Monday, May 31, 2021

पुस्तक समीक्षा : उसने गांधी को क्यों मारा

गांधी के महात्मा ,सावरकर के वीर और गोडसे के हत्यारे होने पर स्थिति स्पष्ट करती एक क़िताब।


गांधी एक ऐसा शब्द है जिसे हमने बचपन से सुना, आज भी गांधी के ऊपर सोशल मीडिया पर कोई पोस्ट चिपका दो तो पक्ष-विपक्ष वाले उन पर अपनी राय देने के लिए तैयार रहते हैं।
महात्मा की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे के बारे में कुछ नही जानने वाले लोग भी उसके द्वारा की गई गांधी हत्या के बारे में अपनी अलग-अलग राय देते हैं।

गांधी के बारे में आप जानने की जितनी कोशिश करेंगे उतना गहराते चले जाएंगे, उनके बारे में महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन ने भी कहा था - आने वाली नस्लें शायद ही यकीन करे कि हाड़-मांस से बना हुआ कोई ऐसा व्यक्ति भी इस धरती पर चलता-फिरता था।

कश्मीर के इतिहास और समकाल के विशेषज्ञ के रुप में सशक्त पहचान बना चुके और 'कश्मीरनामा' के लेखक अशोक कुमार पांडेय की यह किताब गांधी को मारने के लिए बीच में आए साजिश और स्रोतों की पड़ताल करती है।

पुस्तक तीन खंडों में लिखी गई है। पहले खण्ड में हत्यारों से परिचय कराते हुए लेखक दूसरे खण्ड में उन परिस्थितियों से अवगत कराते हैं जिनमें गांधी हत्या की पटकथा लिखी गई, अंतिम खण्ड में अदालती कार्रवाई के बारे में लिखा गया है।

किताब की शुरुआत उस गांधी के बारे में बात करते हुए होती है जो बंटवारे के बाद पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के ऊपर हो रहे अत्याचारों को रोकने की कोशिश करने वहां जाना चाहता था।
पहले खण्ड में हत्यारों के जीवन के बारे में ऐसे खुलासे किए जाते हैं जिससे उनके अतीत की पृष्ठभूमि में हत्यारों का पनपना साफ़ दिखाई देता है।

लेखक ने तब की मीडिया को लेकर जो खुलासे किए हैं उन्हें देख यह लगता है कि मीडिया आज भी उस स्थिति से बाहर नही निकली है, वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए इतिहास से उठाए गए तथ्यों की वज़ह से ही यह किताब आज पढ़ने योग्य बन जाती है।
गांधी हत्या पर तब के तंत्र पर यह सवाल उठते हैं कि उन्होंने जानकारी होते हुए भी हत्या रोकने के लिए आवश्यक कदम नही उठाए।

खण्ड की यह बात कि नफ़रत की विचारधारा सभी धर्मों के ऐसे अनेक उत्साही और आदर्शवादी युवाओं को आज भी हत्यारों में बदल रही है वर्तमान परिदृश्य में सही साबित होती है। 
तख़्त पर बने रहने के लिए वाट्सएप यूनिवर्सिटी से युवाओं को नफ़रत का ज्ञान बांटा जा रहा है, सोशल मीडिया पर आधे-अधूरे ज्ञान की भरमार है।
यही समझाते पुस्तक साधारण मनुष्यों को दरिंदा बनाने वाली प्रेरणाओं तक पहुंचती है और पाठक इसे समझ भी सकते हैं।

दूसरे खण्ड मेंं गांधी हत्या के समय घटित हो रही अन्य घटनाओं को क्रमवार बताया गया है, यह वह घटनाएं थी जिनका परिणाम गांधी हत्या के रूप में सामने आने वाला था।
चुन्नीबाई वैद्य का यह कथन कि 'गांधी जी कट्टरपंथी हिंदुओं की राह के कांटे बन चुके थे'। सारी कहानी बयां करता है।
'केसरी' में 15 नवम्बर 1949 को छपे एक लेख जिसमें गांधी के हत्यारों का गुणगान किया गया है की वज़ह से एक विचारधारा की जीत का जश्न साफ दिखाई दिया है।

लेखक ने गांधी के दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह वाले किस्से को गांधी के अहिंसा पर चलने वाले रास्ते की शुरुआत बताते हुए उनके और मीर आलम के बीच घटी घटना का जिक्र भी किया है।
गांधी ने अपने हमलावर मीर आलम के लिए अटार्नी जनरल से माफी की मांग करी और बाद में उनसे प्रभावित हो वही मीर आलम गांधी की रक्षा के लिए एक जगह कटार लिए खड़ा था।
एक उद्घाटन समारोह में गांधी ने सोने-चांदी से लदे महाराजाओं से कहा था 'ओह यह वही धन है जो किसानों से आया है'। वहीं से विनोबा भावे उनसे मिले थे।
किताब में  हम यह पढ़ सकते हैं कि कैसे पहले गांधी के विचार अंग्रेज़ों के प्रति न्यायपूर्ण राज्य वाले थे जो बाद में बदलकर अन्यायपूर्ण राज्य वाले बन गए थे।
लेखक गांधी के विचार जानने के लिए 'द रिमूवल ऑफ अंटचेबिलिटी' जैसी किताबें पढ़ने के लिए भी कहते हैं।

पुस्तक हमें यह बताती है कि गांधी का संघर्ष जातिवाद विरोध कर एक समरस समाज बनाने के लिए था तो सावरकर अन्य धर्मों के खिलाफ़ खड़े होने के लिए हिन्दू एकता बढ़ाना चाहते थे। सावरकर के खत उनके अंग्रेजी शासन के साथ क़रीबी का वर्णन करते हैं।

लेखक अपनी किताब से गांधी के विभाजन के प्रति जिम्मेदार होने वाले तथ्य को भी तोड़ते हैं। पुस्तक गांधी के आज़ादी के बाद के चिंतन पर भी प्रकाश डालती है। गांधी के लिए कांग्रेस सत्ता प्राप्ति का जरिया नही थी, उनके लिए यह स्वराज़ के सपने को पूरा करने वाली संस्था थी और गांधी का स्वराज़ केवल 'आज़ाद' भारत नही था।

नोआखली की घटना, दंगो की शांति के लिए गांधी के प्रयासों के साथ-साथ उनके हत्यारों के निजी जीवन में चल रही उथल-पुथल पर चर्चा करती किताब आगे बढ़ती है।
आरएसएस पर गांधी विचार आज भी परस्पर सत्य साबित होते हैं।
लेखक गांधी के जीवन में कला और संगीत के अभाव की बात करने वालों के लिए भी तथ्य सामने रखते हैं।

गांधी के हत्यारों की वास्तविकता दिखाने के लिए कपूर आयोग की रिपोर्ट्स का हवाला दिया गया है। गांधी हत्या के बाद पटेल और नेहरू के बारे में कहा गया है कि पटेल हत्यारों को फांसी दिलाना चाहते थे तो नेहरू ने इस पर कोई हस्तक्षेप नही किया था।

सावरकर के अंगरक्षक और सचिव के बयानों का वर्णन है जो अदालत में नही रखे गए। 
हत्या के बाद सावरकर द्वारा सम्पर्क न रखने की वज़ह से गोडसे आहत था, यह बात आज की इस्तेमाल करो और अलग कर दो वाली राजनीति पर भी सही साबित होती है।

तीसरा खण्ड तुम अदालत में झूठ बोले गोडसे में लेखक गोडसे के खुद को सही और महान बनाने की कोशिश करने वाले बयानों को अपने तर्कों से झूठा साबित कर देते हैं।
लेखक समझाते हैं कि आम भारतीयों के घर में जिन स्थितियों के बाद विभाजन होता है उन्हीं स्थितियों में ही भारत-पाक विभाजन हुआ था जिसका जिम्मेदार गांधी को ठहराना गलत है , लेखक इस विचार को मजबूती के साथ रखते हैं कि गांधी तो बंटवारे के बाद भी दोनों को एक करना चाहते थे।

1857 के बाद अंग्रेज़ों की 'डिवाइड एन्ड रूल नीति' जिसमें उनका साथ साम्प्रदायिक हिंदू और मुस्लिमों ने दिया था, विभाजन के लिए जिम्मेदार थी।
किताब भगत सिंह पर भी गांधी की स्थिति स्पष्ट करती है।
अंत में लेखक बहुत सी किताबों व अन्य सबूतों को आधार बनाते हुए यह साबित करने में कामयाब होते हैं कि गोडसे भी उसी मानसिक विकृति का शिकार थे जिस धार्मिक कट्टरता की वज़ह से आज दिल्ली दंगों जैसी घटनाएं हो रही हैं और एक युवक पुलिस की तरफ़ पिस्टल ताने खड़े रहता है।

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन

Sunday, May 30, 2021

हिंदी पत्रकारिता दिवस : उत्तराखंड के जनांदलनों का प्रतिबिंब रहा है 'नैनीताल समाचार'

पण्डित युगुल किशोर शुक्ल ने 30 मई 1826 को हिन्दी समाचार पत्र उदन्त मार्तण्ड का प्रकाशन आरम्भ किया था ।
उसी ऐतिहासिक दिन की याद में और हिंदी पत्रकारिता को बढ़ावा देने के लिए हर वर्ष 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है। 

उदन्त मार्तण्ड के बाद से सैंकड़ो हिंदी समाचार पत्र- पत्रिकाएं आयी, उनमें से कुछ अब भी हैं और कुछ भारतीय जनमानस के मन में अपनी अमिट छाप छोड़कर चली गयी। स्वतंत्रता पूर्व जहां समाचार पत्रों का मुख्य कार्य देश को आज़ादी दिलाने में सहयोग कराते हुए अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध देश को एकजुट करना था तो स्वतन्त्र बाद उनके कार्यों में सामाजिक कुरूतियों को दूर करना भी शामिल हो गया।
आज़ाद भारत के तंत्र में भी कई खामियां सामने आते रही और बहुत से हिंदी व अन्य भाषाओं के समाचार पत्र उनके खिलाफ़ आवाज़ उठाते हुए जनता के साथ खड़े रहे।

एक आंदोलनकारी अख़बार का जन्म 


नैनीताल के तीन युवाओं राजीव लोचन साह, हरीश पन्त और राकेश लाम्बा ने भी लोकतंत्र के इस चौथे स्तम्भ को मजबूत करने के लिए वर्ष 1977 के स्वतंत्रता दिवस को 'नैनीताल समाचार' की शुरुआत करने के लिए चुना। यह एक पाक्षिक अखबार के रुप में शुरू हुआ जिसको अपनी शुरुआत से ही गांधीवादी चंडी प्रसाद भट्ट और सुंदर लाल बहुगुणा का मार्गदर्शन मिला।

लेखकों, पत्रकारों की बात की जाए तो वर्तमान समय के प्रसिद्ध इतिहासकार पद्मश्री शेखर पाठक के साथ नवीन जोशी, गोविंद पन्त जैसे भविष्य के नामी पत्रकारों के साथ इस अखबार की शुरआत हुई।

उत्तराखंड की मुख्य समस्या प्रवास पर इस अख़बार के दूसरे अंक से ही 'प्रवास की डायरी' छपी जो अगले सात साल तक जारी रही और तीसरे अंक में तवाघाट दुर्घटना पर एक रपट प्रकाशित हुई जिसमें पत्रकार के नाम की जगह लिखा तो विशेष प्रतिनिधि गया था पर वह ख़बर सुंदर लाल बहुगुणा ने लिखी थी।

मई 1982 में समाचार पत्र का कार्य पूरा समझकर इसके कर्ताधर्ताओं ने इसे बंद करने की ठानी और इसको लेकर अख़बार में एक छोटा सा सन्देश भी लिख दिया पर उसके बाद पत्रों से पाठकों के इसे बंद न करने की गुज़ारिश पर अख़बार चलता रहा।
वर्ष 1983 में 'उत्तराखंड की बाढ़, भूस्खलन और तबाही' शीर्षक से छपा आलेख उत्तराखंड के इतिहास में हुई प्राकृतिक आपदाओं को दिखाता है।
इतिहास पर नित्यानन्द मिश्रा की लिखी श्रृंखला पर तो 'कुर्मांचल गौरव गाथा' नाम से पुस्तक भी छप गई है।

