किताबों के बारे में एक बात है जो गले में अटकी है, आसपास ऐसे लोग भी नही हैं जिनसे यह कह सकूं। तो जन से विचारों का संवाद करने मैंने इस पेज़ में यह बात साझा करने का निर्णय लिया।
मेरे मेंटर राजीव लोचन साह के कहने पर किताबों को पढ़ने का शौक पाला।
पढ़ते-पढ़ते किताबों की समीक्षा भी हो जाए और लोग वाट्सएप यूनिवर्सिटी से बाहर निकल किताबों पर मन लगाएं, यह सोच समीक्षाएं लिखनी शुरू करी।
अब सवाल ये था कि किताबें पढ़ी कहां से जाए! हम भारतीय 'मूली' खरीदने पर भी दो रुपए कम करवाते हैं तो किताब पर पैसा खर्च... नही.... ये सोच गूगल में किताबों का नाम सर्च डाउनलोड कर, बड़े ध्यान से अशोक कुमार पांडेय की 'उसने गांधी को क्यों मारा', रवीश कुमार की 'इश्क में शहर होना', 'बोलना ही है' पढ़ डाली और उन पर लिखी समीक्षाएं भी अच्छी जगह पब्लिश हुई।
इस बीच एक बड़े समाचार पत्र ने अशोक sir की 'उसने गांधी को क्यों मारा' पर लिखी समीक्षा छापने के लिए किताब की तीन प्रतियां मांगी और यह भी बोला समीक्षा में आपका नाम नही आएगा।
पहले तो लिखे का दाम नही और अब नाम भी नही, पर फिर भी किताब की प्रतियां को ज्यादा बिकेंगी यह सोच मैंने अशोक कुमार पांडेय को यह बात बताई।
उनकी तरफ़ से जो जवाब मिला उसी वज़ह से मैं आज ये पोस्ट लिख रहा हूं। उनका कहना था जो लेखक की इज़्ज़त न करे उनके लिए मत लिखो।
मेरे मन में बहुत से विचार उमड़ने के साथ, शर्मिंदगी भी घर कर गई।
किताब फ्री में डाउनलोड कर उसे पढ़ने के बाद समीक्षा लिख मैं खुद को बड़ा समीक्षक समझ रहा था पर मैं तो सबसे गया गुज़रा इंसान था ,जिसने लेखक के साथ छल कर उसकी मेहनत के मज़े फ्री में लुटे।
गुरु से ज्ञान प्राप्त किया और कोई फीस नही!! क्या मेरे लिए उस ज्ञान पर गर्व करने की वजह रह गई!!
लेखक नीलोत्पल मृणाल की पोस्ट आजकल चर्चा में है, वह किताबो की इंटरनेट में उपलब्ध फ्री पीडीएफ फाइलों के साथ बाज़ार में उपलब्ध नकली किताबों को लेकर आवाज़ उठा रहे हैं।
मैं खुद एक किताब लिख रहा हूं, दिन भर उसी में मन दौड़ता है। और भी काम हैं पर मन किताब का ताना-बाना बुनने से हटता नही।
आप पढ़ते हैं और फिर किताबें अलग रख देते हैं, पर कभी सोचा उसे लिखने वाले ने किताब पूरी करने के लिए क्या-क्या खोया है!
एक-दो-तीन साल की मेहनत और पैसा कुछ भी नही, पर फिर भी लिखना है। आप जो हैं वो आप में जिंदा रहे इसलिए लिखना है, पेट की चिंता किसे है।
जे के रोलिंग ने 'हैरी पॉर्टर' लिखी होगी तब उन्हें पता नही होगा कि वह इतनी पढ़ी जाएगी पर हर लेखक इतना खुशकिस्मत नही होता, वो लिखता है। पूर्णकालिक रूप से लेखक बनना , घर का चूल्हा ठंडा रखने जैसा हो चला है पर फिर भी लिखना है।
लिखने वाले लिखते रहेंगे वो कभी आपके सामने गिड़गिड़ाएंगे नही, आप बस उन्हें उनकी मेहनत का पैसा दे दीजिए।
ये बात मैंने अशोक कुमार पांडेय को कभी नही बताई, रवीश कुमार से मेरा सीधा सम्पर्क नही ,पर मैं उनसे भी माफ़ी मांगता हूं। अब मैं किताबें खरीदने लगा हूं, मैं इन किताबों को भी फिर से खरीदूंगा, विनोद कापड़ी की किताब '1232km' खरीद कर पढ़ी उसकी समीक्षा लिखी। समीक्षा को उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर भी साझा किया, तब मुझे असल सन्तुष्टि का पता चला।
जीवन में खुद को कभी धोखे में मत रखिए, खुद से नज़र मिलाना ही जीत है।
एक शर्मिंदा समीक्षक @himanshu joshi
