Tuesday, July 28, 2020

बसु राय : कैलाश सत्यार्थी का सींचा एक पौधा।

 नागरिकों को मिलने वाले देश के चौथे उच्च नागरिक सम्मान पदमश्री के बारे में सोचने पर बहुत से नाम ऐसे हैं जो बरबस ही याद आ जाते हैं पर भारत में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अंधेरे में रहते हुए भी पूरे देश में उजाला करते रहते हैं। ऐसा ही एक नाम है 'बसु राय'।

 उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार एवं समाजसेवी श्री राजीव लोचन साह जी ने मुझे समाज को एक सन्देश देने के लिए बसु का नाम सुझाया था।
नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी के साथ बचपन से जुड़े बसु राय की कहानी में एक हिंदी फीचर फिल्म के सारे मसाले मौजूद हैं। बसु की कहानी हमें बताती है कि कैसे नेपाल की गलियों में घूमने वाले एक अनाथ ने दुनिया बदली।

बसु राय से मिलने के लिए उनसे सम्पर्क करने पर मैं फोन पर उनके बात करने के सभ्य लहज़े से प्रभावित हुआ। अगली सुबह बसु के आवास पर पहुँचते ही एक मुस्कुराता चेहरा मेरे सामने था। आम कद काठी के बसु से मिलते ही हम इस कहानी की शुरुआत में पहुँच जाते हैं।

बसु राय के पिता भारत में एक धार्मिक सिख परिवार से ताल्लुक रखते थे। परिवार के खिलाफ उन्होंने एक 'उभरती हुई मॉडल' से शादी कर ली जिससे उन्हें अपने परिवार से अलग होना पड़ा और वह भारत छोड़ पहले से अपने परिचित नेपाल के राजा वीर विक्रम शाह के पास जाकर रहने लगे।
अपने मॉडलिंग कॅरियर को बनाने के लिए बसु की माँ गर्भ धारण नही करना चाहती थी और बसु राय के दुनिया में आने के बाद बसु को उनकी माँ ने अपना दूध तक नही पिलाया। छह महीने के बसु और अपने पति को छोड़ उनकी माँ बिन बताए कहीं चली गयी और फिर कभी वापस नही आई। 
बसु राय के पिता जिसके लिए अपना देश, धर्म और परिवार छोड़ आए थे उसके चले जाने से वह टूट गए और शराब पीने लगे। अपने पिता का अस्त व्यस्त कपड़ो में घर आना बसु को अभी भी याद हैं।
उसके बाद पहले तो उन्हें पैरालिसिस हुआ और फिर साढ़े चार साल के बसु को इस दुनिया में अकेला छोड़ उनके पिता चल बसे। बसु के पिता को आखिरी क्रिया कर्म के लिए उनके कुछ दोस्त वहां से ले गए और दुनियादारी से अनजान एक छोटा सा बच्चा 'थामेल' की गलियों में चला गया।

अपने पिता को खो चुका और अच्छे कपड़े पहना एक बच्चा थामेल की गलियों में भूखा था। होटल से खाना मांगने पर होटल वाले ने बसु से पैसा मांगा और 'पैसा' शब्द बसु के लिए नया था।
बहुत देर बाद उन्होंने आसपास के लोगों को भिखारियों को पैसा देते हुए देखा तो नन्हे बसु को पता चला कि ऐसे पैसे मिलते हैं और वह भी सड़क के एक कोने में जाकर बैठ गए। लोग एक प्यारे से बच्चे को देखकर उसे पुचकार तो रहे थे पर पैसा कोई नही दे रहा था जिसके बाद छोटा सा बसु भूखे पेट ही सो गया।

रात 2:30 बजे एक गैंग ने आते ही सोते बसु को उठा कर पूछा कि तू कौन से गैंग का है। तुतलाती ज़ुबान में बसु के कौन सा गैंग पूछते ही नशे में धुत उन लड़कों ने बसु को मार मार कर अधमरा कर दिया।
डेढ़ घण्टे बाद एक और लड़के ने बेहोशी की हालत में पहुँच चुके बसु से उसका गैंग पूछा तो मत मारो कहता हुआ बसु बेहोश हो गया। वो लड़का उसे अस्पताल ले गया और बाद में बसु उसी लड़के के गैंग से जुड़ गया। उस गैंग की विशेषता यह थी कि वह लोग पैसे के लिए साथ नही थे बल्कि उनका मुख्य उद्देश्य बस जिंदा रहने के लिए खाने की व्यवस्था करना था।
बसु ने वहाँ कूड़ा बीना, भीख मांगी, होटलों, घरों, बूचड़खाने में काम किया। बूचड़खाने में काम करते हुए बसु का काम साइकिल चला कर मीठ पहुंचाना था। कैंची बना साइकिल चला मीठ बांटते बसु को मुर्गे काटते देखना अच्छा नही लगता था तो एक दिन उसने सारे मुर्गे भगा दिए जिसकी वज़ह से उसे फिर मार पड़ी।

साढ़े छह साल का हो चुका बसु अब ब्रेड फैक्ट्री में काम करता था। अपने गैंग के साथ जेब काटते हुए बसु अब तक पन्द्रह लोगों को चाकू मार चुका था और एक दिन पकड़े जाने पर बसु ने लोगों से फिर मार खाई। बसु कहते हैं कि " लोग मारते हुए यह सोचना भूल जाते थे कि एक छोटा सा बच्चा जेब क्यों काट रहा है।"

बसु को यह काम बुरा लगता था तो उसने फिर से कूड़ा बीनना शुरू किया और कुछ समय बाद वह बीमार पड़ कर सड़क पर ही बेहोश हो गए। वहां 'सिविन' ( नेपाल में बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली एक अशासकीय संस्था ) के लोगों की नज़र उन पर पड़ी और वो लोग बसु को अपने साथ ले गए।

आँख खुलने पर बसु को पहली बार प्यार नसीब हुआ उन्हें लगा कि वह मर कर स्वर्ग में आ गए हैं क्योंकि उन्होंने सुना था कि स्वर्ग में अच्छे लोग रहते हैं।

आठ साल के बसु ने एक महीने बाद सिविन में पहली बार अपना मुँह खोला और पूछा कि मुझे मशहूर और पैसे वाला बनना है उसके लिए मुझे क्या करना होगा?

सिविन के लोग इस बात से खुश थे कि यह बच्चा गूंगा नही है पर बसु के सवाल से वह परेशान भी हो गए।
सिविन के एक कर्मचारी ने बसु से पूछा कि वह मशहूर और पैसे वाला क्यों बनना चाहते हैं तो बसु ने कहा कि जैसे आपने मेरा ध्यान रखा वैसे ही मैं अपने जैसे लोगों को सड़क से अच्छा जीवन देना चाहता हूं और इसके लिए मुझे पैसे की जरूरत होगी।

एक छोटे बच्चे से इतनी बड़ी बात सुन सिविन के लोग उससे प्रभावित हुए और बसु को एक पुनर्वसन केंद्र 
भेजा गया। जहां विदेशी शिक्षक मुफ्त में अच्छी शिक्षा देते थे और उन्हें वहां पहनने के लिए अच्छे कपड़े मिलते थे। बसु राय कहते हैं कि "यहां से बसु राय ने जन्म लिया'।

वर्ष 1997 में कैलाश सत्यार्थी एक ऐसे बच्चे को ढूंढ रहे थे जो पूरी दुनिया में शोषण झेल रहे बच्चों की आवाज़ बने। इसी वजह से ली जा रही परीक्षा में बसु राय ने खाना खाते हुए यह सुना कि जो जीतेगा वह विदेश जाएगा। तब बसु इस परीक्षा को गम्भीरता से लेने लगे।

सिविन के शिक्षक 'गौरी प्रधान' ने जब बसु से पूछा कि बेटा वहां आप ही क्यों जाएं मैं क्यों न जाऊं?
तब एक आठ साल के बच्चे का उनको जवाब था कि " अगर आपने लोगों की पॉकेट मारी है, मार खाई है तो मेरी जगह आप चले जाइए। जो मेरे साथ हुआ वो सरकार और समाज की गलती है" ।
वहाँ मौजूद 3025 बच्चों में से बसु राय को कैलाश सत्यार्थी के इस 'ग्लोबल मार्च' के लिए चुना गया।

अपने शिक्षक 'तारक धीताल' के साथ पहली बार प्लेन में बैठते ही बसु राय का प्लेन में बैठने का वह सपना पूरा हो रहा था जो उसने अपनी साढ़े चार साल की उम्र से सड़क पर बैठकर देखा था।
बसु राय को लगा कि भगवान ने उनकी सुन ली है। तारक धीताल भावुक होकर बसु से बोले कि अभी तो यह शुरुआत है।
नेपाल से हॉंगकॉंग और वहां से फिलीपींस पहुँचने के बाद अगले दिन 14-18 तक की उम्र के चुने हुए सभी बच्चों का प्रतिनिधि भी उनमें मौजूद एकमात्र 9 साल का बच्चा 'बसु राय' बना।

ग्लोबल मार्च में कैलाश सत्यार्थी की अगुवाई में 'शोषण से शिक्षा तक, लेट्स स्टॉप चाइल्ड लेबर' नारे के साथ बसु राय ने 7.2 मिलियन अन्य प्रतिभागियों के साथ पूरी दुनिया में 80000 किमी तक मार्च किया।

 अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के इतिहास में पहली बार 2 जून 1998 को कैलाश सत्यार्थी के नेतृत्व में नागरिक समाज को संयुक्त राष्ट्र के जिनेवा मुख्यालय में प्रवेश की अनुमति दी।
कैलाश के साथ बसु और अन्य साथियों ने श्रम मंत्री, नियुक्ता और श्रमिक संगठनों के नेताओं को सम्बोधित किया और बाल श्रम के सबसे बुरे रुपों पर सम्मेलन की मांग की।
बसु राय ने वहां अपनी बात रखते हुए कहा कि मेरे सामने बहुत से बच्चे चाकूबाजी में मरते थे । उनका सड़क पर रात भर खून बहता रहता था और सुबह सरकारी गाड़ी आकर उनकी लाशों को उठा ले जाती थी।
क्या आप इसे वापस ला सकते हैं? क्या आप हमारा खोया बचपन वापस कर सकते हैं?
यह सुनने के बाद वहाँ सब सुन्न थे।


इससे बाल श्रम कन्वेंशन (182) के सबसे बुरे रुपों पर चर्चा शुरू हुई। जिसे आखिरकार 1999 में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने अपनाया।

इसके बाद वर्ष 1999 में बसु ने कैलाश सत्यार्थी से भारत वापस आने की जिद की और उन्हें अब तक पता चल गया था कि नेपाल हिंदुस्तान में नही है और उनके पिताजी हिंदुस्तानी थे। कैलाश ने बसु को नेपाल में रह कर ही अच्छी शिक्षा प्राप्त करने की सलाह दी पर बसु जिद कर उनके पास रहने भारत आ गए।

 वर्ष 2001 में कैलाश सत्यार्थी के नेतृत्व में शिक्षा यात्रा का आयोजन किया गया था। बसु राय भी इस यात्रा में एक लाख अन्य लोगों के साथ शामिल थे।
इस यात्रा का उद्देश्य संसद में लंबित संवैधानिक सम्बोधन के पारित होने और कार्यान्वन को सुनिश्चित करना था। जो 18 वर्ष की आयु तक के सभी बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण मुफ्त शिक्षा को अनिवार्य बना देता।
इन्हीं प्रयासों से भारत में वर्ष 2009 में 'शिक्षा का अधिकार' अधिनियम लागू हुआ।

इस बीच बसु 'दूरस्थ शिक्षा' से अपनी पढ़ाई जारी रखे हुए थे। नेहरू स्टेडियम में मार्शल आर्ट्स, ताइक्वांडो और जूडो सीख बसु इसका ट्यूशन दे अपनी पढ़ाई के लिए पैसा जोड़ते थे।

वर्ष 2014 बसु के जीवन के लिए महत्वपूर्ण रहा।
2014 में 11 जनवरी 1954 को विदिशा में जन्में कैलाश सत्यार्थी को बच्चों और युवाओं के दमन के खिलाफ उनके संघर्ष के लिए और सभी बच्चो को शिक्षा के अधिकार के लिए नोबेल पुरस्कार मिला।
यह बसु के जीवन का सबसे खुशी वाला दिन था क्योंकि यह जीत सिर्फ कैलाश सत्यार्थी जी की ही नही थी यह जीत उनकी पूरी टीम की जीत थी।

 वर्ष 2014 में ही बसु राय के जीवन के ऊपर लिखी पुस्तक " 'बसु राय' फ्रॉम द स्ट्रीट्स ऑफ काठमांडू " आई। बसु राय की यह पुस्तक हमारी शिक्षा प्रणाली, सामाजिक कल्याण प्रणाली को सुधारने के लिए कितनी महत्वपूर्ण है यह हम इससे समझ सकते हैं कि इस पुस्तक का विमोचन करते समय किरण बेदी, कैलाश सत्यार्थी जैसी शख्सियत मौजूद थे।


