Tuesday, September 29, 2020

भारत के स्वच्छता अभियानों की वास्तविकता दिखाता 'नैनीताल स्वच्छता दिवस' ।

स्वच्छ भारत अभियान और उसका परिणाम।

2 अक्टूबर 2014 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वच्छ भारत मिशन की नई दिल्ली, राजपथ पर शुरूआत करते हुए कहा था कि “एक स्वच्छ भारत के द्वारा ही देश 2019 में महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर अपनी सर्वोत्तम श्रद्धांजलि दे सकते हैं।” 


स्वच्छ भारत अभियान भारत सरकार द्वारा चलाया गया सबसे महत्वपूर्ण स्वच्छता अभियान था। भारतीय प्रधानमंत्री ने इंडिया गेट पर स्वच्छता के लिए आयोजित एक प्रतिज्ञा समारोह की अगुआई की थी। 

आज अगर हम सोशल मीडिया पर सफल साबित हुए इस अभियान का ज़मीनी तौर पर विश्लेषण करते है तो देश की स्वच्छता में ज्यादा तो नही पर थोड़ा बहुत सुधार ही पाते हैं।

हाल ही में तमिलनाडु के एक व्यक्ति ने चौदह वर्षीय लड़के को अपने खेत पर शौच करते हुए पकड़ा और फिर उसने लड़के को उसी के हाथों से मल की साफ करने पर मज़बूर किया। सरकार खुले में शौच समाप्त होने के लाख दावे तो ठोकती है पर सफ़र करते या घर से बाहर निकलने पर आप आज भी बहुतों को खुले में शौच करते देख सकते हैं। ग्रामीण इलाकों में लोग शौचालय बनने के बाद भी खुले में शौच करना ही पसंद करते हैं।

रेलवे लाइनों के किनारे चलने पर अब भी मल से पैरों को बचाते हुए चलना पड़ता है।

शहर के डस्टबिन अक्सर शहर के चारों ओर बदसूरत दिखने का कारण बनते हैं। उनमें कुत्ते, गाय जैसे आवारा पशु अंदर जा कचरा खाते हैं। गांव में सूखा, गीला कचरा फैला कहीं भी दिख जाता है।

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि दिल्ली सरकार ने 2 अक्टूबर 2014 को शुरू किए गए स्वच्छ भारत मिशन के तहत एक भी शौचालय का निर्माण नहीं किया है । रिपोर्ट में कहा गया है कि इस उद्देश्य के लिए आवंटित करोड़ों रुपये के फंड को बैंकों में बेकार छोड़ दिया गया ।

गुजरात सरकार के यह घोषित करने के एक साल बाद कि राज्य खुले में शौच मुक्त हो गया है, कैग ने अपनी रिपोर्ट में इस दावे को खारिज कर दिया था।

हाल ही में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने कहा कि केंद्रीय लोक उपक्रमों (पीएसयू) द्वारा स्कूलों में निर्मित शौचालयों के ऑडिट में पाया गया कि उनमें से 11 प्रतिशत या तो अस्तित्व में नहीं हैं या फिर उनका आंशिक निर्माण ही हुआ है। वहीं 30 प्रतिशत साफ-सफाई, पानी नहीं होने जैसे विभिन्न कारणों से उपयोग में नही हैं। कोरोना काल में बच्चों के लिए स्वच्छता की यह स्थिति विचारणीय है।

हिन्दुस्तान की एक खबर के अनुसार उत्तराखण्ड के सितारगंज निवासी निखिलेश गिरामी ने एक मामले में हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की है। उन्होंने कहा है कि सितारगंज के ग्राम अरविंद नगर में 2014 से 2019 में सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान के तहत शौचालय बनाने समेत पेयजल सुव्यवस्था के लिए बोरिंग करने की स्वीकृति दी थी। जिसमें ग्राम प्रधान और बीडीओ ने लाखों रुपए का घोटाला किया है। इस योजना में गरीब परिवारों के लिए 371 टॉयलेट समेत पेयजल आदि के लिए अन्य सुविधाए मुहैया कराई जानी थी। लेकिन दोनों की मिलीभगत से निर्धारित कार्य पूर्ण नहीं किए गए। जबकि उक्त अधिकारियों ने अपने स्तर से कार्य पूर्ण होने का सर्टिफिकेट दे दिया।

देशभर में स्वच्छ भारत अभियान की आड़ में इसी तरह भृष्टाचारियों ने जम कर अपनी जेब भरी।

प्रेस सूचना ब्यूरो  द्वारा जारी वर्ष 2016 के आँकड़ों के अनुसार, भारत में प्रतिदिन लगभग 62 मिलियन टन कचरे का उत्पादन होता है।

नैनीताल में रहने वाले पद्मश्री अवार्डी श्री अनुप साह कहते हैं पुराने समय में मुश्किल हालातों में भी कुड़े का निस्तारण होता था, नियम सख्त थे और लोग अपने कचरे के लिए खुद जागरूक थे।

अब नैनीताल में पक्षियों ने आना कम कर दिया है।
कचरे का सही से निस्तारण न होने का परिणाम कितना गम्भीर हो सकता है यह हम रानीखेत की घटना से जान सकते हैं। जनवरी 2006 में रानीखेत के एक कचरा डंप यार्ड के पास सैंकड़ों स्टम्प ईगल बेहोश पाए गए थे।

जनता स्वयं ही कचरे को अलग नही करती उसके बाद सम्बंधित विभाग के लिए यह कार्य मुश्किल होते जाता है। कचरे के निस्तारण में समुदाय की भागीदारी बहुत महत्वपूर्ण है। 


