Friday, November 15, 2024

वर्चुअल दुनिया के दलदल में धंसी जा रही नई नस्लें, जानिए कैसे करें इस मॉडर्न बीमारी का इलाज।

सार्वजनिक स्थान हों या घर, इन दिनों हर जगह हमें छोटे से बड़े बच्चों के हाथ में स्मार्टफोन दिख जाते हैं। स्मार्टफोन में खोए हुए इन बच्चों के हाथों में घण्टों फोन देखने के बाद भी उनके पैरेंट्स को कोई फर्क नही पड़ता और स्मार्टफोन के अत्यधिक प्रयोग की वजह से
बच्चों के व्यवहार में नकारात्मक प्रभाव दिखने शुरू हो जाते हैं। बच्चों को वर्चुअल दुनिया के इस दलदल में धंसने से सिर्फ उनके पैरेंट्स ही बचा सकते हैं।

भारत के अंदर बच्चों के द्वारा इंटरनेट के इस्तेमाल का आंकड़ा चौंकाता है। डेटा वेबसाइट Statista के मुताबिक, साल 2021 में देश की कुल इंटरनेट यूजर आबादी में बच्चों की तादाद करीब 14 फीसदी थी। Statista की ही जून 2024 में पब्लिश एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश के शहरी इलाकों में 9 से 13 साल की उम्र के ज्यादातर बच्चे हर रोज तीन घंटे से ज्यादा वक्त सोशल मीडिया, वीडियोज और इंटरनेट पर गेम खेलने में खर्च करते हैं।

बच्चों पर स्मार्टफोन के ज्यादा प्रयोग की वजह से पड़ रहे नकारात्मक प्रभावों और उसके समाधान को जानने के लिए हमने एम्स में मेडिकल सोशल सर्विस ऑफिसर रोहित गुप्ता और बाल मनोविज्ञान में पीएचडी वसुधा मिश्रा के साथ बातचीत की, वसुधा इन दिनों अमेरिका में बच्चों को हिंदी पढ़ाती हैं।

सामने आई बच्चों में रील बनाने के लिए मची होड़ की असली वजह।

वसुधा मिश्रा को बच्चों की मानसिक स्थिति पर गहरी समझ है और हमने उनसे इन दिनों बच्चों में रील बनाने की होड़ के पीछे की असली वजह पूछी। वसुधा कहती हैं बच्चों में रील बनाने की होड़ की सबसे बड़ी वजह कम मेहनत से मिलने वाली पब्लिक की अटेंशन है। जो दूसरे कर रहे हैं, उसे देखकर बच्चे सोचते हैं कि यह भला हम इसे क्यों नहीं कर सकते। उन्हें लगता है कि सफलता का मापदंड समाज से मिलने वाली लाइक्स है, जितने लाइक्स उतनी सफलता।
लाइक्स की यही होड़ उनका अपना अस्तित्व बन जाती है और वह इसी में अपना भविष्य देखने लगते हैं।

बच्चों को इस होड़ से बचाए रखने में पैरेंट्स के किरदार पर वसुधा कहती हैं कि अब समय ऐसा आ गया है कि स्मार्टफोन से बच्चों को हमेशा के लिए अलग नही रखा जा सकता। उन्हें अपने बच्चों को अच्छे कंटेंट पर काम करने की सलाह देनी चाहिए, पैरेंट्स को चाहिए कि वह बच्चों के काम को प्रोत्साहन देने के साथ उन्हें उसकी क्षण भंगुरता के प्रति मानसिक मजबूती भी देते रहें। उनके मन में स्थापित करते रहें कि जीवन का लक्ष्य ज्यादा लंबा चलने वाला ही होना चाहिए, शौक और स्थायित्व में अंतर बताना बेहद आवश्यक है।

वर्चुअल ऑटिज़्म के जाल में फंसते बच्चे।

आजकल हम देखते हैं कि छोटे बच्चों को उनके पैरेंट्स द्वारा व्यस्त रखने, खाना खिलाने के लिए स्मार्टफोन पकड़ा दिया जाता है। किस मनोस्थिति की वजह से ये बच्चे स्मार्टफोन की तरफ आकर्षित हो रहे हैं! इससे बच्चों को क्या नुकसान है और किस तरह उन्हें फोन से दूर रखा जा सकता है?

इस सवाल पर एम्स में कार्यरत रोहित गुप्ता कहते हैं पैरंट्स और बच्चे दोनों ही इसके लिए जिम्मेदार हैं। पैरेंट्स सोचते हैं कि मैं अपने काम में व्यस्त हूं तो बच्चों को भी स्मार्टफोन में व्यस्त रख लूं। बच्चे अगर व्यस्त रहेंगे तो हम भी अपना काम आसानी से कर लेंगे।
इसकी वजह से बच्चों का अपने पैरेंट्स की जगह लगाव स्मार्टफोन की तरफ चले जाता है। हर बच्चा खाली मस्तिष्क के साथ पैदा हुआ है और स्मार्टफोन के साथ ज्यादा वक्त बिताने की वजह से वह इसी फोन को अपना सब कुछ मानने लगता है।

जन्म के बाद पहले चार पांच महीने में ही फोन दिखाने की वजह से बच्चों को अपने आसपास के लोगों से मतलब नही रहता, वह फोन की दुनिया को ही सच मानने लगते हैं और इस वजह से वह वर्चुअल ऑटिज़्म की तरफ बढ़ने लगते हैं। वर्चुअल ऑटिज़्म, बच्चों में इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स का ज्यादा इस्तेमाल करने की वजह से होती है। इसकी वजह से बच्चों में बोलने, सीखने की क्षमता प्रभावित होने लगती है।

जब यह बच्चे बड़े होने लगते हैं तो वह लोगों से बातचीत करने के बजाए डिजिटल दुनिया को ही सही मानने लगते हैं, उनमें सामाजिकता जन्म नही ले पाती है। वयस्क होने पर अपने निजी जीवन में जब बच्चों को कोई दिक्कत आती है तो वह डिजिटल दुनिया में ही अपना समाधान खोजने लगते है। इस वजह से ही आजकल के बच्चे आत्महत्या जैसा कठोर कदम उठाने लगे हैं, पिछले महीने हमने अमेरिका में देखा कि एक चौदह साल के लड़के ने एआई गर्लफ्रैंड की वजह से आत्महत्या कर ली थी।

बच्चों को डिजिटल मीडिया के दुष्प्रभावों से बचाने के लिए पैरेंट्स को खुद भी त्याग करना होगा। उन्हें बच्चों के सामने फोन इस्तेमाल नही करना चाहिए क्योंकि बच्चा सब कुछ अपने पैरेंट्स को देखकर ही सीखता है, वह ज्यादा फोन चलाएंगे तो वह भी यही सीखेगा।

पैरेंट्स को बच्चों की तरफ हमेशा ध्यान देना चाहिए।

रोहित से दूसरा सवाल यह किया गया कि सोशल मीडिया एक आभासी दुनिया है। कई टीनएज लड़के लड़कियों के साथ हमने इसकी वजह से यौन शोषण के केस देखें हैं, कैसे हम इन बच्चों की समझ विकसित करें कि वह आभासी दुनिया के सही गलत का अनुमान खुद लगा सकें!

