Thursday, December 24, 2020

प्लाज़्मा थिरेपी : कोरोना मरीज़ों को आपकी जरूरत है।

कभी कभी शरीर से निकलने वाला रक्त का फव्वारा भी एक अलग ही आनन्द की अनुभूति देता है।

भारत में कोरोना मरीज़ों की संख्या एक करोड़ के पार पहुंच गई है इनमें अधिकतर सकुशल घर वापसी कर चुके हैं तो कुछ अब भी अस्पताल में कोरोना से जंग लड़ रहे हैं। गंभीर स्थिति में पहुंच चुके मरीज़ों को प्लाज़्मा थिरेपी दी जा रही है। 

प्लाज़्मा थिरेपी के नाम से ही डरे लोग प्लाज़्मा दान करने नही जा रहे उनके लिए यह जानना जरूरी है कि यह प्लाज़्मा थिरेपी है क्या?

 यह साधारण रक्तदान की तरह ही है।
जिस मरीज को एक बार कोरोना का संक्रमण हो जाता है, वह जब ठीक होता है तो उसके शरीर में एंटीबॉडी बनती है। यह एंटीबॉडी उसको ठीक होने में मदद करती है। ऐसा व्यक्ति रक्तदान कर सकता है। उसके खून में से प्लाज्मा निकाला जाता है और प्लाज्मा में मौजूद एंटीबॉडी जब किसी दूसरे मरीज में डाला जाता है तो बीमार मरीज में यह एंटीबॉडी पहुंच जाता है, जो उसे ठीक होने में मदद करता है।

तो ऐसे ही एक गम्भीर बीमार मरीज़ की प्लाज़्मा थिरेपी के लिए मुझे कुछ लोगों की कॉल आई जो हल्द्वानी, उत्तराखंड के वन्देमातरम ग्रुप से थे। यह उन कुछ ग्रुपों में से एक है जो देश में चल रहे किसान आंदोलन, छात्र आंदोलन से परे कोरोना काल में निस्वार्थ भाव से लोगों की मदद कर रहे हैं। 
वंदेमातरम ग्रुप के दो युवा शैलेंद्र सिंह दानू और अभिनव वार्ष्णेय गम्भीर कोरोना मरीज़ के परिवार और कोरोना से ठीक हो चुके लोगों के बीच सोशल मीडिया की मदद से एक सम्पर्क सीढ़ी का कार्य कर रहे हैं। 
ठीक हो चुके कोरोना विजेताओं की लिस्ट से उनका मोबाइल नम्बर ले वह गम्भीर कोरोना मरीज़ की प्लाज़्मा थिरेपी में सहायता के लिए रक्तदान हेतु इक्छुक रक्त दानदाताओं को अस्पताल बुला रहे हैं।

किस्मत से मेरे शरीर में एंटीबॉडी होने के साथ-साथ प्लेटलेट्स जैसी अन्य आवश्यक चीज़े भी भरपूर मात्रा में थी और मैं लैब अस्सिस्टेंट मोहतरमा द्वारा बताई गई अफेरिसिस मशीन ( जिसका नाम मुझे तब एक बार सुन कर समझ नही आया था और बाद में गूगल प्रोफेसर की मदद ली गई ) में अपना रक्त दान कर सका जो रक्त से प्लाज़्मा को अलग कर देती है। 


वंदे मातरम ग्रुप द्वारा जुटाए गए साढ़े छह सौ में से चार सौ रक्तदाताओं में एंटीबॉडी खत्म हो चुकी थी और वह प्लाज़्मा थिरेपी के लिए चाहते हुए भी मदद करने में असमर्थ थे। 

 पहले से ही कोरोना मरीज़ होने का संकोच और प्लाज़्मा थिरेपी की प्रक्रिया से अंजान होकर डरे लोगों की वज़ह से जरूरतमंद गम्भीर कोरोना मरीज़ के सामने प्लाज़्मा थिरेपी देने हेतु रक्तदाताओं की कमी बनी हुई है।

