Saturday, October 29, 2022

'फिल्में और महिलाएं' पढ़िए सिनेमा का महत्वपूर्ण दस्तावेज

'कितनी गिरहें खोली हैं मैंने' पुस्तक का आवरण अनु प्रिया द्वारा तैयार किया गया है. आवरण चित्र पुस्तक के नाम से मेल खाता दिखता है और पाठकों का ध्यान खींचने में सक्षम है. इसे देख लगता है कि पुस्तक में महिलाओं के विषय में कुछ खास लिखा गया है. पिछले आवरण में सम्पादकों के बारे में लिखा गया है. किताब की शुरुआत में 'कस्तूरी' से यह जानकारी मिलती है कि यह किताब कस्तूरी मंच द्वारा आयोजित श्रृंखला 'फिल्में जो सहेजनी हैं' में हुई परिचर्चा का संकलन है.

 चन्द्रकला त्रिपाठी ने बड़े ही विस्तृत तरीके से किताब की भूमिका लिखी है और इसे पढ़ पता चलता है कि किताब में फिल्मों पर लिखे उन्नीस आलेख हैं. यहां हम समझते हैं कि यह किताब सिनेमा की क्षमता और सामाजिक सांस्कृतिक हस्तक्षेप के आयाम लेकर पुरानी नई फिल्मों पर जरूरी बात करती है.

चार शुभकामना सन्देशों के बाद किताब की सम्पादकीय दिखाई देती है. गुलजार की पंक्तियों से शुरू हुई सम्पादकीय में लिखा है की समानांतर सिनेमा ने स्त्री को खुला आकाश दिया है जिसमें आज स्त्रियों की मुक्त भावनाएं अपनी उड़ान भर रही हैं. हिंदी सिनेमा के माध्यम से स्त्री की इन्हीं उड़ानों को देश के विभिन्न विद्वानों की दृष्टि से सुसज्जित महत्वपूर्ण विचारों में संकलित किया गया है, जो इस पुस्तक में देखने को मिल रहा है.
किताब समाप्त करने पर पाठक सम्पादकीय की इन पंक्तियों से स्त्रियों की उड़ान को करीब से समझने में कामयाब हो जाएंगे.

किताब का पहला आलेख साल 1960 में आई 'मुगल-ए- आजम' फिल्म पर लिखा गया है, जिसका शीर्षक बड़ा आकर्षक है. विजय पण्डित के लिखे इस फिल्मी सफर को पढ़ते पाठक एक फिल्म के निर्माण की यात्रा में पूरी तरह से खो जाते हैं.
संवादों की जानकारी बड़े ही रोचक तरीके से लिखी गई है. जैसे 'जब अनारकली कहती है- मुझसे मेरे ख्वाब न छीनिए शहजादे- तो दर्शकों की पीठ पर पसीना उतर आता है'.
आलेख में शामिल 'प्रेमनिघण्टु' जैसे शब्द पढ़ते किताब का कद ऊंचा लगता है.

'तोड़ के बंधन बांधे पायल' आलेख साल 1965 में आई फिल्म 'गाइड' पर लिखा गया है. किताब पढ़ते हम 1960 के बाद आई फिल्मों के बारे में पढ़ते हैं, 2022 में लगभग सत्तर साल पहले के सिनेमा को समझना फिल्म से लगाव रखने वाले पाठकों के लिए बेहतरीन अनुभव होगा.

निर्देश निधि ने 'गाइड' बनने की कहानी लिखने से आलेख की शुरूआत की है.
इसके निर्देशन के किस्से से मालूम चलता है कि फिल्में देश की सांस्कृतिक छवि से कैसे जुड़ी हुई होती हैं.
गाइड पर लिखा यह आलेख तब की फिल्मों में स्त्रियों की छवि को लेकर महत्वपूर्ण दस्तावेज है.
पृष्ठ 40 में लिखी पंक्ति 'शैलेंद्र राजकपूर के खेमे के थे, वे देव आनंद की फिल्म के लिए गीत नही लिखना चाहते थे' वर्षों से बॉलीवुड के बंटे होने की जानकारी देती है.

'सत्यम शिवम सुंदरम' पर लिखा आलेख मुख्य रूप से इस फिल्म के गीतों पर केंद्रित है.
इस आलेख के बाद किताब में साल 1975 में आई तीन फिल्मों अभिमान, आंधी और दीवार पर लिखे आलेख शामिल किए गए हैं.
'अभिमान' पर लिखे आलेख में डॉ लक्ष्मी शर्मा ने फिल्म को पितृसत्ता के चोटिल अहंकार पर केंद्रित बताया है.
पृष्ठ 53 की 'पचास वर्ष पहले बनी अभिमान का विषय भले ही आज के संदर्भ में बेहद सामान्य रह गया हो' पंक्ति से समाज में महिलाओं की बदली हुई स्थिति का पता चलता है.

फिल्म 'आंधी' पर लिखे आलेख में शुरुआती पंक्तियां ही फिल्म का खाका पाठकों के सामने स्पष्ट कर देती हैं. आलेख की खासियत यह है कि सुधा उपाध्याय ने इसे संदर्भ के साथ लिखा है.

किताब में फिल्म 'दीवार' पर शामिल आलेख जितेंद्र श्रीवास्तव द्वारा वर्ष 2015 में दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में दिया गया व्याख्यान है. इस आलेख में अमिताभ के अमिताभ बनने की कहानी को लिखा गया है. अमिताभ का इंदिरा गांधी की राजनीति से जोड़े जाना फिल्म और देश की राजनीति के बीच के सम्बन्ध को दर्शाता है.
पृष्ठ 74 में नायक और कवियों की तुलना किताब का आकर्षण है.

संतोष गोयल द्वारा फिल्म 'बाजार' पर लिखा आलेख 'सो यास-ए-लहू में नहाकर चले' किताब के शीर्षक से न्याय करता जान पड़ता है. बाजार फिल्म पर लिखते संतोष ने पितृसत्तात्मक समाज की कलई खोली है.
'औरत का चेहरा दुनिया भर में एक-सा है' पंक्ति, इसका प्रमाण है.
आलेख के अंत में लड़कियों की स्थिति को लेकर पूछा गया प्रश्न पाठकों के हृदय को कुरेद देगा.

1982 में आई फ़िल्म 'अर्थ' पर लिखे आलेख में उर्मिला शुक्ल द्वारा फिल्म में नारी के चित्रण पर लिखा गया है.
उषा दशोरा का 'प्रेम रोग' पर लिखा आलेख साल 1982 और 2022 के बीच महिलाओं की बदली हुई स्थिति की तुलना करता है.
पृष्ठ 100 में लिखी पंक्ति 'निर्देशक राजकपूर जिस मुहाने पर हमें छोड़ते हैं उससे आगे बस काजल बचाकर रोने का हुनर ही हमारे पास आया' पढ़ते यह महसूस होता है कि आज इतने सालों बाद भी महिलाओं की स्थिति बिल्कुल नही बदली.

1983 में आई फिल्म 'मासूम' पर लिखे आलेख की पंक्ति 'फिल्म में शबाना आजमी को अपने पति नसरुद्दीन को तैयार करते, पति के लिए चाय बनाते दिखाया गया है. एक पुरुष प्रधान समाज में इन दृश्यों से बहुत फर्क पड़ा' इस बात का उदाहरण है कि समाज में फिल्मों का गहरा प्रभाव पड़ता है.

निवेदिता दिनकर का फिल्म 'उत्सव' पर लिखा आलेख पढ़ते हुए आपको इस फ़िल्म को देखने की तीव्र इच्छा होने लगेगी. निर्देशक और निर्माता के बारे में बड़े ही निराले अंदाज में लिखा गया है. कलाकारों, गीत संगीत के बारे में पढ़ना भी अस्सी के दशक में पहुंचा देता है. 'स्त्री' को कलाकार की प्रेरणा बता लेखिका ने पाठकों को स्त्रियों का महत्व बताने की कोशिश की है.

रश्मि रविजा द्वारा फिल्म 'लज्जा' पर लिखे आलेख का शीर्षक 'कौन शहर कौन डगर तू चली कहाँ' है, यह भी हर आलेख के शीर्षक की तरह आकर्षक है और पाठकों का ध्यान खींचने में सक्षम है. आलेख में फिल्म 'लज्जा' में स्त्रियों से जुड़े हर मुद्दे उठाने के बारे में लिखा गया है. पृष्ठ 138 में 'रामदुलारी' के बारे में जो भी लिखा है वह आज भी घटित हो रहा है और रश्मि ने इसे फिल्म के साथ जोड़कर इस किताब की यात्रा को कभी न भूलने वाला बना दिया है.

सम्पादकों ने किताब के लिए ऐसी फिल्मों का चुनाव किया है जिन फिल्मों ने समाज में नारी को लेकर कुछ न कुछ विशेष दिखाया और सिखाया. इन फिल्मों पर लिखे आलेख पढ़ पाठकों को भारतीय नारी की बदलती सामाजिक दशा के बारे में भी जानकारी मिलती रही.
प्रज्ञा पाण्डेय की साल 2019 में आई 'बदला' फिल्म पर लिखे आलेख में 'नैना टॉप क्लास की बिज़नेस वुमन है' पंक्ति इसका उदाहरण है.

