Monday, December 27, 2021

मेरा कबूलनामा.

किताबों के बारे में एक बात है जो गले में अटकी है, आसपास ऐसे लोग भी नही हैं जिनसे यह कह सकूं। तो जन से विचारों का संवाद करने मैंने इस पेज़ में यह बात साझा करने का निर्णय लिया।
मेरे मेंटर राजीव लोचन साह के कहने पर किताबों को पढ़ने का शौक पाला।

 पढ़ते-पढ़ते किताबों की समीक्षा भी हो जाए और लोग वाट्सएप यूनिवर्सिटी से बाहर निकल किताबों पर मन लगाएं, यह सोच समीक्षाएं लिखनी शुरू करी।

अब सवाल ये था कि किताबें पढ़ी कहां से जाए! हम भारतीय 'मूली' खरीदने पर भी दो रुपए कम करवाते हैं तो किताब पर पैसा खर्च... नही....  ये सोच गूगल में किताबों का नाम सर्च डाउनलोड कर, बड़े ध्यान से अशोक कुमार पांडेय की 'उसने गांधी को क्यों  मारा', रवीश कुमार की 'इश्क में शहर होना', 'बोलना ही है' पढ़ डाली और उन पर लिखी समीक्षाएं भी अच्छी जगह पब्लिश हुई।

इस बीच एक बड़े समाचार पत्र ने अशोक sir की 'उसने गांधी को क्यों मारा' पर लिखी समीक्षा छापने के लिए किताब की तीन प्रतियां मांगी और यह भी बोला समीक्षा में आपका नाम नही आएगा। 
पहले तो लिखे का दाम नही और अब नाम भी नही, पर फिर भी किताब की प्रतियां को ज्यादा बिकेंगी यह सोच मैंने अशोक कुमार पांडेय को यह बात बताई।

उनकी तरफ़ से जो जवाब मिला उसी वज़ह से मैं आज ये पोस्ट लिख रहा हूं। उनका कहना था जो लेखक की इज़्ज़त न करे उनके लिए मत लिखो।

मेरे मन में बहुत से विचार उमड़ने के साथ, शर्मिंदगी भी घर कर गई।
 किताब फ्री में डाउनलोड कर उसे पढ़ने के बाद समीक्षा लिख मैं खुद को बड़ा समीक्षक समझ रहा था पर मैं तो सबसे गया गुज़रा इंसान था ,जिसने लेखक के साथ छल कर उसकी मेहनत के मज़े फ्री में लुटे।
गुरु से ज्ञान प्राप्त किया और कोई फीस नही!! क्या मेरे लिए उस ज्ञान पर गर्व करने की वजह रह गई!!

लेखक नीलोत्पल मृणाल की पोस्ट आजकल चर्चा में है, वह किताबो की इंटरनेट में उपलब्ध फ्री पीडीएफ फाइलों के साथ बाज़ार में उपलब्ध नकली किताबों को लेकर आवाज़ उठा रहे हैं।

मैं खुद एक किताब लिख रहा हूं, दिन भर उसी में मन दौड़ता है। और भी काम हैं पर मन किताब का ताना-बाना बुनने से हटता नही।
आप पढ़ते हैं और फिर किताबें अलग रख देते हैं, पर कभी सोचा उसे लिखने वाले ने किताब पूरी करने के लिए क्या-क्या खोया है!

एक-दो-तीन साल की मेहनत और पैसा कुछ भी नही, पर फिर भी लिखना है। आप जो हैं वो आप में जिंदा रहे इसलिए लिखना है, पेट की चिंता किसे है।
जे के रोलिंग ने 'हैरी पॉर्टर' लिखी होगी तब उन्हें पता नही होगा कि वह इतनी पढ़ी जाएगी पर हर लेखक इतना खुशकिस्मत नही होता, वो लिखता है। पूर्णकालिक रूप से लेखक बनना , घर का चूल्हा ठंडा रखने जैसा हो चला है पर फिर भी लिखना है। 
लिखने वाले लिखते रहेंगे वो कभी आपके सामने गिड़गिड़ाएंगे नही, आप बस उन्हें उनकी मेहनत का पैसा दे दीजिए।

ये बात मैंने अशोक कुमार पांडेय को कभी नही बताई, रवीश कुमार से मेरा सीधा सम्पर्क नही ,पर मैं उनसे भी माफ़ी मांगता हूं। अब मैं किताबें खरीदने लगा हूं, मैं इन किताबों को भी फिर से खरीदूंगा, विनोद कापड़ी की किताब '1232km' खरीद कर पढ़ी उसकी समीक्षा लिखी। समीक्षा को उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर भी साझा किया, तब मुझे असल सन्तुष्टि का पता चला।

जीवन में खुद को कभी धोखे में मत रखिए, खुद से नज़र  मिलाना ही जीत है।

एक शर्मिंदा समीक्षक @himanshu joshi 

Saturday, December 25, 2021

83 की कहानी फिर से जीने का मौका देती ये '83'

सिनेमा के सबसे मुख्य कार्य हैं दर्शकों का मनोरंजन करना और कोई सामाजिक संदेश देना।
यदि आप सिनेमा को सिर्फ इतिहास समझने या कोई महत्त्वपूर्ण सीख लेने के लिए देख रहे हैं तो आप गलत जगह हैं, आपका रास्ता पुस्तकालय की ओर जाता है।
1983 में जीता क्रिकेट वर्ल्ड कप, तब पूरे भारतवर्ष के लिए भारतीय इतिहास के कुछ गौरवशाली पलों में से एक था और कबीर खान के निर्देशन में आप उन पलों को फिर से जी सकते हैं। 'क्रिकेट' एक टीम गेम है और इस फ़िल्म की सफलता भी सिर्फ रणवीर और दीपिका की न होकर इस फ़िल्म से जुड़ी पूरी टीम की मेहनत का नतीज़ा है।

फ़िल्म का पहला दृश्य ही आपको उस ऐतिहासिक दिन की झलक दिखाता है।
शुरुआत में आपका ध्यान फ़िल्म के कलाकारों को पहचानने की ओर ज्यादा रहेगा, फ़िल्म की कास्ट बेहतरीन है और कलाकारों की इस पूरी टीम ने पहले से मशहूर लोकप्रिय खेल हस्तियों का चेहरा बन बड़े पर्दे पर उनकी परछाई के रूप में खुद को भी अमर कर दिया है। 

मोहिंदर अमरनाथ, नीना गुप्ता का फ़िल्म से जुड़ना ऐतिहासिक है, तो रणवीर सिंह से लेकर एमी विर्क को 83 से जुड़े हर शख्सियत का परफेक्ट चेहरा बना कबीर खान ने झंडे गाड़ दिए हैं। 
मेकअप टीम के बिना यह सब असम्भव था, बड़े पर्दे पर रणवीर को कपिल देव जैसा लुक देना हो या दीपिका को हूबहू रोमी देव बना देना इस टीम का काम काबिलेतारीफ रहा।

