Sunday, October 31, 2021

योंही जल बहता जाता है.


सूखते हलक को तर कर जाता है,
मुरझाए पौधों को फिर खिला जाता है,
योंही जल बहता जाता है.

शांत सा दिखने वाला ये नीर होली के रंगों में मिल कई रंग दिखा जाता है,
नृत्य करती नदियों से निरंतर बहता अंत में समुद्र का हो जाता है,
प्रकृति विनाशकों के सारे पाप खुद में समेट बस बहता जाता है.

शूल बनकर उसमें चुभता जब इंसानी कृत्य है अपनी यशोधरा पर प्रहार वो सह नही पाता है,
कभी आफ़त बनकर बरसता है तो कभी रौद्र रूप ले जल लावन हो जाता है.

किनारे नदी का नही खुद नदी अपना रास्ता तय करती है,
अपनी छाती पर बने इस कंक्रीट के जाल से हर वक्त जूझती जाती है,
खुद में बहा दी गई तेज़ाब को फिर वापस उड़ेलने बेताब नज़र आती है.

बहने दो अविरल इसे, तभी जल सही अक्स तुम्हारा दिखाता है.
योंही जल बहता जाता है.

हिमांशु जगतनिवासी.

Saturday, October 30, 2021

इस दीवाली घर की लक्ष्मी पर ही बात हो जाए : 'पुरुषवादी मानसिकता' आख़िर कब तक!

इसमें उसकी रज़ामन्दी नही थी फ़िर भी मैंने उसे छू लिया! क्यों, क्योंकि मुझे स्वयं ही आत्मबोध हुआ कि वो तैयार है, क्यों बन गए हम इस तरह. 
शायद हमारे विचारों के बीज ही इस तरह के बोए गए हैं. पढ़िए इस चिंतन को.

पुरुषवादी समाज में जन्म ले हमारे विचार भी उसी तरह के बन गए, पर इस असमानता से अब मेरा मन उचटने लगा है. जाति,धर्म के रूप में घर के बाहर बंटना शुरू हुआ समाज घर के अंदर पुरुष-महिलाओं के बीच विभाजित हो जाता है. 
घर के मर्दों को मां,पत्नी,बेटी,बहन,बहुओं के घर में होने पर खुद की खाना खाई हुई थाली भारी लगती है, भारतीय समाज की चादर पर ऐसे बहुत से छेद हैं, जिनके आर-पार देखना बहुत जरूरी है.

एक घटना जहां से मैं हिल गया

विनोबा, विमला ताई, सुन्दरलाल बहुगुणा जैसों का सानिध्य पाए अनिरुद्ध जडेजा से अल्मोड़ा में जब मेरी पहली मुलाकात हुई थी तब घर में वह अकेले थे, पुरूषप्रधान समाज में जब दो पुरुष साथ भोजन प्राप्त करते हैं तो अक्सर खुद ही अपने बर्तन धोते हैं.
हमारी दूसरी मुलाकात के दौरान रात्रि भोजन अनिरुद्ध की पत्नी और बेटी के साथ किया गया था, बर्तन धोने की बारी आई तो मेरे हाथ खुद के खाए बर्तन धोने से दो बार रुके और मेरे अंदर का पौरुष बाहर निकलने लगा था. अंत में वो बर्तन मैंने घर की महिलाओं के भरोसे छोड़ दिए.
 रह-रह कर मुझे वह बात याद आती है. मेरे मन में तब तरह-तरह के विचार दौड़ रहे थे, क्या मुझे यह बर्तन धोने चाहिए थे, क्या सर्वोदय से जुड़े लोग अपने बर्तन हमेशा खुद ही धोते होंगे, क्या मुझे पुरुष होने का घमंड रहा है, स्वयं महात्मा गांधी जब ऐसी स्थिति में होते होंगे तब वो क्या करते होंगे!

पुरुषवादी समाज 

समाज का तानाबाना ही कुछ इस तरह बुन दिया गया है कि पुरुषों को अधिकतर जगह वरीयता दी जाती है.
हमारे पुरुषप्रधान समाज में अभी कुछ दिन पहले करवाचौथ मनाया गया, महिलाएं अपने पतियों की लंबी उम्र के लिए करवाचौथ व्रत रखती हैं और रात होने पर अपने पति के हाथ से पानी पी अपना व्रत तोड़ती हैं. इस समाज में पुरुष द्वारा अपनी पत्नियों की लंबी उम्र की कामना के लिए शायद ही इस तरह का कोई व्रत रखा जाता है. 
पूरी दुनिया में जितने भी धर्मों को इंसान मानता है, उसमें से अधिकतर धर्मों के ग्रन्थों में महिलाओं को उचित स्थान तो दिया गया है पर उन ग्रन्थों में लिखी परिभाषा धर्म के ठेकेदारों द्वारा अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए अलग-अलग तरह से परिभाषित कर दी गई. 

कहीं महिलाओं को लिबास में जकड़ दिया गया तो कहीं महिलाओं को अछूत मान लिया गया और जो खुद को ऊंची सोच का बताते थे उस समाज ने महिलाओं को गुड़िया की तरह सजा-धजा घर की चौखट पर जिस्म की नुमाइश करने खड़ा कर दिया. 

सत्ता में महिलाओं की भागीदारी ने कितनी स्थिति बदली!

कहा जाता है कि सत्ता में महिलाओं की भागीदारी देश में महिलाओं की स्थिति बदल सकती है. इंदिरा गांधी देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री बनी थी उसके सालों बाद भी आज तक महिलाओं की स्थिति में कोई खास सुधार नही देखा गया है, पुरुष क्या महिलाएं भी इस पुरुषवादी समाज को बनाए रखने में बराबर की जिम्मेदार है. एक महिला बहु से सास बन जाती है तो वह यही चाहती है कि उसकी बहु लड़का जने.
सत्ता के शीर्ष पद में से एक राज्यपाल तक पहुंची उत्तराखंड की पूर्व राज्यपाल बेबी रानी मौर्य के एक बयान से हम समझ सकते हैं कि सत्ता के शीर्ष पद की महिलाएं भी लड़कों को नसीहत देने से बेहतर लड़कियों को पर्दे में छुपाना बेहतर समझती हैं.

एक जगह उन्होंने कहा था कि थाने में महिला अधिकारी और सब इंस्पेक्टर जरूर बैठती हैं, लेकिन एक बात मैं जरूर कहूंगी कि 5 बजे के बाद और अंधेरा होने के बाद थाने कभी मत जाना. फिर अगले दिन सुबह जाना और अगर जरूरी हो तो अपने साथ अपने भाई, पति या पिता को लेकर ही थाने जाना. 

तो क्या पूर्व राज्यपाल के पास थाने के पुरुष कर्मचारियों के लिए कोई सुझाव नही था?
 
भारत में अब भी महिलाओं की बुरी स्थिति

अब भी बाल विवाह-
एबीपी न्यूज़ की एक ख़बर के अनुसार केरल सरकार की रिपोर्ट में कड़वा सच सामने आया है, 
4.37 फीसदी मां बनने वाली महिलाएं 2019 के दौरान 15-19 की आयु ग्रप में शामिल थीं. 19 वर्ष तक उनमें से कुछ ने या तो दूसरे बच्चे को जन्म दिया या तीसरी संतान को पैदा किया. राज्य सरकार की रिपोर्ट महिला सशक्तिकरण और शिक्षा के बावजूद बाल विवाह की घटना के स्पष्ट संकेत को दर्शाती है. आर्थिक और सांख्यिकी विभाग ने सितंबर में रिपोर्ट जारी की थी.

महिलाओं के प्रति अपराध-
महिलाओं के प्रति अपराध दिन-प्रतिदिन बढ़ते ही जा रहे हैं, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2020 में महिलाओं के प्रति हुए अपराधों में कमी तो आई है पर साइबर क्राइम में बढ़ोत्तरी हुई है, कोरोना में लगे लॉकडाउन को इसका कारण माना जा सकता है.


●सिंगल मदर की समस्या-
भारत में तलाक या पति की मृत्यु के बाद अकेले रहने वाली महिलाओं के सामने बच्चें होने पर बड़ी समस्या खड़ी हो जाती है. यदि ऐसी महिलाएं किसी रोज़गार से जुड़ी होती हैं तो उनके कार्यक्षेत्र में साथी कर्मचारियों का व्यवहार उनके साथ ठीक नही रहता और जो महिलाएं किसी रोज़गार से नही जुड़ी होती उनके सामने तो और भी बुरी स्थिति रहती है, वह महिलाएं अपने और बच्चे के पालन-पोषण के लिए किसी दूसरे पुरुष पर निर्भर हो जाती हैं और घरेलू हिंसा का शिकार बनती हैं. भारत में सिंगल मदर के लिए किसी प्रकार की बड़ी योजना का न होना इन महिलाओं के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है.

विधवा पुर्नविवाह-
सन् 1857 की क्रांति तो सबको याद होगी पर गुलाम भारत में सन् 1856 में भी एक क्रांति हुई थी जिसे भारत का समाज शायद याद नही रखना चाहता. श्री ईश्वरचन्द्र विद्यागर के प्रयत्नों से पास हुए सन् 1856 के हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम से विधवा विवाह को वैध घोषित कर दिया गया था पर दुख की बात यह है कि इस विषय में पूरे भारतवर्ष में ना तब बात की गई थी ना अब की जाती है. आज भारत में ऐसी लाखों विधवा महिलाएं हैं जिनके पुनर्विवाह में सामाजिक सोच बाधा बनी हुई है.
वह महिलाएं सामाजिक रूप से तिरस्कृत रहते हुए एकांकी जीवन जीने पर मजबूर हैं.

 महिला सशक्तिकरण के उपाय..