बाल यौन शोषण और बाल दुर्व्यवहार के खिलाफ कैलाश सत्यार्थी ने भारत यात्रा का आयोजन किया था। 
11 सितंबर 2017 को विवेकानंद शिला स्मारक (कन्याकुमारी) से यह यात्रा "सुरक्षित बचपन, सुरक्षित भारत" सपने को लेकर बसु राय सहित सौ लोगों की टीम के साथ शुरू हुई। 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से गुजरते हुए इस यात्रा ने 12000 किलोमीटर का सफर तय किया था। इस यात्रा में 12 लाख लोग शामिल हुए।
16 अक्टूबर 2017 को नई दिल्ली में राष्ट्रपति भवन के अंदर इस यात्रा का समापन हुआ।
 इस दौरान बसु की नवविवाहित पत्नी भी इस यात्रा में उनके साथ रही।

बसु राय का भारत में 'बसु राय पहल फाउंडेशन' नाम से एक पंजीकृत गैर लाभकारी संगठन भी है जो जागरूकता फैलाने और बच्चों पर हिंसा के सभी प्रकारों के खिलाफ लड़ने के लिए निवारक दृष्टिकोण चला रहे हैं और समुदाय, युवाओं, शिक्षा, बच्चों के लिए सार्वभौमिक शांति की प्रत्यक्ष भागीदारी के माध्यम से पूर्ण बाल सुलभ दुनिया का निर्माण करते हैं।


इसके बाद बसु ने 'इंडियन स्कूल ऑफ डेवलपमेंट एंड मैनेजमैंट' से लीडरशिप मैनेजमेंट कोर्स किया।
इससे उन्हें पता चला कि नेतृत्व क्या होता है। बसु कहते हैं कि "पहले उन्हें नही पता था कि वह एक लीडर का काम कर रहे थे पर पढ़ने के बाद उन्हें पता चला कि असल में वह एक लीडर हैं। 
जब तक आप खुद कोई काम स्वयं नही करते तब तक आप किसी और को भी वह करने के लिए विवश नही कर सकते।"

 बसु राय वर्षों से अपनी जान जोखिम में डालकर बहुत से बच्चों को उनके मालिकों से बचा रहे थे पर अब उनके मन में यह प्रश्न उठने लगा कि इस हवा और पानी का क्या होगा। 
इसलिए उन्होंने अब पर्यावरण के मुद्दों को जानने और समझने के लिए पर्यावरण सुधार कार्यक्रमों में भागीदारी करने का निर्णय लिया है।

कोरोना ने पूरे विश्व को अपनी चपेट में ले लिया है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के महानिदेशक गाई राइडर का कहना है कि महामारी परिवार की आय पर कहर ढाती है। अब बिना समर्थन बहुत से परिवार बाल श्रम का सहारा ले सकते हैं। कोरोना की वजह से बाल श्रम बढ़ेगा।

भारत ने अब भी अंतराष्ट्रीय श्रम संगठन के दो मौलिक संलेखों को लागू नही किया है। जिनमें
 - 'संघ की स्वतंत्रता और सम्मेलन आयोजन करने के अधिकारों का संरक्षण' 
 -'आयोजन के अधिकार और सामूहिक रूप से सौदेबाजी करने के अधिकार' शामिल हैं।

जिन परिस्थितियों से बसु राय बचपन में गुज़रे उस बचपन को बदलने और अन्य सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए आज हमें बसु राय जैसे ही लाखों परिवर्तनकारी युवाओं की आवश्यकता है। पर उसके लिए हमें नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी जैसा बनना होगा जिन्होंने अपने बचपन से ही बाल शोषण व बाल शिक्षा के लिए आवाज़ उठाई और बसु जैसे बच्चों को सड़क से ला समाज के लिए एक उदाहरण बना दिया।

हिमांशु जोशी, टनकपुर

Wednesday, July 22, 2020

हे हे सारा ज़माना... ओटीटी का दीवाना..

सरदार उधम और जय भीम जैसी फिल्मों में ओटीटी पर रिलीज़ होने के बाद भी जिस तरह से सफलता पाई है, उसे देख अब फिल्मकारों का विश्वास ओटीटी पर ही बन गया है.          
  कोरोना की वज़ह से बड़े पर्दे की जगह ओटीटी ने ले ली थी और अब दर्शकों को वापस बड़े पर्दे की तरफ़ खींचना फ़िल्म बनाने वालों के लिए टेढ़ी खीर साबित होने वाला है. भला कोई बिस्तर में लेटे-लेटे फ़िल्म देखने का मज़ा छोड़ धूल-धूप खाते बड़े पर्दे तक पहुंचने का कष्ट क्यों करे.


अब तक सुपरहिट ओटीटी

पिछले साल दिवंगत अभिनेता सुुुशांत सिंंह राजपूत की अंतिम फ़िल्म 'दिल बेचारा' ने ओटीटी पर रिलीज होते ही धमाल मचा दिया था और आईएमडीबी दस में दस स्टार प्राप्त किए थे.
2019 क्रिकेट विश्व कप में भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच खेले गए सेमीफाइनल मैच को 25.3 मिलियन लोगों ने हॉटस्टार पर देखा था.
स्पेनिश फुटबॉल लीग 'ला लीगा' का भारत में प्रसारण सिर्फ ओटीटी पर किया जा रहा है. 
पिछले साल फिल्मफेयर की ओर से पहली बार ओटीटी प्लेटफॉर्म पर जारी वेबसीरीज के लिए अवार्ड्स का ऐलान किया था, जिसमें 'पाताल लोक' और 'द फैमिली मैन' का दबदबा रहा, जिन्होंने पांच-पांच पुरस्कार जीते.
अब तक भारत में ओटीटी की कहानी कुछ इस तरह से रही है, मतलब अब तक ओटीटी प्लेटफॉर्म सुपरहिट ही रह है.

कहां से आया और क्या है ये ओटीटी

1930-40 के दशक के दौरान सिनेमा का स्वर्ण युग था. इसके बाद टेलीविजन युग शुरू हुआ और सिनेमा को टेलीविजन पर देखा जाने लगा. साल 1990 के बाद इंटरनेट आम जन के बीच लोकप्रिय होने लगा.

पहले आवश्यक कार्यों हेतु भेजे जाने ईमेल के लिए ही इंटरनेट का प्रयोग किया जाता था.उसके बाद फिल्मी गानों, ज्ञानवर्द्धक वेबसाइटों और सोशल मीडिया के प्रयोग के लिए इंटरनेट का प्रयोग किया जाने लगा.

सस्ते डाटा, सुलभ हैंडसेट, ज्यादा सामग्री, रचनाकारों के लिए बड़ा बाज़ार , थिएटरों के महंगे टिकट और टीवी पर एक जैसे सास-बहू के कार्यक्रमों ने टीवी और सिनेमा के दर्शकों का रुख ओटीटी की ओर किया.

'ओटीटी' शब्द पारम्परिक केबल या सेटेलाइट टीवी सेवाओं के उपयोग के बिना इंटरनेट के माध्यम से फिल्मों, वेब श्रृंखला या किसी अन्य वीडियो सामग्री के वितरण को संदर्भित करता है.

शुरुआत में यूट्यूब इंटरनेट पर वीडियो सामग्री का अग्रणी प्रदाता था.
विकिपीडिया के अनुसार भारत में 40 से ज्यादा ओटीटी प्रदाता अपनी सेवाएं दे रहे हैं जिन्हें आप स्मार्ट टीवी, लैपटॉप, टेबलेट व अपने मोबाइल पर देख सकते हैं.
स्टेटितस्ता के अनुसार मार्च 2018 तक हॉटस्टार का भारत के स्ट्रीमिंग बाज़ार में 69.4 प्रतिशत कब्ज़ा था.

इंटरनेट एंड मोबाइल असोसिएशन ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट 'डिजिटल इंडिया' के अनुसार भारत में नवंबर 2019 के अंत तक 504 मिलियन इंटरनेट उपभोक्ता थे और 'स्टेटितस्ता' के अनुसार वर्ष 2015-19 तक भारत में प्रति माह प्रति उपयोगकर्ता औसत डाटा की खपत 11,183 मेगाबाइट थी जो कोरोना काल में अवश्य ही दोगुनी हुई होगी.

सफर करने के दौरान हो या काम के बीच में आप कहीं भी ओटीटी की मदद से अपनी पसंदीदा फ़िल्म, कार्यक्रम या खेल देख सकते हैं.
ओटीटी में दर्शकों को टेलीविजन के कार्यक्रमों की अपेक्षा कम विज्ञापन मिलते हैं. कॉर्डकटिंग डॉट कॉम का कहना है कि नेटफ्लिक्स ने 2017 में औसतन अपने प्रत्येक ग्राहक को 160 घण्टे विज्ञापनों से बचाया.

सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ पंजाब के ओटीटी पर किए गए एक अध्ययन के अनुसार 63 प्रतिशत दर्शक इसको मुफ़्त में ही इस्तेमाल करना चाहते हैं.
इंटरनेट की गति और महंगे होते डाटा पैक ओटीटी की सफलता के सामने बड़ी चुनौती हैं, सिनेमा की पायरेसी की तरह ही वेब श्रृंखलाओं के सामने भी पायरेसी एक समस्या है.
मोबाइल ही ओटीटी देखने के सबसे सुगम्य साधन हैं पर मोबाइल जगत में सिर्फ एंड्रॉइड और एप्पल प्लेटफॉर्म का ही दबदबा है , अन्य प्लेटफॉर्म पर लोकप्रियता हासिल कर अपना विस्तार करना भी इन ओटीटी सेवा प्रदाताओं के सामने एक मुश्किल कार्य है.

अभी तो ये नया ही है

 ओटीटी कार्यक्रमों के सामने अभी बहुत सी कानूनी समस्याएं भी हैं क्योंकि शैशवावस्था में होने के कारण इन को लेकर कानून अभी स्पष्ट नही हैं.

ओटीटी की बढ़ती हुई संख्या के बीच खुद को लोकप्रिय बनाए रखने के लिए इसके कंटेंट में अश्लीलता, हिंसा और अपशब्दों का जमकर प्रयोग किया जा रहा है. अश्लीलता और हिंसा को ओटीटी पर क्रांतिकारी बदलाव समझने की भूल की जा रही है जबकि यह भूल टेलीविजन द्वारा वर्षों पहले की जा चुकी है.

पाताल लोक, लस्ट स्टोरीज़ जैसी वेब श्रृंखलाओं पर जमकर विवाद भी हुआ. कुछ लोग रचनात्मक स्वतंत्रता से छेड़छाड़ के पक्ष में नही हैं क्योंकि यही मुख्य वजह है कि इस प्लेटफॉर्म को ज्यादा पसंद किया जा रहा है. दर्शक इसकी सामग्री को खुद से जुड़ा हुआ पाते हैं.

 मनोरंजन जगत में नया खिलाड़ी होने के कारण अभी ओटीटी को लेकर कोई स्पष्ट कानून नही बने हैं.
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पीएम मोदी को पत्र लिखकर ओटीटी सेवाओं पर सेंसर लगाने की मांग की है. यह एक प्रश्न है कि निजी तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले ऑनलाइन स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म भी सार्वजनिक प्रदर्शनी के दायरे में आ सकते हैं या नही.

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर क्या दिखाया जा रहा है इस पर कोई नियंत्रण नहीं है. सरकार को ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के लिए सामग्री नियामक ढांचा तैयार करने के प्रयास करने चाहिए.

एक मीडिया हाउस से ओटीटी बनाम बड़े पर्दे पर बात करते हुए जैकी श्रॉफ ने बोला था बेशक, हम कहते हैं कि माध्यम कोई मायने नहीं रखता. लेकिन फिर कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जिन्हें सिनेमाघरों में देखना पड़ता है और यह ऐसी चीज है जिससे हम समझौता नहीं कर सकते.बड़े परदे की बात ही कुछ और है, इसका अपना आकर्षण है.

हॉलीवुड के दिग्गज निर्देशक स्टीवन स्पिलबर्ग नेटफ्लिक्स सहित अन्य ओटीटी प्लेटफॉर्म को ऑस्कर में आने से रोकने के लिए ऑस्कर के नियमों में बदलाव की पैरवी करते आए हैं. उनके अनुसार सिनेमाघरों में फिल्मों को रिलीज़ होना ही फिल्मों का वास्तविक अनुभव है.

नेटफ्लिक्स ने इसके जवाब में कहा था कि वह सिनेमा से प्यार करता है. यह कला साझा करने के लिए अधिक अवसर प्रदान करता है. यह ऐसे लोगों के लिए है जो उन कस्बों में रहते हैं जहाँ थिएटर नही है. इनकी वजह से हर किसी को हर जगह एक साथ फ़िल्म रिलीज़ का आनंद मिलता है.
नेटफ्लिक्स और कान्स फ़िल्म महोत्सव के मध्य का विवाद भी फ़िल्म उद्योग के भविष्य के लिए निर्णायक था.
नेटफ्लिक्स ने दो ऑस्कर अवॉर्ड जीत कर इन सब विवादों को दरकिनार भी किया.


द इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल गोवा में 20 से 28 नवंबर को होगा. अब भारत सरकार ने ओटीटी प्लेटफॉर्म को लेकर घोषणा की है कि वह इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया में भाग लेंगे.यह पहली बार होगा कि ओटीटी प्लेटफॉर्म इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का हिस्सा होंगे. इनमें जी5, नेटफ्लिक्स और अमेजॉन प्राइम जैसे ओटीटी प्लेटफॉर्म शामिल है. 