जनांदोलनों का प्रतिबिंब

उत्तराखंड से उत्तरांचल और फिर उत्तराखंड बनने का पूरा सफ़र हम नैनीताल समाचार में पढ़ सकते हैं, यह यात्रा भी नैनीताल समाचार के साथ ही चलती प्रतीत होती है। प्रदेश में होने वाले हर प्रकार के जनांदोलनों की यह आवाज़ बनते गया। 
वर्ष 1984 में प्रदेश के अंदर शराब विरोध में चल रहे आंदोलन को ख़बर को समाचार पत्र ने 'नशा नही रोज़गार दो' शीर्षक से छापा।
'अल्मोड़ा मैग्नेसाइट लिमिटेड' को लेकर यह कहा जाता था कि उसकी वज़ह से स्थानीय लोगों को नुक़सान और उद्योगपतियों को फ़ायदा हो रहा है तो वर्ष 1988 में अख़बार ने जनता की आवाज़ बन एक आलेख छापा जिसका शीर्षक था 'ईस्ट इंडिया कम्पनी उत्तराखंड में उग गई है'।
वर्ष 1994 में उत्तराखंड राज्य आंदोलन के बीच हुए मसूरी हत्याकांड पर अख़बार ने ख़बर छापी 'मसूरी : लाशों को बो कर उत्तराखंड के फूल उगाओ'।

नया राज्य बनने के बाद भी नैनीताल समाचार ने जन की ख़बरों को छापना नही छोड़ा और अपना पत्रकारिता धर्म निभाते हुए समाचार पत्र जन की आवाज़ बना रहा। अगस्त 2011 में प्रदेश में बन रहे बांधों से पर्यावरण को होने वाले नुक़सान पर 'बांध के लिए वन कानून आड़े नही आते' नाम से ख़बर छपी।
वर्ष 2020 में समाचार पत्र में प्रकाशित दो खबरों के शीर्षक थे 'देश को सुलगा गया अमित शाह का नागरिकता कानून' और 'अफ़सोस कि सरकार भूमाफियाओं के साथ खड़ी है'।

अख़बार सिर्फ़ उत्तराखंड ही नही राष्ट्रीय स्तर की महत्वपूर्ण घटनाओं पर भी अपनी राय मज़बूती के साथ रखता रहा।



नैनीताल समाचार में विशेष

आज जब उत्तराखंड के दूरस्थ क्षेत्रों में पहुंचना आसान है तब भी बहुत से क्षेत्रीय व राष्ट्रीय समाचार पत्र, वेब पोर्टल्स वहां घटित कोई घटना पर किसी अन्य की ली तस्वीरों, वीडियो के माध्यम से अपनी ख़बर देते हैं पर जब उत्तराखंड के दूरस्थ क्षेत्रों में पहुंचना आसान नही था तब वहां घटित किसी आपदा में नैनीताल समाचार के संवाददाता पहुंच जाते थे।

नैनीताल समाचार अपने पाठकों के साथ जुड़ने के लिए नए-नए प्रयोग करता रहा है।
1990 में चल रहे आरक्षण आंदोलन के दौरान दो पृष्ठ के परिशिष्ट छाप सड़कों पर बेचे गए थे।
वर्ष 1993 में राकेश लाम्बा द्वारा शुरू गई निबंध प्रतियोगिता का छात्रों को इंतज़ार रहता था।
साल 1994 के राज्य आन्दोलन के दौरान नैनीताल समाचार का 'सांध्यकालीन उत्तराखंड बुलेटिन' बेहद लोकप्रिय हुआ। 3 सितंबर से 25 अक्टूबर तक नैनीताल के दो स्थानों पर रेडियो बुलेटिन की तर्ज़ पर बुलेटिन पढ़ा गया। जिसका प्रयोग बाद में देश के अन्य हिस्सों दिल्ली के जंतरमंतर, उत्तराखंड के गोपेश्वर और उत्तरकाशी में भी किया गया।
अंटार्कटिक की धरती पर पहली बार गए पत्रकार गोविंद पन्त राजू की डायरी भी बहुत लोकप्रिय हुई।



समाचार पत्र में चिट्ठी पत्र और आशल कुशल भाग अपने आप में अनोखे हैं। 'आशल कुशल' उत्तराखंड की जिलावार ख़बरों से एकसाथ रूबरू करवाता है।
साहित्य अंक, पर्यावरण अंक, होली अंक, हरेला अंक एक नया प्रयोग थे। होली अंक में होली के गीत रंगीन पृष्ठों पर प्रकाशित हो उत्तराखंड की होली का अहसास कराते अलग ही आनन्द देते हैं।
उत्तराखंड के लोकपर्व हरेला के लिए हर साल एक विशेष हरेला अंक आता है, अंक के साथ पाठकों के लिए हरेले का तिनका भी भेजा जाता है।



डिजिटल, कोरोना काल में नैनीताल समाचार
 
मोबाइल इंटरनेट लोकप्रिय होने के बाद बहुत से समाचार पत्रों, टीवी चैनलों ने अपने संस्थान के वेब पोर्टल बनाए तो कुछ समाचार संस्थानों ने वेब पोर्टल पर ही जन्म लिया। समय की मांग को देखते हुए नैनीताल समाचार भी वेब पर उपलब्ध है।
कोरोना काल में लगभग सभी समाचार पत्र विज्ञापन न मिलने की वज़ह से बुरी स्थिति से गुज़र रहे हैं, नैनीताल समाचार भी इससे अछूता नही रहा फिर भी अपने पाठकों के सहयोग से यह अब भी निरंतर प्रकाशित हो रहा है।
समाचार पत्र में सितंबर 2020 के अंक में प्रकाशित आलेख 'खुद तलाशनी होगी राह रोज़गार की' उत्तराखंड की जनता को कोरोना काल में स्वरोज़गार के कई उपायों से परिचित कराता है।
नैनीताल समाचार वेब में 17 सितंबर 2020 को प्रकाशित आलेख ' 18 सितंबर नैनीताल क्लीनअप डे : क्या देश कुछ अनोखा देखेगा' पढ़ने के बाद नैनीताल में स्वच्छता अभियान से जुड़ी संस्था 'ग्रीन आर्मी' के जय जोशी कहते हैं कि यह आलेख पढ़ने के बाद उनमें कुछ करने का जोश भर गया।
वर्ष 2021 के अप्रैल अंक की ख़बर 'ये आग तो बुझ जाएगी, मगर सवाल तो सुलगते रहेंगे' के साथ उत्तराखंड की वनाग्नि पर सवाल उठाते नैनीताल समाचार भारतीय हिंदी पत्रकारिता में अपना काम करते जा रहा है।


आजकल दो-तीन वर्ष चलने के बाद ही बंद होते समाचार पत्रों और समाचार वेब पॉर्टलों के लिए नैनीताल समाचार एक उदाहरण है कि कैसे जन की खबरों से वर्षों पत्रकारिता कर सकते हैं।

हिमांशु जोशी, उत्तराखंड।

हिंदी पत्रकारिता दिवस : आज की हिंदी पत्रकारिता

पण्डित युगुल किशोर शुक्ल ने 30 मई 1826 को हिन्दी समाचार पत्र उदन्त मार्तण्ड का प्रकाशन आरम्भ किया था ।
उसी ऐतिहासिक दिन की याद में और हिंदी पत्रकारिता को बढ़ावा देने के लिए हर वर्ष 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है। 

भारतीय हिंदी पत्रकारिता

उदन्त मार्तण्ड के बाद से सैंकड़ो हिंदी समाचार पत्र- पत्रिकाएं आयी, उनमें से कुछ अब भी हैं और कुछ भारतीय जनमानस के मन में अपनी अमिट छाप छोड़कर चली गयी। स्वतंत्रता पूर्व जहां समाचार पत्रों का मुख्य कार्य देश को आज़ादी दिलाने में सहयोग कराते हुए अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध देश को एकजुट करना था तो स्वतन्त्र बाद उनके कार्यों में सामाजिक कुरूतियों को दूर करना भी शामिल हो गया।
आज़ाद भारत के तंत्र में भी कई खामियां सामने आते रही और बहुत से हिंदी व अन्य भाषाओं के समाचार पत्र उनके खिलाफ़ आवाज़ उठाते हुए जनता के साथ खड़े रहे।
आज भी अपने आसपास की विश्वसनीय खबरें प्राप्त करने के लिए भारतीय घरों में अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिंदुस्तान जैसे दैनिक समाचार पत्रों का इंतज़ार रहता है।

मीडिया अधिकारों पर सवाल 

अमरीका में लोकतंत्र की मज़बूती का एक बहुत बड़ा कारण वहां की पत्रकारिता को दिए गए अधिकारों को माना जाता है। मीडिया पर किए गए शोधों के साथ मीडिया से जुड़े शिक्षण संस्थानों की स्थापना में भी अमरीका हम से बहुत आगे रहा है।

पिछले कुछ सालों में भारतीय मीडिया की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिन्ह लगा है। गौरी लंकेश जैसी पत्रकारों की हत्या से लगता है कि भारत में पत्रकार सुरक्षित नही हैं। विश्व भर में प्रेस की स्वतंत्रता पर नज़र रखने वाली पेरिस स्थित एनजीओ रिपोर्ट्स विदआउट बॉर्डर
के अनुसार विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2021 में भारत 142वें स्थान पर है

पत्रकारिता का गिरता स्तर 

केबल टीवी और डिजिटल मीडिया के आगमन के बाद से भारत में पत्रकारिता सोने के अंडे देने वाली चिड़िया बन गई। विश्व भर के बड़े-बड़े उद्योगपतियों ने भारतीय मीडिया जगत में अपना निवेश शुरू किया।
गांव के साथ बड़े-बड़े शहरों में दसवीं, बारहवीं पास युवाओं को इन समाचर घरानों ने कम वेतन पर अपने साथ जोड़ना शुरू किया। कम वेतन तो ठीक था अब अवैतनिक तौर पर भी ऐसे पत्रकारों की नियुक्ति होने लगी है जो अपने मीडिया कार्ड का उपयोग वसूली, रसूख बढ़ाने जैसे कार्यों में करने लगे हैं।

सुशांत केस पर भारतीय मीडिया की बहुत किरकिरी हुई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने मीडिया घरानों को नसीहत दी कि आत्महत्या के मामलों की रिपोर्टिंग के दौरान संयम बरते। कोर्ट ने दो चैनलों की रिपोर्टिंग को मानहानिकारक बताते हुए कहा, ''मीडिया ट्रायल से न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप और बाधा उत्पन्न होती है।'' 
पुलवामा हमले और उसके मीडिया से सम्बन्धों पर भी उंगली उठी।

टीवी चैनलों में लाईव वाद-विवाद के दौरान कभी-कभी स्तर इतना गिरा दिया जाता है कि वह समाचार चैनल कम और दंगल का चैनल ज्यादा लगता है। दूरदर्शन के शांत समाचारों से इन समाचारों तक का सफ़र अब बहुत ही स्तरहीन बन गया है।

आज़ादी के बाद भारत में पत्रकारिता के स्तर को बनाए रखने के लिए दो प्रेस आयोगों की स्थापना की गई। वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी के साथ अन्य बहुत से पत्रकार भी समय-समय पर तीसरे प्रेस आयोग की स्थापना की मांग उठाते आए हैं। भारतीय पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति की वज़ह से इस आयोग का गठन बहुत ही आवश्यक हो गया है।

कोरोना काल में पत्रकारिता

भारतीय पत्रकारिता अपने अस्तित्व के लिए विज्ञापन राजस्व पर निर्भर हैं। कोरोना में लॉकडाउन की वज़ह से पूरा भारत घर में बंद है, कम्पनियों के उत्पाद बिकने बंद हो गए हैं तो उनका विज्ञापन करना भी बेकार हो गया। विज्ञापन न मिलने की वज़ह से बड़े-बड़े समाचार पत्र भी पांच से दस पन्नों में सिमट गए हैं। वहीं छोटे मीडिया संस्थान तो अपनी पत्रकारिता समेट दूसरे कामों में लग गए। इसमें बहुत से ऐतिहासिक समाचार परिवार भी शामिल हैं।
वर्ष 2021 आते-आते बहुत से पत्रकार अपनी संस्था से निकाले जा चुके हैं और जो पत्रकार किसी संस्थान से जुड़े भी हैं उनके लिए उनमें टिके रहने की चुनौती सामने आने लगी।

लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की रक्षा करने वाले पत्रकारों को सीमा पर अपनी जान देने वाले सिपाहियों की तरह शहीद का दर्जा कभी नही मिलता है। अब किसी-किसी राज्य ने पत्रकारों को कोरोना से युद्ध में अग्रिम पंक्ति का योद्धा मानते हुए वैक्सीन लगवाई है।

जेनेवा स्थित एनजीओ प्रेस एम्बलम कैम्पेन (पी.ई.सी)  के अनुसार 72 देशों में कोरोना की वज़ह से 1अप्रैल 2021 तक 970 पत्रकारों की मौत हो गई है। जिसमें पेरू के सबसे अधिक 135 पत्रकारों की मौत हुई है और वहां कुल कोरोना संक्रमित मरीज़ों की संख्या 1.64 मिलियन है।

 भारत में 13.4 मिलियन आबादी कोरोना संक्रमित होने के बाद यह संख्या 58 है तो अमरीका में 31.2 मिलियन आबादी के कोरोना संक्रमित होने के बाद 46 पत्रकार मौत की नींद सो गए।

 भविष्य की हिंदी पत्रकारिता

प्रिंट मीडिया को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की शुरुआत से ही अपना अस्तित्व बचाने की चुनौती मिली है और वह उसमें सफल भी रहा है पर अब हिंदी पत्रकारिता से जुड़े लोगों को डिजिटल पत्रकारिता को ओर अधिक ध्यान देना होगा क्योंकि निर्विवाद रूप से पत्रकारिता का भविष्य वही है।
क़लम से लिखे शब्द एक सादे कागज़ पर लिखे हों या मोबाइल, लैपटॉप स्क्रीन पर वह अपना असर दोनों जगह बराबर ही छोड़ते हैं।

लैपडॉग मीडिया विवाद

बहुत से पाठकों का कहना होता है कि लैपडॉग मीडिया (जिसे भारत में अधिकतर लोग गोदी मीडिया के नाम से जानते हैं) की वज़ह से उन्होंने अख़बार पढ़ना या समाचार चैनल देखना बंद कर दिया है तो उन्हें यह समझना चाहिए कि पत्रकारिता का कार्य अपने पाठकों को दोनों पक्षों को बराबर दिखाने का होता है। 
पत्रकार आपको कोरोना की वज़ह से लगी चिताओं के लिए कम पड़ती जगह की तस्वीरें दिखाते हैं तो वह आपको कोरोना से जंग जीते मरीज़ की खुशियां भी दिखाते हैं।
पाठकों को अपनी समझ का इस्तेमाल करते हुए सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार की खबरों से कुछ न कुछ सीखना चाहिए।

Saturday, May 29, 2021

जन्मदिन की डायरी : पत्रकारिता का एक दस्तावेज़।

पिछले मई जब क़लम को दुनिया की सबसे बड़ी ताकत मानते लिखना शुरू किया था तब यह समझ नही आया था कि यह मेरा भ्रम है या विश्वास।
तब से आज एक साल पूरा हो गया और कोरोना काल में बहुत बार ऐसा लगा कि यह मेरा भ्रम ही था पर एक साल होते-होते मुझे यह विश्वास हो चला है कि क़लम दुनिया के किसी भी हथियार से बड़ी शक्ति है।

पिछले मई लिखना शुरू किया तो आज मैंने निर्णय ले लिया है कि अपने जन्मदिन के साथ ही हर वर्ष अपनी पत्रकारिता की सालगिरह भी मनाया करूंगा। सामान्य दिनों से लॉकडाउन के दिनों की ओर गुज़रती, रास्तों में चलते सड़क दुर्घटनाओं के कारण विचारती हुई आगे बढ़ती यह कहानी कभी स्वच्छ भारत की वास्तविक तस्वीर दिखाती है तो कभी धौनी के छक्के-चौके। कोरोना डायरी से जन्मदिन डायरी बनने की यह कहानी रोचक है और कुछ दिन बाद एक कॉलेज के प्रथम वर्ष के छात्रों को ऑनलाइन पढ़ाना है तो यह जन्मदिन डायरी शायद उनके और उनके जैसे कई अन्य पत्रकारिता छात्रों के लिए एक आवश्यक दस्तावेज़ भी बन सकती है।

पत्रकार दो तरह के होते हैं, पहले आलीशान स्टूडियो में चमक-धमक के साथ बैठे एंकर और ग्राउंड रिपोर्टिंग करते माइक, कैमरा पकड़े उनके सहयोगी।
 दूसरे आईआईएमसी के छात्र रहे मनदीप पुनिया की तरह जो किसान आंदोलन में गिरफ्तार होने के बाद जेल में अपनी जांघ पर रिपोर्टिंग कर आते हैं। यही मनदीप प्रतिष्ठित कारवां मैगज़ीन में भी अपना नाम छपवा चुके हैं।
मुझे पता है पत्रकारिता के अधिकतर छात्रों का सपना पहले तरह के पत्रकार बनने का ही होता है।

पर मैं मनदीप की तरह वाला पत्रकार, लेखक बनना चाहता हूं।

विधवा पुनर्विवाह को लेकर मैं हमेशा से लिखना चाहता था, विद्यालय के बाद जंग लगी क़लम सालों बाद कोरोना काल में मई 2020 के दौरान चली तो पहला आलेख ही अमर उजाला वेब में प्रकाशित हो गया।

नैनीताल में रहकर नैनीताल समाचार को जो न समझे तो वह पत्रकार कैसा, चला गया 25 मई को नैनीताल समाचार या यूं कहें राजीव लोचन साह से मिलने।
भविष्य की शुभकानाओं सहित नैनीताल समाचार के सफ़र पर छपी एक किताब मुझे उनकी ओर से भेंट पर मिली।
28 मई 2020 में पंजाब केसरी वेब पर 'हम अपना जन्मदिन क्यों मनाते हैं' आलेख के बाद हिंदी पत्रकारिता दिवस पर लिखा आलेख नैनीताल समाचार के वेब पोर्टल पर था।
इसके बाद विश्व साइकिल दिवस , आरोग्य सेतु एप की उपयोगिता और अमरीका में चल रहे अश्वेत आंदोलनों पर लिखे आलेख भी अमर उजाला वेब पर थे।
इसके बाद उत्तराखंड के पहले दैनिक अखबार उत्तर उजाला में मेरे आलेखों के छपने की शुरुआत हुई, सड़क दुर्घटनाओं और पलायन के मुद्दों पर आलेख प्रकाशित हुए।

कोरोना काल में उत्तराखंड के हालातों पर की गई रिपोर्टिंग को नैनीताल समाचार के साथ रीजनल रिपोर्टर में भी जगह मिली।
विकास दूबे कांड पर पुलिसकर्मियों के शहीद होने की वजह तलाशता आलेख भी उत्तर उजाला और नैनीताल समाचार में था।

कोरोना काल में बुजुर्गों की स्थिति पर लिखा आलेख अमर उजाला वेब में तो राजीव लोचन साह के द्वारा मिलाए गए समाजसेवी बसु राय के जीवन पर लिखा अमर उजाला प्रिंट में प्रकाशित हुआ।
बसु राय का साक्षात्कार लिखते समय मैं खुद पर विश्वास नही कर पा रहा था जिस पर राजीव लोचन साह ने मुझसे कहा 'दिमाग पर कोई दबाव मत रखो और जल्दबाजी तो कतई मत करो। तीन-चार बार साथ बैठो और कम से कम पन्द्रह दिन लगाओ।'
उसका परिणाम ऊपर लिखा है।

अगस्त आते-आते धोनी के रिटायरमेंट पर लिखा आलेख एक पुराने मित्र के समाचार वेब पोर्टल लाइवएसकेजी न्यूज़ पर भी पब्लिश हुआ।

इसके बाद सर्वोदय समाज से मेरे परिचय की शुरुआत फिर से राजीव लोचन साह द्वारा ही मिलाए गए अनिरुद्ध जडेजा के साक्षात्कार के साथ हुई, उन पर लिखा आलेख न्यूज़लॉन्ड्री पर पब्लिश हुआ।
स्वतन्त्र पत्रकारिता करते हुए आप वर्तमान हालातों में पैसा कमाने की नही सोच सकते पर कर्म करते रहने से फल मिलता ही है तो मुझे भी राजीव लोचन साह के बालसखा के जीवन पर किताब लिखने का अवसर मिला, अपनी किताब छपना शायद किसी किताब पढ़ने वाले का सबसे बड़ा सपना होता है।

एक रिपोर्ट का अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद ठीक से न कर पाने पर मैं निराश था तो राजीव लोचन साह ने मुझसे कहा कि 'तुम में बहुत अधिक क्षमता है। मैं तो इस बहाने तुम्हें तरीका सिखाने की कोशिश कर रहा था।'
कुछ समय बाद मैं बिना लक्षणों के कोरोना पॉजिटिव हुआ और वहां राजीव लोचन साह के उन्हीं शब्दों को याद कर रोज़ हिम्मत कर अपने हालातों पर डायरी लिखता रहा जो सत्याग्रह ने प्रकाशित करने के लिए कहा तो पर की नही और वह भड़ास4मीडिया पर पब्लिश हुई।

वापस आने पर नैनीताल समाचार के तालों की चाबी हमेशा मेरे लिए उपलब्ध रहने लगी, किसी नए पर उनका इतना भरोसा ही शायद मुझे अच्छा करने के लिए प्रेरित कर रहा था।
नैनीताल समाचार के साथ काम करते मैं पत्रकारिता की अलग विधाओं से परिचित हो रहा था, साक्षात्कार के बाद नैनीताल में स्वच्छता दिवस पर रिपोर्टिंग करना मेरी पत्रकारिता में अब तक का सबसे सुखद अनुभव था जब सामाजिक कार्यकर्ता जय जोशी द्वारा मुझे यह कहा गया कि आपके आलेख ने हमारे अंदर जोश भरा और बेहतर करने के लिए प्रेरित किया।

राजीव लोचन साह ने इस पर मुझे प्रतिभाशाली लिक्खाड़ कहा।

उसके बाद स्वरोज़गार पर कुछ उदाहरण, संजीव भगत की स्वरोज़गार के लिए प्रेरित करती कहानी और उत्तराखंड दिवस पर लिखा आलेख नैनीताल समाचार प्रिंट में प्रकाशित हुए।

कोरोना काल की शुरुआत में प्रवासियों पर जमकर शोर हुआ पर 2020 के अंत में यह शोर ख़त्म हो गया था उस पर ग्राउंड रिपोर्ट लेकर लिखा आलेख उत्तर उजाला में आया और साल का अंत पहली बार प्लाज़्मा दान करने के बाद लिखे आलेख के विभिन्न जगहों पर प्रकाशित होने के साथ हुआ।

2021 में मेरे पास नए कार्य थे पर कोरोना की आने वाली दूसरी लहर से हम सब अंजान थे।
ज्ञानिमा पर अपने 2021 के सपने लिखने का मौका मिला।
पिछले साल अमर उजाला वेब में छपी अपनी कविता पर नज़र पड़ी तो ख़ाकी पर एक कविता लिखी जो उत्तर उजाला में प्रकाशित हुई।

फ़रवरी माह में दूसरी बार प्लाज़्मा दान करने के बाद प्लाज़्मा को गम्भीरता से न लेने पर लिखा आलेख और बाल मज़दूरों पर लिखी कविता उत्तर उजाला पर प्रकाशित हुई।
कोरोना काल में समाचार संस्थान बड़ी मुसीबत में चल रहे हैं, उत्तराखंड में मशरूम गर्ल नाम से मशहूर दिव्या रावत द्वारा आयोजित निबंध प्रतियोगिता में जीती इनाम राशि मैंने कुछ संस्थान को सहयोग के रूप में भी दी। सच्ची पत्रकारिता देखने , पढ़ने के लिए यह आवश्यक है क्योंकि छोटे मीडिया संस्थानों के पास फंडिंग कराने वाला कोई नही होता।