अभिनय पर बात कर ली जाए तो कपिल देव का व्यवहार रणवीर वैसा ही निभाते हैं जैसे कपिल हैं, अभ्यास मैच हारने के बाद प्रेस कांफ्रेंस वाला सीन इसकी बानगी भर है।
दीपिका के पास जितना अभिनय करने के लिए था उन्होंने अच्छा किया। मान सिंह बने पंकज त्रिपाठी, गावस्कर बने ताहिर भसीन, श्रीकांत बने जीवा, संधू बने एमी विर्क सहित हर अन्य सितारों ने अपना बेहतरीन दिया है। यशपाल शर्मा बने जतिन सरना भी विशेष रूप से प्रभावित करते हैं।

फ़िल्म की कहानी वह सब दिखाती आगे बढ़ती है जैसा उस काल में क्रिकेट हुआ करता था, फिर चाहे वेस्टइंडीज क्रिकेट टीम के रुतबे को दिखाना हो या भारतीय टीम के लिए सुविधाओं का अभाव। फ़िल्म में सुनील गावस्कर और कपिल के रिश्तों पर भी प्रकाश डाला गया है। सचिन के सचिन बनने की शुरुआत भी यहां दिखती है।
इंटरवल के बाद फ़िल्म हर क्षेत्र में बेहतरीन बन जाती है, फिर चाहे वह पटकथा के मामले में हो या संगीत के।

फ़िल्म की पटकथा खूबसूरती से यह अहसास कराती है कि अतीत के पन्नों को पर्दे पर उतार दिया गया है।

फ़िल्म में त्रुटियां खोजने पर भी नही मिलती, वानखेड़े की टैक्सी वाले किस्से का अधूरा न छूटना इसका सबूत है। रेडियो पर कमेंट्री सुनना, टीवी एंटीना का हिलाना, डेविड फ्रिथ का किस्सा और बॉर्डर पर गोलीबारी, सब कुछ ध्यान रख चुन-चुन कर फ़िल्म में लाया गया है।

टीम बस में बैकग्राउण्ड पर बजता गाना 'हम बने तुम बने एक दूजे के लिए' दर्शकों को 1983 में ही ले कर चले जाता है । फ़िल्म के अंतिम पलों में बैकग्राउंड संगीत ने तो कमाल ही कर दिया है। 
'लहरा दो' गीत 'चक दे' वाला कमाल दोहरा सकता है।

फ़िल्म के कुछ दृश्य बेहतरीन हैं जैसे मार्शल-वेंगसरकर का आमना-सामना।
 कपिल के शॉट पर ड्रेसिंग रूम का शीशा टूटने वाला दृश्य सिनेमाघर पर दर्शकों की सीटी बजवा देगा तो श्रीकांत का पार्टी में बोलना सबको भावुक कर देगा।
कपिल का वो यादगार कैच यहां उतना जबरदस्त नही लगता। 
फ़िल्म का छायांकन प्रभावित करता है, क्रिकेट मैचों को पर्दे पर उतारना बड़ा मुश्किल काम होता है पर वेस्टइंडीज के गेंदबाजों की सरसराती गेंदों को दिखाना हो या भारतीय बल्लेबाजों के चौकों-छक्कों की बरसात सब कुछ अच्छी तरह से दिखाया गया है।

फ़िल्म के संवाद में अतीत के वो संवाद भी शामिल है जो मिसाल बन गए थे, अब कुछ बेहतरीन संवाद जोड़ उस याद को दिल के और करीब पहुंचा दिया गया है। जैसे कपिल का 'इंडिया में फास्ट बॉलर नही होते' और कपिल का संधू को प्रोत्साहित करने वाला पूरा संवाद।

फ़िल्म खत्म होते-होते भी कपिल की जुबानी कुछ किस्से सुना दर्शकों को उनकी सीट से बांध दिया गया है और यह साबित करता है कि '83' भारतीय फिल्म इतिहास की कुछ याद रखे जाने वाली फिल्मों के क्लब में शामिल हो चुकी है।

फ़िल्म एक महत्वपूर्ण कारण से परफेक्ट रेटिंग नही ले पाई ,वह है इसका विषय।
फ़िल्म सिर्फ़ उन दर्शकों के लिए है जिन्हें क्रिकेट से लगाव है या कभी रहा होगा।

अभिनय- रणवीर सिंह, दीपिका पादुकोण, पंकज त्रिपाठी, साकिब सलीम, जतिन सरना, निशांत दहिया, एमी विर्की
निर्देशक- कबीर खान
लेखन- सुमित अरोड़ा, वासन बाला, संजय पूरन सिंह चौहान
संवाद- कबीर खान, सुमित अरोड़ा
संगीत- प्रीतम चक्रवर्ती, जूलियस पैकियम
छायांकन- असीम मिश्रा
समीक्षक- हिमांशु जोशी @Himanshu28may
रेटिंग- 3.5/5 

Friday, December 24, 2021

आमदनी अठन्नी खर्चा रुपया... अभी तो बहुत से एप बनने बाक़ी हैं..

अंदर जब कुछ उथल पुथल मचती है, तभी लेखक की कलम चलती है।
दिन भर हमारे चारों तरफ़ जो कुछ घटित होता रहता है उसमें राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक रूप से जो कुछ भी लोगों के लिए उपयोगी हो उसी ख़बर को लिख लेने पर हम उसे न्यूज़ कह लेते हैं और कुछ ऐसी ही दुर्घटना राह चलते मेरे साथ हो चली।
हां दुर्घटना ही क्योंकि यह बुरा ही है, मेरे साथ, आपके साथ और हम सबके साथ।


ज़रा इस तस्वीर और बैग पर गौर से नज़र गढ़ा कर देखिए, झोले की गुणवत्ता आपको बदलते भारत की तस्वीर तो दिखाता है पर उसमें छपा विज्ञापन बहुत सारे सवाल छोड़ जाता है।
इन्हीं सवालों की टोह लेने मैंने उस ऑटो स्वामी से बात करी ,जिस पर यह झोला विराजमान दिखा।

मैं- भाईसाहब यह झोला कहां से आया!
ऑटो स्वामी- मोदी जी ने दिया।
मैं- सीधे मोदी जी!!
ऑटो स्वामी- हां , इसमें अनाज मिला।
मैं- तब तो यह अच्छा है, पर इतना महंगा झोला और इस पर छपा विज्ञापन। इसका खर्चा!!
ऑटो स्वामी- मेरी, आपकी और हमारी जेब से।
मैं- ये क्या बात हुई, ख़ैर तेल इत्ता महंगा हो रहा है। उस पर क्या कहोगे।
ऑटो स्वामी- ओ तो तेल कंपनियों की जिम्मेदारी है। वही बढ़ाते हैं।
मैं- अब मोदी जी नही कहा आपने, कोई नही, राम राम। खूब तरक्की कीजिए।