बॉलीवुड हंगामा की रिपोर्ट के मुताबिक, आदित्य अपने OTT प्लेटफॉर्म के लिए 500 करोड़ रुपये का निवेश करेंगे. सूत्र ने कहा, "आदित्य भारत में डिजिटल कंटेंट के उत्पादन के स्तर को बढ़ाने में योगदान देना चाहते हैं, वह भारत में रची-बसी कहानियों को एक वैश्विक स्तर प्रदान करना चाहते हैं. 


सब चल रहे हैं ओटीटी वाले रास्ते

एक्सेंचर के अनुसार पूरे विश्व भर में टीवी दर्शकों की कमी हो रही है. अकेले संयुक्त राज्य अमेरिका में 200 से अधिक ओटीटी सेवाएं हैं, आंकड़ों के अनुसार  4.1 प्रतिशत टीवी दर्शक कम हुए हैं.  
लॉकडाउन की वजह से टेलीविजन में पुराने कार्यक्रम ही चल रहे हैं और बिना दर्शकों के लाइव खेल अभी शुरू ही हुए हैं. नए की तलाश में लोग टीवी से विमुख हो ओटीटी की तरफ रुख कर रहे हैं.
 
थिएटर के टिकटों के बढ़ते दामों को देखकर लोग ओटीटी पर ही फिल्में देखना बेहतर समझते हैं और अगर कोई उन थिएटर में चले भी जाए तो वहाँ के स्नैक्स का दाम थिएटर के टिकट से ज्यादा होता है.

कोरोना काल में शिक्षा ऑनलाइन हो गई तो ओटीटी के पुराने खिलाड़ी यूट्यूब में तो शिक्षण सामग्री की भरमार है ही तो वहीं 'वूट किड्स' जैसे नए खिलाड़ी भी मैदान में उतरे हैं.

इस जंग के बाद राजा तो दर्शक ही बनेंगे

बड़े पर्दे और ओटीटी के बीच चल रही इस जंग का अंजाम जो भी है मनोरंजन, शिक्षण और जागरूकता के क्षेत्र की इस नई जंग का फ़ायदा दर्शकों को मिल रहा है जिनके पास अब पहले से अधिक गुड़वत्ता वाले और सस्ते विकल्प उपलब्ध हैं. 
कलात्मक लोगों के पास अपनी योग्यता दिखाने का अवसर है और उनके लिए मंच भी तैयार है, तो लाइट्स, कैमरा, एक्शन..'कट'

हिमांशु जोशी, उत्तराखंड.

Friday, July 17, 2020

कोरोना काल में 'हमारे कल' की स्थिति।

अमिताभ बच्चन के कोरोना संक्रमित होते ही पूरे देश के लिए यह एक बड़ी ख़बर बन गई। इस चर्चा पर इसलिए भी अधिक ध्यान जाता है क्योंकि सदी के महानायक उम्र के 77 वें साल में हैं।

बुज़ुर्गों में कोरोना का सबसे ज्यादा खतरा है क्योंकि उनमें ह्रदय रोग, मधुमेह जैसी बीमारियां अधिक होती हैं जो उनके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को कम कर देती है।
इस समय देश के महानायक के साथ पूरे देश के बुज़ुर्ग कोरोना महामारी से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।

दिल्ली से 342 किलोमीटर दूर उत्तराखंड में हिमालय की तलहटी में बसे टनकपुर कस्बे में रहने वाले एक दम्पति रामी राम और गंगा राम की उम्र क्रमशः 60 और 58 वर्ष है।
रामी राम से मिलते ही उनकी मोतियाबिंद से सफेद हो चुकी आंखे कोरोना काल में बुज़ुर्गों की बुरी दशा को खुद ही बयाँ कर देती हैं।
उनकी पत्नी गंगा राम कहती हैं कि उनके दो बच्चों में से एक की 15-16 साल पहले मौत हो गई थी और दूसरा लड़का उनसे अलग रहता है।
रामी राम कहते हैं कि लॉकडाउन के समय में सरकारी योजनाओं की वजह से खाने में कोई मुसीबत नही आयी पर आज तो खाना खा लिया है कल क्या खाएंगे इसका पता नही। 
आंखों की रोशनी जा रही है जिसकी वजह से वह कोई भी काम नही कर पाते हैं, उनकी पत्नी ही लोगों के खेतों में काम कर कुछ कमा रही है।
पत्नी की कमाई से ही शराब भी पीते हैं जिससे दोनों पति-पत्नी में अनबन भी होती है पर लड़ाई से भी क्या करें दोनों ही अब एकदूसरे का एकमात्र सहारा हैं।

रामी राम कहते हैं कि कोरोना काल की वजह से अब इन दोनों को अकेलापन भी सताता है डर की वजह से कुछ दूर रह रही अपनी बहन से भी मिलने नही जा पा रहे हैं।

गंगा राम कहती हैं कि मुम्बई के उल्लासनगर में 20-25 साल रहने के बाद 3-4 साल पहले ही उत्तराखंड लौटे हैं और उन्होंने यह कभी नही सोचा था कि ऐसा समय भी आएगा। भविष्य में क्या होगा उन्हें नही पता।  कोरोना से जैसे सब मरेंगे वैसे ही हम भी मर जायेंगे।

टाटा इंस्टिट्यूट्स ऑफ सोशल साइंस मुम्बई द्वारा मार्च 2020 में मुम्बई के बुज़ुर्गों की स्थिति पर एक शोध किया गया था।
डाइबिटीज उनमें एक मुख्य बीमारी थी। 46.4% बुज़ुर्गों ने कहा था कि सरकार को बुज़ुर्गों की मदद करनी चाहिए। ज्यादातर बुज़ुर्गों ने बिना रिटायरमेंट लाभ और पेंशन के काम किया।

वर्ल्ड बैंक के अनुसार वर्ष 2050 तक हर पांचवें भारतीय की उम्र 60 वर्ष से ऊपर होगी।
वर्तमान में सिर्फ 12% भारतीय फॉर्मल पेंशन स्कीम प्राप्त करते हैं। जिसकी वजह से पचास लाख भारतीय जो 60 वर्ष से ऊपर होते हैं या बुज़ुर्ग की श्रेणी में आते हैं गरीबी का सामना करते हैं।

सांख्यकी और कार्यक्रम कार्यान्वन मंत्रालय भारत सरकार द्वारा बुज़ुर्गों पर वर्ष 2011 में किए गए स्थिति विश्लेषण के अनुसार भारत की आबादी में बुज़ुर्गों का प्रतिशत वर्ष 1961 में 5.6% था जो वर्ष 2026 तक 12.4% होने का अनुमान है।
• 65% बुज़ुर्ग अपनी देखभाल के लिए दूसरों पर निर्भर हैं।
• ह्रदय रोगों का खतरा शहरी इलाकों में रहने वाले बुज़ुर्गों को ग्रामीण इलाकों में रहने वाले बुज़ुर्गों से अधिक है।

'हेल्पेज़ इंडिया' चार दशकों से अधिक समय से वंचित बुज़ुर्गों के साथ काम करने वाला एक दान मंच है।
उन्होंने भारत में कोरोना के दौरान बुज़ुर्गों की स्थिति की जमीनी हकीकत जानने के लिए एक सर्वे किया।
जिसकी जून 2020 की रिपोर्ट के अनुसार 91% बुज़ुर्ग कोरोना के लक्षणों के बारे में जानते हैं।
60-69 वर्ष के 63% बुज़ुर्गों में यह जागरूकता सबसे अधिक थी, 70-79 वर्ष के बुज़ुर्गों में यह जागरूकता 31% थी और 80 वर्ष से ऊपर के बुज़ुर्ग जिन्हें कोरोना से सबसे अधिक जागरूक होने की आवश्यकता है उनमें यह जागरूकता सिर्फ 6% थी।

● 62% बुज़ुर्ग किसी न किसी पुरानी बीमारी से जूझ रहे हैं। 42% बुज़ुर्गों ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान उनके स्वास्थ्य की स्थिति और ज्यादा बिगड़ गयी है।

● 78% बुज़ुर्गों ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान उन्हें आवश्यक सामान प्राप्त करने में परेशानी हुई है। ऐसा कहने वालों में ग्रामीण क्षेत्र के 56% और शहरी क्षेत्र के 44% बुज़ुर्ग थे।

● लॉकडाउन में 61% बुज़ुर्गों ने कहा कि कोरोना काल में वह खुद को सीमित और सामाजिक रूप से पृथक महसूस कर रहे हैं।

● 60% ने बुज़ुर्गों ने कहा कि सामाजिक पेंशन उनकी मुख्य जरुरत है।

वृद्धों के लिए योजनाएं

• राष्ट्रीय वयोश्री योजना - इस योजना के तहत गरीबी रेखा के नीचे आने वाले उन वृद्धों को जो शारीरिक रूप से अक्षम हैं, उन्हें सरकार की तरफ से व्हीलचेयर तथा अन्य सहायक उपकरण दिए जाते है।
• इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना - भारत में ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा शुरू की गई एक गैर अंशदायी योजना है जो 60 वर्ष से अधिक आयु के गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे लोगों को जीवन यापन करने के लिए पेंशन प्रदान करती है।
• वरिष्ठ नागरिक बचत योजना - यह सरकार समर्थित बचत योजना है जो 60 वर्ष से अधिक आयु के भारतीय निवासियों के लिए बनाई गई है।

बुज़ुर्गों की समस्याओं का समाधान है टाइम बैंक

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के एक समूह ने वर्ष 2019 में अपने न्यूयॉर्क के दौरे के बाद की रिपोर्ट में भारत सरकार से बुज़ुर्गों की देखभाल के लिए स्विट्जरलैंड में शुरू हुई टाइम बैंक योजना को अपनाने की सिफारिश की है।
मध्य प्रदेश के आध्यात्म विभाग ने टाइम बैंक खोलने का फ़ैसला भी लिया है।
टाइम बैंकिंग एक समय आधारित मुद्रा है। इसमें पैसे के बजाए श्रम आधारित क्रेडिट के लिए सेवाओं का आदान-प्रदान किया जाता है। इसमें एक घण्टा=एक क्रेडिट होता है।
टाइम बैंक की संयुक्त राज्य अमेरिका की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार अमेरिका में टाइम बैंकिंग का प्रयोग करने वालों की वर्तमान संख्या तीस से चालीस हज़ार लोगों की है।
शब्द टाइम बैंक को 1980 के दशक में एडवर्ड कान्ह नामक अमेरिकी कानून प्रोफेसर द्वारा गढ़ा और ट्रेडमार्क किया गया था।
यदि कोई व्यक्ति ड्राइविंग जानता है तो वह बिजली का काम जानने वाले व्यक्ति की कहीं बाहर जाने के लिए ड्राइविंग कर मदद कर सकता है यह समय उसके क्रेडिट में जुड़ जाएगा। 
बिजली का काम जानने वाला किसी भी अन्य व्यक्ति का कार्य कर उसकी मदद कर सकता है।
इस प्रकार हर कोई किसी अन्य की सेवा कर अपने बुढ़ापे में सेवा प्राप्त करने के लिए टाइम बैंक में अपने क्रेडिट जोड़ सकता है।
टाइम बैंक की वजह से बुढ़ापे में किसी अन्य के उपकार की आवश्यकता नही पड़ेगी। 
टाइम बैंक में यदि खेतों में किए गए कार्य के बदले अन्न मिलेगा तो लोकतंत्र की विफलता के सबसे बड़े उदाहरण भिक्षावृत्ति की समस्या समाप्त हो सकती है।
कोरोना काल में टाइम बैंक समाज से अलग-थलग पड़ चुके बुज़ुर्गों की बहुत सहायता कर सकता था।

यूनिसेफ ने कोरोना काल में बुज़ुर्गों की देखभाल के लिए छह सुझाव सुझाए हैं।
• उन्हें सामाजिक समर्थन दें और उनसे फ़ोन कॉल या मैसेज के जरिए सम्पर्क में रहें।
• उनके रोज़ के आवश्यक काम करें जैसे उनके दवा, दूध का ध्यान रखना।
• उन्हें समाजिक अलगाव महसूस न होने दें। 
• उन्हें सिखाएं की वीडियो चैट कर कैसे सबसे जुड़े रह सकते हैं।
• अनावश्यक चिकित्सा यात्राओं को स्थगित करें।
• उनके मोबाइल सम्पर्कों में आपातकालीन नम्बर जोड़ें

Saturday, July 11, 2020

कोरोना काल राजनीतिक पार्टी लोकतंत्र से जनता लोकतंत्र लाने का सही समय ?