भारत मे रक्तदान से जुड़ी कुछ अन्य बातें।

भारत में रक्तदान को लेकर पहले से ही बहुत सी भ्रांतियां हैं। भारत में 18-65 वर्ष की उम्र के बीच के लोग रक्तदान कर सकते हैं। 
रक्तदाता का वज़न 45 किलोग्राम से ऊपर होना चाहिए।
रक्तदाता शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होना चाहिए।
रक्तदाता ने शराब का सेवन ना किया हो।
रक्तदाता रक्तदान से फैलनी वाली सभी बीमारियों से मुक्त हो।
 
रक्तदान के बाद बरती जाने वाली सावधानियां

राष्ट्रीय रक्त आधान परिषद के अनुसार रक्तदान के बाद उपयुक्त मात्रा में तरल पदार्थ पीना चाहिए और कोई भारी काम करने से बचना चाहिए।
रक्तदाता को रक्तदान के तुरंत बाद धूम्रपान और ड्राइविंग से बचना चाहिए।
रक्तदान के बाद लगे बैंडेज को 6 घण्टे बाद ही निकालना चाहिए और किसी भी प्रकार की समस्या आने पर ब्लड बैंक से सम्पर्क करना चाहिए।

रक्तदाता होने के लाभ 

अमेरिकन जनरल ऑफ एपिडेमियोलॉजी द्वारा किए गए एक अध्ययन में फिनलैंड के ऐसे 2682 पुरुषों के नमूने लिए गए जिन्होंने साल में कम से कम एक बार रक्तदान किया था।
उनमें रक्तदान ना करने वाले लोगों से दिल का दौरा पड़ने का जोखिम 88% कम था।

रक्तदान करने से रक्तदाताओं को इसके शारीरिक और मानसिक लाभ भी मिलते हैं। रक्तदान कर गर्व का अनुभव होता है और रक्तदाता के आत्मविश्वास में भी वृद्धि होती है।

रक्तदान एक महान कार्य है यह सभी को समझाना होगा।
इसके लिए नेताओं, गैर सरकारी संगठनों और आम जनता की भागीदारी आवश्यक होगी। 
गूगल प्लेस्टोर पर रक्तदान, प्लाज़्मा थिरेपी से सम्बंधित अधिक आसान एप बनाने होंगे। सोशल मीडिया पर इसके अधिक प्रचार प्रसार की आवश्यकता है। 

जाते जाते एक और समाचार अपडेट करना चाहूंगा। वंदेमातरम ग्रुप द्वारा रक्तदान करते खींची गई फोटो घर पहुंचते ही अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों में अपडेट की है जो लाइक के पिछले सारे रिकार्ड ध्वस्त कर रही है और अब भी जारी है।
प्लाज़्मा थिरेपी दो-तीन दिन बाद अपना असर दिखाएगी और मुझे उम्मीद है अपने जैसे एक और कोरोना योद्धा के साथ मैं जल्द ही एक सेल्फी में दिखूंगा।



हिमांशु जोशी।
पत्रकारिता शोध छात्र।

Thursday, December 10, 2020

अब प्रवासी वाला शोर कहां है?

मेनस्ट्रीम मीडिया में बहुत शोर मचा था प्रवासी-प्रवासी। इनको रोकने के लिए कई योजनाओं की घोषणा हुई। 

आईपीएल, सुशांत, बिहार चुनाव और अब किसान आंदोलन। हम सब भूल गए, अवसाद में बहुत से युवा बेरोजगार आत्महत्या कर रहे हैं, छात्र अपने भविष्य को लेकर चिंतित है।

ट्रम्प के धूम-धड़ाके और फिर प्रधानमंत्री के जनता कर्फ्यू वाले सम्बोधन से देश ने कोरोना महामारी की शुरुआत देखी। फिर अपने मूल निवास स्थान से पलायन कर रोज़गार की तलाश में घर से दूर रह रहे लोग जो अब अपने ही देश में प्रवासी कहलाए जा रहे हैं की घर वापसी का सिलसिला शुरू हुआ।

