Sunday, November 26, 2023

पहाड़ की आंखों देखी : खंडहर हो चुके मकान, बंजर खेत, नेपाली मजदूर।

पहाड़ खाली हो रहे हैं तो हम हमेशा से सुनते आए हैं पर पहाड़ों में बंजर हो चुके खेतों को देखना और खंडहर बन चुके छोड़े हुए मकानों को देखना वाकई में दर्द भरा है। उत्तराखंड के अधिकतर गांव अब कुछ दिनों के लिए होने वाली सामूहिक पूजा में ही आबाद होते हैं, सालों पहले पलायन कर गए लोग देवताओं को पूजने अपने गांव वापस आते हैं। पहाड़ में बीते यह कुछ दिन भी 'बाहर' से आए इन लोगों के लिए मुश्किल होते हैं, वहां के मुश्किल जीवन का सामना करने के लिए वह नेपाली मजदूरों पर निर्भर रहते हैं। इन नेपाली मजदूरों की भी अपनी अलग कहानी हैं।
पिछले दिनों उत्तराखंड के दो गांवों में जाना हुआ, जहां के लोग पूजा करने अपने गांव वापस लौटे थे।

बॉर्डर का गांव खाली होना चिंताजनक।

 चम्पावत जिला मुख्यालय से 51 किलोमीटर दूर नगरुघाट गांव में स्थित नागार्जुन मंदिर में हर साल लगने वाले मेले में लगभग पांच- छह सौ लोग पहुंचे हुए थे। गांव से पांच सौ मीटर पहले ही पक्की सड़क खत्म हो जाती है, हां संचार के लिए गांव में जिओ के नेटवर्क पूरी तरह से आ रहे थे।

                         नगरुघाट गांव।

 महाकाली नदी के तट पर बसे इस गांव की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि नदी के उस पार नेपाल है। गांव में 14-15 घर दिखाई देते हैं, जिनमें रहने वाले लोग लगभग ये सभी घर छोड़ कर जा चुके हैं।

सड़क, पानी, कॉलेज, अस्पताल हो तो कोई गांव क्यों छोड़े!

गांव के एक बुजुर्ग मदन बोहरा और युवा ईश्वर बोहरा मेले की शुरुआत से पहले अपने गांव के बारे में बात करने के लिए तैयार हो जाते हैं। मदन बोहरा कहते हैं कि गांव में लगभग सभी जातियों के लोग रहते हैं, गांव के लोग पहले ठंड के दिनों में नगरुघाट और गर्मियों में गांव से थोड़ा ऊपर स्थित पासम गांव में रहते थे। नगरुघाट से ऊपर के गांवों में जब सड़क बनी, जिनमें पासम भी शामिल था, तो नगरुघाट आने वाले सिंचाई गूल में पानी आना बंद हो गया। पहले गांव के खेतों में सभी प्रकार की फसल होती थी पर पानी न होने की वजह से फसल लगनी बन्द हो गई, सड़क और पानी न होने की वजह से गांव के लोग अपने घर छोड़ पूरी तरह से पासम में ही रहने लग गए।

               नगरुघाट में खाली पड़े घर।

नगरुघाट की खेती अब पूरी तरह से बरसात के पानी पर ही निर्भर है, इस बार गांव के लोगों ने मोटा अनाज झंगोरा लगाया था। झंगोरा को स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा अनाज माना जाता है।
ईश्वर बोहरा कहते हैं कि पासम में सड़क की सुविधा है, जिस वजह से लोग वहां रहते हैं। पासम में सरकारी स्कूल है जो कक्षा आठ तक है और उसके बाद गांव के बच्चे बारहवीं तक पढ़ने सात-आठ किलोमीटर दूर रौसाल जाते हैं। कॉलेज के लिए चालीस पचास किलोमीटर दूर स्थित चम्पावत या तीस चालीस किलोमीटर दूर लोहाघाट जाना पड़ता है, वह बताते हैं इसी वजह से गांव के लगभग हर परिवार के बच्चे आठवीं या दसवीं तक पढ़ाई पूरी करते ही दिल्ली में होटलों में नौकरी करने चले जाते हैं। अस्पतालों की सही सुविधा भी चम्पावत या लोहाघाट ही मिल पाती है।

