Tuesday, January 25, 2022

इस गणतंत्र जाने कौन है भारतीय संविधान का रक्षक.

हमारे हिंदुस्तान में हर साल 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस साल हम अपना 73वां गणतंत्र दिवस मना रहा हैं।
इतिहास के पन्नों में झांक कर देखें तो साल 1947 में जब देश को ब्रिट‍िश राज से स्‍वतंत्रता मिली तब उसके पास अपना कोई संविधान नहीं था।
26 जनवरी 1950 को भारत को अपना संविधान मिला और भारत एक संप्रभु राज्‍य बन गया, जिसे गणतंत्र घोष‍ित किया गया।
 डॉ बीआर अंबेडकर ने संविधान की मसौदा समिति की अध्यक्षता करी थी।
जानें क्या होता है संविधान

विकिपीडिया को पढ़ें तो समझ में आता है कि संविधान ( 'सम्' + 'विधान' ), मूल सिद्धान्तों का एक समुच्चय है, जिससे कोई राज्य या अन्य संगठन अभिशासित होते हैं।
वह किसी संस्था को प्रचालित करने के लिये बनाया हुआ दस्तावेज है। यह प्रायः लिखित रूप में होता है। यह वह विधि है जो किसी राष्ट्र के शासन का आधार है, उसके चरित्र, संगठन, को निर्धारित करती है तथा उसके प्रयोग विधि को बताती है।
यह राष्ट्र की परम विधि है तथा विशेष वैधानिक स्थिति का उपभोग करती है ।
सभी प्रचलित कानूनों को अनिवार्य रूप से संविधान की भावना के अनुरूप होना चाहिए, यदि वे इसका उल्लंघन करेंगे तो वे असंवैधानिक घोषित कर दिए जाते है।

भारत का संविधान विश्व के किसी भी सम्प्रभु देश का सबसे लम्बा लिखित संविधान है। 

भारत में कौन है संविधान का रक्षक

भारत के उच्चतम न्यायालय को संविधान का रक्षक कहा जाता है तथा समय-समय पर उच्चतम न्यायालय द्वारा संविधान की रक्षा की गई है। संवैधानिक व्यवस्था के माध्यम से ही उच्चतम न्यायालय को इतना महत्व और इतनी शक्तियां दी गई हैं।

 संविधान के अनुच्छेद 124 के अंतर्गत भारत के उच्चतम न्यायालय के स्थापना का उपबंध किया गया है।

भारत के  उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए कुछ ऐसे निर्णय जिन्होंने संविधान की रक्षा करी

यूनियन ऑफ इंडिया बनाम एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स - सार्वजनिक पदाधिकारियों और पद के उम्मीदवारों के बारे में जानने का अधिकार। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 में भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के तहत सार्वजनिक पदों के लिए चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के बारे में जानने का अधिकार भी शामिल है। 

न्यायमूर्ति केएस पुट्टस्वामी (सेवानिवृत्त) बनाम भारत संघ - क्या निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है? इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से भारत के संविधान के भाग 3 के अनुसार एक मौलिक अधिकार के रूप में निजता का अधिकार माना।

बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य मामला - क्या बच्चों को राष्ट्रगान गाने के लिए मजबूर करना उनके धर्म के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में अनुच्छेद 19 के तहत मौन का अधिकार मौलिक अधिकार का हिस्सा है

संवैधानिक शिक्षा हो अनिवार्य

संविधान से राष्ट्र को ऊर्जा मिलती है और इस समय हमारे गणतंत्र के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती संवैधानिक निरक्षरता के रूप में सामने आई है।

संवैधानिक निरक्षरता के कारण ही लोग अपने अधिकारों की बातें तो करते है लेकिन नागरिक कर्तव्यों की बातें नहीं होतीं।

अगर संविधान के बारे में जानकारी नही होगी तो उसके अनुदेशों का पालन होना भी मुश्किल है इसलिए यह जरूरी है कि देश में संवैधानिक शिक्षा अनिवार्य हो।

हिमांशु जोशी, उत्तराखंड।

Sunday, January 23, 2022

उत्तराखंड के आने वाले दशक से पहले इस दशक पर बात कर लेते प्रधानमंत्री मोदी.

उत्तराखंड में कड़ाके की ठंड, बर्फबारी और बरसात के बीच चुनावी बिगुल भी फूंका जा चुका है। प्रदेश के राजनीतिक इतिहास को देखें तो यहां सत्ता में देश की दो बड़ी राजनीतिक पार्टियों का ही वर्चस्व रहा है।
उत्तराखंड में बेरोज़गारी इस समय सबसे बड़ा मुद्दा है पर प्रदेश के बड़े नेता उसे निपटाना छोड़ सत्ता के मोह में कभी कांग्रेस तो कभी बीजेपी का दामन थामते रहे हैं।

इस बार प्रदेश में विधानसभा चुनावों के लिए बड़ी पार्टियों में कांग्रेस और बीजेपी के साथ आम आदमी पार्टी भी अपनी ताल ठोक रही है।