नैनीताल के 'स्वच्छता दिवस' की कहानी

उत्तराखण्ड पर ‘न्यूज़ 18’ की एक चौंकाने वाली रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखण्ड हर दिन 1400 टन से अधिक कचरा उत्पन्न करता है और इसका शून्य प्रतिशत संसाधित करता है।
उत्तराखण्ड में केवल तीन प्रतिशत नगरपालिका वार्डों में स्त्रोत पर कचरा पृथक्करण की सुविधा है।

नैनीताल में स्वच्छता दिवस मनाने की बात करें तो वरिष्ठ पत्रकार राजीव लोचन साह ऑस्ट्रेलियाई नागरिक रेमको वेन सेंटन को याद करते हुए कहते हैं कि वर्ष 2007 में रेमको विश्व के लगभग हज़ार देशों की यात्रा कर यहां पहुंचे थे और वह कहते थे कि नैनीताल जैसा खूबसूरत शहर उन्होंने पूरे विश्व में नही देखा पर लगता है इस शहर को मलेरिया हो गया है इसे सही करो।


रेमको ‘क्लीन अप ऑस्ट्रेलिया’ की तर्ज पर नैनीताल की सफ़ाई कराना चाहते थे। जो ऑस्ट्रेलिया में वर्ष 1990 से मनाया जा रहा है। 18.3 मिलियन आस्ट्रेलियाई इस अभियान से जुड़े हैं ,जिन्होंने अपने 36 मिलियन घण्टे इस अभियान को दिए।
वह प्लास्टिक की बोतलें, सिगरेटों के नीचे का हिस्सा, स्ट्रॉ, कॉफी कप, पन्नी की सफाई मुख्य रूप से करते हैं।

नैनीताल में 18 सितंबर 1880 को एक विनाशकारी भूकम्प आया था इसीलिए वर्ष 2007 में स्थानीय लोगों और प्रशासन ने 18 सितम्बर की तिथि को चुन पहली बार 'नैनीताल स्वच्छता दिवस' मनाया।

 नैनीताल के विद्यार्थी, बोट वाले, व्यापारी सब इस अभियान से जुड़े। गंदगी दूर होने लगी थी पर फिर इस अभियान पर किन्हीं कारणों से वर्ष 2013 से विराम लग गया।


रेमको वेन सेंटन तो इस बार कोरोना की वजह से ऑस्ट्रेलिया में ही थे पर एक नई टीम और जोश के साथ नैनीताल में इस बार फिर से यह अभियान शुरू किया गया।

जागृति, हेल्पिंग फ्रेंड्स, एनएए, त्रिवेणी, ग्रीन आर्मी, नैनीताल नागरिक एसोसिएशन जैसी समाजसेवा संस्थाएं इसमें शामिल थी तो कुछ लोग बिना कोई संस्था बनाए अपने खर्च पर एक समूह के रूप में मिल सफाई का कार्य कर रहे थे।


तिब्बती लोगों ने सफ़ाई के लिए आधे दिन अपना पूरा बाज़ार ही बन्द रखा। कुछ लोग नालों में आधे डूब कर भी सफ़ाई का कार्य कर रहे थे तो कुछ बोट ले झील से कचरा उठा रहे थे। यह झील अब भी स्थानीय लोगों की आस्था से जुड़ी है और वर्तमान समय में बुरी स्थिति से गुज़र रही है।

स्वच्छता दिवस में पुराने कपड़े, पानी की बोतलें, तम्बाकू के पैकेट, शराब की बोतलें ही कुड़े के बैगों को भरने के लिए काफी थे।

नैनीताल निवासी लतिका जलाल शाही कहती हैं कि "शहर के ऐसे हालात देखकर लग रहा कि शहर में सब सो रहे हैं। एक तरफ शहर में चारों ओर गंदगी फैली हुई है तो दूसरी तरफ लोग बेफिक्र होकर घूम रहे हैं । फ्लैटस (नैनीताल का ग्राउंड) में देख ऐसा लगता है जैसे मेला हो रहा हो, खाने के इतने स्टालस जो वहीं पर बर्तन धोने का काम भी कर रहे, उन्हें यह अधिकार किसने दिया?

शहर को खोद-खोद कर बुरा हाल कर दिया, जहां एक तरफ कहा जा रहा कि पैसा नहीं वहीं दूसरी तरफ इतना निर्माण कार्य? ज़ू के पास वाला शौचालय अचानक गायब होकर नया बनने को तैयार है।"


नैनीताल में भारत के अन्य शहरों की तरह हो रहे अवैध निर्माणों का विरोध तो किया जाता है पर बॉलीवुड के मशहूर डायलॉग 'पैसा और पॉवर वाले लोगों के सामने आम आदमी के विरोध की क्या बिसात।'

इस वर्ष का स्वच्छता दिवस पिछले हर मनाए गए स्वच्छता दिवसों से कामयाब तो रहा पर इससे एक सीख यह मिली कि समुदाय अभी एक नही हुआ है। नैनीताल के ही लोगों को यह जानकारी नही थी कि 18 सितंबर को उनके शहर में क्या मनाया जा रहा है। यह एक त्यौहार की तरह मनाया जाना था पर युवा शक्ति वहां नदारद थी। अभियान में वही लोग शामिल थे जो इसको सफल बनाने के लिए बनाए गए सोशल मीडिया के माध्यमों से जुड़े थे। बाकि लोग उन्हें सफाई करते वैसी ही नज़रों से देख रहे थे जैसे एक्सीडेंट से एक तड़पते राहगीर को देख कर भी अन्य राहगीर एक नज़र देख आगे बढ़ जाते हैं।

इस मौके पर भी कुछ लोग अपनी राजनीतिक रोटियां सेकते नज़र आए। स्वच्छता अपने लिए किया गया कार्य है और उसके लिए भी वाहवाही लूटने की कोशिश करने वाला व्यक्ति किस स्तर का है यह हम तुरंत अनुमान लगा सकते हैं।

