Tuesday, December 27, 2022

टाइम मशीन '2022', महिलाओं का सफर.

2022 में साल भर पूरे विश्व में उथल पुथल मची रही. रूस ने यूक्रेन की सीमा लांघ करोड़ों लोगों को बेघर किया तो जलवायु परिवर्तन की वजह से विश्व के करोड़ों लोग प्रभावित हुए. युद्ध और प्रकृति की इस मार के बीच दुनिया भर के लोगों में अपनी स्वतंत्रता को लेकर संघर्ष जारी रहा, खासतौर पर महिलाओं ने अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाई. भारत में हिजाब पहनने को लेकर तो ईरान में हिजाब उतारने को लेकर अपने अधिकार की लड़ाई लड़ी गई. अफगानिस्तान में तालिबान द्वारा शिक्षा के अधिकार से महरूम कर दी गई युवतियां, शिक्षा के अधिकार के लिए सड़क पर हैं.


साल 2022 में अपने अधिकारों के लिए जागरूक महिलाएं.

11 अक्टूबर 2022 को अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर संयुक्त राष्ट्र महिला कार्यकारी निदेशक सुश्री सिमा बाहौस ने अपने बयान में कहा था कि जलवायु, शिक्षा, मानसिक कल्याण, लिंग आधारित हिंसा, यौन और प्रजनन स्वास्थ्य अधिकारों के लिए लड़कियां खुद को एक नेता, अधिवक्ता और बदलाव लाने वाले के रूप में आगे बढ़ा रही हैं.

भारत में इस साल महिला अधिकारों के लिए लड़े गए सबसे बड़े आंदोलन की बात करी जाए तो इस साल की शुरुआत में कर्नाटक के कॉलेज में हिजाब पहनने वाली छात्राओं को कॉलेज में प्रवेश करने की अनुमति देने से मना करने पर लोग सड़क पर उतर आए और सिर ढकने वाला हिजाब मुस्लिम महिलाओं के अधिकार की लड़ाई का प्रतीक बन गया.

वहीं ईरान में हिजाब न पहनने के मामले में 22 वर्षीय महसा अमिनी की पुलिस कस्टडी में मौत हो गई, जिसके बाद ईरान की महिलाएं सड़कों पर प्रदर्शन के लिए उतर आई. वहां अब भी महिलाएं हिजाब में आग लगाकर प्रदर्शन कर रही हैं और
सरकार प्रदर्शनकारियों का जितना दमन कर रही है, यह प्रदर्शन उतना ही उग्र हो रहा है.



अमेरिकी में भी महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए लड़ना पड़ रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में पचास साल पुराने गर्भपात का अधिकार देने वाले कानून को पलट दिया और इसके बाद से ही बड़ी संख्या में अमेरिकी महिलाएं इसके खिलाफ सड़कों पर उतरी हुई हैं. 


कैमरून में महिलाओं द्वारा अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विरोध प्रदर्शन किया था. उन्होंने इस प्रदर्शन में अधिक राजनीतिक शक्ति और सरकारी नौकरियों की मांग की. कैमरून में महिलाओं और पुरुषों की लगभग बराबर आबादी है लेकिन देश के दस क्षेत्रीय गवर्नरों या परिषद अध्यक्षों में एक भी महिला नहीं है.

साल खत्म होने से पहले अफगानिस्तान में तालिबान द्वारा महिलाओं की शिक्षा पर लगाए गए प्रतिबन्धों के बाद महिलाएं प्रदर्शन कर रही हैं. हेरात शहर के विश्वविद्यालयों में खुद की शिक्षा पर प्रतिबंध के खिलाफ प्रदर्शन कर रही छात्राओं पर वाटर केनन का इस्तेमाल किया गया है और इससे जुड़ा हुआ एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. इस वीडियो में तालिबान के फैसले का विरोध कर रहीं छात्राएं 'एजुकेशन इज अवर ह्युमन राइट' के नारे लगा रही हैं.


आखिर ऐसा क्या हुआ जो सालों से चुप महिलाएं अब शांत नही हैं.