कोरोना प्रसार रोकने में सरकार की विफलता

पिछले साल ही चीन के वुहान शहर में कोरोना महामारी फैलने की ख़बर सामने आने लगी थी। भारत सरकार अपनी दूरदर्शिता की कमी के चलते तब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के स्वागत की तैयारियों में व्यस्त थी।
वहीं नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ विरोध प्रदर्शन उग्र होने की वजह से देश के ह्रदय में बसा दिल्ली शहर धधक उठा। 
इस बीच ही देश के अंदर एक अदृश्य दुश्मन अपने पैर पसार चुका था।
बिना स्क्रीनिंग विदेश से आने वाले यात्री पूरे देश में फैल चुके थे। सरकार ने तब भी अंतराष्ट्रीय उड़ानों में प्रतिबन्ध लगाने में दो महीने से ज्यादा वक्त लगा दिया।
 22 मार्च को जनता का ध्यान थाली बजाने पर था तो वहीं सरकार ने बिना तैयारी के लॉकडाउन के गम्भीर परिणामों से बेखबर हो 25 मार्च से तीन महीने का लॉकडाउन लगा दिया। बेरोज़गार हो चुके श्रमिक भूखे मरने की डर से अपने परिवारों को साथ ले कर पैदल ही घर वापसी के लिए सैकड़ों किलोमीटर पैदल सफर पर निकल पड़े और इस बीच 5 अप्रैल को देश साल की पहली दिवाली मनाने में मशगूल था।

श्रमिकों की घर वापसी के लिए बढ़ती भारी संख्या को देखते हुए 1 मई से श्रमिक ट्रेन तो चलाई गई पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। लाखों श्रमिक पैदल ही अपने घर पहुंच चुके थे पर इनमें सब इतने भाग्यशाली नही निकले कुछ श्रमिक भूख-प्यास से तड़पकर बीच रास्ते में ही दम तोड़ते रहे तो कुछ सड़क और रेल दुर्घटनाओं का शिकार हो कर भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास पर हमेशा के लिए खूनी दाग छोड़ गए।

भाजपा सरकार ने शायद ही कभी विपक्षियों की बात सुनी हो, राहुल गांधी ने हॉवर्ड विश्विद्यालय के सूचनापत्र का हवाला देते हुए 12 फरवरी को ही ट्वीट कर दिया था कि हमारी सरकार इस खतरे को गम्भीरता से नही ले रही है। 

भारत में कोरोना टेस्टिंग अब भी उतनी नही हो रही है जितनी होनी चाहिए, सरकार की रणनीति में शुरू से अब तक कोई बदलाव देखने में नही आया है। स्वास्थ्य मंत्री यही कहते आए हैं कि हमने कोरोना से निपटने के लिए हर तरह की तैयारी कर रखी है। 8 जुलाई को तेजस्वी यादव बिहार के एक अस्पताल का वीडियो ट्वीट करते हैं जिसमें कोरोना मरीज़ एक ही वार्ड में एक शव के साथ दो दिन से रहने के लिए मजबूर हैं।
भारत में कोरोना मरीज़ों की संख्या 10 जुलाई तक आठ लाख की संख्या को पार कर गयी है और हम संक्रमित देशों की सूची में तीसरे स्थान पर हैं।
वहीं भारत सरकार अब भी यह मानने को तैयार नही है कि कोरोना का प्रसार सामुदायिक स्तर पर शुरू हो गया है।

बढ़ते कोरोना मरीज़ों की वजह से भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था अब चरमराने लगी है। बेड, वेंटिलेटर की कमी की वजह से अस्पताल नए मरीजों को भर्ती नही कर पा रहे हैं। कोरोना मरीज़ों की लाशों को गड्डे में फेंकने का वीडियो भी वायरल हुआ और ऐसे ही एक वीडियो में कूड़े वाली गाड़ी में कोरोना संक्रमित की लाश को ढोया जा रहा था।
ग्रामीण इलाकों में भी कोरोना संक्रमित मरीज़ मिलने लगे हैं जिन्हें इलाज के लिए 50-100 किलोमीटर दूर के अस्पतालों में भर्ती कराया जा रहा है।
दिल्ली की अमनप्रीत अपने ट्विटर हैंडल से पूरे सिस्टम से अपने कोरोना संक्रमित पिता के इलाज के लिए मदद की गुहार लगाते रही पर किसी भी अस्पताल ने उनके पिता को भर्ती नही किया और न ही प्रशासन की ओर से उनकी मदद के लिए कोई सामने आया।
अगर दिल्ली में कोरोना मरीज़ के साथ यह व्यवहार हुआ है तो उत्तर प्रदेश के किसी गांव या उत्तराखंड के किसी दुरस्थ पहाड़ी क्षेत्र में कोरोना मरीज़ के साथ क्या होगा इसका अनुमान आप खुद लगा सकते हैं।

सरकारी नीतियों पर भी सवाल

नम्बियों.कॉम द्वारा किए गए एक शोध में स्वास्थ्य देखभाल सूचकांक वर्ष 2020 में भारत बयालीसवें स्थान पर है।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय भारत सरकार के अनुसार 'भले ही स्वास्थ्य के अधिकार को मौलिक अधिकार नही माना जाता हो परन्तु भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 की उदार व्याख्या करें तो कोई भी स्वास्थ्य के अधिकार को अनुच्छेद 21 के अभिन्न अंग के रूप में शामिल करने का प्रयास कर सकता है, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है।'
राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 में मौलिक अधिकारों में स्वास्थ्य के अधिकार को शामिल करने पर कोई चर्चा नही की गई है। 
स्वास्थ्य पर सबसे कम खर्च करने वाले देशों में भारत का भी स्थान है। स्वास्थ्य व्यवस्थाओं में भारत अपनी जीडीपी का 1 से लेकर 1.8 प्रतिशत तक ही खर्च करता है। 

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 में जन स्वास्थ्य व्यय को 2025 तक जीडीपी के 2.5 प्रतिशत तक बढ़ाने का प्रस्ताव किया गया है। इसमें भारत अब भी अमेरिका से बहुत पीछे है। अमेरिका अपनी जीडीपी का 17-18 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करता है।

भारतीयों की जेब पर अस्पतालों का खर्चा बहुत भारी पड़ता है। कई बार इलाज के दौरान लोगों को अपनी सारी सम्पत्ति तक बेचनी पड़ जाती है और फिर यह पैसा कभी सरकार या किसी एजेन्सी से वापस नही मिलता है।
स्वास्थ्य बीमा लेने वालों की संख्या में भारतीय बहुत पीछे हैं। हालांकि 2018 में प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना तो शुरू की गयी है पर इसकी भी कुछ सीमाएं हैं। इसमें प्रति परिवार प्रति वर्ष पांच लाख रुपए तक का मुफ्त इलाज मिलेगा। यह इलाज पाने के लिए सरकार की ओर से ग़रीबी की कुछ परिभाषा बनाई गई है।

भारत के मध्यमवर्गीय परिवार अपने जीवन भर सरकार द्वारा बनाई गई गरीबी की इस परिभाषा और समाज द्वारा स्वीकृत मध्यमवर्गीय की परिभाषा के बीच झूलते रहते हैं। परिवार में किसी को एक गम्भीर बीमारी होते ही आधे से ज्यादा भारतीय परिवार सड़क पर आ जाते हैं।

भारत में कई राज्यों ने इस लॉकडाउन जैसे संकट के समय में भी श्रम कानूनों का एकतरफा निलंबन कर दिया गया। जिस पर देश के प्रमुख ट्रेड यूनियनों ने अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन को पत्र लिखा था।
उत्तराखंड सरकार के श्रम अनुभाग द्वारा 5 मई 2020 को जारी किए गए संशोधन पत्र के अनुसार 12-12 घण्टे की दो पालियों में कार्य को स्वीकृति दी गयी है।
उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री सूचना परिसर से 6 मई 2020 को जारी किए गए एक पत्र के अनुसार उत्तर प्रदेश में वर्तमान समय में लागू श्रम अधिनियमों में तीन वर्ष की छूट प्रदान की गई है।

 कोरोना मरीजों से अपराधियों सा व्यवहार पंजाब के बरनाला में एक जेल को संगरोध केंद्र के रूप में बदला गया और देश के विभिन्न हिस्सों से भी इस तरह की खबरें आयी जो कोरोना मरीजों के साथ हो रहे गलत व्यवहार को दर्शाता है।
समाज में भी कोरोना मरीजों को लेकर नकरात्मक विचार घर कर गए हैं। कुछ मरीजों ने स्वस्थ होकर वापस अपने घर लौटने के बाद अपना निवास स्थान बदलने का विचार बनाया क्योंकि वह लोग इस संकट की घड़ी में अपने पड़ोसियों के द्वारा किए गए बुरे व्यवहार से दुखी थे।
कुछ ने कोरोना रिपोर्ट पॉज़िटिव आने पर कोरोना वॉरियर्स द्वारा किए गए दुर्व्यवहार के बारे में बताया कि कैसे उन्हें तैयार होने का मौका दिए बगैर एक अपराधी की तरह अस्पताल ले जाया गया।
पुर्वी राज्यों के लोगों के साथ नस्लभेदी टिप्पणियां की गई उन्हें कई जगह कोरोना फैलाने वाला कहा गया और चीन और नेपाल के साथ तल्ख़ होते रिश्तों के साथ यह स्थिति और भी ज्यादा ख़राब हो रही है।

पीएम केयर्स फंड पर बवाल कोविड-19 महामारी जैसी किसी भी तरह की आपातकालीन या संकट की स्थिति से निपटने के प्राथमिक उद्देश्य के साथ एक समर्पित राष्ट्रीय निधि की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए और उससे प्रभावित लोगों को राहत प्रदान करने के लिए पीएम केयर्स फंड के नाम से एक सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट बनाया गया है।

इस फंड में चीनी कम्पनियों से मिले दान पर जमकर विवाद हुआ और इस फंड से खरीदे जाने वाले वेन्टीलेटरों पर भी प्रश्न खड़े हो रहे हैं।

पीएम केयर्स फंड के अस्तित्व पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं, महामारी के इस दौर में सरकार को इस अनावश्यक विवाद से बचना चाहिए था और पहले से चले आ रहे राहत कोषों को ही बढ़ावा देना था।

कोरोना काल में भी राजनीति कोरोना काल में लोगों के अंदर भय बना हुआ है और लाखों लोग बेरोजगार हो गए है पर इस बीच भी देशभर में राजनीतिक पार्टियों की वर्चुअल रैलियां चालू हैं।

महाराष्ट्र में कोरोना संक्रमितों की संख्या 2,30,000 के पार पहुंच चुकी है पर वहाँ राजनीतिक खेल कोरोना काल की शुरूआत से अब तक चल रहा है।

मणिपुर में भी भाजपा सरकार गिराने के खेल में लोकतंत्र की असली पालक जनता का ध्यान किसे होगा!!

मध्य प्रदेश में आज कोरोना संक्रमितों की संख्या 16000 के आंकड़े को पार कर चुकी है और वहाँ भी राजनीतिक खेल कोरोना काल में भी चालू था।
कुछ समय तक मुख्यमंत्री महोदय को सत्ता के इस खेल की वजह से कोरोना प्रसार को रोकने का काम अकेले ही करना पड़ा था।

आधार और आरोग्य सेतु की अनिवार्यता

आधार की अनिवार्यता पर बवाल के बाद निजता के अधिकार पर चर्चा हुई। निजता का अधिकार हमें हमारे जीवन में होने वाले हस्तक्षेपों से बचाता है।
लोकतंत्र में यदि निजता का अधिकार प्राप्त है तो उसका पालन किया जाना भी आवश्यक है। 
अरोग्य सेतु एप और आधार कार्ड पर क्या सरकार यह गारंटी दे सकती है कि अगले पचास सालों तक इन दोनों के डाटा बेस पर कोई भी सेंध नही लगाएगा और अगर देती भी है तो इसकी क्या गारंटी है कि यह सरकार अगले पचास वर्षों तक सत्ता में रहेगी। 

स्मार्टफोन एक निजी सम्पत्ति है जिसे हम अपनी मेहनत की कमाई से जोड़ते हैं और लोकतांत्रिक देश में शायद हमें कोई इस बात पर मजबूर नही कर सकता कि आप इस एप को डाऊनलोड करने के बाद ही सार्वजनिक परिवहनों का इस्तेमाल कर सकते हैं और अगर किसी के पास बेसिक फोन है या वह स्मार्ट फ़ोन नही रखता तो क्या वह इन सार्वजनिक परिवहन के साधनों का प्रयोग नही कर सकता ?