क़लम निखरती गई तो सबलोग, हस्तक्षेप , मीडिया स्वराज, हिंदी क्विंट, जनज्वार, ऑपइंडिया जैसी वेबसाइट पर भी आलेख आने लगे 

मार्च में उत्तराखंड की राजनीति, भाषा पर आलेख लिखे तो विनोद कापड़ी की फ़िल्म पर समीक्षा भी।
'फिर से भगत सिंह' कविता उत्तर उजाला में प्रकाशित हुई।

अप्रैल माह में उत्तराखंड के जंगलों की आग पर दिल्ली की नुपुर के साथ लिखा आलेख, मीडिया की दुर्दशा और कोरोना से समुदाय की जंग पर आलेख प्रकाशित हुए।
इसके साथ ही 'मुझे लगा अब उठना चाहिए' कविता भी लिखी। गांधीवादी अमरनाथ भाई और राजीव लोचन साह के सुझाने पर मातृ सदन के लोगों से भी मिलना हुआ।

मई माह पत्रकारिता में अब तक के सबसे व्यस्त महीनों में रहा है, ज्यादा लिखा तो हिलांश, हिंदी क्विंट जैसे प्रयोगात्मक मीडिया संस्थानों से भी परिचय हुआ है। डॉक्टरों और पुलिसकर्मियों पर लिखी वायरल कविताओं सहित पांच कविताएं अलग-अलग जगह प्रकाशित हुई, डेलीहंट पर जन ख़बर नाम से अपना पेज़ भी बनाया है।
सरदाना के जाने पर लिखे आलेख से शुरूआत होने के बाद soulify, पर्यावरण प्रदूषण, सब चलता है ने देश का यह हाल किया, उत्तराखंड में कोरोना के ताज़ा हालात नाम से आलेख प्रकाशित हुए।
प्रोफेसर लाल बहादुर वर्मा और सुंदर लाल बहुगुणा को श्रद्धांजलि देने वाले आलेख भी लिखे।
कुछ आलेखों ने लोगों को जागरूक करने का कार्य किया है तो कुछ ने शिक्षित।
यही तो पत्रकारिता का उद्देश्य है।

मोबाइल टॉवर से मर रही गौरैयों, यूट्यूब पर चौबीस घण्टे विज्ञान की क्लास चला गरीबों के लिए धन जुटाने वाले लड़के और ऐसे बहुत से आलेख अभी मुझे लिखने हैं जो समाज में कुछ बदलाव तो ला ही सकते हैं।

स्वतन्त्र तौर पर लगातार एक साल लिखने के बाद इसी महीने एक- दो जगह लिखने के बदले पैसा मिलने की बात भी हुई पर उसके लिए मैंने अभी हामी नही भरी है क्योंकि जब तक हो सकेगा मैं बिना भुगतान लिए ही लिखना चाहूंगा।(अन्य युवाओं को मैं यह सुझाव नही दूंगा)

ख़बर हमारे चारों ओर है। 
पढ़ने के बाद उन पर विश्वास करने से पहले उन्हें समझना और परखना जरूरी है। यही सावधानी हमें कुछ लिखने से पहले भी बरतनी चाहिए। आप पर किसी एक विचारधारा से जुड़ने के आरोप भी लगते हैं, यह कहा जाता है कि यह निष्पक्ष पत्रकारिता नही है। यही आरोप मुझ पर भी लगे पर जो आपको सत्य लगता है वही लिखना और बोलना चाहिए क्योंकि वही आत्मसंतुष्टि देता है।

इस साल के अंत तक गांधी को पढ़ने के साथ बहुत सी अन्य पुस्तकें भी पढ़ना चाहता हूं ताकि अपनी आने वाली किताब पाठकों के पढ़ने लायक लिख सकूं।
पत्रकारिता में कोई सुझाव चाहने पर मेरी एक कॉल पर किसी भी समय सुझाव देने तैयार रहने वाले अपने सारे हितैषियों और अपने प्रिय समीक्षकों से सीखते रहूं (एक-एक का नाम लिखना उचित नही है) यही कोशिश रहेगी।

अंत में यह कि अब मैं यह समझ गया हूं कि किसी बड़े संस्थान में आलेख प्रकाशित होना बड़ी बात नही है, मेरे लिए 'जन ख़बर' में आलेख छपना भी उतनी बड़ी बात है जितनी 'हिंदी क्विंट' में।

परिवर्तन बिना किसी संस्थान के नाम लिखे एक सादे कागज़ में लिख कर भी आ सकता है।

हिमांशु जोशी, उत्तराखंड।

Monday, May 24, 2021

बहुगुणा की धरती को सजा रहा गुजरात से आया एक समाजसेवी।

एक-एक कर भारत से गांधीवादी विचारधारा वाले लोग जा रहे हैं। सुंदर लाल बहुगुणा भी चले गए।
पर गांधी वह विचार है जो आने वाले सैंकड़ों सालों तक भी जिंदा रहेगा क्योंकि महात्मा गांधी ने तब अपने दर्शन से वह विचार भविष्य के लिए छोड़ दिए थे जो हमेशा जन की भलाई के लिए होने वाले थे। आज कोरोना की वज़ह से वर्षों पहले गांव से पलायन कर गए लोग वापस लौटे हैं। गांवों से पलायन इसलिए हुआ क्योंकि ग्राम व्यवस्था ठीक नही थी। 

आज़ादी से पहले ही गांधीजी ने इस समस्या का समाधान ग्राम स्वराज के रूप में दिया था। बाद में विनोबा भावे द्वारा इसे विकसित किया गया। ग्राम स्वराज हर गांव को एक आत्म कुशल स्वायत्त इकाई में बदलने को बढ़ावा देता है जहाँ एक गरिमामयी जीवन के लिए सभी प्रणाली और सुविधाएं उपलब्ध हो।
यह स्वशासन के लिए स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता की दशा में किया गया प्रयास है।
ग्राम स्वराज विकेन्द्रीकृत, मानव केन्द्रित और गैर शोषणकारी है।

हम यहां बात करेंगे गांधीवादी अनिरुद्ध जडेजा की जो गुजरात के होने के बाद भी उत्तराखंड में सुंदर लाल बहुगुणा के जाने से पैदा हुए शून्य को ग्राम स्वराज की कल्पना को साकार कर भरने की कोशिश कर रहे हैं।

 गुजरात में चंदू भा जडेजा के घर में अनिरुद्ध जडेजा ने जन्म लिया।
जब महात्मा गांधी के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी विनोबा भावे 'भूदान आंदोलन' चला रहे थे तब चंदू भा भी उनके साथ थे और उन्होंने अपना एक बेटा विनोबा को दान कर दिया था।
विनोबा ने चंदू भा से उस पुत्र को ऐसा बनाने के लिए कहा कि वह देश के अच्छे भविष्य के लिए समाज सेवा करे। 
इसके बाद चंदू भा ने अपने पुत्र अनिरुद्ध को बचपन से ही समाज सेवा के लिए तैयार किया। बचपन में ही अनिरुद्ध को उनके पिताजी ने पढ़ने के लिए एक धार्मिक पुस्तक 'कथामृत' दे दी थी। उनका कहना था कि बिन धार्मिक ज्ञान के कोई भी सामाजिक कार्य नही किया जा सकता है। अनिरुद्ध को स्वामी विवेकानंद के एक विचार 'मातृभूमि के लिए हमारा कर्तव्य' पर चलने के लिए कहा गया।

किशोरावस्था में आते आते अनिरुद्ध ने विनोबा भावे की तरह ही गांवों में जाकर वहाँ के लोगों को उनका अधिकार दिलाने का निर्णय लिया।

इस बीच 1984-85 में गुजरात दंगे की आग में जल उठा। विमला ठाकर लोगों की मदद के लिए अहमदाबाद पहुंची। 
विमला ठाकर का दर्शन कृष्णमूर्ति की आध्यात्मिक शिक्षाओं और महात्मा गांधी, विनोबा के अहिंसक सामाजिक परिवर्तन दर्शन से प्रभावित था। उन्होंने पूरे विश्व भर में ध्यान सिखाया और ग्रामीण विकास पर कार्य किया।

विमला ठाकर के कहने पर गुजरातियों के कल्याण के लिए गुजरात विरादरी वालंटियर ऑर्ग बना।
अनिरुद्ध कॉलेज जाते ही इससे जुड़ गए।

शुरुआत में ही उन्होंने वोटरों को शिक्षित करने के अभियान में हिस्सा लिया ताकि जनता वोटिंग की अपनी शक्ति को समझें।
इसके बाद उन्होंने साईकिलों, बाइकों में 'ग्राम स्वराज यात्रा' नाम से गुजरात के अंदर छोटी छोटी जागरूकता यात्राएं की जिनका उद्देश्य ग्रामीण इलाकों में पानी और जैविक खेती  की महत्वत्ता समझाना था।

पढ़ाई को अपने समाज के प्रति कर्तव्य में बाधक मानते हुए अनिरुद्ध गुजरात विरादरी के संयोजक डॉ प्रफुल्ल दवे के पास गए और उन्होंने अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़ने की बात उनके सामने रखी पर प्रफुल्ल उनकी इस बात से असहमत थे।
बाद में अनिरुद्ध पढ़ाई पूरी कर अपनी डिग्री प्रफुल्ल दवे को सौंप आए।

गुजरात विरादरी के राज्य संयोजक बनने के साथ ही अनिरुद्ध को ऑफिस का काम मिला और उनकी पहली तनख़्वाह भी।
फील्ड में काम कर समाज सेवा की चाहत रखने वाले अनिरुद्ध ने एक ही साल बाद ऑफिस का काम छोड़ दिया और गुजरात में उपलेटा शहर के नज़दीक मुर्खडा गांव चले गए। वहां पहले से ही रह रहे अपने कुछ दोस्तों के साथ उन्होंने जल प्रबंधन, कचरा प्रबंधन पर कार्य किया।
गांव की बंजर पड़ी जमीन पर उन्होंने जैविक खेती की जिसकी वजह से गांव के लोग उनकी मज़ाक बनाने लगे पर जब उनकी वह खेती सफ़ल होने लगी तब वही लोग उनसे खुद भी खेती करने के लिए बीज मांगने लगे।

इसके बाद वह कुछ समय हिमाचल प्रदेश के खज्जियार में रहे पर हिमाचल पहले से ही विकसित प्रदेश है तो उन्होंने उत्तराखण्ड आने का निर्णय किया और विमला ताई से इस बारे में बात करने के लिए चले गए।

 'विमला ताई' ने अनिरुद्ध जडेजा को जीवन में सफलता प्राप्त करने के तीन मन्त्र 'मित्रता, सहयोग और सहजीवन' देने के साथ ही उत्तराखण्ड जाने की आज्ञा भी दी।

उत्तराखण्ड में गायत्री परिवार से जुड़ी अपनी बहन के साथ अनिरुद्ध  वर्ष 1997 में उत्तराखण्ड पहुँचे और वह अल्मोड़ा के मिरतोला जिसे उत्तर वृंदावन भी कहा जाता है जाना चाहते थे पर उत्तरकाशी में 'इंदु टेकेकर' जो विमला ताई की परिचित थी ने उन्हें टिहरी में सुंदर लाल बहुगुणा के साथ टिहरी बचाने के लिए चल रहे 'टिहरी बचाओ आंदोलन' में शामिल होने के लिए कहा।

आंदोलन में शामिल होने के साथ ही अनिरुद्ध 'पर्वतीय नवजीवन मंडल सिलियारा टिहरी (घनसाली)' संस्था के साथ जुड़ गए।
सिलियारा की बंजर भूमि पर उन्होंने लाइब्रेरी, गौशाला और विद्यालय खोला जिसमें पढ़ाई करने के लिए वह सिलियारा के नजदीकी गांव पिस्वाड़ा से भी बच्चे लाए।
उनकी सिलियारा आश्रम में उगाई सब्ज़ियों को पहली बार देख सुंदर लाल बहुगुणा सब्जियों की टोकरी सर पर ले गंगा किनारे खुशी से झूमने लगे थे।