प्रधानमंत्री का उत्तराखंड में चुनावी दौरा और उनके दावों पर एक नज़र
 
प्रदेश की भाजपा सरकार को फ़िर से चुनाव में जीत दिलाने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी चुनाव की आचार संहिता लागू होने से पहले एक चुनावी रैली कर गए।
हल्द्वानी में हुई चुनावी रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि आने वाला दशक उत्तराखंड का होगा। इसके लिए कई विकास कार्यों पर काम करने की जरूरत पर सरकार जोर दे रही है। उत्तराखंड के लोगों का सामर्थ्य इस दशक को उत्तराखंड का दशक बनाएगा यह पक्का विश्वास है।
प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि प्रदेश को 'जल जीवन मिशन' की सौगात दी है और उन्होंने टनकपुर-बागेश्‍वर रेल लाइन, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन, ऑलवेदर रोड को लेकर हो रहे काम को ऐतिहासिक बताया।

प्रधानमंत्री मोदी के भाषण की ज़मीनी हकीकत

              ऑल वेदर रोड का एक दृश्य

ऑल वेदर रोड पर एक शोध छात्र की राय..

नैनीताल से टूरिज्म एडमिनिस्ट्रेशन एंड मैनेजमेंट के शोध छात्र कमलेश जोशी प्रधानमंत्री मोदी द्वारा अपने महत्वपूर्ण काम में गिनाए गए कामों में से एक ऑल वेदर रोड पर कहते हैं कि पहाड़ों में विकास के खिलाफ शायद ही कोई हो लेकिन विनाश की इस शर्त पर विकास शायद ही किसी उत्तराखंडी को मंजूर हो ,जिसमें पल-पल जानमाल का खतरा बना हुआ है। उत्तराखंड को सतत विकास की नितांत आवश्यकता है जो न सिर्फ वर्तमान पीढ़ी के लिए उपयोगी हो बल्कि आने वाली पीढ़ी के लिए भी बचा रहे। संसाधनों का सीमित दोहन व उपयोग सतत विकास की मूल अवधारणा है।

उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों की हकीकत देखी जाए तो लोगों को ऑल वेदर रोड से ज्यादा ऑल वेदर हैल्थ सर्विसेज, ऑल वेदर एजुकेशन, ऑल वेदर जॉब सैक्योरिटी तथा ऑल वेदर लिविंग कंडीशन की जरूरत है। जिस दिन ये बेसिक सुविधाएं हर मौसम में सुदूर पहाड़ी गांवों तक पहुंच जाएंगी ,उस दिन शायद ऑल वेदर रोड जैसी अवधारणाएं लोगों की समझ में आ पाएंगी।

ऐतिहासिक बताए गए टनकपुर-बागेश्‍वर रेल लाइन के काम की कहानी

प्रधानमंत्री द्वारा ऐतिहासिक बताए गए टनकपुर-बागेश्‍वर रेल लाइन के काम पर टनकपुर के युवा मयंक पन्त कहते हैं कि यह अब कोई बड़ा चुनावी मुद्दा नही रहा क्योंकि रेलवे लाइन के सर्वे की बात सुन-सुन कर हम थक चुके हैं। भाजपा हो या कांग्रेस, यहां हर सरकार आती है और इस रेलवे लाइन के फाइनल सर्वे की बात कह जाती है।

प्रधानमंत्री ने अपनी रैली में कहा था प्रदेश को 'जल जीवन मिशन' की सौगात दी है, इस पर एक नज़र

वर्ष 2019 की एक खबर थी कि उत्तराखंड राज्य जल नीति-2019 के मसौदे को मंजूरी दी गई है। राज्य में शुरू होने वाली यह जल नीति प्रदेश में उपलब्ध सतही और भूमिगत जल के अलावा हर वर्ष बारिश के रूप में राज्य में गिरने वाले 79,957 मिलियन किलो लीटर पानी को संरक्षित करने की कवायद है।
जल नीति में राज्य के 3,550 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले 917 हिमनदों के साथ ही नदियों और प्रवाह तंत्र को प्रदूषण मुक्त करने और लोगों को शुद्ध पेयजल और सीवरेज निकासी सुविधा उपलब्ध कराने का भी प्रावधान किया गया है।

शायद इस नीति से एक साल में थोड़ा बहुत प्रभाव पड़ना शुरू हुआ होगा जिससे प्रभावित हो वर्ष 2020 में पीआईबी द्वारा दी गई एक सूचना के अनुसार केन्द्रीय जल शक्ति मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत को लिखे पत्र में आश्वस्त किया कि केंद्र सरकार  उत्तराखंड को 2023 तक ‘हर घर जल राज्य’ बनाने में पूरा सहयोग देगी।
जल शक्ति मंत्री ने पत्र में बताया था कि उत्तराखंड को हर घर में नल से जल पहुंचाने की इस योजना को आगे बढ़ाने के लिए इस वित्त वर्ष में केंद्र की ओर से 362॰57 करोड़ रुपये की मंजूरी दी गई है। यह राशि वर्ष 2019-20 में इस कार्य के लिए दी गई 170॰53 करोड़ के दोगुने से भी अधिक है। पत्र में बताया गया कि इस अभियान के लिए राज्य सरकार के पास इस समय इस अभियान के लिए 480.44 करोड़ की बड़ी राशि उपलब्ध है जिसमें राज्य सरकार का अंशदान और पिछले वर्ष उपयोग न लाई जा सकी राशि शामिल है।

इंडिया वाटर पोर्टल के अनुसार इसी मुहिम को आगे बढ़ाते हुए उत्तराखंड सरकार ने बजट 2020-21 में 1165 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है।
1165 करोड़ रुपये की लागत से प्रदेश के लोगों को पीने का साफ पानी मिल सकेगा।