सैलानी गन्दगी करते हैं पर उन्हें आने से रोकना गन्दगी खत्म करने का उपाय नही हो सकता। इन्हीं सैलानियों से शहर का रोज़गार चलता है।

 ताज़महल जब गन्दा हो रहा था तो उसे बन्द नही किया गया बल्कि  सैलानियों को अंदर प्रवेश करने से पहले ही कुछ नियमों का पालन करवाया गया और उन पर नज़र रखने के लिए वालंटियर्स की तैनाती भी की गई।

आप प्रकृति के उपहार का आनंद लेने से किसी को रोक नही सकते पर उसकी सुंदरता बनाए रखने के लिए कुछ कड़े कदम जरूर उठा सकते हैं।

योजनाओं के क्रियान्वयन पर सरकारी मिशनरियों को अपनी लेट लतीफी से जागना होगा। योजनाएं आती तो हैं पर उन्हें भी कुड़े के ढेर में ही डाल दिया जाता है।

निर्माण कार्य से होने वाला मलबा पूरे देश के लिए मुसीबत है। नैनीताल की झील भी इस मलबे को झेल रही है। कैलगरी में निर्माण कार्य के हर प्रकार मलबे  का रिसाइकिल कर निस्तारण कर दिया जाता है। भारत के हर शहर को कैलगरी मॉडल से सीख लेनी होगी।

भारी बारिश होने पर सीवर लाइन उफान पर आ जाती है और सारी गंदगी झील में चले जाती है।


गर्मियों में नैनीताल की झील बदबू मारने लगती है और आने वाले समय में हम शायद ही उसे झेल पाएं।


भारत और विश्व के सबसे स्वच्छ शहरों की कहानी।

भारत में पिछले कुछ सालों से इंदौरवासी स्वच्छता के क्षेत्र में अन्य भारतवासियों से बहुत आगे रहे हैं।

इंदौर देश और दुनिया में अपनी स्वच्छता को लेकर खास पहचान बना चुका है। इंदौर के नागरिकों ने शहर को साफ और स्वच्छ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। नगर निगम ने कचरे को स्त्रोत पर ही सफलतापूर्वक अलगाव के लिए नागरिकों को संवेदनशील बनाया और खुले क्षेत्रों में कचरा डंप नही किया। इंदौर की स्वच्छता कहानी वास्तव में सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से हुआ परिवर्तन है।

सार्वजनिक समारोहों में डिस्पोजल बर्तनों का इस्तेमाल कम किया जाए, इसके लिए नगर निगम ने बर्तन बैंक भी बनाया है। इसके चलते समारोहों से निकलने वाला कचरा कम हुआ है। इसी तरह थैला बैंक भी बनाया गया, जिससे आम लोग कागज और जूट के बने थैले का इस्तेमाल करते हैं।


कनाडा के कैलगरी शहर में एक रंगीन बिन प्रणाली पेश की गई है। इसमें काले, नीले और हरे रंग के अलग-अलग डिब्बे होते हैं।


हरे रंग के डिब्बे खाद्य अपशिष्ट के लिए हैं। नीले कागज़ और पन्नी के लिए और काला डिब्बा घरेलू कचरे के लिए है। कचरे से खाद का निर्माण भी किया जाता है।

गंदगी करने पर भारी जुर्माना लगाया जाता है। वहां हर साल अप्रैल जून के बीच ‘स्प्रिंग क्लीन अप’ अभियान चलाया जाता है। जिसमें शहर की पूरी सड़कों को पूरी तरह साफ किया जाता है।

वर्ष 2007 में 'टू गुड टू वेस्ट' कार्यक्रम शुरू किया गया था जिसका उद्देश्य कुछ सामग्रियों को रिसाइकिल कर लैंडफिल में डाले जा रहे कचरे की मात्रा को कम करना था।


सिंगापुर दुनिया के सबसे साफ देशों में से एक है। कहीं भी गंदगी फैलाने वाले पर न्यूनतम 15 हजार रुपए जुर्माना वसूला जाता है। सख्ती का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि साल 2017 में 32 हजार लोगों से 48 करोड़ रुपए जुर्माना वसूला गया। जबकि 2016 में 26 हजार लोग गंदगी करते पाए गए थे। बच्चों में स्वच्छता की आदत डालने के लिए दो साल पहले वहां की सरकार ने नियम बनाया कि बच्चों को क्लासरूम और स्कूल कैंपस खुद ही साफ करना होगा। 

सिंगापुर के इसी मॉडल से प्रभावित होकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत में स्वच्छता मुहिम शुरू की थी।


स्वच्छता के लिए प्रत्येक नागरिक को बनाया जाए जिम्मेदार

गांधी जी ने एक बार कहा था कि स्वच्छता स्वतंत्रता से अधिक महत्वपूर्ण है।
जब तक आप झाड़ू और बाल्टी अपने हाथों में नही लेते, आप अपने शहरों की सफाई नही कर सकते।
दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी खुद ही शौचालय की सफाई में जुट गए थे।
आज फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और वाट्सएप पर समाज में सफ़ाई की बात करने वाला युवा कितने सार्वजनिक शौचालयों और मूत्रालयों की सफाई करते हैं यह आप उनसे पूछ सकते हैं।

गांधीजी कहते थे शौचालय को अपने ड्राइंग रूम की तरह ही साफ रखना जरूरी है।

स्वच्छता के लिए सिर्फ एक दिन या नाम बदलती कुछ वर्षों की योजनाओं की आवश्यकता नही है। एक दिन तो फर्श चमकाने की तरह है घर में झाड़ू तो रोज़ ही लगाना होगा।