पाठकों को यह किताब पढ़ते भारतीय सिनेमा और उसमें महिलाओं की स्थिति में जो जानकारी मिलती है, उससे यह स्पष्ट होने लगता है कि कुछ फिल्मों में महिलाओं की स्थिति ठीक वैसी ही दिखाई गई जैसी उस समय के समाज में थी वहीं कुछ फिल्मों में उनकी स्वतन्त्रता पर इस तरह बात की गई जैसी उस समय के समाज में स्वीकार्य नही थी.
यह किताब शुरुआत से अंत तक पाठकों को बिल्कुल नीरस नही लगती.

चित्रा माली का संदर्भ सहित लिखा गया आलेख 'स्त्री प्रतिरोध स्वर : सन्दर्भ हिंदी सिनेमा' नारीवाद की दूसरी लहर और तीसरी लहर के उद्देश्यों के सिनेमा पर प्रभावों पर केंद्रित है. यह आलेख इस तथ्य को प्रमाणित कर देता है कि सिनेमा समाज को देखने का दर्पण है.

रक्षा गीता द्वारा लिखा गया आलेख 'ऐतिहासिक फिल्मों में स्त्री अस्मिता' इस महत्वपूर्ण किताब का अंतिम आलेख है.
इसमें रक्षा ने 1983 में आई 'रजिया सुल्तान' फिल्म का उदाहरण देकर यह समझाया है कि किस तरह फिल्मों में महिलाओं के सशक्त चरित्रों के साथ छेड़खानी कर पितृसत्ता को बढ़ाचढ़ा कर दिखाया जाता है.
यह किताब भारतीय सिनेमा पर एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है और प्रकाशक की एक शब्द को दो बार लिखना व शीर्षक और पैराग्राफ में सालों के अंतर जैसी तीन-चार त्रुटियों को अगर ज्यादा तवज्जो न दी जाए तो 'सिनेमा ये शानदार है'.

हिमांशु जोशी।
@himanshu28may

Tuesday, October 25, 2022

त्योहारों की इस चकाचौंध के बीच कैसी है प्रकाशकों की दीवाली.

भारत में चल रहे त्योहारों के इस सीजन में ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइटों व बाजारों में मोबाइल, कपड़ों, ड्राई फ्रूट्स की खूब बिक्री हुई है। दीवाली में पटाखों की बिक्री में भी कोई कमी नही देखी गई।

सारा जहां गुलज़ार है पर प्रकाशकों के सामने पतझड़ सा मौसम है।
हिंदी के लोकप्रिय लेखक अशोक पांडे की 'तारीख में औरत', 'अरविंग स्टोन विन्सेन्ट' किताबें प्रकाशित करने वाले सम्भावना प्रकाशन के अभिषेक अग्रवाल ने प्रकाशन जगत की दयनीय स्थिति को हमारे सामने रखा। अपनी फेसबुक पोस्ट में वह त्योहारी सीजन में किताबों पर आकर्षक ऑफर देते हुए उसे अपने जीवन की सबसे बड़ी घटना बताते हैं।
इस पोस्ट में वह इस ऑफर की कामयाबी को 'संभावना प्रकाशन' की साँसों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण भी मानते हैं ।

एक तरफ मोबाइल कंपनियां और उन्हें बेचने वालों ने त्योहारी सीजन में अच्छा लाभ कमाया। वहीं प्रकाशक, किताब पढ़ने की खत्म होती संस्कृति की वजह से अपनी किताबों पर इतना भारी डिस्काउंट देने के लिए मजबूर हैं।

लगभग सभी प्रकाशकों का यही हाल है.

इलाहबाद डायरी, नैन बंजारे, चौरासी, गांधी की सुंदरता, नमक स्वादानुसार जैसी किताबें प्रकाशित कर चुके
हिन्द युग्म प्रकाशन ने बहुत ही कम समय में हिंदी साहित्य जगत में अपनी अलग पहचान बनाई है। हिन्द युग्म ने त्यौहारी सीजन के बीच अपनी किताबों पर डिस्काउंट दिया।


हिंदी के सबसे बड़े प्रकाशन समूह राजकमल प्रकाशन ने इस सीजन में 'किताबतेरस' नाम से ऑफर निकाला।



मेरा कमरा,सफर हमारे,कारी तू कभी ना हारी, कोतवाल का हुक्का,हैंडल पैंडल जैसी शानदार किताबों के प्रकाशक काव्यांश प्रकाशन ने भी दीपावली पर किताबों में छूट दी। किताबों की कम होती खरीद पर काव्यांश प्रकाशन के प्रबोध उनियाल कहते हैं कि हिंदी साहित्य की किताबों की खरीद को लेकर यह संकट नया नहीं है।
एक विशेष पाठक वर्ग ही इन किताबों को खरीदता है।
किताबों में छूट के ऑफर बहुत ज्यादा लुभाते होंगे ,मुझे ऐसा नहीं लगता लेकिन अब हमें तो ये भी करना ही है।


नवारुण प्रकाशन से प्रकाशन की दुनिया पर बातचीत

मैं एक कारसेवक था, टिकटशुदा रुक्का, गाजीपुर में क्रिस्टोफर कॉडवेल, बब्बन कार्बोनेट जैसी किताबें प्रकाशित करने वाले नवारुण प्रकाशन के संजय जोशी ने अपनी फेसबुक पोस्ट पर लिखा।

बिना ऑफर की दीवाली 

हमें बहुत खेद के साथ यह सूचित करना पड़ रहा है कि नवारुण प्रकाशन की तरफ से इस दीवाली हमारी कोई उपहार योजना नहीं है। हम भी किताब तेरस मनाना चाहते हैं लेकिन पिछले दिनों कागज़ की कीमतों में जिस तरह तेजी आई है ,सस्ते प्रकाशन करना एक मुश्किल पहेली बन गया है।

हम यह जरूर दुहरा रहे हैं कि पहले की तरह हम अब भी बेरोजगार विद्यार्थियों और पूरावक्ती राजनीतिक कार्यकर्ताओं को हर संभव छूट देंगे। हम यह भी दुहरा रहे हैं कि नवारुण से प्रकाशित हर लेखक को अनुबंध के मुताबिक उनकी रायल्टी समय से दी जाएगी और पहले की तरह आगे भी किसी किताब का प्रकाशन लेखक से बिना पैसे लिए किया जाएगा।

असल में हम तो अपने शुभेच्छु पाठकों से अनुरोध कर रहे हैं कि वे इस मौके पर अधिकाधिक किताबें अपने किताब प्रेमी मित्रों को भेंट कर नवारुण की मुश्किलों को थोड़ा कम करने में मदद करें।
                                                       
इस मौके पर हम यह भी वायदा करते हैं कि हम पूरी कोशिश करके अपने समय की बेहतरीन पांडुलिपि आपके लिए पूरे प्रोफेशनल अनुशासन के साथ प्रकाशित करेंगे।

उनकी इस पोस्ट पर संजय जोशी से बातचीत की गई तो उन्होंने बताया कि हम हर साल किताबों पर डिस्काउंट निकालते थे, इस साल पिताजी शेखर जोशी के गुजर जाने के बाद हमें इतना वक्त नही मिला।
 वैसे डिस्काउंट पर इससे पहले का भी अनुभव ठीक नही रहा था, बहुत प्रचार करने के बाद भी किताबें कम बिकती थी।
 अभी हिंदी पट्टी में शायद किताबें लोगों की जरूरत नही है।
जिन प्रकाशकों की किसी संस्थागत खरीद की व्यवस्था है वह सही स्थिति में हैं, लेकिन पाठकों के बूते प्रकाशन चलाने वालों के लिए बहुत मुश्किल है। कागज के दाम में पिछले एक- डेढ़ साल में करीब सौ से डेढ़ सौ प्रतिशत की वृद्धि हुई है और प्रॉफिट मार्जिन बहुत कम हुआ है।
ये जरूर है दलित विमर्श की किताबें खूब खरीदी और भेंट की जा रही हैं और इनकी बिक्री भी है पर कहानी, कविता, यात्रा वृतांत का स्वागत नही हो रहा है।
पिछले एक दो सालों में किताबों की बिक्री में भारी कमी आई है।
दीवाली पर लोग काजू, बादाम जैसे गिफ्ट देते हैं पर किताब नही देते क्योंकि इनमें लोगों की रुचि खत्म हो रही है। प्रकाशक के लिए डिस्काउंट देना बड़ा मुश्किल है। रॉयल्टी, डिजाइनर को पैसा देकर प्रकाशकों के लिए पैसा बचाना बड़ा मुश्किल काम है।
उत्तराखंड में आरम्भ स्टडी सर्किल, पिथौरागढ़ और  नानकमत्ता पब्लिक स्कूल, नानकमत्ता छात्रों में चेतना जगा कर जगह जगह पुस्तक मेला लगा रहे हैं। इस तरह पढ़ने-लिखने की संस्कृति को बढ़ावा देना जरूरी है, तभी लोग किताब खरीदेंगे। प्रकाशन कोई अलग गतिविधि नही है, यह समाज से ही जुड़ी है।



