Saturday, April 29, 2023
Saturday, April 22, 2023
जंगल आग
विभाग के पास कितनी गाड़ी, कितने लोग, आग बुझाने का तरीका,
ग्रामीणों की आग बुझाने पर राय, चाल खाल चंदन नयाल का काम, विशेषज्ञ टिप्पणी।
Friday, April 21, 2023
पहाड़ी प्रदेश में जमती पढ़ने की संस्कृति, लगातार तीसरा किताब कौथिग.
कोरोना काल में पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में शराब के ठेकों पर लम्बी लाइन देखी जा रही थी पर कोरोना के बाद से प्रदेश की हवा कुछ कुछ बदली सी है. प्रदेश में पिछले पांच महीनों में दो पुस्तक मेलों का आयोजन किया जा चुका है और अब तीसरे की तैयारी है. टनकपुर, बैजनाथ के बाद यह पुस्तक मेला 20 व 21 मई को चंपावत में आयोजित होगा.
क्यों कहा जा रहा है किताब कौथिग.
प्रदेश में हो रहे इन पुस्तक मेलों को 'किताब कौथिग' नाम दिया जा रहा है.
किताब कौथिग नाम रखने की वजह के पीछे के कारण पर बात करते, इन किताब कौथिगों को आयोजित करवाने में अहम भूमिका निभाने वाले हिमांशु कफलटिया बताते हैं कि कौथिग उत्तराखण्ड की अमूल्य धरोहर हैं. सदियों से पहाड़ की इस धरती पर धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, व्यापारिक, सामरिक कारणों से कौथिगों का आयोजन होता आया है. कालांतर में कुछ कौथिगों या मेलों ने भव्य रूप ले लिया तो कुछ विलुप्त भी हो गए. दिसंबर 2022 में हेम पन्त और मैंने एक अभिनव प्रयास की शुरुआत करी, हेम पंत पहाड़ी संस्कृति को बचाने के लिए काम कर रहे मंच 'म्योर पहाड़ मेरि पछ्यान' से जुड़े थे तो मैं टनकपुर में एसडीएम पद पर रहते हुए 'सिटीजन पुस्तकालय अभियान' के माध्यम से समाज में पढ़ने लिखने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देने का प्रयास कर रहा था.
जब इन दो विचारों का मिलन हुआ तो उससे एक नया विचार किताब कौथिग अर्थात किताबों का मेला हमारे सामने आया.
इस नए प्रयोग में टनकपुर के समाज के हर वर्ग ने अपना योगदान दिया और पहला किताब कौथिग बहुत ही सफल रहा. अब उत्तराखंड के युवा प्रशासनिक अधिकारी जैसे बागेश्वर की डीएम अनुराधा पाल व चम्पावत के डीएम नरेंद्र भंडारी किताब कौथिग परंपरा को बढ़ावा देने के साथ संरक्षित भी कर रहे हैं.
टनकपुर किताब कौथिग में बच्चों के साथ देवेंद्र मेवाड़ी
लेखक देवेंद्र मेवाड़ी के कौथिग पर अनुभव.
बाल साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त लेखक देवेंद्र मेवाड़ी ने टनकपुर किताब कौथिग की समाप्ति के बाद लिखा था कि नेपाल सीमा पर सदानीरा शारदा के किनारे बसे नगर टनकपुर के 'किताब कौथिग' से लौटा हूं. वहां आसपास कौथिग यानी मेले तो कई लगे होंगे, लेकिन टनकपुर के निवासियों ने अपने नगर में किताबों का कौथिग पहली बार देखा. हां पहली बार, इसीलिए यह उस नगर की ऐतिहासिक घटना बन गई. इसके साथ ही इस घटना ने व्यापारिक शहर टनकपुर में एक नए साहित्यिक तथा सांस्कृतिक माहौल की शुरुआत कर दी है.
