Tuesday, June 24, 2025

ईरान का परमाणु कार्यक्रम और अमेरिका पर उसका असर

ईरान का परमाणु कार्यक्रम रक्षा से अधिक आक्रामक मंसूबों और घरेलू राजनीति से प्रेरित है. शासन चरमपंथी इस्लामवाद के सहारे सत्ता को मजबूत करता है, जिसके लिए बाहरी दुश्मन की कहानी गढ़ता है. परमाणु हथियार ईरान को क्षेत्रीय अस्थिरता फैलाने और आक्रामक नीतियां थोपने की ताकत देंगे. इससे अमेरिकी नीति को नए सिरे से सोचने की जरूरत है.

परमाणु कार्यक्रम की असल मंशा

ईरान का परमाणु कार्यक्रम मध्य पूर्व की शांति और वैश्विक सुरक्षा के लिए बड़ा सवाल है. क्लिफ्टन डब्ल्यू. शेरिल की रिसर्च Why Iran Wants the Bomb and What it Means for US Policy के अनुसार यह कार्यक्रम रक्षात्मक जरूरतों से नहीं, बल्कि आक्रामक लक्ष्यों और घरेलू राजनीति से प्रेरित है. 
शासन अपनी निरंकुश सत्ता को चरमपंथी इस्लामवाद के सहारे बनाए रखता है, जिसके लिए बाहरी दुश्मन की छवि जरूरी है. परमाणु हथियार शासन को आक्रामक नीतियां चलाने और सत्ता को पक्का करने का हथियार देता है.

रक्षात्मक तर्कों का खोखलापन

ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रक्षात्मक बताने वाले दावे कमजोर हैं. शेरिल की स्टडी के मुताबिक, 2003 में सद्दाम हुसैन के पतन के बाद इराक का खतरा खत्म हो गया. सऊदी अरब, मिस्र, तुर्की या पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देश ईरान के लिए सैन्य खतरा नहीं हैं. इजरायल या अमेरिका का खतरा भी ईरान की भड़काऊ बयानबाजी से ज्यादा उपजता है. ऐसे में परमाणु हथियार शासन की आंतरिक वैधता और कथित दुश्मन की कहानी को जिंदा रखने के लिए हैं.

शासन की आंतरिक संरचना और दुश्मन की जरूरत

ईरान का इस्लामी गणतंत्र चरमपंथी शिया इस्लाम पर टिका है, जो धर्म और सत्ता को अलग करने से इंकार करता है. शेरिल के विश्लेषण में, सर्वोच्च नेता और मौलवी अल्लाह की इच्छा का दावा कर सत्ता को मजबूत करते हैं. यह शासन अमेरिका जैसे बाहरी 'दुश्मन' की कहानी गढ़कर अपनी सत्ता को सही ठहराता है. परमाणु हथियार इस कहानी को ताकत देते हैं, जिससे शासन बिना डर के आक्रामक नीतियां चला सकता है.

परमाणु ईरान का क्षेत्रीय खतरा

शेरिल की रिसर्च बताती है कि परमाणु हथियार मिलने पर ईरान की विदेश नीति और आक्रामक हो जाएगी. यह हिजबुल्लाह, हमास जैसे आतंकी समूहों को और समर्थन देगा, जिससे लेबनान या फिलिस्तीन में अस्थिरता बढ़ेगी. स्थिरता-अस्थिरता विरोध के चलते परमाणु हथियार बड़े युद्ध को रोक सकते हैं, लेकिन छोटे-मोटे संघर्ष और प्रॉक्सी युद्धों को हवा देंगे. क्षेत्रीय देश ईरान की ताकत के आगे झुक सकते हैं या परमाणु हथियारों की दौड़ में कूद सकते हैं.

प्रसार का खतरा और सुरक्षा चुनौतियां

शेरिल के पेपर के अनुसार, ईरान के परमाणु हथियार हासिल करने से सऊदी अरब, तुर्की जैसे देश भी इस दौड़ में शामिल हो सकते हैं. इससे मध्य पूर्व में हथियारों की होड़ मचेगी. आकस्मिक विस्फोट, चोरी या आतंकियों के हाथों परमाणु सामग्री पहुंचने का खतरा बढ़ेगा. इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स में चरमपंथी तत्व इस जोखिम को और गंभीर बनाते हैं. यह क्षेत्र वैश्विक अस्थिरता का केंद्र बन सकता है.

अमेरिकी नीति पर असर और चुनौतियां

शेरिल का विश्लेषण कहता है कि ईरान की आक्रामक मंशा के चलते कूटनीति से समाधान मुश्किल है. अगर ईरान परमाणु हथियारों से लैस हो जाता है, तो क्षेत्रीय अस्थिरता और आतंकवाद बढ़ेगा, जिससे अमेरिकी प्रभाव कमजोर पड़ सकता है. अमेरिका को मध्य पूर्व नीति पर नए सिरे से विचार करना होगा. कूटनीति के अलावा निवारक उपाय, रोकथाम या सैन्य कार्रवाई जैसे कठोर कदमों पर सोचना पड़ सकता है, जिनका अपना अलग जोखिम है.

Wednesday, June 18, 2025

मास्टरजी जैसे जैसे चालक कुचालक के बारे में बता रहे थे वैसे वैसे लता क्लास में बैठी हुई दिन में ही आईटीआई पढ़ने के सपने देख रही थी। खंडहरनुमा क्लास के दरवाजे से अंदर घुसते ही पहली बेंच पर ही हरे रंग की कुर्ती और सफेद पजामा, दुप्पटा पहनी लता क्लास की बाकी लड़कियों से अलग थी। उसके कंधे तक के बाल रबर से बंधे हुए रहते थे और कपड़े हमेशा प्रेस किए होते थे।

'झट हिट यार, मिके गोरुन पानी ले पिलान छु' स्कूल से छुट्टी होने के बाद बिच्छू घास के बीच में दिख रही सीमेंट की पगडंडी पर चढ़ाई करती हीरा ने लता से कहा। कमर में हाथ रखे, हांफते हुए दो किलोमीटर की चढ़ाई के बाद नरेत गांव की सड़क से लता के घर की छत लगी हुई थी।

Monday, June 16, 2025

खाकी के पीछे का इंसान: अशोक कुमार की आत्मकथा

खाकी के पीछे का इंसान: अशोक कुमार की आत्मकथा

अशोक कुमार की आत्मकथा 'खाकी के पीछे का इंसान' पुलिस की चुनौतियों और समाज के साथ उनके जटिल रिश्ते को संवेदनशीलता से उजागर करती है. यह किताब पुलिस के मानवीय पक्ष को दर्शाते हुए सामाजिक सच्चाइयों पर गहरा चिंतन प्रस्तुत करती है.

परिचय और किताब का आकर्षण

यदि आप साहित्यिक कृति या राजनीतिक विचारधारा को बदलने वाली किताब की तलाश में हैं, तो यह आपके लिए नहीं है. लेकिन अगर आप पुलिस की वास्तविक जिंदगी और समाज के साथ उसके जटिल रिश्ते को समझना चाहते हैं, तो उत्तराखंड पुलिस के पूर्व डीजीपी अशोक कुमार की यह आत्मकथात्मक किताब आपके लिए है. उनकी डायरी के पन्नों से निकली यह रचना आपको घंटों बांधे रखेगी. लेखक ने वी.सी. गोयल की 'द पावर ऑफ इथिकल पुलिसिंग' से प्रेरणा ली और हिंदी लेखक लक्ष्मण सिंह बटरोही की मदद से इसे साहित्यिक रूप दिया. यह किताब इतनी जीवंत है कि इससे एक दमदार हिंदी फिल्म बन सकती है, जो किसी भी काल्पनिक दबंग कहानी से कहीं अधिक प्रभावशाली होगी.

लेखक का सफर और किताब की संरचना

गांव से निकलकर आईआईटी तक का सफर तय करने वाले अशोक कुमार ने समाज में अमीर-गरीब की खाई को पाटने के लिए सिविल सर्विस को चुना. इस किताब में उन्होंने अपनी नौकरी के अनुभवों को सोलह हिस्सों में बांटा है, जो उनकी शुरुआती चुनौतियों से लेकर समाज के लिए समर्पण तक की कहानी बयान करते हैं. हर अध्याय की शुरुआत किसी कविता, गद्य या डायरी की पंक्तियों से होती है, जो पाठक को यह संकेत देती है कि आगे क्या आने वाला है. उदाहरण के लिए, भूमाफियाओं पर तंज कसने के लिए टॉल्स्टॉय की कहानी के किरदार पाहोम का जिक्र किया गया है, जो किताब की साहित्यिक गहराई को दर्शाता है.

 सामाजिक मुद्दों का चित्रण

यह किताब केवल पुलिस की कहानी नहीं, बल्कि समाज की कड़वी सच्चाइयों का भी चित्रण है. लेखक ने अपहरण, सामूहिक बलात्कार, और महिलाओं के प्रति अपराध जैसी घटनाओं को संवेदनशीलता से उभारा है. एक घटना में पंचायत के आदेश पर सोलह लोगों द्वारा महिला के साथ किए गए अत्याचार का वर्णन तालिबानी मानसिकता को उजागर करता है. साथ ही, रक्तदान जैसी सामाजिक भ्रांतियों को दूर करने का संदेश भी दिया गया है. लेखक की भाषा कभी साहित्यिक है, 'हाड़-मांस का इंसान बैलों की जगह जुतता है', तो कभी रोजमर्रा की, 'अधिकारी बनकर तने रहोगे तो कुछ नहीं सीख पाओगे' जो पाठक के दिल को छूती है.