इन आंकड़ों से ये तो साफ़ है कि योजना का बजट बढ़ता जा रहा है पर काम शायद कम ही हो रहा है।

जल जीवन मिशन की महत्ता पर प्रदेश के नौलों को पुनर्जीवित करने में लगे नौला फाउंडेशन बगवालीपोखर रानीखेत के संस्थापक अध्यक्ष बिशन सिंह कहते हैं कि पानी के लिये तरसते पहाड़ के लिये जल जीवन मिशन एक वरदान साबित होगा पर उत्तराखंड में ये जल्दबाज़ी में स्थानीय समुदायों की सहभागिता के बग़ैर लिया गया फैसला है। जिसमें योजना के सही ढंग से कार्यान्वित होने में संदेह है। जल जीवन मिशन की सार्थकता सीमित रुप से उपलब्ध भूजल के बजाय पहाड़ के परम्परागत जल स्रोतो नौलों-धारों पर आधारित होनी चाहिये, जिससे दीर्घकालीन योजना चलेगी अन्यथा हैंडपम्पों की तरह ही यह योजना भी बेकार हो जाएगी । 
स्थानीय भागीदारी ही जल संरक्षण को सही दिशा दे सकती है।

हिमांशु जोशी, उत्तराखंड।

Thursday, January 20, 2022

बड़ी दूरी है साब

एक कपड़ा है एक रंग है 
पर फिर भी बड़ी दूरी है साब


ये जाति, छुआ-छूत नही
ये नए ज़माने की दूरी है साब

ये थाली और पत्तल की दूरी है
ये रेशम और खादी की दूरी है साब

एक चमड़ा है एक रंग है
पर मिट्टी और रेते के घर की दूरी है साब

ये जाति, छुआ-छूत नही
ये नए ज़माने की दूरी है साब

ये लोकतंत्र और मरतंत्र की दूरी है
ये खाली और भरी जेब की दूरी है साब

कामगर तो कामगर ही रहेगा
ये गरीबी बड़ी बुरी चीज़ है साब

Wednesday, January 19, 2022

उत्तराखंड में चुनावी मौसम के बीच वादों और मुद्दों को परखती एक रिपोर्ट

उत्तराखंड में कड़ाके की ठंड, बर्फबारी और बरसात के बीच चुनावी बिगुल भी फूंका जा चुका है। प्रदेश के राजनीतिक इतिहास को देखें तो यहां सत्ता में देश की दो बड़ी राजनीतिक पार्टियों का ही वर्चस्व रहा है।
उत्तराखंड में बेरोज़गारी इस समय सबसे बड़ा मुद्दा है पर प्रदेश के बड़े नेता उसे निपटाना छोड़ सत्ता के मोह में कभी कांग्रेस तो कभी बीजेपी का दामन थामते रहे हैं।

इस बार प्रदेश में विधानसभा चुनावों के लिए बड़ी पार्टियों में कांग्रेस और बीजेपी के साथ आम आदमी पार्टी भी अपनी ताल ठोक रही है।

पार्टियों की नज़र में क्या है उत्तराखंड के चुनावी मुद्दे

प्रदेश में चुनाव आचार संहिता लागू होने से पहले अपनी पार्टी को प्रदेश में फिर से जीत दिलाने के लिए चुनाव प्रचार रैली करने हल्द्वानी आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टनकपुर-बागेश्‍वर रेल लाइन, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन, ऑलवेदर रोड को लेकर हो रहे काम को ऐतिहासिक बताया।

वहीं देहरादून में हुई रैली के दौरान राहुल गांधी ने अपने संबोधन को उत्तराखंड से सेना में गए जवानों पर केंद्रित रखा।

आप पार्टी के अरविंद केजरीवाल ने कहा कि रिटायरमेंट के बाद जवानों को भटकना नहीं पड़ेगा। अगर उत्तराखंड में ‘आप’ की सरकार बनती है तो भूतपूर्व सैनिकों को सीधे सरकारी नौकरी दी जाएगी।
 उन्होंने ये भी कहा कि आप की सरकार आने के बाद अगर राज्य का रहने वाला सैनिक कहीं भी शहीद होगा, उनके परिवार को आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री कर्नल(सेवानिवृत्त) अजय कोठियाल उनके घर जाकर एक करोड़ रुपए का चेक सौंपेंगे।

प्रदेश के असल मुद्दों का डीएनए

नेताओं की नज़र से देखा जाए तो लगता है कि उन्होंने उत्तराखंड में सेना की तैयारी कर रहे युवाओं और सेना में सेवा दे रहे जवानों पर ही अपना ध्यान केंद्रित रखा है। पर वास्तव में उत्तराखंड के मुद्दे इससे कहीं वृहद हैं, उत्तराखंड का युवा सेना के सिवाय अन्य जगह भी अपने लिए रोज़गार की राह तलाशता है।
उत्तराखंड वासियों को कोरोना काल के बाद से उपजे हालातों की वजह से अपने प्रदेश वापस लौटना पड़ा है और अब वह अपने प्रदेश का विकास चाहते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण है रोज़गार