इस बीच टिहरी में कौसानी से आए हुए राधा भट्ट, दीक्षा बिष्ट जैसे गांधीवादियों से उनकी मुलाकात हुई जिन्हें कौसानी में एक शिक्षक की आवश्यकता थी।

अनिरुद्ध का वर्ष 1999 में अल्पा के साथ गुजरात में विवाह हुआ जहां शामिल होने उत्तराखंड से सुंदर लाल बहुगुणा अपनी पत्नी विमला बहुगुणा के साथ पहुंचे थे।
 विवाह पश्चात अनिरुद्ध अनिरुद्ध अपनी पत्नी को गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ घुमाते हुए कौसानी पहुंचे।
जहां उन्होंने दस गाँव गोद लिए और महिला मंगल दल बनाया। 
बहुत से महिलाओं को स्वरोज़गार के लिए प्रेरित किया।
घराट की चक्की चला उसका आटा उत्तराखण्ड से दिल्ली तक बेचा।



उनकी पत्नी भी सरला बहन के 'कस्तूरबा महिला उत्थान मण्डल कौसानी' से जुड़ कर वहां संस्कृत पढ़ाने लगी।

वर्ष 2001 में उन्होंने अल्मोड़ा के कुछ 'ड्रॉपआउट' छात्रों को 'ब्रिज कोर्स' कराया जो अब अच्छी नौकरी कर रहे हैं।

अनिरुद्ध को अपने सामाजिक कार्यों की वजह से अब आर्थिक समर्थन भी मिलने लगा था जिस कारण धन का हिसाब रखने के लिए उन्हें 'जीवन मांगल्य ट्रस्ट' का गठन करना पड़ा।

अनिरुद्ध जडेजा 'उत्तराखण्ड सर्वोदय मण्डल' के पहले सचिव थे और इसी के साथ उन्होंने कंधार (बागेश्वर) में शराब का विरोध किया। जिसमें इनके साथ सरला बहन की छात्रा दीक्षा बिष्ट भी 'शराब नही रोज़गार दो, स्वदेशी अपनाओ' नारे के साथ शामिल हुई। कंधार में सत्याग्रह के दौरान उनका अस्सी प्रतिशत शरीर लकवाग्रस्त हो गया।

अनिरुद्ध के परिवार जन उनकी इस स्थिति का समाचार सुन उन्हें जबरदस्ती वर्ष 2003 में गुजरात वापस ले गए। वहीं अनिरुद्ध और अल्पा को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।

अनिरुद्ध की तबियत में अब सुधार आने लगा था तो समाजसेवी अनिरुद्ध भला कैसे शांत बैठ सकते थे। इस बीच 'गुजरात स्वराज संघ' गुजरात में भूकम्प के बाद पुनर्वासन का कार्य कर रहा था। 
अनिरुद्ध उन्हीं से जुड़ गए और फिर वह वर्ष 2004 में 33 लोगों की टीम के साथ सुनामी से ग्रसित तमिलनाडु के नागपट्टनम जिले में रह कर पुनर्वासन एवं राहत कार्य में लग गए।


उन्होंने उड़ीसा में चक्रवात तूफान के बाद के राहत कार्यों में भी हिस्सा लिया।

विमला ठाकर ने पूरे एशिया में समाजसेवा के लिए एशियन बिरादरी बनाई थी। वर्ष 2005 में विनाशकारी भूकम्प आने पर पाकिस्तान से अनिरुद्ध को मदद के लिए बुलाया गया पर उन्होंने पाकिस्तान जाने के बजाए सेवा करने के लिए अपने देश को चुना और वह 'ग्राम स्वराजय संघ' के साथ कश्मीर चले गए।
वहां उन्होंने 56 राष्ट्रीय राईफल्स के साथ बारामूला के नावा रुण्डा गांव में भूकम्प से तबाह घरों को फिर से बनाने में मदद की। 
उसके बाद गुजरात भूकम्प के पुनर्वासन अभियान में उनके साथ काम कर चुकी वृंदा डार ने कश्मीर में नए मकान बनाने के एक प्रोजेक्ट 'कश्मीर प्रोजेक्ट ऑक्सफेम' का कार्यभार उन्हें सौंपा जिसकी तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ एपीजे कलाम ने भी तारीफ़ की थी।


गुजरात वापस आ अनिरुद्ध जडेजा ने प्राकृतिक संसाधनों पर मालिकाना हक के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की मदद से 19 सत्याग्रह आंदोलन किए और सब में जीत हासिल की। यह सारे आंदोलन उन्होंने 'सौराष्ट्र लोक समिति' के बैनर तले लड़े जिसके वह संयोजक भी थे।
इनमें से एक महुआ,जिला भावनगर में निरमा सीमेंट फैक्ट्री के स्थान को लेकर किया गया आंदोलन भी था। जिसके लिए उन्हें तीन महीने की जेल भी हुई थी।


गुजरातियों में गांव के प्रति कम होते लगाव से व्यथित हो अनिरुद्ध वर्ष 2016 में फिर से वापस उत्तराखण्ड आ गए।
वर्ष 2019 में पानी की बर्बादी पर उन्होंने भीमताल में 'जल पंचायत' भी की थी।

इस समय वह अपनी सोच से मिलते जुलते 'अवनी' एनजीओ के साथ कार्य कर रहे हैं।
अवनी ग्रामीण महिलाओं और पुरुषों के लिए आत्मनिर्भर और पर्यावरण की दृष्टि से स्थायी आपूर्ति श्रृंखला के माध्यम से व्यवहार्य रोज़गार खोजने के अवसर पैदा करती है।


एक पिरूल के प्लांट में सात-आठ लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोज़गार मिलता है। इस प्लांट से यूपीसीएल को प्रतिदिन 300-400 यूनिट बिजली बेची जाती है। साल भर में एक प्लांट से चार से पांच लाख तक कि कमाई की जा सकती है। 
इस प्रोजेक्ट पर जिला उद्योग केंद्र, उरेडा, यूपीसीएल और अवनी मिलकर कार्य कर रहे हैं।
 यूपीसीएल अगले बीस वर्षों तक इससे बिजली खरीदेगा।
अनिरुद्ध का काम इस प्रोजेक्ट पर लोगों को जागरूक करने का है। वह इसके जमीनी कार्य देखने के साथ-साथ जनता और सरकार के बीच संचार का जरिया भी हैं।



निगराड़, अल्मोड़ा में पिरूल से बिजली के उत्पादन वाले एक प्लांट में अनिरुद्ध कहते हैं कि "पहले पिरूल से जंगलों में आग लगती थी अब उसका सदुपयोग हो रहा है। जो युवा बेरोज़गार हो आत्महत्या की सोच रहे थे वह अब इस पर रुचि ले रहे हैं। ग्रामोद्योग से देश आगे बढ़ेगा"।


अवनी के काम से प्रेरित हो उत्तराखण्ड सरकार ने वर्ष 2018 में पिरूल नीति बनाई।

अनिरुद्ध उत्तराखण्ड के राजकीय इंटर कॉलेजों में कम्प्यूटर की शिक्षा देना चाहते हैं ताकि कोरोना की वजह से शुरू हुए इस ऑनलाइन जमाने में यहां के छात्रों को कम्प्यूटर की जानकारी रहे और उन्होंने रामगढ़ ब्लॉक से इस पर काम भी शुरू कर लिया है।
 अनिरुद्ध ने निगराड़ में किराए पर एक भवन ले उसका नाम विवेकानंद केंद्र रखा है जिसमें वह आसपास के बच्चे जमा कर उनसे पेंटिंग, खेलकूद प्रतियोगिताएं करवाते हैं, अक्सर अनिरुद्ध की बेटी यह प्रतियोगिताएं पूरी करवाती हैं।

कोरोना काल में कोरोना संक्रमित होने के बाद अनिरुद्ध गम्भीर रूप से बीमार हुए थे उससे विजय पाने के बाद वह जनसेवा के अपने कार्य को फिर से आगे बढ़ा रहे हैं और नौलों धारों के संरक्षण पर कार्य कर रहे हैं।

              पीएसआई की टीम के साथ अनिरुद्ध

उन्होंने अपने 'जीवन मांगल्य ट्रस्ट' को पीएसआई (पीपुल्स साइंस इंस्टीट्यूट) का साथ दिया। इसमें वह निगराड़ के आसपास के गांवों में नौलों को पुनर्जीवित करने का कार्य कर रहे हैं।

इसके लिए अनिरुद्ध जन के साथ अपनी भागीदारी के अद्भुत सामंजस्य का इस्तेमाल करते हैं।
गांधीवादी अनिरुद्ध के विचारों में वह शक्ति है जिससे जन उनसे स्वतः ही जुड़ने को मजबूर हो जाता है ।
वह साबित करते हैं कि आज भी गांधी के विचारों में वह शक्ति है जिससे जन उन विचारों को अपना लेता है।


   मौना गांव में ग्राम प्रधान के घर ग्रामीणों को नौलों के    पुनर्जीवित करने के लिए प्रोत्साहित करते अनिरुद्ध।




अनिरुद्ध का सपना उत्तराखण्ड में हुनर स्कूल खोलने का है जिसमें स्किल सीख उत्तराखण्ड के छात्र भविष्य में पलायन नही करेंगे। इसके साथ ही वह उत्तराखण्ड के युवाओं में देश के प्रति समर्पण को देखते हुए एक रक्षा यूनिवर्सिटी भी खोलना चाहते हैं जिसमें युवाओं को सेना में भर्ती होने की ट्रेनिंग दी जाएगी।

गुजरात का होकर वहां से सैंकड़ो किलोमीटर दूर उत्तराखण्ड को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले अनिरुद्ध में आप गांधीजी, विनोबा भावे, रामकृष्ण परमहंस और विमला ठाकर की छवि देख सकते हैं यह आप उनके पास थोड़ी देर बैठकर खुद ही  पहचान लेंगे। 

'अवनी' के पिरूल प्लांट पर ट्रेनिंग के लिए आए युवाओं को बिना शर्त अपने कमरे में रहने की इजाजत देना हो या मेरे लिए दिन का भोजन तैयार करना और शाम को विदाई पर नाशपाती के फल उपहार स्वरूप देना। यह सब उनके अद्भुत व्यक्ति होने का छोटा सा प्रमाण है।

हिमांशु जोशी, उत्तराखंड।
मोबाइल- 9720897941

Sunday, May 23, 2021

उत्तराखंड में कोरोना के ताजा हालात।

पहाड़ी प्रदेश उत्तराखंड में कोरोना की दूसरी लहर के दौरान बहुत सी जाने गई और मई के पहले हफ़्ते में सबसे बुरी स्थिति थी। 

                       फ़ोटो साभार गूगल

आंकड़ों पर नज़र डालें तो 7 मई 2021 को उत्तराखंड में एक दिन में सर्वाधिक 9,642 कोरोना संक्रमित सामने आए थे और कोरोना से जान गंवाने वाले मरीज़ों की संख्या के मामले में 17 मई 2021 को सबसे अधिक 223 मरीज़ों ने दम तोड़ा।

                        फ़ोटो साभार गूगल

इसी बीच प्रदेश में ब्लैक फंगस यानी म्यूकरमाइकोसिस भी अपने पैर जमाने लगा है। अमर उजाला में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में इसके मरीजों का आंकड़ा सौ के पार हो गया है जबकि नौ मरीजों की ब्लैक फंगज़ से मौत हो चुकी है।

प्रदेश की इन्हीं हालातों को देखते हुए उत्तराखंड में कोरोना मरीज़ों को दिए जा रहे चिकित्सा हालातों पर चर्चा करने के लिए भारत के वरिष्ठ पत्रकार राम दत्त त्रिपाठी ने हेमवतीनंदन बहुगुणा उत्तराखंड मेडिकल एजुकेशन यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रोफेसर हेम चन्द्र से बातचीत की।

प्रोफेसर के अनुसार पूरे देशभर में कोरोना के मामलों में बढ़ोतरी हुई है। एक दिन में दस हज़ार कोरोना मरीज़ों के सामने आने के बाद अब धीरे-धीरे मामले कम हो रहे हैं।
हाल ही में प्रदेश के रिमोट एरिया जैसे पौड़ी, नैनीताल जिलों में भी बहुत से कोरोना पॉजिटिव सामने आए।