साल 1994 में अफगानिस्तान में तालिबान ने अपना शासन जमाया और महिलाओं के अधिकारों पर प्रतिबंध लगाए ,तो वहां की महिलाओं ने तालिबान की धार्मिक पुलिस के सामने चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी थी. लेकिन अब स्थिति अलग है और अफगानी महिलाएं अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरी हुई हैं. विश्व भर की महिलाएं इस तरह के आंदोलन कर रही हैं और इन महिलाओं में इस तरह की हिम्मत कहां से आई, इस बारे में महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली देहरादून निवासी उमा भट्ट और गीता गैरोला से बात की गई. 
उमा भट्ट ने बताया कि आज विश्व भर में उदारवाद, बहुलतावाद और सहिष्णुता विरोध पर आधारित दक्षिणपंथी विचारधारा ज्यादा हावी हैं. इस वजह से महिलाओं पर ज्यादा दबाव बन रहा है लेकिन महिलाएं दबाव में नही आएंगी. महिलाओं की शिक्षा पर बहुत काम हुआ है और इस वजह से अब महिलाएं पहले से कहीं अधिक शिक्षित हैं और अच्छे पदों पर भी हैं. वह अपनी स्वतंत्रता मांगेंगे ही, वैसे भी इंसान तब अधिक स्वतंत्रता मांगता है जब उसे ज्यादा दबाया जाता है.

 गीता गैरोला ने कहा कि दुनिया ग्लोबल हो रही है. पहले कहीं कुछ घटित होता था तो किसी को पता नही चलता था या बहुत देर से पता चलता था, पर अब संचार के उचित माध्यमों से विश्व भर की महिलाएं यह देख रही हैं कि दूसरी जगह अपने अधिकारों को प्राप्त करने के लिए लोगों द्वारा कैसा आंदोलन चलाया जा रहा है, इससे उन्हें अपने आंदोलन की योजना बनाने की हिम्मत और सहायता मिलती है. 

हिमांशु जोशी
@himanshu28may

Sunday, December 25, 2022

अलविदा 2022, महिलाओं और मोबाइल से जिंदा आंदोलनों की भूमि.

इस सितंबर की बात है जब उत्तराखंड में अल्मोड़ा जिले के भिकियासैंण में प्रेम विवाह करने पर ससुराल वालों ने अपहरण के बाद उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के दलित नेता जगदीश चंद्र की हत्या कर दी, इस हत्या के खिलाफ उत्तराखंड भर में प्रदर्शन हुए.
अब यह साल जाते-जाते जोशीमठ में अपने घरों को बचाने के लिए जुटी आंदोलित भीड़ का दिखाई देना उत्तराखंड के लिए नया नही है.
उत्तराखंड राज्य का आंदोलनों से गहरा नाता रहा है, दशकों के आंदोलन के बाद उत्तर प्रदेश से अलग होने के बाद 9 नवम्बर साल 2000 को इस राज्य का गठन हुआ था.
उत्तराखंड के इतिहास में ऐसे बहुत से आंदोलन हैं, जिन्हें आज भी याद किया जाता है.
आजादी के बाद साल 1949 में हुए टिहरी राज्य आंदोलन की वजह से टिहरी में राजशाही समाप्त हुई और यह उत्तर प्रदेश का एक जिला बना.
सत्तर के दशक में चमोली जिले के रैणी गांव की गौरा देवी ने चिपको आंदोलन शुरू किया. महिलाओं द्वारा पेड़ों से चिपक कर ,उन्हें कटने से बचाने वाला यह आंदोलन पूरी दुनिया के पर्यावरण प्रेमियों के बीच आज भी एक मिसाल के तौर पर याद किया जाता है.
उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी द्वारा साल 1984 में 'शराब नही रोजगार दो' आंदोलन में उत्तराखंड की महिलाओं ने जिस तरह भागीदारी करी थी, उसे आज भी याद किया जाता है.
साल 1984 में हुए मैती आंदोलन ने समाज में पर्यावरण के प्रति लगाव पैदा किया, इस आंदोलन में लड़की अपनी शादी के समय अपने मायके में पेड़ लगा जाती थी.

साल 2022 में उत्तराखंड के आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका.

जोशीमठ धंसने को लेकर सड़क पर उतरे लोग, फोटो- अतुल सती

अपने जल, जंगल, जमीन को बचाने और समाज में व्याप्त कुरीतियों को लेकर साल 2022 में उत्तराखंड के लोग जिस तरह से सड़कों पर उतरे, उससे यह तो साफ हो गया कि उत्तराखंड की जनता संघर्षों से मिले अपने इस प्रदेश में अपनी शर्तों पर जीना चाहती है.