पुलिस और समाज का रिश्ता

लेखक ने उत्तराखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आतंकवाद को खत्म करने के अपने अनुभव साझा किए हैं, जो पुलिस और जनता के सहयोग की अहमियत को रेखांकित करते हैं. आतंकवादियों के परिवारों पर पुलिस कार्रवाई का प्रभाव और शहीद पुलिसकर्मियों के परिवारों की भावनाएं किताब में भावुकता के साथ उभरती हैं. हरिद्वार और मथुरा की कहानियां पुलिस की समाज में भूमिका को रोचकता के साथ स्पष्ट करती हैं. लेखक 'सड़क पर पड़ रही डकैती' जैसे वाक्यांशों से व्यवस्था पर तंज कसते हैं, जो उनकी लेखन कला को और प्रभावी बनाता है.

निष्कर्ष और पाठक के लिए संदेश

यह किताब पुलिस को भ्रष्ट कहने वालों के सामने पुलिस का पक्ष रखती है, इसके लिए पुलिस की कठिन ड्यूटियों और उनके ऊपर के राजनीतिक दबावों को उजागर किया गया है. यह आपको बिकरू कांड से लेकर थाने-चौकियों के चक्कर तक की याद दिलाएगी. वह खाकी, जिससे लोग दूरी बनाते हैं, लेकिन जिसकी जरूरत हर किसी को पड़ती है, उसे समझने के लिए यह किताब जरूरी है. यह न केवल पुलिस की जिंदगी को करीब से दिखाती है, बल्कि समाज के प्रति आपके नजरिए को भी बदल सकती है. इसे पढ़ें और उस इंसान को जानें, जो वर्दी के पीछे छिपा है.
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Sunday, June 15, 2025

मेरे हिस्से की अस्कोट आराकोट यात्रा: लुप्त होती लोहारी की कला

लोहार पीढ़ियों से किसानों के लिए औज़ार बनाते रहे हैं, जिनके बिना खेती का काम अधूरा था। लेकिन आधुनिक मशीनों, बदलते समय और नई पीढ़ी की उदासीनता ने इस पारंपरिक शिल्प को संकट के कगार पर ला खड़ा किया है।

*मुल्तान से भारत तक की यात्रा*

उत्तराखंड के रुड़की से लगभग 20 किलोमीटर दूर, मानक मजरा गांव में जाहिद हसन और उनके भाई वाजिद हसन रहते हैं। पिछले साल, अस्कोट आराकोट यात्रा से लौटते वक्त रुड़की के पास चुड़ियाला गांव में एक मित्र से मिलने जाते हुए डाडा जलालपुर में जाहिद अपनी छोटी-सी दुकान पर बैठे दिखे। उनकी दुकान के बाहर लोहे की ठक-ठक और भट्टी की आग की गर्माहट ने ध्यान खींचा और उनसे बातचीत के लिए रुकना जरूरी लगा।

जाहिद बताते हैं कि वे मिर्जा समुदाय से हैं और उनका परिवार कई पीढ़ियों से लोहारी का काम करता आया है। उनके दादा, मोहम्मद हसन, अपने भाई रज्जाक के साथ 1947 के भारत-पाकिस्तान बंटवारे के दौरान मुल्तान से भारत आए थे। उस दौर में अशांति और अनिश्चितता के बीच उन्होंने नई जिंदगी शुरू करने का फैसला किया। जाहिद बताते हैं कि लाहौर में बसे उनके कुछ रिश्तेदार शुरुआती वर्षों में उनसे मिलने आते थे, लेकिन समय के साथ यह सिलसिला धीरे-धीरे थम गया।

जाहिद के अनुसार, बंटवारे के समय मानक मजरा में लोहारों की कमी थी। गांव के मुखिया चतरू ने उनके परिवार की मदद की और उन्हें बसने के लिए जमीन का पट्टा दिया। यह मदद उनके लिए नई शुरुआत का आधार बनी। जाहिद और वाजिद ने अपने पिता अब्दुल हमीद से लोहारी की कला सीखी, जो न केवल एक पेशा था, बल्कि उनके परिवार की पहचान और विरासत का हिस्सा था।

*लोहारी की कला और उसकी प्रक्रिया*

जाहिद और वाजिद का काम किसानों की रोजमर्रा की जरूरतों के इर्द-गिर्द घूमता है। वे दरांती, खुरपा और पाटल जैसे औज़ार बनाते हैं, जो खेती, फसल कटाई और पेड़ काटने जैसे कार्यों में इस्तेमाल होते हैं। इसके अलावा, पुराने औज़ारों में धार लगाने का काम उनकी आय का एक बड़ा हिस्सा है। जाहिद बताते हैं कि पहले ये औज़ार हर किसान के घर की जरूरत हुआ करते थे, लेकिन अब इनकी मांग सीमित हो गई है।

जाहिद अपनी दुकान के सामने बने एक गड्ढे की ओर इशारा करते हैं, जहां कोयला जलाया जाता है। इस कोयले को जलाने के लिए वे एक खास हवा देने वाली मशीन का इस्तेमाल करते हैं। यह मशीन दो तरह की होती हैं, एक पारंपरिक, जो हाथ से चलती है और दूसरी आधुनिक, जो बिजली से संचालित होती है। औज़ार के प्रकार के आधार पर वे कबाड़ी से विशेष लोहा खरीदते हैं। उदाहरण के लिए, पाटल बनाने के लिए चौड़े और मजबूत लोहे की जरूरत होती है, जबकि दरांती के लिए पतला और तेज धार वाला लोहा चुना जाता है।

कोयला वे स्थानीय लकड़ी की भट्टियों से 20 रुपये प्रति किलो की दर से खरीदते हैं। एक महीने में करीब 50 किलो कोयला खप जाता है, जो उनके काम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। भट्टी में लोहा गर्म होता है और फिर हथौड़े की ठक-ठक के साथ वह औज़ार का आकार लेता है। यह प्रक्रिया देखने में जितनी सरल लगती है, उतनी ही कौशल और मेहनत मांगती है। जाहिद कहते हैं कि इस काम में धैर्य और अनुभव की जरूरत होती है, जो केवल वर्षों की मेहनत से आता है।

*बदलता बाजार और आर्थिक चुनौतियां*

पिछले दो दशकों में लोहारी के पेशे में भारी बदलाव आया है। जाहिद बताते हैं कि 20 साल पहले एक पाटल 120 रुपये में बिकता था, जो अब 250 रुपये में बिकता है। कोयले की कीमत भी 6-7 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 20 रुपये हो गई है। दरांती, जो पहले 20 रुपये में बिकती थी, अब 50 रुपये की हो गई है। लेकिन कीमतों में इस बढ़ोतरी के बावजूद, मांग में भारी कमी आई है।

जाहिद इसका कारण समझाते हुए कहते हैं कि पहले खेती पूरी तरह हस्तनिर्मित औज़ारों पर निर्भर थी। फसल कटाई के मौसम में 200-300 दरांतियां आसानी से बिक जाया करती थीं। लेकिन अब आधुनिक मशीनों, जैसे ट्रैक्टर और हार्वेस्टर, के आने से यह संख्या घटकर 100-150 रह गई है। खुरपे की स्थिति और भी चिंताजनक है। पहले महीने में 100-150 खुरपे बिकते थे, लेकिन अब केवल 20-30 ही बनाए और बिकाए जाते हैं। केवल छोटे किसान, जिनके पास मशीनों के लिए संसाधन नहीं हैं, अब ये औज़ार खरीदते हैं।

आज उनकी आय का अधिकांश हिस्सा पुराने औज़ारों की मरम्मत और धार लगाने से आता है। जाहिद कहते हैं कि यह काम उन्हें घर का राशन चलाने लायक आय देता है, लेकिन यह उनके परिवार की बढ़ती जरूरतों के लिए पर्याप्त नहीं है।

*लोहारी का भविष्य अधर में*

जाहिद को डर है कि उनका यह पुश्तैनी पेशा अगले 10-20 सालों में शायद पूरी तरह खत्म हो जाए। वे कहते हैं कि मशीनों ने न केवल खेती के तरीकों को बदल दिया है, बल्कि पशुपालन में कमी ने भी घास काटने की जरूरत को कम कर दिया है। नतीजतन, दरांती और खुरपे जैसे औज़ारों की मांग दिन-ब-दिन सिकुड़ रही है। 

इस बदलते दौर में जाहिद के बच्चे इस पेशे को अपनाने में रुचि नहीं दिखाते। उनका एक बेटा इलेक्ट्रिशियन बन चुका है, जो आधुनिक तकनीक के साथ अपने भविष्य को सुरक्षित करना चाहता है। उनका दूसरा बेटा नौवीं कक्षा में पढ़ रहा है और शायद वह भी कोई नया रास्ता चुनेगा। 

*एक विरासत का अंत?*

लोहारी का यह शिल्प न केवल एक पेशा है, बल्कि एक समुदाय की पहचान और इतिहास का हिस्सा है। लेकिन आधुनिकीकरण और बदलते बाजार ने इसे किनारे कर दिया है। जाहिद और वाजिद जैसे शिल्पकार आज भी अपनी कला को जीवित रखने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन भविष्य अनिश्चित है। क्या यह कला केवल कहानियों में सिमट जाएगी, या कोई नया रास्ता इसे बचा पाएगा? यह सवाल समय के साथ ही जवाब देगा।

 हिमांशु जोशी

सीधे गांव से: वजूद खोते शिल्पकार

'लोहार' पीढ़ियों से किसानों के औजार बनाते आए हैं. आधुनिक मशीनों और बदलते समय ने उनके पेशे को चुनौती दी है.