क्या कहते हैं सालों से किताबों के व्यवसाय से जुड़े जयमित्र

वर्ष 1988 से शुरू हुए 'अल्मोड़ा किताब घर' के जयमित्र सिंह बिष्ट कहते हैं कि कुछ प्रकाशकों ने इस बार किताबों की बिक्री पर आकर्षक ऑफर रखे हैं, जिसका उन्हें फायदा भी मिला है। लेखक अशोक पांडे की 'लपूझन्ना' किताब पहले दिन से ही ऑनलाइन उपलब्ध थी बावजूद इसके उन्होंने अपने स्टोर पर इसकी रिकॉर्ड बिक्री करी है।
वह कहते हैं कि लोगों के अंदर इस त्योहारी सीजन में किताबों को लेकर अलग से तो कोई उत्साह नही है पर नियमित ग्राहक किताब खरीद ही रहे हैं और कुछ नए ग्राहक भी हमसे जुड़े हैं। मार्केटिंग ठीक से की जाए तो किताबें बिक सकती हैं।

हिमांशु जोशी
@himanshu28may


(फोटो - आरम्भ स्टडी सर्किल, पिथौरागढ़ द्वारा आयोजित पुस्तक मेला)

Sunday, October 23, 2022

विराट पर्व में झूम उठा भारत।


आखिरी ओवर का रोमांच, सांस रोकने वाला
विराट और हार्दिक की साझेदारी।
रउफ की पिटाई
आखिरी ओवर
हार्दिक आउट
फ्री हिट
कार्तिक आउट
 अंतिम गेंद

Saturday, October 22, 2022

कैसी है प्रकाशकों की दीवाली.

भारत में चल रहे त्योहारों के इस सीजन में ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइटों पर खूब बिक्री हुई है. शॉपिंग वेबसाइटों द्वारा इस सीजन में ऑनलाइन फेस्टिव सेल आयोजित करी गई, जिनमें
सबसे अधिक बिक्री मोबाइल फोन की हुई है. स्ट्रैटिजी कंसल्टेंसी फर्म रेडसीर के अनुसार त्योहारी सीजन की पहली ऑनलाइन सेल के दौरान प्रति घंटे 56,000 मोबाइल फोन बेचे गए. 
मोबाइल फोन में डूबे भारत में किताबों की बिक्री बहुत पीछे छूट गई है. कोई भी देश तभी आगे बढ़ता है जब वहां के नागरिक किताबों से दोस्ती करें. 

हिंदी के लोकप्रिय लेखक अशोक पांडे की 'तारीख में औरत', 'अरविंग स्टोन विन्सेन्ट' किताबें प्रकाशित करने वाले सम्भावना प्रकाशन के अभिषेक अग्रवाल ने प्रकाशन जगत की दयनीय स्थिति को हमारे सामने रखा. अपनी फेसबुक पोस्ट में वह लिखते हैं.

यह मेरे जीवन की सबसे बड़ी घटना है 

संभावना प्रकाशन एक साथ ग्यारह नयी किताबें आपके सामने ला रहा है किताबों का विवरण निम्न है 

1 अँधेरे में पिता की आवाज़ : सतीश नूतन (कविता संचयन) मूल्य : 400
2 भारत की घड़ी : प्रियदर्शन (समय समीक्षा) मूल्य : 350
3 एक सफ़र मुकम्मल : दिवाकर मुक्तिबोध (आत्म वृत्तान्त) मूल्य : 350
4 जीवन जैसे पहाड़ : देवेन्द्र मेवाड़ी (आत्मकथा) मूल्य :  300
5 दमनचक्र : सुधा अरोड़ा (कहानी संग्रह) मूल्य : 300
6 आहार घोंसला : अशोक अग्रवाल (कहानी संग्रह)  मूल्य : 300
7 राजमार्ग क्रमांक 6 : सतीश जायसवाल (कहानी संग्रह) मूल्य : 250
8 नीली गिटार : दीपक शर्मा (कहानी संग्रह) मूल्य : 350
9 जगह की जगह : रामकुमार तिवारी (कहानी संग्रह) मूल्य : 300
10 बाघैन : नवीन जोशी (कहानी संग्रह) मूल्य : 300
11. मैं थिगली में लिपटी थेर हूँ : ज्योति रीता (कविता) मूल्य : 199

3400 रुपये का यह सेट दिवाली के शुभ मौके पर आप पा सकते हैं मात्र 2300 रुपये के अग्रिम भुगतान पर .

इस पुस्तक सेट की कामयाबी संभावना प्रकाशन की साँसों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है आपका योगदान हमारे लिए बेहद अहम् है.

एक तरफ मोबाइल कंपनियां और उन्हें बेचने वालों ने त्योहारी सीजन में अच्छा लाभ कमाया. वहीं प्रकाशक, किताब पढ़ने की खत्म होती संस्कृति की वजह से अपनी किताबों पर इतना भारी डिस्काउंट देने के लिए मजबूर हैं.

इलाहबाद डायरी, नैन बंजारे, चौरासी, गांधी की सुंदरता, नमक स्वादानुसार जैसी किताबें प्रकाशित कर चुके
हिन्द युग्म प्रकाशन ने बहुत ही कम समय में हिंदी साहित्य जगत में अपनी अलग पहचान बनाई है. हिन्द युग्म ने त्यौहारी सीजन के बीच अपनी किताबों पर डिस्काउंट दिया .


नवारुण प्रकाशन से प्रकाशन की दुनिया पर बातचीत

मैं एक कारसेवक था, टिकटशुदा रुक्का, गाजीपुर में क्रिस्टोफर कॉडवेल, बब्बन कार्बोनेट जैसी किताबें प्रकाशित करने वाले नवारुण प्रकाशन के संजय जोशी ने अपनी फेसबुक पोस्ट पर लिखा.

बिना ऑफर की दीवाली 

हमें बहुत खेद के साथ यह सूचित करना पड़ रहा है कि नवारुण प्रकाशन की तरफ से इस दीवाली हमारी कोई उपहार योजना नहीं है. हम भी किताब तेरस मनाना चाहते हैं लेकिन पिछले दिनों कागज़ की कीमतों में जिस तरह तेजी आई है ,सस्ते प्रकाशन करना एक मुश्किल पहेली बन गया है.

हम यह जरूर दुहरा रहे हैं कि पहले की तरह हम अब भी बेरोजगार विद्यार्थियों और पूरावक्ती राजनीतिक कार्यकर्ताओं को हर संभव छूट देंगे . हम यह भी दुहरा रहे हैं कि नवारुण से प्रकाशित हर लेखक को अनुबंध के मुताबिक उनकी रायल्टी समय से दी जाएगी और पहले की तरह आगे भी किसी किताब का प्रकाशन लेखक से बिना पैसे लिए किया जाएगा.

असल में हम तो अपने शुभेच्छु पाठकों से अनुरोध कर रहे हैं कि वे इस मौके पर अधिकाधिक किताबें अपने किताब प्रेमी मित्रों को भेंट कर नवारुण की मुश्किलों को थोड़ा कम करने में मदद करें.                                                                   
इस मौके पर हम यह भी वायदा करते हैं कि हम पूरी कोशिश करके अपने समय की बेहतरीन पांडुलिपि आपके लिए पूरे प्रोफेशनल अनुशासन के साथ प्रकाशित करेंगे.

उनकी इस पोस्ट पर संजय जोशी से बातचीत की गई तो उन्होंने बताया कि हम हर साल किताबों पर डिस्काउंट निकालते थे, इस साल पिताजी शेखर जोशी के गुजर जाने के बाद हमें इतना वक्त नही मिला.
 वैसे डिस्काउंट पर इससे पहले का भी अनुभव ठीक नही रहा था, बहुत प्रचार करने के बाद भी किताबें कम बिकती थी.
 अभी हिंदी पट्टी में शायद किताबें लोगों की जरूरत नही है.
जिन प्रकाशकों की किसी संस्थागत खरीद की व्यवस्था है वह सही स्थिति में हैं, लेकिन पाठकों के बूते प्रकाशन चलाने वालों के लिए बहुत मुश्किल है. कागज के दाम में पिछले एक- डेढ़ साल में करीब सौ से डेढ़ सौ प्रतिशत की वृद्धि हुई है और प्रॉफिट मार्जिन बहुत कम हुआ है.
ये जरूर है दलित विमर्श की किताबें खूब खरीदी और भेंट की जा रही हैं और इनकी बिक्री भी है पर कहानी, कविता, यात्रा वृतांत का स्वागत नही हो रहा है.
पिछले एक दो सालों में किताबों की बिक्री में भारी कमी आई है.
दीवाली पर लोग काजू, बादाम जैसे गिफ्ट देते हैं पर किताब नही देते क्योंकि इनमें लोगों की रुचि खत्म हो रही है. प्रकाशक के लिए डिस्काउंट देना बड़ा मुश्किल है. रॉयल्टी, डिजाइनर को पैसा देकर प्रकाशकों के लिए पैसा बचाना बड़ा मुश्किल काम है.
उत्तराखंड में आरम्भ स्टडी सर्किल, पिथौरागढ़ और  नानकमत्ता पब्लिक स्कूल, नानकमत्ता छात्रों में चेतना जगा कर जगह जगह पुस्तक मेला लगा रहे हैं. इस तरह पढ़ने-लिखने की संस्कृति को बढ़ावा देना जरूरी है, तभी लोग किताब खरीदेंगे. प्रकाशन कोई अलग गतिविधि नही है, यह समाज से ही जुड़ी है.