जस्टिस बीएन कृष्णा समिति ने डाटा प्रोटेक्शन पर रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है और सरकार ने पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन बिल 2018 पेश कर उसे कानून बनाने की तैयारी भी शुरू कर ली है। यह देखने वाली बात होगी कि उसमें बीएन कृष्णा समिति की कितनी सिफारिशों को लागू किया जाएगा पर यह सुप्रीम कोर्ट के निजता को मौलिक अधिकार मानने के ऐतिहासिक फैसले पर एक पहरा है। 
इसके कानून बनते ही सरकार स्वास्थ्य, देश की सुरक्षा के नाम पर कानूनी रूप से हम पर अरोग्य सेतु एप और आधार कार्ड जैसे अन्य तरीके अपनाकर हमारी निजता पर नए पहरे बैठाने लगेगी।
इंटरनेट में इस्तेमाल की गई हमारी हर गतिविधियों पर सरकार की नज़र रहेगी। 
हमारे डाटा पर सरकार की नज़र रखने का क्या दुष्परिणाम हो सकता है यह आप स्वयं मेरे साथ घटित  एक घटना से जान सकते हैं। एक नामी शॉपिंग साईट पर मेरे द्वारा की गई खरीददारी की पूरी जानकारी एक तीसरे पक्ष को भी थी जिसने मुझे एक ईनामी कार का प्रलोभन दिया। यह जानकारी तीसरे पक्ष तक पहुंचना बिना उस शॉपिंग साईट के किसी कर्मचारी के मिलीभगत के बगैर सम्भव नही है जिसने तीसरे पक्ष को मेरा डाटा बेचा हो।

पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन बिल 2018 के कानून बनने के बाद यही डाटा बेचने का काम डाटा प्रोटेक्शन विभाग से जुड़े किसी कर्मचारी द्वारा भी किया जा सकता है।

व्यापारियों के लिए महामारी एक बड़ा बाजार

तहलका की 26 जून 2010 में शांतनु गुहा रे की एक रिपोर्ट के अनुसार बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के संस्थान 'पथ' जो खुद को सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार करने वाला एक वैश्विक गैर लाभकारी संगठन कहता है द्वारा भारत में किए गए एक वैक्सीन ट्रॉयल में कुछ लड़कियों की जान गई थी जिनकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी उनके माता-पिता से छुपाई गयी थी।
वैक्सीन ट्रॉयल में हुई मौतों पर भारत सरकार की तरफ से बिल एंड मेलिंडा गेट फाउंडेशन पर आज तक कोई कार्रवाई नही हुई है।

वर्ष 2017 में भारत सरकार ने टिकाकरण पर बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के साथ सम्बन्धों में कटौती की थी। कोरोना काल में विश्व के सबसे बड़े परोपकारी के रूप में विख्यात इसी फाउंडेशन के स्वामी बिल गेट्स से भारतीय प्रधानमंत्री की वीडियो कॉल के माध्यम से वार्ता हुई। इस बातचीत के उपलब्ध कराए गए स्क्रीनशॉट्स में जनता के अपने हर सम्बोधन में नए-नए तरीके के मास्क पहनने वाले मोदीजी का मास्क गायब है और न ही बिल गेट्स ने मास्क पहना है।
बिल गेट्स को एड्स महामारी के बाद अब भारत में कोरोना का भी एक बड़ा बाज़ार दिख रहा है।

रिबेका प्रोजेक्ट फ़ॉर जस्टिस संगठन जो अफ्रीका और संयुक्त राज्य अमेरिका में लोगों के जीवन गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षा करने की वकालत करता है। वह कहता है कि बिल एंड मेलिंडा गेट्स की मदद से चलाए जा रहे एक प्रोग्राम पर एक मानवाधिकार रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका और अफ्रीका में सैंकड़ों महिलाओं और लड़कियों को गर्भनिरोधक इंजेक्शन से जुड़े दुष्प्रभावों के बारे में नही बताया जा रहा है।

ग्लोबल फार्मास्युटिकल दिग्गज ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन और बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के बीच व्यापारिक सम्बंध बहुत पुराने हैं। 
ह्यूमोनोस्फीयर की एक रिपोर्ट के अनुसार ग्लैक्सो ड्रग में हुई एक धोखाधड़ी में बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन का सम्बंध भी था। 
यही ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन ब्रिटेन से कोरोना वैक्सीन आपूर्ति के सौदे में सबसे आगे चल रही है।

फार्मा कम्पनी माइलान और फाइज़र के बीच होने वाले विलय के बाद यह कम्पनियां एक बड़ी वैश्विक फार्मा कम्पनी बन जाएगी। हैदराबाद स्थित माइलान की लैब में भी बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन ने भारी निवेश किया है।
यही माइलान कम्पनी भारत में कोरोना वायरस के लिए अब तक की सबसे प्रभावी दवा रेमडिसिवीर पेश करने वाली है।

अपने देश की व्यवस्थाओं की समझ हर भारतीय को है। अपनी सुरक्षा अपने हाथों में ही होती है इसलिए कोरोना प्रसार को रोकने के लिए सरकार द्वारा सुझाए गए उपायों का पालन करे, जरूरत पड़ने पर ही घर से बाहर निकलें और सामाजिक दूरी का ध्यान रखें। हमेशा सेनेटाइजर को अपने पास रखें या घर से अंदर बाहर जाने के बाद अपने हाथों को साबुन से धोएं।

Saturday, July 4, 2020

कानपुर शहीदों को नमन : पुलिस सुधार में देरी का नतीज़ा है यह मुठभेड़।

●  कानपुर एनकाउंटर देश के पूरे पुलिस ढांचे पर सवाल है।
● आज़ादी से अब तक 33000 से ज़्यादा पुलिसकर्मी अपने कर्तव्य के दौरान शहीद हुए हैं।
● पुलिस के मानवाधिकार पर चर्चा कम ही की जाती है।
● पुलिस सुधार की रिपोर्टें सरकारी दफ्तरों की अलमारियों में धूल फांक रही हैं।

कानपुर में एक शातिर अपराधी विकास दूबे को पकड़ने गयी पुलिस टीम पर हमला किया गया जिसमें आठ पुलिसकर्मी शहीद हो गए।
 60 से ज्यादा दर्ज मुकदमों वाला अपराधी विकास दूबे पुलिस के छापा मारने की सटीक सूचना मिलने पर भागता नही है और घात लगा कर पुलिस टीम पर हमला करता है तो इस पर हमारे पूरे पुलिस ढांचे पर ही सवाल उठता है। यह बात तहकीकात के बाद सामने आ ही जाएगी कि इस वीभत्स घटनाक्रम के पीछे कोई विभीषण शामिल था या नही पर यह समय भारत की पुलिस के ढांचे पर चर्चा का सबसे उपयुक्त समय है ताकि फिर से कोई जाबांज़ पुलिसकर्मी ऐसे अपराधियों से निपटने में अपनी जान ना गंवाएं।

पुलिसकर्मियों की भुला दी गयी शहादत

गुलाम भारत में जलियांवाला बाग हत्याकांड को पुलिस द्वारा गुलाम भारतीयों पर किए गए सबसे बड़े अत्याचार के रूप में याद किया जाता है।
आज़ाद भारत की बात करें तो 2 मई 1987 को मेरठ के हाशिमपुरा कांड में पुलिस की गोलियों से 42 लोगों की जान चली गयी थी।
23 जुलाई 1999 को तमिलनाडु के मन्जोलाई में पुलिस के लाठीचार्ज की वज़ह से 17 मौतें हुई थी।
तमिलनाडु के ही थूथुकुड़ी में 22 मई 2018 को स्टरलाइट कॉपर के खिलाफ किए गए प्रदर्शन में हालात बेकाबू होने पर पुलिस द्वारा की गई गोलीबारी में 13 मौतें हुई थी।

कोरोना काल में पुलिसकर्मियों पर कोरोना के प्रसार को रोकने की बड़ी जिम्मेदारी है। लॉकडाउन का सख्ती से पालन कराने के लिए पुलिसकर्मियों का जनता के साथ सीधा संपर्क है। सैंकड़ों पुलिसकर्मी अपने कर्तव्य का पालन करने के दौरान कोरोना पॉज़िटिव पाए गए हैं।
अकेले महाराष्ट्र में ही कोरोना की वजह से 30 पुलिसकर्मी शहीद हुए हैं।
गृह मंत्रालय , भारत सरकार से जुड़ी पुलिस की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार आज़ादी के बाद से 33000 से ज़्यादा पुलिसकर्मी अपने कर्तव्यपालन के दौरान शहीद हुए हैं।

पुलिस के लिए मानवाधिकार

2008 से 2009 तक आयोजित 'ह्यूमन राइट्स वाच फ़ील्ड' की रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश के एक पूर्व महानिदेशक का कहना है कि यदि आप एक अमेरिकी पुलिसकर्मी को यहाँ ले आए तो वह एक दिन में ही आत्महत्या कर लेगा। यहाँ 8 या 10 घण्टे की ड्यूटी शिफ्ट नही है यहाँ के पुलिस कर्मियों को 24 घण्टे काम करना पड़ता है।

संयुक्त राष्ट्र के सुझाए मानकों के अनुसार प्रति एक लाख व्यक्तियों पर 222 पुलिस बल होना चाहिए और पब्लिक रिलेशन सोसायटी ऑफ इंडिया के आंकड़ों के अनुसार भारत में यह संख्या प्रति लाख पर मात्र 137 की है।

कम रैंक के पुलिस अधिकारी बैरकों की गन्दी शौचालय से रोज़ रूबरू होते हैं और अपने लिए सिर्फ एक बेड की जगह में आपस में नोकझोंक करते हैं और तंग रहते हैं।
जिस ठंड में एक बेसहारा, सड़क में सोने वाला व्यक्ति सुबह मृत मिलता है उस ठंड में पुलिसकर्मी बिना छत के रात भर हमारी सुरक्षा के लिए गश्त करते हैं।
 
'ह्यूमन राइट्स वॉच फील्ड' के अनुसार बहुत से पुलिसकर्मी प्रतिष्ठा का प्रतीक वीआईपी सुरक्षा में लगे हुए हैं। कानून व्यवस्था बनाने के लिए भर्ती हुआ पुलिसकर्मी किसी का निजी सुरक्षाकर्मी बन जाता है।

मानवाधिकार का संरक्षण सिर्फ विकास दूबे जैसे अपराधियों के लिए ही होता है और पुलिसकर्मियों के मानवाधिकार की कभी चर्चा नही की जाती है।
मानवाधिकार उल्लंघन पर पुलिस के ऊपर मजिस्ट्रेटी जांच का प्रावधान है और इन आरोपों की वज़ह से कई पुलिसकर्मियों का पूरा जीवन बर्बाद हो गया है। बहुत से पुलिसकर्मी मानवाधिकार उल्लंघन पर मुकदमों का सामना कर रहे हैं तो कुछ सलाखों के पीछे अपनी ज़िंदगी काट रहे हैं।

पुलिस सुधार पर धूल फांक रही रिपोर्टें

7 फरवरी 1979 को श्री धर्मवीर की अध्यक्षता में छह लोगों  की समिति ने सरकार को राष्ट्रीय पुलिस आयोग की रिपोर्ट सौंपी थी।
आयोग द्वारा दिए गए सुझाव निम्न हैं-
- सभी राज्यों में पुलिस संघ की मान्यता।
- कांस्टेबलों को अकुशल कर्मचारियों की जगह रखने के बजाए उन्हें कुशल कर्मचारी माना जाए।
- पुलिस के अराजपत्रित कर्मचारियों को रियायती दर पर चावल, गेंहू, चीनी जैसी आवश्यक वस्तुओं का वितरण किया जाए।
- सभी पुलिसकर्मियों को सप्ताह में एक दिन आराम दिया जाए और उनसे आठ घण्टे का कार्य लिया जाए। अतिरिक्त ड्यूटी के लिए पुलिसकर्मियों को वित्तीय मुआवजा दिया जाए।

दिसंबर 1993 को तत्कालीन केंद्रीय गृह सचिव एनएन वोहरा ने अपनी रिपोर्ट गृहमंत्री को सौंपी थी। रिपोर्ट में कहा गया, ‘इस देश में अपराधी गिरोहों, हथियारबंद सेनाओं, नशीली दवाओं का व्यापार करने वाले माफिया गिरोहों, तस्कर गिरोहों, आर्थिक क्षेत्रों में सक्रिय लॉबियों का तेजी से प्रसार हुआ है।
 इन लोगों ने विगत कुछ वर्षों के दौरान स्थानीय स्तर पर नौकरशाहों, सरकारी पदों पर आसीन लोगों, राज नेताओं, मीडिया से जुड़े व्यक्तियों तथा गैर-सरकारी क्षेत्रों के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन व्यक्तियों के साथ व्यापक संपर्क विकसित किए हैं।'
इस रिपोर्ट पर गम्भीरता से कार्य किया जाता तो आज शायद हमारे यह आठ पुलिसकर्मी भी शहीद नही हुए होते। 

 रिटायर्ड डीजीपी जूलियो एफ रिबेरो की अध्यक्षता वाली समिति ने अक्टूबर 1998 में पहली रिपोर्ट दी। इसने हर राज्य में पुलिस परफॉर्मेंस ऐंड एकाउंटिबिलिटी कमीशन (पीपीएसी) और हर जिले में पुलिस शिकायत अथॉरिटी (डीपीसीए) बनाने की सिफारिश की। 
मार्च 1999 में सौंपी दूसरी रिपोर्ट में केंद्रीय पुलिस समिति बनाने, जांच और कानून-व्यवस्था के लिए अलग-अलग बल तैनात करने, हर राज्य में पुलिस भर्ती बोर्ड बनाने जैसे सुझाव दिए गए।

पुलिस सुधार पर बात हो और उसमें प्रकाश सिंह का नाम शामिल ना हो यह बात निराश कर सकती है।
पुलिस सुधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने 22 दिसम्बर 2006 में प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ पर एतिहासिक निर्णय देते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को सात अहम सुझाव दिए थे। इन सुझावों के प्रमुख बिंदु हैं-
- हर राज्य में एक सुरक्षा परिषद का गठन।
- डीजीपी, आईजी व अन्य पुलिस अधिकारियों का कार्यकाल दो साल तक सुनिश्चित करना।
- आपराधिक जांच एवं अभियोजन के कार्यों को कानून व्यवस्था के दायित्व से अलग करना और एक पुलिस शिकायत निवारण प्राधिकरण का गठन।

राष्ट्रमंडल मानवाधिकार पहल पुलिस सुधार कार्यक्रम की समन्वयक देविका प्रसाद की एक रिपोर्ट के अनुसार पुलिस सुधार अब भी सिर्फ कागजों पर ही हैं।

पुलिस सुधारों को लागू करने का सही समय

भारत में मोदी सरकार आने के बाद से सुशासन पर ज़ोर दिया गया है। लॉकडाउन में हम सुशासन स्थापित करने के लिए पुलिस की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है यह देख ही चुके हैं।
देश में सुशासन लाने के लिए पुलिस ढांचे में सुधार की सख्त आवश्यकता है।