इस सवाल पर रोहित ने कहा कि पैरेंट्स का किरदार बच्चों के जीवन के साथ हमेशा ही जरूरी बने रहता है। उन्हें 'लालयेत् पञ्च वर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत्
प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत्' श्लोक के हिसाब से चलना चाहिए, जिसका अर्थ है सभी पैरेंट्स ने अपने बच्चों को पांच वर्ष तक बहुत प्रेम करना है, इसके बाद पंद्रह वर्ष तक बच्चों के व्यवहार पर पूरी नज़र रखनी है। वह कुछ गलत कर रहा है तो उसे तुरंत समझाना है, जहां उसके साथ गर्म होकर निपटना है, वहां गर्म होना चाहिए और जहां नरम होना हो वहां उसके साथ नरम होकर व्यवहार करना चाहिए।

इसके बाद सोलह साल से उनके साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार करना चाहिए, उससे ऐसा व्यवहार बनाए रखना है कि वह अपनी कोई भी बात अपने पैरेंट्स के साथ साझा कर सके। अगर ऐसा नही हो पाया तो वह बाहर के लोगों से अपनी समस्या कहेगा और ऐसा करते वह गलत रास्ते की तरफ जा सकता है।

जीत के साथ हार भी जीवन का हिस्सा।

बच्चों को उनके पैरेंट्स रियलिटी शो में भेजते हैं, हार का उनके मन में क्या असर पड़ता होगा? कैसे इससे बचा जा सकता है, सवाल पर रोहित कहते हैं जल्दी लोकप्रिय होने की चाहत में बच्चों को ऐसी जगह भेजा जाता है। यह रियलिटी शो एक कम्पटीशन है और पैरेंट्स द्वारा उनके बच्चों को यह सिखाया जाना चाहिए कि जीत के साथ हार भी जीवन का एक हिस्सा है। आजकल सोशल मीडिया ट्रोल का चलन भी बढ़ा है इसलिए बच्चों को नकारात्मक बातों से कैसे दूर रहें, यह सिखाना होगा।

बाजार में सब कुछ बिकता है- अमीरी, गरीबी, सादगी, अय्याशी, बच्चों की मासूमियत तक बिक रही है। बाजार हमेशा एक सा नही रहता और बाजार कल किसी और का भी हो सकता है।

 बच्चों को यह बताना होगा कि उनके अंदर जो स्किल है उस पर बेहतर काम करें। उन्हें किसी शॉर्ट कट की जगह मेहनत करना सिखाना होगा, यहां हम सचिन तेंदुलकर का उदाहरण दे सकते हैं। सचिन अपनी पढ़ाई के दौरान ही समझ गए थे कि मैं क्रिकेट में अपना कैरियर बना सकता हूं, फिर उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़कर क्रिकेट पर ध्यान दिया। आजकल के बच्चों को अपनी पढ़ाई और स्किल के बीच बैलेंस बनाना होगा।

अपनी योग्यता पर विश्वास रखना ही बच्चों की सफलता का राज़।

रोहित से हमने आखिरी सवाल पूछते आजकल रील्स बनाने के बढ़ते ट्रेंड का कारण जानना चाहा। इस पर रोहित गुप्ता कहते हैं कि बच्चे कपोल कल्पना करते हैं, वह किसी और को सोशल मीडिया पर स्टार बनते देखकर सोचते हैं कि मैं भी ऐसा कर सकता हूं और इसके बाद वह रील बनाते कितना भी बड़ा खतरा मोल ले लेते हैं।

पैरेंट्स को अपने बच्चों को बताना चाहिए कि आप अपनी योग्यता पर विश्वास रखो, फल देर से ही सही पर जरूर मिलेगा। उन्हें अपने बच्चों की हर एक एक्टिविटी पर ध्यान रखना चाहिए, हाल ही में ऑस्ट्रेलिया ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सोलह साल से कम उम्र के यूजर्स के लिए बैन लगाने का फैसला लिया है और भारत में भी बच्चों के स्मार्टफोन के बढ़ते प्रयोग की वजह से इस तरह के बैन लगाने की आवश्यकता है।

अपनी बात समाप्त करते रोहित गुप्ता ने कहा कि पैरेंट्स को प्रयास करना चाहिए कि डिनर पूरे परिवार का साथ बैठकर ही हो और उस समय किसी भी डिवाइस का प्रयोग न करते बच्चों की समस्याओं को सुना जाए। सम्भव हो सके तो पूरे परिवार को सप्ताह के अंत में एक बार साथ बैठकर बच्चों की हर जिज्ञासाओं को शांत करना चाहिए।

हिमांशु जोशी।

Thursday, November 14, 2024

कला और साहित्य का हिमालय को वरदान है महावीर।

हिमालयी राज्य उत्तराखंड के सुदूरवर्ती गांवों से सुमित्रानंदन पंत, शिवानी, मंगलेश डबराल, हिमांशु जोशी, शेखर जोशी जैसे हिंदी साहित्य के बड़े नाम आते रहे हैं, महावीर रवांल्टा भी उसी कड़ी को आगे बढ़ा रहे हैं। लेखन की वजह से अपने दुखों को भूलकर महावीर रवांल्टा ने रवांल्टी भाषा के लिए जो कार्य किए हैं, उनसे वह अपनी जन्मभूमि हिमालय का कद और भी बढ़ा रहे हैं। पौढ़ी के सिरोली गांव में महावीर रवांल्टा को इस महीने 'उमेश डोभाल स्मृति सम्मान' से भी सम्मानित किया जाएगा।