       नागार्जुन देवता के मंदिर में मेले की रात।

मेले के बारे में मदन बोहरा कहते हैं कि यह मेला गुरु नानक जयंती से एक दिन पहले सालों से मनाया जाता रहा है। नागार्जुन देवता को मानने वाले दर्जन भर गांवों से लोग इस मेले में आते हैं। यह नेपाल के कुछ गांवों के देवता भी हैं, इसलिए आज मेले में नेपाल से भी लोग आते हैं, रात भर मेले में भगवान की आराधना के साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते हैं और सुबह स्नान के बाद यह मेला समाप्त होता है।

खाली पड़े पहाड़ में बस अब नागफनी और दतुरा।

पिथौरागढ़ जिला मुख्यालय से 90 किलोमीटर और गंगोलीहाट तहसील से 16 किलोमीटर दूर पोखरी गांव के लिए जाने वाली सड़क कहीं पर बहुत ही खराब तो कहीं पर सही है।

पोखरी गांव में भटना मोहल्ले के नौले में वर्षों पहले गांव से पलायन कर गए मदन जोशी नहाते हुए मिलते हैं, वह कहते हैं कि पोखरी गांव के कलखेत, नाकुड़, मालघर, भटना, पालमोल मोहल्लों में लगभग पचास परिवारों के घर हैं और सालों से खाली पड़े इन घरों में अब मात्र दो परिवारों के सदस्य रहते हैं। एक ही घर में दस से बीस परिवारों का हिस्सा होता है, यह लोग गांव में पूजा होने पर ही सालों में कभी- कभी गांव आते हैं और किसी तरह इन घरों में रहते हैं। यह नौला भी इस बीच लोगों द्वारा साफ कर दिया जाता है, सीमेंट लगाए जाने के बाद नौले में पानी का प्रवाह कम हुआ है और अब इसके चारों तरफ गाजरघास, दतुरा भी बढ़ गए हैं।

                                नौला।

पोखरी के खेतों में घूमने पर वहां नागफनी, कुरी, दतुरा ही दिखाई देता है।

नेपाली मजदूरों की भी अपनी कहानी हैं।

नौले में नेपाल के जिला बाजुरा के रहने वाले दो बच्चों के पिता 54 साल के चन्द्र खटका और बाजुरा के ही 22 वर्षीय प्रेम मिले। नेपाल के सरकारी स्कूल में पच्चीस साल पढ़ाने के बाद रिटायर हुए चन्द्र खटका पिछले तीन साल से भारत में रहकर मजदूरी कर रहे हैं। वह कहते हैं कि गंगोलीहाट में हम लगभग पचास नेपाली मजदूर रहते हैं, आसपास के गांवों में काम मिलने पर वहां चले आते हैं। यहां इन लोगों की पूजा है तो हम नौले से पीने का पानी भर रहे हैं, हमें यहां सामान ढोने का काम मिला हुआ है। चन्द्र खटका कहते हैं कि गंगोलीहाट में वह लोग 600 रुपए के कमरे में चार लोग रहते हैं और खाना होटल में ही खाते हैं।जब उनके बीच का कोई नेपाली साथी बीमार पड़ता है तो सभी नेपाली लोग इलाज में उसकी मदद करते हैं।