प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की विधानसभा सीट खटीमा के ही एक युवा गोविंद से हमारी बात हुई अन्य युवाओं की तरह उनका भी कहना था कि रोज़गार के नाम पर इस सरकार ने कुछ नही किया। जरूरत इस बात की है कि प्रदेश में कुछ वर्षों पहले जैसी शिक्षा व्यवस्था बनाई जाए।

पहले सरकारी स्कूलों में ही पढ़ा जाता था, अब छात्रों को प्राइवेट स्कूलों की तरफ़ धकेला जा रहा है। कम वेतन प्राप्त कर रहे अभिवावकों के लिए अपने बच्चों को इन महंगे स्कूलों में पढ़ाना मुश्किल होता जा रहा है और इन स्कूलों में पढ़ाने के बाद भी बच्चों के सफल भविष्य की कोई गारंटी नही है। पहले जितने भी लोग सरकारी नौकरी में हैं, उनमें से अधिकतर सरकारी स्कूलों से ही पढ़े हैं, इन स्कूलों को मज़बूत कर ही छात्रों का भला होगा। इसके साथ ही गोविंद कहते हैं कि एक बार नौकरी कर चुके लोगों को फिर नौकरी न दी जाए।

यह सब तभी सम्भव है जब नेताओं के लिए भी शिक्षा के मानक तय किए जाए, वह समझदार होंगे तभी सही फैसले लेंगे।

प्रधानमंत्री मोदी के भाषण में शामिल टनकपुर-बागेश्‍वर रेल लाइन

टनकपुर-बागेश्‍वर रेल लाइन सर्वे पर टनकपुर के युवा मयंक पन्त कहते हैं कि यह अब कोई बड़ा चुनावी मुद्दा नही रहा क्योंकि सर्वे की बात सुन-सुन कर हम थक चुके हैं। हर सरकार आती है और इस रेलवे लाइन के फाइनल सर्वे की बात कह जाती है।

स्वास्थ्य सेवा पर एक राय..

प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर देहरादून के वरिष्ठ पत्रकार त्रिलोचन भट्ट कहते हैं कि प्रदेश की स्वास्थ्य सेवा दयनीय हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में गर्भवती महिलाओं के हाल बेहाल हैं, प्रसव कराने उन्हें गांव वाले कंधे पर उठा कई किलोमीटर दूर स्थित अस्पताल पहुंचाते हैं। प्रदेश की दोनों बड़ी पार्टियों ने इस मामले में अब तक निराश ही किया है।

एक मुद्दा भूकानुन भी

पिछले एक-दो साल से उत्तराखंड में भूकानून लागू कराने की मांग ने सोशल मीडिया पर ज़ोर पकड़ा है और यह एक बड़ा चुनावी मुद्दा भी है।

भू कानून पर वरिष्ठ पत्रकार पलाश विश्वास कहते हैं कि
इस कानून को पास कराने का नाटक आम जनता, खासकर किसानों को यह भरोसा दिलाने के लिए अनिवार्य है कि वे इस गलत फहमी में रहें कि कानून के मुताबिक ही उनको हलाल या झटके से मार दिया जायेगा। गैर कानूनी कुछ भी नहीं होगा।


प्रधानमंत्री मोदी के भाषण में शामिल ऑल वेदर रोड पर एक शोध छात्र की राय..

नैनीताल से टूरिज्म एडमिनिस्ट्रेशन एंड मैनेजमेंट के शोध छात्र कमलेश जोशी ऑल वेदर रोड पर कहते हैं कि
पहाड़ों में विकास के खिलाफ शायद ही कोई हो लेकिन विनाश की इस शर्त पर विकास शायद ही किसी उत्तराखंडी को मंजूर हो ,जिसमें पल-पल जानमाल का खतरा बना हुआ है। उत्तराखंड को सतत विकास की नितांत आवश्यकता है जो न सिर्फ वर्तमान पीढ़ी के लिए उपयोगी हो बल्कि आने वाली पीढ़ी के लिए भी बचा रहे। संसाधनों का सीमित दोहन व उपयोग सतत विकास की मूल अवधारणा है।

उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों की हकीकत देखी जाए तो लोगों को ऑल वेदर रोड से ज्यादा ऑल वेदर हैल्थ सर्विसेज, ऑल वेदर एजुकेशन, ऑल वेदर जॉब सैक्योरिटी तथा ऑल वेदर लिविंग कंडीशन की जरूरत है। जिस दिन ये बेसिक सुविधाएं हर मौसम में सुदूर पहाड़ी गांवों तक पहुंच जाएंगी ,उस दिन शायद ऑल वेदर रोड जैसी अवधारणाएं लोगों की समझ में आ पाएंगी।


प्रधानमंत्री ने अपनी रैली में कहा था प्रदेश को 'जल जीवन मिशन' की सौगात दी है, इस पर एक नज़र

वर्ष 2019 की एक खबर थी कि उत्तराखंड राज्य जल नीति-2019 के मसौदे को मंजूरी दी गई है। राज्य में शुरू होने वाली यह जल नीति प्रदेश में उपलब्ध सतही और भूमिगत जल के अलावा हर वर्ष बारिश के रूप में राज्य में गिरने वाले 79,957 मिलियन किलो लीटर पानी को संरक्षित करने की कवायद है।
जल नीति में राज्य के 3,550 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले 917 हिमनदों के साथ ही नदियों और प्रवाह तंत्र को प्रदूषण मुक्त करने और लोगों को शुद्ध पेयजल और सीवरेज निकासी सुविधा उपलब्ध कराने का भी प्रावधान किया गया है।