प्रदेश के अंदर कहीं भी आने-जाने में कोई रुकावट नही थी और कोरोना वायरस में हो रहे बदलाव की वज़ह से प्रदेश में संक्रमितों की संख्या बढ़ी।
अब लॉकडाउन की वज़ह से केस कम हुए हैं।

प्रोफेसर हेम कहते हैं कि लोग अब मास्क का प्रयोग तो करने लगे हैं पर सोशल डिस्टेंस के प्रति जागरूक नही हैं।

राम दत्त त्रिपाठी के प्रदेश में वैक्सीन की स्थिति के प्रश्न पर प्रोफेसर कहते हैं कि वैक्सीन की दूसरी डोज़ बहुतों को लग गई है।
18-44 वर्ष वालों के रजिस्ट्रेशन बहुत हुए हैं, प्रदेश में वैक्सीन की ज्यादा समस्या नही है।

ऑक्सीजन पर बात करते हुए प्रोफेसर कहते हैं कि ऑक्सीजन के कोटे की बीच में समस्या थी पर अब आइसीयू बेड की मांग कम हो रही है। 
पिछले हफ्ते 540 तक आइसीयू बेड इस्तेमाल हुए थे जो अब 488 हैं।

तीसरी लहर में बच्चों के ज्यादा संक्रमित होने के अनुमान पर प्रोफेसर कहते हैं कि इस लहर युवा मरीज़ों की संख्या अधिक है, आने वाले दिनों में बच्चे अधिक संक्रमित न हों इसकी तैयारी चल रही है।

राम दत्त त्रिपाठी द्वारा कोरोना के इलाज में दवाईयों के इस्तेमाल पर हो रहे भ्रम पर प्रोफेसर कहते हैं कि हम स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग के मानकों के अनुसार दवाई दे रहे हैं।

वह कहते हैं कि 85% पॉजिटिव मरीज़ों में कोई लक्षण नही हैं और वह सिर्फ कोरोना वायरस के वाहक का काम करते हैं।
कम लक्षण वाले मरीज़ों को घर में आइसोलेट किया जा रहा है या उन्हें कोविड केयर सेंटर में भेजा जा रहा है।
ज्यादा गम्भीर रोगियों का इलाज जिला स्तर के अस्पतालों में किया जा रहा है।
मरीज़ों के घर पर ही दवाइयों का एक पैकेट दिया जा रहा है जिसमें छह गोली आइवरमेकटीन , एज़ीथ्रोमाइसीन, डॉक्सी, विटामिन, थर्मामीटर, मास्क, सेनेटाइजर और प्लस ऑक्सोमीटर की रहती हैं।
ज्यादा तबीयत बिगड़ने पर रेमेडिसिवर इंजेक्शन लगाया जा रहा है।
सरकार ने रेमेडिसिवर की कालाबाज़ारी रोकने के लिए इसका नियंत्रण अपने हाथों में लिया है। डॉक्टर की पर्ची पर ही यह दी जा रही है।
सरकार ने आईसीयू के 650-700 बेड बना लिए हैं और ऑक्सीजन बेड इससे भी ज्यादा हैं।

प्रोफेसर कहते हैं कि सरकार ने कोरोना की चैन तोड़ने के लिए आइवरमेकटीन 12 एमजी की गोली पूरी जनता के बीच बांटने का निर्णय लिया है।
15 वर्ष से ऊपर के सभी लोगों को आइवरमेकटीन की एक गोली तीन दिन तक सुबह शाम खानी होगी।
10-15 वर्ष के बच्चों को यही गोली तीन दिन तक रात में खाना खाने के बाद एक बार लेनी होगी।
इससे कम आयु के बच्चों को और गर्भवती महिलाओं को यह गोली अभी नही दी जाएगी।
आइवरमेकटीन लगभग सत्तर लाख लोगों के बीच बांटी जानी है। 
इससे एक हफ़्ते बाद कोरोना की यह चैन टूट जाएगी, साथ ही वैक्सिनेशन भी जारी रहेगा।

राम दत्त त्रिपाठी के इस सवाल पर की उत्तर प्रदेश में आइवरमेकटीन दिन में तीन बार के लिए दी जा रही है और उत्तराखंड में दो बार क्यों!
इस सवाल पर प्रोफेसर हेम चन्द्र कहते हैं कि जिन जिलों में 40 प्रतिशत पॉजिटिविटी बढ़ी है वहां दवाई बांटने के लिए डोर टू डोर कॉन्टेक्ट चल रहा है। यह दवाई शरीर में किसी भी प्रकार का नुकसान नही करेगी।

राम दत्त त्रिपाठी पूछते हैं कि चाइना ने कोरोना के खिलाफ जंग में अपनी पारम्परिक दवाइयों का इस्तेमाल किया है, भारत में भी केरल और तमिलनाडु में यह देखा गया। उत्तराखंड में इस प्रकार की कोई योजना है?

इसका जवाब देते हुए प्रोफेसर कहते हैं कि केस ज्यादा आने की वज़ह से हम उन्हें ही संभाल रहे थे और अभी तक उत्तराखंड सरकार ने इन सब पर कोई क्लीनिकल ट्रायल नही किया है।
अब इस पर बात की जा रही है, हर्बल और आयुर्वेद से बच्चों की इम्युनिटी बढ़ाने की कोशिश की जाएगी।

ब्लैक फंगज़ के बढ़ते मामलों पर प्रोफेसर कहते हैं कि ब्लैक फंगज़ हमारे बीच पहले से मौजूद है। यह छूने से नही फैलता, जब कोई मरीज़ डायबेटिक हो या उसकी इम्युनिटी कम हो तब यह शरीर पर हमला करता है।
कुछ मामलों में गम्भीर कोरोना मरीज़ पर स्टेरॉइड का इस्तेमाल करने से भी ब्लैक फंगज़ को शरीर पर हमला करने का मौका मिल जाता है।
ब्लैक फंगज़ से बचाव के लिए स्वच्छता पर भी विशेष ध्यान दिए जाने की जरूरत है। जैसे ऑक्सीजन फ्लोमीटर को दुबारा इस्तेमाल करने से पहले नियमानुसार साफ किया जाना चाहिए और मास्क भी समय-समय पर धोना चाहिए।
इनकी सफाई न होने पर स्वस्थ शरीर पर तो ज्यादा फ़र्क नही पड़ता पर कोविड मरीज़ के ब्लैक फंगज़ जैसी बीमारियों से घिरने की आशंका बनी रहती है।

वरिष्ठ पत्रकार राम दत्त त्रिपाठी द्वारा यूट्यूब पर लिए गए इस साक्षात्कार को लिखित रूप हिमांशु जोशी द्वारा दिया गया है।

https://youtu.be/P584yRSSwSc

Saturday, May 22, 2021

अद्वैत : स्मृति राज और सिद्धार्थ मस्केरी की कहानी।

पैसे के पीछे हमने अंधी दौड़ लगाई है। कोरोना जैसी महामारी आई और इंसान के सारे सपने, सारी योजनाएं ध्वस्त करते गई। हमने इस धरती में जन्म लेने के बाद से अपना समय सिर्फ दुनिया को समझने में ही ज़ाया कर दिया। कभी गणित तो कभी विज्ञान, कभी पढ़ाई तो कभी नौकरी। शायद ही हमने इस छोटी सी जिंदगी में खुद को कभी खोजना चाहा होगा और शायद ही हमने कभी अपने जन्म लेने की वास्तविक वज़ह को जानने की कोशिश करी हो।

स्मृति , सिद्धार्थ और अद्वैत की Soulify.org.in सिर्फ़ खुद को खोजने वाली वाली वेबसाइट नही है, यह कहानी है ऐसे परिवार की जिसने दुनिया की घिसी पिटी रीत से हटकर अपना अलग रास्ता चुना।

                           Soulify दम्पति

स्मृति राज का जन्म पटना निवासी जयंत प्रसाद साह और कंचन माला के घर में हुआ। पेशे से इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर जयंत प्रसाद ने अपनी बेटी को बचपन से ही कॉन्वेंट स्कूल में शिक्षा दी जिसकी वजह से स्मृति ने बचपन से ही बड़े सपने देखने शुरू कर दिए थे। यही सपने बड़े होने पर उन्हें मुंबई खींच कर ले गए।

वहीं सिद्धार्थ मस्केरी का जन्म मुंबई में ही हुआ था और उनके पिता प्रमोद मस्केरी बैंक ऑफ इंडिया में और माता शर्दिनी 'किंग एडवर्ड मेमोरियल हॉस्पिटल एल्फिंस्टोन, मुंबई' की एक पुरस्कार विजेता नर्स थी। सिद्धार्थ का बचपन अपने पिता की नौकरी की वजह से लंदन और हांगकांग जैसे शहरों में गुजरा फिर वापस उनका परिवार मुंबई आ गया।

सिद्धार्थ को शुरू से ही कहानी लिखना पसन्द था पर उनके माता-पिता को यह पसन्द नही था इसलिए सिद्धार्थ ने पढ़ाई के लिए माइक्रोबायोलॉजी को चुना पर वह खुद ही एनिमेशन सीखने लगे और उसे पढ़ाते भी थे।
स्मृति ने भी ग्राफिक डिजाइन की पढ़ाई के लिए मुंबई स्थित सी-डैक को चुना।

        सी-डैक मुुंबई (फ़ोटो साभार सी-डैक वेबसाइट)

इस बीच ही सिद्धार्थ और स्मृति की एक पारस्परिक मित्र ने स्मृति का परिचय सिद्धार्थ से कराया ताकि खुद से एनिमेशन सीख और पढ़ा रहे सिद्धार्थ से स्मृति कुछ नया सीख सके।

इस बीच सिद्धार्थ सी-डैक में पढ़ाने लगे और स्मृति वेब डिजाइनिंग का काम करने लगी।
स्मृति और सिद्धार्थ उत्साही स्वभाव के थे और हमेशा ही कुछ नया करना चाहते थे। किसी जगह नौकरी के बजाए इन दोनों को उद्यमिता पर ज्यादा भरोसा था। अपनी इसी समानता की वज़ह से दोनो करीब आते गए और लिव इन रिलेशनशिप में रहने लगे।

स्मृति के घरवाले इस रिश्ते के खिलाफ नही थे पर सिद्धार्थ के घर में उस समय मुंबई में मीडिया द्वारा बिहारियों को लेकर बनाई गई नकारात्मक छवि की वजह से इस रिश्ते को लेकर डर था। साल 2002 में अपनी माँ की मृत्यु के बाद 2003 में सिद्धार्थ दिवाली के दौरान जनरल टिकट पर स्मृति के घरवालों से मिलने मुंबई से बिहार पहुंचे थे।


         विश्व समाजिक मंच मुंबई 2004- फ़ोटो साभार                                   yachana.org

स्मृति हमेशा से यह सोचती थी कि हम उपभोगवादी समाज में रहते हैं और हमेशा अपना फायदा-नुकसान देखते रहते हैं। समाज में महंगे ब्रांडेड कपड़े पहनना, अच्छा खाना खाते दूसरे को दिखाना, हम सब समाज में प्रतिष्ठा पाने के लिए यह कार्य क्यों करते हैं। कभी-कभी उन्हें लगता था कि वह गलत हैं और समाज सही है।
विश्व सामाजिक मंच में जाकर उन्हें लगा कि वह सही हैं और उनकी सोच की तरह सोचने वाले दुनिया में और लोग भी हैं।
वहां उनकी मुलाकात मंजुल भारद्वाज से हुई। “थिएटर ऑफ रेलेवेंस” नाट्य सिद्धांत के सर्जक व प्रयोगकर्त्ता मंजुल भारद्वाज वह थिएटर शख्सियत हैं, जो राष्ट्रीय चुनौतियों को न सिर्फ स्वीकार करते हैं, बल्कि अपने रंग विचार “थिएटर आफ रेलेवेंस” के माध्यम से वह राष्ट्रीय एजेंडा भी तय करते हैं। स्मृति ने वहां मंजुल के चाइल्ड थियेटर वर्कशॉप को देखा, यह उनके लिए कुछ नया सीखने और खुद को खोजने का अवसर था।