कैलगरी की तरह शायद हम भी हर कोने में सफाई करने के लिए वर्ष में एक दिन अपनी गाड़ियों को भी पार्किंग से हटाने लगें।

सफ़ाई के लिए स्कूली बच्चों को जागरूक करना सबसे ज्यादा जरूरी है क्योंकि एक बच्चा घर जाने के बाद सफ़ाई करने के लिए चार अन्य लोगों को भी कह सकता है।

सरकार को स्वच्छता और राजनीति को अलग रख ज़मीनी स्तर पर कार्य करने होंगे। सफ़ाई से सम्बंधित विभागों में और अधिक पारदर्शिता लहर की आवश्यकता है।

दूसरे देशों के मॉडल को जबरदस्ती अपने देश पर नही थोपना होगा। हर देश की संस्कृति और जनता अलग होती है। भारतीय हर काम अपने तरीके से करते हैं। अगर कचरा मुक्त देश चाहते हैं तो समुदाय में ही स्वच्छता की भावना को जगाना होगा।

Wednesday, September 16, 2020

18 सितंबर नैनीताल क्लीन अप डे : क्या देश कुछ अनोखा देखेगा !!

कोरोना संक्रमित होने के बाद एक कोरोना मरीज़ की डायरी मैं रोज़ लिख रहा था पर फिर भी मुझे अपने चारों ओर घटित होने वाली घटनाओं में शामिल न होने की कसक थी ही और एक बहुत ही महत्वपूर्ण घटना मुझसे छूट रही थी जो शायद पूरे भारतवर्ष के लिए एक उदाहरण बन सकती है। 

कोरोना की वज़ह से पूरे देश में बेरोज़गारी, महामारी का डर व्याप्त है और एक नकारात्मकता सी छाई हुई है। पर इन सब के बीच भी कैलाश सत्यार्थी की बाल मजदूरी, बाल शोषण के विरुद्ध खड़ा होने की कक्षा पढ़ नैनीताल आए बसु राय ने पर्यावरण की ओर ध्यान दे नैनीताल की तस्वीर बदलने की ठानी। इसमें उनका साथ दिया सत्तर साल के हो चुके वरिष्ठ पत्रकार और समाजसेवी राजीव लोचन साह जी ने।

जिस नैनीताल के दिन में इतने रूप बदलते हैं कि उन्हें हर प्रसिद्ध छायाकार अपने कैमरे में उतारना चाहता है और जिस शहर का हर कोना लोगों के वॉट्सएप, फेसबुक स्टेटस की शान है वहां अगर सफाई का बीड़ा सैंकड़ों किलोमीटर दूर से आए बसु राय और सत्तर वर्ष के हो चुके राजीव जी को उठाना पड़े तो यह नैनीताल के मूल निवासियों के लिए लज्जा की बात है। यह स्थिति तब है जब विश्वविख्यात पर्यावरणविद वंदना शिवा नैनीताल शहर से ताल्लुक रखती हैं, उनकी प्रारम्भिक शिक्षा सेंट मेरी स्कूल नैनीताल से हुई थी।

शहर के डस्टबिन अक्सर शहर के चारों ओर बदसूरत दिखने का कारण बनते हैं। उनमें कुत्ते, गाय जैसे आवारा पशु अंदर जा कचड़ा खाते हैं। 

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 9 मार्च 1995 को डॉक्टर अजय सिंह रावत बनाम भारतीय संघ और संगठन पर अपने फैसले में कहा था कि नैनीताल एक सुंदर तितली, जिसे एक बदसूरत कैटरपिलर में बदल दिया जाता है। याचिकाकर्ता के अनुसार इसके कारण थे जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण और वीआइपी प्रदूषण।

उत्तराखण्ड पर 'न्यूज़ 18' की एक चौंकाने वाली रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखण्ड हर दिन 1400 टन से अधिक कचड़ा उत्पन्न करता है और इसका शून्य प्रतिशत संसाधित करता है।
उत्तराखण्ड में केवल तीन प्रतिशत नगरपालिका वार्डों में स्त्रोत पर कचड़ा पृथक्करण की सुविधा है।

नैनीताल में कक्षा एक में पढ़ने वाली अवरनिका जोशी जो अपने घर की सफ़ाई से तो सन्तुष्ट है पर सड़क किनारे पड़े कूड़े को लेकर चिंतित है मुझे स्वतः ही ग्रेटा थनबर्ग की याद दिलाती है।
वर्ष 2019 में संयुक्त राष्ट्र के 'उच्चस्तरीय जलवायु सम्मेलन' के दौरान अपने भाषण में सोलह साल की पर्यावरणकर्ता ग्रेटा थनबर्ग ने सभी को झकझोर दिया था। उन्होंने विश्व के बड़े नेताओं से कहा कि "आपने हमारे सपने, हमारा बचपन अपने खोखले शब्दों से छीना, हालांकि मैं अभी भी भाग्यशाली हूं, लेकिन लोग झेल रहे हैं, मर रहे हैं, पूरा ईको सिस्टम बर्बाद हो रहा है"।

आज उस भाषण के लगभग एक साल बाद ग्रेटा का वह डर सच साबित हो गया है। कोरोना भी पर्यावरण के साथ की गई इसी छेड़छाड़ का नतीजा है। लाखों विद्यार्थियों का भविष्य अधर में लटका है और कई छात्र अवसाद में आत्महत्या कर रहे हैं।

2 अक्टूबर 2014 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जन्मदिवस पर भारत सरकार द्वारा 2014 'स्वच्छ भारत मिशन' शुरू किया गया था। भारतीय जनता में तब अपने प्रधानमंत्री को हाथ में झाड़ू पकड़े देख सफाई का एक कीड़ा तो जगा था पर वह ज्यादा दिन नही टिक पाया।