अपने भविष्य के लिए चिंतित और सरकार के बिना परिणाम की चिंता किए बगैर लगाए गए लॉकडाउन की वज़ह से हमने देश की सड़कों पर घर लौट रहे 'प्रवासियों' की भारी भीड़ देखी। कोई पैदल ही अपने बच्चों को कंधे पर लादे सैंकड़ो किलोमीटर की यात्रा पर चल पड़ा तो कोई साईकिल, ठेलों पर अपने घर पहुंचा। सभी प्रवासी इतने खुशकिस्मत नही थे ,कई ट्रेन की पटरियों पर ही हमेशा के लिए सो गए तो कुछ की यात्रा पैदल चलते-चलते ही समाप्त हो गई।

देश की नीति निर्माण करने वालों का अपने ही देश के मज़बूर श्रमिकों के लिए 'प्रवासी' शब्द का इस्तेमाल करना कितना सही है? 
भारत का संविधान (अनुच्छेद19) सभी नागरिकों को भारत की सीमा में पूरी आज़ादी से आने-जाने व भारत की सीमा के किसी भाग में रहने तथा बसने का अधिकार देता है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन(आईएलओ) के अनुसार, 'प्रवासी श्रमिक' को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया जाता है जो रोज़गार के लिए एक देश से दूसरे देश प्रवासित होता है।

घर वापसी के लिए श्रमिक बम अनायास ही नही फूटा था जनसंख्या वृद्धि की वजह से आज़ादी के बाद से ही भारत में पलायन की समस्या बढ़ती चली गई।

 उत्तराखंड के 'ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग पौड़ी' की सितम्बर2019 की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले दस सालों में प्रदेश की 6338 ग्राम पंचायतों से 3,83,726 लोगों ने अस्थाई तौर पर पलायन किया जो समय-समय पर घर वापस आते रहे। वहीं 3946 ग्राम पंचायतों से 1,18,981 लोगों ने स्थाई तौर पर पलायन किया।
उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में देश के अन्य ग्रामीण इलाकों की तरह ही कृषि मुख्य व्यवसाय है। उसके बाद क्रमशः मज़दूरी और सरकारी नौकरी लोगों के लिए जीविकोपार्जन के साधन हैं।
प्रदेश के गांवों में सबसे ज्यादा पलायन 26-35 वर्ष के युवाओं ने किया है। प्रदेश से 50.16 प्रतिशत पलायन रोज़गार और उसके बाद 15.21 प्रतिशत पलायन शिक्षा की वजह से हुआ है।

पलायन की वज़ह से समाज में कुछ सकारात्मक प्रभाव भी देखने को मिलते हैं जिनकी अक्सर अनदेखी ही की जाती है। पलायन से दूसरी जगह जाने वाले को जातिगत विभाजनों से मुक्ति मिलती है। मैंने स्वयं बहुत से लोगों को उत्तराखंड से मुंबई, बंगलौर जाते ही अपने उपनाम बदलते देखा है। 
महिलाएं जो फैसले और स्वतंत्रता संयुक्त परिवार में नही ले पाती हैं, पलायन करते ही और एकल परिवार में आने के बाद वह खुद को सशक्त महसूस करती हैं।
पलायनकर्ता अपने स्त्रोतों से विभिन्न प्रकार के कौशल लाता है, जिनका प्रयोग वह घर वापसी पर करता है। जैसे वर्तमान समय में होटलों पर कार्य कर चुके लोग लॉकडाउन के बाद अपने मूलस्थान में होटल व्यवसाय जमाने की कोशिश कर रहे हैं।