24-25 दिसंबर को आयोजित इस कौतिक में सैकड़ों स्थानीय विद्यार्थियों और नगर निवासियों ने भाग लिया और वे अपने चहेते लेखकों और कलाकारों से मिले. मेले में दूर सिने नगरी मुंबई से उनके प्रिय अभिनेता हेमंत पांडे आए थे तो दिल्ली शहर से जाने-माने यायावर लेखक उमेश पंत, देहरादून से प्रिय साहित्यकार गीता गैरौला, उमा भट्ट, मुकेश नौटियाल, युवा पीढ़ी की दिलों की धड़कन कॉमेडियन पवन पहाड़ी, चांद-तारों की कहानियां सुनाने वाले नैनीताल वेधशाला के वैज्ञानिक मोहित जोशी, पुस्तक संस्कृति की अनूठी अलख जगाने वाले 'आरम्भ' स्टडी सर्कल के समर्पित साथी, टोपी राम की कहानी सुनाते-गाते बच्चों के प्रिय उदय किरौला, घुघुती जागर टीम के प्यारे गायक राजेन्द्र ढैला व तीन सौ से अधिक चिड़ियों और जानवरों की आवाज़ें सुनाने वाले प्रकृति प्रेमी राजेश भट्ट शामिल हुए. वहां पड़ोसी देश नेपाल से आए दस प्रिय नेपाली भाषा के साहित्यकार भी थे.
टनकपुर किताब कौथिग में बच्चों के साथ बॉलीवुड कलाकार हेमंत पांडे
वहां मंच पर स्कूली बच्चे एक से एक बेहतरीन, मनभावन सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश कर रहे थे. नन्हे बच्चों के अनोखे छोलिया नृत्य से आंखें नहीं हटती थीं. नगारे भी वे बच्चे उस्तादों की तरह खुद ही बजा रहे थे. दो बालिकाएं कुमाऊंनी चांचरी गीत की पंक्तियां गाती थीं और छोलिया नर्तक बच्चे नृत्य मोड में आ जाते थे.
वहां किताबें थीं, प्रकाशक थे. टनकपुर नगर में बच्चों ने शायद पहली बार एक साथ इतनी सारी किताबें देखीं. किताबें देख कर उनके चेहरे खिल रहे थे.
वहां हवा में उत्तराखंड के गीत गूंज रहे थे-
'उत्तराखंड मेरी मातृभूमि
मेरी पितृभूमि
म्यर हिमाला !'
- 'माया ले भरीया मन
बिन माया उदास
मेरि हिरू न्है गै
रंगीला भाबर !
बड़ा मायालू गीत था यह, जिसकी लय-ताल पर बड़ी संख्या में बच्चों से लेकर बड़े तक क़दम से क़दम मिला कर झोड़ा गा रहे थे.
हिमांशु कफलटिया दाएं तो बाएं बैठे हेम पन्त
हेम पन्त ने कहा प्रशासन का सहयोग मिला कार्यक्रम अभी आगे और भी होते रहेंगे.
प्रशासनिक अधिकारी हिमांशु कफलटिया के साथ किताब कौथिगों के सपने को साकार बनाने वाले पेशे से इंजीनियर हेम पन्त कहते हैं कि उनके और हिमांशु के मन में किताब कौथिग आयोजित करवाने का पहली बार विचार आया तो टनकपुर से इसकी शुरुआत हुई.
हमारा यह विचार था कि एक ही कार्यक्रम के साथ हम तीन-चार चीजों को जोड़कर आगे बढ़ें. जैसे शिक्षा, साहित्य, पर्यटन के साथ उत्तराखंड की विशिष्ट लोक संस्कृति भी इन कौथिगों में शामिल हो.
हम इसको एक सामाजिक दायित्व की तरह ले रहे हैं. उत्तराखण्ड के जिस भी जिले का प्रशासन हमें सहयोग करेगा, हम वहां यह कार्यक्रम करने की कोशिश करेंगे.
बैजनाथ किताब कौथिग में उमड़ी भीड़
बैजनाथ किताब कौथिग भी पहले किताब कौथिग की तरह हिट रहा.
15 और 16 अप्रैल को बागेश्वर के बैजनाथ में सम्पन्न हुए किताब कौथिग में भी टनकपुर किताब कौथिग जैसी रौनक रही थी. बागेश्वर के कई विद्यालयों के विद्यार्थियों ने इस किताब कौथिग में भाग लिया और पचास से अधिक प्रकाशकों की किताबें कौथिग में उपलब्ध थी. कार्यक्रम में
इतिहासकार शेखर पाठक, उत्तराखंड के लोक संगीत को बढ़ावा दे रहीं माधुरी बर्थवाल, उत्तराखंड के सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक उत्तराखंड श्री अनिल रतूड़ी शामिल थे.
