Friday, July 28, 2023

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Tuesday, July 25, 2023

ट्विटर ट्विटर

राजीव नयन बहुगुणा

बूढ़ा, बेटी।
मणिपुर
बैंगलोर
सदन
 विपक्ष
ट्विटर


अक्सर मैं इनके ट्वीट नही देखता, मतलब राजनीतिक वाले। कोई डाले भी तो फेक न्यूज़ चैक करना पड़ता है।
यहां मामला गम्भीर था तो देखा, bjp4India ने इसे सबसे ऊपर रखा है। मोदी नाम को लेकर सदस्यता रद्द करने वाली कोर्ट, चुनाव आयोग ने यहां इतने बड़े शब्द को लेकर एक्शन नही लिया चौंकाने वाली बात है

मतलब इंडिया, इंडिया नाम से अब क्रिकेट नही खेलेगी। अरे, पीएम को दिक़्क़त है भाई। तो अब भारत कभी विश्व कप नही जीता है, ओहो। गजब बेइज्जती है।

अरे वो टीम वेस्टइंडीज से खेल रही है, वो किसकी है!!


Monday, July 24, 2023

आम होकर भी खास फिल्म है 'ट्रायल पीरियड'.

ओपनहाइमर और बार्बी ने बॉक्स ऑफिस पर धमाका किया हुआ है पर इस बीच जियो सिनेमा पर आई 'ट्रायल पीरियड' भी एक महत्वपूर्ण फ़िल्म है.
 यह एक ऐसे विषय को उठाती है जो भारतीय समाज के लिए बेहद जरूरी है. जेनेलिया देशमुख की खूबसूरती और गजराज राव, मानव कौल के हिंदी में बोले संवाद आपको फ़िल्म देखते निराश तो बिल्कुल नही होने देंगे.

सिंगल मदर पर खुलकर बात करती यह फ़िल्म, रिश्तों को बड़ी पवित्रता के साथ बांधती हैं एलेया सेन.

निर्देशक एलेया सेन एक ऐसा जरूरी विषय उठा कर लाई हैं जिस पर हमारे समाज में आज भी खुल कर बात नही होती. भारत में समाज की बंदिशों से डरी सहमी महिला अपनी शादी में आ रही लाख दिक्कतों के बाद भी तलाक नही लेती, तलाक के बाद फिर शादी की हिम्मत करना मुश्किल होता है और अगर किसी को पहली शादी से बच्चा है तो उस महिला के लिए तो दोबारा शादी नामुमकिन सा हो जाता है.
सिंगल मदर की समस्याओं पर हमारे यहां कम फिल्में बनी हैं, इस फिल्म में जिस तरह जेनेलिया देशमुख आंसू बहाते हुए बच्चे को अकेले पालने का अपना संघर्ष मानव कौल को सुनाती हैं, वह वाकई हमारे समाज की रूढ़िवादिता पर सवाल करता है. हर किसी को नई शुरुआत करने का हक होना चाहिए, अक्सर माता पिता इसमें समाज की फिक्र करते हैं पर फ़िल्म में जेनेलिया के माता पिता इस मामले में उनका साथ देते दिखते हैं. एलेया सेन ने जिस तरह से यह कहानी हमारे सामने रखी है उससे उनकी काबिलियत हमारे सामने आ जाती है, जैसे जेनेलिया एक तलाकशुदा महिला हैं दिखाने के लिए निर्देशक ने उनकी डिवोर्स की कहानी दिखाने के बजाए सिर्फ डिवोर्स सर्टिफिकेट दिखाने मात्र का ही रास्ता चुना है.
एलेया सेन ने फ़िल्म के मुख्य पात्रों के रिश्ते को बड़ी पवित्रता के साथ दिखाने की कोशिश की है, जैसे खुले आकाश के नीचे बच्चे के साथ लेटे मानव के पास जब जेनेलिया आती हैं तो यह दृश्य कहीं भी अश्लील नही लगता और मानव उन्हें एक कविता गाकर सुला देते हैं.
 
घुमावदार नही है कहानी.