क्या कहते हैं सालों से किताबों के व्यवसाय से जुड़े जयमित्र

वर्ष 1988 से शुरू हुए 'अल्मोड़ा किताब घर' के जयमित्र सिंह बिष्ट कहते हैं कि कुछ प्रकाशकों ने इस बार किताबों की बिक्री पर आकर्षक ऑफर रखे हैं, जिसका उन्हें फायदा भी मिला है. लेखक अशोक पांडे की 'लपूझन्ना' किताब पहले दिन से ही ऑनलाइन उपलब्ध थी बावजूद इसके उन्होंने अपने स्टोर पर इसकी रिकॉर्ड बिक्री करी है. 
वह कहते हैं कि लोगों के अंदर इस त्योहारी सीजन में किताबों को लेकर अलग से तो कोई उत्साह नही है पर नियमित ग्राहक किताब खरीद ही रहे हैं और कुछ नए ग्राहक भी हमसे जुड़े हैं. मार्केटिंग ठीक से की जाए तो किताबें बिक सकती हैं.

हिमांशु जोशी
@himanshu28may

Thursday, October 6, 2022

उत्तराखंड में हिमस्खलन , पर्वतारोहण की मुश्किलें और भविष्य.

उत्तरकाशी के द्रौपदी का डांडा द्वितीय पहाड़ पर हिमस्खलन की वजह से पर्वतारोहियों के फंसने की सूचना आई थी, जिसमें अब तक 27 लोगों के शव मिल गए हैं.

इस हिमस्खलन में उत्तरकाशी के गांव लोन्थरु की पर्वतारोही सविता कंसवाल की भी मृत्यु हो गई. सविता कंसवाल ने इस साल 12 मई को समुद्र तल से लगभग 8848 मीटर ऊंचे एवरेस्ट शिखर पर पर्वतारोहण किया था, इसके 16 दिन बाद ही 28 मई को उन्होंने समुद्र तल से 8463 मीटर ऊंचे माउंट मकालू शिखर पर भी पर्वतारोहण किया.
तकनीकी रूप से बेहद कठिन माने जाने वाले माउंट मकालु पर एवरेस्ट पर्वतारोहण के 16 दिन के भीतर ही चढ़ जाने की वजह से सविता कंसवाल ने पर्वतारोहण की दुनिया में तहलका मचा दिया था. इससे पहले साल 2019 में सविता कंसवाल समुद्र तल से 7120 मीटर ऊंचे त्रिशूल शिखर पर भी पर्वतारोहण कर चुकी थी. अभावों के बीच से निकलकर पहाड़ों की रानी बनने की सविता कंसवाल की ये कहानी अद्भुत रही और हमेशा याद की जाएगी.

कम नहीं है पर्वतारोहण की चुनौतियां

पर्वतारोहण खेल लगता बड़ा आकर्षक है पर यह बहुत चुनौतीपूर्ण है कई लोग इसे मजे के तौर पर ले लेते हैं और अपनी जान गवां देते हैं.
पहाड़ चढ़ने के दौरान सबसे ज्यादा मौतें हाइपोथर्मिया की वजह से होती हैं.
पिछले साल अक्टूबर में मुंबई के तीन पर्यटकों की हिमाचल प्रदेश में इसी वजह से मौत हो गई थी. 
जब शरीर का तापमान गर्मी तेजी से होने लगता है और यह 35 डिग्री या इससे कम हो जाता है तो उसे हाइपोथर्मिया बोला जाता है. इसके शिकार लोगों को अत्यधिक कंपनी महसूस होने लगती है, सोचने की क्षमता पर भी असर पड़ता है.
पर्वतारोहण के दौरान ट्रेनिंग में कमी भी जानलेवा साबित होती है. कई बार अनुभवी प्रशिक्षक भी पर्वतारोहण के दौरान ओवरकॉन्फिडेंस में मौसम का मिजाज समझने नाकामयाब होते हैं या उसके खतरे को हल्के में लेते हैं और मारे जाते हैं.
पर्वतारोहण में वाइट आउट आम समस्या है, चारों तरफ बर्फ देखने से मार्ग समझने में भ्रम पैदा हो जाता है. कंपास की कुशल जानकारी रखने वाला ही इस समस्या से बच सकता है.
पर्वतारोहण में ट्रैफिक की समस्या भी आने लगी है साल 2019 में एवरेस्ट में पर्वतारोहण के दौरान यह समस्या लोगों की नजरों में आई थी. सीमित संसाधनों के साथ पहाड़ चढ़े लोगों के लिए ट्रैफिक की वजह से चढ़ाई और मुश्किल बन जाती है.

पर्वतारोहियों के लिए एक्यूट माउंटेन सिकनेस भी एक बड़ी समस्या है.

यह एक ऐसी बीमारी है जो आमतौर पर 8000 फीट से अधिक ऊंचाई पर पर्वतारोहियों या यात्रियों को प्रभावित कर सकती है. एक्यूट माउंटेन सिकनेस हवा के दबाव में कमी और ऊंचाई पर कम ऑक्सीजन के स्तर के कारण होता है.

जितनी तेजी से पर्वतारोही ऊंचाई पर चढ़ते हैं, उतनी ही अधिक संभावना है कि वह इसके शिकार होंगे. इसके लक्षणो में उल्टी आना, सिरदर्द, हाथ पैरों में सूजन शामिल है.

पर्वतारोहण की चुनौतियों पर बात करते जानेमाने पर्वतारोही सुभाष तराण कहते हैं

पर्वतारोहण किसी व्यक्ति की शारिरिक और मानसिक इच्छाशक्ति की सीमाओं की कसौटी है. यह एक ऐसा खेल है जहाँ आप अपनी जान को दांव पर लगाते हो और पुरस्कार में रोमांच के साथ साथ उसे वापस पाते हो. पर्वतारोहण एक ऐसा खेल है जिसमें कोई दर्शक नही होता, वहां पर्वतारोही को अपनी पीठ खुद ही थपथपानी पड़ती है और खतरों से जूझते हुए आगे बढना होता है. पहाड़ की चोटी से जो दृश्य एक पर्वतारोही की आंखें देख सकती हैं, वह दृश्य शब्दों और तस्वीरों में उसका आधा भी नही समा पाता. एक पर्वतारोही पर्वतारोहण के दौरान पहाड़ की चोटी ही नही चढ़ता, वह उस दौरान उस पूरे क्षेत्र की सामाजिक, ऐतिहासिक और भौगोलिक स्थिति के बारे में जान सकता है. पर्वतारोहण का एक महत्वपूर्ण पक्ष पर्यावरण की वह समझ भी है जो अधिकतर व्यक्तियों में पूरी उम्र नही आ पाती.

पर्वतारोहण के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं को रोका तो नही जा सकता लेकिन बचाव की आधुनिक तकनीकों और जरूरी उपकरणों का इस्तेमाल कर जान माल के नुकसान को कम किया जा सकता है.  हिमालय का एक बड़ा भाग भारत में पड़ता है जबकि प्राकृतिक आपदाओं के चलते होने वाली दुर्घटनाओं के लिए हिमालय के पहाड़ी प्रदेशों के पास बचाव हेतु उचित साधन और व्यवस्थाएं नही के बराबर है. एसडीआरएफ जैसे बचाव दल पहाड़ के निचले क्षेत्रों में तो कामयाब हो सकते है लेकिन ऊंचाई वाले क्षेत्रो में, जहां बिना एक्लमटाईजेशन प्रोसेस के एक घंटा रहना भी मुश्किल है. दुर्घटना और खराब मौसम की परिस्थिति में यह बचाव दल कैसे किसी और का बचाव कर सकते हैं. आईटीबीपी और सेना का भी हाल कुछ अलग नही है. 

पर्वतारोहण के दौरान शेरपाओं के भरोसे पहाड़ की चोटियों पर चढ़ने वालों से बेवजह की उम्मीद पालना ठीक नही है.
इससे बेहतर है कि हिमालय के इन दुरूह क्षेत्रो में स्वैच्छिक रूप से हाई एल्टिट्यूड में काम करने वाले सेना, अर्ध सैनिक बल, तथा दूसरे सरकारी/अर्द्ध सरकारी विभागों के अलावा स्थानीय युवाओं को लेकर एक ऐसे टास्क फोर्स का गठन किया जाए जो ऐसे समय में तुरंत हरकत में आ जाए. 
अभी कुछ दिन पहले मनासलू के सम्मिट कैंप के उपर हुए हिमस्खलन में बहुत से लोग दब गये थे, लेकिन बर्फ का मिजाज समझने वाले स्थानीय शेरपाओं ने बर्फ में दबे ऐसे बहुत से लोगों की जान बचाई जिनका बचना लगभग असंभव बताया जा रहा था. आप अगर बर्फीले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों से पूछेंगे कि बर्फीली पहाड़ी पर कब चढ़ना है, वह आपको बर्फ में हाथ लगाकर ही उसका मिजाज बता देंगे.