●लड़कियां तो काम के लिए बनी है
महिला कमज़ोर होती हैं, महिला काम के लिए ही बनी हैं यह विचार हम भारतीयों के मन में बचपन से ठूस दिए जाते हैं. छोटे भाई-बहनों के बीच लड़कों से काम नही कराया जाता और लड़कियों को काम सिखाया जाता है. थोड़ा बड़ा होने पर माता-पिता अपनी लड़कियों को सिखाने लगते हैं कि भाई के लिए खाना लगा, उसको पानी पिला. बस यही शुरुआत होती है जब लड़का पौरुष को श्रेष्ठ मानने लगता है, उसका मन मान लेता है कि लड़कियां लड़कों से कमज़ोर होती हैं और यही धारणा वह घर के बाहर की महिलाओं पर भी बना लेता है.
उसके द्वारा स्त्री को खुद से कमज़ोर मान लिया जाता है, वह उन पर अपराध करने से हिचकता नही है.
 प्राथमिक पाठशाला से ही अगर लड़के-लड़की के बीच भेद को न सिखाया जाए तो स्त्री-पुरुष को बराबरी प्रदान करने वाले समाज की नींव रखी जा सकती है.

●लड़ना सिखाना
महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों में हमने क्रूरता की हदें पार होते देखी है. दामिनी वाली घटना तो बड़ी बन गई पर हर लड़की की किस्मत ऐसी नही की उसे न्याय मिल ही जाए. कोर्ट का रुख करने वाली लड़कियों के प्रति अपराधों में भी इज़ाफ़ा हुआ है तो देहरादून में लड़की का गला रेत छात्र कोर्ट पहुंच कर कहता है कि मैंने मर्डर कर दिया. 
कुदरत ने महिलाओं को नाखून दिए हैं उसका प्रयोग करते महिलाओं को गुथमगुथा की लड़ाई लड़ने के पैंतरे आने चाहिए. लड़कियों को बचपन से कृपाण धारण करना सीखना चाहिए, यह उनकी आत्मरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है.
महिलाओं को मानसिक रूप से भी मज़बूत होना चाहिए, भावुक हो वो किसी के सामने रो देती हैं तो इसे उनकी कमज़ोरी मान लिया जाता है और यह कुदरत का नियम रहा है कि कमज़ोर का शोषण किया जाता है.

●सौंदर्यता का प्रदर्शन पर सम्भल कर
बॉलीवुड की अधिकतर फिल्में हों या टेलीविज़न पर आने वाले विज्ञापन, महिलाओं को हमेशा एक उत्पाद की तरह पेश किया गया है. उनके गोरे-काले रंग पर विज्ञापन बनाया जाता है, उनकी लम्बाई पर गाने लिखे जाते हैं पर दुख की बात यह है कि एक महिला ही कुछ पैसों के लिए उन विज्ञापन-फिल्मों में काम करती हैं.
हां महिलाओं की शारीरिक रचना इस प्रकार की है वह श्रृंगार कर सुंदर लगती हैं पर उन्हें ब्यूटी प्रोडक्ट की छवि से बाहर आना होगा उन्हें अपनी सुंदरता नही, अपनी बुद्धिमत्ता से समाज में छाने की तैयारी करनी होगी, बहुत सी महिलाएं अपने-अपने क्षेत्र में पुरुषों से आगे हो नाम कमा भी रही हैं.
कपड़ों के साइज़ को लेकर विवाद रहता है तो इसका उत्तर मैं पहले ही दे चुका हूं, यदि पुरुष समान सोच वाला बन जाएगा तो कपड़ों का साइज महत्व नही रखेगा. कौन क्या पहनता है यह अपने आराम को देखते हुए निजी फ़ैसला होना चाहिए. पोर्नोग्राफी भी एक महत्त्वपूर्ण विषय है, भारत सरकार समय-समय पर इनमें प्रतिबंध लगाने के असफ़ल प्रयास करती रही है. पोर्न का महत्व सीखने तक होना चाहिए, यदि सेक्स एजुकेशन को भी समान रूप से वरीयता दी जाएगी तो यह रहस्य नही रहेगा.

●तलाक से डरना
भारतीय समाज में तलाक को एक बुरा शब्द माना गया है, तलाकशुदा महिलाओं को सामाजिक रूप से असफ़ल मान लिया जाता है.
तलाक होने के डर से बहुत सी महिलाएं अपनी शादी से खुश न रहते हुए भी रिश्ता निभाती जाती हैं और अपने जीवन की अहमियत भूल जाती हैं.
 क्रिकेटर शिखर धवन से तलाक होने के बाद उनकी पूर्व पत्नी आयशा ने इंस्टाग्राम में तलाक को लेकर एक पोस्ट की थी, जिसे पढ़ना जरूर चाहिए.

●विधवाओं के प्रति विचार
 भारतीय युवाओं के कपड़े तो पश्चिमी हो गए पर उनके विचार अब भी शताब्दियों पीछे चल रहे हैं, विधवाओं से विवाह पर भारत में अब भी एक मानसिक बाधा बनी हुई है.
विधवा महिला यदि समझदार, शिक्षित है तो यह कहीं नही लिखा है कि वह अच्छी जीवनसंगिनी नही बन सकती. यदि हम ऐसी विधवा महिला की बात करें जिसकी कोई संतान है तो परिवार नियोजन के इस जमाने में वह महिला विवाह के लिये सबसे उपयुक्त है.

क्या स्थिति ऐसी ही रहेगी

कहने को हम महिलाओं को घर की लक्ष्मी पदवी से नवाज़ते हैं पर हमने महिलाओं को सुरक्षा देने एवं उनके लिए बेहतर भविष्य की दुनिया बनाने के लिए क्या कभी माहौल बनाया! यहां हम मतलब पुरुषों से बिल्कुल नही है, हम समाज है जिसमें सबकी बराबर की भागीदारी है.

आज 'मुखजात्रा' किताब के लेखक सुनील कैंथोला से उनके ऑफिस में मुलाकात हुई. वहां कार्यरत एक लड़की ने मुझे चाय पिलाई, चाय ख़त्म होने के बाद मैं खाली कप पकड़े फिर से कुछ सवालों में उलझा हुआ था. यह वही सवाल थे जो गांधीवादी अनिरुद्ध जडेजा के घर मुझे परेशान कर रहे थे.
शायद महिलाओं के लिए बेहतर समाज बनाने के बाद ही हम सभी को कह सकते हैं, शुभ दीपावली.

हिमांशु जोशी,
उत्तराखंड.

Monday, October 25, 2021

सरदार उधम, आज देश को 'राम मोहम्मद सिंह आज़ाद' की ही जरूरत है.

सरदार उधम अंत में एक सवाल उठाती है कि अंग्रेजों के शासन के दौरान भारत में लाखों लोग मारे गए, उसमें जलियांवाला बाग कांड में मारे गए लोग भी शामिल थे पर उसके बारे में इंग्लैंड ने आज तक कोई माफ़ी नही मांगी है. इंग्लैंड ने यह माफ़ी क्यों नही मांगी इसका जवाब भी हमें फ़िल्म रिलीज़ के कुछ दिनों बाद ही मिल गया, फ़िल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया ने सरदार उधम को एकेडमी पुरस्कारों के लिए भारत की तरफ से आधिकारिक एंट्री के लिए चयनित नही किया क्योंकि शायद सबको डर है कि यह फ़िल्म ऑस्कर के लिए भेजने के बाद इंग्लैंड भारत से नाराज़ हो जाएगा. फ़िल्म ऑस्कर के लिए भेजी जाती तो शायद इंग्लैंड अपने उस कृत्य के लिए भारत से माफ़ी भी मांगता और जलियांवाला बाग कांड में मारे गए लोगों के परिजनों के साथ-साथ करोड़ों भारतीयों को भी संतुष्टि मिलती पर फिक्र किसे है!

फ़िल्म की बात की जाए तो यह सिर्फ़ एक फ़िल्म ही नही ओटीटी पर उतरा हमारा इतिहास भी है, बड़े पर्दे पर इसे देखना और भी ज्यादा सुखद होता पर फ़िर भी यह अब तक कि सर्वश्रेष्ठ फिल्म है.
फ़िल्म आने का वक्त भी बिल्कुल सही है मोहम्मद शमी को 'मोहम्मद' होने की वज़ह से ताने दिए जा रहे हैं, शाहरुख खान को उनके बेटे की वज़ह से निशाने पर लिया जा रहा है उधम सिंह के 'राम मोहम्मद सिंह आजाद' बनने की वज़ह को भुला दिया गया है.

सरदार उधम सिंह बने विक्की कौशल और निर्देशक शूजित सरकार को अब अपनी किसी पुरानी फ़िल्म की जगह सरदार उधम की वज़ह से जाना जाएगा. विक्की कौशल का बोलता चेहरा उनके अभिनय की ख़ासियत है तो फ़िल्म का छायांकन अद्भुत. अविक मुखोपाध्याय ने अपनी छायांकन कला से फ़िल्म में जान डाल दी है और हमें सीधे अंग्रेज़ी शासन की छवि का अनुभव दिया है. फ़िल्म के संवाद लिखते रितेश शाह ने सोचा भी नही होगा कि वह हिंदी सिनेमा के कुछ सबसे बेहतरीन संवाद लिख रहे हैं.
वीरा कपूर ईई ने भविष्य के कॉस्ट्यूम डिज़ाइनरों के लिए एक चुनौती रख दी है कि कैसे कोई उनकी तरह ब्रिटिश शासन काल के कॉस्ट्यूम फिर से डिज़ाइन करके दिखाए. विंटेज कार, पुरानी आलीशान इमारतें और अंग्रेजों का सेना कैम्प सब कुछ वैसा ही है जैसा तब होता होगा.