उत्तराखंड के आंदोलनों में महिलाओं की हमेशा बढ़चढ़कर भागीदारी रही है. इस पर साल 2022 में उत्तराखंड के लगभग हर बड़े आंदोलन को करीब से देखने वाले त्रिलोचन भट्ट ने बताया.
साल 2022 का वर्ष उत्तराखंड के लिए एक बार फिर आंदोलनों के नाम रहा, राज्य के आंदोलनों की अगुवाई महिलाओं के हाथ रही.
अंकिता हत्याकांड के राज्यव्यापी आंदोलन से पहले इस वर्ष उत्तराखंड में हेलंग आंदोलन सबसे जोरदार तरीके से चला. चमोली जिले के हेलंग का एक वीडियो जुलाई के महीने पर सोशल मीडिया पर वायरल हुआ. इस वीडियो में हेलंग-पीपलकोटी जल विद्युत परियोजना की सुरक्षा में तैनात केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल और स्थानीय पुलिस के जवान महिलाओं की पीठ पर लदा घास का गट्ठर छीनते नजर आए. जिस महिला के साथ यह बदसलूकी की गई उनका नाम हेलंग गांव की मंदोदरी देवी बताया गया.

पूरे उत्तराखंड में इस वीडियो को लेकर हलचल हुई और इसे उत्तराखंड में महिलाओं की अस्मिता पर हमला माना गया. उत्तराखंड आंदोलन में अग्रणी भूमिका में रही 'उत्तराखंड महिला मंच' ने पूरे हेलंग आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. खासकर देहरादून, नैनीताल और हल्द्वानी में महिला मंच से जुड़ी महिलाओं की सक्रियता ने इस आंदोलन को हवा दी. इसके साथ ही राज्य के तमाम अन्य जन सरोकारों से जुड़े संगठनों ने भी इस आंदोलन में हिस्सेदारी की.
 दो बार हेलंग चलो का सफल आयोजन हुआ, कुमाऊं कमिश्नरी का घेराव किया किया और देहरादून में भी गढ़वाल कमिश्नर कार्यालय पर महिलाओं की अगुआई में प्रदर्शन किया गया.


नैनीताल में हेलंग आंदोलन की एक तस्वीर, फोटो- उमेश तिवारी विश्वास

अंकिता हत्याकांड में भी राज्यभर में चलाए गए आंदोलन में महिलाएं अग्रणी भूमिका में रही. ऋषिकेश में यूकेडी और अन्य संगठनों से जुड़ी तमाम महिलाएं हत्याकांड के बाद से ही लगातार सड़कों पर रही. पुलिस से भिड़ी, गिरफ्तार हुई और फिर लंबा धरना भी चला. इस धरने में महिलाएं रात-दिन धरना स्थल पर जुटी रही. अंकिता मामले को लेकर देहरादून में भी हुए धरने-प्रदर्शनों में भी महिलाओं की भूमिका अग्रणी रही. खासकर 2 अक्टूबर को राज्यव्यापी बंद के दौरान दून की सड़कों पर उमड़े हुजूम में महिलाओं की संख्या उल्लेखनीय रही.

इस वर्ष राज्य में एक ऐसा आंदोलन भी हुआ, जिसे पूरी तरह महिलाओं ने चलाया, यह आंदोलन अब भी चल रहा है. चमोली जिले के थराली ब्लॉक के जबरकोट में गांव वालों की सहमति के बिना एक स्टोन क्रशर लगाया जा रहा है. गांव की महिलाओं ने इस स्टोन क्रशर के खिलाफ आंदोलन खड़ा कर दिया. महिलाओं का कहना था कि गांव के पास स्कूल के ठीक नीचे लगाये जा रहे इस स्टोन क्रशर से गांव की हवा खराब होगी, लोग टीबी और केंसर जैसी बीमारियों की चपेट में आएंगे और गांव वालों की खेती भी बर्बाद होगी.

राजधानी देहरादून में पेड़ काटने के खिलाफ इस वर्ष कई आंदोलन हुए. सहस्रधारा रोड और मोहंड में बड़ी संख्या में पेड़ काटे गए. इन दोनों स्थानों पर आंदोलन हुए और दोनों जगहों पर महिलाओं, खासकर छात्राओं की उपस्थिति अन्य लोगों से ज्यादा रही. पेड़ बचाने के इन आंदोलनों में बड़ी संख्या में छात्राएं पेड़ों से लिपटती और पुलिस से उलझती नजर आई.