फ़िल्म की कहानी तेज गति से आगे बढ़ती है, दर्शक शुरुआती दस मिनट में ही कहानी से जुड़ जाते हैं. इस कहानी में कोई रोमांचक मोड़ नही आता, अंत का अनुमान दर्शकों को पहले से ही रहता है.
सिंगल मदर बनी जेनेलिया देशमुख अपने बेटे के सर से पापा की जरूरत का भूत उतारने के लिए एग्रिमेंट के तहत एक महीने के लिए रोजगार की तलाश में भटक रहे मानव कौल को घर ले आती है फिर उसके बाद रिश्तों में उतार चढ़ाव के बाद दोनों एक हो जाते हैं.

जिडेन ब्राज बन सकते हैं भारतीय सिनेमा का बड़ा सितारा. गजराज राव और मानव कौल के संवादों के साथ जेनेलिया के हाव भाव के हो जाएंगे दर्शक दीवाने.

बाल कलाकार जिडेन ब्राज के जरिए निर्देशक ने एक ऐसा किरदार गढ़ा है जो दिखाता है कि टूट चुके रिश्तों की वजह से बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ता है. जिडेन ने फिल्म में एक परिपक्व कलाकार की तरह अभिनय किया है, भविष्य में उनमें एक बड़ा कलाकार बनने की क्षमता दिखाई देती है.
गजराज राव के अभिनय की बात की जाए तो वह इस फ़िल्म में नौकरी दिलवाने वाले बने हैं, संवाद बोलते उनके चेहरे के हाव भाव गजब के लगते हैं.
एक बच्चे की तलाकशुदा मां बनी जेनेलिया देशमुख का अभिनय भी संवाद के दौरान चेहरे में हाव भाव लाने के मामले गजराज राव से कहीं कम नही ठहरता और उनकी खूबसूरती इसमें चार चांद लगा देती है.
उज्जैन से दिल्ली पहुंचने वाले भोले भाले व्यक्ति बने मानव कौल का आम भारतीय जैसा दिखने वाला चेहरा ही उनकी ताकत है. जिसे देख दर्शकों को वह उनके बीच से ही निकल कर स्क्रीन पर पहुंचे व्यक्ति लगते हैं, इस वजह से दर्शक मानव कौल के किरदार से बहुत जल्दी जुड़ जाते हैं. जेनेलिया के साथ उनकी कैमिस्ट्री बहुत अच्छी लगती है. जैसे मानव, जेनेलिया के गुड मॉर्निंग का जवाब सुप्रभात में देते हैं.
फ़िल्म में शामिल बाकी कलाकार भी अपने किरदारों से पूरी तरह न्याय करते हैं.

संवाद कुछ अलग से तो 'धीरे' का भी नशा कम नही.

एक दृश्य में मानव कौल के जीवन में चल रहा संघर्ष तो दूसरे ही दृश्य में जेनेलिया देशमुख की कहानी दिखाते हुए फ़िल्म का सम्पदान सही लगता है. पात्रों का बंगाली या यूपी बैकग्राउंड उनकी बोलचाल, पूरी तरह से मेल कराते हुए स्क्रिप्ट को सही तरीके से लिखा गया है.
तालाब में तैरते बत्तख, इमारत के ऊपर उड़ते कबूतर, ड्रोन से दिखाया गया स्कूल, कुछ ऐसे दृश्य हैं जो साबित करते हैं कि फिल्म के छायांकन पर बेहतरीन काम किया गया है.

फ़िल्म का संगीत हमें बंगाल और उत्तर प्रदेश की याद दिलाते रहता है. जैसे मानव कौल जब उज्जैन से दिल्ली पहुंचते हैं तो चाय वाले से बातचीत के दौरान हमें तबला बजता सुनाई देता है.
'धीरे' गाना सुनने में बड़ा प्यारा है और यूट्यूब में अब तक लगभग चालीस लाख बार देखा गया है. 'गोले माले' की कोरियोग्राफी प्रभावित करती है, 'पापा सुपरहीरो' गाना लंबे वक्त तक बर्थडे पार्टियों में सुनाई दे सकता है.

फ़िल्म के संवाद भी एलेया सेन ने लिखे हैं और यह प्रभावी हैं. 'गुड़ में चीनी चिपक जाए और निकल नही पाती, देट इस प्रेम, लव' इसका उदाहरण है.
'हम बेबस हैं बेशर्म नही' और 'दफ्तर है ये मेरा चावड़ी बाजार नही है' जैसी छोटी छोटी पंक्तियां भी फ़िल्म के प्रति आकर्षित करती रहती हैं.