फ़िल्म का पहला हाफ आपको बिना आउट करे किसी बैटिंग पिच पर जमने का मौका देता है, फ़िल्म किसी एक कालक्रम में नही बनी है. यह आपको कभी भारत के दृश्य दिखाती है तो कभी इंग्लैंड, जो हो रहा है उसकी वज़ह आपके सामने आती रहेंगी.
सरदार उधम की अपनी बहन से थोड़ी सी मुलाकात फिर रूस की बर्फीली जगह से गुजरना अच्छे दृश्य हैं. अब आपको एक ब्रिटिश अभिनेत्री किर्स्टी एवर्टन भी दिखती हैं जो आयरिश स्वतंत्रता युद्ध में शामिल होती है, वो उधम का साथ देती है. 
भगत सिंह का भाषण फ़िल्म के कुछ बेहतरीन दृश्यों की शुरुआत भर है, उधम सिंह का 'भगत सिंह के बारे में मत बोल' वाला दृश्य देख अभी तक चुप्पी साधे विक्की कौशल का इंजन स्टार्टर है.
उधम सिंह जेल की चारदीवारी में टॉर्चर होने के बाद जिस तेज़ी से सांसें लेते हैं वहां फ़िल्म के साउंड का भी लोहा मानना पड़ता है.
साथियों और उधम सिंह को टॉर्चर करने के अलग-अलग तरीके दिल को दहलाना शुरू ही करते हैं.

ओ ड्वायर के घर में काम करते उधम सिंह वाले दृश्य में विक्की कौशल और शॉन स्कॉट का अभिनय देखने योग्य है.
'भगत सिंह के बाद इंग्लैंड में बड़ा करना है जिससे अंग्रेज डर जाएं' वज़ह स्पष्ट कर देता है कि उधम सिंह ने इंग्लैंड में ओ ड्वायर को क्यों मारा.
फ्री स्पीच देने के लिए बनाई गई एक जगह पर खड़े होकर विक्की ने जंग और स्वतंत्रता पर जो संवाद बोले हैं उसके लिए फ़िल्म देखनी जरूरी है.

विक्की के डिटेक्टिव बने स्टीफन होगन को बोले शब्द 'प्रोटेस्ट को मर्डर या मर्डर को प्रोटेस्ट मानेगा आपका ब्रिटिश लॉ' याद रखने लायक हैं.
उधम सिंह की मूक प्रेमिका बनी बनिता संधू के पास करने के लिए जितना भी है वह उसमें सफल हुई हैं, फ़िल्म में जिसने भी अभिनय किया है सबने अपने-अपने किरदार के साथ न्याय किया है.

कोर्ट रूम के दृश्य की शरुआत होते ही फिल्म उस स्तर पर पहुंच गई है जिस वज़ह से मैंने इसे शुरुआत में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म कहा था, ठीक से पढ़िए सर्वश्रेष्ठ हिंदी फ़िल्म ही नही सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म.
हीर-रांझा की किताब पर हाथ रख सच बोलने की कसम खाने के बाद अपना नाम पूछे जाने पर शूट मी चिल्लाना और खुद को राम मोहम्मद सिंह आज़ाद कहना, विक्की ने अपने अभिनय से ऐतिहासिक फ़िल्म में भी इतिहास लिखा है.
कोर्ट रूम के दृश्य देख आपकी सांसे तेज़ होने लगेंगी, हर संवाद यहां नही लिखा जा सकता, पूरे अभिनय पर यहां चर्चा सम्भव नही.
फांसी की सज़ा और इंकलाब जिंदाबाद नारों के बाद खाने के बर्तन वाला दृश्य कमाल करता है, बस बर्तन खिसका कर ही फ़िल्म की टीम आपको रोमांचित करती रहती है.
जबरदस्ती मुंह में पाइप डाल उधम सिंह की भूख हड़ताल तुड़वाने वाले दृश्य में विक्की आपको बिस्तर पर लेटे-लेटे ही सुन्न कर देंगे, बैकग्राउंड संगीत पर शांतनु मोइत्रा प्रभावित करते रहते हैं.

अब आपकी सांसे थोड़ी सामान्य होंगी और फ़िल्म अब आपको लौटा कर फिर भारत पहुंचाएगी. रौलेट एक्ट को खत्म करने के लिए अंग्रेजों की जो रणनीति बन रही है उसे देख आप सोचेंगे कि अब भी क्या कुछ बदला है!
जलियांवाला बाग कांड जहां से बाहर निकलने की सिर्फ एक पतली गली है वहां खड़े हो जनरल डायर ने फ़ायर का आदेश दिया.
गोली से आधा लटकता पैर या गेट पकड़ते हुए हाथ का गोली लगने के बाद कटा पंजा, निर्देशक ने उस कांड का हर सेकेंड आपको फिर से दिखाया है. 
जान बचाने के लिए कुंए में कूदते लोग, भगदड़ में दबते बच्चे, घायल तड़पते लोग, हर दृश्य आपकी आंखें झपकने नही देगा. इस बीच 'मुंह सूखा हो, होंठ सूखे हों.. वाली पंक्ति कहते विक्की कौशल ने उधम सिंह का दर्द हमारे सामने रखा है.

कांड के बाद देर से उठे उधम जब जलियांवाला बाग दीवार फांद पहुंचते हैं तो उसके बाद का हर दृश्य पचासों बार देखने वाला है. लाशों पर मक्खियां भिनभिनाने की आवाज़ फ़िर आपको फ़िल्म के हर मज़बूत तकनीकी पक्ष की याद दिलाता है.

घायलों की मदद करते उधम के किरदार को विक्की ने अमर बना दिया है, अस्पताल के खून से सने फ़र्श वाले दृश्य हों या लाशों के ऊपर मंडराते चील कव्वों और ठेलों से घायलों को ले जाने वाले दृश्य शूजित हिंदी सिनेमा के सबसे काबिल निर्देशक बन कर सामने आए हैं. जलियांवाला बाग में मारे गए लोगों की लाशों के ढेर वाला दृश्य जिस कोण से दिखाया गया वह आपको जलियांवाला बाग कांड की क्रूरता को फ़िल्म ख़त्म होते-होते कभी न भुलने वाली याद दे जाएगा.

फ़िल्म पर इतिहास के साथ छेड़छाड़ करने के आरोप लगाए जा रहे हैं पर सिनेमा इतिहास पढ़ाने के लिए नही बनाई जाती, उसका उद्देश्य होता है सकारात्मक संदेश देना और वह यह उद्देश्य देने में सफ़ल भी हुई है.
फ़िल्म याद दिलाती है कि हमें आज़ादी यूं ही नही मिल गई उसके लिए इन क्रांतिकारियों द्वारा की गई सालों की मेहनत और कुर्बानी जिम्मेदार थी. वो आज़ादी न किसी एक राम की थी न मोहम्मद और न ही किसी एक सिंह की, वो आज़ादी एक ही के लिए थी जो था 'राम मोहम्मद सिंह आज़ाद'.

निर्देशन- शूजित सरकार
पटकथा- शुबेंदु भट्टाचार्य
निर्माता- रॉनी लहिरी, शील कुमार
छायांकन- अविक मुखोपाध्याय
संवाद- रितेश शाह
कॉस्ट्यूम डिज़ाइन- वीरा कपूर ईई
अभिनय- विक्की कौशल, बनिता संधू, स्टीफन होगन, शॉन स्कॉट
संगीत- शांतनु मोइत्रा
ओटीटी प्लेटफॉर्म- अमेज़न प्राइम वीडियो
रेटिंग ❌✋✅ -- ✅
समीक्षक - हिमांशु जोशी 

Friday, October 22, 2021

उत्तराखंड बाढ़ पर : विनाशलीला ज़ारी है, अब भी नही चेते तो कब!!

पहाड़ों पर हो रहे विकास कार्यों और मानव द्वारा प्रकृति के साथ कि गई छेड़छाड़ का नतीजा अब हमारे सामने है, पहाड़ों में आपदाओं का दौर तेज़ हुआ है. बाढ़ से होने वाले नुकसान को कैसे कम किया जाए इसके लिए ठोस योजना बनाने की जरूरत है.


स्थिति बिगड़ेगी नही बिगड़ने लगी है

बात ज्यादा पुरानी नही है जब साल 2019 में ग्रेटा थनबर्ग ने संयुक्त राष्ट्र में अपने भाषण के दौरान विश्व नेताओं को पर्यावरण बिगाड़ने पर कटघरे में खड़ा कर दिया था, एक बच्ची संयुक्त राष्ट्र में हमारे हक के लिए लड़ रही थी और हम चैन की नींद सोए थे. 
सोए इसलिए क्योंकि तब खुद पर ज्यादा नही बीत रही थी, वैसे भी दुनिया का उसूल है कि जब खुद पर बीतती है तब सच्चाई महसूस होती है.

डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट में लिखा है कि पॉट्सडैम यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के अनुसार हिमालय क्षेत्र की हजारों प्राकृतिक झीलों पर बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है. इसके लिए उन्होंने बढ़ते तापमान को जिम्मेदार माना है. वैज्ञानिकों के अनुसार इसके चलते घाटियों में बहने वाली नदियों पर भी बाढ़ का खतरा बढ़ गया है, रिपोर्ट में कहा गया है कि खतरा बढ़ गया है पर पिछले कुछ सालों में उत्तराखंड के साथ-साथ भारत के कुछ अन्य हिस्सों जैसे उड़ीसा, असम पर नज़र डालें तो पता चलेगा खतरा बढ़ा नही बल्कि हम अब उस खतरे से गुज़रने लगे हैं.