टनकपुर किताब कौथिग में शामिल रहे चिड़ियों और जानवरों की आवाज़ें सुनाने वाले प्रकृति प्रेमी राजेश भट्ट यहां भी शामिल हुए.
एरीज और नक्षत्र संस्था ने संयुक्त रूप से एस्ट्रोनॉमी से जुड़े क्रियाकलापों को भी इस कार्यक्रम में शामिल किया गया था.
हिमांशु जोशी
@himanshu28may
Sunday, April 16, 2023
एनसीआरटी के कोर्स बदलाव वाले दौर में जरूरी होता शिक्षा में नवाचार।
इस सत्र में एनसीआरटी ने स्कूलों में पढ़ाए जाने वाले इतिहास, विज्ञान, हिंदी जैसे विषयों के कोर्स में बदलाव किए हैं, जिनको लेकर विवाद चल रहा है। हाल में कक्षा नौ और दस के जीव विज्ञान विषय से डार्विन के विकासवादी सिद्धांत को हटा दिया गया है।
देशभर के शिक्षाविदों ने इस पर अपनी आपत्ति जताते हुए एनसीईआरटी से मांग की है कि माध्यमिक शिक्षा में डार्विन के विकासवादी सिद्धांत को बहाल किया जाए। विकास की प्रक्रिया को समझना ‘वैज्ञानिक सोच के निर्माण में महत्वपूर्ण’ है और छात्रों को इससे वंचित करता ‘शिक्षा का उपहास’ है।
कोर्स में इस बदलाव को देख याद आती है पीटर ग्रे की किताब।
एनसीआरटी द्वारा स्कूली शिक्षा में किए जा रहे इस बदलाव का कारण समझना हो तो हमें शिक्षा पर लिखी पीटर ग्रे की लोकप्रिय किताब 'शिक्षा का अर्थ' में इसकी वजह मिलती है। जिसमें लिखा है जैसे-जैसे राष्ट्र जुड़ते और ज्यादा से ज्यादा केंद्रीकृत होते गए, राष्ट्रवादी नेता स्कूली शिक्षा को वफादार देशभक्त और भावी सैनिक तैयार करने के माध्यम के रूप में देखने लगे। उनके अनुसार मातृभूमि की महान गाथाएं, हैरतअंगेज उपलब्धियां और देश के संस्थापकों व नेताओं के नैतिक उपदेश तथा बाहरी दुष्ट ताकतों से देशरक्षा की जरूरत जैसे पाठ बच्चों को अवश्य पढ़ाए जाने चाहिए।
तो जाहिर सी बात है कि राष्ट्रवाद के इस दौर में वैज्ञानिक सोच पर बात कम ही की जाएगी।
शिक्षा कमाल करती है, शिक्षा से सम्भव है दूसरे धर्मों का सम्मान।
एनसीआरटी द्वारा हटाए गए कोर्स में मुगलों का इतिहास भी शामिल है।
भारतीय शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए बनाई गई 'राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005' में छात्रों के अंदर आपसी भाईचारे पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया है। उसमें लिखा है भारत एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य है, इसका अर्थ है कि सभी आस्थाओं का आदर किया जाता है, लेकिन साथ ही भारतीय गणराज्य किसी आस्था विशेष को अपेक्षाकृत अधिक श्रेष्ठ नहीं मानता। आज बच्चों में सभी लोगों के प्रति चाहे वे किसी भी धर्म के हों, समान आदरभाव पोषित करने की जरूरत है।
मुगलों के इतिहास का कोर्स से हटना 'राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005' के लक्ष्य प्राप्ति में रुकावट ही जान पड़ता है।
दिनेश कर्नाटक की लिखी किताब 'शिक्षा में बदलाव की चुनौतियां' की पंक्ति 'जहां 9वीं कक्षा तक सभी बच्चे आपस में घुल मिलकर रहते थे। वहीं 10वीं में मुस्लिम बच्चे एक साथ बैठने लगते थे' यह साबित करती है कि एक दूसरे के धर्म से दूरी भारतीयों में स्कूली शिक्षा के दौरान ही बढ़ रही है।
युवाओं को सही दिशा दिखाने के लिए जरूरी है शिक्षा में नवाचार।
शांति के लिए नोबेल पुरस्कार प्राप्त कोफी अन्नान का कहना था कि युवाओं को वैश्विक परिवर्तन और नवाचार की अगुवाई करनी चाहिए। उन्हें सशक्त बनाया जाए तो वे विकास और शांति के अग्रदूत बन सकते हैं और यदि उन्हें समाज के हाशिए पर छोड़ दिया जाए तो हम सभी दरिद्र बन जाएंगे। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि सभी युवाओं को समाज के जीवन में सहभागी बनने से हर अवसर मिले।