अस्कोट आराकोट यात्रा में जाना कि युवाओं में भी लोकप्रिय हैं महावीर।

अस्कोट आराकोट यात्रा के दौरान स्वील गांव से निकलते वक्त युवाओं के एक झुंड ने हमारा उस रात्रि का पड़ाव पूछा तो हमने उन्हें अपना रात्रि पड़ाव महरगांव बताया। सुनते ही उनमें से एक लड़का बोला रवांल्टी भाषा में लिखने वाले महावीर रवांल्टा वहीं रहते हैं, एक भाषा को बचाए रखने वाले शख्स की युवाओं में इतनी लोकप्रियता से प्रभावित होकर उनसे मिलने की बेसब्री मुझमें वहीं होने लगी थी।

शाम होते महरगांव पहुंचने पर महावीर रवांल्टा ने हम सभी यात्रियों का अपने घर में स्वागत किया था और अपने घर के आंगन में मंच बना कर उनका हमें बच्चों द्वारा किया जाने वाला एक नाटक दिखाने का विचार भी था, लेकिन बारिश की वजह से उस प्रोग्राम को रद्द करना पड़ा। हालांकि इस बीच अस्कोट आराकोट यात्रियों द्वारा उन्होंने अपनी किताब 'चल मेरी ढोलक ठुमक ठुमक' का विमोचन करवा लिया था।

यात्रा के अंतिम पड़ाव आराकोट पहुंचने पर उनसे फिर से भेट हुई और रात्रि में उनके साथ ही ठहर कर बातचीत का अवसर मिला।

दोस्त जेबख़र्च से खाना ख़रीदते तो पत्रिका खरीद कर पढ़ते थे महावीर।

महावीर रवांल्टा का जन्म 10 मई, 1966 को उत्तरकाशी जिले के सरनौल गांव में हुआ था, उनके पिता टीका सिंह राजस्व विभाग में कानूनगो और माता रूपदेई देवी गृहिणी थीं। तीन भाइयों और दो बहनों में दूसरे नम्बर के महावीर बचपन में ही महरगांव आ गए। गांव के विद्यालय में शनिवार को होने वाले कार्यक्रमों में कविता सुनाई जाती थी, वहां से महावीर का कविताओं को पढ़ने का शौक जागने लगा। नौवीं कक्षा में विद्यालय के पुस्तकालय में उन्होंने किताबें पढ़नी शुरू कर ली थी, उस दौरान वह पराग, नन्दन, धर्मयुग पत्रिकाएं पढ़ने लगे थे। महावीर के साथी अपने जेब खर्चे से खाना खाते थे तो वह उन पैसों से पत्रिकाएं खरीद लेते थे। कुछ समय बाद महावीर रवांल्टा अपने पिता के साथ उत्तरकाशी आ गए और वहां भी उन्होंने पढ़ने लिखना नही छोड़ा और गांधी वाचनालय जाने लगे। बारहवीं कक्षा में वह विज्ञान वर्ग के छात्र थे पर उनका रुझान वैज्ञानिकों में न होकर हिंदी लेखकों की तरफ था। उन्हें प्रेमचंद, शिवानी, हिमांशु जोशी को पढ़ना पसंद था।

लिखोगे तो कहीं न कहीं छपोगे ही।

बीएससी में एडमिशन लेने के बाद महावीर रवांल्टा पहले ही साल उसमें असफल हो गए क्योंकि उन दिनों वह लिखने में बहुत ज्यादा मशगूल हो गए थे। उन्होंने टिहरी से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक पत्र 'हिमालय और हम' के लिए पहला पत्र लिखा, इसके सम्पादक गोविंद प्रसाद गैरोला थे। साल 1983 में देहरादून से प्रकाशित होने वाली साप्ताहिक पत्र 'उत्तरांचल' के स्तम्भ 'साहित्य कला और संस्कृति' में उनकी पहली कविता 'बेरोजगार' प्रकाशित हुई। उत्तरांचल के सम्पादक सोमवारी लाल उनियाल 'प्रदीप' आजकल देहरादून में रहते हैं और वह खुद अच्छे कवि रहे हैं।
इन दोनों रचनाओं के प्रकाशित होने पर युवा हो रहे महावीर को लगने लगा कि लिखोगे तो कहीं न कहीं छपोगे ही।

इस बीच ही कुंवर बैचेन, कन्हैया लाल नन्दन, केशव अनुरागी, रमानाथ अवस्थी जैसे बड़े कवि उत्तरकाशी में होने वाले माघ मेले में कवि सम्मेलन के लिए पहुंचे, यह रात भर चलता था। उन्हें रात भर सुनते महावीर सोचते थे कि क्या कभी मैं भी कभी ऐसे मंच से अपनी रचनाओं को सुना पाऊंगा, इसके बाद उनके अंदर कविता लिखने की धुन सवार हो गई। इत्तेफाक से इस कवि सम्मेलन के संयोजक, पर्यावरण नियोजन और विकास के कवि घनश्याम रतूड़ी ने उन्हें कवि सम्मेलन में कविता पढ़ने का निमंत्रण दिया। वहां पर बड़े कवियों ने कविता सुनाने पर महावीर रवांल्टा की पीठ थपथपाई, उन्हें ईनाम में बीस रूपए का लिफाफा भी मिला। उन बीस रुपयों के बारे में महावीर कहते हैं कि वह लिफाफा मुझे ज्ञानपीठ पुरस्कार के समान लग रहा था, यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी। इसके बाद मुझे वहां कविता सुनाने का मौका फिर मिला और उससे मेरा हौंसला बढ़ता ही चला गया।