मुल्तान के लोहार हिंदुस्तान में कब बसे

जाहिद हसन और उनके भाई वाजिद हसन उत्तराखंड के मानक मजरा गांव में रहते हैं. यह रुड़की से करीब 20 किलोमीटर की दूरी पर है. जाहिद कहते हैं कि वे मिर्जा जाति से हैं और उनका परिवार पीढ़ियों से लोहार का काम करता आया है. उनके दादा का नाम मोहम्मद हसन था और वे अपने भाई रज्जाक के साथ 1947 के बंटवारे के दौरान मुल्तान से भारत आए थे. लाहौर से उनके रिश्तेदार कुछ सालों तक यहां आते रहते थे, लेकिन समय के साथ यह सिलसिला थम गया.

जाहिद कहते हैं, बंटवारे के दौर में मानक मजरा में लोहारों की कमी थी, जिसके चलते गांव के प्रधान चतरू ने उनके परिवार को घर के लिए ज़मीन के पट्टे देकर बसने में मदद की. जाहिद और उनके भाई वाजिद ने अपने पिता अब्दुल हमीद से लोहारी का हुनर सीखा है.

लोहारी का शिल्प और तकनीक

जाहिद और वाजिद का काम किसानों की ज़रूरतों के इर्द-गिर्द घूमता है.
जाहिद कहते हैं कि वे दरांती, खुरपा और पाटल जैसे औजार बनाते हैं, जो खेती और पेड़ काटने के काम आते हैं. इसके अलावा, वे पुराने लोहे के औजारों में धार लगाने का काम भी करते हैं, जो उनकी आय का मुख्य ज़रिया है.

जाहिद, दुकान के आगे बना गड्ढा दिखाते हुए कहते हैं कि इस गड्ढे में कोयला डाला जाता है. कोयले को जलाने के लिए वे हवा देने वाली मशीन का इस्तेमाल करते हैं. यह मशीन दो तरह की आती है — एक मशीन हाथ से चलती है और दूसरी बिजली से.
औजार के आकार के हिसाब से वे कबाड़ी से खास तरह का लोहा खरीदते हैं, जैसे पाटल के लिए चौड़ा और मज़बूत लोहे का टुकड़ा लिया जाता है.
कोयला वे लकड़ी की भट्टियों से 20 रुपये प्रति किलो की दर से खरीदते हैं, और एक महीने में करीब 50 किलो कोयला खप जाता है.
भट्टी की आग में लोहा तपता है और हथौड़ों की ठक-ठक से वह औजार का रूप लेता है.

बदलता बाज़ार और आर्थिक चुनौतियाँ

पिछले दो दशकों में इस पेशे में बड़ा बदलाव आया है.
जाहिद कहते हैं कि बीस साल पहले एक पाटल 200 रुपये में बिकता था, वह अब 250 रुपये का हो गया है. कोयले की कीमत भी 6-7 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 20 रुपये हो गई है. 20 रुपये में बिकने वाली दरांती अब 50 रुपये में बिकती है.


कीमतों में इस बढ़ोतरी के बावजूद, सामान की मांग में भारी कमी आई है. इसका कारण बताते हुए जाहिद कहते हैं कि पहले खेती का सारा काम हाथ से होता था, जिसके कारण फसल कटाई के मौसम में 200-300 दरांतियां आसानी से बिक जाती थीं. अब मशीनों के आने से यह संख्या घटकर 100-150 रह गई है.


खुरपे की स्थिति और भी खराब है. पहले 100-150 खुरपे महीने में बिकते थे, अब सिर्फ 20-30 ही बनते और बिकते हैं. केवल छोटे खेत वाले किसान ही अब ये औजार खरीदते हैं. घर का राशन खरीदने लायक आय का मुख्य हिस्सा औजारों की मरम्मत से आता है.

लोहारों का वजूद ही खत्म हो जाएगा

जाहिद को लगता है कि उनका यह पुश्तैनी पेशा अगले 10-20 साल में शायद खत्म हो जाएगा. वे कहते हैं, मशीनों ने खेती के तरीकों को बदल दिया है और पशुपालन में कमी के कारण घास काटने की ज़रूरत भी घट रही है. दरांती और खुरपे जैसे औजारों की मांग दिन-ब-दिन सिकुड़ती जा रही है. इस बदलते दौर में उनके बच्चे इस पेशे को अपनाने के इच्छुक नहीं हैं. उनका एक लड़का इलेक्ट्रिशियन है, तो एक अभी नौवीं कक्षा में पढ़ रहा है.

Saturday, June 14, 2025

‘चोकर्स’ से ‘चैंपियंस’ तक: WTC फाइनल 2025 में साउथ अफ्रीका की ऐतिहासिक जीत

ग्रीम स्मिथ, एबीडी विलियर्स और शॉन पोलक के लिए लॉर्ड्स में उनकी मौजूदगी में साऊथ अफ्रीका की ये जीत उनकी जीवन यात्रा का एक चक्र पूरा होना जैसा था. 15 जून 2025 को अपने देशवासियों के साथ ये तीनों भी जश्न मना रहे थे, जब लॉर्ड्स के मैदान पर काइल वेरेयने ने मिशेल स्टार्क की गेंद पर कवर ड्राइव लगाकर विजयी रन बनाया. यह रन सिर्फ 282 रनों के लक्ष्य को पूरा करने वाला शॉट ही नहीं था बल्कि यह सालों की मेहनत और हारों से सीख का जश्न था. एबीडी विलियर्स के लिए तो यह साल खास रहा है, आरसीबी के बाद अब दक्षिण अफ्रीका ने चैंपियन बनकर 'MR 360' के हर सपने को पूरा कर दिया है.

ऑस्ट्रेलिया को 5 विकेट से हराकर साउथ अफ्रीका ने पहली बार वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप (WTC) की ट्रॉफी जीती. कगिसो रबाडा, टेम्बा बवुमा, लुंगी एनगिडी, और एडन मार्कराम ने मिलकर जीत की एक ऐसी कहानी लिखी, जो हर क्रिकेट फैन के दिल में बस गई. लॉर्ड्स की बालकनी पर बवुमा ने अपने दोनों हाथों से मुंह ढका हुआ था, इस प्रतिक्रिया ने उस कसक को बयां किया, जो सालों की निराशाओं के बाद इस जीत में बदल गई. 

संघर्ष ही करती रहा साउथ अफ्रीका क्रिकेट 
  
साउथ अफ्रीका का क्रिकेट इतिहास हमेशा से ही चुनौतियों से भरा है. साल 1970 में रंगभेद नीतियों के कारण उन्हें क्रिकेट से बाहर किया गया था, 1991 में वापसी के बाद 1992 विश्व कप में बारिश और डकवर्थ-लुइस नियम ने सेमीफाइनल में इंग्लैंड के खिलाफ जीत छीन ली. 

इसके बाद साल 1999 के सेमीफाइनल में लांस क्लूजनर और एलन डोनाल्ड का रन-आउट होना, टाई के बावजूद हार बन गया. 2003 में अपने घर में श्रीलंका के खिलाफ मार्क बाउचर की डकवर्थ-लुइस गलती ने विश्व कप से बाहर किया. 2011 और 2015 में न्यूजीलैंड से हार और 2024 में भारत से T20 विश्व कप फाइनल में 7 रन की हार ने उन्हें दबाव में टूटने की छवि दी. 

WTC में बदल गई किस्मत

11-14 जून 2025 को लॉर्ड्स में खेले गए WTC फाइनल में साउथ अफ्रीका ने टॉस जीतकर पहले गेंदबाजी चुनी.
 ऑस्ट्रेलिया ने पहली पारी में मैक्स वेस्टर के 72 और स्टीव स्मिथ के 66 रनों की मदद से 212 रन बनाए, जिसके जवाब में दक्षिण अफ्रीका की टीम सिर्फ 138 रन पर सिमट गई. पैट कमिंस ने 6 विकेट लेकर अफ्रीका को बैकफुट पर धकेला. दूसरी पारी में ऑस्ट्रेलिया 207 रन ही बना सकी, जहां कगिसो रबाडा ने 4 और लुंगी नगीदी ने 3 विकेट लेकर मैच में दक्षिण अफ्रीका की वापसी कराई. 282 रनों के मुश्किल लक्ष्य का पीछा करते हुए एडेन मार्कराम ने नाबाद 136 रनों की ऐतिहासिक पारी खेली और कप्तान टेम्बा बावुमा ने 66 रनों का योगदान दिया. काइल वेरेयने ने मिशेल स्टार्क की गेंद पर कवर ड्राइव लगाकर विजयी रन बनाया.

 शांत नेतृत्व का चमकता सितारा बावुमा

आपका लेख पहले से ही काफी सधा हुआ है और भावनात्मक रूप से प्रभावशाली है। इसमें कुछ मामूली व्याकरण और वाक्य संरचना संबंधी सुधार किए जा सकते हैं ताकि भाषा और प्रवाह और भी बेहतर हो जाए। नीचे सुधार किया गया संस्करण प्रस्तुत है:


शांत नेतृत्व का चमकता सितारा: बावुमा

साउथ अफ्रीका के पहले अश्वेत टेस्ट कप्तान टेम्बा बावुमा, WTC फाइनल 2025 में टीम की ऐतिहासिक जीत के असली नायक साबित हुए. फाइनल की दूसरी पारी में, जब मैच निर्णायक मोड़ पर था और साउथ अफ्रीका को अपने कप्तान से एक जिम्मेदार पारी की दरकार थी, तब उनकी 46 रन की संयमित बल्लेबाज़ी और एडन मार्कराम के साथ 100 रनों से ज़्यादा की साझेदारी ने 282 रन के लक्ष्य का पीछा आसान बना दिया.