इन आंदोलनों में मोबाइल की भूमिका.

समाचार पत्रों, रेडियो और टेलीविजन के बाद अब विश्व भर के हर आंदोलनों में मोबाइल का बहुत प्रभाव पड़ा है, हाल ही में तालिबान द्वारा शिक्षा से महरूम कर दी गई अफगानी महिलाओं ने भी मोबाइल के जरिए एकजुट होकर तालिबान के इस निर्णय का विरोध करना शुरु कर दिया है.

उत्तराखंड के दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्रों में भी मोबाइल की वजह से आंदोलनों को गति मिली है. इस पर बात करते एक्टिविस्ट अतुल सती बताते हैं.

 हेलंग आंदोलन में आम जनता मोबाइल की वजह से ही दूर दूर तक के इलाकों से भी इस आंदोलन से जुड़ी.
 मोबाइल से ही सीआइएसएफ जवानों द्वारा घास छीनने की वीडियो बनी और इसके वायरल होने से इस घटना ने आंदोलन का रूप ले लिया.
अतुल बताते हैं कि जब मेरा पिथौरागढ़ जाना हुआ, तब वहां के मजदूर भी हेलंग की घटना को जानते थे. यही मुझे कलकत्ता, सेवाग्राम में जाने पर सुनने को मिला.
हां , इस आंदोलन में स्थानीय भागीदारी कम थी क्योंकि इस मामले को सिर्फ दो-तीन परिवारों का निजी मामला बना दिया गया था.

तपोवन-विष्णुगाड़ परियोजना के लिए बनाई जा रही सुरंग की वजह से जोशीमठ धंस रहा है.
साल 2003 से हम लोग इस पर बोल रहे थे, तब अखबारों में आई खबरों की वजह से इस पर थोड़ी हलचल होती थी पर अब मोबाइल में लोग इस पर बनाए वीडियो खुद देख रहे हैं. मकानों में पड़ी दरारों के दृश्य देखने के बाद वह इस मामले की गम्भीरता को समझ रहे हैं. अभी इसके लिए हुए आंदोलन में तीन हजार लोग एकत्रित हुए, यह सिर्फ मोबाइल की वजह से ही सम्भव हुआ है.

हिमांशु जोशी.
@himanshu28may

Tuesday, December 20, 2022

खामोश नगाड़ों का भी शोर बहुत है.

18 दिसम्बर को नैनीताल में रंगमंच 'युगमंच' द्वारा गिरीश तिवारी गिर्दा द्वारा लिखे गए नाटक 'नगाड़े खामोश हैं' का मंचन किया गया. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) और एफटीआईआई पुणे जैसे प्रतिष्ठित संस्थान तक पहुंचने के लिए उत्तराखंड के कलाकारों की सीढ़ी 'युगमंच' द्वारा दिखाए गए किसी नाटक को देखने का मेरा यह पहला अनुभव रहा.
शैलहॉल के दरवाजे को खोलते ही उसके अंदर अंधेरे में कुर्सियों और जमीन पर बैठकर, नाटक शुरू होने का इंतजार करते दो सौ के आसपास दर्शकों की संख्या मेरे लिए चौंकाने वाली थी. मोबाइल मनोरंजन केंद्र के इस दौर में नाटक के प्रति इतने रोमांच का अनुभव देखते ही बन रहा है था, खास बात यह कि दर्शकों में बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक हर उम्र के लोग शामिल थे.

नाटक की शुरुआत होते ही हेमन्त बिष्ट नाटक के बारे में परिचय देने के लिए खड़े होते हैं, किसी नाटक की खास बात यह होती है कि उसमें दर्शकों और कलाकारों के बीच किसी स्क्रीन की दीवार नही होती और दर्शक सीधे कलाकारों से मुखातिब होते हैं.

   
            नाटक का एक दृश्य- फोटो अमित साह

वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक परिस्थितियों पर सटीक बैठता यह नाटक.