प्रेम।

प्रेम कहते हैं कि नेपाल में उनके माता पिता किसान हैं और दो भाई स्कूल पढ़ते हैं। वह कहते हैं कि मैं पांच छह महीने में लगभग पचास साठ हजार रुपए घर भेज देता हूं, यह पैसे खुद घर लेकर जाता हूं या साथियों के हाथ भेजता हूं। प्रेम कहते हैं कि कई लोग काम करने के बाद भी उन्हें रुपए नही देते और मांगने पर कहते हैं कि कुछ भी कर लो रुपए नही मिलेंगे, हम पुलिस से भी बड़े हैं।
प्रेम ने पिथौरागढ़ 15 दिन काम किया था और उन्हें पैसे नही दिए गए, काम करवाने वाले ने कहा कि 8-9 महीने काम और करोगे तब रुपया मिलेगा।

प्रेम रुपए कमा कर वापस नेपाल जाना चाहते हैं और वहां अपनी दुकान खोलना चाहते हैं। वह कहते हैं कि मैं रोज होटल में मांसाहारी भोजन लेता हूं क्योंकि खाऊंगा तभी यह काम कर पाऊंगा। रहने-खाने के साथ प्रेम का मोबाइल रिचार्ज का खर्चा भी है, जिससे वह भारत और नेपाल के समाचार लगातार सुनते रहते हैं।

हिमांशु जोशी।
@Himanshu28may

Friday, November 24, 2023

मुक्तेश्वर टू मुंबई तैयार हुई समोसा एंड सन्स.

उत्तराखंड राज्य में रहकर मुंबई फिल्म इंडस्ट्री के लिए यह फ़िल्म बनाना 'समोसा एंड सन्स' के मेकरों के लिए आसान नही रहा था. इसके बारे में बात करते फिल्म के डायरेक्टर ऑफ फोटोग्राफी और फिल्म की निर्देशक शालिनी शाह के पति राजेश शाह बताते हैं कि इस फिल्म का निर्माण कोरोना काल में हुआ था, जब बहुत सारी पाबंदियां लागू थी और उन सब के बीच अपने कलाकारों और सामान को मुंबई से मुक्तेश्वर लाना बड़ा मुश्किल काम था. संजय मिश्रा, बृजेंद्र काला जैसे बड़े नाम ने इस फ़िल्म में काम करने के लिए हामी भरी, तो फिल्म बनाने का सपना पूरा होता चला गया.

 शालिनी शाह और राजेश शाह के साथ फिल्म के लेखक दीपक तिरुआ ने उत्तराखंड से बॉलीवुड में जो दस्तक दी है, वह उत्तराखंड में फिल्म निर्माण के जरिए बॉलीवुड तक पहुंचने का सपना देखने वालों के लिए एक प्रेरणा बन सकते हैं.
राजेश शाह इस बारे में बात करते हुए कहते हैं कि जब मैं 1989 में पुणे एफटीआईआई पढ़ने गया था तो मेरी मां रात भर रोई थी कि ये कौन सा भविष्य बनाने चला गया.
आज इतने सालों बाद भी फिल्म मेकिंग को एक अच्छे करियर के तौर पर नहीं जाना समझा जाता है, हर कोई डॉक्टर, इंजीनियर, फौजी बनना चाहता है. उत्तराखंड के कॉलेजों को अभी मुंबई,बंगाल से फिल्म मेकिंग की बराबरी करने में बहुत काम करना है क्योंकि ये अभी इन बड़े शहरों से फ़िल्म से जुड़ी पढ़ाई के मामले में पीछे हैं और यहां पर इनसे जुड़ी पढ़ाई कराई जानी बहुत जरूरी है.

समोसा एंड सन्स की कहानी.

ओटीटी प्लेटफॉर्म जिओ सिनेमा पर आई फिल्म 'समोसा एंड सन्स' की कहानी का मुख्य पात्र चंदन है, जिसके ऊपर अपने पिता का इतना प्रभाव है कि वह अपनी जिंदगी के हर निर्णय उनको ध्यान में रख कर ही लेता है. भारतीय समाज में लड़के को ही परिवार आगे बढ़ाने वाला माना गया और इसी सोच से कहानी के मुख्य पात्रों पर पड़ते असर को दिखाते कहानी आगे बढ़ती रहती है.