फाइनल के तनावपूर्ण माहौल में भी बावुमा पूरी तरह शांत और स्थिर नज़र आए. दिलचस्प बात यह है कि बावुमा को विश्व क्रिकेट में कभी बड़ा सितारा नहीं माना गया. उन्होंने आज तक एक भी IPL मैच नहीं खेला है. अपनी कदकाठी और स्ट्राइक रेट को लेकर वे सोशल मीडिया पर कई बार मज़ाक का विषय भी बने, लेकिन उन्होंने बार-बार यह दिखाया है कि क्रिकेट की असली चमक लाल गेंद के लंबे प्रारूप में ही नज़र आती है.

बावुमा ने एक ऐसे समाज में, जो दशकों तक रंगभेद से जूझता रहा है, वहां एकजुटता, आत्मविश्वास और नए नेतृत्व का एक प्रेरणादायक अध्याय लिखा है.

Friday, June 13, 2025

'सोने की चिड़िया’: अतीत की महिमा बनाम आलोचनात्मक दृष्टि

'सोने की चिड़िया’ एक प्रेरक लेकिन एकतरफा किताब है. यह भारत के अतीत से जुड़ाव का भाव तो देती है, परंतु उससे जुड़े जटिल ऐतिहासिक, सामाजिक और आर्थिक पहलुओं का गहराई से विश्लेषण नहीं करती. यह पुस्तक उन पाठकों के लिए उपयोगी है जो भारत के इतिहास, परंपराओं और राष्ट्रगौरव में रुचि रखते हैं, परंतु गंभीर शोधार्थियों को इससे अधिक पुष्ट स्रोतों की आवश्यकता पड़ेगी.


‘सोने की चिड़िया’ (प्रभात प्रकाशन) श्री अनीश और अरुण आनंद द्वारा लिखित सात लेखों का ऐसा संकलन है, जो भारत के अतीत की सांस्कृतिक, आर्थिक और बौद्धिक समृद्धि की याद दिलाता है. यह पुस्तक प्राचीन भारत की शिक्षा, कृषि, कपड़ा उद्योग और सांस्कृतिक परंपराओं की झलक देते हुए औपनिवेशिक दुष्प्रभावों की भी पड़ताल करती है. लेखकों का प्रयास है कि पाठक अपने अतीत की महिमा से प्रेरणा लें और भविष्य के लिए आत्मगौरव से भरी सोच विकसित करें.

 *स्वर्णयुग की छाया में*

पुस्तक के आरंभिक लेख भारत की आर्थिक समृद्धि की चर्चा करते हैं. उदाहरणस्वरूप, ‘बुनी हवा’ लेख में 1851 के दौरान मलमल की एक गज कीमत को 50 से 400 पाउंड बताया गया है, यह आँकड़ा कपड़ा उद्योग की वैश्विक प्रतिष्ठा को रेखांकित करता है. लेखकों का यह दृष्टिकोण भारत को एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में पुनः कल्पित करने का आग्रह करता है.

लेखों की भाषा सरल और सहज है, जिससे सामान्य पाठक जुड़ सकता है. प्रत्येक लेख प्रभावशाली उद्घाटन व प्रेरक निष्कर्ष के साथ समाप्त होता है. तथापि, यह शैली कभी-कभी प्रचारात्मक रूप ले लेती है, जहाँ तथ्यों की पुष्टि का अभाव आलोचनात्मक पाठकों को खटक सकता है.

*गौरवशाली उद्योग की चुनौतियाँ*

‘बुनी हवा’ न केवल ऐतिहासिक संदर्भ देता है, बल्कि वर्तमान में कपड़ा उद्योग की संभावनाओं पर भी रोशनी डालता है. लेखक लिखते हैं, 'ब्रिटिश लूट के बाद भी हमारे पास 136 प्रकार की बुनाई की विधियाँ आज भी जीवित हैं.' यह सांस्कृतिक जीवटता भारत के लिए संभावनाओं का संकेत है. हालांकि, यह लेख इस बात की गहराई में नहीं जाता कि समकालीन वैश्विक बाजार और उपभोक्ता संस्कृति में भारत की बुनाई परंपराएँ कैसे पुनर्स्थापित हो सकती हैं.

*कृषि ज्ञान: जड़ों से भविष्य तक*

‘धरती पुकारे’ लेख में ‘वृक्षायुर्वेद’ जैसे ग्रंथों के उल्लेख द्वारा यह दर्शाया गया है कि भारतीय कृषि केवल श्रम आधारित न होकर वैज्ञानिक रूप से उन्नत थी. परंतु यह लेख भी आधुनिक संदर्भों में कृषि-नीतियों, जलवायु संकट या किसानों की आत्महत्या जैसे ज्वलंत विषयों को छूने से बचता है. लेख में एक सतही समाधान प्रस्तुत किया गया है कि प्राचीन ज्ञान को अपनाकर आज की समस्याओं को सुलझाया जा सकता है, परंतु यह कथन बिना ठोस नीति सुझावों के अधूरा लगता है.

*उपनिवेशवाद का कड़वा सच*

‘लूट’ और ‘बोधशाला’ जैसे लेखों में औपनिवेशिक शोषण और भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था का वर्णन किया गया है. लेखकों का दावा है कि 'ब्रिटिशों ने भारत से लगभग 45 खरब डॉलर लूटे' और 'नालंदा, अल-अजहर व बोलोना से पाँच शताब्दी पुराना विश्वविद्यालय था.',  यह बातें गर्व तो जगाती हैं, परंतु गंभीर इतिहासकार इन आंकड़ों की पुष्टि की मांग करेंगे. विशेषतः ‘एल्यूमिनियम के बरतनों से कैंसर फैलाने’ जैसी बात बिना स्रोत के प्रस्तुत की गई है, जिससे पुस्तक की प्रामाणिकता संदिग्ध हो सकती है.

*संस्कृति और विज्ञान: संतुलन की ज़रूरत*

‘सांस्कृतिक धरोहर’ लेख में नमस्ते, उपवास, तुलसी, और गंगा की महिमा के पीछे वैज्ञानिक तर्क देने का प्रयास किया गया है. जैसे, 'नमस्ते करने से तंत्रिकाओं पर दबाव पड़ता है और ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है.' इस तरह के तर्क परंपरा को वैज्ञानिक समझ से जोड़ने की कोशिश करते हैं, परंतु इनमें कभी-कभी ‘पौराणिकता में वैज्ञानिकता’ थोपने की प्रवृत्ति दिखती है.

*वैचारिक झुकाव और आलोचनात्मक संतुलन*

पुस्तक का समग्र स्वर राष्ट्रवादी पुनर्जागरण से प्रेरित है, जो आज के सामाजिक-राजनीतिक विमर्श में सामान्य है. यह दृष्टिकोण अपने आप में अनुचित नहीं, परंतु जब इतिहास को प्रेरणास्रोत के रूप में प्रस्तुत किया जाए तो उसके तथ्यों की प्रामाणिकता और आलोचनात्मक दृष्टि और अधिक अनिवार्य हो जाती है.

पुस्तक में संदर्भ सूची, नोट्स या ग्रंथ-सूची नहीं है और यह कमी इसे अकादमिक रूप से कमजोर बनाती है. हालाँकि, यह पुस्तक एक आम पाठक के लिए राष्ट्रबोध और सांस्कृतिक जागरूकता का एक प्रभावी प्रवेशद्वार बन सकती है.

हिमांशु जोशी

Sunday, June 8, 2025

'ये मन बंजारा रे' : यात्रा, समाज और आत्म-खोज की अनूठी दास्तान

संभावना प्रकाशन से प्रकाशित गीता गैरोला की किताब 'ये मन बंजारा रे' एक यात्रा वृत्तांत से कहीं अधिक है. यह सामाजिक ढांचे, पर्यावरण, लैंगिक असमानता और सांस्कृतिक विरासत पर गहरे विचारों का संग्रह है.

सामाजिक ढांचे को चुनौती देती यात्रा

"मैं उन सब में बड़ी शादीशुदा होने की सामाजिक सुरक्षा वाले हथियार से लैस थी.",  'ये मन बंजारा रे' के आरंभ में गीता गैरोला की यह टिप्पणी यात्रा में स्त्रियों के लिए एक अदृश्य 'सुरक्षा कवच' की ओर इशारा करती है. किताब में लेखिका बार-बार यह दिखाती हैं कि पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं को किस तरह इन प्रतीकात्मक सुरक्षा ढालों की आड़ में आज़ादी मिलती है और किस तरह यह व्यवस्था खुद में एक विडंबना है.

 'नन्दा भी तो औरत ही है, माई जी और औरत होने के नाते उसको भी जरूर माहवारी होती होगी. एक औरत का इतना सम्मान और दूसरी तरफ जीती जागती औरतों के लिए यात्रा को वर्जित करना कहाँ का न्याय है.', जैसी टिप्पणी से वह धार्मिक और सामाजिक ढांचे की उस विसंगति को भी उजागर करती हैं जहां स्त्रियों के लिए कई प्रतिबंध हैं जबकि देवी की पूजा में उन पर आस्था रखी जाती है. 

पहाड़ के संसाधनों के दोहरे चित्र

यह किताब पहाड़ के संसाधनों का उचित प्रयोग नहीं कर पाने का दस्तावेज भी है. पृष्ठ संख्या 16 में लिखा है 'अरे भूली कौन आता है यहाँ माल्टे खरीदने.' 'मुझे अचानक याद आया कि उद्यान विभाग फलों से जूस, अचार बनाना भी सिखाता है. इस बारे में उस वक्त वहां के दुकानदारों को कोई जानकारी नहीं थी.' इस तरह लेखिका दिखाती हैं कि पहाड़ के लोग अपने संसाधनों की संभावनाओं से अक्सर अनभिज्ञ ही रह जाते हैं. नीति-निर्माण और स्थानीय विकास के बीच जो दूरी है, वह यहां स्पष्ट झलकती है. 

किताब पहाड़ के आर्थिक आत्मनिर्भरता के सवाल को भी मजबूती से उठाती है.