नैनीताल में स्वच्छता दिवस मनाने की बात करें तो श्री राजीव लोचन साह ऑस्ट्रेलियाई नागरिक रेमको वेन सेंटन को याद करते हुए कहते हैं कि वर्ष 2007 में रेमको विश्व के लगभग हज़ार देशों की यात्रा कर यहां पहुंचे थे और वह कहते थे कि नैनीताल जैसा खूबसूरत शहर उन्होंने पूरे विश्व में नही देखा पर लगता है इस शहर को मलेरिया हो गया है इसे सही करो। 

रेमको 'क्लीन अप ऑस्ट्रेलिया' की तर्ज पर नैनीताल की सफ़ाई कराना चाहते थे। जो ऑस्ट्रेलिया में वर्ष 1990 से मनाया जा रहा है। 18.3 मिलियन आस्ट्रेलियाई इस अभियान से जुड़े हैं ,जिन्होंने अपने 36 मिलियन घण्टे इस अभियान को दिए।
वह प्लास्टिक की बोतलें, सिगरेटों के नीचे का हिस्सा, स्ट्रॉ, कॉफी कप, पन्नी की सफाई मुख्य रूप से करते हैं।

वर्ष 2007 में 18 सितम्बर को स्थानीय लोगों के सहयोग और प्रशासन की मदद से पहली बार नैनीताल स्वच्छता दिवस मनाया गया। नैनीताल के विद्यार्थी, बोट वाले, व्यापारी सब इस अभियान से जुड़े। गंदगी दूर होने लगी थी पर फिर इस अभियान पर किन्हीं कारणों से वर्ष 2013 से विराम लग गया। 

रेमको वेन सेंटन तो इस बार कोरोना की वजह से ऑस्ट्रेलिया में ही है पर एक नई टीम और जोश के साथ नैनीताल में इस बार फिर से यह अभियान शुरू किया जा रहा है।

पद्मश्री अवार्डी श्री अनुप साह कहते हैं पुराने समय में मुश्किल हालातों में भी कुड़े का निस्तारण होता था, नियम सख्त थे और लोग अपने कचड़े के लिए खुद जागरूक थे।
अब नैनीताल में पक्षियों ने आना कम कर दिया है। 
कचड़े का सही से निस्तारण न होने का परिणाम कितना गम्भीर हो सकता है यह हम रानीखेत की घटना से जान सकते हैं। जनवरी 2006 में रानीखेत के एक कचड़ा डंप यार्ड के पास सैंकड़ों स्टम्प ईगल बेहोश पाए गए थे।

नैनीताल की श्रीमती उषा लांबा कहती हैं कि पहले सड़कें साफ हुआ करती थी। पर्यटक आकर गन्दगी कर जाते हैं।

तिब्बती समुदाय के येशी कहते हैं नैनीताल शहर हमारा है तो जहां तक हमारी पहुंच होगी हम ही सफाई करेंगे।

45 साल से चली आ रही संस्था युगमंच के अध्यक्ष श्री जहूर आलम कहते हैं की नैनीताल सफाई के मामले में मॉडल था। सफाई अभियान हम अपने बच्चों को बेहतर भविष्य देने के लिए करेंगे।

नैनीताल का प्रशासनिक अमला भी इस अभियान के समर्थन में उतर आया है।

भारत के सबसे साफ शहरों में से एक इंदौर का मॉडल हमारे लिए आदर्श हो सकता है। उसी तरह विश्व के सबसे स्वच्छ शहरों में शामिल सिंगापुर, किगाली और कैलगरी से हम कुछ न कुछ सीख सकते हैं।

इंदौर के नागरिकों ने शहर को साफ और स्वच्छ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। नगर निगम ने कचड़े को स्त्रोत पर ही सफलतापूर्वक अलगाव के लिए नागरिकों को संवेदनशील बनाया और खुले क्षेत्रों में कचड़ा डंप नही किया। इंदौर की स्वच्छता कहानी वास्तव में सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से हुआ परिवर्तन है।

मलेशिया की राजधानी सिंगापुर में खुले में कूड़ा फेंकने पर जुर्माना या सामुदायिक कार्य करने का आदेश मिलता है। सम्बंधित अधिकारी वहां गश्त पर रहते हैं और गंदगी फैलाने वालों को पकड़ लेते हैं।

रवांडा का किगाली शहर विकसित न होने के बाद भी अपनी स्वच्छता के लिए एक उदाहरण है। वहां स्कूलों में युवाओं को सफ़ाई का महत्व सिखाया जाता है तो स्थानीय सामुदायिक केंद्रों में वृद्ध नागरिकों के लिए स्वच्छता शैक्षिक कक्षाएं भी उपलब्ध हैं।

कनाडा के कैलगरी शहर में एक रंगीन बिन प्रणाली पेश की गई है। इसमें काले, नीले और हरे रंग के अलग-अलग डिब्बे होते हैं। 
हरे रंग के डिब्बे खाद्य अपशिष्ट के लिए हैं। नीले कागज़ और पन्नी के लिए और काला डिब्बा घरेलू कचड़े के लिए है। 
गंदगी करने पर भारी जुर्माना लगाया जाता है। वहां हर साल अप्रैल जून के बीच 'स्प्रिंग क्लीन अप' अभियान चलाया जाता है। जिसमें शहर की पूरी सड़कों को पूरी तरह साफ किया जाता है।

गांधी जी ने एक बार कहा था कि स्वच्छता स्वतंत्रता से अधिक महत्वपूर्ण है।
जब तक आप झाड़ू और बाल्टी अपने हाथों में नही लेते, आप अपने शहरों की सफाई नही कर सकते।
दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी खुद ही शौचालय की सफाई में जुट गए थे। 
आज फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और वाट्सएप पर समाज में सफ़ाई की बात करने वाला युवा कितने सार्वजनिक शौचालयों और मूत्रालयों की सफाई करते हैं यह आप उनसे पूछ सकते हैं।