किसी विशेष क्षेत्र को बैकग्राउंड में लेकर तैयार की गई कहानी में अगर वहां के क्षेत्रीय शब्दों के उच्चारण में कलाकारों द्वारा गलती की जाए तो यह बड़ी खलती है पर इस फिल्म में चंदन बिष्ट के पिता बने संजय मिश्रा ने 'ओ ईजा' शब्द जिस तरह बोला है, वह उत्तराखंड के दर्शकों को खुश कर देगा. श्री नारायण सिंह की साल 2018 में शाहिद कपूर अभिनीत फिल्म 'बत्ती गुल मिटर चालू' में सही उच्चारण न करने की यह गलती देखने को मिली थी पर इस फिल्म में साल 2000 में अपनी फिल्म 'फ्रॉम द लैंड ऑफ बुद्धिज़्म टू द लैंड ऑफ बुद्ध' के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त निर्देशक शालिनी शाह द्वारा इन बातों का विशेष रूप से ध्यान रखा गया है.

सामाजिक वर्जना तोड़ रही हैं निर्देशक शालिनी शाह.

भारतीय समाज में पत्नी को अक्सर लंबाई में पति से छोटा ही बेहतर समझा जाता है पर यहां निर्देशक अभिनेत्री नेहा गर्ग को चंदन बिष्ट से लंबाई में ज्यादा दिखाकर, इस सामाजिक वर्जना पर प्रहार करती हैं. पिछले साल 'एम एक्स प्लेयर' में आई एक शॉर्ट फिल्म 'टार्गेट' से चर्चा में आई नेहा ने एक शहरी बिंदास लड़की के साथ-साथ पतिव्रता स्त्री का किरदार बड़ी ही खूबसूरती के साथ निभाया है. फिल्म की शुरूआत में हल्के-फुल्के मूड में वह संवाद अदायगी में अन्य कलाकारों की अपेक्षा थोड़ा कमतर लगती हैं पर बाद में गम्भीर किरदार निभाते नेहा गर्ग अपनी इस कमी को पूरा कर लेती हैं.

 महिलाओं की वास्तविक स्थिति पर ध्यान खींचते संवाद.

'ये क्या मालती! पांच लड़कियां तुम्हारी पहले से हैं, दो बार तुम एबॉर्शन करा चुकी हो और अब फिर लड़के के लिए' संवाद से हमारे आसपास लड़के की चाहत के लिए व्याकुल समाज दिखाई देता है.

'एक बात हमेशा ध्यान रखना, बेटी हमेशा पराया धन होती हैं, अपना धन होता है अपनी औलाद, अपना बेटा' संवाद भारतीय समाज में बेटों को लेकर रूढ़िवादी सोच की सच्चाई हमारे सामने लेकर आता है. निर्देशक ने इस दृश्य को फिल्माया भी बड़े ही नाटकीय अंदाज में है, पेड़ में रस्सी से बंधे चंदन और रस्सी पकड़े संजय मिश्रा वाला यह दृश्य अपने आप में अनोखा है.

 वेशभूषा पर बढ़िया काम तो संगीत और छायांकन में झलकता पहाड़.

कलाकारों की वेशभूषा पर भी बेहतरीन काम किया गया है. नेहा को शादी के अवसर पर उत्तराखंड का लोकप्रिय पिछोड़ा पहनाया गया है, साथ ही संजय मिश्रा की टोपी भी ध्यान खींचती है.

समोसा एंड सन्स का बैकग्राउंड स्कोर इसे पहाड़ के करीब लाते हुए खास बना देता है. पहाड़ की खूबसूरती जब भी दिखती है, तब उसके साथ बजता हुआ मधुर संगीत भी मंत्रमुग्ध करता है और साथ में पक्षियों की चहचाहट भी फ़िल्म देखते सुखद अनुभव देती है.
'प्यार क्या बला, कभी जाना ना' गाने के बोल बड़े ही प्यारे हैं और इसकी कोरियोग्राफी भी ठीक-ठाक है.