शायद इस नीति से एक साल में थोड़ा बहुत प्रभाव पड़ना शुरू हुआ होगा जिससे प्रभावित हो वर्ष 2020 में पीआईबी द्वारा दी गई एक सूचना के अनुसार केन्द्रीय जल शक्ति मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत को लिखे पत्र में आश्वस्त किया कि केंद्र सरकार  उत्तराखंड को 2023 तक ‘हर घर जल राज्य’ बनाने में पूरा सहयोग देगी।
जल शक्ति मंत्री ने पत्र में बताया था कि उत्तराखंड को हर घर में नल से जल पहुंचाने की इस योजना को आगे बढ़ाने के लिए इस वित्त वर्ष में केंद्र की ओर से 362॰57 करोड़ रुपये की मंजूरी दी गई है। यह राशि वर्ष 2019-20 में इस कार्य के लिए दी गई 170॰53 करोड़ के दोगुने से भी अधिक है। पत्र में बताया गया कि इस अभियान के लिए राज्य सरकार के पास इस समय इस अभियान के लिए 480.44 करोड़ की बड़ी राशि उपलब्ध है जिसमें राज्य सरकार का अंशदान और पिछले वर्ष उपयोग न लाई जा सकी राशि शामिल है।

इंडिया वाटर पोर्टल के अनुसार इसी मुहिम को आगे बढ़ाते हुए उत्तराखंड सरकार ने बजट 2020-21 में 1165 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है।
1165 करोड़ रुपये की लागत से प्रदेश के लोगों को पीने का साफ पानी मिल सकेगा।

इन आंकड़ों को देख यही लगता है कि योजना पर धन तो बहुत बरसा है पर काम कम ही हुआ है।

जल जीवन मिशन की महत्ता पर प्रदेश के नौलों को पुनर्जीवित करने में लगे नौला फाउंडेशन बगवालीपोखर रानीखेत के संस्थापक अध्यक्ष बिशन सिंह कहते हैं कि पानी के लिये तरसते पहाड़ के लिये जल जीवन मिशन एक वरदान साबित होगा पर उत्तराखंड में ये जल्दबाज़ी में स्थानीय समुदायों की सहभागिता के बग़ैर लिया गया फैसला है। जिसमें योजना के सही ढंग से कार्यान्वित होने में संदेह है। जल जीवन मिशन की सार्थकता सीमित रुप से उपलब्ध भूजल के बजाय पहाड़ के परम्परागत जल स्रोतो नौलों-धारों पर आधारित होनी चाहिये, जिससे दीर्घकालीन योजना चलेगी अन्यथा हैंडपम्पों की तरह ही यह योजना भी बेकार हो जाएगी । 
स्थानीय भागीदारी ही जल संरक्षण को सही दिशा दे सकती है।

हिमांशु जोशी, उत्तराखंड।

Sunday, January 16, 2022

मेंटल स्ट्रेंथ पर विचार करने को कहता कमाल का जाना

कमाल का जाना और पत्रकारों पर दबाव
जिम्मेदारी, लोगों की राय बनाना, दबाव, सोशल मीडिया, नौकरी की असुरक्षा, कम वेतन, बिना वेतन

कोहली का सन्यास

ट्रेसकोठीक, स्टोक्स, अमरीकी ओलंपिक खिलाड़ी

एक्टर पर दबाव

कोरोना वैक्सीन तो वज़ह नही

दीवारें चीन दी गई हैं, खुल कर खेलना, कम्प्यूटर, मोबायल

Saturday, January 15, 2022

चुनाव, बॉर्डर, धर्म, मैं और मेरा देश

चुनाव 
उम्मीदवार
जिसने मदद की

धर्म 
विवाद

बॉर्डर
राजनीति

काम
रोजगार 
समय देश की चिंता
लिखना
पर्यावरण

विकास
आबादी 
रोजगार
युवा, फेसबुक वाट्सएप मीडिया, गांधी, विवेकानंद, हिंसा, नफ़रत

स्टार 
क्रिकेटर
इंटरनेट
अमीर

Friday, January 7, 2022

'पुष्पा' है सदी का सुपरस्टार पर फिल्मों में धूम्रपान के दृश्य चिंता का विषय..

2021 भारतीय सिनेमा को सरदार उधम, जय भीम जैसी उम्दा कलाकृति दे गया और इस साल की शुरुआत भी शानदार है। 'पुष्पा' इस सदी का सुपरस्टार बन हमारे सामने आया है।
तेलुगु फ़िल्म पुष्पा 'द राइज़' पुष्पा बने अल्लु अर्जुन के एक साधारण मज़दूर से ताकतवर चंदन तस्कर बनने की कहानी है।
अल्लु अर्जुन के बेहतरीन अभिनय के साथ दमदार स्टंट और शानदार कोरियोग्राफी से सिनेमाघरों पर हिंदी डबिंग में उपलब्ध यह फ़िल्म भारतीय सिनेमा का धूमकेतु बनेगी क्योंकि भारतीय सिनेमा का दर्शक इन्हीं का दीवाना है। 
फ़िल्म में सिंगल मदर जैसे महत्वपूर्ण विषय को छूने की कोशिश की गई है तो धूम्रपान वाले दृश्य निराश करते हैं।