हिमांशु जोशी
@himanshu28may.


Sunday, July 9, 2023

'72 हूरें' वाला सपना तो हर धर्म में है, निर्देशक की मास्टरपीस है यह फिल्म.

पवन मल्होत्रा के दमदार अभिनय और अपने शानदार निर्देशन से संजय पूरन सिंह चौहान ने फिल्म '72 हूरें' से दर्शकों को नफरत का अंजाम दिखाने में कामयाबी पाई है.


ऐसे विषय को चुनना हिम्मत की बात है.

साल 2010 में आई फ़िल्म 'लाहौर' के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार जीतने वाले निर्देशक संजय पूरन सिंह चौहान '72 हूरें' के लिए भी राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार जीत गए हैं.
उन्होंने इस फ़िल्म को ऐसे विषय पर बनाया है, जिसके लिए किसी भी निर्देशक को बड़े कलेजे की जरूरत थी. इसका विषय आजकल धर्मगुरुओं के प्रभाव पर आधारित है, फिल्म में दिखाई गई कहानी आज हर धर्म की है. फ़िल्म दिखाती है कि इंसान को कोई भी निर्णय खुद लेना चाहिए, न कि इसके लिए उसे किसी व्यक्ति की बातों में आना चाहिए. यह बात उसे वक्त पर समझनी चाहिए नही तो बहुत देर हो सकती है.

72 हूरें की कहानी हाकिम और बिलाल नाम के दो फिदायीन आतंकियों की है, जिनकी आत्मा एक फिदायीन हमला करने के बाद भटक रही है. उनको मरने के बाद पता चलता है कि उन्हें फिदायीन हमला करने के बाद 72 हूरों के पास जाने का जो सपना दिखाया गया था, वह झूठा था. अपने किए हमले से प्रभावित हुए लोगों को देखते और उस पर पछतावा करते, हाकिम और बिलाल अपनी मौत के बाद अपने मृत शरीर के साथ हो रही घटनाओं को देखते हैं.

निर्देशक की मास्टरपीस है यह फिल्म.

संजय पूरन सिंह चौहान ने फ़िल्म को दर्शकों तक पहुंचाने के लिए ब्लैक एंड व्हाइट का रास्ता चुना है. हिंसा का क्रूर परिणाम दिखाने के लिए निर्देशक ने फ़िल्म में जो दृश्य रचे हैं, वह बेहद प्रभावी हैं. बम धमाके के बाद ब्लैक एंड व्हाइट दृश्य के बीच बिखरे पड़े पैर को रंगीन दिखा देना, इसका उदाहरण है. आतंकियों की आत्मा को कुड़े के ढेर के भटकता दिखाना भी निर्देशक की रचनात्मकता का नमूना है.
गाड़ी के एक्सीडेंट से पहले सामने आती गाड़ी को शीशे पर दिखाकर, निर्देशक दर्शकों को भी फ़िल्म से जोड़ देते हैं. आत्महत्या करने ट्रेन की तरफ जा रही लड़की और उसे रोकते हाकिम, बिलाल, यह वह दृश्य है जिसके जरिए निर्देशक ने फ़िल्म का सार पूरी तरह से कहने की कोशिश करी है. वह दिखाना चाहते हैं कि एक आतंकी के अंदर भी दया भावना होती है, अगर उसे सही समय पर सही रास्ता दिखाया जाए तो वह आतंक के रास्ते पर जाएगा ही नही.

पवन मल्होत्रा ने अपना पूरा अनुभव झोंक दिया है.