कोरोना काल में सरकार की भूमिका निर्विवाद रूप से तारीफ़ के काबिल रही ,जो उसने उसकी वज़ह से ही भूखे-प्यासे घर पहुंचे लोगों को पेट पालने लायक राशन पहुंचाया।
गरीब को यही तो चाहिए था, पहले 'फ्री' फिर जेब पर भारी पड़ती डेढ़ जीबी इंटरनेट वाली लत पूरी करने के बाद उसे खाने को कुछ मिल जाए ,यही उनके जीवन का फ़लसफ़ा बन गया है।

बसों, ट्रेनों,मेट्रो, अखबारों और अब राशन के बैगों तक पहुंचे इन विज्ञापनों पर किसने कितना खर्च किया इसकी चिंता तीसरे भारत के इन लोगों को तो बिल्कुल भी नही है। रही बात दूसरे भारत की तो वो रोज़ तीसरे भारत में शामिल न हो जाए इससे जूझता रहता है, ऐसे में उसे इस ख़र्चे पर विचार करने के लिए वक्त कहां। पहला भारत या इंडिया तो इसका स्पॉन्सर ही है तो उन्हें तो छोड़ ही दें।


लोकसभा में एक संसद सदस्य के लिखित सवाल के जवाब में ब्यूरो ऑफ कम्यूनिकेशन (बीओसी) ने यह जानकारी दी कि तीन वित्तीय वर्षों में न्यूजपेपर विज्ञापनों पर केंद्रीय मंत्रालयों ने कितना खर्च किया. ये इस प्रकार है:

वित्तीय वर्ष 2017-18 - 462.22 करोड़ रुपए

वित्तीय वर्ष 2018-19 - 301.03 करोड़ रुपए

वित्तीय वर्ष 2019-20 - 128.96 करोड़ रुपए

लेकिन पूछिए कि सरकारी योजनाओं और नीतियों के प्रचार के लिए इस्तेमाल होने वाला पैसा किसका है? यह आपका पैसा है, टैक्सपेयर का पैसा। ‘सरकार का पैसा’ जैसी तो कोई चीज़ होती ही नहीं, यह तो ‘टैक्सपेयर का पैसा’ होता है.

https://twitter.com/ProfVilas/status/1431133869349036035?t=p8MQCoRrXcpLdp3k5_WF3w&s=19


बांदा। 5 अगस्त को अन्न महोत्सव मनाया जाएगा। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत सरकारी कोटे की दुकानों में जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति में राशन बंटेगा।



मणिपुर (Manipur) में अखबारों और स्थानीय टेलीविजन चैनलों (Newspapers And Local Television Channels) ने 15 करोड़ रुपये के बकाया विज्ञापन बिलों का भुगतान (Advertisement Bill Payment) न किए जाने को मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह (Chief Minister N. Biren Singh) की प्रतिबद्धता की विफलता करार देते हुए इसके विरोध में गुरुवार को बंद रखा।

पेट खाली तो बना बुली बाई एप, आख़िर ये बुनियाद कैसे डली

तब्लीग़ी जमात कार्यक्रम के मीडिया कवरेज पर एक याचिका की सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एसए बोबड़े की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने कहा कि हाल के दिनों में भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबसे अधिक दुरुपयोग किया गया है.

कोर्ट ने यह टिप्पणी एक याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें कहा गया था कि मीडिया का एक वर्ग तब्लीग़ी जमात के मामले को लेकर सांप्रदायिक द्वेष फैला रहा था.

दिसंबर 2020 में दिल्ली की एक अदालत ने 36 विदेशी तब्लीग़ी जमात के सदस्यों को बरी करते हुए कहा कि उपस्थिति रजिस्टर भी यह साबित नहीं करता कि अभियुक्त बताई गई तारीखों पर मरकज़ में पहुँचे या मार्च 2020 के अंत तक मरकज़ में रहे.

अदालत ने स्पष्ट कहा कि "अभियोजन पक्ष 12 मार्च से 1 अप्रैल तक मरकज़ के अंदर किसी भी अभियुक्त की उपस्थिति को साबित करने में विफल रहा. ऐसा नहीं लगता कि कहीं कोई भी उल्लंघन हुआ."


जावेद भाई आप अपनी दुकान उठा लो और यहां दुकान मत लगाओ. बड़ी दिक्क़त हो रही है आप लोगों से. इन्हीं लोगों से बीमारी फैल रही है. उठाओ...उठाओ दुकान उठाओ अपनी.'- उत्तराखंड के हल्द्वानी की घटना

मुंबई साइबर पुलिस ने 'बुली बाई' मामले की मुख्य आरोपी एक महिला को उत्तराखंड से हिरासत में लिया है, जबकि बेंगलुरु के 21 वर्षीय इंजीनियरिंग छात्र को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है। पुलिस सूत्रों के मुताबिक हिरासत में ली गई महिला इस मामले में मुख्य आरोपी है। पुलिस की टीम महिला से पूछताछ कर रही है। एक अधिकारी ने बताया कि महिला को ट्रांजिट रिमांड के लिए एक अदालत में पेश किया जाएगा और इसके बाद मुंबई लाया जाएगा।



Saturday, December 18, 2021

खूब नाम कमाएगी 'गहन है यह अंधकारा'

समुद्र की लहरों की तरह ही किताब भी भावनाओं के उतार चढ़ाव से भरी पड़ी है, किताब पढ़ते ऐसा लगता है मानो लेखक पाठकों को 'अश्विन' की कैरम बॉल फेंक रहे हैं। इस लघु उपन्यास को एक बार पढ़, आप अमित श्रीवास्तव को फिर से जरूर पढ़ना चाहेंगे।


हिंदी के प्रोफेसर प्रसिद्ध कवि शिरीष कुमार मौर्य ने पुस्तक की शुरुआत में लेखक एवं पुस्तक का परिचय दिया है।

 लेखक ने पुस्तक की शुरुआत में ही उसे पुलिस विभाग की बुनियाद को समर्पित कर दिया है, जो उनके एक पुलिस अधिकारी होते हुए भी ज़मीन से जुड़े रहने का परिचायक है।

'अज्ञेय' की फांसी रचना पाठकों को एक पशोपेश में डाल किताब की शुरुआत में पहुंचा देती है।
एक गरीब परिवार, हत्या, पुलिस और उसकी तफ्तीश के इर्द-गिर्द बुनी गई यह कहानी आपको पुरानी हिंदी फिल्मों की याद दिलाती है।