सुदूरवर्ती पहाड़ में 'हेमलेट' का चमत्कार।

इसके बाद महावीर रवांल्टा 'पराग' पत्रिका पढ़ते हुए कहानियों की तरफ आकर्षित होने लगे। इस बीच उनका उत्तरकाशी पॉलिटेक्निक में फॉर्मेसी के लिए चयन हो गया था। गांव जाने पर रामलीला देखते उन्हें नाटक करने का चस्का लगा। उन्होंने 'मुनारबन्दी' नाटक लिखा और उसमें निर्देशन के साथ अभिनय भी किया, यह नाटक साल 1930 में घटित हुए तिलाड़ी कांड पर केंद्रित था।
साल 1984-85 में उन्होंने 'रवांई जौनपुर विकास युवा मंच' बनाया, जिसमें क्षेत्र के अन्य लोग भी शामिल हुए। वहीं पॉलिटेक्निक में हुए वार्षिकोत्सव में उन्होंने दो नाटक करवाए, जिसमें उन्होंने निर्देशन और अभिनय किया। इस बीच सुवर्ण रावत के एनएसडी दिल्ली से लौटने पर उन्होंने अपने साथियों का सुवर्ण रावत से परिचय करवाया और उनके साथ उत्तरकाशी में 'काला मुंह' नाटक का मंचन किया। इस नाटक के बाद उन्होंने सुवर्ण रावत के साथ मिलकर 'कला दर्पण' की स्थापना की, कला दर्पण के माध्यम से उत्तरकाशी में वह लगातार नाटक करते रहे। इसमें बांसुरी बजती रही, हेमलेट जैसे नाटक थे। हेमलेट के मंचन के दौरान पंजाब के एक प्रोफेसर ने नाटक देखा और उन्होंने कला दर्पण की पूरी टीम की खूब तारीफ करते हुए कहा कि मुझे यह देख कर आश्चर्य हो रहा है कि आपने इतने सुदूरवर्ती पहाड़ी क्षेत्र में इतने शानदार नाटक का मंचन किया। मैंने अपने पूरे जीवन भर हेमलेट को पढ़ाया है पर उसके ऊपर ऐसा शानदार नाटक बनने की कल्पना तक कभी नही की।

साल 1987-88 में महावीर रवांल्टा ने एक नया प्रयोग करते हुए महरगांव में तीन चार दिन नाट्य शिविर आयोजित किए, इसमें गांव के लगभग चालीस बच्चे शामिल किए। उन्होंने गांव की समस्याओं को लेकर नाटक लिखे, जिससे लोगों में इन समस्याओं को लेकर कोई न कोई संदेश जाए। यह नाटक पौराणिक, समसामयिक, लोककथाओं से जुड़े होते थे।
शुरुआत में रामलीला के दौरान दिखाए जाने वाले नाटकों में महिलाओं का किरदार पुरुष ही करते थे, लेकिन महावीर रवांल्टा ने गांव की लड़कियों को ही महिला के किरदार देने शुरू किए। इस बीच ही उनका विवाह भी हो गया था।

उन दिनों की एक घटना का जिक्र करते महावीर रवांल्टा कहते हैं कि साल 1988 में चुनाव के दौरान किसी को चुनावी समर्थन देने की वजह से विपक्षी उनसे नाराज़ हो गए। उन लोगों ने गांव के मेले के दौरान हमारे नाटक का यह कहते हुए विरोध किया कि इससे गांव के मेले में व्यवधान आ रहा है। इसके बाद मैंने नाटकों का मंचन अपने घर के आंगन में शुरू करा दिया और उनसे पूछा कि अब तो आपके मेले में कोई व्यवधान नही आ रहा होगा!

'पगडण्डियों के सहारे' से प्रसिद्ध हुए महावीर।

नौकरी का नियुक्ति पत्र आने पर महावीर रवांल्टा को मुरादाबाद जाना पड़ा, फिर उनको अस्कोट भेज दिया गया। रंगमंच छूटने के दुख में उन्होंने फिर से लिखना शुरू किया।
साल 1992 में 'पगडण्डियों के सहारे' उनका पहला उपन्यास था, इस उपन्यास का विचार उन्हें बेरोजगारी के दिनों में घर रहते हुए ही आ गया था।
'पगडण्डियों के सहारे' तक्षशिला प्रकाशन से प्रकाशित होकर आया, उसकी खूब प्रतियां बिकी। इस उपन्यास के बारे में बात करते महावीर कहते हैं कि आज भी इतने सालों बाद लोग मुझसे कहते हैं कि हमने आपका 'पगडण्डियों के सहारे' उपन्यास पढ़ा है। हरिमोहन ने 8 अगस्त 1992 में 'पगडण्डियों के सहारे दूर तक जाने की ललक' शीर्षक से उनके इस उपन्यास की समीक्षा लिखी।
इसके बाद उनका दूसरा उपन्यास 'एक और लड़ाई लड़' भी तक्षशिला प्रकाशन से प्रकाशित हो गया।

इसके बाद महावीर कहानियां लिखने लगे, जो अमर उजाला, वागर्थ, उत्तरार्द्ध जैसी अलग अलग पत्र पत्रिकाओं में छपते रहीं। 'समय नही ठहरता' उनका पहला कहानी संग्रह था. इस बीच उनका ट्रांसफर बुलंदशहर हो गया था। साल 2003 में उनका उपन्यास 'अपना अपना आकाश' और कहानी संग्रह 'टुकड़ा टुकड़ा यथार्थ' प्रकाशित हुआ। अभी वह एक उपन्यास पर काम कर रहे हैं।

दुख के पहाड़ को झेल खुद पहाड़ से ऊंचे बने महावीर।

साल 2004 में महावीर रवांल्टा की इकलौती बेटी की मृत्यु हो गई थी, महावीर कहते हैं कि बेटी के जाने का दुख ऐसा था कि मुझे लगा मेरी दुनिया खत्म हो गई पर लेखन से ही मुझे जीने का हौंसला मिला। उसके जाने के कुछ समय बाद ही मेरा लघुकथा संग्रह 'त्रिशंकु' प्रकाशित हुआ, रचना धर्मिता की वजह से मुझे मेरा दुख सहने की हिम्मत मिली।

बेटी की मृत्यु के दुख में महावीर ने 'सपनों के साथ चेहरे' कविता संग्रह लिखा, इस कविता संग्रह को पढ़ने के बाद भारत भारद्वाज व अन्य लोगों ने उनसे कहा कि यह कविताएं निराला की 'सरोज स्मृति' की तरह बैचेन करने वाली कविता हैं।

'सीमा प्रहरी' पत्रिका के सम्पादन के लिए के लिए उन्हें पहला पुरस्कार मिला. सैनिक और उनके परिवेश विषय पर 'अक्षर भारत' समाचार पत्र में कहानी लिखने के लिए एक विज्ञप्ति निकली, समाचार पत्र के साहित्य सम्पादक अमर गोस्वामी थे। महावीर रवांल्टा ने इसके लिए 'अवरोहण' कहानी लिखी और इसके लिए उन्हें कानपुर में आयोजित एक समारोह में प्रसिद्ध कमेंटेटर पद्मश्री पुरस्कार प्राप्त जसदेव सिंह और परमवीर चक्र विजेता लेफ्टिनेंट कर्नल धन सिंह थापा की मौजूदगी में द्वितीय पुरस्कार मिला। इसके बाद उन्हें अन्य कई जगह आज तक सम्मानित किया जाता रहा है। सम्मान पर महावीर रवांल्टा कहते हैं कि सही उम्र में मिला सम्मान लेखकों के लिए संजीवनी का नाम करता है और लिखने का हौंसला देता है।