'द सेंटर फ़ॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज़' की 'भारत में पुलिस की स्थिति रिपोर्ट 2019 : पुलिस की पर्याप्तता और कार्य करने की स्थिति' रिपोर्ट में पुलिस के बारे में कहा गया है कि एक तिहाई पुलिस अफसरों ने यह माना है कि यदि उन्हें समान वेतन और सुविधाओं वाली कोई अन्य नौकरी दी जाए तो वह अपनी पुलिस की नौकरी छोड़ देंगे।
हमारी पुलिस आधुनिक हथियारों से लैस अपराधियों से लड़ने में कितनी सक्षम है यह हमें कैग की एक रिपोर्ट से पता चलता है। कैग के अनुसार राज्य के पुलिस बलों के पास हथियारों की भारी कमी पायी गई है।

कांस्टेबल पुलिस की रीढ़ की हड्डी होता है। जमीनी स्तर पर उसे ही सारे कार्य करने करने होते हैं। उन्हीं कांस्टेबलों की शैक्षिक योग्यता मात्र बारहवीं कक्षा है और उनसे हम डॉक्टरों, वकीलों, इंजीनियर, नेताओं और इन शातिर अपराधियों से निपटने की उम्मीद रखते हैं।

पुलिस ट्रेनिंग में सिर्फ शारीरिक क्षमता को बढ़ाने पर ही ज़ोर दिया जाता है यह अंग्रेजों के गुलाम भारत के लिए सही था पर अब पुलिसकर्मियों को नए-नए तरीकों से किए जा रहे साइबर अपराधों से निपटना पड़ रहा है।

एक कांस्टेबल अपनी सेवा के दौरान सिर्फ एक बार प्रोन्नत किया जाता है यह बात उसके प्रदर्शन पर विपरीत असर डालती है।

देश की सीमाओं पर तैनात जवानों की तरह ही देश के अंदर हमारी सुरक्षा में 24 घण्टे मौजूद पुलिसकर्मियों की स्थिति पर सरकार द्वारा कोई ठोस निर्णय लिए जाने का शायद यही सबसे सही समय है। यही कानपुर एनकाउंटर के शहीदों को हमारी ओर से सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

Friday, July 3, 2020

कोरोना में कैसे सांस ले रहा है हमारा उत्तराखंड।


उत्तराखंड के अल्मोड़ा में एक साइबर कैफे में अपना पीपीएफ निकालने खड़े कुछ प्रवासी युवाओं को देख कर एक बार तो मेरा उनसे बात करने का हुआ पर मैं कुछ सोच कर झिझक गया। 
कोरोना काल में लगभग डेढ़ लाख से ज्यादा प्रवासी अपनी जन्मभूमि में वापस लौट चुके हैं ।

वापस लौटे प्रवासियों का दर्द

उत्तराखंड में डीडीहाट के रैतड़ी गांव के एक प्रवासी पुष्कर राम से बात करने का मौका मिला। इनसे आप प्रवासियों की पीड़ा को आसानी से समझ सकते हैं।
वह गुड़गांव के एक रेस्टोरेंट में काम करते थे और कोरोना कि वजह से रेस्टोरेंट बन्द होने पर इन्हें वापस अपने गांव लौटना पड़ा। लॉक्डाउन में वापस आना इतना आसान नही था। पुष्कर ने उत्तराखंड के रूद्रपुर तक आने के लिए टैम्पो और बसों का सहारा लिया, रुद्रपुर आने पर उन्हें एक रात के लिए वहीं रोक लिया गया और अगले दिन उन्हें पिथौरागढ़ भेजा गया।
डीडीहाट में 14 दिन संगरोध में बिताने के बाद वो घर वापस आ सके। हालात ठीक होने पर पुष्कर गुड़गांव वापस जा कर रेस्टोरेंट में अपने बचे हुए 70 हज़ार रुपए वापस ले अपने गांव में ही कोई काम शुरू करना चाहते हैं। हालात ठीक होने तक क्या करोगे पूछने पर पुष्कर का जवाब मनरेगा की मदद से मज़दूरी प्राप्त कर अपना पेट पालने का था। मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना के बारे में प्रश्न करने पर पुष्कर राम को इसकी कोई जानकारी नही थी।

कोरोना काल में उत्तराखंड के विद्यालयों और कॉलेजों की स्थिति
 
उत्तराखंड बोर्ड ने 10 वीं और 12 वीं कक्षाओं की बोर्ड परीक्षा करा इतिश्री तो कर ली है पर अन्य छात्रों का भविष्य अधर में लटक रहा है।

उच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद सरकार ने ऑनलाइन पढ़ाने वाले स्कूलों को ही फीस लेने की अनुमति दी है। 
हल्द्वानी के रहने वाले कृष्ण लाल और उनकी पत्नी के लिए एक निजी विद्यालय में पढ़ रही अपनी बच्ची को मिल रहे ऑनलाइन गृह कार्य को करवा पाना एक टेढ़ी खीर है पर डिजिटल युग में जन्मे बच्चे सुविधा उपलब्ध होने पर खुद ही अपने माता-पिता से कम्प्यूटर, मोबाइल के प्रयोग में एक कदम आगे हैं इसलिए कृष्ण लाल की बच्ची तो इस डिजिटल ताम-झाम को निपटाने में खुद समर्थ है पर पिथौरागढ़ के एक दूरस्थ गांव में रहने वाले सुंदर सिंह के साथ यह स्थिति नही है। उनके घर में एक फीचर फोन है और डिजिटल ज्ञान से वह और उनके बच्चे परिचित नही हैं और ऐसे बच्चों से  ऑनलाइन पढ़ाई की परिभाषा पूछना भी बेईमानी है।
संविधान में शिक्षा को मौलिक अधिकार माना गया है जिसमें छह से चौदह वर्ष के आयु समूह के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान है। ऐसे बच्चे जो ऑनलाइन शिक्षा प्राप्त करने में असमर्थ हैं लम्बे समय तक उन्हें शिक्षा के अधिकार से वंचित रखना उनके मौलिक अधिकारों का हनन होगा और सरकार को इस वर्ग के बच्चों के शिक्षा के अधिकार को बचाने पर गम्भीरता से सोचना होगा।
उत्तराखंड की उच्च शिक्षा का भी कमाबोश यही हाल है। सरकारी और निजी शिक्षण संस्थाएं ऑनलाइन पढ़ाई की बात तो कर रहे हैं पर हम उत्तराखंड के दुरस्थ पहाड़ी क्षेत्रों में मोबाइल नेटवर्क की स्थिति से अच्छी तरह से वाकिफ़ हैं।
अब प्रश्न यह है कि छात्र मोबाइल नेटवर्क ढूंढ़ेंगे या अपनी समस्याओं के हल। छात्रों का भविष्य कोरोना की वजह से अंधकार में है। सरकार को चाहिए कि उत्तराखंड की भौगोलिक और आर्थिक स्थिति को देखते हुए ऑनलाइन शिक्षा का विकल्प ढूंढे।

उत्तराखंड के परिवहन साधनों की स्थिति

कोरोना काल शुरू होने के बाद पूरे देश को लॉक्डाउन लागू कर दिया गया था। परिवहन के साधनों पर भी रोक लगा दी गयी थी। पैदल लौट रहे प्रवासियों की भारी संख्या को देखते हुए केंद्र सरकार ने स्पेशल श्रमिक ट्रेनें चलवाई। उत्तराखंड के प्रवासी भारी संख्या में पैदल और इन श्रमिक ट्रेनों से वापस अपने पहाड़ पहुंचे। अब कुछ रूटों पर उत्तराखंड परिवहन की बसें नई शर्तों के साथ दौड़ने लगी हैं जिसमें सामाजिक दूरी का ध्यान दिया जाना और दोगुना किराया शामिल है।
आवश्यक यात्राओं के लिए उत्तराखंडवासी निजी टैक्सियों का सहारा लेने के लिए मज़बूर हैं। पहले से ही कोरोना और बेरोज़गारी की मार झेल रहे लोगों के लिए यह दोहरी मार है।

कोरोना काल में उत्तराखंड के अस्पतालों की स्थिति

हमारे प्रदेश में कोरोना संक्रमित मरीज़ों की संख्या तीन हज़ार के पार पहुंच चुकी है।
मानसून पास आने पर डेंगू का खतरा भी बढ़ गया है।
समय-समय पर विभिन्न माध्यमों से हम उत्तराखंड की बदहाल चिकित्सा व्यवस्था से सूचित होते ही रहते हैं। कोई गम्भीर बीमारी पर दिल्ली, बरेली , मुरादाबाद के बड़े अस्पतालों की ओर रुख करना हम उत्तराखंडवासियों की मजबूरी है। दुरस्थ पहाड़ी क्षेत्रों के मरीज़ों को कई बार डोलों पर बैठाकर अस्पताल तक पहुँचाया जाता है।
विपरीत परिस्थितियों और सीमित संसाधनों की उपलब्धता के बाद भी उत्तराखंड में चिकित्सीय क्षेत्र से जुड़े लोग पूरी मेहनत के साथ कोरोना से लड़ रहे हैं।
छोटी मोटी बीमारियों पर लोग अस्पतालों में जाने से कतरा रहे हैं जिस वजह से कोरोना टेस्टिंग भी कम मात्रा में हो रही है। हाल ही में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के निर्देश पर कोविड-19 से संबंधित टेस्टिंग क्षमता बढ़ाने के लिए 11.25 करोड़ रूपए स्वीकृत किए गए हैं।

कोरोना से प्रदेश के व्यापारियों पर पड़ी मार

कोरोना काल में अब लॉक्डाउन को धीरे-धीरे खोला जा रहा है पर इससे पूरे भारत के व्यापारियों पर गहरा असर पड़ा है। इसमें कपड़े और होटल व्यवसायियों पर सबसे अधिक असर पड़ा है।
उत्तराखंड के नैनीताल में बड़ा बाज़ार स्थित 'वर्मा ड्रेप्स एंड गारमेंट्स' के मालिक दिनेश वर्मा जी बताते हैं कि कोरोना काल में काम पूरी तरह से ठप हो चुका है और दुकान में काम करने वाले कर्मचारियों को अपनी पुरानी बचत से ही तनख्वाह देनी पड़ रही है। भविष्य में किसी अन्य व्यवसाय शुरू किए जाने के प्रश्न पर वर्मा जी स्थिति सही होने के इंतज़ार की बात कहते हैं।

नैनीताल में एक छोटे ढाबे के व्यवसायी नाम ना छापने की शर्त पर कहते हैं कि "बाहर से आने वाले पर्यटकों को ढाबे के अंदर बुलाने पर भी डर लग रहा है और उन्हें बाहर से ही समान ना होने की बात कह कर वापस लौटा रहे है।"

नैनीताल बड़ा बाज़ार स्थित वर्ष 1850 से चली आ रही मशहूर लोटे से बनने वाली जलेबी के होटल मालिक रक्षित शाह जी कहते हैं कि " कोरोना काल में अपनी जमापूंजी बैंक से निकाल-निकाल कर घर चला रहे हैं। लॉक्डाउन में छूट के बाद भी अभी व्यापार की स्थिति में कोई खास सुधार नही आया है। "

नाम ना छापने की शर्त पर नैनीताल में बोट व्यवसाय से जुड़े एक व्यक्ति कहते हैं कि अब भी काम पूरी तरह से बंद है और बोट व्यवसाय से जुड़े बाहर के सारे लोग वापस जा चुके हैं जो आस-पास के हैं वो कहीं ओर मज़दूरी करने में लिए काम ढूंढ़ रहे हैं।

कोरोना से जंग के लिए सरकारी योजनाएं

कोरोना काल में केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के अंतर्गत प्राथमिक परिवार एवं अंत्योदय अन्य योजना और राज्य खाद्य योजना के लाभार्थियों के लिए यह योजनाएं संजीवनी साबित हुई हैं।
नैनीताल के तिब्बती मार्केट के अंत में कपड़ों की फड़ लगाने वाले अंगत लाल मौर्य की पत्नी कहती हैं कि जब कुछ नही था तब सरकार की इन योजनाओं से बहुत मदद मिली। उनके साथ ही कपड़े का ही फड़ लगाने वाले रोहित जाटव भी कहते हैं कि यह योजनाएं हम गरीबों के लिए वरदान है।

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के अंर्तगत गरीबों को लाभ दिया जाता है। उत्तराखंड सरकार ने भी इस योजना के अंतर्गत कोरोना काल में श्रमिको की मदद का एलान किया था। नैनीताल नगर निगम के ठेकेदार सुमित शर्मा के अनुसार जो श्रमिक वापस नही गये थे उन्हें सरकार की तरफ से मदद मिली और उन्होंने भी स्थानीय लोगों के साथ मिलकर लॉक्डाउन के शुरुआती समय में इन मज़दूरों की राशन देकर और आर्थिक रूप से मदद की थी।
वहीं मालरोड में काम कर रहे कुछ मज़दूरों से पूछने पर पता चला कि उन्हें सरकार से कोई मदद प्राप्त नही हुई और उन्होंने आठ महीने पहले श्रमिक पंजीकरण की दरख्वास्त दी थी ।

उत्तराखंड सरकार ने दीनदयाल उपाध्याय होम स्टे योजना में अप्रैल से जून तक ऋण ब्याज पर छूट का एलान किया। अल्मोड़ा के कौसानी में एक होम स्टे के मालिक ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि पर्यटक अब भी नही आ रहे हैं और सरकार होम स्टे के ब्याज पर थोड़ी सी और छूट दे तो सही होगा।