संजय मिश्रा और नेहा गर्ग के बीच एक दृश्य में नेहा के पहने हेलमेट के अंदर से संजय मिश्रा पर कैमरा फोकस है, यह छायाकार की रचनात्मकता का उदाहरण है.

'तू बावरी नदी शहरी' गाने में भी तीन खिड़कियों के बीच नेहा गर्ग और चंदन बिष्ट वाला दृश्य दिखने में शानदार है.
फिल्म में ड्रोन से भी सही कार्य किया गया है, कुछ दृश्य तो 'वाह' निकलवाने में कामयाब रहे हैं.
कहानी ज्यादा समय एक घर में ही फिल्माई गई है, जिसमें लाइट्स का प्रयोग देखने में प्रभावित करता है.

हिमांशु जोशी.
@himanshu28may

Tuesday, November 14, 2023

वर्ल्ड कप

बंग्लादेश - तमीम, आउट
श्रीलंका- खराब खेल
इंग्लैंड- शर्मनाक
नीदरलैंड- हीरो
अफगानिस्तान- हीरो
भारत- यादव, रोहित, केएल, विराट

Friday, November 10, 2023

त्योहारी सीजन : ऑनलाइन बाजार गुलज़ार तो लोकल सुनसान, क्या है समाधान!

त्योहारी सीजन में ऑनलाइन बाजार गुलज़ार है पर लोकल बाज़ार में अब पहली जैसी बात नही। लोकल दुकानदारों ने भी अपने व्यापार को ऑनलाइन विस्तार देने के लिए कोई साझा पहल नही की है।

त्योहारी सीजन में बाजार में दुकानों पर भीड़ देखी जा सकती है पर अब यह भीड़ कुछ सालों पहली जैसी नही है। ऑनलाइन शॉपिंग साइटों ने इन लोकल दुकानदारों के हिस्से से कई ग्राहक कम कर दिए हैं। भारतीय ऑनलाइन शॉपिंग साईट्स के बाजार में साल 2007 में फ्लिपकार्ट और फिर साल 2013 में अमेज़न के उतरने के बाद से ही इन लोकल दुकानदारों की बिक्री कम होने लगी है। मीशो, स्नैपडील जैसे कुछ अन्य ऑनलाइन शॉपिंग साईट्स ने भी भारतीय बाजार पर अपनी धाक जमाई है।

त्योहारी सीजन में बाजारों की रौनक गायब।

उत्तराखंड के टनकपुर में रहने वाले संजय बिष्ट इस विषय पर फेसबुक में अपनी एक पोस्ट पर लिखते हैं कि क्या आपने महसूस किया है कि अब त्योहारों में बाज़ार की रौनक़ कम होने लगी है ! लोग एक दूसरे से कटे- कटे रहने लगे हैं. इसका कारण जानते हैं? ऑनलाइन शॉपिंग।
जो सामान हमको अपनी पास की दुकान से मिल ही रहा है तो बेवजह ऑनलाइन शॉपिंग क्यों करनी है।

ज़रा सोचिए कि अगर होली, दिवाली, बैसाखी, लोहड़ी, ईद, क्रिसमस आदि त्योहारों में बाज़ार ही ना सजे तो क्या त्योहार मनाने में आनंद आएगा? 
दोस्तों बाज़ार की रौनक़ फिर से बन जाइए और धूमधाम से त्योहार मनाइए और इस बार ऑनलाइन नहीं लोकल दुकानदार से ख़रीदारी कीजिए।