गांधीजी कहते थे शौचालय को अपने ड्राइंग रूम की तरह ही साफ रखना जरूरी है।

18 सितम्बर का 'नैनीताल क्लीनअप डे' सिर्फ सोशल मीडिया पर फ़ोटो अपलोड करने का दिवस न बन जाए। 18 सितम्बर नैनीताल वासियों के मन में सफाई का कीड़ा हमेशा के लिए जगा जाए।

 उस दिन स्वच्छता टीम की योजना कोरोना की वज़ह से सीमित है। वह एक जगह एकत्र न हो 30-35 अलग-अलग स्थानों पर 8-10 लोगों की टीम के साथ सफ़ाई करेंगे जिससे जमा कचड़े को बाद में नियत स्थान पर पहुंचाया जाएगा।

नैनीतालवासी अगर इस अभियान को सफल बना पाए तो यह मॉडल आने वाले समय में पूरे देश के लिए उदाहरण बन सकता है और बार-बार नाम बदलते सफ़ाई अभियानों में समुदाय की भागीदारी से पूरा पासा ही पलट सकता है।

शायद हमें कुड़े के ढेर से गुजरते फिर कभी सांस रोकने की जरूरत न पड़े।

Sunday, September 13, 2020

एक कोरोना पॉजिटिव मरीज़ की डायरी।

बारिश में भीग कपड़े न बदल पाना मेरे लिए इतना महंगा पड़ने वाला है यह मैंने सोचा नही था।
शाम से ही मुझे ठंड महसूस हुई और मैंने अपने पास पहले से उपलब्ध काढ़ा पिया। 

अगली सुबह मुझे हल्का बुखार महसूस हुआ पर फिर दो तीन बार काढ़ा पी वह बुखार जाता रहा।

भीगने के तीसरे दिन मेरा कोरोना टेस्ट हुआ उस समय मुझे फिर से हल्का बुखार महसूस हो रहा था पर रात वह बुखार भी उतर गया था।

दूसरे दिन आई कोरोना रिपोर्ट में मेरा नाम नही था पर अपने आसपास लगातार कोरोना पॉजिटिव मरीज़ मिलने से मेरी चिंता स्वभाविक थी।
बाद में अस्पताल से मुझे अपने कोरोना पॉजिटिव होने की सूचना मिली और मैं अब एक होटल में पहुँच चुका था जहां मुझे दस दिन संगरोध में रहना था।

नकारात्मक विचार मन में आ रहे थे पर तभी कुछ दिन पहले बॉलीवुड एक्टर पूरब कोहली से जुड़ा समाचार याद आया । 
कोरोना पॉजिटिव आने पर उन्होंने कैसे आराम पाने के लिए गुनगुने पानी का गरारा, प्लास्टिक की बोतल में गर्म पानी डाल छाती की सिकाई, भाप लेना सुझाया था। अदरक, शहद , हल्दी का काढ़ा लेने के साथ ही भरपूर आराम को उन्होंने कोरोना का तोड़ बताया था।

उस रात मैंने अपने आने वाले दिनों के लिए एक समय-तालिका तैयार की , परिवार को बताने में हिचकिचाहट थी तो अपने एक मित्र को खुद के पॉजिटिव होने की ख़बर दी और समय से रात दस बजे सो गया।

संगरोध का दूसरा दिन मोबाइल रिसीव करने में ही निकल गया। अगर कोई कोरोना से परेशान नही होगा तो वह इन फोन कॉल्स से तो अवश्य ही मर जाएगा।
एक्टर ड्वेन जॉनसन, फुटबॉलर नेमार के कोरोना पॉजिटिव होने की खबर देखी। ड्वेन जॉनसन (द रॉक) ने कोरोना को हराने के लिए अनुशासन को आवश्यक बताया है।
शायद खाना बदलने या यूं कहें राशन बदलने की वज़ह से मुझे पेट में दिक्कत महसूस हो रही है उम्मीद है दो-तीन दिन में यह ठीक हो जाएगी। शाम पांच बजे बाबा रामदेव के कोरोना से लड़ने के लिए बताए योग किए।
परिवार को खुद के कोरोना पॉजिटिव होने की जानकारी दी और यह भी दिलासा दी कि स्थिति गम्भीर नही है। परिवार को बताना जरूरी है कोरोना पॉजिटिव होना कोई अपराध नही है, मन का एक बोझ हल्का हो जाता है।
खाने का स्तर आज दूसरे दिन भी गिरा हुआ ही रहा , मैं खाने पर कभी कटाक्ष नही करता पर तनाव भरे दिनों में यह मन को उचेटता है।
छाती में आज खिचांव सा महसूस होने लगा है शायद यह कोरोना ही है , नकारात्मक विचार मन को घेरने लगे हैं पर समय-सारणी के अनुसार कार्य कर रहा हूँ।

सोने का समय नज़दीक है, सब कुछ ठीक रहा तो कल मिलते हैं और जानेंगे संगरोध में एक कोरोना रोगी का तीसरा दिन।

तीसरे दिन की सुबह अब तक कि सबसे बेहतरीन है, मैं खुद को पिछले कुछ दिनों में सबसे स्वस्थ महसूस कर रहा हूँ। एक टेस्ट के नतीज़े के परिणामस्वरूप किसी को दस से बीस दिनों के लिए संगरोध में ठूस देना कितना सही है इसका आप खुद निर्णय ले सकते हैं। अभी तक मेरा कोई दूसरा टेस्ट नही हुआ है न ही मुझे कोई दवा दी गई है। साधारण बुखार भी रोगी के शरीर में कुछ दिन रहता ही है।
अखबार में बार, पब और मेट्रो शुरू होने की खबरें छायी हुई हैं। 
यह तो तय है सरकार को चालीस लाख के करीब पहुंच चुके कोरोना मरीज़ों की ज्यादा चिंता नही है।