अब यहां लेखक की लेखन कला का कायल होना बनता है जब एक मर्डर से शुरू होने के बावजूद 'एक्सट्रा करिक्यूलर' और 'सिज़्मोग्राफ' जैसे शब्दों का प्रयोग कर किताब को शुरुआत से ही 'सेंटर फ़्रेश' की तरह फ़्रेश रखा गया है।

आगे पढ़ते हुए एक कवि 'सीओ' के साथ किताब का जो खाका लेखक द्वारा बुना गया है, उसका एक शब्द छोड़ने पर भी ऐसा महसूस होता है कि आप कुछ ज़रूरी पीछे छोड़ कर जा रहे हैं।

कहानी में 'सिस्टम' पर भी तीखे तीर चलाए जा रहे हैं, पर उन तीरों से बने जख्मों को लेखक बखूबी ढकते चले गए हैं।
 वकीलों पर की गई बात हो या मिश्रा जी से जुड़ा किस्सा, लेखक ने अपनी किताब से यह कोशिश की है कि वह एक स्पीकर की तरह पाठकों को सब कुछ सुना, समझा जाएं।

किताब सोलह हिस्सों में बंटी हुई है और हर हिस्सा पढ़ आपको अपनी आंखों के सामने यह महसूस होने लगेगा कि आपके सामने किसी नाटक का मंचन चल रहा है, एक दृश्य खत्म पर्दा गिरा फिर पर्दा हटा और नया दृश्य शुरू।

लेखक का 'एफएएस' की फुल फॉर्म का बताना कुछ नया सा है, फोन और टीवी के आगमन की जो तस्वीर याद दिलाई गई है वो मन में बस जाती है। किताब पढ़ते ऐसा लगने लगता है जैसे आप लगातार किन्हीं ताबड़तोड़ खतरनाक व्यंग्यात्मक लेखों को पढ़ रहे हैं।

किताब में पुलिस की कार्यप्रणाली और बदहाल व्यवस्थाओं पर भी प्रकाश डाला गया है तो पत्रकारिता की समस्या को भी हल्के से छू लिया गया है।

'रीढ़ का दर्द उसी को होता है जिसने अपनी रीढ़ बचा रखी है' , 'उनके पसीने में कुछ नमक अभी बाक़ी था', 'महकमा अब सैल्यूट ठोकने से सरकाने तक खिसक आया है' जैसी पंक्तियों को पढ़ यह लगने लगता है कि आप किसी बेहतरीन साहित्यिक रचना को पढ़ रहे हैं।

ईमानदारों और भ्रष्टों की कैटेगरी बांट लेखक पाठकों को हंसाना चाहते हैं या उन्हें गम्भीर मुद्रा में लाना चाहते हैं यह समझ नही आता पर किताब आपको खुद से बांधे रख आगे बढ़ती है।

यह कहानी ज्यादा लंबी नही है और शायद कुछ पन्नों में ही सिमट जाती पर इस सच्ची घटना की काल्पनिक दास्तान से जुड़े घटनाक्रमों को लिखते हुए लेखक ने जिस तरह की भाषा शैली का प्रयोग किया है, यह शैली पाठकों को हिंदी के बेहतरीन लेखकों को पढ़ने की फीलिंग भी देने में कामयाब होती है।
उदाहरण के लिए 'सीओ साहब ने दाहिना हाथ जेब में डाला और बाएं हाथ को हवा में उठा-उठा कर उनको वही दिया जो वो जनता को दिया करते हैं। आश्वासन।' इन पंक्तियों को पढ़ते पाठक अपने मन में एक चित्र बना लेंगे।
वहीं जिस तरह से 'ब', 'भ', 'न', 'ण' के बारे में विस्तार से बात करी गई है ,उन्हें पढ़ पाठक इनका उच्चारण 'डू इट योरसेल्फ' थ्योरी पर करने लगेंगे।

किताब पूरी तरह से पाठकों को खुद से बांधे रखने के लिए लिखी गई है और पाठक इसे पढ़ते ऊबे न , इसके लिए लेखक ने किताब में ऐसे पेंच कसे कि पाठक क़िताब छोड़ नही पाएंगे।

शीर्षक और आवरण चित्र पर भी बात कर ली जाए

किताब का शीर्षक उसकी कहानी के अनुसार बिल्कुल फिट बैठता है क्योंकि किताब में जो मुद्दा उठाया गया है उस अंधकार की हाल फिलहाल प्रकाश में तब्दील होने की कोई उम्मीद नज़र नही आती।
विजय सिंह का आवरण चित्र भी किताब को लेकर जिज्ञासा बढ़ाने में कामयाब रहा है।

    लेखक 'अमित श्रीवास्तव' एक गीत गुनगुनाते 

हिंदी के लेखकों और ओरिजनल कंटेंट की भारी कमी के इस दौर में इस किताब को ऑर्डर कर पढ़ लेना तो बनता ही है।

किताब- गहन है यह अन्धकारा
 लिंक- https://www.amazon.in/dp/8183619312/ref=cm_sw_r_apan_glt_fabc_BRD9YPVH06C6V1VSABS6
लेखक- अमित श्रीवास्तव @TaravAmit
मूल्य- 450 रुपए
प्रकाशक- राधाकृष्ण प्रकाशन
समीक्षक - हिमांशु जोशी @Himanshu28may

Sunday, December 12, 2021

सिनेमा के अर्थ को पूरा करती है 'चंडीगढ़ करे आशिक़ी'.

अधिकतर बॉलीवुड फिल्मों की तरह 'चंडीगढ़ करे आशिक़ी' में भी एक लव स्टोरी शुरू हो अपने अंजाम तक पहुंची है, पर इस बीच का सफ़र बॉलीवुड की फिल्मों में न कभी देखा गया है न सुना।

जितेंद्र के भतीजे अभिषेक कूपर ने बॉलीवुड में अपनी अलग पहचान पहचान बनाई है। अपने निर्देशन में 'रॉक ऑन', 'काइ पो छे' , 'केदारनाथ' जैसी सफ़ल फिल्में बनाने के बाद अभिषेक इस बार हमारे सामने 'चंडीगढ़ करे आशिक़ी' लाए हैं।

फ़िल्म का पहला हाफ आपको आशिक़ी वाले मूड में ढाले रहेगा, बॉडी बिल्डिंग का संसार और आधुनिक समय में रिश्तों की तेज़ी यहां देखी जा सकती है। सम्बन्धों में मोबाइल के गहराते प्रभाव को भी जगह-जगह बखूबी दिखाने की कोशिश करी गई है।

इंटरवल से थोड़ा पहले फ़िल्म के विषय के बारे में पता चलेगा और यह वह विषय है जो भारतीय सिनेमा के इतिहास में पहली बार दर्शकों के सामने लाने का प्रयास किया गया है। 

