनोविज्ञान के संबंध में उन्होंने कहा की भाषा के मनोविज्ञान के अंतर्गत तीन चीजें प्रमुख होती हैं जिज्ञासा, अनुकरण और अभ्यास।
 यदि हमें आदिम मनुष्य ने भाषा कैसे सीखी यह जानना है तो हम एक छोटे बच्चे को जन्म से लेकर 10 वर्ष की उम्र तक बढ़ता हुआ देख ले हमें समझ में आ जाएगा।

हिंदी के परिप्रेक्ष्य में भाषा  की विशेषताओं के संबंध में बताया गया कि भाषा अनुकरण करती है, भाषा और उसके प्रयोग से आपके व्यक्तित्व का पता चलता है । भाषा अपने आप में अन्य भाषाओं के शब्दों को समाहित करती है और समृद्ध होती है। किसी भी भाषा में लिखा गया साहित्य उस भाषा का सब उत्कृष्ट उदाहरण होता है इसीलिए साहित्य सृजन में भाषा का ध्यान रखना बहुत आवश्यक है ।

 हिंदी का विकास भी अन्य भाषाओं की तरह ही हुआ है लेकिन आज हिंदी न केवल समाज की, संपर्क की ,बल्कि व्यापार की, विज्ञापनों की और बाजार की भी प्रमुख भाषा है। 
 आज ऐसा कोई प्रदेश नहीं है जहां हिंदी समझने वाले या बोलने वाले लोग ना हो ।

आरपीआई की तरफ से हिंदी दिवस के दिन का सबसे बड़ा सरप्राइज हिंदी साहित्य जगत की बड़ी नाम सुप्रिया पुरोहित की तरफ से किए गए कार्यक्रम थे। उन्होंने आरपीआई के बैनर तले मेन्टज़ा पर पांच कार्यक्रम किए, जिनको सुनने के लिए हमारी साइट पर कार्यक्रम के लिंक को चटकाया जा सकता है।

रात साढ़े दस बजे हिंदी दिवस पर अंतिम कार्यक्रम 'हिंदी दिवस के दिन हिंदी पर विशेष चर्चा था'। इस कार्यक्रम में विद्यालयों में अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव पर चर्चा की गई। हिन्द युग्म प्रकाशन के वसीम अकरम द्वारा कुछ ऐसे विचार रखे गए कि हर श्रोता 'ओ मॉय गॉड' बोलने पर मजबूर हो गया।

आरपीआई ब्लॉग टीम।

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