पहले तो विदेश से आने वाले यात्रियों को पूरे देश में फैलने देना और फिर लॉकडाउन लगा ख़ौफ़ज़दा मज़दूरों को भारत के दूरस्थ क्षेत्रों में कोरोना वाहक बना भेजना। सरकार की रणनीतियों का वास्तव में भगवान ही मालिक है।

खैर अपनी समय- सारणी के अनुसार अनुशासन में रहते हुए आगे का दिन व्यतीत करना है, उम्मीद है अब यह स्वास्थ्य भी साथ देगा।
रात थोड़ा छाती में खिंचाव महसूस हुआ पर यह कोरोना के डर से उत्पन्न भ्रम भी हो सकता है।

डॉक्टर, दवाई, इलाज क्या होता है अब तक पता नही, वो तो मैं पूरब कोहली का अनुसरण कर रहा हूं और मेरी स्थिति गम्भीर नही है नही तो बिन इलाज के दम तोड़ते कोरोना मरीजों की जो वीडियो सोशल मीडिया पर देखी थी वह लाईव देखता।
पानी की गर्म बोतल से छाती सेकने के बाद अब सोने का समय हो गया है।

दरवाज़े की घण्टी के साथ चौथे दिन सुबह मेरी नींद खुली। आज चाय भी अच्छी लगी और स्वास्थ्य भी ठीक है।
छाती में खिंचाव ही पिछले दो दिन से समस्या बना हुआ है पर यह ज्यादा गम्भीर नही है। 

सुप्रीम कोर्ट ने कुछ राज्यों की नीट और जेईई पर छह राज्यों की पुनर्विचार याचिका खारिज़ कर परीक्षा को हरी झण्डी दे दी है, शायद सब मिल कोरोना मरीज़ों का आंकड़ा जल्द से जल्द एक करोड़ पहुंचाना चाहते हैं।
यूट्यूब में कुछ वीडियो देखें जिनमें पेट के बल लेटने से अच्छी श्वसन क्रिया होगी बताया है अतः अब यह प्रयास भी शुरू करूँगा।
शाम होते होते ज्यादा बोलने में खांसी होने लगी है और थोड़ा सा काम करते ही सांस फूल जाती है। 
खाने का मन बिल्कुल नही है और कमज़ोरी हावी होने लगी है, मुझे पता है खाया नही तो फिर अस्पताल का गलूकोज लेना होगा इसलिए रात जबरदस्ती खा सो गया।

पांचवां दिन सुबह आठ बजे दरवाज़े की घण्टी से शुरू हुआ। समय- सारणी के अनुसार उठ तो नही रहा हूँ पर उसका पालन जरूर कर रहा हूँ।
छाती में खिंचाव बढ़ता ही जा रहा है पर आराम से सांस ले पा रहा हूँ। आज खाना खाने में ज्यादा परेशानी नही हुई और कुछ फ़िल्म देख कर दिन व्यतीत किया। 
बुख़ार तो पिछले कुछ दिनों से गायब ही हो गया है। शाम होते-होते खाँसना बढ़ गया था और घुटने में हुए एक छोटे से दाने ने अब भयंकर फोड़े का रूप ले लिया है। नींद आना मुश्किल काम है पर गर्म बोतल से छाती पर सिकाई ने बहुत आराम दिया।

आज कोविड सेन्टर में छठे दिन की शुरुआत खांसी के प्रकोप से होगी सोचा था पर अब तक इतनी ज्यादा परेशानी नही हुई है। समय-सारणी के अनुसार सारे कार्य कर लिए हैं और दिन के भोजन का इंतज़ार है।
शाम तक छाती में कोई खास समस्या महसूस नही हुई है और न ही ज्यादा खांसी।
देश के लिए कोरोना, भारत- चीन सीमा विवाद, कश्मीर, बेरोज़गारी से ज्यादा कंगना, सुशांत विवाद ज्यादा महत्वपूर्ण है। मीडिया वही दिखाता है जो आप देखना चाहते हैं। सरकार वही करती है जिससे उसका नाम हो नही तो जो सुरक्षा कंगना को दी गई है वह उन्नाव रेप पीड़िता को मिलती तो उसकी जान न जाती।

दर्शकों की रुचि सुशांत विवाद में है इसलिए अर्नब जैसे पत्रकार अपना चैनल खोल आज देश के सर्वश्रेष्ठ पत्रकारों में शामिल हो गए हैं और रवीश दर्शकों की गाली खाते रह गए।
आज तीन दिन बाद सोने से पहले का सूरतेहाल लिख पाने में समर्थ हूं नही तो किसी तरह सांस चलते आंख लग जाए और अगली सुबह हो जाए सोचता था।
आज छाती में संक्रमण कम हुआ है जान पड़ता है और यहां का खाना तो किसी को एक महीने में कुपोषण का शिकार बना दे, पौष्टिक तत्व तो हैं पर जीभ में कोई स्वाद तो आए। 
खुद बनाए ऑमलेट से दो रोटी तोड़ पाया। 

कल सातवां दिन शायद मुझे बिल्कुल चंगा कर देगा, उसके लिए मुझे अब सोना होगा।
उम्मीद है सब ठीक रहेगा।