उत्तराखंड सरकार ने घर बैठे राशन और जरूरी सामान मंगाने के किए जनता के लिए 'जन आपूर्ति एप' शुरू किया है। गूगल फॉर्म में मैंने स्वयं एक सर्वे किया जिसमें मेरा प्रश्न यह था कि कितने लोगों को इस एप के बारे में जानकारी है। 22 लोगों के मुझे उत्तर मिले जिसमें 90.9% लोगों को इस एप के बारे में जानकारी नही थी और सिर्फ 9.1% ही इस एप के बारे में जानते थे।
सरकार का दूरस्थ क्षेत्रों के लोगों की मदद के लिए यह प्रयास सराहनीय है पर इस बारे में जनता को और अधिक जागरूक करने के उचित साधन ढूंढने की आवश्यकता है।

उत्तराखंड में शराब के ठेकों की भीड़ चर्चा का विषय रही थी और नैनीताल के ठेके पर भारी बारिश के बीच लगी भीड़ सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुई थी पर पुस्तकालय इन ठेकों की तरह शायद इक्कीसवीं सदी की जनता के लिए उपयोगी नही रह गए हैं।
 पिछले दो साल से सहस्त्रधारा रोड, देहरादून में 24 घण्टे खुले रहने वाली सरस्वती मॉडर्न लाइब्रेरी चला रहे आशीष भंडारी जी कहते हैं कि सरकार की ओर से लाइब्रेरी खोलने का कोई आदेश अब तक नही आया है उनका दो साल पहले जनता के बीच ज्ञान बांटने सम्बंधी लिया गया फैसला अब उन्हें भारी पड़ने लगा है। लाइब्रेरी से होने वाली कमाई बन्द है और भवन का किराया भी देना है, उनके लिए यही रोज़गार का एकमात्र साधन है।

मुख्यमंत्री स्वरोज़गार योजना

पर्वतीय ग्रामीण क्षेत्रों से नौकरी की खोज़ में होने वाले पलायन को रोकने के लिए मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना को शुरू किया गया है। प्रवासियों को प्रदेश में ही रोकना इसका उद्देश्य है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री जी ने सोलर प्रोजेक्ट को भी इससे जोड़ने की तैयारी की है जो उनकी दूरगामी सोच को दर्शाता है।
इसके तहत कुशल व अकुशल दस्तकारों, हस्तशिल्पियों और बेरोजगार युवाओं को अपना व्यवसाय शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया जायेगा।
योजना के तहत राष्ट्रीयकृत बैंकों, अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों, राज्य सहकारी बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के माध्यम से ऋण सुविधा भी उपलब्ध करायी जाएगी।

स्वरोज़गार के ज़रिए उत्तराखंड में पहले ही कुछ लोग अच्छी कमाई कर रहे हैं और दूसरों को भी प्रोत्साहित कर रहे हैं। 
चम्पावत जिले के किस्कोट गांव के जोशी बन्धुओं ने सरकार की ग्राम उद्योग योजना से दस लाख रुपए उधार लेकर चप्पल बनाने का काम शुरू किया और उसमें अपने साथ गांव के अन्य लोगों को भी रोज़गार दिया।
इसके लिए उन्होंने चप्पल बनाने के अपने आगरा के पुराने अनुभव का सहारा लिया।

रानीखेत में दिल्ली से पढ़े बढ़े गोपाल दत्त उप्रेती ने जैविक तरीके से धनिया का 7.1 फुट का पौधा उगाया जिसे गिनीज़ वर्ल्ड रिकार्ड्स में दर्ज किया गया है। जिसकी प्रदेश के मुख्यमंत्री जी ने भी तारीफ़ की थी।

मोथरोवाला , देहरादून की रहने वाली 'मशरुम गर्ल' नाम से मशहूर दिव्या रावत काफी समय पहले ही स्वरोज़गार के महत्व को समझ गयी थी। वापस आए प्रवासियों को उनसे सीख लेनी होगी। दिव्या रावत के अनुसार आप मशरूम की खेती की तकनीकी ट्रेनिंग अपने जिले के कृषि कार्यालयों से ले सकते हैं।
 अगर हम तकनीकी ज्ञान को प्रदेश में रोकने में सफल हुए तो उत्तराखंड एक विकसित राज्य बन सकता है।

उत्तराखंड के बहुत से युवा ऐसे हैं जो बचपन में सड़क मार्ग ना होने की वजह से कई किलोमीटर पैदल चल कर विद्यालय जाते हैं और बड़े होने पर अच्छे जीवनस्तर के लिए दिल्ली, मुम्बई जैसे बड़े शहरों का रुख करते हैं।
अल्मोड़ा के ग्राम भटोली के रहने वाले युवा वीरेंद्र सिंह सजवान ने शहर का रुख करने की जगह रोज़गार के लिए अपने गांव को ही चुना, गांव में ही रह कर वह खेती-बाड़ी करते हैं। कोरोना के बाद वापस आए प्रवासियों के साथ मिलकर वह भटोली से घुरकोट को जोड़ने के लिए तीन किलोमीटर मोटर मार्ग का निर्माण कर रहे हैं। इसमें उनके साथ 34 लोग शामिल हैं जिसमें महिलाएं भी शामिल हैं। वीरेंद्र सिंह सजवान कहते है कि सड़क मार्ग बना ग्रामवासियों के लिए मुख्यमंत्री स्वरोज़गार योजना का लाभ लेना आसान होगा और उनके लिए मत्स्यपालन, मुर्गीपालन, मशरूम की खेती जैसे स्वरोज़गार के रास्ते खुलेंगे। मोटर मार्ग बनने से वह गांव की सब्जी और फल आसानी से बाज़ार तक पहुंचा सकेंगे।

प्रवासियों का वापस आना एक अवसर

आज सभी सरकारी योजनाओं की सूचना सोशल मीडिया व अन्य माध्यमों से जनता तक पहुँचती हैं पर एक वर्ग ऐसा भी है जो इन सब योजनाओं से अंजान है और इन योजनाओं की सबसे ज्यादा आवश्यकता भी उसी वर्ग के लोगों को है।

 उत्तराखंड प्राकृतिक संसाधनों से धनी प्रदेश है अगर यहाँ की जनता ने उपलब्ध संसाधनों का सही प्रयोग करना सीख लिया तो यह देश का सबसे विकसित राज्य बन सकता है। 

कोरोना ने हमें प्रवासियों को वापस लौटाकर एक मौका दिया है और अगर नीचले स्तर से ही प्रदेश की जनता को हर सरकारी योजनाओं के बारे में समझाया जाए और उनसे जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाए तो हम उन सभी महापुरुषों को सच्ची श्रंद्धाजलि दे सकते हैं जिन्होंने एक विकसित और सम्पन्न प्रदेश का सपना देखा था ।

Thursday, July 2, 2020

कोरोना काल में रोज़गार

सार
● कोरोना की वजह से बेरोजगार हो लाखों प्रवासी अपने जन्मस्थान वापस लौटे हैं।
● आज़ाद भारत में जैसे-जैसे परिवहन और संचार साधन उन्नत हुए थे आज़ाद भारत शहरों की ओर रोज़गार की तलाश में भागने लगा।
● भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान कम होने के कारण ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन की समस्या गम्भीर होते गयी।
● कोरोना से त्रस्त भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी में लाने के लिए गांधी जी के स्वदेशी अपनाओ और मोदी जी के लोकल पर वोकल विचारों पर चलना होगा।

विस्तार

चीन के वुहान शहर से शुरू हुयी कोरोना महामारी दिसंबर 2019 के अंत में पूरे विश्व में फैलनी शुरू हो गयी थी। भारत के केरल राज्य में 30 जनवरी 2020 को कोरोना का पहला मामला सामने आया था। कोरोना की गम्भीरता को देखते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने 22 मार्च को जनता कर्फ़्यू की घोषणा की थी।
 उसके बाद भारत में लॉकडाउन की शुरुआत हुई पहला लॉकडाउन 21 दिन का था जो 24 मार्च से शुरु हुआ ।

इसमें देश की अंदर होने वाली हर तरह की धार्मिक, आर्थिक, मनोरंजन गतिविधियों पर विराम लगा दिया गया था। सार्वजनिक परिवहन के सारे साधन बन्द कर दिए गए।

उसके बाद दूसरा लॉकडाउन 19 दिन दिन का था जो 15 अप्रैल से शुरू हुआ। बेरोजगारी और फ़ेक न्यूज़ की वजह से बहुत से प्रवासी पैदल ही अपने घर लौटने लगे।

तीसरा और चौथा लॉकडाउन क्रमशः 4 और 18 मई से शुरू हुए दोनों की अवधि दो-दो हफ्ते की थी। प्रवासियों को उनके घर वापस लाने के लिए विशेष ट्रेनें चलायी गयी।

 कोई भी देश अपनी आर्थिक गतिविधियों को अधिक समय तक नही रोक सकता। धीरे-धीरे कोरोना के साथ जीने की आदत डालते हुए सभी रूकी गतिविधियों को फिर से शुरू करने की शुरुआत हुयी।
1 जून से 30 दिन का पांचवा लॉकडाउन और उसके बाद 1 जुलाई से छटा लॉकडाउन चल रहा है जिसकी अवधि 30 भी दिन की है।
भारत सरकार ने कोरोना संक्रमण को सामुदायिक संक्रमण बनने से रोकने के बहुत प्रयास किए पर जनता ने इसे गम्भीरता से नही लिया।
 19 मई 2020 को संक्रमितों का आंकड़ा एक लाख पार कर गया और 3 जून को देखते ही देखते यह आंकड़ा दो लाख की संख्या पार कर गया और वर्तमान में यह संख्या छह लाख के आसपास है।

लॉकडाउन की शुरुआत के बाद से ही गरीब भारत की बहुत सी दर्दनाक तस्वीरें हमारे सामने आयी जिसमें मज़दूरों की नींद में रेलवे पटरी पर लेटने के बाद ट्रेन से कटकर हुयी मौत और उनकी बिखरी हुई चप्पलों की तस्वीर सबसे मुख्य थी।
घर लौटने के लिये एकत्रित हुए प्रवासियों की पुलिस पर पथराव की खबरें आयी। राज्यों ने इतनी ज्यादा संख्या में घर लौटते प्रवासियों को रोकने के लिए अपनी सीमाएं तक सील कर दी।
मज़दूरों की सड़क हादसों में मौत की तस्वीरें हो या घर वापसी के लिए सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल पैरों में पड़े छालों की तस्वीर। 
साइकिल में अपने पिता को बैठाकर घर वापस लायी बेटी की तस्वीर और रेलवे स्टेशन पर अपनी मृत माँ के पल्लू से खेलते बच्चे की तस्वीर। 
सबने हमें विचलित किया और विकासशील भारत की सबसे दर्दनाक तस्वीर हमारे सामने ला कर हर भारतीय को अंदर तक झकझोर दिया।
सरकार के साथ देश के बहुत से लोग भी कलयुग के भगवान बन कर प्रवासियों की मदद के लिये आगे आये।

बेरोजगारी एक समस्या 

एक महामारी ने देश की बुनियाद को कैसे हिला दिया इसको जानने के लिए हमें देश में वर्षो से चली आ रही बेरोजगारों की समस्या को समझना होगा।

अग्रज़ों के समय भारत में संचार और परिवहन के अच्छे साधन नही थे।
स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद जैसे-जैसे परिवहन और संचार के साधनों में सुधार हुआ भारत में अच्छे जीवन की तलाश में शहरों में जाने वाले ग्रामीण बेरोजगारों की शुरुआत भी हो गयी।
 1960 के आस पास अच्छे जीवन स्तर की तलाश में कई भारतीय इंजीनियर, डॉक्टर अमेरिका, कनाडा और इंग्लैंड चले गए।
1970 के आसपास खाड़ी देशों में अकुशल श्रमिकों की आवश्यकता हुई तो भारत से बहुत से लोग वहां चले गए।
1990 के आसपास बहुत से भारतीय न्यूज़ीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी जैसे देशों में जाकर बस गए।

आज़ादी के बाद बढ़ती आबादी के लिए कृषि योग्य भूमि कम पड़ने लगी तो ग्रामीण गाँव छोड़ने लगे। तीस-तीस किलोमीटर पैदल चल विद्यालय जाने वाले छात्र युवा होकर रोज़गार की तलाश में प्रवासियों की गिनती में शामिल होते चले गए।

स्वरोज़गार से दूरी और मशीनीकरण ने एक ऐसी भीड़ को जमा कर दिया जो गांव और शहर दोनों जगह बेरोजगारों की भीड़ के रूप में अपनी पहचान बनाने लगी।

कोरोना के बाद लाखों की संख्या में प्रवासी वापस अपने जन्मस्थान आ चुके हैं ।
उनके बिना उद्योगों का फिर से चलना मुश्किल होगा। 
बेरोजगारों की इस भीड़ की भारत को सख्त आवश्यकता है। यही बेरोज़गार भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी हैं जो उद्योगों में काम करते हैं और उद्योगपतियों, सरकार के ख़जाने को भरने में दिन-रात मदद करते हैं।

सांख्यकी एवम कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार भारत के सबसे ज्यादा पांच गरीब राज्य बिहार, उत्तर प्रदेश, मणिपुर, झारखंड और असम हैं और इन्ही राज्यों से सबसे ज्यादा बेरोजगार निकल कर दिल्ली , मुम्बई जैसे बड़े शहरों की ओर रोज़गार की तलाश में जाते हैं ।