गिर्दा के इस नाटक को समकालीन बनाने के लिए हिंदी के नामी लेखक शैलेश मटियानी की रचना 'मुख सरोवर के हंस' का प्रयोग किया गया था और विस्तृत नाट्य आलेख प्रदीप पाण्डे ने तैयार किए.
नाटक की कहानी काली कुमाऊं पर आधारित है तो इसके मंच में पहाड़ सा माहौल बनाने के लिए एक काले पर्दे पर कपड़ों से पहाड़ बना दिए गए, जो नाटक होते आपको काली कुमाऊं के पहाड़ों के बीच बैठे होने का अहसास देते हैं.
इसकी तेज कहानी बड़ी रोचक है और एक दृश्य के बाद अंधेरा, फिर दूसरा दृश्य, यह देखकर दर्शकों का ध्यान नाटक से हटता ही नही.
इस नाटक में एक राजा अपनी रानी पर अंधा विश्वास करता है और उसकी बातों में आकर अपने भरोसेमंद रक्षकों को उनके महल में जलाकर मार देता है. फिर वह रानी पर इतना मोहित हो जाता है कि राज्य के सारे निर्णय रानी पर ही छोड़ देता है. रानी हमेशा अपनी झूठी तारीफ करने वाले लोगों से घिरे रहती है और राजा उसके पास मूक बनकर बैठा रहता है. इन सबके बीच राज्य की जनता अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों से त्रस्त हो जाती है और राज्य डोटी (नेपाल) पर निर्भर हो जाता है, लेकिन जनता को अपने बेहतर भविष्य के लिए एक मसीहा से उम्मीद बाकी है.

यह नाटक आज की राजनीतिक परिस्थितियों पर सटीक बैठता है. यह नौकरशाही की सच्चाई दिखाता है और संयुक्त परिवारों की अहमियत पर भी प्रकाश डालता है.
इस नाटक में युवाओं के अंदर नशे की बढ़ती प्रवृत्ति के कारणों का डीएनए भी किया गया है.

नाटकों की खास बात यह होती है कि कलाकारों द्वारा सैंकड़ों बार अभ्यास के बाद जब इसे मंच पर दर्शकों के सामने दिखाया जाता है , तब इसके निर्देशक के पास किसी दृश्य को कट और रीटेक करने का वक्त नही होता. इस नाटक में निर्देशक जहूर आलम ने अपने कलाकारों को इस तरह तैयार किया है कि वह मंच पर आते ही छा जाते हैं.
संकेतों का प्रयोग बखूबी किया गया है, कलाकारों के हाथ में कमण्डल नही है पर वह हाथ में कमण्डल होने का नाटक करते हैं. यही प्रयोग शीशे की जगह अपने हाथ देखकर भी किया गया है.

नाटक में पहाड़ के गीत, मुहावरे, व्यंग्य, जागर का प्रयोग इसे प्रभावशाली बनाता है और पहाड़ से जोड़े रखता है.

नाटक की जान सामने बजता ढोलक, बांसुरी, हुड़का, थाली, दमुआ.

नाटक के संगीत का निर्देशन नवीन बेगाना द्वारा किया गया है. इसकी शुरुआत से ही लगातार बजते अलग-अलग वाद्य यंत्र ढोलक, बांसुरी, हुड़का, थाली, दमुआ, हारमोनियम, शंख, घण्टी शानदार अभिनय के साथ चल रहे नाटक में जान डाल देते हैं. इनकी आवाजों से शरीर में सिहरन पैदा हो जाती है.
ढोलक की आवाज के साथ नैनीताल में यह नाटक देखना अद्भुत है, नैनीताल की ठंड और पहाड़ में होने के अहसास के साथ यह अनुभव जीवन पर्यंत नही भुलाया जा सकता. इस अनुभव को किसी भी संचार यंत्र से प्राप्त नही किया जा सकता.
नाटक के गीत प्रदीप पाण्डे द्वारा लिखे गए हैं, इसका मुख्य गीत 'समय बदलता है, वक्त का पहिया रुकता नही, सदा वो चलता है',  सीधे दिल पर लगता है.

        
      गीत गाते नाटक के कलाकार- फोटो अमित साह


कई कलाकारों में दिखता है सुनहरा भविष्य.

युगमंच से प्रशिक्षित होकर कई बड़े कलाकार निकले हैं तो भविष्य में भी इसकी उम्मीद दिखाई देती है. इस नाटक में कुछ कलाकारों ने एक साथ दो तीन किरदारों को निभाते कमाल का अभिनय किया है.
लता त्रिपाठी, महिला देव और आम आदमी के रूप में दिखी. उनकी आवाज में भावों के अनुसार कमाल का उतार चढ़ाव है.


