भारत में कोरोना मरीज़ों की संख्या एक करोड़ के पार पहुंच गई है इनमें अधिकतर सकुशल घर वापसी कर चुके हैं तो कुछ अब भी अस्पताल में कोरोना से जंग लड़ रहे हैं। गंभीर स्थिति में पहुंच चुके मरीज़ों को प्लाज़्मा थिरेपी दी जा रही है।
प्लाज़्मा थिरेपी के नाम से ही डरे लोग प्लाज़्मा दान करने नही जा रहे उनके लिए यह जानना जरूरी है कि यह प्लाज़्मा थिरेपी है क्या?
यह साधारण रक्तदान की तरह ही है।
जिस मरीज को एक बार कोरोना का संक्रमण हो जाता है, वह जब ठीक होता है तो उसके शरीर में एंटीबॉडी बनती है। यह एंटीबॉडी उसको ठीक होने में मदद करती है। ऐसा व्यक्ति रक्तदान कर सकता है। उसके खून में से प्लाज्मा निकाला जाता है और प्लाज्मा में मौजूद एंटीबॉडी जब किसी दूसरे मरीज में डाला जाता है तो बीमार मरीज में यह एंटीबॉडी पहुंच जाता है, जो उसे ठीक होने में मदद करता है।
तो ऐसे ही एक गम्भीर बीमार मरीज़ की प्लाज़्मा थिरेपी के लिए मुझे कुछ लोगों की कॉल आई जो हल्द्वानी, उत्तराखंड के वन्देमातरम ग्रुप से थे। यह उन कुछ ग्रुपों में से एक है जो देश में चल रहे किसान आंदोलन, छात्र आंदोलन से परे कोरोना काल में निस्वार्थ भाव से लोगों की मदद कर रहे हैं।
वंदेमातरम ग्रुप के दो युवा शैलेंद्र सिंह दानू और अभिनव वार्ष्णेय गम्भीर कोरोना मरीज़ के परिवार और कोरोना से ठीक हो चुके लोगों के बीच सोशल मीडिया की मदद से एक सम्पर्क सीढ़ी का कार्य कर रहे हैं।
ठीक हो चुके कोरोना विजेताओं की लिस्ट से उनका मोबाइल नम्बर ले वह गम्भीर कोरोना मरीज़ की प्लाज़्मा थिरेपी में सहायता के लिए रक्तदान हेतु इक्छुक रक्त दानदाताओं को अस्पताल बुला रहे हैं।
किस्मत से मेरे शरीर में एंटीबॉडी होने के साथ-साथ प्लेटलेट्स जैसी अन्य आवश्यक चीज़े भी भरपूर मात्रा में थी और मैं लैब अस्सिस्टेंट मोहतरमा द्वारा बताई गई अफेरिसिस मशीन ( जिसका नाम मुझे तब एक बार सुन कर समझ नही आया था और बाद में गूगल प्रोफेसर की मदद ली गई ) में अपना रक्त दान कर सका जो रक्त से प्लाज़्मा को अलग कर देती है।
वंदे मातरम ग्रुप द्वारा जुटाए गए साढ़े छह सौ में से चार सौ रक्तदाताओं में एंटीबॉडी खत्म हो चुकी थी और वह प्लाज़्मा थिरेपी के लिए चाहते हुए भी मदद करने में असमर्थ थे।
पहले से ही कोरोना मरीज़ होने का संकोच और प्लाज़्मा थिरेपी की प्रक्रिया से अंजान होकर डरे लोगों की वज़ह से जरूरतमंद गम्भीर कोरोना मरीज़ के सामने प्लाज़्मा थिरेपी देने हेतु रक्तदाताओं की कमी बनी हुई है।
भारत मे रक्तदान से जुड़ी कुछ अन्य बातें।
भारत में रक्तदान को लेकर पहले से ही बहुत सी भ्रांतियां हैं। भारत में 18-65 वर्ष की उम्र के बीच के लोग रक्तदान कर सकते हैं।
रक्तदाता का वज़न 45 किलोग्राम से ऊपर होना चाहिए।
रक्तदाता शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होना चाहिए।
रक्तदाता ने शराब का सेवन ना किया हो।
रक्तदाता रक्तदान से फैलनी वाली सभी बीमारियों से मुक्त हो।
रक्तदान के बाद बरती जाने वाली सावधानियां
राष्ट्रीय रक्त आधान परिषद के अनुसार रक्तदान के बाद उपयुक्त मात्रा में तरल पदार्थ पीना चाहिए और कोई भारी काम करने से बचना चाहिए।
रक्तदाता को रक्तदान के तुरंत बाद धूम्रपान और ड्राइविंग से बचना चाहिए।
रक्तदान के बाद लगे बैंडेज को 6 घण्टे बाद ही निकालना चाहिए और किसी भी प्रकार की समस्या आने पर ब्लड बैंक से सम्पर्क करना चाहिए।
रक्तदाता होने के लाभ
अमेरिकन जनरल ऑफ एपिडेमियोलॉजी द्वारा किए गए एक अध्ययन में फिनलैंड के ऐसे 2682 पुरुषों के नमूने लिए गए जिन्होंने साल में कम से कम एक बार रक्तदान किया था।
उनमें रक्तदान ना करने वाले लोगों से दिल का दौरा पड़ने का जोखिम 88% कम था।
रक्तदान करने से रक्तदाताओं को इसके शारीरिक और मानसिक लाभ भी मिलते हैं। रक्तदान कर गर्व का अनुभव होता है और रक्तदाता के आत्मविश्वास में भी वृद्धि होती है।
रक्तदान एक महान कार्य है यह सभी को समझाना होगा।
इसके लिए नेताओं, गैर सरकारी संगठनों और आम जनता की भागीदारी आवश्यक होगी।
गूगल प्लेस्टोर पर रक्तदान, प्लाज़्मा थिरेपी से सम्बंधित अधिक आसान एप बनाने होंगे। सोशल मीडिया पर इसके अधिक प्रचार प्रसार की आवश्यकता है।
जाते जाते एक और समाचार अपडेट करना चाहूंगा। वंदेमातरम ग्रुप द्वारा रक्तदान करते खींची गई फोटो घर पहुंचते ही अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों में अपडेट की है जो लाइक के पिछले सारे रिकार्ड ध्वस्त कर रही है और अब भी जारी है।
प्लाज़्मा थिरेपी दो-तीन दिन बाद अपना असर दिखाएगी और मुझे उम्मीद है अपने जैसे एक और कोरोना योद्धा के साथ मैं जल्द ही एक सेल्फी में दिखूंगा।
हिमांशु जोशी।
पत्रकारिता शोध छात्र।