हिमालयी यात्राओं की सजीव झलकियां

 'ये मन बंजारा रे' में लेखिका यात्रा का सलीका पाठकों के सामने रखती हैं. पृष्ठ 21 में उन्होंने लिखा है 'गर्म कपड़े, कैमरे के सैल, दो जोड़ी मोजे, विंडचिटर, टोपी, कुछ बेसिक दवाइयां, बोरोलीन, पानी का गिलास वाला फिल्टर, सुई धागे की रील, एक बड़ी पॉलीथिन शीट और एक डिबिया में नमक, सब चीजें याद कर के पिट्ठू में रख दी.' हिमालय की अधिकतर यात्राओं पर लिखी यह किताब एक तरीके से हिमालय भ्रमण के लिए गाइड बुक भी है. जैसे इसमें लिखा है 'चढ़ाई चढ़ने के साथ सूरज हिम श्रृंखलाओं को अपनी लाली से रंगने लगा था. यह अक्टूबर का महीना था इस वक्त हिमालय दर्शन अवर्णनीय होता है.'

राजजात यात्रा पहली बार पूरी करने वाली पाँच महिलाओं में शामिल गीता गैरोला ने पहाड़ों की कठिन यात्रा और उनमें जाने का जज्बा लेखक के शब्दों से किताब में कई जगह झलका है. वह लिखती हैं 'कुलसारी तक पहुंचते तीन जगह सड़क सड़क पूरी तरह टूटी थी. चलने का रास्ता भी सड़क के साथ गायब हो गया था.' ज्यूरांगली जैसी कठिन पहाड़ी पर चढ़ने उतरने के बाद वह लिखती हैं 'आज मैं कह सकती हूं स्त्रियाँ चाहें तो अपने लिए कुछ भी करने के लिए समर्थन जुटा सकती हैं.'

परंपरा, लोक संस्कृति और मेलों का दस्तावेज

किताब में बहुत-सी जगह उत्तराखंड के मेलों की जानकारी और उनका इतिहास लिखा गया है. उत्तराखंड की कई महत्वपूर्ण जगह और यात्राओं का वर्णन भी उन्होंने आसान भाषा में दिया है. 'गढ़वाल के चमोली जिले में नन्दा देवी की जात यूँ तो हर साल होती है पर बारहवें साल में की जाने वाली जात को राजजात (राजयात्रा) कहा जाता है.'


सेवादास के बारे में किताब में लिखा है 'वे ढोलसागर पवाड़ों (ऐतिहासिक लोक गाथाएं) के गहन ज्ञाता थे. हमें अपनी क्षेत्रीय प्रतिभाओं की पहचान कर कद्र करने की समझ कब आएगी? हमारे पहाड़ों में जाने कितने ऐसे रत्न अनचीन्हे रह जाते हैं और उनकी विद्या भी उनके साथ ही समाप्त हो जाती है. विज्ञान के युग में अपनी परंपरागत प्रतिभाओं को रिकॉर्ड तक ना कर पाना हमारी पीढ़ी के लिए शर्मनाक ही कहा जाएगा.'

स्त्री चेतना और पितृसत्ता पर प्रहार

किताब पढ़ते हुए हम गीता गैरोला को भी अपने जीवन में यात्राओं से परिवर्तन लाते देखते हैं. वह पितृसत्ता को चुनौती देती दिखाई देती रहती हैं. जैसे उन्होंने लिखा है 'उसके बाबा ब्याह के सालों बाद पैदा हुए बैठे को छाती तान के शान से गोद में लिए घूमते थे. सोचा जरा देखभाल कर के बाप होने का फर्ज निभाने का मौका उन्हें भी दिया जाए.'


पहाड़ की महिलाओं का कठिन जीवन पाठकों को दिखाने के लिए लेखक ने गीत का सहारा लिया है. जो उनकी दादी अपने खेतों में गा रही हैं. साथ में दादी के साथ ये बातचीत पहाड़ की महिलाओं को करीब से जानने का मौका देती है. 'अरे बाबा हमारे पहाड़ी लोग अपने बेटे के लिए बहु के रूप में मजदूर लाते थे. पहाड़ की हर औरत खेती के काम के साथ घास, लकड़ी काटकर सारी जिंदगी बाप का कर्जा ही तो चुकाती है.'

नई यात्राओं के अनुभव और सामाजिक अंतर्दृष्टि

'नीले पर्वतों के देश में' लेखक ने जम्मू कश्मीर की अपनी यात्रा के अनुभवों से वहाँ की खूबसूरती के साथ-साथ आर्टिकल 370 जैसे विषयों पर लिखा है. किताब के इस हिस्से में अपने बेटे और पति के साथ संबंधों पर भी उन्होंने खुल कर लिखा है. 'तब से आज तक गोलू के बाबा के साथ पारिवारिक कामों के अलावा कभी कहीं नहीं गई.'


अपनी केरल यात्रा में गीता मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सवाल उठाती हैं तो पाठकों को लोगों का पहनावा भी बताती हैं. इतिहास के बारे में भी वह बात करती रहती हैं. 'सुना है ब्रिटानिया के मिशनरी जार्ज अल्फ्रेड को कोवलम बीच बहुत पसंद आया और वो यही का हो कर रह गया था.' ऐसे ही लोहाघाट के बारे में जानकारी देती हैं 'विक्टोरिया राज के मैकग्रोबर ने अपना चाय बागान बनाया जिसे बाद में स्वामी विवेकानंद ने मायावती आश्रम नाम दिया.'

सामाजिक पीड़ाओं का मार्मिक चित्रण

दलित महिलाओं का दर्द उन्होंने जिस तरह लिखा है उससे झलकता है कि गीता गैरोला ने अपने यात्राओं को सिर्फ प्रकृति की खूबसूरती देखने तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि उन्होंने समाज की हर परतों को उधेड़ा है. 'हमारे समाज में आज भी दलित महिलाएँ दो तरह से प्रताड़ित होती हैं. दलित होने के नाते और औरत होने के नाते.'


वृद्ध हो रहे पिता को लेकर लेखक का दर्द भी दिखा है. 'दिन रात पुलिसिया परेड से गठे बदन वाले मेरे पिताजी आज इतने लाचार हो गए कि उन्हें घर से बाहर निकलने के लिए सहयोगी की जरूरत पड़ती है.'


सालों बाद गाँव में वापस जाकर 'मेरी दादी और मां की आवाज किस दिशा में बीज रही होगी?' लिखना भावुक कर देता है. यही जुड़ाव उनका अपने वन से भी है, जिसकी जगह सड़क बनने पर वह लिखती हैं 'तो फिर हमारा वण कहाँ गया?'

यात्राओं के बीच गृहराज्य की पीड़ा और तुलना

किताब पढ़ते लेखक नवीन जोशी की किताबें याद आती हैं जिनमें लिखा होता है कि जब गांव में लोग नहीं तब सड़क आई हैं, ये प्रवासियों के लिए बनी हैं. वैसे ही गीता भी लिखती हैं 'कितनी विडंबना है जब गाँव में लोग थे तब पानी नहीं था अब गांव में लोग नहीं हैं पर घर-घर पानी के नल लग गए.'
महाराष्ट्र यात्रा में महाराष्ट्र के गांवों की तुलना उत्तराखंड के गांवों से करते उन्होंने 'बेचारा अपना उत्तराखंड और उसके दयनीय से ग्राम प्रधान' लिखा है. यात्रा के दौरान अपने गृहराज्य उत्तराखंड की तुलना अन्य राज्यों से करते रहकर उन्होंने अपने राज्य की नीति बनाने वालों का काम आसान कर दिया है.

किताब की सीमाएं और संभावनाएं

छत्तीसगढ़, केरल में महिलाओं की स्थिति, वहां के पर्यावरण पर गंभीर बातें हैं. पर कुछ घटनाओं ने किताब को ज्यादा लंबा खींच दिया है. जैसे पृष्ठ संख्या 45 में 'मेरा हाँफता काँपता मन कह रहा था कि चढ़ाई चढ़ते कमल को पीछे से एक डंडे से सटाक मार दूं, जुबान रुक जाएगी बाबू साहब की.' पृष्ठ 204 में ऐसे ही खिड़की पर खटखट की घटना का जिक्र हुआ है.


लेखक के महिला समाख्या कार्यक्रम में होने की वजह से उनकी कई यात्राएं वैसी संभव हुई हैं, जैसा उन्होंने चाहा. वह जहां गई वहां की प्रकृति और सांस्कृतिक विरासतों का वर्णन तो किया है पर उनका ज्यादा ध्यान सामाजिक कुरीतियों की तरफ ही ज्यादा रहा है. वह क्षेत्र की खूबसूरती, उसकी बनावट पर विस्तार से लिख सकती थीं. 'यहाँ पर स्थानीय लकड़ी, पत्थर की वास्तुकला से बने पत्थर की स्लेटों वाली छत के मकानों की बसावट देखने लायक है.' विस्तार से लिखा जा सकता था.

एक जरूरी और सोचने को विवश करने वाली यात्रा

'ये मन बंजारा रे' को पढ़ना एक ऐसी यात्रा पर चलना है जहां पाठक हिमालय की ऊंचाइयों से लेकर समाज की गहराइयों तक उतरते हैं. गीता गैरोला ने इस यात्रा वृत्तांत को केवल प्राकृतिक सौंदर्य के चित्रण तक सीमित नहीं रखा बल्कि उसमें समाज की जटिलताओं, स्त्री चेतना, लोक संस्कृति, पर्यावरणीय चिंताओं और विकास की विडंबनाओं को गहराई से पिरोया है. किताब की भाषा सरल है और शैली संवादधर्मी. इससे पाठक गीता के अनुभवों से सहज ही जुड़ जाता है.