 'पुष्पा' के निर्देशक सुकुमार ने साल 2004 में अल्लु अर्जुन के साथ ही फ़िल्म 'आर्या' से बतौर निर्देशक अपने फिल्मी कैरियर की शुरुआत करी थी और टॉलीवुड में अपनी किस्मत आजमाने से पहले सुकुमार लगभग छह साल तक गणित के अध्यापक रहे थे।

मिला इस सदी का सुपरस्टार पर एक खलनायक बन सकता है बड़ी मुसीबत

पिछली सदी 'शोले' के जय-वीरू की जोड़ी से भारतीय सिनेमा को अमिताभ बच्चन के रूप अपना पहला सुपरस्टार मिला था और अब इस सदी निर्देशक सुकुमार ने अल्लू अर्जुन को पुष्पा राज बना भारतीय सिनेमा को उसका दूसरा सुपरस्टार दे दिया है।

फ़िल्म के लिए कोरोना सबसे बड़ा खलनायक साबित होगा, कोरोना के डर से लोग सिनेमाघरों तक नही पहुंच रहे और फ़िल्म इतना दम तो रखती थी कि भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री में सफलता के सारे रिकॉर्ड तोड़ती। ओटीटी पर फ़िल्म को रिलीज़ कर उस नुकसान की भरपाई करने की कोशिश तो की गई है, उम्मीद है कि यह ओटीटी पर भी सबसे ज्यादा देखे जाने वाली फ़िल्म बनेगी।

शेषाचलम जंगलों के लाल चंदन की तस्करी को केंद्र में रख फ़िल्म की कहानी शुरू होती है और इसके शीर्षक पुष्पा 'द राइज़' से ही समझ आ जाता है कि यह पुष्पा राज के राज करने की कहानी है।

फ़िल्म की पटकथा कसकर लिखी गई है,  इसमें कहीं भी कोई कमी नही महसूस होती।

अल्लु अर्जुन पहले दृश्य से ही एक कंधा झुका छा गए हैं..

'पानी लेकर आ, मेरको नही इसको पिला थक गया है..' जैसे संवादों के ज़रिए 'पुष्पा' दर्शकों के दिल में जगह बना लेता है।

पुष्पा के दोस्त केशव बन जगदीश प्रताप बंडारी सहायक अभिनेता के रूप में प्रभावित करते हैं।
रश्मिका मंदाना की बात की जाए तो उनमें कुछ मिसिंग सा लगा है, उन्हें देख फ़िल्म 'डियर कॉमरेड' वाली रश्मिका की याद नही आती।

फ़िल्म के बाक़ी कलाकारों ने अपने पात्रों के साथ न्याय किया है।

संवाद 'मार्किट से इज़्ज़त खरीद के माथे पर चिपका' दर्शकों की वाहवाही बटोरता है तो 'फ्लॉवर नही फायर' और 'झुकेगा नही' ट्रेडमार्क बनेगा।

फ़िल्म में संगीत देवी श्री प्रसाद द्वारा दिया गया है। इसका बैकग्राउंड स्कोर गज़ब का है जैसे तस्कर पुलिस की रेस में बैकग्राउंड पर बजता हुआ संगीत ध्यान खींच फ़िल्म का रोमांच बरकरार रखता है।

'ओ बोलेगा' आइटम नम्बर हिंदी में कनिका कपूर का गाया है तो उसका तेलुगु वर्ज़न 'उ अंटावा' इंद्रावती चौहान ने गाया है ।

आइटम नंबर सुनने में तो अच्छा है ही, अल्लु और सामंथा रुथ प्रभु इसमें अपने डांस मुव्स से आग भी लगा रहे हैं। गाने के कोरियोग्राफर पोलाकी विजय हैं।

'श्रीवल्ली' गाने में गणेश आचार्य की कोरियोग्राफी काफी अर्से बाद बड़े पर्दे पर कुछ नया सा दिखाती है।

जंगल और अंधेरे जैसी चुनौतियों के बावजूद फ़िल्म का छायांकन, आंखों को हरियाली का आनन्द देते कहीं से भी निराश नही करता।

फ़िल्म अपने बेहतरीन स्टंट सीनों के लिए भी जानी जाएगी। ट्रक को उछलते देखना, पुष्पा का मंगल शीनू के घर जाकर कोहराम मचाना बेहतरीन स्टंट सीनों का नमूना है।
पुष्पा का जंगल में मुंह बांध तस्कर की दुनिया का नया बादशाह बनने वाला स्टंट आपको 'शोले' के स्टंटों की याद दिला जाता है।

पुष्पा और भंवर का तनाव ही पुष्पा द रूल के लिए दर्शकों को खींचेगा

फ़िल्म के अंत में पुलिस अधिकारी भंवर सिंह शेखावत बने फहाद फासिल और पुष्पा के बीच का तनाव देखने लायक है और यही आपके अंदर फ़िल्म का अगला भाग पुष्पा द रूल देखने की इच्छा जगा जाएगा।

जाते-जाते-
फिल्मों के सामाजिक प्रभाव पर चर्चा:  
फिल्मों से धुम्रपान के दृश्य हो पूर्णतः प्रतिबंधित और सिंगल मदर पर भी सोचना है जरूरी।