अपने गृहनगर के बैकग्राउंड में बनाई गई इस फ़िल्म में आयुष्मान खुराना ने मेज़बान की भूमिका बड़े सही ढंग से निभाई है और दर्शकों को अपनी परफेक्ट मसल्स के दर्शन कराए हैं। आयुष्मान आज के युवाओं का चेहरा बने नज़र आते हैं, जिस पर सफलता और शादी हर तरह का बोझ है और उन्होंने इसे बखूबी निभाया भी है। फ़िल्म की महफ़िल लूट ले गई हैं आधुनिक लड़की बनी वाणी कपूर , उन्होंने जिस तरह के किरदार को निभाया है उसके लिए उन्हें अपने बॉलीवुड कैरियर को दांव पर रखना था पर वह इसमें सिकंदर निकली।

फ़िल्म में बहुत से पात्र हैं जिनमें वरिष्ठ अभिनेता कंवलजीत सिंह , योगराज सिंह, 'चक दे इंडिया!' फेम तान्या अब्रोल, अभिषेक बजाज जैसे सितारे मौजूद हैं और सभी ने अपनी छाप छोड़ी है।

दृश्यों को याद किया जाए तो पुलिस से प्रेमी युगल का सामना, फ़िल्म के विषय पर आयुष्मान का गूगल सर्च करना और मां-बेटी का हॉस्पिटल संवाद, याद रहते हैं।

फ़िल्म का संगीत ताज़गी भरा और 'तुम्बा ते जुम्बा', 'कल्ले-कल्ले' , 'माफ़ी' जैसे गाने लोगों की ज़ुबान पर लंबे समय तक चढ़े रहेंगे।
संवादों पर बात की जाए तो यह भी फ़िल्म की जान हैं और 'सोच मैंने क्या काटा' है तो माथा सन्न करने वाला है।
फ़िल्म की पटकथा और छायांकन शानदार हैं। फ़िल्म देख या तो आपको चंडीगढ़ की याद आ जाएगी या आप वहां घूमने के लिए टिकट बुक करा लेंगे।

फ़िल्म से जुड़े सभी लोगों ने इसे पूरा करने में जो हिम्मत दिखाई है,वही हिम्मत 'केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड' ने भी इसे यू-ए की जगह यू प्रमाण पत्र देकर दिखानी चाहिए थी।
दर्शकों की बात भी कर ली जाए कि वह यह फ़िल्म क्यों देखें , तो आख़िर में थोड़ा सा चूकने के बाद भी सिनेमा की समाज को लेकर जो जिम्म्मेदारी है वह यह फ़िल्म पूरा करती दिखती है।
इसलिए इश्क़ पर थोड़ा कम प्रतिबंध लगे और समाज के अंदर भविष्य में कुछ अच्छा हो इसके लिए परिवार सहित यह फ़िल्म देख लेने की हिम्मत जुटाइए।

निर्देशक- अभिषेक कपूर
पटकथा- सुप्रतीक सेन, तुषार परांजपे
अभिनीत- आयुष्मान खुराना, वाणी कपूर
छायांकन- मनोज लोबो
संगीत- सचिन-जिगरो
निर्माता- भूषण कुमार, प्रज्ञा कपूर, कृष्ण कुमार, अभिषेक नय्यर 
रेटिंग- 4/5
समीक्षक- हिमांशु जोशी @Himanshu28may

Friday, December 10, 2021

कोरोना काल के दौरान मेहनतकशों की वास्तविक स्थिति पर महत्वपूर्ण दस्तावेज है '1232 किमी'

किताब आधुनिक भारत का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज बन गई है, जो समाज को उसकी सच्चाई दिखा समाज के बनावटी मुंह पर तमाचा भी है.

किताब- 1232 KM
लेखक- विनोद कापड़ी
प्रकाशक- सार्थक
मूल्य- 199 रुपए

गुलज़ार साहब की कुछ चंद लाइनों से शुरू हुई ये किताब आपको इन लाइनों से ही किताब का सार समझा देती है.
इसके बाद 'द हिन्दू' के पूर्व प्रधान संपादक एन. राम ने प्रधानमंत्री द्वारा पहले लॉकडाउन की घोषणा करने से 1232 किमी कथा बनने तक के सफऱ को कुछ इस तरह समझाया है कि आपकी बंद हो चुकी आंखों में लॉकडाउन की कहानी फिर घूमने लगेगी. यह प्रस्तावना आपको फिल्मों के ऐसे ट्रेलर की तरह लगेगी जो मिनटों में ही लाखों बार देख लिया जाता है.

अब आपको मार्ग मानचित्र दिखाया गया है जिसका सफ़र आप क़िताब पढ़ने के साथ पूरा करेंगे.

भूमिका में लेखक ने सीधे पाठकों से मुख़ातिब हो लॉकडाउन की कुछ ऐसी कहानियां बताई हैं जिनसे आप विचलित हो उठेंगे. यहां लेखक इस कहानी को लिखने के दौरान बनाए गए खुद के नियमों पर बात करते यह भी कहते हैं कि इस यात्रा को पढ़ने के बाद 'मज़दूर' शब्द के प्रति पाठकों का नज़रिया बदल जाएगा.

भूमिका के बाद लेखक ने किताब को आभार सहित 11 हिस्सों में बांटा है, जो आकर्षित करने वाले शीर्षकों से शुरू होते हैं. 
'बेचेहरा और बेनाम' भाग से इस सफ़र की शुरुआत की गई है. यह किताब पढ़ते शुरुआत से ही हमें यह लगने लगता है कि विनोद कापड़ी सामने बैठ लॉकडाउन की दिल डुबा देने वाली कहानी सुना रहे हैं, इस बीच लेखक की उन सात मज़दूरों से हुई शुरुआती बातचीत भी किताब में पढ़ने को मिलती है.
'पुलिस की उस मरी हुई आत्मा के घेरे को कैसे पार करें जहां एक मज़दूर उसे इनसान तक नही दिखता है' जैसी पंक्ति लॉकडाउन के दौरान का पुलिस का अमानवीय चेहरा हमारे सामने लाती है.

किताब को आगे पढ़ते आपको मकानमालिकों के रवैये, मज़दूरों द्वारा चोरी तक करने के बने हालातों और फिर उनकी यात्रा में हुई मुश्किलों के बारे में पता चलेगा. जिस तरह के ख़तरे उठा यह यात्रा करी जा रही थी, उसके बारे में पढ़ आप यह जरूर सोचने लगेंगे की क्या सभी मज़दूर ऐसे ही खुशनसीब रहे होंगे.

गंगा नदी वाला वाक्या किताब की जान है. कुछ ऐसी ही घटनाओं की वजह से किताब आधुनिक भारत का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज बन गई है, जो समाज को उसकी सच्चाई दिखा समाज के बनावटी मुंह में तमाचा भी है.