ऑनलाइन शॉपिंग साइट्स का बढ़ता प्रभाव और उनसे टकराने में विफल लोकल दुकानदार।

संजय बिष्ट अपनी जगह सही हैं, उनका लोकल दुकानदारों और अपने क्षेत्र से लगाव होना समझ आता है पर सवाल यह है कि जब ग्राहक को इन दुकानों की तुलना में सस्ता सामान जब फ्लिपकार्ट, अमेज़न पर उपलब्ध है तो वह क्यों इन लोकल दुकानदार के पास जाएगा!
बाजार के आधे से भी कम दाम पर कपड़े, ड्राई फ्रूट्स, टीवी ऑनलाइन उपलब्ध है।
फ्लिपकार्ट ने 'द बिग बिलियन डेज' सेल के अपने आंकड़े साझा करते हुए लिखा कि इस बार रिकॉर्ड 18500 करोड़ रुपयों की बचत भारतीयों द्वारा फ्लिपकार्ट से सामान लेकर की गई।
 
देश की अर्थव्यवस्था के लिए छोटे दुकानदारों का सदृढ़ होना जरूरी है लेकिन कोरोना के बाद से भारत में ऑनलाइन शॉपिंग में इजाफा हुआ है और इन लोकल दुकानदारों ने अमेज़न जैसे बड़े खिलाड़ियों से लड़ने के लिए कुछ नही किया है। भारत सरकार की इन्वेस्ट इंडिया वेबसाइट के अनुसार भारत में साल 2019 की तुलना में मोबाइल के माध्यम से इंटरनेट एक्सेस की अवधि में 21 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, इसका सीधा अर्थ यह है कि दूरस्थ क्षेत्रों के लोगों ने भी इंटरनेट की उपलब्धता की वजह से ऑनलाइन शॉपिंग साइट्स से खरीददारी बढ़ाई होगी।

लोकल दुकानदारों के लिए आगे चुनौती और भी मुश्किल होने वाली है क्योंकि भारत सरकार के अनुसार साल 2025 तक लगभग 87 प्रतिशत घरों में इंटरनेट कनेक्शन होगा।

व्यापार करना है तो साझी पहल अब जरूरी।

देहरादून के सुनील कैंथोला ने कोरोना काल में लोकल दुकानदारी ठप होने पर और भविष्य में ऑनलाइन शॉपिंग साइट्स के बढ़ते वर्चस्व को ध्यान में रखते लोकल दुकानदारों के लिए एक एप बनाया, जिससे इन छोटे दुकानदारों की ग्राहकों तक पहुंच आसान होगी।

इस पर बात करते सुनील कहते हैं एक ख़ास तरह का भविष्य हमारे जेहन में बोया जा रहा है। शॉपिंग मॉल की चेन और ऑनलाइन व्यापार की दुनिया से सजा भविष्य, जहां घर बैठे ही सब हासिल हो जायेगा और खरीददारी किसी पिकनिक से कम न होगी ! कुछ समय बाद यह मायावी दुनिया सिर्फ इज़ारेदारी के दम पर ही चल पायेगी और यह इज़ारेदारी उत्पादन, विपणन, उपभोक्ता और उपभोग के समस्त आयामों तक पसरती चली जाएगी। इस तंत्र के केंद्र में होगा उपभोक्ता को सम्मोहित करने का मंत्र जो विशेष छूट, फ्री कूपन और विविध प्रचार माध्यमों के जरिये वास्तव में भारत के पारम्परिक किराना व्यापार का मर्सिया पढ़ रहा होगा, लेकिन इस खेल में सामान्य उपभोक्ता तभी तक शामिल रह पायेगा जब तक उसके क्रेडिट कार्ड में दम होगा। यूं प्रारंभिक स्तर पर उसकी क्रेडिट रेटिंग उसे दिवाली में ड्राई फ्रूट खरीदने के लिए भी ईएमआई पर लोन देने को तत्पर दिखेगी पर एक सीमा के बाद उसकी भविष्य में होने वाली आमदनी भी रेहन पर चली जाएगी और इस विकट गणित को जीडीपी के उतार-चढ़ाव के ग्राफ के माध्यम से परिभाषित किया सकेगा। ऐसे में यदि बस्तियों, मोहल्लों और कॉलोनियों की किराना दुकान यदि बच पायी तो पिटे हुए उपभोक्ता फिर उसी लाला की तरफ लौटेंगे जो उन्हें बिना ब्याज, बिना किसी कागज़ी लिखा-पढ़ी के बरसों से उधार सामान देता आ रहा है।
जब टेक्नोलॉजी उपलब्ध है तो भारत के समस्त स्थानीय बाज़ारों और किराना व्यापारियों को बिना किसी खर्चे के ऑनलाइन रिटेल से जोड़ा जा सकता है। दिलचस्प बात यह है कि इस दिशा में कोई सार्थक प्रयास कभी किया ही नहीं गया और स्वयं किराना व्यापारियों भी अपने व्यापार को ऑनलाइन विस्तार देने में कोई साझी पहल करने में असफल रहे।