स्मृति सोचती थी कि हम जो शिक्षा अपने बच्चों को दे रहे हैं उसमें व्यक्तित्व निर्माण की जगह कहां है। 

हमारे बच्चे ऐसे बच्चों के साथ क्यों बड़े नही होते जो आम बच्चों से अलग हैं। क्यों ऐसे बच्चे जो चल नही सकते , देख नही सकते उन्हें और आम बच्चों को बचपन से ही अलग- अलग रखा जाता है, उन्हें समाज क्यों छुपाने की कोशिश करता है।

स्मृति ने कमाठीपुरा में नाटक का मंचन किया जहां एड्स जैसी गम्भीर बीमारी से ग्रस्त बच्चे रहते हैं। उन्होंने 'पॉपुलेशन फर्स्ट' नाम की संस्था द्वारा कन्या भ्रूण हत्या पर चलाई जा रही मुहिम के अंतर्गत मुंबई के मशहुर 'टाटा थियेटर' पर नाटक का मंचन किया।
जैसे गांधी जी ने राजा हरिश्चंद्र का नाटक देख कर सत्य और अहिंसा पर चलने की प्रेरणा ली थी, ठीक वैसे ही स्मृति भी अपने नाटकों के माध्यम से अपने दिखावे के मुखोटे उतार लोगों को प्रेरणा देना चाहती थी।

यह नाटक का काम चल तो रहा था पर इससे आजीविका नही होती थी और घरवालों के दबाब में फिर स्मृति ने एडवरटाइजिंग, पब्लिकेशन का काम किया और मुंबई की तेज़ रफ़्तार जिंदगी में खो गई।

धीरे- धीरे उन्हें यह महसूस होने लगा कि वह फिर मुखोटे में जीने लगी हैं और खुद से ज्यादा झूठ नही बोल सकती।

इस बीच सिद्धार्थ कला से जुड़े बहुत से प्रतिष्ठित संस्थानों में काम कर रहे थे। वह बॉलीवुड के मशहूर फ़िल्म निर्माता और निर्देशक सुभाष घई के विश्व प्रसिद्ध फ़िल्म संस्थान 'व्हिस्टलिंग वुड्स इंटरनेशनल' में पढ़ाते थे। उन्होंने मुंबई के ऐतिहासिक फ़ेमस स्टूडियो और वैभव स्टूडियो के साथ भी काम किया।
 वह बॉलीवुड फ़िल्म 'तारे ज़मीन पर' और 'मस्ती एक्सप्रेस' के साथ जुड़े थे।
 
सिद्धार्थ को पटना स्थित बिहार संग्रहालय बनाने वाली टीम में भी जगह मिली।  यह संग्रहालय पूरी दुनिया में भारतीय कला के सबसे समृद्ध संग्रह में से एक के विश्व स्तरीय प्रदर्शन का अनुभव करने के लिए एक जगह है।

स्मृति की तरह ही अच्छी जगह काम करने और ऊंचा वेतन पाने के बाद भी सिद्धार्थ अपनी नौकरियों से संतुष्ट नही थे क्योंकि उनका सपना अपनी कहानी पर काम करने का था।

दिसम्बर 2006 में स्मृति की नानी के मंत्रों के बीच दोनों की कोर्ट में शादी हुई और सिद्धार्थ के पिता की जिद पर बाद में मुंबई में ही शादी का रिसेप्शन दिया गया।


                        स्मृति और अद्वैत

6 अगस्त 2009 में स्मृति और सिद्धार्थ के पुत्र अद्वैत का जन्म हुआ। यहां से यह दम्पति सोचने लगा कि उन्हें अपने बेटे की छवि एक लड़के और लड़की से दूर एक इंसान के रूप में बनानी है। उन दोनों में अब राजनीतिक और सामाजिक सोच की जगह आध्यात्मिक सोच बढ़ने लगी।

मस्केरी दम्पत्ति ने अद्वैत को 'वाल्डोर्फ प्रणाली' की शिक्षा प्रदान करने का निर्णय लिया। यहां पर स्मृति का थिएटर वाला अनुभव काम कर रहा था। उन्हें यह लगता था कि जब बच्चा बड़ा होने लगता है तो हम उसे जबर्दस्ती पेन पकड़ा देते हैं और हम उसके विकास के अनुक्रम को जबर्दस्ती प्रभावित करने लगते हैं।
वाल्डोर्फ प्रणाली के जनक रुडोल्फ स्टीनर का मानना ​​था कि बच्चों के विकास में कुत्रिम रूप से तेजी लाने की आवश्यकता नही है, बच्चे को नया कौशल सीखने के लिए समय चाहिए।
 
अद्वैत ने मुंबई के प्रतिष्ठित इनोदय और कैम्ब्रिज स्कूलों में अपनी शिक्षा ग्रहण की पर इस बीच उसका स्वास्थ्य भी ख़राब रहने लगा। मस्केरी दम्पत्ति को यह लगने लगा था कि हर स्कूली संस्थान का उद्देश्य मुनाफ़ा कमाना ही होता है। 
स्कूलों से यह बोला जाता कि आपका बच्चा पिछड़ रहा है पर वह अद्वैत को स्कूलों के मानदंडों पर नही तोलते थे। वह इस बात को लेकर जागरूक थे कि अद्वैत की समझ घर में ही शिक्षा देने पर कितनी विकसित हो रही है। वह अद्वैत की किसी भी इच्छा को दबाते नही थे, वह चाहता तो कमीज़ के बटन लगाता था, बर्तन धोता था, कपड़े समेटता, सब्जी काटता और छह साल का होते किचन के सारे काम करने लगा था। मस्केरी दम्पत्ति अद्वैत पर प्रयोग करते हुए उसे खुद को खोजने का अवसर दे रहे थे।
मस्केरी दम्पत्ति अद्वैत को किसी स्कूल में न भेजकर घर पर ही पढ़ाना चाहते थे पर अपने परिवारों के दबाव की वज़ह से ऐसा नही कर पाते थे।

साल 2017 में मस्केरी दम्पत्ति दिल्ली के साकेत स्थित एक पॉश इलाके में शिफ्ट हो गए। सिद्धार्थ दिल्ली में बैंडिट क्वीन, मकबूल जैसी मशहूर फिल्मों के निर्देशक बॉबी बेदी के गुरुद्वारे से जुड़े एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे।

यह समय मस्केरी दम्पत्ति के जीवन का सबसे बुरा समय था। उनको लगने लगा था कि वह एक मशीन की तरह जीवन जी रहे हैं, अद्वैत का काम करने एक बाई घर आती थी जो उसे सुबह स्कूल भेजती और फिर वह वापस लौटने पर गृहकार्य में ही व्यस्त रहता। वह दोनों सुबह ही अपने काम पर निकल जाते थे। दिन भर एक दूसरे से दूर रह उनके बीच परिवार जैसा कुछ नही था।
 इस वजह से उन्हें एक घुटन सी महसूस होने लगी थी और उनके वैवाहिक जीवन में भी तनाव आने लगा था। 

यह पूरी प्रक्रिया वर्तमान में हर परिवार के साथ होती है, हर दम्पत्ति का अब मशीनी जीवन हो गया है जहां भावनाओं के लिए कोई जगह नही रह जाती पर मस्केरी दम्पत्ति ने इसे समझा और वह उस चक्र से अलग हटना चाहते थे जहां पूरी दुनिया जीने लगी है, जिसमें पैदा होना, पढ़ना, डिग्री लेना, बच्चे पैदा करना ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। उन्होंने निर्णय लिया कि वह इस चक्र को तोड़ेंगे।

मस्केरी दम्पत्ति ने इसके लिए एक प्रयोग किया और अपने घर के एक कमरे को समुदाय के लिए खोल दिया। वह कमरा उन्होंने एक मंच के रूप में ऐसे लोगों के लिए खोल दिया जो अपना हुनर दूसरों के साथ बांटना चाहते थे। ऐसे लोगों में रचनात्मक प्रकार के लोग होते थे जिसमें बड़े और बूढ़े सब समान थे क्योंकि सीखने की कोई उम्र नही होती।

मस्केरी दम्पति के दिल्ली स्थित घर में Soulify की कार्यशाला

जैसे हम अपने कमरे को किराए पर देने के लिए ओएलएक्स जैसी वेबसाइट का प्रयोग करते हैं वैसे ही मस्केरी दम्पति ने अपना कमरा निःस्वार्थ भाव से जरूरतमन्दों की मदद के लिए बनाए गए एक फेसबुक पेज दरिया दिल की दुकान पर साझा किया था।

अब उनके इस कमरे पर नए नए प्रयोग होने लगे थे। वहां डॉक्टर, इंजीनियर, बैंकिंग, लेखन हर क्षेत्र से जुड़े लोग अपने अनुभव साझा करने आने लगे।

बॉबी बेदी के गुरुद्वारे वाले प्रोजेक्ट पर काम करते हुए सिद्धार्थ ने गुरुनानक देव जी के बारे में समझा कि उन्होंने घूम-घूम कर कैसे ज्ञान अर्जित किया और उस ज्ञान को वह कैसे लोगों के बीच बांटते चले गए।

 मस्केरी दम्पति को अब खुद को समझने का मौका मिला कि उनकी भाषा कितनी मशीनी हो गई है वह सिर्फ अपने काम में इस्तेमाल होने वाली भाषा बोलते हैं जिसमें न दिल को छूने वाली गर्माहट होती है और न ही रिश्तों को बांधने वाली कोई डोर। 

उन्हें दुनिया की सच्चाई को समझने का मौका मिला कि हम सब उपभोगता वाद के पीछे अंधे होकर भाग रहे हैं। जो जितना ज्यादा पैसा, बड़ा घर, महंगे सामान जोड़ेगा समाज और उसके खुद के परिवार में उसकी उतनी ही अधिक इज्ज़त होगी।

सिद्धार्थ ने पच्चीस सौ रुपए महीने से कमाना शुरू किया और उस समय वह डेढ़ लाख रुपए महीना कमा रहे थे पर लोन, घर के खर्चे पर सारा कमाया चला जाता था, उन्हें ऐसा लगता था कि वह शीशम के बेड पर लेटे तो हैं पर वहां उन्हें नींद नही है।

अपनी पहली कार्यशाला के लिए अहमदाबाद निकलता मस्केरी परिवार

अब उन्होंने निर्णय लिया कि वह अब अपने दिल की सुनेंगे और यहीं से Soulify.org.in की नींव पड़ी।

मंजुल भारद्वाज ने साल 1992 में  द एक्सपेरिमेंटल थियेटर फाउंडेशन की स्थापना की थी जो थिएटर आफ रेलेवेंस के सिद्धांत पर आधारित है।
उसके 25 साल पूरे होने पर स्मृति ने अपने जन्मदिन 17 मई 2017 पर, दिल्ली के मुक्तधारा और 'अलायन्स फ्रांसौयज़' सभागृह में 'थियटर आफ रेलेवंस नाट्य उत्सव' के अंतर्गत तीन नाटकों के मंचन के आयोजन का निर्णय लिया। 
अनहद नाद- अनहर्रड साउंड्स आफ यूनिवर्स, गर्भ, न्याय के भंवर में भंवरी।
 इन तीनों नाटकों के रचयिता मंजुल भारद्वाज हैं।

इसके साथ ही मस्केरी दम्पत्ति ने 'क्रिएटर एन्विज़निंग फॉर्म' का आयोजन भी किया जहां जीवन में कुछ अलग करने की चाह रखने वाले लोग भी आएं, उसमें राजनीतिक, कला, लेखन जैसे किसी भी क्षेत्र के लोग शामिल हो सकते थे। 
इसी आयोजन के बीच सिद्धार्थ की मंजुल भारद्वाज से पुनः मुलाकात हुई।

मंजुल ने सिद्धार्थ से पूछा कि तुम्हारे जीवन जीने की दृष्टि क्या है?
सिद्धार्थ बोले कि मैंने अपनी मां को वादा किया था कि वह ऑस्कर जीतेंगे और वही उनके जीवन की सबसे बड़ी सफलता होगी।
मंजुल ने सिद्धार्थ को बताया कि आप एक लक्ष्य लेकर चल रहे हैं पर आपकी जीवन दृष्टि तो है ही नही।