युवाओं को नवाचार शुरू करने के लिए प्रोत्साहित करना है तो भारतीय स्कूली शिक्षा में ही नवाचार पर जोर देना होगा।
बच्चों के अधिकारों की रक्षा करने वाली संस्था यूनिसेफ अनुसार शिक्षा में नवाचार का अर्थ समान शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए नए और सरल तरीके से वास्तविक समस्या को हल करने से है।
शिक्षा में नवाचार तभी सम्भव होगा जब ज्ञान को स्कूल के बाहर के जीवन से जोड़ा जाएगा, यह सुझाव हम राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 में भी पढ़ते हैं। इस तरह यदि हम शिक्षा में नवाचार ला पाने में सफल होते हैं तो छात्रों में एनसीआरटी द्वारा किए गए इस कोर्स बदलाव का इतना प्रभाव नही पड़ेगा।
बुनाई सीखते अद्वैत, शिक्षा में नवाचार का इससे बेहतर उदाहरण क्या होगा
शिक्षा में नवाचार से बढ़ता है ज्ञान सृजन।
शिक्षा में नवाचार का उदाहरण हमें 'शिक्षा के अर्थ' किताब में मिलता है, जहां परम्परागत स्कूली शिक्षा के बिना सफल होते बच्चों के बारे में लिखते हुए मैसाचुसेट्स के सडबरी वैली स्कूल के बारे में लिखा गया है। वहां बच्चे पूरी तरह से निर्देशित गतिविधियों से खुद को शिक्षित करते हैं। वहां कोई परीक्षा नहीं होती, पढ़ाई को लेकर कोई जोर जबरदस्ती नहीं की जाती और ना ही कोई पास फेल होता है। स्कूल से निकलकर बच्चे कुशल कारीगर, कलाकार, रसोइए, चिकित्सक, इंजीनियर, उद्यमी, वकील, संगीतकार, वैज्ञानिक, समाजसेवी और सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनते हैं। वहां के बच्चे उन सभी पेशों में नाम कमा रहे हैं, जिन्हें हम अपने समाज में इज्जत देते हैं।
बच्चे अपने अनुभवों से स्वयं ज्ञान सृजन करते हैं और शिक्षा में नवाचार उन्हें इस बात में मदद करता है। किसी नाटक को करते हुए उन्हें दिशाओं का ज्ञान सिखाया जा सकता है तो नाटक के जरिए उन्हें एक दूसरे के धर्म के बारे में भी समझाया जा सकता है।
शिक्षा में नवाचार से पकड़ी सही दिशा, माता पिता किताबें पढ़ें तो बच्चे भी करते हैं दोस्ती।
माता पिता किसी भी छात्र की शिक्षा में नवाचार की पहली सीढ़ी होते हैं। सॉलिफाई वेबसाइट चला रहे सिद्धार्थ मस्केरी और स्मृति राज अपने बच्चे अद्वैत को बिना किसी स्कूली शिक्षा के घर पर ही बौद्धिक रूप से विकसित होने का मौका दे रहे हैं, छोटी सी उम्र में ही अद्वैत घर के सारे कार्य करते हैं और साथ ही बेहतरीन पियानो भी बजाते हैं। बच्चे अक्सर घर पर इसलिए किताबें नही पढ़ते क्योंकि उनके माता-पिता भी किताबों से दोस्ती नही करते, सिद्धार्थ और स्मृति को किताबें पढ़ने का शौक है तो उन्हें देख अद्वैत खुद किताबें पढ़ते हैं। अद्वैत एयरोडायनामिक पढ़ते हुए ग्लाइडर बनाना भी सीख रहे हैं।
फिल्मोत्सव में शामिल नानकमत्ता पब्लिक स्कूल के बच्चे।
उत्तराखंड का नानकमत्ता पब्लिक स्कूल भी शिक्षा में नवाचार का अड्डा बनकर सामने आया है। स्कूल के विद्यार्थी किताबों की समीक्षा लिखते हैं, किताबों पर परिचर्चा करते हैं, यूट्यूब पर डॉक्यूमेंट्री बनाते हैं, खुद का पुस्तकालय चलाते हैं और यह सब वह स्कूल के संस्थापक कमलेश अटवाल के मार्गदर्शन में कर रहे हैं। कमलेश उन्हें नया सीखने की प्रेरणा देते हैं। वह अपने छात्रों के लिए आईआईटी, आईआईएमसी, जेएनयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से जुड़े लोगों की वर्कशॉप करवाते हैं। इसके लिए स्कूल के बच्चे रविवार को भी अपनी मर्जी से कुछ नया सीखने स्कूल चले आते हैं।
हिमांशु जोशी।
Wednesday, April 5, 2023
नाम मिटाने की यह साजिश पुरानी है.