   रानी रुपाली बनी ज्योति धामी, फोटो- अमित साह

रानी रुपाली बनी ज्योति धामी मंच पर चलने के तरीके से किसी रानी के रौब को हूबहू दिखाने में कामयाब रही.
रानी रुपाली और राजा कालीचन्द के बीच जितने भी दृश्य हुए, सभी प्रभावित करते हैं.
जब रानी राजा को उनके भाइयों के प्रति भड़काती है और कुटिल हंसी हंसती है, वह दृश्य नाटक का सबसे अच्छा दृश्य लगता है.
रानी रुपाली की गुस्से में निकली चींख सामने बैठे दर्शकों को सन्न कर देती है.

दासी और न्योली बनी अवन्तिका नेगी शर्माने भर से ही दर्शकों की वाहवाही लूट लेती हैं. रानी के राजकवि बने भास्कर बिष्ट संक्षिप्त किरदार में भी अपनी छाप छोड़ गए.
डंगरिया, बफौल और अजवा बफौल बने दीपक टम्टा ने अपने अभिनय से काफी प्रभावित किया, वह अपनी आंखो से ही दर्शकों को अपनी तरफ आकर्षित कर लेते हैं.

संवाद लिखने में हुई मेहनत साफ दिखती है और वेशभूषा में पहाड़ दिखता है.

नाटक के दमदार संवादों की वजह से ही कलाकार खुद को दर्शकों के सामने साबित करने में कामयाब हुए हैं.
रानी रुपाली द्वारा बोला गया संवाद 'इनका सत्कार करेगा मेरा अंगूठा' इसका उदाहरण है. मनुष्य के बारे में लिखा संवाद 'जागता है तो ब्रह्मांड हिला देता है' भी दमदार है.

     
   नगाड़े खामोश हैं नाटक की टीम- फोटो अमित साह

नाटक में कलाकारों ने पारम्परिक पहाड़ी वस्त्र पहनें हैं, इन वस्त्रों में हर कलाकार बहुत ही सुंदर लगा है. लाइट्स में तो यह परिधान और भी चमक उठते हैं.

नाटक का सम्पादन बहुत बढ़िया किया गया है,  इसमें कोई भी ऐसा दृश्य नही दिखता जिसका होना नाटक में अनावश्यक लगता हो.

इस नाटक को इतने सारे पात्रों, घटनाओं के साथ सफलता पूर्वक पूरा करना बहुत ही मुश्किल कार्य है पर इसकी पूरी टीम ने इस मुश्किल कार्य को सम्भव कर दिखाया. इसका होना, इससे मिलने वाले सन्देशों को पूरा करने में सहायता देगा और बड़े जोर शोर के साथ देगा.

हिमांशु जोशी.
@himanshu28may

Thursday, December 15, 2022

पढ़ने की खत्म होती संस्कृति को अब किसका सहारा?

नैनीताल में तिब्बती मार्केट के पास एक युवक बीच रास्ते में मोबाइल जमीन पर रखकर डांस करते हुए रील्स बनाने में मस्त था और उसे इस बात की बिल्कुल भी चिंता नही थी कि उसकी इस हरकत की वजह से राहगीरों को दिक्कत हो रही है. आसपास कुछ युवा सार्वजनिक स्थान पर सिगरेट पीते हुए दिख रहे थे तो कुछ सड़क पर कचरा फेंकते.
नई पीढ़ी की इन हरकतों का कारण समझने का प्रयास किया जाए तो महसूस होता है कि देश के अधिकतर युवाओं में अब मोबाइल का भूत सवार है. वह अपना अधिकतर समय सोशल मीडिया पर रील्स को देखने और बनाने में बर्बाद कर रहे हैं, जिस वजह से उनका बौद्धिक विकास रुक सा गया है.

 आज के युवाओं, बच्चों का किताब पढ़ने का पैटर्न

नैनीताल के रहने वाले बाइस वर्षीय शुभम तल्लीताल में बाइक वर्कशॉप चलाते हैं. शुभम ने दस साल पहले आठवीं कक्षा में ही स्कूल छोड़ दिया था और फिर उन्होंने बाइक मैकेनिक का काम सीखना शुरू किया. वह कहते हैं कि स्कूल छोड़ने के बाद से उन्होंने कभी किताब के पन्ने नही पलटे हैं पर अपने खाली वक्त में वह इंस्टाग्राम और फेसबुक को चार से पांच घण्टे जरूर देते हैं.