मज़दूरों के घर की कहानी सुन लेखक का अपने बचपन को याद करना भावुक कर देता है.
'जातियों से आगे बढ़ अब छुआछूत कोरोना तक आ पहुंचा है' किस्सा बिल्कुल नया नवेला है.

मज़दूरों द्वारा मॉब लिंचिंग कर मारे जाने का विचार आने वाली बात भी कई नए सवाल उठाती है, ऐसी बातें इसी कहानी पर बनी फिल्म के ज़रिए समझ पाना मुश्किल था और ऐसे सवाल किताब पढ़ ही बन सकते हैं.

'अशरफ' साइकिल वाले का किस्सा हिन्दू-मुस्लिम जपने वालों को लाख बार पढ़ना चाहिए.

'सब दिन होत न एक समान' में लेखक इस यात्रा में अपनी बदलती भूमिका पर बात करते हैं जो आपको भी लेखक के साथ इस यात्रा के बहाव में बहाते लेकर चली जाती है.

'ये जो आप हमारा वीडियो बना रहे हैं, इससे हमारी दशा में सुधार होगा क्या?' लेखक के पास इसका जवाब नही था पर शायद किताब अपने पाठकों पर इसका जवाब छोड़ गई है.
शाहजहांपुर जिले की पुलिस वाली घटना किताब पढ़ते पहली बार हंसने का मौका देती है. 

सरकार की सहायता से खाना मिलना और फिर ट्यूबवेल में नहाने वाला किस्सा पढ़ आप मज़दूरों की समस्या खत्म होती देखेंगे और खुद भी एक राहत सी महसूस करेंगे.

रामसुरेश यादव, जयविन्द और प्रत्यूष का किस्सा पढ़ लगता है कि ऐसे लोग पूरे भारत में होते तो यह किताब लिखने की जरूरत ही नही पड़ती, फिर यह भी ध्यान आता है कि क्या हमने कोरोना काल के बाद इन लोगों को फ़िर से याद किया!!

राजकुमार के बारे में पढ़ने से पता चलता है कि ख़ाकी पहने हर इंसान एक से नही होते. 
मज़दूरों द्वारा मज़दूरों को ही लूटने की घटना से दिल पसीज जाता है, अच्छा ही हुआ कि उन तंत्र के सताए मज़दूरों के चेहरे डॉक्यूमेंट्री में नही दिखे.

बिहार पहुंचने के बाद कहानी एक अलग ही मोड़ ले लेती है और लेखक यहां पर मज़दूरों से भावनात्मक रूप से कुछ ज्यादा ही जुड़े लगते हैं.
मज़दूरों की भीड़ का वर्णन हो या बिहार के सरकारी अमले द्वारा कोरोना रोकथाम के लिए किया गया कुप्रबंधन, लेखक ने सब कुछ यहां पर बेहतरीन तरीके से अपनी क़लम के ज़रिए लिख दिया है.

मज़दूरों कितने घण्टे भूखे रहे यह जान आपका तंत्र के प्रति विश्वास उठ सा जाएगा. किताब में लिखे गए कुछ दृश्य आपको डॉक्यूमेंट्री में देखने ही होंगे, उनमें बस के ऊपर वाला दृश्य मुख्य है.

किताब के अंत में इस यात्रा से जुड़ी कुछ तस्वीरें हैं.
कोरोना काल के बाद दिल्ली वापस लौटे मज़दूरों के साथ लेखक की चर्चा सवाल छोड़ जाती है कि कोरोना की तीसरी लहर आने पर मज़दूर फिर सड़कों पर न दिखें, इसके लिए हम कितने तैयार हैं.

किताब के आवरण चित्र पर बात की जाए तो साइकिल पकड़े मज़दूरों की तस्वीर से अच्छा उनकी भावनाओं को दर्शाता कोई चित्र दिखाया जाता तो थोड़ा बेहतर हो सकता था, किताब और इस पर बनी डॉक्यूमेंट्री में ऐसे बहुत से अवसर थे जिनकी एक यादगार तस्वीर आवरण चित्र पर लगाई जा सकती थी.

जब भविष्य में कृषि कानून पर सरकार का रुख क्या रहा होगा, यह समझ न आए तो एक बार मेहनतकशों पर सरकार के रुख को समझने के लिए विनोद कापड़ी का यह दस्तावेज़ खोल पढ़ा जा सकता है.

समीक्षक- हिमांशु जोशी @Himanshu28may

चटक रहा है चौथा स्तम्भ, आप आंख में पट्टी बांधे रहिए.

Tuesday, December 7, 2021

अभी मास्क से दूरी कल सड़क में रेंगते घर जाना होगा जरूरी.

आज सुबह की ही खबरों के अनुसार दुनिया भर के 38 से ज्यादा देशों में कोरोना के नए वेरिएंट ओमिक्रॉन के मामले सामने आ रहे हैं. दक्षिण अफ्रीका में सबसे पहले  सामने आए इस वेरिएंट के अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोप, भारत में भी काफी तेजी से नए केस मिलने लगे हैं. ब्रिटेन में ओमिक्रॉन सामुदायिक रूप से फैलना शुरू हो चुका है और वहां बिना ट्रैवल हिस्ट्री के भी काफी लोग कोरोना के नए वेरिएंट से संक्रमित हो रहे हैं.  


सिर्फ़ भारत की बात की जाए तो तस्वीर में भारत के पिछले 30 दिनों के कोरोना आंकड़े हैं, साफ देखा जा सकता है कि भारत में भी कोरोना से मौत के आंकड़ों में उछाल आने लगा है.
लोगों का मास्क मीडिया की खबरों के अनुसार निकलता है और वह भी अधिकतर ठुड्डीयों में ही लटका रहता है.

अभी हम कोरोना से जुड़ी जो खबरें देख-पढ़ रहे, यह ठीक वैसी ही हैं जैसी हमने कोरोना की पहली लहर के शुरुआती दौर में देखी थी. उसके बाद ऑक्सीजन, वेंटिलेटर, बेडों की कमी वाली कहानी शायद हम भूल चुके हैं.

आजतक की एक ख़बर के अनुसार ओमिक्रॉन वेरिएंट का ट्रांसमिशन रेट पिछले सभी वेरिएंट से बहुत ज्यादा है. ये वेरिएंट ज्यादा तेजी से इंसान को संक्रमित कर सकता है, भारत में पहली लहर अल्फा वेरिएंट से आई थी. जिसमें एक इंसान दो से तीन व्यक्तियों को संक्रमित कर सकता था. दूसरी लहर डेल्टा वेरिएंट की वजह से आई थी जिसका ट्रांसमिशन रेट 6.5 था यानी ये पहली लहर से तीन गुना तेज था. 
अब अनुमानों के मुताबिक, नए ओमिक्रॉन वेरिएंट का ट्रांसमिशन रेट 12 से 18 के बीच है और ये डेल्टा से करीब तीन गुना ज्यादा तेजी से फैल सकता है.