किताब की सबसे बड़ी ताकत इसकी संवेदनशील दृष्टि है.
गीता गैरोला का यह लेखन इस बात का प्रमाण है कि यात्रा केवल स्थानों को नापने का नाम नहीं बल्कि अपने समय, समाज और स्वयं को गहराई से समझने का भी माध्यम है. 

SYNOPSIS


SYNOPSIS
A Gendered Perspective on the Portrayal of Female Protagonists in Indian Web Series
CHAPTER OUTLINE
  1. Introduction
    1.1 Overview of OTT Platforms and Female Representation
    1.2 Role of OTT in Shifting Gender Narratives
    1.3 Indian Web Series: A New Era for Women in Media
    1.4 Portrayal of Women in Web Series: Breaking Stereotypes
  2. Literature Review
    Critical analysis of existing studies on OTT platforms, gender representation, and audience engagement.
  3. Theoretical Framework
    3.1 Feminist Media Theory
    3.2 Semiotics and Thematic Analysis in Gender Studies
    3.3 Cultivation Theory and Representation
  4. Research Objectives
    4.1 To semiotically decipher web series that are women-centric.
    4.2 To extract the underlying themes of women-centric web series (struggle, problem/issue depicted, and its treatment).
  5. Methodology
    5.1 Rationale for Selecting OTT Platforms Over Films
    5.2 Selection Criteria for Web Series
    5.3 Semiotic and Thematic Analysis: Tools and Techniques
  6. Analysis and Findings
    6.1 Semiotic Decoding of Visual and Narrative Symbols
    6.2 Thematic Exploration of Feminist Ideologies
    6.3 Case Studies: Four More Shots Please, Maja Ma, The Fame Game
  7. Discussion
    Interpretation of findings in relation to feminist theory and societal impact.
  8. Conclusion
    Summary of Key Insights and Future Directions
  9. References
INTRODUCTION
1.1 OVERVIEW
The proliferation of Indian web series such as Aarya, Four More Shots Please!, Bombay Begums, and The Fame Game highlights the transformative role of OTT platforms in amplifying female-led narratives. These platforms have democratized storytelling, enabling nuanced explorations of women’s lives that challenge patriarchal norms (Narain, 2021). Unlike traditional cinema, OTT platforms bypass censorship constraints and cater to a diverse, homebound audience, making them ideal for feminist narratives.
1.2 HAS OTT CHANGED THE WAY WOMEN ARE PORTRAYED ON SCREEN?
1.2.1 Role of OTT Platforms
OTT platforms have disrupted traditional media by prioritizing inclusivity and diversity. For instance, Aranyak (Netflix) features Raveena Tandon as a career-driven detective, while The Fame Game (Madhuri Dixit) explores aging and motherhood in the entertainment industry. These narratives contrast sharply with Bollywood’s historically reductive roles for women (e.g., the “virgin-vamp” dichotomy) (Srivastava, 2020).
1.2.2 Rewriting the Script
The rise of female creators like Alankrita Srivastava (Bombay Begums) and Gazal Dhaliwal (Mismatched) has enabled authentic storytelling. Netflix’s 2021 report highlights that 23% of Indian writers on the platform are women, fostering narratives that resonate globally—from Mumbai to Chennai, Rome to Kota (Netflix, 2021).
1.3 INDIAN WEB SERIES: REVOLUTIONIZING PORTRAYALS OF WOMEN
The COVID-19 pandemic accelerated OTT adoption, with platforms like Netflix and Amazon Prime reporting a 200% surge in subscriptions (Mohan, 2022). This shift allowed web series to address taboo topics—female sexuality (Four More Shots Please!), workplace discrimination (Bombay Begums), and LGBTQ+ identities (Made in Heaven)—with unprecedented boldness. Unlike films, web series offer episodic depth, enabling layered character arcs (e.g., Tara Khanna’s journey in Made in Heaven).
1.4 THE PORTRAYAL OF WOMEN IN WEB SERIES
While early Indian television reduced women to domestic roles (e.g., Kyunki Saas Bhi Kabhi Bahu Thi), web series celebrate multidimensionality. For example, Delhi Crime’s Vartika Chaturvedi (Shefali Shah) balances professional rigor with maternal vulnerability. However, critics argue that some shows tokenize feminism—Four More Shots Please! has been accused of prioritizing glamour over substance (News18, 2021).
LITERATURE REVIEW
Existing research underscores OTT’s role in reshaping gender dynamics:
  1. Vaidya et al. (2022) conducted a survey of 395 Indian youth (aged 17–26) and found that 62% preferred OTT platforms for their progressive female characters. Their study highlighted that comedies, sitcoms, and dramas with strong female leads were most popular.
  2. Marcos-Ramos & González (2021) analyzed 760 characters in Spanish VOD series (2017–2020), revealing persistent underrepresentation of women in STEM roles and stereotyping in familial roles. This mirrors trends in Indian series like Four More Shots Please!, where career-oriented women face societal backlash.
  3. Sink & Mastro (2016) demonstrated that primetime TV perpetuates gender stereotypes (e.g., sexualization of women), while OTT platforms like Netflix challenge these norms through complex protagonists like Sacred Games’ Cuckoo (Kubra Sait), a trans woman navigating power dynamics.
  4. Rácz (2016) emphasized the need for intersectional feminism in media, a gap partially filled by Indian web series like Maja Ma (exploring queer motherhood in rural India) and Bombay Begums (class and gender struggles).
  5. Puthiyakath & Goswami (2021) compared OTT and TV viewership in India, noting that OTT’s convenience and diverse content (e.g., female-led narratives) drove higher satisfaction rates among women aged 18–35.
  6. Dhingra & Sainy (2019) linked OTT’s success to its affordability and accessibility, enabling marginalized groups (e.g., working-class women) to engage with feminist narratives.
THEORETICAL FRAMEWORK
3.1 Feminist Media Theory
This study employs feminist media theory (van Zoonen, 1994) to critique power dynamics in storytelling. It interrogates how web series subvert or reinforce patriarchal norms.
3.2 Semiotics and Thematic Analysis
Semiotics (Barthes, 1967): Analyzes visual symbols (e.g., costumes in The Fame Game signify societal expectations).
Thematic Analysis (Braun & Clarke, 2006): Identifies recurring themes like agency, resilience, and intersectionality.
RESEARCH OBJECTIVES
  1. To semiotically decipher women-centric web series:
    Analyze visual metaphors (e.g., color palettes, attire) and narrative tropes (e.g., dialogues, character arcs) to decode how gender roles are constructed or deconstructed.
  2. To extract underlying themes:
    Identify recurring issues (e.g., workplace sexism, sexual autonomy) and their narrative treatment (e.g., resolution, victimization, empowerment).
METHODOLOGY
5.1 Rationale for Selecting OTT Over Films
Creative Freedom: OTT platforms face less censorship than films (Central Board of Film Certification), enabling bold narratives (e.g., She’s exploration of undercover policing and sexuality) (Isa et al., 2020).
Accessibility: Post-pandemic, OTT reached 450 million Indian users (Puthiyakath & Goswami, 2021), ensuring diverse demographic engagement.
Episodic Depth: Unlike 2-hour films, series like Aarya (Season 3) allow gradual character development.
5.2 Selection of Web Series
Four More Shots Please! (Amazon Prime): Critiqued for its “urban feminism” but pivotal in normalizing female desire.
Maja Ma (Disney+ Hotstar): Examines closeted lesbian motherhood, representing rural India’s LGBTQ+ struggles.
The Fame Game (Netflix): Deconstructs ageism and maternal sacrifice in showbiz.
5.3 Semiotic and Thematic Analysis
Semiotics: Decodes visual metaphors (e.g., red lighting in Four More Shots Please! symbolizes rebellion against societal norms).
Thematic Analysis: Uses NVivo to categorize dialogues and plotlines into themes like “economic independence” and “sexual autonomy” (Braun & Clarke, 2006).
EXPECTED OUTCOMES
  1. Web series reflect feminist ideologies through themes of resilience (e.g., Aarya’s drug mafia queen) and intersectionality (Maja Ma’s rural queer narrative).
  2. OTT’s democratized storytelling fosters inclusive representation, though regional language content remains underrepresented.
  3. Post-pandemic, OTT’s dominance signals a permanent shift in media consumption, with feminist narratives driving subscriptions.
REFERENCES
Barthes, R. (1967). Elements of Semiology. Hill and Wang.
Braun, V., & Clarke, V. (2006). Using Thematic Analysis in Psychology. Qualitative Research in Psychology.
Mohan, A. (2022). OTT Growth in India. Trade Media Journal.
van Zoonen, L. (1994). Feminist Media Studies. SAGE Publications.
Vaidya, A., et al. (2022). IJRAR Study on OTT Consumption.
Marcos-Ramos, M., & González, B. (2021). Gender Representation in Spanish VOD. International Journal of Communication.

Wednesday, June 4, 2025

विश्व पर्यावरण दिवस 2025: युद्धों का पर्यावरण पर विनाशकारी प्रभाव

विश्व पर्यावरण दिवस 2025: युद्धों का पर्यावरण पर विनाशकारी प्रभाव

विश्व पर्यावरण दिवस 2025 (5 जून) हमें पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी याद दिलाता है, रूस-यूक्रेन, इस्राइल-फलस्तीन और भारत-पाकिस्तान जैसे हाल के युद्धों ने पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाया है. 'United Nations Environment Programme' की रिपोर्ट्स में इन युद्धों को लेकर चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं.

ये संघर्ष मिट्टी, जल, हवा और जैव विविधता को नष्ट कर रहे हैं, जिससे दीर्घकालिक पारिस्थितिक संकट पैदा हो रहा है.  रूस के आक्रामक रवैये की वजह से यूक्रेन में लगभग 42,000 भेड़-बकरियाँ, 92,000 गाय-भैंस, 2.58 लाख सूअर और 57 लाख से ज्यादा मुर्गियाँ मारे गए.