उत्तराखंड में आपदा पर आपदा

उत्तराखंड में साल 2013 की भीषण आपदा के बाद इसी साल 7 फरवरी को चमोली में ग्लेशियर टूटने से आपदा आई और अब अक्टूबर में फिर प्रदेश बाढ़ का कहर झेल रहा है, स्थिति यह है कि बाढ़ आए चार-पांच दिन बाद भी उससे हुए नुकसान का आकलन करना भी अभी तक सम्भव नही हुआ है.

उत्तराखंड के मुक्तेश्वर में 1 मई 1897 से बारिश के आंकड़े दर्ज किये जा रहे हैं. यहां अब तक 24 घंटे के दौरान सबसे ज्यादा बारिश 18 सितम्बर 1914 को 254.5 मिमी दर्ज की गई थी, जबकि इस बार यहां 24 घंटे के दौरान 340.8 मिमी बारिश हुई है.

हिमालयी और मैदानी क्षेत्र होने के कारण उत्तराखंडवासी इस बार एक ही रात में एक साथ अलग-अलग परिस्थितियों से जूझे.

सोचें पहाड़ों में आप एक रात चैन से सोए हुए हैं और खूब सारा कीचड़ लिए तेज़ बहाव के साथ पानी आपके घर में घुस आपका दम घोंट आपकी जान ले शांत हो जाए या आप इस डर से रात भर अपने बच्चों को गले लगाए बैठे रहें कि कहीं कोई सैलाब आपके घर न घुस जाए.
 वहीं मैदानी क्षेत्र में आप रात भर अपने घर के कीमती सामानों को बाढ़ में बहने से रोकने का प्रबंध करते रहें.
अक्टूबर बेमौसम आई बरसात ने उत्तराखंड वालों का बिल्कुल यही हश्र किया है, इसके शिकार वह पर्यटक भी हुए हैं जो सुकून की तलाश में उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में घूमने आए थे.

सोशल मीडिया पर बहुत सी पोस्ट छाई हुई हैं जहां पुलिस और सेना के जवान बाढ़ प्रभावित लोगों को बचाने में जुटे हुए हैं, इनमें कुछ तस्वीरों में पुलिस के जवान पहाड़ों में भारी बारिश से किसी के घर में घुसे मलबे के बीच उस घर में रहने वालों की दबी लाशों को खोज रहे हैं तो कुछ तस्वीरों में पुलिस-सेना के जवान खतरे में फंसे लोगों को तेज बहाव से निकाल रहे हैं.
नदी किनारे बने घर उसमें समा जा रहे हैं तो मैदानी जगह बाढ़ में बाइक, कारों की तैरती तस्वीर भी वायरल हो रही हैं.

"साफ आसमान । धूल का एक कण भी नहीं । बरसात के बाद चमकते, हरे वृक्ष । बहुत सारी जगहों पर खिले, बहुत सारे, तरह तरह के फूल । तेज से कुछ ज्यादा तीखी धूप। तीखी धूप के बाद शुकून देती खूबसूरत शाम। बरसात के पानी से लबालब , छलकता हरे पानी वाला तालाब । कई लोगों का मानना है कि अक्टूबर नैनीताल का सबसे सुन्दर मौसम होता है। हो सकता है कि यह सच हो , पर इस बार का अक्टूबर इसके ठीक उल्टा था । इस बार अक्टूबर के दो दिनों ने नैनीताल वासियों के दिल दहशत से भर दिये । कैन्ट के कई दुकानदार पानी की रफ्तार की वजह से सड़क पार कर अपनी दुकानों तक नहीं पहुंच पाए ऐसे में उनकी दुकानों का हाल समझा जा सकता है। (यहां तक कि डांठ और कैन्ट में रेसक्यू के लिये सेना की सहायता भी लेनी पड़ी। )
डांठ का गेट खोलने के लिये नियुक्त पालीवाल बताते हैं कि 18 अक्टूबर को प्रातः 9 बजे से 18 इंच यानी डेड़ फिट पानी खोल दिया गया था, यह सर्वाधिक है और इससे ज्यादा गेट नहीं खोला जा सकता । फिर भी पानी की पूरी निकासी नहीं हो सकती थी क्योंकि बरस रहा पानी इस निकासी से कई गुना ज्यादा था । 23 अक्टूबर को जब नैनीताल समाचार की टीम यह जानकारी ले रही थी उस वक़्त भी यह निकासी 9 इंच थी और इसको कम नहीं किया जा सकता था क्योंकि विभिन्न स्रोतों से तथा लबालब भरे सूखाताल से पानी की भारी आमद जारी थी।
पिछाड़ी बाजार (हल्द्वानी रोड )की सभी दुकानें पानी की मार से पीड़ित रहीं । यूं देखने में रेहान की इलक्ट्रोनिक्स की दुकान फिट – फाट लग रही थी पर 18 अक्टूबर की आपदा ने पूरी दुकान का सामान बरबाद कर दिया था । इलैक्ट्रिक रिपेयर की दुकानें, कम्प्रेशर और वैल्डिंग की मशीनों वाली दुकानें खुली तो थीं पर काम धंधा ठप था, क्योंकि सारी मशीनें पानी की मार से खराब हो चुकी थीं । सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान के मालिक भट्ट जी का सारा राशन खराब हो चुका था और बहुत सारा बह भी चुका था ।
यही हाल नया बाजार (हल्द्वानी रोड ) का भी था । नेशनल होटल के मालिक सुनील बताते हैं कि पानी की इस मार ने होटल तो होटल उनके घर को भी नहीं छोड़ा, जो नगर पालिका क्वाटर्स में है । इसके अतिरिक्त वर्मा जी (स्वर्णकार ) , जीतेन्द्र भट्ट , मनीष जोशी और मोहन काण्डपाल आदि कई दुकानदारों के सामान या तो बह गए या खराब हो गए।
आयुर्वेदिक डाक्टर रामेश्वरी की दवाएं तो सब खराब हो ही चुकी थीं जब समाचार की टीम वहां पर पहुँची तो उनके मरीजों और दवाओं की पर्चियां जो बूरी तरह भीगी थीं उन्हें वह धूप में सुखाने का प्रयत्न कर रहीं थीं ।
हरिनगर पहुंचते पहुंचते सूचना मिली कि जी.आई. सी . फील्ड के नीचे अभी अभी भू-स्खलन हुआ है । हम जब उस स्थान पर पहुंचे तो ठीक फील्ड के दाहिने ओर धूल का गुबार हमने उठते हुए देखा और अचानक बिजली के खंभे तारों साहित जोर जोर से हिलने लगे और कई जगह चिंगारियां भी निकलने लगी क्योंकि बिजली का कोर्ई खम्बा भूस्खलन की चपेट में आ गया था। वहां पर जमा स्थानीय लोग डर के मारे जान बचाने को ऊपर की ओर भागे । समाचार की टीम द्वारा तुरन्त यह सूचना विद्युत विभाग को दी ताकि किसी संभावित दुर्धटना से बचा जा सके। हरि नगर के स्थानीय निवासियों से ज्ञात हुआ कि फिलहाल एक परिवार को एक कमरे के हिसाब से फिलहाल प्रशासन ने उनके लिए एक अस्थाई व्यवस्था कर दी है परन्तु स्थानीय निवासी अत्यधिक गुस्से में थे कि आज तक बलिया नाले के नाम पर आ रहा करोड़ो रुपया कहां गया ? और वो अपने ही शहर में शरणार्थी क्यों हो गए हैं ?
जी.आई.सी. पहुंचने पर ज्ञात हुआ कि कुछ परिवार ऐसे हैं जिन्हें हर वर्ष आपदा आने पर जी.आई.सी. में शरण मिलती है तथा पुनः अगली बार आपदा आने तक उनसे कमरा खाली करा लिया जाता है।
सूखाताल पहुंचने पर लबालब सूखाताल के दर्शन कई वर्षों बाद हुए पर ज्ञात हुआ कि अब यह काफी खाली किया जा चुका है , परन्तु स्थानीय निवासियों ने किसी किस्म के नुकसान का जिक्र नहीं किया जबकि उनके भीगे फर्श कुछ और कह रहे थे।
बिड़ला क्षेत्र के कई – कई घरों में मलवा भरा हुआ है । गोविन्द बल्लभ पन्त चिकित्सालय ( रैमजे अस्पताल ) क्षेत्र में, अस्पताल कर्मचारियों को नोटिस दे दिए गए हैं कि वह अपने क्वार्टर खाली कर दें क्योंकि मंगावली क्षेत्र से भू – स्खलन की संभावनाएं बनीं हुई हैं । शिव मन्दिर के ठीक बगल से भू-स्खलन हुआ तो है पर इस भू-स्खलन के ठीक नीचे रह रहे कर्मचारी भाग्यशाली हैं कि वो सब बच गए क्योंकि भू-स्खलन से निकला एक बड़ा पत्थर, कर्मचारी निवास तक पहुंचने से पूर्व रास्ते में ही अटक कर रह गया।
हो गई क्षति की पूर्ति तो नहीं हो सकती पर 124 वर्षों में अभी तक रिकार्ड की गई सबसे अधिक वर्षा के बावजूद गनीमत है कि किसी को भी अपनी जान से हाथ नहीं धोना पड़ा ।"

बाढ़ पर राजनीति और आपदा के लिए जिम्मेदार सड़क

लोग मुसीबत में फंसे हैं तो बाढ़ पर राजनीति भी कम नही हो रही, सोशल मीडिया पर प्रदेश के मुख्यमंत्री का बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में हेलीकॉप्टर से किया दौरा विवाद का विषय बना है तो कहीं सड़क मार्ग से आपदा ग्रस्त इलाकों में पहुंचने पर उनकी वाहवाही हो रही है.

वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए ऑल वेदर रोड पर कार्य शुरू हुआ, इस सड़क से पर्यावरण को होने वाले नुक़सान को देखते सुप्रीम कोर्ट ने एक हाई पॉवर कमेटी गठित की, जिसके अध्यक्ष रवि चोपड़ा ने अपनी रिपोर्ट में सड़क की चौड़ाई 12 मीटर रखना ठीक नही बताया था और इसको सिर्फ 5.5 मीटर तक ही रखने की सिफारिश की थी पर प्रकृति की चिंता किसे थी और वैसे भी इससे होने वाले नुकसान को उन पहाड़ों में रहने वाले लोग ही झेल रहे हैं.

पहाड़ में सड़क बनाते समय उसके मलबे को नदियों में फेंका जा रहा है, इससे होने वाले नुकसान पर पर्यावरण के मुद्दों पर सालों से लिख रहे वरिष्ठ पत्रकार विनोद पांडे से बात की गई. उन्होंने बताया कि पहले पहाड़ों में सड़क 'कट एंड फिल' तकनीक से बनती थी. सड़क बनाने के लिए पहाड़ काट सड़क के लिए आधा हिस्सा छोड़ा जाता था और आधे में उसी के मलबे की दीवार दी जाती थी. जेसीबी आने के बाद से इस ओर ज्यादा ध्यान नही दिया गया, पहाड़ काट उसका मलबा सड़क पर कहीं भी बेतरतीब तरीके से फेंक दिया जाता है.
वो मलबा नीचे बह रही नदियों पर गिरता है और इससे जल प्रवाह में विघ्न आता है. 
सड़क बनाते समय पानी की निकासी का ध्यान भी नही दिया जाता, जिस वजह से पानी अपना रास्ता खुद बना लेता है. पानी के बहाव की गम्भीरता को कम आंका गया है.

इंडिया वॉटरपोर्टल वेबसाइट में सड़क काटने और उससे बने खड्डों को पुन: भरने के लिए विभिन्न एजेंसीयों द्वारा किए गए सभी कार्यों से सम्बंधित सूचनाएं उपलब्ध कराने हेतु मांगे गए सूचना के अधिकार का प्रारूप मिला. शायद ही पहाड़वासियों ने कभी अपने इस अधिकार का प्रयोग पहाड़ों को बेतरतीब चीरने की स्थिति जानने के लिए किया हो.

         सड़क का मलबा नदी में (फ़ोटो साभार                      @MallikaBG ट्विटर अकाउंट)

अब भारी बारिश की वज़ह से सड़के जगह-जगह टूट गई हैं, गम्भीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए अस्पताल तक पहुंचने के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं या अस्पताल तक पहुंचने में ही उनकी जेब कुतर जा रही है.

जो हुआ सो हुआ

बाढ़ और प्रकृति का तांडव फ़िलहाल थमा हुआ है पर अब जिस अंतराल पर यह आपदाएं आने लगी है उन्हें देख भविष्य में इस तरह की आपदाओं से कम से कम नुकसान हो इसके लिए हमें अभी से कार्य शुरू करने होंगे.

वर्ल्ड मीटरोलॉजिकल आर्गेनाइजेशन और ग्लोबल वाटर पार्टनरशिप ने मिलकर बाढ़ प्रबंधन प्रोग्राम पर कार्य किया, अमरीकी कम्पनी ने सुनामी जैसी आपदा के वक्त सुरक्षित बचने के किए सुनामी बॉल बनाई तो चीन में स्पंज सिटी की अवधारणा बनी.

वर्ल्ड मीटरोलॉजिकल आर्गेनाइजेशन और ग्लोबल वाटर पार्टनरशिप की रिपार्ट के अनुसार पहाड़ों में बाढ़ से होने वाले नुकसान के मुख्य कारणों में पहाड़ों की ढलान पर वनों की अत्यधिक कटाई पहले नम्बर पर आता है. आज आप पूरे हिमालयी क्षेत्र घूम आइए, सड़क की सनक ने रास्ते के सभी पेड़ों को खत्म कर दिया है. सड़क पर आधे लटके वह पेड़ अपना बदला लेने के लिए हमेशा सड़क पर लटक किसी के ऊपर गिरने का मौका देखते हैं.
स्थानांतरित कृषि जिसमें वृक्षों और वनस्पतियों को जला दिया जाता है फिर उसमें नए बीज बोए जाते हैं इस वज़ह से भी पहाड़ कमज़ोर हुए हैं और तेज़ बहाव में टूट जाते हैं.
अद्रभूमि की कमी और इसके साथ पहाड़ों में जानवरों की अत्यधिक चराई की वजह से भी पहाड़ कमज़ोर होते जाते हैं.

बाढ़ के बारे में थोड़ा अध्ययन किया जाए तो पता चलता है कि बाढ़ मुख्यतः चार तरीकों से आती हैं.
फ्लुवियल में अत्यधिक बारिश से या बर्फ गलने से नदी का जलस्तर बढ़ जाता है, उत्तराखंड में इसी तरह की बाढ़ कोहराम मचाती है. अभी आई बाढ़ में नैनीताल की झील का स्तर इतना बढ़ गया था सड़क और झील में अंतर करना मुश्किल हो रहा था.
प्लूवियल बाढ़ में बारिश का पानी निकासी सुविधा अच्छी न होने की वजह से शहर की गलियों में भर जाता है, मुंबई- दिल्ली हो या उत्तराखंड का रुद्रपुर सबमें इसी तरह की बाढ़ आती है.
फ्लैश बाढ़ में बांधों से तेज़ी से पानी आता है और इस तरह की बाढ़ खतरनाक होती है, कोस्टल बाढ़ का उदाहरण सुनामी है.

रिपोर्ट के अनुसार बाढ़ प्रबंधन के लिए प्रशासन, नेताओं, गैर सरकारी संगठनों और भवनों का निर्माण करने वालों को मिलकर साथ काम करना होगा.
बाढ़ हमेशा एक सी नही होती और उसकी तैयारी भी पहली जैसी नही होनी चाहिए, नगरीकरण से यह समस्या बढ़ती ही जाएगी क्योंकि नदी, नालों को अपना रास्ता नही मिलेगा और वह बार-बार लौटकर अपने रास्ते पर आएंगे ही.
रिपोर्ट में कहा गया है कि बाढ़ के समय सही रास्ता बताने के लिए सड़क पर निशान लगाने चाहिए क्योंकि ऐसी स्थिति में लोग गड्ढों पर भी गिर सकते हैं, साथ ही हमें घर भी ऐसे बनाने होंगे जिन पर बाढ़ का असर कम से कम हो.
बाढ़ के असर को कम करने के लिए तीन तरह के घर बनाने का सुझाव दिया गया जिसमें ऐसा घर शामिल है जो उठा हुआ बनाया जाए, दरवाजों-खिड़कियों को बंद कर पानी रोकने वाला घर भी बनाया जा सकता है जिसे ड्राई फ्लड प्रूफिंग कहा गया है.
वेट फ्लड प्रूफिंग नाम के घरों को ऐसा बनाया जाता है जिसमें घर के अंदर पानी आने के बाद भी उसका असर कम से कम हो.
अगर ऐसे ही घर पहाड़ी क्षेत्रों में बनाए जाएं तो कई जानें बचाई जा सकती हैं.
बाढ़ से बचने के लिए घरों के डिज़ाइन

सुनामी बॉल और स्पंज सिटी
सुनामी जैसी आपदाओं को झेलने के लिए एक अमरीकी कम्पनी ने सुनामी बॉल का निर्माण किया और भारत के असम जैसे बाढ़ग्रस्त इलाकों में यह सुनामी बॉल वरदान साबित हो सकती है, सुनामी बॉल का प्रयोग किया जाना आवश्यक है.

'द हिन्दू' में पिछले साल आई एक रिपोर्ट में स्पंज सिटी का जिक्र करते हुए लिखा है कि कोच्चि भारत की पहली स्पंज सिटी बन सकती है.

चीन ने जिस तरह से प्राकृतिक ऊर्जा का प्रयोग किया है वह काबिलेतारीफ है और चीन में ही साल 2013 में एक और दुनिया बदलने वाली योजना पर काम शुरू हुआ।
चीनी शोधकर्ता प्रोफेसर कोंगजियान यू ने स्पंज सिटी के बारे में सुझाव दिया था.

स्पंज सिटी

इस योजना में खर्चा अधिक है पर इसके लाभ उससे ज्यादा हैं, चीन अपने 16 जिलों में इस जल अवशोषक परियोजना का निर्माण कर रहा है.
इन शहरों में कंक्रीट की जगह बॉयोस्वेल्स का प्रयोग कर जल संरक्षण किया जाएगा.
यह ऐसे शहर होंगे जो वर्षा के पानी को अवशोषित कर पर्यावरणीय रूप से अनुकूल तरीके से उसके पुनः उपयोग को बढ़ावा देंगे और बहता हुआ पानी भी कम हो जाएगा। पानी की कमी को दूर करने के लिए वर्षा जल का सही प्रयोग किया जाएगा.

खर्चा तो बराबर है

समाज को यह समझना होगा कि अगर मनुष्य जाति के अस्तित्व को बचाए रखना है तो प्रकृति के साथ ज्यादा छेड़छाड़ करना ठीक नही है, प्रकृति को सुरक्षित रखते विकास कार्य करने होंगे.
वहीं हमारी सरकार को यह समझना होगा कि आपदा के बाद जितना पैसा मुआवजे और पुनर्निर्माण में लगाया जाता है उतना अगर आपदा प्रबंधन में समय रहते खर्च कर लिया जाए तो जानमाल की होने वाली हानि से बचा जा सकता है.


हिमांशु जोशी, उत्तराखंड

Sunday, October 17, 2021

'पिंक' से तुलना न करें तो देखने लायक है 'रश्मि रॉकेट'


रश्मि रॉकेट' क्यों देखी जाए?