अपनी भाषा को पहचान दिलाने वाले महावीर से प्रेरणा लेते युवा।

दो से तीन दशक पहले रवांई के लोग अपनी भाषा रवांल्टी बोलने में झिझकते थे। हिंदी में स्थापित रचनाकार बनने के बाद महावीर रवांल्टा को लगा कि उन्हें अपनी भाषा बचाने और उसे लोकप्रिय करने के लिए प्रयास करना होगा। उन्होंने साल 1995 में पहली बार रवांल्टी में लिखने की कोशिश करते हुए एक कविता लिखी। यह कविता देहरादून से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र 'जन लहर' में हिंदी अनुवाद के साथ प्रकाशित हुई। इसके बाद साल 2003 से 2005 के बीच महावीर रवांल्टा के दो रवांल्टी कविता संग्रहों के 'बी मोहन नेगी' ने कविता पोस्टर बनाए, बी मोहन नेगी के बनाए हुए कविता पोस्टर विश्व प्रसिद्ध हैं।

साल 2010 में 'भाषा शोध एवं प्रकाशन केंद्र वडोदरा' ने डॉक्टर शेखर पाठक और उमा भट्ट से अपनी परियोजना 'भारतीय भाषा लोक सर्वेक्षण' पर काम करने के लिए सम्पर्क किया। उत्तराखंड की तेरह भाषाओं पर इस परियोजना के अंतर्गत काम किया गया, रवांल्टी भाषा पर काम करने के लिए शेखर पाठक ने महावीर रवांल्टा को जिम्मेदारी सौंपी।
इसके बाद उत्तराखंड भाषा संस्थान की तरफ से प्रोफेसर डीडी शर्मा के निर्देशन में उत्तराखंड की भाषाओं पर 'भाषाओं का सांस्कृतिक एवं भाषा वैज्ञानिक विवेचन' नाम से काम शुरू हुआ, उसके लिए भी महावीर रवांल्टा ने मन लगाकर काम किया और वह कार्य अभी प्रकाशित होने वाला है।

'पहाड़' संस्था ने भी उत्तराखंड की तेरह भाषाओं का शब्दकोश बनाया है, इसमें भी महावीर रवांल्टा ने रवांल्टी भाषा के शब्दों पर काम किया। हाल ही में उनकी 'चल मेरी ढोलक ठुमक ठुमक' नामक किताब प्रकाशित हुई है, जिसमें रवांल्टी लोक कथाओं को हिंदी भाषा में लिखा गया है। इन लोक कथाओं को महावीर अब रवांल्टी भाषा में लिख रहे हैं। चार उपन्यासों, पंद्रह कथा संग्रहों, पांच कविता संग्रहों व कई अन्य हिंदी व रवांल्टी भाषा की रचनाओं के साथ उनका रचनात्मक कार्य अनवरत जारी है।

महावीर रवांल्टा से प्रेरणा लेकर अब रवांई क्षेत्र के लगभग तीस युवा रवांल्टी भाषा में लिख रहे हैं। 'रवांल्टी कविता विशेषांक' में इनमें से कुछ युवाओं की कविताएं भी प्रकाशित हुई हैं।

हिमांशु जोशी।

Wednesday, November 13, 2024

माता पिता के लिए भी मोबाइल का त्याग जरूरी है।

कोरोना काल के बाद से बच्चों के हाथ में मोबाइल ज्यादा लंबे समय तक रहने लगा है। माता पिता भी अपनी व्यस्तता के बीच बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारी मोबाइल पर थोपते हुए उन्हें मोबाइल थमा देते हैं, जिसका बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव दिखने लगता है। बच्चे सोशल मीडिया पर अपनी पहचान बनाने चाहते हैं इस वजह से वह रील्स बनाते हैं और आजकल रील्स बनाते वह कई बार अपने भविष्य के साथ अपनी जान तक गंवा रहे हैं। बच्चों पर मोबाइल की वजह से पड़ रहे इन नकारात्मक प्रभावों और उसके समाधान को जानने के लिए हमने मेडिकल सोशल सर्विस ऑफिसर रोहित गुप्ता के साथ बातचीत की।

आजकल हम देखते हैं कि छोटे बच्चों को उनके अभिभावकों द्वारा व्यस्त रखने, खाना खिलाने के लिए मोबाइल पकड़ाया जाता है, किस मनोस्थिति की वजह से ये बच्चे मोबाइल की तरफ आकर्षित हो रहे हैं! इससे बच्चों को क्या नुकसान है और किस तरह उन्हें फोन से दूर रखा जा सकता है?

इस सवाल पर रोहित कहते हैं पैरंट्स और बच्चे दोनों इसके लिए जिम्मेदार हैं। वह सोचते हैं कि मैं अपने काम में व्यस्त हूं तो बच्चों को भी मोबाइल में व्यस्त रख लूं। बच्चे अगर व्यस्त रहेंगे तो हम भी अपना काम कर लेंगे।
इसकी वजह से बच्चों का अपने माता पिता की जगह लगाव मोबाइल की तरफ चले जाता है। बच्चा खाली मस्तिष्क के साथ पैदा हुआ है, वह इसी फोन को अपना सब कुछ मानने लगता है। पहले चार पांच महीने में ही फोन दिखाने की वजह से बच्चों को अपने आसपास के लोगों से मतलब नही रहता, वह फोन की दुनिया को ही सच मानने लगते हैं और इस वजह से वह वर्चुअल ऑटिज़्म की तरफ बढ़ने लगते हैं। वर्चुअल ऑटिज़्म, बच्चों में इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स का ज्यादा इस्तेमाल करने की वजह से होती है। इसकी वजह से बच्चों में बोलने, सीखने की क्षमता प्रभावित होने लगती है।