उत्तराखंड के खटीमा में श्रीपुर बिछुआ के रहने वाले भास्कर चौसाली लॉकडाउन से पहले दिल्ली के चाणक्यपुरी में एक होटल में कार्य करते थे। अब उन्होंने अपने गांव में ही एक फ़ास्ट फूड रेस्टोरेंट खोला है। भास्कर कहते हैं कि गांव में इतना काम है कि मुझे अपने साथ दो-तीन सहयोगियों की आवश्यकता है लेकिन फिर भी स्थिति सामान्य होने पर वह दिल्ली लौटना चाहते हैं। दिल्ली में वह दिन भर काम करने के बाद मन बहलाने देर रात तक घूम सकते हैं पर यहाँ तो शाम होते ही सन्नाटा छा जाता है।  गांव में मनमाफ़िक काम भी नही किया जा सकता क्योंकि लोग खुद के काम से ज्यादा दूसरों के कामों पर ज्यादा ध्यान देते हैं। शहर की तेज़ जिंदगी में तो पड़ोसियों के नाम तक नही पता होते।

'ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग पौड़ी' की कोविड19 के प्रकोप के बाद उत्तराखंड के पर्वतीय जनपदों में लौटे श्रमिकों की सहायता हेतु सिफारिशों पर अप्रैल 2020 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में वापस लौटे श्रमिकों की संख्या 59,360 थी। जिसमें सबसे अधिक 12,039 पौड़ी जिले से थे।
25 से 30 प्रतिशत श्रमिक उत्तराखंड के ही विभिन्न शहरों से वापस आए थे, 60-65 प्रतिशत श्रमिक देश के अन्य बड़े शहरों और 3-5 प्रतिशत श्रमिक विदेश से वापस लौटे थे। 
 श्रमिकों की सहायता और उनके वापस पलायन को रोकने के लिए सरकार ने बहुत सी योजनाएं शुरू की थी पर अधिकतर लोगों को इन योजनाओं का ज्ञान ही नही था।

हमें यह जानना जरूरी है कि तमाम बाधाओं को पार करते हुए ऐसी आपात स्थिति में यह श्रमिक अपने गांव या मूल स्थान ही क्यों वापस लौटे। 
छह लोगों के परिवार वाले धर्मवीर उत्तराखंड के रुद्रपुर में दूधियानगर इलाके में रहते हैं और पिछले सोलह वर्षों से गोलगप्पे का ठेला लगाते हैं। जब मेरी उनसे मुलाकात हुई तो धर्मवीर ने बताया कि आज महीनों बाद फिर से ठेला लगाया है। लॉकडाउन में उन्होंने रुद्रपुर की ही एक धान मिल में काम किया। 
ऐसे लाखों लोग थे जिन्हें संकट की इस घड़ी में सिर्फ कृषि आधारित उद्योगों का ही सहारा था। यह हमारे लिए लज्जा की बात है  कि लाखों कृषक इस समय अपने अधिकारों के लिए पिछले कई दिनों से देश की राजधानी के बाहर आंदोलन कर रहे हैं।

दीपावली के बाद अब वापस आए प्रवासी फिर से रोज़गार के लिए शहरों का रुख करने लगे हैं, फ़र्क बस इतना है कि ट्रेन और बसों के चलने पर वह भीड़ सड़कों पर नही दिख रही है। भविष्य की अनिश्चितता अब  भी वैसी ही बनी हुई है,  किसी को नही पता कि कोरोना की लहर फिर से वापस लौटने  या फिर से कोरोना जैसी कोई अन्य महामारी आने पर क्या होगा। अब समय आ गया है कि हमारी सरकार को कृषि के साथ सड़क, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे वास्तविक मुद्दों पर फिर से गम्भीरता से विचार करना चाहिए।