सांतवा दिन सुबह से ही मारे भूख मेरा हाल बुरा होने लगा था। अब यह खाना मेरे लिए मुसीबत बन गया है।जैसा भी स्वाद है अब मुझे यह खाना जबर्दस्ती खाना होगा। 
खांसी की समस्या आज भी थोड़ी बहुत बनी हुई है पर यह गम्भीर नही है। अपने बनाए नियमों का पालन करना है।
पिछले तीन साल से मुझे हर साल एक महीने से ज्यादा खांसी हो रही है यह उससे कम है।
 मुझे नही पता कि सिर्फ खांसी तक सीमित मैं वास्तव में कोरोना संक्रमित हूं भी या नही क्योंकि मेरा सिर्फ एक बार टेस्ट हुआ वह भी तब जब मुझे भीग कर बुखार आया था, न मुझे ज़ुकाम हुआ, न मेरी सूंघने की क्षमता कम हुई और न ही कभी मेरी जिह्वा ने किसी चीज़ का स्वाद लेने से मना किया।
खैर कोविड सेंटर में सांतवां दिन भी समाप्त हुआ।

आज कोरोना सेंटर में आंठवा दिन है सुबह हल्की खांसी बनी हुई है पर सांस लेने में कोई दिक्कत नही है। टेस्ट से पहले जब मुझे बुखार आया था वह दिन बीते आज दस दिन हो गए हैं।
पूरे दिन अपनी बनाई समय सारणी के अनुसार चला और आज लम्बी सांस खींचने पर भी छाती में कोई ज़ोर नही पड़ रहा। आज यहां के बेस्वाद खाने में भी मैंने तीन रोटियां खाई।

कल कोविड सेंटर में मेरा नवां दिन होगा और कोरोना टेस्ट हुए दसवां। कोरोना संक्रमित होने के बाद बुखार आए हुए ग्यारवां। नियमानुसार टेस्ट से दसवें दिन कोविड सेंटर से छुट्टी मिल जा रही है और फिर कुछ दिन गृह संगरोध है। 

शायद अब मैं किसी को संक्रमित नही करूँगा पर कोरोना मेरे शरीर से तो चला गया लोगों के दिमाग से नही। अपने भी कोरोना मरीज़ को बुरी नज़र से देख रहे हैं जबकि आप किसी कोरोना मरीज़ का दूर से तो सामना तो कर ही सकते हैं। क्या मैं अछूत हूँ? क्या मैं ऐसे रोग से ग्रसित हूँ जो असाध्य है? 
शायद यह आलेख पूरे देश में लोगों की कोरोना मरीज़ के प्रति भावना को बदलेगा और लोगों को इससे लड़ने की हिम्मत देगा क्योंकि संख्या लगातार बढ़ ही रही है।

कल मिलते हैं और समाज से बहिष्कृत एक कोरोना मरीज़ की कहानी आप तक लगातार पहुँचेगी।
 शुभ रात्रि।

कोविड सेंटर में नवें दिन की शुरुआत कोविड सेंटर से आज़ादी के फरमान के साथ हुई। अब मुझे सात दिन के लिए होम आइसोलेशन में रहना है। कोविड सेंटर का बुरा खाना किसी भी स्वस्थ व्यक्ति को मरीज़ बना सकता है।
बाहर आकर मैं बिना किसी से सम्पर्क बनाए अपने घर पहुंच चुका हूं और रात मैंने ऐसे खाना खाया जैसे महीनों से भूखा हूँ। शरीर में ठीक से न खाने की वज़ह से कमज़ोरी महसूस हो रही है, यह कोरोना की नही होटल के खाने से उपजी कमज़ोरी है।

भूले भटके कभी कभी एक दो बार खांसी अब भी आ रही है और मैं पहले भी लिख चुका हूं कि यह समस्या मुझे बिन कोरोना के पिछले दो-तीन साल से लगातार है।

अब समय-सारणी भी निरस्त हो चुकी है, मैं रात जल्दी सो गया ।

होम आइसोलेशन का दूसरा दिन अच्छे नाश्ते के शुरू हुआ। अब मेरी पिछले कुछ बुरे दिनों की कमज़ोरी खुद जा रही है।
समय-सारणी का पालन तो अब बन्द हो गया है पर उसमें से योग अब भी जारी है और यह मेरी दिनचर्या में शायद लंबे दिनों तक रहेगा। आज कुछ लिखने के लिए क़लम भी उठाई है। मैं अब खाली समय का सदुपयोग करने की स्थिति में भी हूं।

होम आइसोलेशन का तीसरा दिन और आज महसूस होने लगा है कि मैं अब किसी खतरे में नही हूँ। 
शायद अपनी यह कहानी समाप्त करने का भी समय आ गया है।

अच्छे तरीके से मास्क पहन और सामाजिक दूरी की पालन कर आप खुद को कोरोना संक्रमित होने से बचा सकते हैं ।

अगर आपको कोरोना हो भी जाए तो घबराना बिल्कुल नही है, यह एक साधारण बुखार और खांसी की तरह ही है। घरेलू उपचार अपनाएं और कुछ दवा अपने पास पहले से ही संग्रहित कर अवश्य रखें। अपने विश्वासपात्रों से सम्पर्क में रहें वही इस मुसीबत की घड़ी में आपकी मदद कर सकते हैं।

भारत में मध्यमवर्गीय परिवार के पास हेल्थ इंश्योरेंस बहुत कम रहता है। यदि परिवार के किसी सदस्य को कभी कोई गम्भीर बीमारी हो जाए तो वह जमीन-जायजाद बिकवा कर ही दम लेती है। सम्भव हो तो हेल्थ इंश्योरेंस अवश्य लें।

कोरोना की दवा आने तक अपना और अपने परिवार का ख्याल रखिए। पड़ोस में कोई कोरोना संक्रमित हो जाए तो उसके साथ मंगल ग्रह वासी जैसा व्यवहार बिल्कुल न करें, उनका साथ दें।

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