यह फ़ोटो आज सुबह-सुबह देहरादून की है और इसे ज़ूम करके देखेंगे तो मास्क पहने शायद ही कोई दिखेगा. इस स्थान पर सुबह मजदूरों का जमावड़ा लगा रहता है और अगर कल कोरोना बढ़ने से लॉकडाउन लगाया जाता है तो यही मज़दूर कल सड़क पर भूखे-प्यासे अपने घर जाते दिखेंगे.
मास्क न पहनने वाले अधिकतर लोग मज़दूर वर्ग के हैं और इन्हें मास्क की चिंता न होकर अपने काम मिलने की चिंता अधिक है. अब सवाल यह है कि इन्हें मास्क पहनने के लिए जागरूक कौन करेगा! कोरोना काल आए दो वर्ष होने को हैं पर हम अब तक भारत की आबादी को मास्क पहनने के लिए जागरूक करने में कामयाब नही हो पाए हैं, सिर्फ मोबाइल की रिंगटोन भर से मज़दूर वर्ग मास्क पहनने के लिए जागरूक नही हो सकता. इसके लिए हमें संचार के अपने पारंपरिक तरीकों की तरफ़ लौटना होगा,जैसे उन चौराहों पर जहां इन मजदूरों का जमावड़ा रहता है वहां नाटक दिखाया जाए. जिसमें मास्क न पहनने के नुकसान को दिखाया जा सकता है. 
यह कार्य हमें जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी शुरू करना होगा क्योंकि सुनी पड़ी सड़कों से घरों के बर्तन भी सुने पड़ने जल्दी ही शुरू हो सकते हैं.

नोट- आलेख डराने नही जागरूक करने के लिए लिखा गया है, जब जागो तब सवेरा.

हिमांशु जोशी, उत्तराखंड. @himanshu28may

Friday, December 3, 2021

बेटा-बेटी विरासत आगे ले जाएंगे, घोषणा करती BoB Biswas

साल 2017 में 'Neighborhood ties' नाम की शॉर्ट फ़िल्म आई और कांस फ़िल्म फेस्टिवल के लिए चुन ली गई थी, इस शॉर्ट फ़िल्म की निर्देशक का नाम था दीया अन्नपूर्णा घोष.
दीया का एक और परिचय यह है कि वह 'झंकार बीट्स', 'बदला' के निर्देशक सुजॉय घोष की बेटी हैं.

दीया ने अपनी पहली फ़िल्म के लिए अभिषेक बच्चन पर भरोसा जताया और उन्हें लेकर बॉब बिस्वास बनाई. 
यह फिल्म 'कहानी' के बॉब बिस्वास नामक काल्पनिक चरित्र पर आधारित है.

'ब्लू' से शुरू हुई फ़िल्म पूरी तरह से बॉब बने अभिषेक के इर्दगिर्द ही घूमती है. फ़िल्म के लिए उन्होंने अपना वज़न बढ़ाया और अपनी इस मेहनत से लुक में बदलाव ला अभिषेक ने दर्शकों का दिल जीतने में सफलता पाई है, जिसमें फ़िल्म की मेकअप टीम ने भी उनका बराबर साथ दिया है.
अभिनय के मामले में भी अभिषेक ने वह कर दिखाया है जिसके बाद वह भी कह सकते हैं "मैं अभिषेक बच्चन बोल रहा हूं".
चित्रांगदा सिंह भी खूबसूरत लगी हैं साथ ही उन्होंने बॉब की खूबसूरत पत्नी का किरदार भी बखूबी निभाया है, इन दोनों के अलावा फ़िल्म में सभी कलाकारों के पास जितना भी अभिनय करने के लिए था सबने बेहतर ही निभाया.

फ़िल्म शुरू होने के दस मिनट बाद ही आपको इसे देखने में मज़ा आने लगेगा और फ़िल्म का बेहतरीन छायांकन आपके इसे मज़े को दोगुना कर देगा. 
फ़िल्म का कलर उसके विषय से ही जुड़ा हुआ लगता है, कोलकाता की गलियों को चाउमीन के ज़रिए बिना हावड़ा ब्रिज दिखाए ही मंत्रमुग्ध करने वाला दिखा दिया गया है.

फ़िल्म आगे बढ़ते इसका रहस्य-रोमांच बढ़ता जाता है और फिल्मकार दर्शकों को एक बढ़िया बॉलीवुड फिल्म देखने का अवसर भी देते हैं. इतना तो है आप इसे देखते क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है, सोचने पर मजबूर होते रहेंगे. 
अगर आप हॉलीवुड फिल्मों के शौकीन हैं तो कभी-कभी यह 'जेसन बॉर्न' की याद भी दिलाती है.

फ़िल्म की कहानी के अनुसार ही उसका संगीत भी बजता है ,जो फ़िल्म के रोमांच को बनाए रखने में अभिषेक के बराबर ही काम करता है.
फ़िल्म के गाने तो ऐसे नही हैं जो याद रखे जाएं पर वह फ़िल्म देखते आपको कहानी से जोड़े रखते हैं.

दीया अन्नपूर्णा घोष और अभिषेक बच्चन का यह अब तक का सर्वश्रेष्ठ है और हमें उम्मीद है कि इनसे भविष्य में इससे भी अच्छा देखने को मिलेगा.
तब तक आप अपने-अपने पिताओं की विरासत को आगे ले जाते निर्देशक और अभिनेता की इस फ़िल्म का मज़ा तो ले ही सकते हैं.

निर्देशक- दीया अन्नपूर्णा घोष
निर्माता- गौरी खान, सुजॉय घोष, गौरव वर्मा
लेखक- सुजॉय घोष
मेकअप- सीमोन बेयलेवेल्ड
स्टंट- एलिस्टर और परमजीत
सिनमोटोग्राफी- गैरिक सरकार
संगीत- विशाल-शेखरअनुपम रॉय, क्लिंटन सेरेजो,बियांका गोम्स
ओटीटी प्लेटफॉर्म- ZEE5
समीक्षक- हिमांशु जोशी @Himanshu28may
रेटिंग- 3.5/5

Thursday, December 2, 2021

डग्गामार टैंपो में सफ़र कराने के बाद भी बड़ा सन्देश देती 'छोरी'.

सबसे पहले तो ये बात जान लें कि Chhori साल 2017 में आई एक मराठी फ़िल्म लपाछपी की रीमेक है. 
गन्ने के खेत में बदहवास हालत में भागती औरत के साथ फ़िल्म की शुरुआत होती है, यह दर्शकों को फ़िल्म के साथ बांधने की अच्छी कोशिश है.