तीन हफ़्ते बाद ही अपने लिए दो जून की रोटी की व्यवस्था न कर पाने वाले मज़दूरों की समस्याओं के समाधान करने के लिये कई कानून जैसे-’ अंतर्राज्यीय प्रवासी श्रमिक अधिनियम, 1979 और  ‘असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम, 2008 बनाए गए, परंतु कई कारणों से ये अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में असफल रहे हैं। 
असंगठित क्षेत्रों में कार्य करने वाले मज़दूरों को अधिकांशतः सरकार की योजनाओं की जानकारी नहीं होती है, ऐसे में जागरूकता और परामर्श के अभाव में बहुत से पात्र लोग भी योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाते। मज़दूरों को सीधे सहायता पहुंचाने के लिए उनकी पहचान के लिए उपलब्ध आधार कार्ड का सही उपयोग कर उन तक उचित जानकारियां पहुंचाने के साथ ही आवश्यकता पड़ने पर सरकारी सहायता पहुंचाने की व्यवस्था भी करनी चाहिए।

Tuesday, December 8, 2020

कोरोना के बाद आवश्यक है जनसंख्या प्रबंधन।

 कोरोना काल के शुरुआती दौर में जब पहली बार घर आया तो सड़क पर बच्चों को सूटकेस, सब्जी के ठेलों और कंधों पर लादे पैदल चलते बहुत से मज़बूर माता-पिताओं को देखा। टीवी, अखबार और सोशल मीडिया में ट्रेन की पटरियों पर सो रहे मज़दूरों की ट्रेन से कटने के बाद बिखरी चप्पलों की तस्वीरें, वीडियो वायरल थे। किसी समाचार चैनल में अपनी मृत माँ के पल्लू से खेल रहे बच्चों की वीडियो देखी। नैनीताल और हल्द्वानी के बीच बाइक से जाते दिल्ली से पैदल अल्मोड़ा आ रहे किसी भारतीय नागरिक से मिला जिसे मेनस्ट्रीम मीडिया का एक तबका आईएलओ की परिभाषा के विपरीत चींख-चींख कर प्रवासी कह रहा था। नैनीताल में बिहार के कुछ मज़दूरों को घर वापसी के लिए रोज़ ट्रेन टिकट कार्यालय के खुलने के इंतज़ार में चक्कर लगाते देखता था। कौन थे यह लोग जिन्हें हमने और हमारी अब तक की सरकारों की नाकाम नीतियों ने सड़क पर भूखे मरने के लिए छोड़ दिया था?

कोरोना के बाद जिस तरह से हम अपनी आबादी को प्रवासी के रूप में सम्बोधित करते रहे और घर बैठ टीवी चैनलों, सोशल मीडिया, अखबारों में उनके कष्टभरे दिनों की कहानी सुनते रहे वह एक ऐसे भारत की कहानी बयां करता है जो तीन हिस्सों में बंट गया हैं। जहां गरीब गरीब ही होता जा रहा, मध्यमवर्गीय अपने लिए रोटी का इंतज़ाम करने भर से खुश है और अमीर इन दोनों को लूटखसोट कर अपनी सम्पत्ति बढ़ाता ही जा रहा है।

सुशांत की आत्महत्या के बाद ड्रग्स सिंडिकेट के भंडाफोड़, बिहार चुनाव में बीजेपी की जीत का जश्न और उसके बाद आईपीएल की तड़कभड़क में हम वह सब भूल चुके हैं। 
हमें यह लग तो रहा है कि स्थिति अब धीरे धीरे सामान्य हो रही है पर क्या पूरी तरह से खत्म हुए रोज़गार इतनी जल्दी फिर से शुरू हो पाना सम्भव है और क्या इस बेतहाशा भीड़ को संभालने, संवारने के लिए हमारी सरकार के पास कोई ठोस योजना है?

यह बात सत्य है कि गाँवों में बढ़ती आबादी और खेती के लिए कम होती जमीन के बाद वर्षों से रोज़गार की तलाश में शहरों का रुख करने वाली 'जनसंख्या' के पास पहला लॉकडाउन लगने के बाद तीन हफ़्तों तक की भी बचत नही थी। आज भी चार सौ रुपए प्रतिदिन दिहाड़ी के हिसाब से हमारी अधिकतर 'आबादी' अपना पेट पालती है। 