जब यह बच्चे बड़े होने लगता है तो वह लोगों से बातचीत करने के बजाए डिजिटल दुनिया को ही सही मानने लगते हैं, उनमें सामाजिकता जन्म नही ले पाती है। वयस्क होने पर अपने निजी जीवन में जब बच्चों को कोई दिक्कत आती है तो वह डिजिटल दुनिया में ही अपना समाधान खोजने लगते है। इस वजह से ही आजकल के बच्चे आत्महत्या जैसा कठोर कदम उठाने लगे हैं, पिछले महीने हमने अमेरिका में देखा कि एक चौदह साल के लड़के ने एआई गर्लफ्रैंड की वजह से आत्महत्या कर ली थी। बच्चों को डिजिटल मीडिया के दुष्प्रभावों से बचाने के लिए माता पिता को खुद त्याग करना होगा। उन्हें बच्चों के सामने फोन इस्तेमाल नही करना चाहिए क्योंकि बच्चा सब कुछ अपने माता पिता को देखकर ही सीखता है।

बच्चों पर लगातार नज़र बनाए रखना जरूरी है।

रोहित से दूसरा सवाल किया गया कि सोशल मीडिया एक आभासी दुनिया है, कई टीनएज लड़के लड़कियों के साथ हमने इसकी वजह से यौन शोषण के केस देखें हैं, कैसे हम इन बच्चों की समझ विकसित करें कि वह आभासी दुनिया के सही गलत का अनुमान खुद लगा सकें!

इस सवाल पर रोहित ने कहा कि माता पिता का किरदार बच्चों के जीवन के साथ हमेशा बने रहता है। उन्हें 'लालयेत् पञ्च वर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत्
प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत् ' श्लोक के हिसाब से चलना चाहिए, जिसका अर्थ है बच्चों को पांच वर्ष तक बहुत प्रेम करना है, इसके बाद पंद्रह वर्ष तक बच्चों के व्यवहार पर पूरी नज़र रखनी है। वह कुछ गलत कर रहा है तो उसे तुरंत समझाना है, जहां उसके साथ गर्म होकर निपटना है वहां गर्म होना चाहिए और जहां नरम होना हो वहां उसके साथ नरम होकर व्यवहार करना चाहिए। इसके बाद सोलह साल से उनके साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार करना चाहिए, उससे ऐसा व्यवहार बनाए रखना है कि वह अपनी कोई भी बात अपने माता पिता के साथ साझा कर सके। अगर ऐसा नही हो पाया तो वह बाहर के लोगों से अपनी समस्या कहेगा और ऐसा करते वह गलत रास्ते की तरफ जा सकता है।

अपने स्किल्स पर काम करते सफलता प्राप्त की जा सकती है।

बच्चों को माता पिता रियलिटी शो में भेजते हैं, हार का उनके मन में क्या असर पड़ता होगा? कैसे इससे बचा जा सकता है, सवाल पर रोहित ने कहा कि जल्दी लोकप्रिय करने की चाहत में बच्चों को ऐसी जगह भेजा जाता है। यह रियलिटी शो एक कम्पटीशन है और बच्चों को सिखाया जाना चाहिए कि जीत के साथ हार भी जीवन का एक हिस्सा है, आजकल सोशल मीडिया ट्रोल का चलन भी बढ़ा है तो बच्चों को नकारात्मक बातों से दूर रहने की सलाह भी दी जानी चाहिए।

बाजार में सब कुछ बिकता है- अमीरी, गरीबी, सादगी, अय्याशी, बच्चों की मासूमियत तक बिक रही है। बाजार हमेशा एक सा नही रहता और बाजार कल किसी और का भी हो सकता है।
इसलिए बच्चों को यह बताना होगा कि आपके अंदर जो स्किल है उस पर बेहतर काम करो। उन्हें किसी शॉर्ट कट की जगह मेहनत करना सिखाना होगा, यहां हम सचिन तेंदुलकर का उदाहरण दे सकते हैं। उन्हें पढ़ाई के दौरान पहचान आ गया था कि मैं क्रिकेट में कैरियर बना सकता हूं, इसके बाद ही उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ी। हमें अपनी पढ़ाई और स्किल के बीच बैलेंस बनाना होगा।

बच्चों के साथ वक्त बिताएं माता पिता।

रोहित से हमारा आखिरी सवाल आजकल रील्स बनाने के ट्रेंड की वजह को लेकर था। 
रोहित ने इस पर कहा कि बच्चे कपोल कल्पना करते हैं, वह किसी और को सोशल मीडिया पर स्टार बनते देखकर सोचते हैं कि मैं भी ऐसा कर सकता हूं। यहां माता पिता को अपने बच्चों को बताना चाहिए कि आप अपनी योग्यता पर विश्वास रखो, फल देर से ही सही पर जरूर मिलेगा। उन्हें अपने बच्चों की हर एक्टिविटी पर ध्यान रखना चाहिए, टीनएज द्वारा स्कूलों में मोबाइल ले जाने की प्रथा को रोकना होगा। माता पिता को चाहिए कि डिनर पूरे परिवार का साथ बैठकर हो और उस समय किसी भी डिवाइस का प्रयोग न करते बच्चों की समस्या को सुना जाए। सम्भव हो सके तो पूरे परिवार को सप्ताह के अंत में एक बार साथ बैठकर बच्चों की जिज्ञासाओं को शांत करना चाहिए।

हिमांशु जोशी।

Saturday, November 9, 2024

कैसा है आज हमारे सपनों का उत्तराखंड!

उत्तराखंड ने आज अपनी स्थापना के चौबीस वर्ष पूरे कर लिए। लंबे आंदोलन के बाद बने इस राज्य को जैसा हमने सोचा था क्या यह वैसा ही बना! इस सवाल पर हमने उत्तराखंड के जल, जीवन, जंगल की चिंता करने वाले कुछ लोगों से बातचीत की।