रूस-यूक्रेन युद्ध: पर्यावरण नरसंहार की त्रासदी

2022 से चल रहे रूस-यूक्रेन युद्ध ने यूक्रेन के पर्यावरण को तबाह किया है. बमबारी और रासायनिक हथियारों से मिट्टी और नदियां दूषित हुई हैं. 'United Nations Environment Programme' की 'The Environmental Impact of the Conflict in Ukraine' रिपोर्ट के अनुसार  यूक्रेन में जंग से खेती को काफी नुकसान हुआ है. सबसे ज्यादा नुकसान यूक्रेन की मशहूर काली उपजाऊ मिट्टी (चेरनोज़म) को हुआ है. अमेरिकी कंपनी मैक्सार के सैटेलाइट चित्रों (जून 2022) में डोनेत्स्क-लुहान्स्क के खेतों में सैकड़ों गोले गिरने के गड्ढे और डोवहेंके में 40 मीटर चौड़ा बम गड्ढा दिखा. इन गड्ढों में फंसे बारूद के टुकड़े, जहरीली धातुएँ और ईंधन, बारिश के पानी के साथ मिलकर ज़मीनी पानी को प्रदूषित कर रहे हैं. खासकर खेरसॉन-मिकोलाइव इलाकों में, जहाँ ज़मीन के नीचे पानी सिर्फ 1-2 मीटर गहराई पर है. बड़े पशु फार्मों के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट भी बमबारी से टूट गए. 
डोनेत्स्क के एक सुअर फार्म से निकला जहरीला गंदा पानी कालमियस नदी में जा रहा है. युद्ध के चलते अभी इस प्रदूषण को रोकना मुश्किल है. रिपोर्ट में यह भी लिखा है कि लड़ाई के चलते किसान जानवरों को खिला नहीं पाए या डॉक्टर नहीं बुला पाए. इस वजह से लगभग 42,000 भेड़-बकरियाँ, 92,000 गाय-भैंस, 2.58 लाख सूअर और 57 लाख से ज्यादा मुर्गियाँ मारे गए.


इस्राइल-फलस्तीन संघर्ष: गाजा में पर्यावरणीय तबाही

इस्राइल-फलस्तीन संघर्ष, खासकर 2023 के बाद गाजा में, ने पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचाया. बमबारी से वायु प्रदूषण बढ़ा, जिसमें सफेद फॉस्फोरस जैसे रसायनों का उपयोग शामिल है. . 'United Nations Environment Programme' की 'Environmental impact of the conflict in Gaza' रिपोर्ट के अनुसार युद्ध में इस्तेमाल गोला-बारूद के ज़हरीले पदार्थ पेड़-पौधों और जानवरों को तुरंत नुकसान पहुँचाते हैं. इनसे मौत, बीमारी या विकास रुक सकता है . कुछ खतरनाक पदार्थ मिट्टी, पानी या समुद्र में दशकों तक रह सकते हैं, जिन्हें साफ करते समय सीधा संपर्क खतरनाक होता है. 

कई विस्फोटक इंसानों के लिए भी हानिकारक हैं, जैसे 'टीएनटी' से लिवर, किडनी खराब हो सकती है. आरडीएक्स दूषित पानी से नर्वस सिस्टम प्रभावित होता है और कई गंभीर रोग सकते हैं. 
भारी धातुएँ (जैसे आर्सेनिक, सीसा) बेहद ज़हरीली हैं. थोड़ी मात्रा भी अंगों को नुकसान पहुँचा सकती है या कैंसर कर सकती है .
रिपोर्ट के अनुसार गाजा क्षेत्र में बम से बने गड्ढों की मिट्टी में निकल, क्रोमियम, ताँबा, मैंगनीज और सीसे की मात्रा बहुत ज़्यादा मिली, पुराने युद्धों से पता चलता है कि भारी धातुओं का प्रदूषण दशकों तक रहता है.

भारत-पाकिस्तान तनाव: कश्मीर की नाजुक पारिस्थितिकी को नुकसान

The Wildlife India के अनुसार जम्मू और कश्मीर राज्य ने 1947 के बाद से तीन युद्धों का सामना किया है और लगभग तीन दशकों तक युद्ध जैसी स्थिति में रहा है. मानव जीवन की क्षति के अलावा, इस संघर्ष ने क्षेत्र के पारिस्थितिक धन को भी नष्ट किया है. आतंकवाद-रोधी रणनीतियों के कारण सेना को जंगल क्षेत्रों में शिविर स्थापित करने पड़ते हैं, जिससे वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास में व्यवधान पड़ता है. उपलब्ध आंकड़ों से पता चलता है कि 66% जीव-जातीय विविधता 460 मील लंबी और 15.5 मील चौड़ी नियंत्रण रेखा (LoC) के साथ मौजूद है और इसका काफी हिस्सा बारूदी सुरंगों के कारण नष्ट हो गया है.

 आतंकवादियों को पकड़ने की कोशिश में, सुरक्षा बलों द्वारा उच्च-वेग वाली राइफलों का व्यापक उपयोग, बिजली से घिरी बाड़, ठोस स्टील की दीवारें, रात भर की रोशनी, बहु-स्तरीय वाहन अवरोध, नई सड़कों का विशाल नेटवर्क, सभी इलाकों में चलने वाले वाहनों सहित गश्ती वाहनों का 24 घंटे का प्रवाह, निरंतर निम्न-स्तर के विमान उड़ानें, और पैदल गश्त जैसी विधियों का उपयोग होता है. हालांकि ये उपाय आतंकवादी गतिविधियों को रोकने के लिए बनाए गए हैं लेकिन ये हिमालयी घाटी के आसपास के गांवों और जंगलों में वन्यजीवों की आवाजाही में बाधा उत्पन्न करते हैं.

Center for Arms Control and Non-Proliferation की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध के दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रभाव वायुमंडल में निकलने वाले धुएं से होंगे, और धुएं की मात्रा दोनों देशों के रणनीतिक हथियारों के आकार पर निर्भर करेगी. अध्ययन मानता है कि दोनों देश हिरोशिमा बम के आकार के हथियारों का उपयोग करेंगे, और अनुमान लगाता है कि दोनों देशों के बीच परमाणु संघर्ष से वायुमंडल में 17 मिलियन टन से अधिक काला कार्बन जाएगा. यह कार्बन सूर्य से गर्म होकर समताप मंडल में पहुंचेगा, जहां यह पृथ्वी तक सूर्य की रोशनी को रोकेगा और वैश्विक परमाणु सर्दी पैदा करेगा. यह आपदा कृषि को रोक देगी, समुद्र के तापमान को बदल देगी, और वैश्विक औसत तापमान को खतरनाक रूप से कम कर देगी. इसके अतिरिक्त, अध्ययन कहता है कि परमाणु युद्ध का धुआं कई वर्षों तक समताप मंडल में रहेगा, जिसका अर्थ है कि भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष के पर्यावरणीय प्रभाव लंबे समय तक रहेंगे.


Monday, June 2, 2025

'ये मन बंजारा रे' : यात्रा, समाज और आत्म-खोज की अनूठी दास्तान

गीता गैरोला की किताब ये मन बंजारा रे एक यात्रा वृत्तांत से कहीं अधिक है। यह सामाजिक ढांचे, पर्यावरण, लैंगिक असमानता और सांस्कृतिक विरासत पर गहरे विचारों का संग्रह है।

'मैं उन सब में बड़ी शादीशुदा होने की सामाजिक सुरक्षा वाले हथियार से लैस थी', 'ये मन बंजारा रे' की शुरुआत में गीता गैरोला की अपनी यात्रा के दौरान लिखी यह पंक्तियां हमारे सामाजिक ढांचे पर सवाल उठाती हैं.

संभावना प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब में लेखक यात्रा का सलीका पाठकों के सामने रखती हैं पृष्ठ 21 में उन्होंने लिखा है 'गर्म कपड़े, कैमरे के सैल, दो जोड़ी मोजे, विंडचिटर, टोपी, कुछ बेसिक दवाइयां, बोरोलीन, पानी का गिलास वाला फिल्टर, सुई धागे की रील, एक बड़ी पॉलीथिन शीट और एक डिबिया में नमक, सब चीजें याद कर के पिट्ठू में रख दी.'

क्या किताब पहाड़ के संसाधनों का उचित प्रयोग नहीं कर पाने का दस्तावेज भी है, पृष्ठ संख्या 16 में लिखा है 'अरे भूली कौन आता है यहाँ माल्टे खरीदने.' 
'मुझे अचानक याद आया कि उद्यान विभाग फलों से जूस, अचार बनाना भी सिखाता है. इस बारे में उस वक्त वहां के दुकानदारों को कोई जानकारी नहीं थी.'

हिमालय की अधिकतर यात्राओं पर लिखी यह किताब  एक तरीके से हिमालय भ्रमण के लिए गाइड बुक भी है.  जैसे इसमें लिखा है 'चढ़ाई चढ़ने के साथ सूरज हिम श्रृंखलाओं को अपनी लाली से रंगने लगा था. यह अक्टूबर का महीना था इस वक्त हिमालय दर्शन अवर्णनीय होता है.'

किताब में बहुत सी जगह उत्तराखंड के मेलों की जानकारी और उनका इतिहास लिखा गया है.