'सूर्यवंशम' जैसी फ़िल्म की शुरुआत में एक महिला के लिए जिस तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया गया वह अमर्यादित थे।

संचार के साधनों में महिलाओं को उत्पाद की तरह पेश किया जाता रहा है और इस पर नियंत्रण रखने के लिए बनाई गई संस्थाएं सोती रही हैं।

बॉलीवुड में महिलाओं के अधिकारों पर बहुत कम फिल्में बनी हैं, उनमें से एक फ़िल्म 'पिंक' की दमदार अभिनेत्री तापसी पन्नू की ही फ़िल्म होने की वजह से मैंने 'रश्मि रॉकेट' (Rashmi Rocket) को देखने के लिए चुना।

आकर्ष खुराना का 15 वर्ष का अनुभव काम आया

फ़िल्म उद्योग में बिताए अपने 15 सालों के दौरान आकर्ष खुराना का दम मारो दम, कृष 3, काइट्स जैसी फिल्मों में काम करने का अनुभव है और रश्मि रॉकेट के निर्देशन में उन्होंने उसी को झोंका है।

फ़िल्म अपने कौतूहल वाले नाम की तरह ही शुरुआत से सोचने पर मजबूर कर देती है। पुलिस का थप्पड़ खाती रश्मि रॉकेट बनी तापसी पन्नू को देखने के बाद दर्शक 14 साल पहले की कहानी में पहुंच जाते हैं।

गुजरात की रश्मि रॉकेट के पिता की भूमिका में अपने छोटे से रोल में मनोज जोशी प्रभावित करते हैं तो रश्मि की मां बनी सुप्रिया पाठक ने अपना किरदार बखूबी निभाया है।

गुजरात भूकम्प के फ्लैशबैक में पहुंच कहानी फौजी ट्रेनर बने प्रियांशु पैन्यूली के प्रोत्साहन पर रॉकेट के दौड़ने पर पहुंचती है।

रॉकेट बनी तापसी बहुत जल्द अपनी दौड़ से नाम कमा लेती है।

इसी बीच गुजराती संगीत तो अच्छा लगता है पर बिन हेल्मेट के गाड़ी चलाती तापसी सही सन्देश नही देती।

प्रियांशु पैन्यूली की पहचान वेब सीरीज़ मिर्जापुर से होती थी फ़िल्म में वह तापसी के साथ जोड़ी बना जचे हैं।हल्की मूछों में फौजी बने प्रियांशु अपने सादे अभिनय से प्रभावित करते हैं, उम्मीद है फ़िल्म से उन्हें नई पहचान मिलेगी।

फ़िल्म जैसे आगे बढ़ती है हम उसमें भारतीय महिला खिलाड़ियों के साथ होने वाले गलत व्यवहार के बारे में जानकारी पाते हैं।

खेलों में होने वाली राजनीति पर भी फ़िल्म प्रकाश डालती है, तापसी उसे जीती हुई लगती हैं।

फ़िल्म का असली मुद्दा वहां से पता चलता है जब थप्पड़ वाला शुरुआती दृश्य वापस आता है।

जेंडर टेस्ट नाम का एक ऐसा नाजुक मुद्दा जिस पर शायद हिंदी फिल्म जगत में कभी बात हुई हो और भारतीय खेल प्रशंसकों ने भी शायद इस मुद्दे पर कभी अपने खिलाडियों का साथ दिया हो।

अभिषेक बनर्जी ने वकील के तौर पर फ़िल्म में एंट्री मारी है, जिसमें वह जेंडर टेस्ट के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रश्मि के साथ- साथ जेंडर टेस्ट के शिकार अन्य खिलाड़ियों को भी न्याय दिलाना चाहते हैं। अभिषेक बनर्जी को देख यह महसूस होता है कि फ़िल्म रंग दे बसंती से शुरू हुआ उनका फ़िल्मी सफ़र अब ट्रैक पर आ जाएगा।

वह पहले घण्टे के बाद फ़िल्म की जान हैं पर कोर्टरूम की गम्भीरता वैसी नही लगती जैसी होनी चाहिए थी जबकि फ़िल्म के अंतिम 40-50 मिनट कोर्टरूम के ही हैं।


पिंक में अमिताभ बच्चन ने वकील की भूमिका के साथ जो न्याय किया था, किसी अन्य अभिनेता से उसकी बराबरी की उम्मीद रखना बेमानी ही है।

जज के रूप में सुप्रिया पिलगांवकर ने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है।

फ़िल्म के संवाद और गीतों के बोल ऐसे नही हैं जो लंबे समय तक याद रखे जाएं।

गुजरात, रांची के दृश्य खूबसूरत दिखे हैं तो शादी के जोड़े में तापसी भी उतनी ही अच्छी लगी हैं।

जेंडर टेस्ट के समय तापसी को दी गई प्रताड़ना और फ़िल्म के अंतिम क्षणों में अपने होने वाले बच्चे से तापसी की बातचीत वाले दृश्य उनके दमदार अभिनय के हिस्से हैं।

अगर आप पिंक से तुलना न कर इस फ़िल्म को देखने का मूड बनाते हैं तो आप रश्मि रॉकेट से निराश नही होंगे।

जेंडर टेस्ट इन स्पोर्ट्स के बारे में गूगल सर्च करने पर आपके सामने बहुत सी जानकारियां सामने आएंगी और इस वज़ह से शायद कभी आप जेंडर टेस्ट की वजह से परेशान किसी खिलाड़ी का साथ देने आगे आएंगे, यही तो फ़िल्म का उद्देश्य है।

समीक्षक- हिमांशु जोशी

फ़िल्म- रश्मि रॉकेट

रिलीज़- जी5 ओटीटी प्लेटफॉर्म

निर्देशक- आकर्ष खुराना

निर्माता- रोनी स्क्रूवाला

संगीत- अमित त्रिवेदी

अभिनय- तापसी पन्नू, अभिषेक बनर्जी, प्रियांशु पैन्यूली, सुप्रिया पाठक, मनोज जोशी, सुप्रिया पिलगांवकर



Tuesday, October 5, 2021

गांधी के विचार, विनोबा का सानिध्य और जयप्रकाश का साथ पाए अमरनाथ भाई की कहानी.

सार- 
वर्तमान परिस्थितियों से अमरनाथ भाई खिन्न हैं, वह कहते हैं आज़ादी तक तो भारतीय जनता ने संघर्ष किया पर पहले लोकसभा चुनाव के बाद भारतीय जनता निश्चिंत हो गई कि अब सब काम सरकार करेंगी, जनता तब सोई और अब तक उठी नही है।
देश का निर्माण आयातित है, पंचवर्षीय योजना रूस की तो शिक्षा मैकाले वाली चल रही है।

विस्तार-

अपना पूरा जीवन ग्राम स्वराज़ के लिए समर्पित करने वाले और सर्व सेवा संघ के दो बार अध्यक्ष रहे अमरनाथ भाई से मेरा मिलना देहरादून में सम्भव हुआ।

गांधी के विचार, विनोबा का सानिध्य और जयप्रकाश का साथ पाए अमरनाथ भाई की कहानी आज की पीढ़ी के लोगों को बहुत कम पता है और गांधीवादी लोगों से जुड़ी ऐसी बहुत सी कहानी हमारे युवाओं को पता नही है। यही कारण भी है कि आज का युवा 'गोडसे जिंदाबाद' का ट्वीट ट्रेंड करवा रहा है।
                 अमरनाथ भाई के साथ

अमरनाथ भाई का जन्म वर्ष 1933 के जुलाई माह में वाराणसी के चोलापुर ब्लॉक में हुआ। वह एक धर्मपरायण परिवार में जन्में, उनके पिता का नाम रामसुमेर मिश्र और माता का नाम सरताजी था।
बचपन से ही अमरनाथ भाई अपने ननिहाल में ज्यादा रहे और उनको वहां होने वाला सामाजिक भेदभाव पसन्द नही आता था। वह हलवाहे के साथ खेलते तो उनके घरवालों को पसन्द नही आता था, वह देखते थे कि उनके पालतू कुत्ते की थाली तो घर के अंदर आ जाती थी पर हलवाहे की थाली नही आती थी।

नवीं कक्षा में पढ़ते हुए ही अमरनाथ भाई रुस्तम सैटिन के सम्पर्क में आए। (जनसत्ता में मदन मोहन मालवीय के पौत्र श्री लक्ष्मीधर मालवीय संस्मरण लिख रहे थे। उनमें से एक संस्मरण में उन्होंने रुस्तम सैटिन की चर्चा की, जिनके छात्र जीवन में किये जा रहे स्वतंत्रता आन्दोलनों से प्रभावित होकर मालवीय जी ने स्वयं उन्हें बीएचयू में लाने और पढ़ाई जारी रखने के लिए छात्रवृत्ति की व्यवस्था की थी। यह व्यवस्था उनके यह कहने के बाद भी की थी कि वे कम्युनिस्ट हैं। बाद में कामरेड रुस्तम सैटिन बनारस से विधायक भी चुने गये थे और चरण सिंह के नेतृत्व में बनी सरकार में पुलिस विभाग के उपमंत्री रहे थे) 

कम्युनिस्टों से अमरनाथ भाई का यह लगाव उनके 1954 में बीएचयू छोड़ने तक रहा।

जब अमरनाथ भाई 17-18 साल के थे तब उनकी बनारस से शादी हुई और उनकी पत्नी का नाम माधुरी है।  
1951 में जब से भूदान आंदोलन शुरू हुआ तब से ही अमरनाथ भाई इस आंदोलन की खबरों पर अपनी नज़र जमाए हुए थे, 1953-54 में जब विनोबा बनारस से गुज़र रहे थे तब अमरनाथ भाई की उनसे मुलाकात हुई।