खबर है कि एनसीईआरटी ने कक्षा बारह की इतिहास की किताब से गांधी की हत्या से जुड़ा वो हिस्सा हटा दिया गया है जिसमें उन्हें मारने वाले को ब्राह्मण और कट्टरपंथी हिंदू अखबार का संपादक बताया गया था. ऐसी कई अन्य बातें भी हैं जो छात्रों को बताना जरूरी नही समझा जा रहा है.
इस बारे में अभी विवाद हो रहा है पर महात्मा गांधी को इतिहास से मिटाने की यह साजिश पिछले काफी समय से चल रही है.
आदित्य मुखर्जी, मृदुला मुखर्जी और सुचेता महाजन की किताब 'आरएसएस, स्कूली पाठ्यपुस्तकें और महात्मा गांधी की हत्या' किताब शिक्षा के साम्प्रदायिकरण के खिलाफ वर्ष 2001 में दिल्ली हिस्टेरियन ग्रुप के तहत शुरू हुए एक अभियान का हिस्सा है. इसका हिंदी अनुवाद सौरभ बाजपेयी द्वारा किया गया है.
किताब के लेखकों का कहना है कि इस किताब को आए दस साल हो गए हैं पर किताब जिन मुद्दों पर लिखी गई उन मुद्दों की प्रासंगिकता घटने के बजाए बढ़ती ही जा रही है. अब एनसीआरटी की किताबों को लेकर उठा यह विवाद किताब के लेखकों की बातों को सच साबित भी करता है.
विपिन चन्द्र की प्रस्तावना अप्रैल 2007 में उत्तर प्रदेश विधनसभा चुनाव प्रचार अभियान में चल रहे सीडीज के खेल से शुरू होती है.
वह कहते हैं कि किताब पढ़ आप साम्प्रदायिकता के प्रचंड संकट से रूबरू हो जाएंगे.
'आरएसएस और स्कूली शिक्षा' पर दिमाग खोलती किताब.
किताब की शुरुआत में स्पष्ट है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेतृत्व में संघ गठजोड़ की समझ बहुत साफ रही है कि साम्प्रदायिकता को मजबूत करने के लिए जरूरी है कि साम्प्रदायिक विचारधारा को प्रभावी ढंग से फैलाया जाए. यही वजह है कि संघ ने सबसे ज्यादा गम्भीर प्रयास विचारधारा के क्षेत्र में ही किए हैं. दूसरे समुदाय के प्रति घृणा और अविश्वास को भरने के लिए आरएसएस ने इस काम के लिए हजारों सरस्वती शिशु मंदिरों, विद्याभारती के प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों और अपनी शाखाओं को माध्यम के रूप में चुना है.
किताब में आरएसएस द्वारा संचालित सरस्वती शिशु मंदिर प्रकाशन और विद्या भारती प्रकाशन से प्रकाशित पाठ्यपुस्तकों के मूल्यांकन के लिए बनाई गई समिति की रिपोर्ट और उसकी सिफारिश का जिक्र है.
दिल्ली के कुतुबमीनार और उसको बनवाने का श्रेय समुद्रगुप्त को देना जैसे अस्पष्ट तथ्यों को स्कूली शिक्षा में शामिल करना सिफारिश की अहमियत भी प्रमाणित करता है.