26 सितम्बर 2017 को मंजुल की यह बात सुनकर सिद्धार्थ अंदर तक हिल गए और उन्हें रात भर नींद नही आई।
सुबह उठते ही उन्होंने मंजुल से कहा कि वह लोगों को कहानियां सुनकर और सुनाकर खुशियां बांटना चाहते हैं और यही उनके जीवन का दर्शन है।
मंजुल ने सिद्धार्थ से बोला कि तुमने यह सन्तों वाली बात कही है।

किस्मत सिद्धार्थ के लिए आगे के रास्ते खोल रही थी। अगले दिन उनके ऑफिस पहुंचते ही बॉबी बेदी ने उनसे कहा कि गुरुद्वारे पर फ़िल्म वाले प्रोजेक्ट के फंड रुक गए हैं और हमें यह काम रोकना होगा।
सिद्धार्थ ने ऑफिस से नीचे आकर स्मृति को फोन किया और बोला कि हमारे मन की बात हो गई है। बह्मांड हमसे जो चाहता है वह हो रहा है। ऊपर वाले ने पेड़ की डाल काट कर बोला है उड़ो और वापस इस घोसले में कभी मत आना और न ही किसी दूसरे पेड़ पर जाना।

वापस ऑफिस जाकर सिद्धार्थ ने बॉबी को धन्यवाद ईमेल लिखा। उन्होंने लिखा कि बॉबी आपने मेरे लिए जो भी किया वह मेरे पिताजी ने भी कभी मेरे लिए नही किया, उन्होंने मुझे हमेशा बचाया ही पर आपने मुझ पर विश्वास किया कि मैं उड़ सकता हूं। ऊपरवाले ने आपको मेरी उड़ान के लिए एक ज़रिया बनने के लिए चुना है। इन सब के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

दिल की आवाज़ सुनने पर हमारे आगे के रास्ते खुद ही खुलने लगते हैं वैसे ही सिद्धार्थ के साथ हुआ। प्रोजेक्ट छोड़ते ही उन्हें अपने प्रोजेक्ट्स के लिए पार्टनर मिल गए जो उनके एनिमेशन को डेवलप कर आगे बेचने के लिए तैयार थे। एक एजुकेशन कम्पनी ने उन्हें हफ़्ते में तीन दिन अपने स्टूडियो में क्रिएटिव डायरेक्शन और ट्रेनिंग देने के लिए अस्सी हज़ार रुपए ऑफर किए।

    नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ डिज़ाइन अहमदाबाद के                           छात्र और सिद्धार्थ

नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ डिज़ाइन अहमदाबाद ने अपने छात्रों को थ्री डी एनिमेशन के ज़रिए कहानी सुनाने के लिए सिद्धार्थ को अहमदाबाद बुलाया। मस्केरी परिवार जनवरी 2018 को अपनी कार में Soulify का बैनर लगा कर दिल्ली से अहमदाबाद चल दिया।
सिद्धार्थ के नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ डिज़ाइन अहमदाबाद के सफ़र पर  एक किताब 'आई एम पॉसिबल' भी छपी है।


इस यात्रा के बाद वह लोग दिल्ली में अपने घर पर हर रविवार Soulify- Creators connect नाम से कहानी सुनने सुनाने का एक सत्र रखने लगे।

इसके बाद Soulify परिवार ने पूरी धरती को ही अपना घर मानते हुए पूरी दुनिया में अपनी कहानी सुनने सुनाने और खुशियां बांटने का निर्णय लिया।

soulify.org.in के द्वारा यह परिवार कहानी कहने के माध्यम से लोगों को उनके अपने दिल की आवाज़ तक पहुंचाते हैं। 
इसमें वह 'थिएटर आफ रेलेवंस' की प्रकिया द्वारा लोगों के मुखोटे को उतार जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। यह वही मुखोटा होता है जो उन्होंने समाज के सामने खुद को भुलने के बाद लगाया होता है।
इस प्रक्रिया में सहभागी खुद के सृजनात्मक, रचनात्मक और कलात्मक अभिव्यक्तियों द्वारा अपने आयामों को गढ़ने की दृष्टि निर्माण करते हैं।
जैसे जो लोग सालों से शारीरिक जड़ता में हैं , स्वाभाविक है कि वह मानसिक और भावनात्मक तनाव से जूझ रहे हों। उन्हें नाट्यशाला द्वारा अपनी जड़ता को आत्मचेतना की ओर बढ़ने की संभावनाओं से मुलाकात करवाई जाती है।
सहभागी नाचना, गाना, लिखना, नाटक का मंचन करने के आनंद में बखूबी खुद को निखारते हैं। नाटक का मुख्य उद्देश्य रूढ़िवादिता तोड़ जीवन को खुल कर जीना होता है।

प्रकृति से हमारे रिश्तों के बारे में बात की जाती है जैसे प्रकृति में सब बराबर हैं और उससे छेड़छाड़ करने का परिणाम हम सब भुगतेंगे।
स्मृति नाटकों के माध्यम से मनुष्य के व्यवहार में परिवर्तन लाने के साथ उनके दिलों की दबी आवाज़ को बाहर निकालती हैं।
सिद्धार्थ अपने फ़िल्म लेखन के अनुभवों का प्रयोग करते हैं। वह लोगों को यह बताते हैं कि कहानी कैसे लिखी जाती है। उनका मानना है कि हर किसी में कोई न कोई गुण अवश्य होते हैं जो वह किसी और के साथ बांट सकता है।

कहानी लिखने के तरीके को समझाने के लिए सिद्धार्थ ने 'कहानी के सात रंग' नाम से एक टूल बनाया है।
जिसके अनुसार कहानी वह होती है जो लोगों को प्रभावित करे, यह कोई घटना हो सकती है जो लिखने वाले का अपना अनुभव होगा। लोग कहानी के पात्रों से प्रभावित होंगे जिसकी अपनी सीमाएं भी होंगी।  कहानी में उतार चढ़ाव होने चाहिए।
कहानी का नायक जब कोई सपना देखता है तभी कहानी बननी शुरू होती है।
हम हमेशा कहानी के खलनायक से नफ़रत करते हैं और खुद को एक पीड़ित के रूप में देखते हैं जबकि हमें उस खलनायक को धन्यवाद कहना चाहिए कि उसकी वज़ह से हमने खुद को समझा और मज़बूत किया। 
हम भी किसी की कहानी में खलनायक हो सकते हैं जो कहीं न कहीं उसका रास्ता रोक रहे होते हैं।

यह प्रक्रिया खलनायकों के प्रति प्रतिभागियों के दिल में करुणा की भावना पैदा करती है।

'कहानी के सात रंग' मुख्य रूप से हमारा जीवन जीने का तरीका ही है। नायक की कहानी उसके वातावरण और उसको मिलने वाले सहयोग के अनुसार अलग-अलग हो जाती हैं। अगर हम अपने जीवन के सभी रंगों को समझ लें तो खुद को भी समझ जाएंगे।

अद्वैत भी soulify.org.in में अहम भूमिका निभाते हैं। मस्केरी दम्पत्ति के इस सफर में जब कुछ बातें जटिल हो जाती हैं तो अद्वैत के पास उनका सीधा और सरल रास्ता होता है। अद्वैत की रुचि एरोनॉटिक्स में है जिसके लिए उन्होंने मात्र ग्यारह वर्ष की उम्र में 'एम्बरी रिडल एरोनॉटिकल यूनिवर्सिटी अमरीका' से ऑनलाइन कोर्स भी कर लिया है।

Soulify परिवार की यह यात्रा गांधी जी की किताब 'एक्सपेरिमेंट विद ट्रुथ' से बहुत अधिक प्रभावित है जिसमें वह गांधी जी की तरह ही आत्म-जागरूकता विकसित करने के लिए प्रयोग करते जा रहे हैं।

अपने इस सफ़र में मस्केरी दम्पति ने अब तक बहुत कुछ सीखा और सिखाया है।

                    रामगढ़ में कार्यशाला

उन्होंने अरबिंदो आश्रम स्कूल, नई दिल्ली में बच्चों के साथ वोकेशनल ट्रेनिंग में थिएटर का आयोजन किया।

 उत्तराखंड स्थित रामगढ़ के एक विद्यालय में अपनी कार्यशाला आयोजित करने के बाद सिद्धार्थ ने उस पर 'हमारा रामगढ़' नाम से एक किताब भी लिखी है।



उन्होंने मेघालय स्थित 'बेथानी सोसाइटी' में अपने मिशन को साझा किया और तिरना गांव में कार्यशाला आयोजित की। बेथानी सोसाइटी शिक्षा और पर्यावरण के अनुकूल आजीविका के माध्यम से दिव्यांगों के लिए अवसर पैदा करती है।

Soulify परिवार अपनी इस यात्रा के दौरान 'पीपल्स एक्शन ग्रुप फ़ॉर इंक्लूशन एंड राइट्स' पागीर से भी मिला। पागीर लद्दाख में दिव्यांग जनों के अधिकारों की वकालत करता है।

लद्दाख में ही Soulify परिवार की मुलाकात सोनम वांगचुक से हुई। सोनम एक इंजीनियर, अन्वेषक और शिक्षा सुधारक हैं, वह साल 1988 में बने स्टूडेंट्स एजुकेशनल एन्ड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (सेकमोल) के संस्थापक निदेशक भी हैं। सेकमोल की स्थापना लद्दाख के शिक्षा तंत्र में सुधार लाने के लिए की गई थी। सेकमोल में भी Soulify की कथाकारिता पर कार्यशाला का आयोजन हुआ।

सेकमोल से ही निकले स्टांज़िन दोरज़ाई से मिलकर भी मस्केरी परिवार को काफ़ी कुछ सीखने और समझने का मौका मिला।
स्टांज़िन अपनी वृतचित्र 'द शिफ़र्ड्स ऑफ द ग्लेशियर' के लिए कई राष्ट्रीय,अंतरराष्ट्रीय अवॉर्ड जीत चुके हैं

लेह की जेल में भी Soulify ने कैदियों के साथ एक कार्यशाला का आयोजन किया था।

               लेह जेल में मस्केरी दम्पति

वह अपने आप में अनोखी राजस्थान की मशहूर 'स्वराज यूनिवर्सिटी' भी गए, यह यूनिवर्सिटी आत्म निर्देशन में सीखने पर ज़ोर देती है।
वहां उन्होंने अपनी कार्यशाला का आयोजन किया।

इस यात्रा की शुरुआत करने के लिए मस्केरी परिवार ने अपनी आर्थिक जरूरतों को कम किया। पुणे का अपना एक फ़्लैट बेच अस्सी प्रतिशत लोन खत्म किया और दूसरे फ़्लैट के दस हज़ार किराए से उनका काम चल जाता है। उनके हर पड़ाव पर कोई अगर उनके रहने, खाने और गाड़ी के तेल का ख़र्च देना चाहता है तो वह खुशी से उसे रख लेते हैं।

देश के अलग-अलग कोनों पर जाने पर इस परिवार को हर जगह अलग मौसम भी मिलता है जिसकी वजह से इनका स्वास्थ्य भी खराब रहता था पर अब वह बदलते मौसम की आदत और अपने खान-पान में सुखद बदलाव ला रहे हैं।

            देहरादून में Soulify परिवार

 soulify.org.in के इस सफर में मैं इस दम्पत्ति से देहरादून में मिला ।
कोरोना की इस दूसरी लहर में यह परिवार जयप्रकाश नारायण के सहयोगी और सर्वोदय के अध्यक्ष रहे वरिष्ठ गांधीवादी अमरनाथ भाई के साथ हिमाचल प्रदेश के पालमपुर नगर में हैं और वहां दिन भर खेती करने के बाद रात सुकून से सोते हुए भी उनका सफर दुनिया को खोजते हुए चलता जा रहा है।

ऐसे नाटक देखने और कहानी सुनने से अपने भविष्य की उम्मीदें खो चुके अनाथ बच्चों, जेल में बंद कैदियों और कोरोना की वजह से अवसाद में जी रहे लोगों के चेहरे पर मुस्कान और अपने भविष्य को लेकर सकारात्मकता तो आ ही सकती है।

हिमांशु जोशी , उत्तराखंड।

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