पवन मल्होत्रा बॉलीवुड के उन कलाकारों में हैं जो अपने जीवन के पांच-छह दशक बॉलीवुड को देते हैं पर उनके बारे में कभी इतनी चर्चा नही होती. दर्शक उनके निभाए एक या दो किरदारों को ही याद रखते हैं. हर इंसान को जिंदगी में कुछ अलग करने के लिए एक मौका तो जरूर मिलता है और 'डॉन', 'भाग मिल्खा भाग' जैसी फिल्मों में काम कर चुके पवन मल्होत्रा को अपने अभिनय जीवन के चार दशक के लंबे सफर में वह मौका इस फ़िल्म से मिला है. लंबे बाल और दाढ़ी के लुक में आतंकी हाकिम बने पवन का अपने धर्मगुरु की बातों पर अटूट विश्वास होता है, वह पूरी फिल्म में अपने किरदार में पूरी तरह डूबे हुए लगते हैं. उन्होंने आतंकी बिलाल के किरदार में दिखे आमिर बशीर के साथ फिल्म में दर्शकों को बांधे रखा है.
अपनी लाश को जलते देख निराश पवन बारिश आने पर जन्नत मिलने की उम्मीद को फिर से जिंदा होता देख नृत्य करते झूमने लगते हैं, तो वहां वह फिल्मी दुनिया के अपने सफर का सबसे शानदार पल निभाते दिखते हैं.
आमिर बशीर ने पवन मल्होत्रा के साथ निर्देशक की इस मास्टरपीस को सही से पूरा करने में कोई कसर नही छोड़ी है. उन्हें देख कर महसूस होता है कि मरने के बाद बिलाल की आत्मा अपने किए पर शर्मिंदा होती है.

तकनीकी रूप से मजबूत फिल्म.

'72 हूरें' का प्लॉट सही तरीके से तैयार किया गया है, कहानी में आ रहे मोड़ों से उसमें रोचकता बने रहती है. फ़िल्म का पटकथा लेखन सही लिखा गया है, इसके लगभग हर तकनीकी पक्ष में निर्देशक ने अपना पूरा नियंत्रण बनाए रखा है.

कार के अंदर एक जोड़ा किस कर रहा होता है और बैकग्राउंड में धमाके से सब कुछ बिखर रहा होता है, यह दृश्य स्क्रीन में देखते दर्शकों में गहरा असर पड़ता है. यही नियंत्रण फ़िल्म के सम्पदान में भी देखना को मिला है, जहां फ़िल्म को दिन के हिसाब से बांटा गया है. हाकिम और बिलाल जब दरवाज़े के दूसरी तरफ जन्नत होने के बारे में सोचकर दरवाजा खोलते हैं, इस दृश्य पर किया गया सम्पदान कार्य प्रभावित करता है.

मुंबई के खूबसूरत दृश्यों को कैमरे में एक इस तरह दिखाना था कि यह आतंकवाद पीड़ित क्षेत्र लगे, फ़िल्म का छायांकन इसमें खरा उतरा है. वहां की सुंदरता देख कर भी आपका दिल डूब सा जाएगा क्योंकि इन्हीं जगहों में आपको धमाके के बाद शरीर के बिखरे अंग दिखते हैं.
फ़िल्म का संगीत हिंसा और आतंकवाद के दर्द को महसूस करवाता है.

संवाद लिखते हुए पवन मल्होत्रा के बोले लगभग सभी संवाद पंजाबी में लिखे गए हैं और आम हिंदी दर्शक को इन्हें समझने में थोड़ी मुश्किल तो आती ही है.
'ओ किसी बेगुनाह को मार के जन्नत नही मिलनी, हूर नही मिलनी' जैसे संवाद वास्तविकता दिखाते हैं.
'न मर सकया, न जमीन मेनू कबूल करती है न आसमान, न नमाज होंदी है न कोई दुआ' फिदायीन का पछतावा दर्शकों के सामने रख देता है.

हिमांशु जोशी.
@himanshu28may

Monday, July 3, 2023

ज्योति मौर्या घटनाक्रम से सामने आया पितृसत्तात्मक समाज.

ज्योति मौर्या मामले में रोज़ नए खुलासे हो रहे हैं. पति-पत्नी, दोनों में से सही-गलत जो भी है पर अभी तक इस पूरे घटनाक्रम में जो भी हुआ है उसने हमारे पितृसत्तात्मक समाज की पोल जरूर खोल दी है. इस मामले को तूल दिए जाने के पीछे मनोवैज्ञानिक कारण भी हैं, जिन्हें समझना बहुत जरूरी है.