गांधी नाम को हटाने की असल वजह.
किताब का दूसरा भाग 'गांधी की हत्या की प्रेतछाया' गांधी नाम को हटाने के डर की वजह और उनकी हत्या की साजिश से पर्दा न उठाने की वजह ढूंढते शुरू होता है.
गांधी नाम पर अक्सर उठने वाले कई सवालों के जवाब इस किताब में मिलते हैं.
'गांधी जी की हत्या का कोई अफसोस नही' जैसे शीर्षकों पर विस्तार से नजर डालने पर पाठकों को यह मालूम पड़ेगा कि आरएसएस ने गांधी जी की हत्या की निंदा करते हुए कभी एक वक्तव्य तक जारी नही किया.
भाजपा पर नजर रखते हुए लेखकों ने भाजपा सरकार द्वारा बहुत से मौकों पर सावरकर को फिर से जिंदा किए जाने का वर्णन इस किताब में लिखा है. जैसे साल 2003 में भाजपा सरकार ने संसद भवन में सावरकर की तस्वीर को ठीक महात्मा गांधी की तस्वीर के सामने लगाया.
भारतीय राष्ट्रवाद को हिन्दू राष्ट्रवाद तक सीमित कर दिया गया है, इतिहास के पन्नों को पलटकर लिखी एक किताब.
किताब के अंतिम भाग में यह समझाने की कोशिश की गई है कि हिंदुत्व के विचारकों के लेखन में हिंदुत्व की जो धारणा पेश की गई है उसके अनुसार भारत सिर्फ हिंदुओं का देश है, मुसलमान हमारे दुश्मन हैं, वे राष्ट्रद्रोही और गद्दार हैं.
इसको पढ़कर पाठकों को समझ आता है कि यही वह बात है जिसके दिमाग में भर जाने से महात्मा गांधी की हत्या की गई थी और अब बनाए नए पाठ्यक्रम का यह परिणाम भी हमारे सामने आ सकता है.
इतिहास के प्रोफेसर लेखकों ने किताब खत्म करने से पहले एक महत्वपूर्ण तथ्य पाठकों के सामने रखते हुए लिखा है कि साल 1937 में ही सावरकर ने हिन्दू महासभा में दो राष्ट्रों के बारे में बात की थी और मुस्लिम लीग में यह मांग 1938 में उठी, जिसकी प्रतिक्रिया में सावरकर द्वारा अपने बयान बदल दिए गए थे.
'हिन्दू महासभा से जुड़े लोगों की अंग्रेजों से वफादारी और उसके बाद भी हिन्दू समेत तमाम भारतीयों से खारिज हो चुनावों में हार की हताशा ने गांधी हत्या की नींव तैयार करी.' जैसी पंक्ति सीख देती है कि जनता हमेशा से अपना मत राष्ट्रहित में ही देना चाहती है.
इस किताब को पढ़ने के बाद सालों से एक ही विचारधारा से जुड़े लोग अपने समाज और राजनीतिक माहौल को समझते हुए स्वयं में एक आलोचनात्मक चिंतन कर सकते हैं, लोकतंत्र के लिए यह बहुत आवश्यक भी है.
हिमांशु जोशी
@himanshu28may
Sunday, April 2, 2023
अपनी जमीन तलाशता सलमान.
आज सुबह हल्द्वानी में सलमान से मुलाकात हुई।
ये बच्चा अभी किसी मोटरसाइकिल की सर्विस इतनी दक्षता से कर सकता है जो मैं या आप सोच भी नही सकते, सोच इसलिए नही सकते क्योंकि हमने कभी ये काम सीखे ही नही न हमारी शिक्षा पद्धति में इसकी कोई जगह है।
व्यवसायिक शिक्षा
तीन भाइयों में मंझला सलमान तीन साल पहले बदायूं के आसपास अपने गांव से हल्द्वानी चला आया। सलमान के पिताजी गांव में जीन्स बनाने का काम करते थे, जहां उनके पास पचास के आसपास सिलाई मशीनें थी। उन्हीं सिलाई मशीनों को बेचकर तीन भाई और मां हल्द्वानी आ गए हैं और पिताजी गांव में अपनी पन्द्रह बीघा जमीन पर खेती सम्भाल रहे हैं।
इतनी जमीन होने के बावजूद गांव और पढ़ाई छोड़ने के विषय पर सवाल पूछने के बाद सलमान से वह जवाब मिलते हैं ,जो हिन्दू मुस्लिम टकराव की खबरों के बीच कभी हमारे सामने नही आते।
सलमान कहता है पढ़ाई इसलिए छोड़ी क्योंकि उसका पढ़ने में मन नही लगता, पढ़ने से कौन सा उसे रोज़गार मिल जाता। अभी वह बाइक सर्विस का काम सीख लेगा तो दो चार साल बाद गांव जाकर अपनी बाइक सर्विस सेंटर खोलेगा।
मेरा सवाल यह था कि उसका मन पढ़ाई में क्यों नही लगता था, उसे कौन से विषय ऐसे लगे जिन्होंने उसे स्कूल छोड़ने पर मजबूर कर दिया!