किताब पढ़ते हुए हम गीता गैरोला को भी अपने जीवन में यात्राओं से परिवर्तन लाते देखते हैं, वह पितृसत्ता को चुनौती दिखाई देती रहती हैं, जैसे उन्होंने लिखा है 'उसके बाबा ब्याह के सालों बाद पैदा हुए बैठे को छाती तान के शान से गोद में लिए घूमते थे. सोचा जरा देखभाल कर के बाप होने का फर्ज निभाने का मौका उन्हें भी दिया जाए.'

सेवादास के बारे में किताब में लिखा है 'वे ढोलसागर पवाड़ों (एतिहासिक लोक गाथाएं) के गहन ज्ञाता थे. हमें अपनी क्षेत्रीय प्रतिभाओं की पहचान कर कद्र करने की समझ कब आएगी? हमारे पहाड़ों में जाने कितने ऐसे रत्न अनचीन्हे रह जाते हैं और उनकी विद्या भी उनके साथ ही समाप्त हो जाती है. विज्ञान के युग में अपनी परंपरागत प्रतिभाओं को रिकॉर्ड तक ना कर पाना हमारी पीढ़ी के लिए शर्मनाक ही कहा जाएगा.'

यात्रा में नई जगहों की मुश्किलें, लैंगिक असमानता, पर्यावरण, संस्कृति पर विचार करती रहती हैं.
'नन्दा भी तो औरत ही है माई जी और औरत होने के नाते उसको भी जरूर माहवारी होती होगी. एक औरत का इतना सम्मान और दूसरी तरफ जीती जागती औरतों के लिए यात्रा को वर्जित करना कहाँ का न्याय है.'

उत्तराखंड की कई महत्वपूर्ण जगह और यात्राओं का वर्णन भी उन्होंने आसान भाषा में दिया है, 'गढ़वाल के चमोली जिले में नन्दा देवी की जात यूँ तो हर साल होती है पर बारहवें साल में की जाने वाली जात को राजजात (राजयात्रा) कहा जाता है.'

राजजात यात्रा पहली बार पूरी करने वाली पांच महिलाओं में शामिल गीता गैरोला ने पहाड़ों की कठिन यात्रा और उनमें जाने का जज्बा लेखक के शब्दों से किताब में कई जगह झलका है , वह लिखती हैं 'कुलसारी तक पहुंचते तीन जगह सड़क सड़क पूरी तरह टूटी थी। चलने का रास्ता भी सड़क के साथ गायब हो गया था.'
ज्यूरांगली जैसी कठिन पहाड़ी पर चढ़ने उतरने के बाद वह लिखती हैं 'आज मैं कह सकती हूं स्त्रियाँ चाहें तो अपने लिए कुछ भी करने के लिए समर्थन जुटा सकती हैं.'

यात्राओं में काम आने वाले अनुभव भी उन्होंने बेहद सरल भाषा में पाठकों के साथ साझा किए हैं 'हमारे पास बदलने के लिए ज्यादा कपड़े नहीं थे, दिन भर जो कपड़े मोजे गीले हो जाते उन्हें रात को उतारकर पिट्ठू में रखे सूखे कपड़े और मोजे पहन लेते. दूसरे दिन सुबह सूखे कपड़े उतार कर पिट्ठू में रख देते और पहले दिन के उतारे हुए गिरे कपड़े पहन लेते.'

राजजात यात्रा में जाकर लेखक ने जलवायु परिवर्तन पर किताब के जरिए अहम बात बोली है, साल 2000 की राजजात यात्रा के बारे में बात करते वह लिखती हैं '1987 की राजजात में शामिल लोगों ने बताया कि कभी ये झील इससे दुगुनी बड़ी थी.'

पहाड़ की महिलाओं का कठिन जीवन पाठकों को दिखाने के लिए लेखक ने गीत का सहारा लिया है, जो उनकी दादी अपने खेतों में गा रही है. साथ में दादी के साथ ये बातचीत पहाड़ की महिलाओं को करीब से जानने का मौका देती है 'अरे बाबा हमारे पहाड़ी लोग अपने बेटे के लिए बहु के रूप में मजदूर लाते थे. पहाड़ की हर औरत खेती के काम के साथ घास, लकड़ी काटकर सारी जिंदगी बाप का कर्जा ही तो चुकाती है.'

'नीले पर्वतों के देश में' लेखक ने जम्मू कश्मीर की अपनी यात्रा के अनुभवों से वहां की खूबसूरती के साथ- साथ आर्टिकल 370 जैसे विषयों पर लिखा है. किताब के इस हिस्से में अपने बेटे और पति के साथ संबंधों पर भी उन्होंने खुल कर लिखा है, 'तब से आज तक गोलू के बाबा के साथ पारिवारिक कामों के अलावा कभी कहीं नही गई.'
 
'अभी बहुत कुछ बाकी है' में महिलाओं के बारे में लेखक जो भी लिखती हैं, पाठक उसमें खो जाते हैं। सरल भाषा की ये स्टोरीटेलिंग वाकई लाजवाब है और महिलाओं की सामाजिक स्थिति को पाठकों के सामने बार बार लेकर आती है 'हजारों लोग हम दोनों माँ बेटी के मालिक बनने को तैयार हुए, हमें कई तरह के लालच दिए'. 
बकरी चरा रही लड़कियों को 'तीन अप्रतिम सौंदर्य से पूर्ण वन कन्यायें' कहना साहित्यिक श्रेणी में गीता गैरोला को काफी आगे खड़ा कर देता है.

अपने बचपन को याद करती गीता गैरोला ने पाठकों को खुद से जोड़ लिया है,पाठक भी उनके बचपन की यादों में खो जाते हैं.
गढ़वाली गीतों और उनका अनुवाद, पाठकों को भी पहाड़ों से जोड़ता रहता है.

अपनी केरल यात्रा में गीता मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सवाल उठाती हैं तो पाठकों को लोगों का पहनावा भी बताती है.
इतिहास के बारे में भी वह बात करती रहती हैं. 'सुना है ब्रिटानिया के मिशनरी जार्ज अल्फ्रेड को कोवलम बीच बहुत पसंद आया और वो यही का हो कर रह गया था.'
ऐसे ही लोहाघाट के बारे में जानकारी देती हैं 'विक्टोरिया राज के मैकग्रोबर ने अपना चाय बागान बनाया जिसे बाद में स्वामी विवेकानंद ने मायावती आश्रम नाम दिया.

दलित महिलाओं का दर्द उन्होंने जिस तरह लिखा है उससे झलकता है कि गीता गैरोला ने अपने यात्राओं को सिर्फ प्रकृति की खूबसूरती देखने तक ही सीमित नही रखा बल्कि उन्होंने समाज की हर परतों को उधेड़ा है 'हमारे समाज में आज भी दलित महिलाएँ दो तरह से प्रताड़ित होती हैं. दलित होने के नाते और औरत होने के नाते.'

वृद्ध हो रहे पिता को लेकर लेखक का दर्द भी दिखा है 'दिन रात पुलिसिया परेड से गठे बदन वाले मेरे पिताजी आज इतने लाचार हो गए कि उन्हें घर से बाहर निकलने के लिए सहयोगी की जरूरत पड़ती है.'

यही जुड़ाव उनका अपने वन से भी है, जिसकी जगह सड़क बनने पर वह लिखती हैं 'तो फिर हमारा वण कहाँ गया?' यह पंक्ति विकास के लिए होने वाले विनाश को सामने ले आती है.

किताब पढ़ते लेखक नवीन जोशी की किताबें याद आती हैं जिनमें लिखा होता है कि जब गांव में लोग नही तब सड़क आई हैं, ये प्रवासियों के लिए बनी हैं. वैसे ही गीता भी लिखती हैं 'कितनी विडंबना है जब गाँव में लोग थे तब पानी नही था अब गाँव में लोग नही हैं पर घर घर पानी के नल लग गए.'

 छत्तीसगढ़, केरल में महिलाओं की स्थिति, वहां के पर्यावरण पर गंभीर बात हैं, पर कुछ घटनाओं ने किताब को ज्यादा लंबा खींच दिया है, जैसे पृष्ठ संख्या 45 में 'मेरा हाँफता काँपता मन कह रहा था कि चढ़ाई चढ़ते कमल को पीछे से एक डंडे से सटाक मार दूं , जुबान रुक जाएगी बाबू साहब की.' पृष्ठ 204 में ऐसे ही खिड़की पर खटखट की घटना का जिक्र हुआ है.

लेखक के महिला समाख्या कार्यक्रम में होने की वजह से उनकी कई यात्रा वैसी संभव हुई हैं, जैसा उन्होंने चाहा.
वह जहां गई वहां की प्रकृति और सांस्कृतिक विरासतों का वर्णन तो किया है पर उनका ज्यादा ध्यान सामाजिक कुरीतियों की तरफ ही ज्यादा रहा है, वह क्षेत्र की खूबसूरती उसकी बनावट पर विस्तार से लिख सकती थीं. 'यहाँ पर स्थानीय लकड़ी, पत्थर की वास्तुकला से बने पत्थर की स्लेटों वाली छत के मकानों की बसावट देखने लायक है.' विस्तार से लिखा जा सकता था.

महाराष्ट्र यात्रा में महाराष्ट्र के गांवों की तुलना उत्तराखंड के गांवों से करते उन्होंने 'बेचारा अपना उत्तराखंड और उसके दयनीय से ग्राम प्रधान' लिखा है, यात्रा के दौरान अपने गृहराज्य उत्तराखंड की तुलना अन्य राज्यों से करते रहकर उन्होंने अपने राज्य की नीति बनाने वालों का काम आसान कर दिया है.

यात्रा के दौरान पहाड़ की महिलाओं की उनके परिवार में स्थिति को वह खासतौर पर देख रही हैं 'मैंने धीरे से पार्वती से कहा तू तो खूब घी दूध खाती होगी. देव सिंह की तरफ इशारा कर बोली- जब दे देते हैं मैं खा लेती हूं.'

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