पंचायत राज विभाग में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी आलोक मौर्य  की ज्योति से शादी हुई. शादी के बाद पढ़ाई जारी रखते हुए ज्योति पीसीएस अधिकारी बनी और अब पति-पत्नी के बीच तीसरे व्यक्ति को लेकर विवाद हुआ तो यह मामला राष्ट्रीय खबर बन गया है. अभी इस मामले में रोज़ नए खुलासे हो रहे हैं और पति-पत्नी दोनों एक दूसरे पर लगातार आरोप लगा रहे हैं.
यह तो वक्त ही बताएगा कि पति-पत्नी में कौन सही है पर इस मामले के सुर्खियों में आने के बाद से ही सोशल मीडिया पर शादी के बाद महिलाओं की पढ़ाई को लेकर तरह-तरह की बात कही जाने लगी हैं. जिस देश में महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए सती प्रथा पर रोक, विधवा पुनर्विवाह जैसे आंदोलन हुए, वहां महिलाओं की स्वतंत्रता की वास्तविक स्थिति एक बार फिर हमारे सामने आ गई है.

घटना के बाद से महिलाओं की स्वतंत्रता को लेकर सोशल मीडिया पर सवाल उठने लगे हैं.
 मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी आया कि घटना के बाद से बहुत सी महिलाओं ने परिवार के दबाव में आकर नौकरी की तैयारी के लिए चल रही कोचिंग छोड़ दी है.

सोशल मीडिया में कुछ इस तरह की तस्वीरें वायरल हैं, घटना से जुड़ी रील्स की भी भरमार है.


ज्योति मौर्या नाम को एक गाली बना दिया गया है.

लेखक प्रतिमा सिन्हा ने ज्योति मौर्या घटनाक्रम के बाद महिलाओं को निशाना बनाए जाने पर लिखा.

(मैं ज्योति मौर्या कहूं, तुम गाली समझना।)
देश की नई गाली ईजाद हो चुकी है...ज्योति मौर्या.
कहने की जरूरत नहीं कि ये गाली औरतों के लिए रिज़र्व है. अब कोई पति अपनी पत्नी को ज्योति मौर्या नहीं बनाना चाहता. शायद कोई पत्नी भी ज्योति मौर्या नहीं बनना चाहती. आखिर चरित्र का सवाल है, स्त्री के लिए चरित्र ही सब कुछ है.

अब कोई पति भी अपनी पत्नी को एसडीएम, एडीएम, डीएम, कलेक्टर तो छोड़िए... डॉक्टर, इंजीनियर भी भूल जाइए, टीचर, क्लर्क या कलाकार कुछ नहीं बनाएगा.

इस भूल में मत रहिए कि लड़की अपनी मेहनत से कुछ बनती है. एक बार शादी हो गई तो वो पति की प्रॉपर्टी है. फिर उसे जो बनाता है, पति ही बनाता है. पति के बनाए बिना पत्नियां कुछ भी नहीं बनतीं.

सुना नहीं है क्या कि शादी के बाद पति जब इजाज़त देता है, तभी पत्नी कुछ करती है और ये इजाज़त हर बात के लिए ली जाती है.
साज, सिंगार, खाना, कपड़ा, घूमना, बोलना, उठना, बैठना, हर बात के लिए अनुमति पत्र ज़रूरी है.
पत्नी को खुशी से अनुमति पत्र देने वाले पति देवतातुल्य होते हैं. पति के समर्थन, सहयोग और योगदान के बिना पत्नी कुछ नहीं कर सकती और अगर कर लिया तो ऐसी पत्नियां चरित्रवान नहीं होतीं.
तो अब तय है कि लड़कियों का शादी के बाद कुछ भी बनना बंद.

तो लड़कियों सोच लो.
अब शादी करने और किसी के पत्नी बनने से पहले ही एसडीएम-वेसडीएम, कलेक्टर-वलेक्टर, डॉक्टर-वॉक्टर या कलाकार-वलाकार, जो बनना है, बन जाना. उसके बाद कोई चांस नहीं मिलने वाला अब.

देश में अब पत्नियों को 'ज्योति मौर्या' नहीं बनने देने का अभियान चालू हो चुका है.

इस घटना से लोगों की असलियत तो सामने आई.