इसी बीच सर्वोदय के प्रदेश नेता अक्षय कुमार कर्ण उन्हें 1954 में सेवापुरी स्थित सर्वोदय संस्था में ले आए,  वहां अमरनाथ भाई ने कताई, बुनाई करते एक साल तक गांधी दर्शन सीखा, इसके बाद वहीं 5-6 साल उन्होंने कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण की जिम्मेदारी भी संभाली।

अब उन्होंने यह निर्णय ले लिया था कि ग्राम स्वराज़ का प्रयोग वह अपने गांव में जाकर करेंगे, यह बात धीरेंद्र मजूमदार को मालूम चली। धीरेंद्र तब सर्व सेवा संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी थे, वह अमरनाथ भाई को किसी तरह मना कर दो साल तक अपने साथ ले आए।
अमरनाथ भाई कहते हैं कि मजूमदार 'शास्त्री' भी थे और 'मिस्त्री' भी थे। उनमें महात्मा गांधी की तरह खासियत थी कि वह जो बोलते थे वो करते भी थे।
वह दूरदर्शी भी थे और जो होने वाला है उसे समझते थे, 1954-55 में गांव वालों को समझाते हुए कहते थे मुकदमा जीते हो, कागज़ हाथ में नही आया। कब्ज़ा नही हुआ, कब्ज़ा कर लो नही तो जिन वकीलों ने मुकदमा लड़ कब्ज़ा दिलाया है, वो कब्ज़ा कर लेंगे।
बाबू लोगों के कपड़े सफेद नही रहने वाले हैं, समझदारी है कि उसे मिट्टी के रंग में रंग लें वरना खून के छींटे पड़ने से कोई नही रोक सकता।

अमरनाथ भाई के जीवन में धीरेंद्र का हमेशा बड़ा प्रभाव बना रहा। 
कुछ समय बाद सर्व सेवा संघ की शाखा के तौर पर अखिल भारत शांति सेना मंडल बना, जिसके अध्यक्ष जयप्रकाश नारायण और मंत्री 'महात्मा गांधी' के पर्सनल सेक्रेटरी महादेव देसाई के पुत्र नारायण देसाई थे। यह लोग अमरनाथ भाई को अपने साथ ले आए और उन्हें शांति सेना विद्यालय में प्रशिक्षण का कार्य दिया गया, अमरनाथ भाई इससे 1975 तक जुड़े रहे।
शांति सेना का कार्य सामान्य दिनों में सेवा करना था और दंगों में भी उसे कार्य करना होता था।
वर्ष 1974 में वह शांति सेना के साथ साइप्रस में ग्रीस और तुर्की के बीच हो रही लड़ाई में भी गए।
1974 में ही हुए बिहार आंदोलन के दौरान वह जयप्रकाश नारायण के साथ रहे और इमरजेंसी के दौरान तीन- चार बार जेल भी गए। इसी दौरान वह जाबिर हुसैन और कुमार प्रशांत के साथ 'तरुण क्रांति' पत्रिका निकालते थे।

इसके बाद वह सर्व सेना संघ में मंत्री, महामंत्री और दो बार अध्यक्ष रहे।
अमरनाथ भाई के तीन बेटे और एक लड़की हैं, उनके दो लड़के सर्वोदय से ही जुड़े हैं।

वह कहते हैं कि उन्होंने फैसला लिया था कि 75 साल के बाद किसी संस्था से नही जुड़ेंगे, अब वह ऐसी जगह घूमते हैं जहां जल, जंगल ,जमीन को लेकर कोई संघर्ष चल रहा हो।
वह ऐसी जगह भी जाते हैं जहां ग्राम स्वराज़ की दृष्टि से रचना के कार्य चल रहे हों।

उनका मानना है कि आजकल गांधी विचार के लोग बहुत हैं और युवाओं को भी गांधी के विचारों में भविष्य दिख रहा है पर गांधी को समझाने वाले लोग अब बहुत कम बचे हैं और गांधी से जुड़ी संस्थाएं अब थक चुकी हैं।

वह कहते हैं कि गांधी के विचार, विनोबा का सानिध्य और जयप्रकाश नारायण के साथ रह कर उनका जीवन धन्य हुआ। 
वर्तमान परिस्थितियों से अमरनाथ भाई खिन्न हैं, वह कहते हैं आज़ादी तक तो भारतीय जनता ने संघर्ष किया पर पहले लोकसभा चुनाव के बाद भारतीय जनता निश्चिंत हो गई कि अब सब काम सरकार करेंगी, जनता तब सोई और अब तक उठी नही है।
देश का निर्माण आयातित है, पंचवर्षीय योजना रूस की तो शिक्षा मैकाले वाली चल रही है।

वह बोलते हैं कि जयप्रकाश कहते थे कि ग्राम स्वराज़ के लिए उल्टे पिरामिड को सीधा करना है। सारी शक्तियां उल्टे पिरामिड की तरह ऊपर से नीचे आ रही हैं, जबकि गांव स्वावलंबी बन सब कुछ कर सकते हैं। गांव में ही होने वाली वस्तुओं का मूल्य दिल्ली द्वारा निर्धारित किया जाता है, ऐसा क्या है जो गांव में नही हो सकता!
राजनीतिक, शैक्षणिक और सामाजिक अधिकार गांव वालों को सौंप देने चाहिए।

उन्होंने 'पेसा कानून' और उस पर दिग्विजय सिंह के विचारों की भी चर्चा की, जिन्होंने आदिवासियों को उनके अधिकार देने के लिए ग्राम स्वराज और विशेष क़ानून 'पेसा' के ज़रिए एक प्रयास किया था।
दिग्विजय नक्सलवाद समस्या का समाधान पेसा कानून को बताते थे पर वह कानून आज लगभग भुला दिया गया है और उस पर कोई अधिक कार्य नही हुआ।

इस दो अक्टूबर अमरनाथ भाई चम्पारण में किसान आंदोलन के समर्थन में हो रही पदयात्रा में होने गए हुए हैं।

कोरोना के बाद रोज़गार के अवसर समाप्त हो गए हैं और देश की स्थिति डांवाडोल चल रही है। अगर हम पीछे मुड़ कर देखें तो आज़ादी के बाद हमने बहुत सी गलतियां की हैं, गांधी को बिना पढ़े उन पर चर्चा करने वाले लोग अगर उन्हें थोड़ा सा भी पढ़ते तो वह समझ जाते कि उनके जल्दी जाने से देश को कितना नुकसान हुआ। महात्मा गांधी का सपना ग्राम स्वराज़ अगर पूरा हुआ होता तो आज का भारत बेरोजगारी की इतनी विकराल समस्या से जूझ नही रहा होता।

हिमांशु जोशी, उत्तराखंड।

(सर्व सेवा संघ महात्मा गाँधी द्वारा या उनकी प्रेरणा से स्थापित रचनात्मक संस्थाओं तथा संघों का मिलाजुला संगठन है, जो उनके बलिदान के बाद आचार्य विनोबा भावे के मार्गदर्शन में अप्रैल 1948 में गठित किया गया। संशोधित नियमों के सन्दर्भ में यह देशभर में फैले हुए "लोकसेवकों का एक संयोजक संघ" भी बन गया है। इसे अखिल भारत सर्वोदय मण्डल के नाम से भी जाना जाता है।)

नीम करौली महाराज के 'गिरिजा शंकर' जैसे होने चाहिए जीवन आदर्श.

नीम करौली महाराज ने ही गिरिजा शंकर मुनगली के नामकरण में आकर उन्हें यह नाम दिया था, महाराज की पुत्री का नाम भी गिरिजा ही था। गिरिजा का मतलब है पार्वती या हिमालय की पुत्री।

'गिरिजा शंकर मुनगली' नाम ठीक से पढ़िए, अगर आप किसी उत्तराखंडवासी को जानते हैं और उनके नामों से परिचित हैं तो मेरी गारंटी है कि आपको यह नाम 'मुनगली' को छोड़ उत्तराखंड से जुड़ा तो नही लगेगा।

चलिए इस नाम को गूगल पर सर्च करिए अब आपको इसके नतीजों में रिटायर्ड कर्नल गिरिजा शंकर मुनगली के 'एफसी टास्क फोर्स' के सदस्यों में चुने जाने के बारे में पता चलेगा।
गूगल की यह जानकारी उस शख्सियत की जानकारी देने के मामले में बहुत कम है जिसने नैनीताल की खूबसूरत वादियों से निकल उत्तराखंड का नाम देश-विदेश में रोशन किया।

                    गिरिजा शंकर मुनगली

सालों पहले नैनीताल की झील में अपने कुछ साथियों के साथ निडरता से तैरने वाले बालक गिरिजा का जन्म नैनीताल के एक धर्मपरायण परिवार में हुआ। उनके परदादा भवानी दत्त तब कुमाउनी समाज के प्रतिष्ठित लोगों में से थे, उन्होंने 19वीं शताब्दी में  नैनीताल-हल्द्वानी सड़क के निर्माण के साथ ही भीमताल बैराज के निर्माण में अहम योगदान दिया था।
गिरिजा के पिता भुवन चन्द्र भी स्थापित ठेकेदार एवं सफल व्यापारी थे, उनके नीम करौली महाराज से बहुत अच्छे सम्बन्ध थे। नीम करौली बाबा ने वृंदावन से आने पर उनके हल्द्वानी स्थित घर में बहुत समय तक निवास किया था, बाबा के आदेशानुसार ही गिरिजा के पिता ने अपनी सामर्थ्यानुसार नैनीताल स्थित हनुमानगढ़ी मंदिर का निर्माण कराया।

नीम करौली महाराज ने ही गिरिजा शंकर मुनगली के नामकरण में आकर उन्हें यह नाम दिया था, महाराज की पुत्री का नाम भी गिरिजा ही था। गिरिजा का मतलब है पार्वती या हिमालय की पुत्री।