भारत में साहसिक खेलों के विकास पर झटका है यह हिमस्खलन

भारत में साहसिक खेल बहुत कम खेले जाते हैं. कुछ खेलों के संसाधन बहुत महंगे होते हैं और कुछ खेल सस्ते संसाधन के बावजूद लोकप्रिय नही हैं.

साइकिल रेसिंग, कार रेसिंग, पर्वतारोहण आदि खेलों को हम साहसिक खेलों में शामिल कर सकते हैं.

 जलवायु परिवर्तन के इस कठिन समय में पर्वतारोहण अब जोखिम भरा बन गया है. भारत में साहसिक खेलों के विकास पर इस हिमस्खलन की खबर से रोक लगेगी और अभिभावक अपने बच्चों को ऐसे खेलों में भेजने से डरेंगे.

हिमांशु जोशी

@himanshu28may


केदारनाथ धाम में आई 2013 की आपदा अब भी लोगों की यादों में ताजा है.

 अब फिर से केदारनाथ धाम के चोराबाड़ी ग्लेशियर के कैचमेंट में 22 सितम्बर की शाम हिमस्खलन हुआ और फिर इसी क्षेत्र के आसपास 1 अक्टूबर की सुबह भूस्खलन हुआ. इन दोनों हिमस्खलन में किसी को नुकसान नही पहुंचा.

https://twitter.com/ANINewsUP/status/1576036923138662401

4 अक्टूबर को उत्तरकाशी के द्रोपदी का डांडा में हिमस्खलन।


साइंस डॉट ऑर्ग में साल 2019 में हिमालय में पिछले चालीस सालों में कितनी बर्फ पिघली, इस पर एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई।
इस रिपोर्ट में साल 1975-2000 और 2000-2016 के अंतराल के दौरान हिमालय में बर्फ की मोटाई में परिवर्तन को मापा गया। जिसमें साल 2000-2016 के दौरान औसत हानि दर को दोगुना पाया गया।

भारत और पाकिस्तान में इस साल भीषण गर्मी पड़ी थी, जिनसे ग्लेशियर पिघलने और बाढ़ आने का खतरा बढ़ गया। पाकिस्तान में इस साल तापमान सामान्य से पांच से सात डिग्री सेल्सियस ज्यादा रहा।

https://twitter.com/WMO/status/1519613185191469057


विश्व के पर्यावरण पर नज़र रखने वाली संस्था विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार

ग्रीनलैंड में इस बार दर्ज आंकड़ों में सबसे ज्यादा गर्म सितम्बर रहा है।

https://twitter.com/WMO/status/1577980140457541633




पाकिस्तान में जो इस साल हुआ उसका अंदेशा पहले से ही था।

2019 में विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने यह वीडियो साझा करी थी, जिसमें पाकिस्तान के पिघलते ग्लेशियरों को देखा गया था।

https://twitter.com/WMO/status/1081207753698435074


 

जलविद्युत बांध पहले के अनुमान से कहीं अधिक ग्लोबल वार्मिंग के लिए दोषी है। अध्ययन में दावा किया गया है कि 100 साल पुराने बांध, धान के खेतों और बायोमास जलाने से भी अधिक मीथेन का उत्सर्जन करते है। हिमालयी प्रदेश उत्तराखंड में ऐसे कई बांध हैं म



पर्यावरण मामलों के विशेषज्ञ डॉ एस पी सती
मार्च में दिन का औसत तापमान करीब 15 डिग्री सेल्सियस रहता है लेकिन इस साल मार्च में तापमान इससे काफी ज्यादा रहा जिससे कश्मीर में सेब की फसल जल्दी आ गई. इसके बाद तापमान में तेज उतार-चढ़ाव के कारण कलियां झड़ गईं और संक्रामक रोग फैलने लगे.
सामान्य तौर पर कश्मीर में जून महीने में ओले नहीं पड़ते लेकिन अब उनकी तीव्रता बढ़ रही है जिसकी वजह से सेब की फसल खराब हो रही है.



आई. पी. सी. सी. रिपोर्ट के अनसार दक्षिण एशिया की लगभग ¾ अर्थव्यवस्था मानसूनी वर्षा पर आधारित है । जलवाय परिवर्तन से उत्पन्न मानसूनी वर्षा में उतार चढाव किसानों की आय प्रभावित कर सकता है क्योंकि ज्यादातर किसानों की आय का एक मात्र स्त्रोत कृषि है । दक्षिण एशिया के उष्णकटिबधीय वाले भागों में जहा फसलें पहले से ही अपने तापमान सहिष्णुता सीमा के करीब है, इन क्षेत्रो में मखु्यतः धान और गेहू की पैदावार पर तापमान वद्धिृ का नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है । आई. पी. सी. सी. के अनसार जलवाय परिवर्तन के कारण दक्षिण एशिया में यदि सदी के मध्य तक फसलों की पैदावार में 30 प्रतिशत तक की गिरावट हो सकती है । इसका सबसे अधिक प्रभाव वर्षा आधारित छोटे किसान की आजीविका पर पड़ सकता है ।अध्यन्नो से यह स्पष्ट है कि प्रत्येक एक  डिग्री  सल्सिेयस तापमान बढ़ने पर गहेू का उत्पादन 4 स 5 करोड़ टन कम होता जाएगा । इसी प्रकार 2 डिग्री सल्सिे यस तापमान बढ़ने स धान का उत्पादन 0.75 टन प्रति हेक्टेयर कम हो जायगा । जलवायु परिवर्तन से फसलों की उत्पादकता ही प्रभावित नहीं होगी बल्कि उनकी गणवुत्ता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा । अनाज में पोषक तत्वों एवं प्रोटीन की कमी पाई जाएगी जिसके कारण सन्तुलित भोजन लेने पर भी मनुष्यों का स्वास्थ्य प्रभावित होगा।



जलवाय परिवर्तन के कारण कीट एवं रोगों की मात्रा बढ़ेगी । गर्म जलवायु होने के कारण कीट-पतगों की प्रजनन क्षमता भी बढ़ जाएगी जिससे कीटों में वृद्धि होगी और उसके साथ ही उनके नियत्रंण हेतु अत्यधिक कीटनाशकों का प्रयोग किया जायगा। जो जानवरों तथा मनुष्यों में अनेक प्रकार की बीमारियों को जन्म देगा। वसै भी गेंहू , मटर और चने में तापमान बढ़ने से फंफूदी जनित रोग की सम्भावना बढ़न लगती है।

घोंघे का देशी जैव विविधता, और कृषि और बागवानी फसलों पर प्रभाव पड़ता है। भारत में, यह देशी पौधों और कृषि फसलों की पचास से अधिक प्रजातियों को खिलाने के लिए जाना जाता है

आईपीसीसी की रिपोर्ट में ज़ोर दिया गया है कि वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री (2.7F) तक सीमित रखने के लिये, वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जनों में वृद्धि 2025 तक उच्च बिन्दु पर पहुँचना ज़रूरी है ताकि उसके बाद वर्ष 2030 तक 43 प्रतिशत की कमी लाई जा सके.


2020-21 में विकास के नाम पर भारत में तीस लाख


अमरीका के फ्लोरिडा में इयान चक्रवात ने भीषण तबाही मचाई है और इस पर अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने भी कहा कि अब जलवायु परिवर्तन के विषय पर कुछ करने का वक्त आ गया है।

https://twitter.com/greg_price11/status/1577736426590027782


सौर ऊर्जा का इस्तेमाल पॉवर कट से बचा पाया

https://twitter.com/SecGranholm/status/157687293781830041

जलवायु परिवर्तन के लिए चल रहे अभियान में इन दिनों इंग्लैंड का 'जस्ट स्टॉप ऑयल' अभियान चर्चा है। यह लोग लन्दन में प्रदर्शन कर रहे हैं इनकी मांग है कि यूके में जीवाश्म ईंधन की खोज, उसके विकास और उत्पादन के लिए भविष्य के सभी लाइसेंस और सहमति पर तुरंत रोक लगाई जाए।

'मैं यह अपने बच्चे के लिए कर रही हूं' कहती इस महिला का वीडियो अब तक लगभग 11 मिलियन लोग देख चुके हैं। यह दिखाता है कि दुनिया अब जलवायु परिवर्तन के गम्भीर परिणामों को रोकने के लिए आवाज़ उठाने लगी है।

https://twitter.com/cameraZoe/status/1576831006375809024

Tuesday, October 4, 2022

नही रहे शेखर जोशी.