दिल्ली की रहने वाली रश्मि (परिवर्तित नाम) शादी से पहले एक बड़े मीडिया संस्थान से जुड़ी थी और शादी के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी, बच्चा होने के बाद दो साल से उसकी परवरिश में लगी रश्मि अब फिर काम करना चाहती हैं और तीन महीने से वह अपने पति से इस पर बात कर रही हैं पर उन्हें अब तक काम के लिए हां नही कहा गया है. 
वर्ल्ड बैंक के आंकड़ों के अनुसार भारत में औपचारिक तौर पर पांच में से सिर्फ एक महिला काम करती है और यह आंकड़े पाकिस्तान से भी कम हैं.

महिलाओं को काम पर जाने के लिए पति की रजामंदी क्यों लेनी पड़ती है और ज्योति मौर्या से जुड़ी घटना का समाज पर क्या असर पड़ेगा, सवाल का जवाब ढूंढने के लिए स्त्री अधिकारवादी गीता गैरोला से बात की गई. उन्होंने कहा कि
कोई स्त्री पितृसत्तात्मक समाज की वर्जना को तोड़ती है तो उसका नाम बदनाम होता है. 
मैं अपने पति को डीएम बनाना चाहती थी, नही बने. कोई किसी को कुछ नही बनाता, एक स्पोर्ट सिस्टम होता है बस.
'काम करने, पढ़ने की अनुमति दी' यह वाक्य ही बहुत गहरी बात है कि औरत को अनुमति की आवश्यकता क्यों होती है! 
क्या वह घर के काम करती है, बच्चे संभालती है , उसका यही काम है! क्या इन सब कामों की कोई फीस नही होती, जो लोग कह रहे हैं कि ज्योति मौर्या के पति ने उसे पढ़ाने पर अपनी कमाई खर्च की. 
मुझे तो खुशी है कि इस घटना से लोगों की असलियत सामने आ रही है, वो एक महिला के आगे बढ़ने पर अपनी खीज निकाल रहे हैं.

पुरुषों की इस खीज के पीछे का मनोवैज्ञानिक कारण.

सोशल मीडिया पर इस तरह ज्योति मौर्या को निशाने पर लिए जाने के मनोवैज्ञानिक कारणों को जानने के लिए मनोवैज्ञानिक सत्य प्रकाश यादव से बात की गई.

उन्होंने कहा कि लोग इस घटना के बारे में ज्यादा पढ़ और बात इसलिए कर रहे हैं क्योंकि किसी भी व्यक्ति के रवैये में बदलाव के लिए तीन प्रमुख कारक प्रभाव डालते हैं और यह सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं.

पहला कारक है अतिरिक्त जानकारी की उपलब्धता. सत्य प्रकाश कहते हैं कि आजकल हम सभी सोशल मीडिया पर अधिक समय बिता रहे हैं और कहीं न कहीं हमें इससे आनंद भी मिलता है. इसी कारण हम सोशल मीडिया के माध्यम से प्राप्त किसी भी प्रकार की जानकारी पर आसानी से विश्वास कर लेते हैं. ऐसा सामाजिक मनोविज्ञान में कहा गया है कि जब हमें एक ही विषय पर अधिक से अधिक जानकारी विभिन्न माध्यमों से प्राप्त होती है तब हमारा दृष्टिकोण बदलने की संभावना अत्यधिक हो जाती है. यहां भी यही हुआ सब जगह यही पढ़ा कि एक महिला ज्योति मौर्या ने अपने पति को धोखा दिया तो लोगों ने हर महिला के बारे में यही विचार बना लिया.

 दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारक सांस्कृतिक कारक है. आज भी हमारा समाज पुरुष प्रधान है, हमारे समाज में पहले से ही एक सांस्कृतिक दृष्टिकोण है कि जब महिलाओं को अधिकार मिलते हैं तो उनका दृष्टिकोण बदल जाता है. यही वजह है कि यहां ज्योति को एक खलनायिका की तरह पेश किया गया.

 तीसरे और आखिरी कारक प्रेरक संचार में जिस प्रकार की विचारधारा सुनने वाले व्यक्तियों के लिए आकर्षक एवं मनमोहन हो और उसी प्रकार का संचार बार-बार उनके सामने आने लगे तो यह उनके दृष्टिकोण को बदल देता है. यहां बार-बार एक महिला ज्योति मौर्या की कहानी लोगों को सुनाई दे रही है तो उनके रवैये में भी बदलाव आ रहे हैं.

हिमांशु जोशी
@himanshu28may

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...