गिरिजा की एक बहन और चार भाई भी हैं और उन पर बचपन से ही अपने माता-पिता का बड़ा प्रभाव रहा और उनकी कही बातों को उन्होंने पूरे जीवन भर के लिए गांठ बांधा हुआ है। गिरिजा के पिता उनसे कहते थे कि जीवन में कुछ भी छोड़ना चाहते हो तो तुरंत छोड़ दो, अगर सोचोगे तो कभी नही छोड़ पाओगे।
अपनी माता कमला मुनगली की एक बात गिरिजा हमेशा दोहराते हैं और वह उसे ही अपने जीवन में सफलता का सूत्र बताते हैं,  उनकी मां कहती थी कि तुम्हारा विश्व तुम्हारे मस्तिष्क के अंदर है। हारना और जीतना सब कुछ मस्तिष्क से ही नियंत्रित होता है।

नैनीताल का माहौल

बचपन से ही नैनीताल के पढ़ाई-लिखाई वाले माहौल का गिरिजा पर बहुत सकारात्मक असर पड़ा, वह कहते हैं कि नैनीताल की लाइब्रेरी ने उन पर बहुत गहरा प्रभाव डाला।
उसी लाइब्रेरी में किताब पढ़ते-पढ़ते उन्हें पता नही चला कि कब किताबें उनकी सबसे अच्छी दोस्त बन गई, किताबों के सिवा नैनीताल में राजीव लोचन साह और विजय मोहन खाती से भी उनकी आजीवन दोस्ती बन गई।
कॉलेज के दिनों में उनके प्रिय विषय अर्थशास्त्र और इतिहास थे, वह कॉलेज के दौरान ही एनसीसी की नेवल विंग से भी जुड़े।
नैनीताल में होने वाले खेलों से गिरिजा का रुझान खेलकूद की तरफ भी बराबर बना रहा।

कॉलेज के बाद गिरिजा ने अपने पिता के कहने पर अल्मोड़ा मैग्नेसाइट में नौकरी शुरू करी, उनके पिता चाहते थे कि गिरिजा कहीं काम कर जीवन के अनुभवों को सीखे। उनकी पहली तनख्वाह 175 रुपए थी, कुछ समय बाद उनके काम से प्रभावित हो कम्पनी ने उन्हें अहम जिम्मेदारी पर दिल्ली भेज दिया।
दिल्ली के अनुभवों ने गिरिजा को जीवन में संघर्षों से लड़ना सिखाया। इसी बीच घर के खराब होते आर्थिक हालातों ने उन्हें और भी अधिक मजबूत बनाया।

नैनीताल तल्लीताल कैंटोनमेंट क्षेत्र में जन्म लेने के कारण गिरिजा का सेना के प्रति बचपन से ही लगाव रहा, सेना से जुड़ने का गिरिजा का यह अधूरा सपना उनके  दिल्ली प्रवास के दौरान और अधिक तब परवान चढ़ा जब वह 26 जनवरी की परेड देखने लाल किले पहुंचे।
यही शुरुआत थी जब गिरिजा ने सपने देखने शुरू किए और उन्हें पूरा भी किया।

सेना में अधिकारी के तौर पर जुड़ने के बाद उन्हें वहां अनेक विभूतियों के साथ काम करने और सीखने का मौका मिला जिनमें आर्मी चीफ बी सी जोशी, आर्मी वाइस चीफ जनरल दर, आईएमए के लंबे समय तक कमांडेंट रहे जनरल पन्त शामिल रहे।

                        मुनगली दम्पत्ति

सेना में रहने के दौरान ही जब गिरिजा अवकाश में नैनीताल आए तो उन्होंने वहां देवयानी को देखा, उन्हें पहली बार देखकर ही गिरिजा को महसूस हुआ कि यही उनकी जीवनसाथी होंगी। 
                 स्वामी राम के साथ गिरिजा

देवयानी के पिता स्वामी राम, स्वामी राम हिमालयन यूनिवर्सिटी के संस्थापक और माता लीलू कुमार नैनीताल में अंग्रेज़ी की प्रोफेसर थी।
लीलू मशहूर लेखिका शिवानी और भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी के परिवार से सम्बन्ध रखती थी।

देवयानी से विवाह के बाद गिरिजा ने हिमालय विषय पर पीएचडी करी, जिसकी प्रेरणा उन्हें एडमण्ड हिलेरी से मिलने के बाद मिली।

            एडमण्ड हिलेरी के साथ गिरिजा

गिरिजा की यह पीएचडी पद्मश्री शेखर पाठक के निर्देशन में पूरी हुई और इसी दौरान उन्हें हिमालय पर बहुत से किताबें पढ़ने का भी मौका मिला, जिससे वह गहराई से हिमालय को समझ सके।

सेना में वह पैराट्रूपर रहे और एक मौका तो ऐसा भी था जब उनके छोटे भाई जो वायुसेना में पायलट थे वह विमान चला रहे थे और गिरिजा ने उस विमान से जम्प करी थी।

                    सेना की वर्दी में गिरिजा


जीवन बदलने वाली घटना

 वर्ष 2001 में सियांग नदी में रिवर राफ्टिंग के दौरान हुई घटना को गिरिजा अपने जीवन को परिवर्तित करने वाली बताते हैं। वह कहते हैं कि जब उनकी राफ्ट वहां भंवर में फंस गई थी तो उन्हें उनकी मृत्यु स्पष्ट दिखी और उन्होंने वहां पर अपना पूरा जीवन प्रत्यक्ष देखा, उन्हें वह सब लोग दिखे जिनसे वह प्रेम करते हैं।

गिरिजा जब वहां से बचकर बाहर निकले तो उनका मस्तिष्क परिवर्तित होने लगा, वह कहते हैं कि उनके अंदर से मृत्यु का भय समाप्त हो गया और उन्हें अहसास हो गया कि कोई हमें हराता या जिताता नही है, पूरा बह्मांड हमारे अंदर ही है।
व्यक्ति जो चाहे कर सकता है।

अब गिरिजा को जीवन में कुछ नया करना था, वह फौज का जीवन छोड़ समाज के लिए कुछ करने का मन बना चुके थे। उन्होंने पुणे में फौज से वॉलंटरी रिटायरमेंट ले ली और कुछ समय भारत की बड़ी कम्पनियों में से एक 'वेंकीज़' में काम किया।

इसके बाद गिरिजा की इच्छा थी कि वह एक टाउनशिप विकसित करें और पुणे में जमीन ले उन्होंने अपने इस सपने पर काम शुरू किया। 
गिरिजा की फौज में नौकरी के दौरान उनकी पत्नी देवयानी मुनगली ने अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए अलग-अलग स्कूलों में पढ़ाया, जिस वजह से उनका सपना था कि वह खुद का ऐसा स्कूल खोलेंगी जिसमें भारतीय बच्चे अन्य स्कूलों से हटकर सर्वश्रेष्ठ शिक्षा प्राप्त करें।
पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के साथ गिरिजा


इसके लिए मुनगली दम्पति ने छह बच्चों के साथ संस्कृति स्कूल की शुरुआत की। स्कूल की पूरी योजना गिरिजा की पत्नी ने बनाई और गिरिजा ने यहां पर अपनी भूमिका सहयोगी तक ही सीमित रखी, वह पर्दे के पीछे ही कार्य करते रहे।

         किरण बेदी के साथ देवयानी मुनगली

स्कूल के उद्घाटन में स्वयं एपीजे अब्दुल कलाम साहब आए थे। आज स्कूल की शाखाएं पुणे में तीन अन्य जगह भी खुल चुकी हैं और स्कूल ने महाराष्ट्र के सबसे अच्छे स्कूलों के तौर पर खुद को स्थापित किया है।
बाइचुंग भूटिया, किरण बेदी जैसे बड़े नाम स्कूल में आकर बच्चों को नई राह दिखाते रहते हैं।
मुनगली दम्पति विदेशों में अपने भ्रमण के दौरान वहां के स्कूलों में भी जाते हैं, देवयानी वहां से सीखे अनुभवों का फायदा उठा अपने स्कूल के छात्रों को भी विश्वस्तरीय शिक्षा प्रदान करने की कोशिश करती रहती हैं।
तिब्बतियों के धर्मगुरु दलाई लामा से हुई एक मुलाकात के बाद अब गिरिजा के उनसे बड़े ही आत्मीय सम्बन्ध हैं।

         दलाई लामा के साथ मुनगली दम्पत्ति

गिरिजा के दोनों बच्चे अपने पिता की दी हुई सीख से उनकी तरह ही निडर हैं और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पढ़ अब अपने माता-पिता के काम में सहयोग कर रहे हैं।

हिमालय के कर्ज़ को चुकाने का वक्त

गिरिजा अब पहाड़ में रोज़गार के अवसर पैदा करना चाहते हैं जिससे उत्तराखंड में पलायन की समस्या का समाधान हो।
वह शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी पहाड़ का विकास करना चाहते हैं, इन सब के लिए वह अपने अनुभवों को यहां झोंकना चाहते हैं। 
वह कहते हैं उन्होंने जीवन में सब कुछ प्राप्त कर लिया है और अब पहाड़ का ऋण चुकाने का समय है, इसके लिए उन्हें कोई लाभ नही चाहिए।
 इन सब के लिए वह एफडीआई का रास्ता अपनाना चाहते हैं।
                        मुनगली दम्पत्ति

गिरिजा ने अपने जीवन में जिन नियमों का पालन किया वह है-
● चलते रहिए
● सपने देखो पर एक लक्ष्य के साथ
● अपनी आवाज़ पर विश्वास करो
● अपने डर को कभी खुद पर हावी मत होने दो

हिमांशु जोशी, उत्तराखंड।
(लेखक गिरिजा शंकर मुनगली पर किताब भी लिख रहे हैं)

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