उन्नीस वर्षीय देवेन सिंह बिष्ट नैनीताल डीएसबी कैम्पस में बीसीए द्वितीय वर्ष के छात्र हैं और वह भी अपने कोर्स की किताबों के सिवाय कोई अन्य किताब नही पढ़ते. देवेन इंस्टाग्राम को दिन में अपने बहुमूल्य दो घण्टे देते हैं.

डीएसबी की ही छात्रा साक्षी जोशी प्रतियोगी परीक्षाओं की किताबों को दिन में सात घण्टे देती हैं पर वह इन किताबों के बाद कोई और किताब नही देखती. साक्षी भी दिन का अपना एक घण्टा इंस्टाग्राम पर बिताती हैं.

स्कूली छात्रों ने कोरोना काल में ऑनलाइन पढ़ाई के लिए मोबाइल से दोस्ती करी पर अब मोबाइल ने उनको पूरी तरह से अपने कब्जे में ले लिया है.

भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय नैनीताल के प्रियांशु दिन के दो-तीन घण्टे मास्टरमाइंड से अपने कोर्स को याद करते हैं पर मोबाइल पर अपने कीमती आठ नौ घण्टे बर्बाद कर देते हैं. इसी स्कूल के हर्ष हफ्ते में एक बार 'यू कैन विन' जैसी किताब पढ़ते हैं, यह किताबी शौक उन्हें अपने बड़े भाई से लगा. हर्ष अपने स्कूल की लाइब्रेरी कभी नही गए पर पांच सालों बाद हाल ही में खुली नैनीताल की ऐतिहासिक दुर्गा शाह म्युनिसिपल लाइब्रेरी में जाकर वह कभी-कभी विज्ञान से जुड़ी किताब पढ़ लेते हैं.
हर्ष दिन में एक घण्टा मोबाइल को देते हैं, जिसमें वह यूट्यूब पर शिक्षा से जुड़े वीडियो देखते हैं.

मोबाइल हर हाथ में उपलब्ध पर किताबों की पहुंच कितनी!

उत्तराखंड लोक पुस्तकालय अधिनियम 2005 में लिखा है कि लोक पुस्तकालयों के गठन एवं प्रशासन हेतु राज्य के प्रत्येक जनपद में सम्बंधित जनपद के नाम से एक जिला पुस्तकालय प्राधिकरण गठित किया जाएगा. इस जिला पुस्तकालय प्राधिकरण को यह कर्तव्य दिया गया कि अधिनियम की अधिनियमिति के पश्चात यथाशीघ्र प्रत्येक विकास खण्ड में एक विकास खण्ड पुस्तकालय, प्रत्येक नगरपालिका/कस्बे में एक नगर पुस्तकालय और प्रत्येक ग्राम पंचायत क्षेत्र में एक ग्राम पुस्तकालय चरणबद्ध योजना बनाकर स्थापित किया जाए.

अधिनियम बनने के सालों बाद भी ग्राम स्तर तक पुस्तकालय की बात सिर्फ किताबी ही लगती है. नई पीढ़ी को मोबाइल की लत से दूर करने के लिए ग्राम स्तर पर पुस्तकालय बनाना और उस पुस्तकालय के प्रति उनमें रुचि जगाना सबसे बड़ी चुनौती है.
इस चुनौती को पूरा करने के लिए भारत में अब फिर से पुस्तकालय आंदोलन की आवश्यकता महसूस होने लगी है.

एक और पुस्तकालय आंदोलन शुरु हो गया है।

उत्तराखंड में टनकपुर के एसडीएम हिमांशु कफल्टिया ने साल 2020 से अपने तहसील क्षेत्र में नागरिक पुस्तकालय खोलने की मुहिम छेड़ रखी है. इन पुस्तकालयों में प्रतियोगी परीक्षाओं की किताबों के साथ साहित्यिक किताबें भी हैं. क्षेत्र में अब तक लगभग एक दर्जन नागरिक पुस्तकालय खोले जा चुके हैं, जिनसे कई क्षेत्रीय युवा प्रतियोगी परीक्षाओं में उत्तीर्ण भी हुए.


एसडीएम हिमांशु कफल्टिया इन नागरिक पुस्तकालयों पर कहते हैं कि उन्हें पुस्तकालय खोलने का यह विचार सिविल सर्विसेस की तैयारी के दौरान आया. वह सोचते थे कि जिन किताबों को पढ़ने के लिए क्षेत्र के छात्र दिल्ली, इलाहाबाद जैसे शहरों की तरफ दौड़ते हैं, क्यों न वह उन किताबों को छोटे शहरों और गांवों में उपलब्ध करा सकें. उन्होंने आगे बताया कि मैं मानता हूं किताबें लाइफ चेंजिंग होती हैं, उनसे दोस्ती हो जाए तो इंसान बदल जाता है. मेरे साथ भी यही हुआ, यदि समाज में सकरात्मक परिवर्तन लाने हैं तो यह पुस्तकों से ही संभव है.