कोरोना के बाद से सैंकड़ो युवाओं ने बेरोज़गार हो अवसाद की वज़ह से आत्महत्या कर ली। 'सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी' जो देश की एक प्रमुख व्यवसायिक सूचना कम्पनी है के आंकड़ों के अनुसार मई 2020 को भारत में बेरोज़गारी दर 21.73 प्रतिशत पहुंच गई थी जो दिसंबर 2019 में 7.60 प्रतिशत थी।

कोरोना काल मे हमने भारतीय स्वास्थ्य सेवाओं को लड़खड़ाते हुए देखा। भारत की जनसंख्या के अनुसार हमारी स्वास्थ्य सेवा ऐसी महामारी झेलने में सक्षम नही थी। 
आबादी और पलायन की वज़ह से दिल्ली या अन्य मुख्य शहरों में ट्रैफिक की समस्या अब आम हो चली है। दिल्ली की वायु अब प्रदूषण की वजह से जहरीली हो गई है। सम-विषम फार्मूले जैसे नए प्रयोग से इस प्रदूषण और ट्रैफिक को कम करने की कोशिश तो की गई है पर इस प्रकार के अधिक से अधिक नए प्रयोगों की आवश्यकता है।
बढ़ती आबादी रोज़गार के अवसर कम कर रही है। भारत का स्थान सर्वाधिक बेरोजगारी वाले देशों की सूची में अव्वल रहता है। बेरोज़गारी की वजह से अपराध बढ़ते हैं और अपराध बढ़ने से न्याय व्यवस्था का चरमराना भी स्वाभाविक है। कोर्ट में फैसले आते आते वर्षों लग जाते हैं। बड़ा परिवार होने की वजह से उपभोक्तावाद हावी रहता है और इससे भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा मिलता है।
बढ़ती आबादी आधी से ज्यादा सरकारी योजनाओं को ध्वस्त कर देती हैं।

कोरोना जब पूरे विश्व में अपने पांव पसारने में लगा था। तब हमें अपनी आबादी को देख कर ही यह डर था कि अगर इटली, अमरीका जैसे विकसित देशों में कोरोना से यह हाल है तो हमारे देश में क्या होगा। वह तो भला हो सरकारी आंकड़ो का जो हम उन पर विश्वास कर अब कोरोना से निडर हो बिन मास्क और सामाजिक दूरी के घूम रहे हैं।

आज़ादी के बाद भारत की जनसंख्या नीति

बढ़ती जनसंख्या हमारे लिए हमेशा से खतरा थी इसी वजह से भारत दुनिया का पहला ऐसा देश बना जिसने सबसे पहले 1952 में परिवार नियोजन कार्यक्रम को अपनाया।  तभी से विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में जनसंख्या नियंत्रण के लिए कोशिश की जाती रही है।

जनसंख्या नियंत्रण के लिए अटल बिहारी सरकार की ओर से 2000 में गठित वेंकटचलैया आयोग ने जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने की सिफारिश की थी। इस आयोग के अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस वेंकटचलैया थे जबकि जस्टिस सरकारिया, जस्टिस जीवन रेड्डी और जस्टिस पुन्नैया इसके सदस्य थे। 
सितंबर 2019 में जनसंख्या नियंत्रण को लेकर दायर याचिका को दिल्ली हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि हम सरकार के कार्यों को अंजाम नहीं दे सकते। जनसंख्या नियंत्रण कानून पर अमल करवाना अदालत का कार्यक्षेत्र नहीं है। बाद में इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।

वर्तमान भाजपा सरकार संसद में जनसंख्या नियंत्रण बिल लाकर कानून बना सकती है। सम्भव है कि इस बिल में दो संतान का प्रावधान रखा जाए। दो से अधिक संतान होने पर माता पिता और उनकी संतानों को किसी भी प्रकार की सरकारी सुविधाओं का लाभ नहीं दिया जाए।