ऑनलाइन व्यापार की बिसात आभासी खिलाडियों ने बिछाई है ,जिसके तहत स्थानीय बाज़ार मुकाबला नहीं कर सकते। किन्तु इसके केंद्र में अंततः टेक्नोलॉजी ही है, दाज्यू इन्नोवेशंस ने लोकल मार्किट इकोसिस्टम के आधार पर लाला जी एप विकसित किया है। इसमें भुगतान सीधा व्यापारी पकड़ता है और किसी तरह की कमीशन नहीं देनी पड़ता। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लाला जी इंडिया एप के  प्रयोग से उत्पन्न यूजर डाटा व्यापारी की डिजिटल संपत्ति के रूप में विकसित होता चला जाता है, जिसका कालांतर में वह अपने व्यापार के प्रबंधन एवं विस्तार में उपयोग कर सकता है। इस यूजर डाटा पर गूगल अथवा फेसबुक सेंधमारी नहीं कर सकते। लोकल मार्केट इकोसिस्टम के अंतर्गत ग्राहक अपनी पसंदीदा दुकानों को अपने एप से जोड़ कर सीधा आर्डर कर सकते हैं, जिसके अंतर्गत किराना, फल - सब्जी, फार्मेसी आदि से लेकर प्रेस लॉन्ड्री वाले सभी उद्यमियों को एक एप के अंतर्गत जोड़ना संभव है।

हिमांशु जोशी।

Thursday, November 2, 2023

टिहरी

इस किताब में टिहरी के बारे में ऐसी कई बातें हैं, जिन्हें पढ़ने के बारे में उसे जानने की इच्छा और बढ़ जाती है.
इसे पढ़कर पाठकों के मन में जल विद्युत परियोजनाओं के औचित्य पर भी सवाल उठने लगता है कि कैसे कुछ लोग सिर्फ अपने लाभ के लिए हजारों लोगों का घर तो उजाड़ते हैं और साथ ही एक संस्कृति के साथ-साथ उसके इतिहास को मिटा दिया जाता है.

Wednesday, November 1, 2023

राह की चाह रखने वाले क लिए हर दरवाज़े खुद खुल जाते हैं।

फ़िल्म के निर्देशक ने रिश्तों की गर्माहट को शानदार तरीके से दिखाया है। मां बेटे, दादी पोते, पिता बेटे, प्रेमी युगल के बीच कम से एक दृश्य तो ऐसा है ही जो दर्शकों को रिश्तों की अहमियत दिखा जाता है और इन सब दृश्यों के पीछे चलते बैकग्राउंड स्कोर ने फ़िल्म को शानदार बनाए रखने में कोई कसर नही छोड़ी है।

बेटे का साथ हर पिता के लिए सब कुछ होता है और जब हालातों से परेशान पिता को मेसी समझाता है तब इस दृश्य के साथ निर्देशक हर दर्शक के दिलों में उतरने में कामयाब रहे हैं।

हेयरस्टाइल और कपड़े।
चक्की में काम करते, कोच के बाल, लड़की की ड्रेस

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...