जैसा सोचा वैसा तो बिल्कुल नही बना उत्तराखंड।

वरिष्ठ पत्रकार गोविंद पंत राजू से हमने सवाल पूछा कि क्या यह उत्तराखंड वही है, जैसा हमने सोचा था। इस पर वह कहते हैं नहीं कतई नहीं। हमें जो राज्य मिला वह एक पृथक प्रदेश अवश्य है लेकिन हमने ऐसे राज्य के सपने नहीं देखे थे। पृथक पर्वतीय राज्य के सपने पर्वतीय आकांक्षाओं के सपने थे, पर्वतीय सामाजिक परिवेश, संस्कृति और परिस्थितियों से उपजी समस्याओं के समाधान के सपने थे। उन सपनों में आम पर्वतीय इंसान के कष्टों के निवारण की बात थी, उसकी तरक्की की बात थी, उसकी बेहतरी की बात थी। बेहतर शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य और बेहतर जीवन स्तर के साथ-साथ हरे-भरे और पर्यावरण अनुकूल विकास योजनाओं वाले उत्तराखंड की बात थी। उस सपने में राज्य के समस्त निवासियों के बीच भाईचारे और एक दूसरे के कष्टों में बढ़ चढ़कर शामिल होने की बात भी थी तथा मेलों ठेलों, उत्सवों एवं खेती पाती में परंपरागत सामूहिकता के विकास की बात भी थी। चिंतन मनन के साथ बौद्धिक, राजनीतिक और जमीनी आंदोलन के लंबे संघर्षों के बाद राज्य के रूप में उत्तराखंड की जनता को जो मिला, दुर्भाग्य से वह यहां की जनता के सपनों के एकदम विपरीत हमें हमारे पर्यावरण और पारिस्थितिकी के खिलाफ चलाई जाने वाली हमलावर विकास योजनाएं मिली। इस राज्य ने उत्तराखंड के आम आदमी की संघर्ष क्षमता को कुंद किया, उसको दलाल और भ्रष्ट बनने की दिशा में आगे बढ़ाने का काम किया और अपनी संस्कृति तथा परंपराओं को बाजार के हवाले करने के लिए मजबूर कर दिया। पच्चीस साल में पहुंचे इस राज्य के पास आज न अपनी संस्कृति बची है न अपनी परंपरागत कृषि विशेषज्ञता बची है न अपना पर्यावरण संरक्षित बचा है। न उसकी नदियां सुरक्षित हैं न उसके गांव सुरक्षित हैं और न ही उसका आम आदमी सुरक्षित है। बेरोजगारी, खराब स्वास्थ्य सेवाएं और तार तार होती शिक्षा व्यवस्था आज के उत्तराखंड का सबसे बड़ा सच है। ऐसे उत्तराखंड का सपना तो किसी ने भी नहीं देखा था।

चौबीस साल फिर भी खाली हाथ हैं हम।

इस साल ही पत्रकारिता में प्रतिष्ठित पुरस्कार पण्डित भैरव दत्त धूलिया पत्रकार पुरस्कार प्राप्त नैनीताल समाचार के सम्पादक राजीव लोचन साह को पत्रकारिता का लगभग पांच दशकों का अनुभव है। उत्तराखंड की वर्तमान स्थिति पर वह कहते हैं कि मैदानी प्रदेश के साथ लगा पर्वतीय हिस्सा ठीक से विकास नही कर पा रहा था इसलिए पृथक राज्य की मांग उठी। चालीस पचास साल तक लगातार कोशिश हुई कि यह राज्य बने लेकिन इसका चरम आया साल 1994 में, जब उत्तराखंड की सारी जनता सड़क पर उतर आई थी। उनकी मांगे ज्यादा बड़ी नही थी, वह यही थी कि यहां जिंदगी शांत हो, शराब का ज्यादा प्रभाव न हो, रोजगार हो, किसानी पनपे, गैरसैंण राजधानी हो, भू कानून बने।
लेकिन इन चौबीस सालों में हमें इसमें से कुछ भी नही मिला, प्रदेश की खेती नष्ट हो रही है, भू कानून अब तक लागू नही हुआ, गर्भवती सड़क में प्रसव कर रही हैं, गैरसैंण अब तक राजधानी नही बनी, बेरोजगारी बढ़ रही है। प्रदेश की छवि साम्प्रदायिक रुप से तनावग्रस्त प्रदेश की हो गई है, लव जिहाद और लैंड जिहाद जैसे शब्दों का प्रयोग कर सामाजिक समरसता खत्म की जा रही है। उत्तराखंड की जनता को इन्हीं मूल प्रश्नों पर फिर से केंद्रित होना होगा।

 सरकार साथ दे तो आगे बढ़ सकते हैं युवा।

उत्तराखंड की वर्तमान स्थिति पर सबसे पहले हमने चंदन डांगी के साथ विस्तार से बातचीत की। चंदन डांगी उत्तराखंड के भौगोलिक और सामाजिक बदलावों पर साल 1974 से हर दस सालों में पैदल चलकर ही जानकारी जुटाने वाली लगभग 1200 किलोमीटर लंबी अस्कोट आराकोट यात्रा में तीन बार शामिल हुए हैं। वह कहते हैं हाल ही में उत्तराखंड में उद्यमिता से जुड़े अनेक सफल प्रयोग हुए हैं, जैसे मुनस्यारी में महिलाओं द्वारा संचालित सरमोली होम स्टे, उत्तरकाशी के नौगांव में टमाटर की खेती और इसी के ऊपरी इलाकों में सेब की बागवानी। हिमाचल प्रदेश से तुलना की जाए तो यह पैदावार और आमदनी अब भी कम है और उत्तराखंड में वहां से ज्यादा मेहनत और जोखिम है।

उत्तराखंड में जलवायु परिवर्तन से सामने आ रहे बदलावों पर चंदन ने आगे बताया कि साल 2004 की अस्कोट आराकोट यात्रा के दौरान, जब हम जड़ी बूटी शोध एवं विकास संस्थान, मण्डल, गोपेश्वर से चोपता की तरफ बढ़े तो हमें कांचुला खरक कस्तूरी मृग परियोजना देखने को मिली थी। हमें बताया गया था कि यहां अभी लगभग 18 कस्तूरी मृग हैं और एक दर्जन कस्तूरी मृग हमें वहां दिखे भी थे। साल 2014 में जब हम उस जगह पर फिर से गए तो वहां कुछ भी नही बचा था।
पिछले 20 सालों के दौरान भुलकन बड़े कंक्रीट जंगल में बदल गया है, उन्हें समझ नही आता कि पर्यावरण को लेकर इतनी संवेदनशील जगह में कैसे डीजल से चलने वाले बिजली संयंत्र के निर्माण को मंजूरी मिल गई होगी जबकि सालों पहले चोपता में ही होने वाले एक निर्माण कार्य को इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के बाद रोक दिया गया था।