सलमान से इस पर यह जवाब मिला कि पढ़ाई ही बोरिंग थी, यहां सलमान दरअसल उन लाखों भारतीय बच्चों का प्रतिनिधित्व कर रहा है जो स्कूल में खाना-पैसा मिलने के बावजूद पढ़ाई बोझिल लगने पर उसे छोड़ रहे हैं। शिक्षा नीति में बदलाव बस कागजों पर ही अच्छे लग रहे हैं।
सलमान से यह कहने पर कि उसे स्कूल में ही बाइक सर्विस, बढ़ई के कार्य सिखाए जाते तो क्या वह स्कूल छोड़ता! इस बात पर वह सोच में पढ़ गया और उसने तब कहा कि वह स्कूल में रहना पसंद करता।
गांव में इतनी जमीन होने के बाद भी लोगों का शहर पलायन करना ,भारत के लिए बड़ी समस्या है।
कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में जब कोई कृषि करने वाला ही नही बचेगा तो अर्थव्यवस्था चलेगी कैसे! साल 2023 भारत के प्रस्ताव पर संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष घोषित हुआ है।
सलमान कहता है कि गांव में नीलगाय खेती खराब कर देती है और फसलों की रखवाली का काम बड़ा मुश्किल है। उसके घर के पास मंडी भी है पर खेती से दूर रहने का सबसे बड़ा कारण उसने यह बताया या समझें कि उसने मुझसे ही सवाल करते पूछा कि अब खेती में किसकी रुचि है?
कृषि छोड़ने के कारण
कोरोना काल में निज़ामुद्दीन मरकज में शामिल होने आए जमातियों को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा कोरोना फैलाने का जिम्मेदार ठहराने के बाद से देश भर में कई हिन्दू मुस्लिम विवाद देखने को मिला था। हल्द्वानी में भी फल का ठेला लगाने वाले मुस्लिम व्यक्ति के साथ अभद्रता का वीडियो ट्विटर पर जमकर वायरल हुआ था।
हिन्दू मुस्लिम विवाद आंकड़े
कौन हैं यह लोग और कहां से आते हैं! इस सवाल पर सलमान कहता है कि आप और मैं यहां प्यार से बैठे हैं और अपने अपने कामों में मशगूल हैं, यह वही लोग होते हैं जो खुद को चर्चा में लाना चाहते हैं।
Saturday, April 1, 2023
हिंदी क्विंट के लिए लिखने वाले हिमांशु जोशी को 'उमेश डोभाल स्मृति पत्रकारिता पुरस्कार'
स्वास्थ्य, पर्यावरण, कला और महिला अधिकारों को लेकर हिमांशु जोशी ने हिंदी क्विंट के लिए लगातार लिखा है.
उमेश डोभाल स्मृति समारोह इस बार आठ और नौ अप्रैल को चमियाला (टिहरी) में होगा. इस वर्ष प्रतिष्ठित उमेश डोभाल स्मृति सम्मान जनसंघर्षों के माध्यम से लोक कल्याण के लिए समर्पित जोशीमठ बचाओ अभियान के संयोजक अतुल सती को दिया जाएगा जबकि उमेश डोभाल स्मृति पत्रकारिता पुरस्कार टनकपुर के हिमांशु जोशी को मिलेगा. हिमांशु जोशी स्वतंत्र पत्रकारिता करते हैं और हिंदी क्विंट के लिए लगातार लिखते रहे हैं.