भारत में बेरोज़गारी का प्रमुख कारण:कृषि में पिछड़कर लड़खड़ाती भारतीय अर्थव्यवस्था

ताज़ा आंकड़ों के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान मात्र पन्द्रह प्रतिशत रह गया है। कृषि जैसे स्वरोज़गार में अवसर कम होने की वजह से ही युवा उद्योगों में रोज़गार के लिए शहरों का रुख करता है।

 वर्ष 1967 में भारत में हरित क्रांति की शुरुआत हुई थी। इससे कृषि क्षेत्र में विकास हुआ था। उन्नतशील बीज, बेहतरीन सिंचाई सुविधा , कृषि में नयी तकनीक, बहुफसली फसल, कृषि के लिए मृदा परीक्षण इसकी विशेषता थी। 
जैविक खेती को बढ़ावा देना चाहिए जिससे भूमि की उर्वरक क्षमता बनी रहे।
पर कृषि में नए प्रयोग होने बन्द हो गए हैं। कृषि आधारित विश्वविद्यालयों की हालत खराब होते चली गयी है। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश की तरह ज़ीरो बजट खेती जैसे प्रयोग और राज्यों में नही किए जा रहे हैं।
कृषि कुछ फसलों तक ही सीमित रही। 

पिछले कुछ वर्षों से पानी की समस्या बढ़ती गयी है।
इसके लिए वर्षा जल संचयन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए और भू जल पर निर्भरता कम होनी चाहिए।
राष्ट्रीय किसान नीति 2007 में जल संरक्षण को लेकर कहा गया है कि एक जल साक्षरता अभियान को शुरू किया जाएगा पर ग्रामीण इलाकों में वर्षा जल संचयन को लेकर जागरूकता ना के बराबर है।

कई राज्य अपने प्राकृतिक संसाधनों का सही प्रयोग करने में नाकामयाब रहे हैं और इन संसाधनों में धनी होने के बाद भी पलायन की समस्या से जूझ रहे हैं। इनमें झारखंड और उत्तराखंड प्रमुख हैं।

यूएन के अनुसार जंगल गरीबी हटाने में मदद कर सकते हैं।
लकड़ी से बने सामान, जंगल में मिलने वाली औषधियां, रस्सियां बनाना, मशरूम उत्पादन, शहद और फलों का व्यापार कुछ ऐसे कार्य हैं जिनको करने के बाद जंगल से भी अपनी आजीविका चलायी जा सकती है।
जंगल का प्रयोग करने के लिए ज्यादा अधिकार दिए जाने की आवश्यकता है। अधिक से अधिक वृक्षारोपण पर ज़ोर दिया जाना चाहिए। ऐसे एनजीओ बनाने चाहिए जो ग्रामीणों को गरीबी से लड़ने के लिए जागरूक करें।


औद्योगीकरण भारत को गर्त में ले जा रहा है। कोरोना महामारी नही आती तो शायद यह कभी पता नही चलता कि इतने प्रवासी सिर्फ सांस लेने लायक स्थिति में ही शहरों में रह रहे हैं। मेट्रो और लोकल ट्रेन में लद कर रोज़ खुद को ढोने वाले प्रवासियों के पास सिर्फ एक महीने भी कोरोना जैसी महामारी से लड़ने की शक्ति नही है।
इसे आज तक की सरकारों की असफलता ही कहा जायेगा कि वह पलायन को रोकने में नाकामयाब रहे।

 औद्योगीकरण पर महात्मा गाँधी जी के विचार और कोरोना काल में रोज़गार

महात्मा गाँधी जी ने अपने बीज ग्रन्थ 'हिन्द स्वराज्य' में औद्योगीकरण की ओर इशारा करते हुए कहा था कि मशीनें यूरोप को उजड़ने में लगी हैं और वहाँ की हवा अब हिंदुस्तान में चल रही है।
बम्बई के मिलों में जो मज़दूर काम करते हैं वह गुलाम बन गए हैं।
जब ये सब चीज़े यन्त्र से नही बनी थी तब हिंदुस्तान क्या करता था।
स्वदेशी पर मोदीजी ने लोकल पर वोकल का विचार दिया है। गाँधी जी ने शताब्दी पूर्व ही इस बात को समझ लिया था।
'यंग इंडिया' में उन्होंने कहा था कि मैं भारत के जरूरतमंद करोड़ो निर्धनों द्वारा काते और बुने गये कपड़ो को खरीदने से इंकार करना और विदेशी कपड़ों को खरीदना पाप समझता हूँ, भले ही वह भारत के हाथ के कते कपड़ो की तुलना में कितने ही बढ़िया किस्म का हो।

आज हम चीन के बने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और अन्य सामानों का विरोध कर रहे हैं पर हम भारतीय उत्पादों की गुणवत्ता पर प्रश्न भी उठाते हैं। हमें इस पर गाँधी जी की कही इन बातों को समझना होगा।
 गुणवत्ता से समझौता कर अपने आज़ाद भारत को चीन और अमेरिका जैसे शक्तिशाली देशों से आगे निकालना होगा।
उत्पादों की गुणवत्ता तो एक बार विकसित राष्ट्र बनते ही खुद बढ़ जायेगी।

ग्रामीण क्षेत्रों के विकास और बेरोजगारी दूर करने के लिए सरकार द्वारा बहुत सी योजनाएं चलाई गई हैं। 

वर्ष 1999 में स्वर्णजयंती ग्राम स्वरोजगार योजना शुरू की गयी इसी योजना को बाद में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन वर्ष 2011 और दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना वर्ष 2014 कहा गया। जिसका उद्देश्य ग्रामीण गरीब परिवारों को देश की मुख्यधारा से जोड़ना और विभिन्न कार्यक्रमों के जरिए उनकी गरीबी दूर करना है।

वर्ष 2000 में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना शुरू की गई थी। गांवों के विकास में सड़क की महत्वत्ता को देखते हुए इसका उद्देश्य ग्रामीण इलाकों में 500 या इससे अधिक आबादी वाले सड़क संपर्क से वंचित गांवों को बारह मासी सड़क से जोड़ना है।

2001 में सम्पूर्ण ग्रामीण स्वरोजगार योजना को शुरू किया गया जिसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य सुरक्षा के साथ-साथ दिहाड़ी रोज़गार के अवसर बढ़ाने के लिये स्थायी सामुदायिक परिसम्पत्तियों का निर्माण करना है।

2005 में महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम जिसे मनरेगा नाम से जाना जाता है को शुरू किया गया।इस योजना में प्रत्येक वित्तीय वर्ष में किसी भी ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्यों को 100 दिन का रोज़गार उपलब्ध कराया जाता है।

कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों के अधिक समग्र एवं समेकित विकास को सुनिश्चित करने के लिए कृषि जलवायुवीय, प्राकृतिक संसाधन और प्रौद्योगिकी को ध्यान में रखते हुए गहन कृषि विकास करने के लिए राज्यों को बढ़ावा देने हेतु एक विशेष अतिरिक्त केंद्रीय सहायता योजना की शुरूआत भारत सरकार ने वर्ष 2007-08 राष्ट्रीय कृषि विकास योजना की शुरूआत की थी जो तब से प्रचलन में है।

लोकल पर वोकल 

अब जब प्रवासी अपने अपने राज्यों में वापस आ चुके हैं तो वहाँ की सरकारों को यह प्रयास करना चाहिए कि उनकी कुशल और अकुशल श्रमिक शक्ति अब उनके राज्यों में ही रहे और खुद प्रवासियों को भी ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार के अवसर ढूंढने होंगे।
खादी ग्रामोद्योग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए पर इसके लिये सिर्फ ट्विटर पर हैशटैग #localforVocal अभियान चलाने से कुछ नही होगा देश की जनता को भी खादी वस्त्रों को अपनाना होगा। 
ग्रामीण कुटीर उद्योगों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। यह वह उद्योग हैं जिन्हें घर के सदस्यों द्वारा सीमित संसाधनों में खुद शुरू किया जा सकता है।
अगरबत्ती, नमकीन, मोमबत्ती, मसाले, पापड़ , चूड़ी , साबुन , सॉस और झाड़ु बनाने के कार्य इसमें शामिल है।
फर्नीचर बनाकर और टेलरिंग करके भी अच्छे पैसे कमाए जा सकते हैं।
बेकरी का काम शुरू कर अन्य लोगों को भी रोज़गार दिया जा सकता है। 
ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ पीने के जल की कमी है वाटर आरोह का प्लांट लगा कर भी अच्छा धन कमाया जा सकता है।
शहरों में जगह की कमी होने के कारण उत्पादों के भंडारण के स्थान की कमी है और ग्रामीण क्षेत्रों में गोदाम बनाकर अच्छा धन अर्जित किया जा सकता है ।

होटल क्षेत्र में बाहर काम कर रहे प्रवासी खुद के ढाबे खोल अपने मालिक खुद बन सकते हैं।
मुर्गी और मत्स्य पालन स्वरोज़गार के सबसे उत्तम साधनों में से एक है। 
दुग्ध उत्पादन के लिए पशु पालन कर स्वावलंबी बना जा सकता है।

भारत सरकार को नवीकरणीय ऊर्जा के विकास पर कार्य करना होगा। नवीकरणीय ऊर्जा वह है जिसे प्रकृति में नियमित रूप से बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है और यह प्रकृति में बहुतायत मात्रा में उपलब्ध है।

इरोना ( अंतराष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी )  अंतराष्ट्रीय स्तर पर नवीकरणीय ऊर्जा के विकास पर कार्य करती है और भारत में यह कार्य नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय का है।

अमेरिका और चीन ने नवीकरणीय ऊर्जा के संसाधनों पर तेज़ी से कार्य किए हैं और इनका प्रयोग कर रोज़गार के बहुत से नए अवसर पैदा किए हैं।

पवन ऊर्जा से चलने वाली हवा टरबाइन अपने खेतों में लगवाकर किसान उससे अच्छा किराया कमा सकते हैं और इससे फसलों में भी कोई व्यवधान नही आता है।
हवा टरबाइन के टेक्नीशियनों की भी बहुत आवश्यकता है। इस क्षेत्र में युवाओं के लिये रोज़गार के बहुत से अवसर हैं।

जलशक्ति ऊर्जा जो नदी और बहते पानी से उपलब्ध होती है यह भी ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार का अच्छा साधन साबित हो सकती है। इईएसआई जो पर्यावरण पर अध्ययन करने वाली एक अमेरिकी संस्था है के अनुसार चीन में जलशक्ति ऊर्जा का सही उपयोग कर रोज़गार पाने वालों की संख्या तीन लाख आठ हज़ार है वही भारत में इसकी संख्या तीन लाख सैंतालीस हज़ार है।

भूतापीय ऊर्जा जिसे पृथ्वी के अंदर संग्रहित ताप से प्राप्त किया जाता है उसमें चीन में वर्तमान समय में 2500 लोगों ने रोज़गार प्राप्त किया है और भारत में यह संख्या ना के बराबर है।

बायोगैस जिसे जीवाश्म ईंधन से बनाया जा सकता है और जो बहुत ही सस्ते दामों में उपलब्ध है। इईएसआई के अनुसार चीन में उससे 1,45,000 रोज़गार उपलब्ध हैं और भारत में उससे सिर्फ 85,000 रोज़गार उपलब्ध हैं।

सौर ऊर्जा का उपयोग चीन ने बहुतायत मात्रा में किया है और भारत का चीन से पिछड़ने का मुख्य कारण यह भी है कि चीन ने नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग सुनियोजित तरीके से किया है। सौर ऊर्जा दो प्रकार से उपयोग की जाती है।
-सोलर हीटिंग और कूलिंग
-सोलर पैनल
सोलर हीटिंग और कूलिंग में तापीय ऊर्जा का प्रयोग किया जाता है। मुख्यतः पानी गर्म करने में इसका प्रयोग किया जाता है। चीन ने छह लाख सत्तर हजार लोगों को इससे रोज़गर उपलब्ध कराया तो भारत सिर्फ बीस हज़ार सात सौ लोगों को रोजगार दिलाने में सफल हुआ है।
सोलर पैनल में प्रकाश ऊर्जा का प्रयोग किया जाता है। विद्युत बल्ब, पंखे आदि चलाने में इसका प्रयोग किया जाता है। भारत ने इसके विकास के लिये राष्ट्रीय सौर मिशन चलाया है पर फिर भी इसके प्रयोग में भारत अपने प्रतिद्वंद्वी चीन से कहीं पीछे है। इईएसआई के अनुसार चीन ने 21,94,000 लोगों के लिए सोलर पैनल के ज़रिए रोजगार के अवसर पैदा किये तो भारत इसमें सिर्फ 1,15,000 अवसर पैदा कर चीन से कहीं पीछे था।

कोरोना से लाखों लोग बेरोज़गार हुए हैं।
प्रकृति का नियम है कि जो एक बार ऊपर उठता है वह नीचे भी आता है। कोरोना का यह बहाव भी अवश्य खत्म होगा पर देखना यह होगा कि हम भारतीय उस बहाव से खुद को संभाल कर रोज़गार के नए अवसर बनायेंगे या उस बहाव में बह कर अपने आने वाले भविष्य को भी बर्बाद कर देंगे।

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