दर्शक अपने प्रिय अभिनेताओं के बहुत से स्टाइल कॉपी करते रहे हैं, फ़िल्म में अल्लु की एंट्री धूम्रपान करते दिखाई गई गई है।
फिल्मों में चेतावनी के साथ धूम्रपान करना दिखाया जाता रहा है पर अपने सुपरस्टार को धूम्रपान करते देख समाज धूम्रपान की तरफ़ ज्यादा आकर्षित होता है।

 ऑस्ट्रेलिया में बैठे क्रिकेटर डेविड वार्नर अगर 'पुष्पा' का दाढ़ी सेट करने वाला एक्शन कर स्टाइल मार सकते हैं तो भारत में अल्लू अर्जुन की तरह लोग धूम्रपान करते न दिखें, यह तो असम्भव है।

हालांकि केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की तरफ़ से फ़िल्म को U/A सर्टिफिकेट जरूर जारी किया गया है पर ओटीटी के इस ज़माने में ये कितना सार्थक हो सकता है यह विवाद का विषय है। अपने आसपास 12 साल से नीचे के बच्चों को भी आप धूम्रपान करते देख सकते हैं और 12 साल के बाद तो धूम्रपान की तरफ़ बच्चों का आकर्षण चरम पर होता है।

फ़िल्म में सिंगल मदर की समस्या को भी दिखाया गया है, जिस पर कभी ध्यान नही दिया जाता। सिंगल मदर समाज का वह तबका है जो अकेले ही बहुत सी मुसीबतों का सामना करती हैं और उन्हें सरकार से कोई मदद नही मिलती।

निर्देशक/लेखक/पटकथा- सुकुमार
संवाद- श्रीकांत विसा
अभिनय- अल्लु अर्जुन, फ़हद फासिल, रश्मिका मंदाना, अजय, राओ रमेश
संगीत- देवी श्री प्रसाद
छायांकन- मिरोस्लाव ब्रोज़ेक
स्टंट- लक्ष्मण चेल्ला, राम चेल्ला, पीटर हेन
फ़िल्म सर्टिफिकेट- U/A
समीक्षक- हिमांशु जोशी @himanshu28may
रेटिंग- 4/5

Tuesday, January 4, 2022

गांव पर विमर्श करती किताब..

लेखक चाहते थे कि पुस्तक प्रसारित हो तो देश में रोज़गारविहीन जन विरोधी विकास नीति पर देशव्यापी बहस छिड़ सकती है और हमारे द्वारा प्रस्तुत वैकल्पिक विकास नीति के पक्ष में जनमत बन सकता है।
किताब पढ़ते और आज के युवाओं के हाल देख यह लगता है कि किताब को चर्चित करना आवश्यक है।

                  सम्पादक- पलाश विश्वास

पलाश विश्वास के लिखे प्राक्कथन को पढ़ने से पता चलता है कि किताब में मास्साब की रचनाधर्मिता को समग्रता से प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। यहां पाठकों को यह भी मालूम पड़ेगा कि मास्साब यह किताब कैंसर होने के बावजूद लिख रहे थे और किताब का उद्देश्य उनके कृषि विमर्श को समग्रता में राष्ट्रव्यापी संवाद के लिए प्रस्तुत करना था।

भूमिका एक वरिष्ठ पत्रकार चारु तिवारी ने लिखी है जो यह जानकारी देती है कि मास्साब की यह किताब गांव बचाने के उद्देश्य पर केंद्रित है।
भूमिका दो में पुरुषोत्तम शर्मा ने मास्टर प्रताप सिंह के निजी जीवन पर प्रकाश डाला है, साथ ही किताब के तैयार होने की कहानी भी इस भूमिका में दी गई है।

'यह किताब क्यों' मास्टर प्रताप सिंह द्वारा ही लिखा गया है और जिज्ञासा जगाता है कि किताब में कुछ महत्त्वपूर्ण मिलेगा जो राष्ट्र के विकास में सहायक होगा।

छह खण्डों में बंटी इस किताब को मास्साब के आलेखों, कविताओं, डायरी के हिस्से और पत्रों को मिला कर पूर्ण रूप दिया गया है। किताब में आपको गद्य और पद्य दोनों पढ़ने के लिए मिल जाएंगे।

खण्ड एक 'गांव और किसान भारत की मौलिक पहचान' 2011 की जनगणना के आंकड़ों से शुरू होता है। विकास की परिभाषा के बारे में लिखा गया है कि इसकी वास्तविक परिभाषा से हम अनजान हैं।
लेखक द्वारा यजुर्वेद, अर्थववेद, विष्णुपुराण के शब्दों को आज के परिवेश से जोड़ देना और 'माटी हिंदुस्तान की' पाठ में विज्ञान की चर्चा करना, उनके लेखन की विविधता को दर्शाता है।

हर पाठ के बाद 'मास्साब ने कहा' बॉक्स गांव और कृषि के बारे में नए विचार रखता है।
भारत की जल सम्पदा और वन सम्पदा पर हो रहे अतिक्रमण के बारे में पाठकों का ज्ञान खोलती किताब आगे बढ़ती है। जल सम्पदा पर विचार करती जनकवि 'गिर्दा' की कविता भी पढ़नी आवश्यक है।
खण्ड का अगला विषय ग्रामीण भारत, शहरी औद्योगिक विकास, बजट उपयोग और स्वास्थ्य पर केंद्रित है।