https://hindi.thequint.com/amp/story/lifestyle/pop-culture/nagare-khamosh-hai-play-review-shows-truth-politics-of-and-bureaucracy
हिमांशु जोशी
https://hindi.thequint.com/readers-blog/ankita-murder-case-helang-protests-women-driven-movements-of-2022-in-uttrakhand
स्वास्थ्य, पर्यावरण, कला और महिला अधिकारों को लेकर उन्होंने हिंदी क्विंट के लिए लगातार लिखा है.
https://hindi.thequint.com/fit/uttarakhand-poor-health-system-women-health-doctors
उमेश डोभाल स्मृति ट्रस्ट द्वारा एक ऑनलाइन बैठक के बाद सम्मान और पुरस्कारों की घोषणा की गयी. ट्रस्ट के अध्यक्ष गोबिन्द पंत (राजू) ने बताया कि बैठक में अनेक नामों पर चर्चा के बाद निर्णय लिया गया कि इस वर्ष 2023 का उमेश डोभाल स्मृति सम्मान अतुल सती (जोशीमठ) को दिया जाए.
अतुल सती
बैठक में उनके जनसंघर्षो के जरिये जनहित के कार्यों पर विस्तार से चर्चा की गयी और मूल्यांकन के बाद पाया गया कि उत्तराखंड में पर्यावरण एवं जलविद्युत परियोजनाओं के सवाल पर वे लम्बे समय से सक्रिय रहे. जोशीमठ के सन्दर्भ में जल, जंगल और जमीन को बचाने हेतु अभियान का संचालन ही नहीं किया अपितु जनसंघर्षों को धार देते हुए हेलंग में चारागाह बचाने और जोशीमठ को भूधंसाव की आपदा से बचाने हेतु आन्दोलनों का नेतृत्व भी किया और इसे राष्ट्रीय और अर्न्तराष्ट्रीय फलक तक भी पुहँचाया.
ट्रस्ट द्वारा इस वर्ष का राजेन्द्र (राजू) जनसरोकार सम्मान नैनीताल में शिप्रा कल्याण समिति के अध्यक्ष जगदीश नेगी को दिये जाने का निर्णय लिया गया. श्री नेगी लम्बे समय से जनसरोकारों से जुड़े हैं और उन्होंने नैनीताल में शिप्रा नदी की स्वच्छता एवं अविरल प्रवाह हेतु सार्थक प्रयास किये हैं. गिरीश तिवारी (गिर्दा) सम्मान इस वर्ष भास्कर भौर्याल (बागेश्वर) को दिया जायेगा। युवा भौर्याल गिर्दा की सांस्कृति और जनगीतों की परम्परा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं. उमेश डोभाल स्मृति पत्रकारिता पुरस्कार (प्रिन्ट मीडिया) इस वर्ष जनपक्षीय पत्रकारिता के लिए हिमांशु जोशी (टनकपुर) को दिया जायेगा.
https://hindi.thequint.com/lifestyle/uttarakhand-unplanned-tourism-development-destroying-mountains-environment
इसी तरह जनसरोकारों और जनपक्षीय खबरों के लिए उमेश डोभाल स्मृति पत्रकारिता पुरस्कार (इलेक्ट्रॉनिक मीडिया) के लिए कमलेश भट्ट (चम्पावत) एवं उमेश डोभाल स्मृति पत्रकारिता पुरस्कार (सोशल मीडिया) के लिए जयदीप सकलानी (देहरादून) को पुरस्कार दिये जाने की घोषणा की गयी है. ये सभी सम्मान व पुरस्कार उमेश डोभाल स्मृति समारोह चमियाला (टिहरी) में 9 अप्रैल 2023 को दिये जाएंगे.
बैठक में समारोह हेतू एक स्मारिका प्रकाशन का निर्णय लिया गया तथा दिनांक 25 मार्च 2023 को उमेश की पुण्य तिथि को उनके पैतृक गाँव सिरोली में आयोजित कार्यक्रम हेतु स्थानीय ग्रामवासियों का आभार व्यक्त किया गया.
बैठक में ट्रस्ट के अध्यक्ष गोबिन्द पन्त (राजू), कार्यकारी अध्यक्ष बिमल नेगी, महासचिव आशीष नेगी, कोषाध्यक्ष सुरेन्द्र सिंह नेगी आदि शामिल थे.
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