कहानी में साक्षी बनी नुसरत भरुचा की एंट्री होती है, जिन्होंने गर्भवती महिला का किरदार निभाया है और वह उसे जीती हुई भी लगी हैं. भानो देवी बनी मीता वशिष्ट का अभिनय उनकी एंट्री के बाद से उतार चढ़ाव भरा लगता है, उन्होंने अभिनय में निरन्तरता नही रखी.
सौरभ गोयल और राजेश जैस ठीकठाक हैं.

फ़िल्म की शूटिंग मध्य प्रदेश राज्य के होशंगाबाद जिले में हुई है और वहां के गांव की गन्ने के खेत वाली लोकेशन मात्र भी दर्शकों को डराने में कामयाब हुई है. कैमरा वर्क इतना बेहतरीन है कि पुतले, बच्चों की झलक और रोशनदान भर से ही डरावना माहौल पैदा कर दिया गया है. 

फ़िल्म की कहानी और उद्देश्य की बात करें तो निर्देशक इसी बात में भ्रमित लगते हैं कि वह दर्शकों को डराना चाहते हैं या भ्रूण हत्या पर बात करना चाहते हैं. दोनों साथ करने के प्रयास में फ़िल्म शुरू से आखिर तक एक डग्गामार टैंपो की तरह खिंचती चली जाती है. 
एक ड्राइवर पर भरोसा कर उसके घर पहुंच जाना, तंत्र-मंत्र, डायन वाला खेल और भी बहुत कुछ आजकल के दर्शकों को पचना बंद हो गया है.

फ़िल्म का ध्वनि विभाग बेहतरीन है. कहानी कुछ खास न होने के बाद भी पानी की टप-टप या लकड़ी काटने की आवाज़ मात्र से ही डराने का सफ़ल प्रयास किया गया है. बैकग्राउंड म्यूज़िक इसका साथ बख़ूबी निभाता है, 'ओ री चिरैया नन्ही सी चिड़िया अंगना में फिर आजा रे' सुनने में हमेशा की तरह दर्दभरा है.

'छोरे से वंश आगे बढ़े है और छोरियां...'
'हर छोरी में एक मां होती है और मां से बड़ा न किसी का ओहदा है न किसी की औक़ात' ,जैसे संवाद ठीक हैं तथा महिलाओं की स्थिति पर विमर्श कराने का प्रयास करते हैं.

 फ़िल्म का कॉस्ट्यूम डिज़ाइन अच्छा है, नुसरत भरुचा हों या मीता सभी कपड़ों के डिजाइन भर से ही गांव का दर्शन करा देते हैं.

एक कुंए में बच्चियों की लाशों के ढेर वाला दृश्य बहुत कुछ कहता है और फ़िल्म के आख़िर में एक जानकारी भी मिलती है कि जब तक आपने फ़िल्म देखी तब तक 113 भ्रूण हत्या हो गई होंगी. 
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि फ़िल्म का विषय तो बहुत अच्छा था पर वह वैसी बन नही पाई जैसी बन सकती थी.

ओटीटी प्लेटफॉर्म- अमेज़न प्राइम वीडियो
निर्देशक- विशाल फुरिया
लेखक- विशाल फुरिया, विशाल कपूर
छायांकन- अंशुल चौबे
पार्श्व संगीत- केतन सोढा
कॉस्ट्यूम डिज़ाइन- विशाखा कुल्लरवर
कलाकार- नुसरत भरुचा, मीता वशिष्ट, सौरभ गोयल, राजेश जैस
समीक्षक- हिमांशु जोशी @Himanshu28may
रेटिंग- 2.5/5

स्पेशल ऑप्स 1.5 द हिम्मत स्टोरी, नाम से ही कोई स्पेशल नही बन जाता.

Special Ops की सफलता के बाद उसी सफलता को दोहराने की उम्मीद में बनाई गई Special Ops 1.5

शुरुआत से ही फ़िल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक किसी जासूसी फ़िल्म के लिए उपयुक्त लगता है और साथ में जिन कोणों का प्रयोग कर दृश्य दिखाए गए हैं वो लाजवाब हैं. 
युक्रेन की खूबसूरती पर आपका दिल आ जाएगा.

विपक्ष नेता के साथ हिम्मत सिंह बने के के मेनन का संवाद सुनने लायक है तो अब्बास बने विनय पाठक का
'कभी- कभी दूसरों से लड़ना आसान होता है और अपने लिए लड़ना सबसे मुश्किल' जैसे कुछ संवाद भी अच्छे हैं.

वेब सीरीज़ पूरी तरह से के के मेनन की है जिनका अभिनय ठीक कहा जा सकता है. विनय पाठक, काली प्रसाद मुखर्जी जैसे दिग्गज भी वेब सीरीज़ में हैं पर उनके साथ वेब सीरीज़ के अन्य कलाकारों के पास करने के लिए ज़्यादा कुछ बचा नही है. 
आफताब को फिर से देखना अच्छा लगा है, ओटीटी ने कई अभिनेताओं के डूबते कैरियर को फिर से जान दी है.

कहानी हनी ट्रैप और रॉ के इर्दगिर्द बुनी गई है, यह विषय मनोरंजन क्षेत्र में हमेशा सुपरहिट रहा है पर यहां इस पर बनी वेब सीरीज़ को ठीक तरह से सम्पादित नही किया गया और कहानी में भी बड़ा झोल लगा है. 
वेब सीरीज़ में एक बार चीनी लड़की की बात तो करी जाती है पर फ़िर वो गायब है, हिम्मत अपनी गर्लफ्रेंड सरोज को क्यों कैद कर जाते हैं और फिर क्यों मार देते हैं वो समझ नही आता. 
जिस आसानी से हर कोई अपने टार्गेट तक पहुंच रहा था, उससे तो लगा जासूसी करना पांचवी पास मानुष के लिए भी आसान काम है.

अगर आपके पास टाइम पास करने के साधन बिल्कुल ही ख़त्म हो गए हैं और तीन-चार दिन तक आप कुछ नही देख पाए तब एक बार यह वेब सीरीज़ देखी जा सकती है.

निर्देशक- नीरज पांडे
निर्माता- शीतल भाटिया
लेखक- नीरज पांडे ,दीपक किंगरानी, बेनज़ीर अली फ़िदा
छायांकन- सुधीर पलसाने, अरविंद सिंह
संगीतकार- अद्वैत नेमलेकर
संपादक- प्रवीण काथिकुलोठी
ओटीटी प्लेटफॉर्म- डिज्नी+ हॉटस्टार
कलाकार- के के मेनन, विनय पाठक, आफताब शिवदासानी, ऐश्वर्या सुष्मिता
समीक्षक- हिमांशु जोशी @Himanshu28may
रेटिंग- 2.5/5

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...