हिमांशु अभी टनकपुर में पहली बार क्षेत्रीय लोगों के सहयोग से 24-25 दिसम्बर में पुस्तक मेले को आयोजित करवाने जा रहे हैं, जिसमें लगभग पचास प्रकाशकों की किताबें उपलब्ध रहेंगी.
पुस्तक मेले के लाभ पर वह कहते हैं कि इस मेले को आयोजित करवाने का उद्देश्य युवाओं में पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देना है. पुस्तक मेले से लोगों को बहुत सी नई किताबों के बारे में पता चलेगा और स्थानीय लोगों को पुस्तक मेले में आने वाले अच्छे लोगों से मिलकर बहुत कुछ सीखने का मौका मिलेगा.

'आरम्भ' का कमाल

आरम्भ स्टडी सर्कल पिथौरागढ़ भी पिथौरागढ़ में कॉलेज के कुछ छात्रों का एक ऐसा समूह है, जो क्षेत्र में पढ़ने लिखने की संस्कृति को बढ़ावा देने के प्रयासों में जुटा है. आरम्भ से जुड़े महेंद्र रावत बताते हैं कि हम चाहते हैं कि क्षेत्र के बच्चों और युवाओं में पढ़ने लिखने की संस्कृति बढ़े, इसके लिए हम जगह-जगह पुस्तक मेलों का आयोजन करवाते हैं. इनमें धारचूला, डीडीहाट जैसे दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्र भी शामिल हैं. मेलों में स्कूली बच्चों की भागीदारी उत्साहवर्द्धक रहती है. वह पुस्तक परिचर्चा भी आयोजित करते हैं, जिसमें लोग अपनी पढ़ी किताबों पर प्रतिक्रिया देते हैं.

रचनात्मक शिक्षक मण्डल उत्तराखंड, इस समूह से जुड़े लोग कुछ हट कर हैं.

रचनात्मक शिक्षक मण्डल उत्तराखंड, यह उत्तराखंड के प्राथमिक से डिग्री स्तर तक कार्यरत शिक्षकों का फोरम है. यह समूह पिछले पंद्रह सालों से शिक्षकों और छात्रों के लिए काम कर रहा है. शिक्षा के ज्वलन्त मुद्दों पर लगातार पहलकदमी लेने वाले इस फोरम के  राज्य संयोजक शिक्षक नवेन्दु मठपाल बताते हैं कि हमारा मानना है कि बच्चों में सृजनशीलता के विकास हेतु बच्चों को स्वतंत्रता प्रदान की जानी चाहिए. वह सिर्फ कोर्स से जुड़ी किताबों से ऊब न जाएं, इसके लिए उन्हें जीवन के विभिन्न क्षेत्रों का अनुभव प्राप्त करने के अवसर प्रदान किया जाना आवश्यक है.
हम बच्चों के लिए समय समय पर सिनेमा, रंगमंच, वाइल्डलाइफ फोटोग्राफी आदि कार्यशाला करते हैं, उन्हें सिनेमा दिखाई जाती हैं, समाचार फीचर लिखना सिखाया जाता है और उनके लिए थियेटर वर्कशॉप भी आयोजित करी जाती है.
 हमने जनसहयोग से रामनगर के आसपास पच्चीस पुस्तकालय खोले हैं और इसके साथ ही हमने रामनगर में सावित्री बाई फुले सायंकालीन स्कूल पुछड़ी, ज्योति बाई फुले सांयकालीन स्कूल पुछड़ी नाम से दो स्कूल भी खोले हैं. इन स्कूलों में रामनगर में रहने वाले खनन मजदूरों के 300 से अधिक  बच्चों और कूड़ा बीनने वाले बच्चों को शाम के समय तीन घण्टे निःशुल्क पढ़ाया जाता है.
शिक्षक मण्डल शिक्षा के निजीकरण व बड़े बड़े कारपोरेट घरानों की शिक्षा में बढ़ती दखलंदाजी के खिलाफ है.

हिमांशु जोशी
@himanshu28may

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...