उत्तराखंड की महिलाओं पर औद्योगिक क्षेत्र में लगभग चार दशकों का अनुभव प्राप्त चंदन कहते हैं कि उत्तराखंड की महिलाओं के सर और पीठ के बोझ को कम करने में दुनिया भर के डिजाइन क्षेत्र में प्राप्त उपलब्धियों का लाभ कतई नहीं मिला है। पेड के जमाने में भी पीरियड के दौरान आज भी उत्तराखंड के अनेक गावों की महिलाएं, घर से अलग रहने के लिए बाध्य हैं। यही स्थिति यात्रा के दौरान हमने जातियों को लेकर होने वाले भेदभाव की भी देखी, जिसे आधुनिकता के साथ समाप्त हो जाना चाहिए था।

चंदन डांगी अस्कोट आराकोट यात्रा के अनुभवों से आज के उत्तराखंड पर बात करते आगे कहते हैं कि कोरोना काल के दौरान उत्तराखंड के युवाओं ने प्रदेश में वापस लौट कर स्वरोजगार के कई प्रयोग किए हैं, उदाहरण के लिए बागेश्वर जिले में कीवी का उत्पादन बढ़ा है।
हिमालय के गांवों में कोदा, मडुवा, झंगोरा जैसे मिलेट उगाए जा रहे है, इनकी माँग देशभर में बहुत अधिक है लेकिन बड़े व्यापारी किसानों से पूरी फ़सल बहुत ही सस्ते दामों में खरीद रहे हैं। पहाड़ का उद्यमी कम संसाधनों के कारण पिछड़ जाता है क्योंकि उसके पास भंडारण, पैकेजिंग और उचित मार्केटिंग का सपोर्ट नहीं है।
कीड़ा जड़ी की खोज में लोग उसको ढूंढने के लिए जान का जोख़िम उठा रहे हैं, किंतु इसका क्या बनता है, कैसे बनता है, तैयार उत्पाद कहां बिकते हैं, इसकी जानकारी उन्हें नहीं है। सरकार यदि युवाओं के लिए उनके उत्पाद आसानी से बिकने के मार्ग खोले और पहाड़ में खेती के विकास को लेकर गंभीर हो तो इन युवाओं को आगे बढ़ने से कोई नही रोक सकता।

लड़कियों के शिक्षा के स्तर में हुआ है सुधार।

चंद्रा भंडारी महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए केंद्र सरकार द्वारा चलाए गए बेहद महत्वपूर्ण रहे कार्यक्रम, महिला समाख्या कार्यक्रम से लंबे समय तक जुड़ी रहीं और उन्होंने उत्तराखंड में महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए काफी महत्वपूर्ण कार्य किए थे। इस साल उन्होंने साल 2004 के बाद दूसरी बाद अस्कोट आराकोट यात्रा की. चंद्रा कहती हैं जिस कल्पना के साथ उत्तराखंड राज्य का निर्माण किया गया था, वह आज राज्य बनने के चौबीस साल पूरे होने के बाद आज भी कल्पना ही है। इसमें राज्य के जल, जंगल, जमीन को बचाना शामिल था और साथ ही राज्य से पलायन रोकने के साथ महिला हिंसा को रोकने की कल्पना की गई थी। वह कहती हैं कि अस्कोट आराकोट यात्रा के दौरान उन्होंने राज्य में लड़कियों की शिक्षा के स्तर में विकास देखा है। साल 2004 में यात्रा करते हमने देखा था कि पहाड़ों में लड़कियां ज्यादा नही पढ़ती थी और कक्षा तीन चार के बाद स्कूल छोड़ देती थी लेकिन इस बार हमने कई जगह देखा कि लड़कियां घरों में खेती का काम भी करती हैं और साथ ही स्कूल भी जाती हैं, उच्च शिक्षा के लिए भी माता पिता अब अपनी लड़कियों को देहरादून, दिल्ली, हल्द्वानी जैसे शहरों में भेजने लगे हैं।

हमें हिमाचल प्रदेश से सीख लेनी चाहिए थी.

इतिहास के सेवानिवृत्त प्रोफेसर अनिल जोशी उत्तराखंड के गठन से लेकर वर्तमान हालातों पर कहते हैं कि जब उत्तराखंड राज्य का आंदोलन चरम पर था तब मैं उन चंद लोगों में था जो तत्काल राज्य बनने के पक्ष में नहीं थे। मेरा मानना ये था कि हिमाचल की तर्ज़ में पहले कुछ वर्षों के लिए केंद्र शासित प्रदेश का दर्ज़ा मिले तो बेहतर होगा। केन्द्र की योजनाओं का तथा वहां से मिलने वाले अनुदानों का भरपूर उपभोग करके इन्फ्रास्ट्रक्चर को मज़बूत करने के बाद यदि राज्य बनता तो विकास की एक योजना बनी होती और राज्य के पास एक मज़बूत ढांचा पहले से मौजूद रहता, साथ ही तक स्थानीय नेतृत्व भी विकसित हो जाता। लेकिन अफ़सोस ऐसा नहीं हुआ, आंदोलनकारियों और सरकार दोनों को ही राज्य बनाने की जल्दी थी।
बिना व्यापक तैयारी के पृथक राज्य की घोषणा तो हो गई मगर धरातल पर तो कुछ था ही नहीं। राज्य ऐसे लोग चला रहे थे जिनको राज्य की परिकल्पना से कुछ लेना देना नही था और ना हीं यहां की परिस्थिति के अनुरूप विकास से उन्हें मतलब था, अब नतीजा सबके सामने है। पच्चीस साल होने को आए लेकिन कोई भी सरकार सही से राज्य की प्राथमिकताएं तय नहीं कर पाई है।
सतत विकास किसे कहते हैं यही बुनियादी सवाल जस का तस खड़ा है।
यहां हमें हिमाचल प्रदेश से सीख लेनी चाहिए थी, उनके पहले मुख्यमंत्री डॉक्टर यशवंत सिंह परमार उच्च कोटि के विद्वान थे और अपने पर्वतीय राज्य की भौगोलिक विशेषताओं और विषमताओं दोनों से भली भांति अवगत थे और वे लंबे समय तक पद पर रहे। जिससे वह हिमाचल में विकास के मॉडल को अमलीजामा पहना सके। उनके उत्तराधिकारियों ने उनके विज़न को ही आगे बढ़ाया चाहे सरकार किसी भी पार्टी की हो।

हिमांशु जोशी।

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