दाज्यू, कोसी के घटवार जैसी कहानियों को लिखने वाले हिंदी लेखक शेखर जोशी ने आज गाजियाबाद में अपनी आखिरी सांस ली. उनके पुत्र ‘नवारुण प्रकाशन’ के संचालक 
संजय जोशी ने इस बारे में सूचना देते हुए अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा 'आज दोपहर 3.20 पर पिता जी श्री शेखर जोशी का वैशाली, गाज़ियाबाद के पारस हॉस्पिटल में निधन हो गया.
उनकी इच्छानुसार उनका पार्थिव शरीर देहदान के लिए ग्रेटर नोएडा के शारदा हॉस्पिटल को कल सुबह 9 बजे चला जायेगा.

शेखर जोशी का जन्म उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के ओलिया गांव में 10 सितंबर सन 1932 को हुआ था.
बचपन में ही मां की मृत्यु के बाद शेखर जोशी अपने मामा के पास राजस्थान भेजे गए थे. पहाड़ से जाने के बाद भी उनके मन में गांव और वहां की विविध स्मृतियां बनी रही. उनके भीतर साहित्यिक संस्कार स्कूली पढ़ाई के दौरान ही विकसित हो चुके थे. इण्टर के बाद रक्षा मंत्रालय की ‘कोर ऑफ इलेक्ट्रिकल एण्ड मैकेनिकल इंजीनियर्स’ में प्रशिक्षण के लिए उनका चयन हो गया. 
इसी समय उन्होंने लिखना भी शुरू किया. साल 1950-60 के उस समय को हिंदी कहानी के उर्वर दौर के रूप में याद किया जाता है, वह दौर 'नई कहानी' आंदोलन का दौर था. शेखर जोशी ने उस दौर में अपनी कहानियों में ताजापन बनाए रखा और इन कहानियों को जनसंवेदी बनाए रखने के लिए वह सावधान रहे. उनकी कहानी किस्सागोई के रूप में सामने आती थी. इन कहानियों का अंग्रेजी, पोलिश, रूसी और जापानी भाषाओं में अनुवाद हुआ है.

https://twitter.com/Ashok_Kashmir/status/1577275821244366851

शेखर जोशी को साल 1987 में महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार, 1995 में साहित्य भूषण, 1997 में पहल सम्मान
दिया गया था. हाल ही में उन्हें साहित्य के क्षेत्र में दिए जाने वाले विद्यासागर सम्मान 2022 से सम्मानित किया गया था.

मशहूर लेखक नवीन जोशी ने कुछ दिन पहले उनके बारे में फेसबुक पर लिखा था- 
शेखर जी ने 10 सितंबर 2022 को 91वें वर्ष में प्रवेश कर लिया है. एक लाइलाज बीमारी से आंखों की रोशनी क्षीण हो जाने के बावजूद वे अंगुलियों के सहारे से कलम चलाकर छोटे-छोटे किस्से और कविताएं लिख लेते हैं. आकारवर्धक शीशे की सहायता से थोड़ा-थोड़ा पढ़ते भी हैं. ‘आकाशवाणी’ सुनकर समाचारों से भी अद्यतन रहते हैं

आज उनके निधन पर नवीन जोशी फेसबुक पर लिखते हैं-
बहुत दुःख और कष्ट के साथ यह लिख रहा हूं कि हमारे उस्ताद और दाज्यू शेखर जोशी ने कुछ देर पहले देह से मुक्ति पा ली. चंद रोज से वे गाजियाबाद के अस्पताल में थे और बड़े कष्ट में थे. 10 सितंबर को बड़े खुश थे कि बच्चों ने उनका नब्बे वाँ जन्मदिन बड़े धूमधाम से मनाया. उत्साहित थे और खूब सक्रिय भी. अस्पताल जाते हुए भी अपने शीघ्र प्रकाश्य कथा-समग्र के आवरण चित्र के बारे में संजय से पूछ रहे थे. लिखने और संकलनों की कई योजनाएँ बना रहे थे.
सलाम दाज्यू. आप हमारे आसपास ही बने रहेंगे.

हिंदी भाषा के विद्वान डॉ सुरेश पन्त ने अपनी फेसबुक पोस्ट पर लिखा-
विश्वास नहीं हो रहा कि कथा लेखन को आजीवन दायित्वपूर्ण कर्म मानने वाले सुपरिचित वयोवृद्ध लेखक शेखर जोशी (शेखर-दा) नहीं रहे. हिंदी साहित्य जगत के लिए यह क्षति अपूरणीय है.
दो महीने पहले मेरे निवास पर पधारकर दर्शन दिए थे, नब्बे वर्ष में भी स्वस्थ और सजग. इतना कोमल, मधुर और प्रेरक व्यक्तित्व भुलाए नहीं भूला जा सकता.
सादर श्रद्धांजलि, शेखर दा 🙏💐



शेखर जोशी के लोकप्रिय कहानी 'कोसी का घटवार' की कुछ पंक्तियां.

दाड़िम की छाया में पात-पतेल झाडकर बैठते लछमा ने शंकित दृष्टि से गुसाईं की ओर देखा. कोसी की सूखी धार अचानक जल प्लावित होकर बहने लगती, तो भी लछमा को इतना आश्चर्य न होता, जितना अपने स्थान से केवल चार कदम की दूरी पर गुसाईं को इस रूप में देखने पर हुआ. विस्मय से आँखें फाड़कर वह उसे देखे जा रही थी, जैसे अब भी उसे विश्वास न हो रहा हो कि जो व्यक्ति उसके सम्मुख बैठा है, वह उसका पूर्व-परिचित गुसाईं ही है.

“तुम?” जाने लछमा क्या कहना चाहती थी, शेष शब्द उसके कंठ में ही रह गए.

“हाँ, पिछले साल पल्टन से लौट आया था, वक्त काटने के लिए यह घट लगवा लिया.” गुसाईं ने ही पूछा, “बाल-बच्चे ठीक हैं?”

आँखें जमीन पर टिकाए, गरदन हिलाकर संकेत से ही उसने बच्चों की कुशलता की सूचना दे दी जमीन पर गिरे एक दाडिम के फूल को हाथों में लेकर लछमा उसकी पंखुड़ियों को एक-एक कर निरूद्देश्य तोडने लगी और गुसाईं पतली सींक लेकर आग को कुरेदता रहा.

बातों का क्रम बनाए रखने के लिए गुसाई ने पूछा, “तू अभी और कितने दिन मायके ठहरनेवाली है?”

अब लछमा के लिए अपने को रोकना असंभव हो गया. टप्-टप्-टप्, वह सर नीचा किए आँसूं गिराने लगी. सिसकियों के साथ-साथ उसके उठते-गिरते कंथों को गुसाईं देखता रहा. उसे यह नहीं सूझ रहा था कि वह किन शब्दों में अपनी सहानुभूति प्रकट करे.

इतनी देर बाद सहसा गुसाईं का ध्यान लछमा के शरीर की ओर गया। उसके गले में चरेऊ (सुहाग-चिह्न) नहीं था. हतप्रभ सा गुसाईं उसे देखता रहा. अपनी व्यावहारिक अज्ञानता पर उसे बेहद झुँझलाहट हो रही थी.

हिमांशु जोशी
@himanshu28may

अधूरा रह कर भी पूरा है 'प्लान ए प्लान बी'

ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर आई फ़िल्म 'प्लान ए प्लान बी' में महानगरों की चमक धमक है. इस फिल्म में उच्च मध्यम वर्ग की कहानी है, जहां महिलाएं आधुनिक कपड़े पहनती हैं, पार्टी करती हैं. बॉलीवुड के दर्शकों में हर तरह के दर्शक शामिल होते हैं, वह फिल्मों में दिखाए गए कपड़े, भाषा और संवादों से प्रभावित होते हैं. इस फ़िल्म के पात्रों द्वारा अंग्रेजी संवाद जम कर बोले गए हैं और पात्रों की जीवन शैली से भी आम बॉलीवुड दर्शक जुड़ नही पाता, यही कारण है कि यह फिल्म दर्शकों द्वारा ज्यादा पसन्द नही की जाएगी. इन सब के बावजूद यह बात जरूर है कि तलाक को लेकर समाज में नई सोच विकसित करने में यह फिल्म कामयाब होती है.

आज नही तो कल नाम जरूर कमाएंगे शशांक घोष

प्लान ए प्लान बी के निर्देशक शशांक घोष बॉलीवुड में फिल्म 'वीरे दी वेडिंग' के लिए जाने जाते हैं. इस रोमांटिक कॉमेडी फिल्म को बनाने के लिए उन्होंने स्क्रीन पर रोमांस वाला माहौल बड़ी ही खूबसूरती के साथ तैयार किया है. ऑफिस का सेटअप हो या फिल्म का क्लाइमेक्स, सब कुछ देखने में अच्छा लगा है.
आंख में पट्टी बांध कर साथी की तलाश करने वाला दृश्य अनूठा है.
रिश्तों की बदलती परिभाषा पर भी उन्होंने आजकल 'एप' से बनने वाले रिश्तों को दिखाने की कोशिश करी है. यह जानते हुए भी कि हमारा समाज अभी सेक्स की बातों पर इतना खुला नही है, निर्देशक ने इस फिल्म में एक माँ को अपनी बेटी से 'सेक्स कर ले किसी के साथ' कहते हुए दिखाया है.
शशांक घोष की फिल्में भले ही आज लोगों को अच्छी न लगें पर दस साल बाद यह पसन्द की जाएंगी.