जनसंख्या नियंत्रण कानून आवश्यक है या जनसंख्या का प्रबंधन।

यूएन के मुताबिक, “यदि प्रतिस्थापन स्तर की फर्टिलिटी पर्याप्त रूप से लंबे समय तक बनी रहती है तो देश के अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्थापन द्वारा जनसंख्या को संतुलित करने के लिए कुछ भी करने की जरूरत के बिना ही प्रत्येक पीढ़ी खुद को पूरी तरह बदल देगी।” भारत अब इसके बहुत करीब है, क्योंकि कई राज्यों में कुल प्रजनन दर 2.1 से नीचे है। इसका मतलब है कि भारत की आबादी अब प्रतिस्थापन स्तर पर पहुंचने ही वाली है या अब संभवतः कोई प्रभावी जनसंख्या वृद्धि नहीं होगी।  जनसंख्या वृद्धि नही होगी तो इसका सीधा मतलब यह निकलता है कि अब हमें जनसंख्या नियंत्रण करने की कोई आवश्यकता नही है और न ही इसके लिए कोई कानून बनाना अब जरूरी रह गया है।

अब अगर हम जनसंख्या प्रबंधन की बात करें तो हमारे पास अभी एक शक्तिशाली युवाशक्ति है। 

जियो युग के बाद से भारत में इंटरनेट के दाम तो गिरे है पर भारतीय युवा तकनीक के प्रयोग और उसका लाभ लेने की जगह उसका गुलाम बन रहा है। विकसित देश एक बाज़ार की तरह हमारे युवाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं। टिकटोक, पब्ज़ी के दुख में डूबे युवा को वाट्सएप, इंस्टाग्राम और फेसबुक की आभासी दुनिया से बाहर निकलने की फुर्सत ही नही है।

अगर हमें विश्वगुरु बनना है तो कोरोना के इस झटके से बाहर निकल यह समय अपनी आबादी और युवाशक्ति के सदुपयोग का है। 

हमें कोरोना के बाद घरवापसी कर रहे लोगों की भीड़ और रोज़ ठूंस कर रेलों में यात्रा कर रही जनता को याद कर बुलेट ट्रेन से पहले लोकल ट्रेनों की संख्या बढ़ानी होगी । इसके साथ ही परिवहन के अन्य सार्वजनिक साधनों को भी मजबूत करने की आवश्यकता है।

बुजुर्गों के लिए अभी से टाइम बैंक खोले जाने चाहिए ताकि भविष्य की तैयारी अभी से की जा सके। 

कोरोना की वजह से बेरोज़गार हो चुके युवाओं के बूढ़े होने से पहले उनके लिए रोजग़ार के अवसरों पर बात शुरू करनी चाहिए।

शिक्षा की गुणवत्ता में भी सुधार की आवश्यकता है। कोरोना काल में विद्यार्थियों के सामने शिक्षा ग्रहण करने की गम्भीर समस्या खड़ी हो गई है। विद्यालय तो ऑनलाइन पढ़ाई के बहाने पूरी फीस वसूल कर रहे हैं पर हमें उन छात्रों के बारे में भी सोचना चाहिए जिन्होंने स्मार्टफोन सिर्फ अपने सपनों में ही देखा है। ऐसे विद्यार्थियों का भविष्य कोरोना की शुरूआत से ही अंधकार में चल रहा है।

बढ़ती आबादी जिस तेज़ी से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रही है उसे देखते हुए हमें प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग भी समझदारी से करना होगा। ईंधन से चलने वाली गाड़ियों की जगह बिजली चालित गाड़ियों को बढ़ावा तो दिया जा रहा है पर दाम अधिक होने की वजह से आम आदमी की पहुंच से वह अब भी दूर है।
 सौर ऊर्जा का प्रयोग भी अभी इतना लोकप्रिय नही हुआ है जितना होना चाहिए। 
चीन ने जिस तेजी से नवीकरणीय ऊर्जा का अधिक प्रयोग कर अपने प्राकृतिक संसाधनों का सही प्रयोग करना सीखा है हमें भी अब अतिशीघ्र उस ओर ध्यान देना होगा।

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...