खण्ड दो 'दूर तलक फैली हरियाली मास्साब के नोट्स' से पहले आप देश के खोखलेपन से वाकिफ हो चुके होंगे। 

किसान कर्ज का इस्तेमाल बीज, खाद, सिंचाई आदि में करे तो तरक्की करेगा, अन्य कामों में करे तो तबाह हो जाएगा। पंक्ति नोट्स का महत्व समझाती हैं।
'विकास की अवधारणा' जैसे महत्वपूर्ण शीर्षक सामने आते हैं, जिसकी पंक्ति 'तकनीक अब उपाय नही रह गई, हमारी स्वामी बन गई' किताब पढ़ते आपको गांधी विचारों की याद भी दिलाएगी।

खण्ड तीन 'आंदोलनों की ज़मीन से' पढ़ने के लिए आपका कलेजा मज़बूत होना चाहिए। संपादक ने मास्साब के लिखे को सही क्रमानुसार समेटने के लिए अपने पूरे लेखकीय अनुभव का सही इस्तेमाल किया है।

लेखक चाहते थे कि पुस्तक प्रसारित हो तो देश में रोज़गारविहीन जन विरोधी विकास नीति पर देशव्यापी बहस छिड़ सकती है और हमारे द्वारा प्रस्तुत वैकल्पिक विकास नीति के पक्ष में जनमत बन सकता है।
किताब पढ़ते और आज के युवाओं के हाल देख यह लगता है कि किताब को चर्चित करना आवश्यक है।

खण्ड में आगे मास्टर को गिरफ्तार करने की साजिश के साथ उनके परिवार को परेशान करने की कहानी है, यह वाक्या जनता के लिए लड़ने वालों के साथ होने वाली मुश्किलों से आपको परिचित करवाता है।

SRWC का परिचय मास्साब का दूसरा पक्ष दिखाता है, किताब पढ़ते कभी-कभी लगता है कि इसे स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया जाए तो छात्रों को भूगोल, विज्ञान आसानी से समझ आ जाए।
'नैनीसार' का डीएनए जिस तरह से किया गया है उससे पूरा तंत्र कटघरे में खड़ा दिखता है।


खण्ड चार की शुरुआत में 'दिहाड़ी मजदूर को भी बिना दलाली के काम नही मिल रहा' पंक्ति सत्यता के करीब ही है। यह खण्ड पूंजीवाद की कलई खोलता 'वाम लफ्फाज़ों का अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन' पाठ पर आता है, जो समाजवाद और विकास की वास्तविक परिभाषा हमारे सामने रखता है।
अब आपको यह मालूम भी पड़ जाएगा कि कृषि कानून और श्रम कानूनों में बदलाव की आवश्यकता क्यों पड़ी थी।

उत्तराखंड के विकास के साथ ही देशभर के कृषकों की हालत में कैसे सुधार लाया जाए, इसके लिए विशेष सुझाव किताब में आपका इंतज़ार कर रहे हैं।

खण्ड पांच के परिचय पृष्ठ में पांच की जगह छह का पृष्ठ लग गया है , जो प्रकाशक की गलती जान पड़ता है। खण्ड पांच में आपको गद्य के साथ पद्य भी मिलेंगे।
प्रकृति, राष्ट्र के वर्तमान हालातों जैसे विषयों पर लिखी कविताएं प्रभावित करती हैं।

खण्ड छह 'मास्साब की डायरी' में राजनीति, पर्यावरण, आर्थिकी जैसे मुद्दे शामिल हैं। सम्पादक ने खण्ड छह का परिचय भी लिखा है, जो प्रभावित करता है।
डायरी राष्ट्रीय पटल में घटित हो रही घटनाओं के साथ उत्तराखंड के घटनाक्रमों पर भी केंद्रित है। 

बरेली का इतिहास रोचक है तो 'विद्यालय की नई शाखा' में मास्साब का अपने परिवार के प्रति प्रेम झलकता है।

खण्ड सात मास्साब के करीबियों ने लिखा है और यह मास्साब पर बात करते उनको श्रद्धांजलि देने का सबसे बेहतर तरीका भी है।
मास्साब की अंतिम यात्रा पढ़ते लेखक सुनील कैंथोला द्वारा लिखित प्रसिद्ध पुस्तक 'मुखजात्रा' आपको खुद ही याद आने लगेगी।


जाते जाते

 अंत में पुस्तक के आवरण पर भी बात कर ली जाए जो के.रविन्द्र, भोपाल द्वारा तैयार किया गया है। आवरण चित्र पर किसानों की जो तस्वीर दिखाई गई है वह उनकी वर्तमान दशा को हूबहू हमारे सामने रख देती है, पिछले आवरण पर वरिष्ठ पत्रकारों पलाश विश्वास, चारु तिवारी और पुरषोत्तम शर्मा ने प्रताप सिंह 'मास्साब' पर अपनी टिप्पणी दी हैं।
कुल मिलाकर पुस्तक का आवरण और नाम उसके भीतर की सामग्री से न्याय करता जान पड़ता है।

किताब- गांव और किसान 
प्रताप सिंह 'मास्साब'
सम्पादक- पलाश विश्वास
प्रकाशक- संभव प्रकाशन
सम्पर्क- (ईमेल) kitabsambhav@gmail.com
(मोबाइल) 9412946162
मूल्य- ₹120
समीक्षक- हिमांशु जोशी @himanshu28may

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