अंत तक बांधे रखती ये रोमांटिक कॉमेडी

फ़िल्म की कहानी, संगीत और संवाद शुरुआत से ही दर्शकों का ध्यान खींचने लगते हैं.
इसकी कहानी एक मैचमेकर और तलाक कराने वाले एडवोकेट के रिश्ते पर केंद्रित है. लड़ते-झगड़ते कब यह दोनों एक दूसरे के करीब आ जाते हैं, इन्हें पता ही नही चलता है. फिल्म की कहानी बहुत खूबसूरत है और इसके मुख्य पात्रों के बारे में हमें फिल्म आगे बढ़ते कुछ न कुछ नया पता चलते रहता है.
इस रोमांटिक कॉमेडी से भरपूर कहानी के अंत तक दर्शकों को अनुमान नही लग पाता कि वह एक हैप्पी एंडिंग देखेंगे या कहानी के अंत से दुखी होंगे.

दमदार अभिनय के साथ बला की खूबसूरत लगी हैं तमन्ना भाटिया

फिल्म की मुख्य पात्र निराली है. निराली एक मैचमेकर है और अपने पुराने रिश्ते की वजह से किसी नए रिश्ते में नही जाना चाहती. निराली का किरदार दक्षिण भारतीय सिनेमा की सुपरस्टार तमन्ना भाटिया ने निभाया है और फिल्म में वह बला की खूबसूरत लगी हैं. अभिनय के मामले में भी वह रितेश देशमुख से एक कदम आगे लगती हैं.
शीशे के सामने खुद से बात करने वाले दृश्य में वह दमदार अभिनय करती नज़र आती हैं.
रितेश ने बॉलीवुड में अपने कॉमेडी किरदारों से ही पहचान बनाई है. फिल्म में वह तलाक कराने वाले एडवोकेट बने हैं. फिल्म में उनके किरदार को इस तरह नही बुना गया कि दर्शक रितेश को ज्यादा कॉमेडी करते देख पाते.
पूनम ढिल्लों ने एक आधुनिक मां के किरदार को निभाने में कोई कसर नही छोड़ी है.
 
नब्बे के दशक की याद दिलाता 'कह दो कि'

फिल्म का संगीत रिश्तों की मिठास और कड़वाहट दोनों ही दर्शकों के सामने लाने में कामयाब रहा है.
इसके गाने काफी लम्बे तक लोगों की यादों में बसे रहने का दम रखते हैं. 'टल्ली' गाना पार्टियों की शान बनेगा.
सौरभ दास का गाया 'दिल हो गया जोगिया' सुनने में अच्छा लगता है.
'कह दो कि' गाना फ़िल्म के अंत में है और यह दिखाता है कि गाना में किसी फिल्म के क्लाइमेक्स में निर्णायक हो सकता है. इसकी कोरिगोग्राफी को बड़ी ही खूबसूरती से अंजाम दिया गया है. 'कह दो कि' सुन आपको नब्बे के दशक के गानों की याद भी आने लगेगी.

काफी सोच विचार कर लिखे हुए संवाद

प्लान ए प्लान बी के संवाद बड़े प्लान बना कर लिखे गए हैं. इनमें तलाक से जुड़े संवाद बड़े प्रभावी हैं. 'न शादी गलत है न डिवोर्स, गलत शादी में रहना गलत है' इसका उदाहरण है.
कौस्तुभ के ऑफिस में काम करने वाली सेरेना का निराली से बोला हुआ संवाद 'डिवोर्स के बाद लगा कि इट्स ऑल ऑवर. फिर से प्यार करना मुश्किल होगा, मारता था वो'. उन महिलाओं का प्रतिनिधित्व करता हुआ लगता है जो सामाजिक तिरस्कार के डर की वजह से मानसिक रूप से प्रताड़ित होने के बावजूद तलाक नही लेती हैं.

कसी पटकथा, सुंदर दृश्य और कॉस्ट्यूम डिज़ाइन

फ़िल्म की पटकथा पर अच्छा काम किया गया है. फ्लैशबैक में जाकर घटनाओं को याद करते दिखाने वाला प्रयोग प्रभावी है.
मुंबई में ढलती हुई शाम को दिखाए जाने वाले दृश्य ,छायांकन पर दमदार काम की गवाही देते हैं.

कलाकारों के मेकअप और कॉस्ट्यूम पर अच्छा काम हुआ है. तमन्ना भाटिया की वेस्टर्न ड्रेस हो या रितेश के रंगबिरंगे कपड़े, दोनों ही फ़िल्म की कहानी के हिसाब से फिट लगे हैं.

हिमांशु जोशी
@himanshu28may

Monday, October 3, 2022

छोरा कमाल है, फिल्म ये धमाल है.

गुजराती फिल्म 'द लास्ट फिल्म शो' को ऑस्कर पुरस्कार 2023 के लिए भारत की आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में चुना गया है। फिल्म को साल की दो बड़ी हिट फिल्मों 'ट्रिपल आर' और 'कश्मीर फाइल्स' के ऊपर वरीयता दी गई है। ओटीटी प्लेटफॉर्म के बाद अब यह फिल्म बड़े पर्दे पर रिलीज हो गई है।

भाविन और भावेश का अभिनय, फ़िल्म को अमर बनाता है

फिल्म का मुख्य पात्र 'समय' जिद्दी है, जिज्ञासु है, हिम्मती है और अपने दोस्तों का लीडर है। इसको निभाने वाले बाल कलाकार भाविन रबरी ने कमाल का अभिनय किया है। बच्चों की तरह खुल कर थिरकना हो या बच्चों की तरह गुस्सा हो जाना, भाविन ने अपने हाव भावों से दर्शकों का दिल जीत लिया है।
भाविन की मां बनी ऋचा मीना हिंदी फिल्मों में इतना बड़ा नाम नही हैं। बॉलीवुड फिल्मों के दर्शक उन्हें 'कसाई' और 'डैडी' जैसी फिल्मों में देख चुके हैं, ऋचा इस फिल्म में मातृत्व की भावना शानदार तरीके से दिखाने में कामयाब रही हैं।

दीपेन रावल गुजराती फिल्मों में काम करते रहे हैं और गरीब पिता के किरदार को उन्होंने पूरी तरह से जीवंत किया है।
भावेश श्रीमाली ने सिनेमाघर के एक कर्मचारी के किरदार निभाया है और निसन्देह फिल्म के मुख्य कलाकार भाविन के बाद उन्होंने अपने अभिनय से सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। कहानी में भाविन के साथ फिल्मों का आनन्द लेने वाले हर दृश्य में वह शानदार लगे हैं।
अन्य बाल कलाकारों ने भी अपने अभिनय और मासूमियत से दर्शकों के दिलों में जगह बनाई है।

शुरुआत देखकर ही लगता है कि फ़िल्म में कुछ तो खास है.

फिल्म 'द लास्ट फ़िल्म शो' के शुरुआती कुछ पल देख कर ही आपको लग जाएगा कि इस फिल्म में कुछ खास है। फिल्म गुजराती में है लेकिन यह हिंदी भाषी दर्शकों को आसानी से समझ में आती है क्योंकि इसमें बहुत कम संवाद हैं और इसके दृश्य बोलते हैं।
स्क्रीन पर जो कुछ भी दिखता है वो शानदार, वास्तविक और बचपन से जुड़ा हुआ लगता है।

द लास्ट फिल्म शो की कहानी एक सपने की है, ऐसा सपना जो 'समय' नाम का एक बच्चा अपनी खुली आंखों से देखता है। इस फिल्म में समय के बचपन की संघर्ष भरी यात्रा दिखाई गई है। फिल्म की कहानी में एक बच्चे के लिए उसकी मां का प्यार है, पिता का गुस्सा है और दोस्तों का साथ है। फिल्म एक बच्चे की नजरों से दुनिया को देखती है और उसकी ये नजरे कब दर्शकों की हो जाती हैं, इसका उन्हें भी पता नही चलता।
द लास्ट फिल्म शो का अंत भावुक करने के साथ भविष्य की उम्मीद भी दिखाता है। यह दिखाता है कि बच्चे जो चाहें उन्हें करने देना चाहिए, इसी में उनका भला है।

शानदार दृश्यों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करते निर्देशक पान नलिन।

फिल्म के निर्देशक पान नलिन बहुत सी शानदार फिल्मों का निर्देशन कर चुके हैं, जिनमें साल 2001 में आई 'समसारा' और साल 2015 में आई 'एंग्री इंडियन गॉडेसेस' शामिल हैं। इन दोनों फिल्मों को बहुत से अंतरराष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों से नवाजा गया था।
निर्देशक द्वारा द लास्ट फिल्म शो फिल्म के हर दृश्य को बेहद खूबसूरती के साथ रचा गया है। फिल्म के एक दृश्य में उन्होंने बच्चों के सपनों को माचिस के डिब्बों के जरिए दिखाने की कोशिश करी है, यह प्रयास वाकई में बेहद ही शानदार रचनात्मकता का उदाहरण है।
फिल्म में गांव के दृश्यों की भरमार है पर जैसे ही शहर सामने आता है तो उससे शहर की चमकदमक दर्शकों की आंखों पर भी पड़ती है।
दीपेन रावल का घर सिर्फ ईंटों का ढांचा भर है और यह गरीबों की दशा दिखाने के लिए काफी है।
समय जब ट्रेन के डिब्बे में अंधेरा कर सिनेमा की झलक दिखाता है तो दर्शकों के लिए यह पल निर्देशक का कायल बनने का है।
दीपेन रावल अपने बेटे को लोगों के सामने फिल्म के दृश्य चलाते देखते हैं। वहां पर कोई बच्चा अपनी छाती पीटकर, कोई सीटी बजाकर उन दृश्यों को आवाज दे रहा होता है। यह दृश्य अद्भुत है।

छायांकन और संगीत में जादू है

फ़िल्म में छायांकन स्वप्निल एस सोनवणे और संगीत सिरिल मॉरिन का है। दोनों ने निर्देशक पान नलिन के साथ पहले भी 'एंग्री इंडियन गॉडेसेस' फिल्म में साथ काम किया है। 
'सेक्रेड गेम्स' वेब सीरीज के लिए सर्वश्रेष्ठ छायाकार का अवॉर्ड जीते हुए, स्वप्निल ने द लास्ट फ़िल्म शो के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ दिया है।
 ऋचा मीना जब भाविन के लिए विभिन्न व्यंजन बनाती और पैक करती है, उसे ऐसे दिखाया गया है कि दर्शकों को मां के खाने की याद आने लगेगी।
सब्जी,मूली,रोटी,मिर्च और फिर उन्हें कपड़े में बंद कर देना। यह दर्शकों की यादों में रह जाता है।
चलती ट्रेन में कांच की रंगीन बोतल से बाहर देखना, बच्चों की नीरस दुनिया मे रंग भरता हुआ लगता है।
पानी के बीच खड़े पेड़ वाला दृश्य, फ्रेम में सँजोकर घर की दीवार पर टांगने लायक है।

सिरिल मॉरिन का बैकग्राउंड स्कोर हर दृश्य को प्रभावी बनाता है। फिल्म में एक गीत है 'छोरा कमाल है', यह इस बात का संकेत है कि फिल्म यह धमाल है।

हिमांशु जोशी
@himanshu28may

Sunday, October 2, 2022

कुल बनने के इस चक्कर में फूल बनते दर्शक.

निर्देशक रत्ना सिन्हा की साल 2017 में आई फ़िल्म 'शादी में जरूर आना' के सत्तू और आरती शुक्ला से बॉलीवुड फिल्मों के प्रेमी आज भी परिचित हैं. यह फिल्म अपनी कहानी और कलाकारों के शानदार अभिनय की वजह से लोगों को काफी पसंद आई थी. रत्ना सिन्हा अपने निर्देशन में साल 2022 में एक और फ़िल्म लेकर आई हैं जिसका नाम है 'मिडिल क्लास लव'.

कहानी की उलझन से ऊबते दर्शक 

फिल्म की कहानी एक मिडिल क्लास परिवार के लड़के के इर्द गिर्द घूमती है, जो एक नामी कॉलेज में सिर्फ इसलिए जाना चाहता है ताकि वहां जाकर एक सोशल मीडिया स्टार लड़की को अपना दोस्त बना सके. खूबसूरत लड़की से दोस्ती करना ही उसके लिए कूल बनना है.
कॉलेज जाने के बाद उसके सामने कुछ ऐसी परिस्थितियां बनती हैं कि वह अपने घर की आर्थिक स्थिति को भूल सिर्फ लड़कियों के बारे में सोचने लगता है.

फ़िल्म की कहानी को देख बहुत से युवा फिल्म की शुरुआत में मुख्य पात्र से खुद को जोड़ने लगेंगे पर कहानी को इतना उलझा दिया गया है कि बाद में दर्शक इससे ऊबने लगेंगे.

प्रीत कमानी या आयुष्मान खुराना, प्रभावित करती ईशा सिंह

फिल्म के मुख्य पात्र यूडी बने प्रीत कमानी को शुरुआत से देखकर ही यह लगता है कि वह आयुष्मान खुराना की नकल करने की कोशिश कर रहे हैं. नायिका को प्रभावित करने की कला को पर्दे पर बेहतरी से दिखाने में उन्हें अभी वक्त लगेगा. अभिनेत्री ईशा सिंह एक दबी सी लड़की के किरदार में असर छोड़ती हैं, टेलीविजन में नाम कमाने के बाद अब वह बड़े पर्दे के लिए भी तैयार लगती हैं.
काव्या थापर एक आधुनिक लड़की के किरदार में हैं और फिल्म में वह खूबसूरत लगी हैं पर उनके हावभाव प्रभावित नही करते.

मिडिल क्लास लव की स्क्रिप्ट ने दो ऐसे शानदार कलाकारों को व्यर्थ किया है, जिन्हें ज्यादा मौका देकर फिल्म दर्शकों के दिल में उतर सकती थी.
फिल्म में नए कलाकारों के बीच मनोज पाहवा का अनुभव इस्तेमाल में लाया जा सकता था, पर एक पिता के किरदार में फिल्म में उनकी भूमिका को सीमित रख दिया गया.
इसी तरह एक उभरते हुए अच्छे कलाकार संजय बिश्नोई को भी स्क्रीन पर ज्यादा वक्त नही दिया गया है.

फिल्म को नीरस बनाते संवाद पर रंग भरता छायांकन

फिल्म को नीरस बनाने में इसके संवादों ने भी कोई कसर नही छोड़ी है. 'कड़वी मिठाई, मेरा भाई' संवाद फीका लगता है.
'सचिन, सचिन तब बना. जब उसने लॉर्डस में छक्के लगाए. अगर वो गली में क्रिकेट खेलता रहता तो क्या वो गॉड ऑफ क्रिकेट बनता' संवाद भी कोई प्रभाव नही छोड़ता.

उत्तराखंड में आजकल बहुत सी फिल्में बन रही हैं और यह फिल्म भी मसूरी की खूबसूरती को दर्शकों के सामने लाने में कामयाब रही हैं। मसूरी के कुछ दृश्य बहुत अच्छे लगते हैं.

संगीत की वजह से यह फ़िल्म, फ़िल्म बन सकी

फिल्म में संगीत हिमेश रेशमिया का है और यही इस फ़िल्म को देखने लायक बनाता है. बैकग्राउंड स्कोर को अच्छा तैयार किया गया है.
मिडिल क्लास लव में गानों की भरमार है, 'नया प्यार नया एहसास' सुनने में इतना खास नही है पर इसमें जयेश प्रधान की कोरियोग्राफी अच्छी लगती है.
'टुक टुक', 'किसको पता था' और 'मांझा' गानों में हिमेश का जादू सर चढ़कर बोला है. 'टुक टुक' में रेमो डिसूजा की कोरिगोग्राफी ठीक ठाक है.
'हिप्नोटाइज' और 'अपना करेंगे' को हर कोई जल्दी से खत्म करना चाहेगा इसलिए इन पर ज्यादा न ही लिखा जाए तो अच्छा.

हिमांशु जोशी
@himanshu28may

महात्मा को याद करते हुए किताबें पढ़ना भी जरूरी.

महात्मा गांधी ने अपनी किताबों में किसी न किसी किताब का जिक्र जरूर करते थे। गांधी को महात्मा किताबों ने बनाया।
साल 1931 में ब्रिटिश पत्रिका 'स्पैक्टर' के संपादक एवेलिन रैंच को दिए एक इंटरव्यू में गांधी ने जॉन रस्किन की पुस्तक
 'अंटू दिस लास्ट' का जिक्र करते हुए कहा था, 'इस किताब ने मेरी अंतरात्मा को ही नहीं बदला, लेकिन बाहरी-जीवन में भी मैंने सकारात्मक परिवर्तन अनुभव किया। सच पूछो तो मेरी तमाम सोच को सर्वहारा या आमजन के प्रति स्थापित करने में 'अंटू दिस लास्ट' का ही कमाल है।' 

ऐसे ही 'अन्नाहार की हिमायत' किताब पर महात्मा गांधी अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि सॉल्ट की पुस्तक पढ़ी। मुझ पर उसकी अच्छी छाप पड़ी। इस पुस्तक को पढ़ने के दिन से मैं स्वेच्छापूर्वक, अन्नाहार में विश्वास करने लगा। माता के निकट की गयी प्रतिज्ञा अब मुझे आनन्द देने लगी और जिस तरह अब तक मैं यह मानता था कि सब माँसाहारी बने तो अच्छा हो और पहले केवल सत्य की रक्षा के लिए और बाद में प्रतिज्ञा-पालन के लिए ही मैं माँस-त्याग करता था। भविष्य में किसी दिन स्वयं आजादी से , प्रकट रुप में, माँस खाकर दूसरों को खानेवालों के दल में सम्मिलित करने की अमंग रखता था, इसी तरह अब स्वयं अन्नाहारी रहकर दूसरों को वैसा बनाने का लोभ मुझ में जागा।

टॉलस्टाय की किताब 'द किंगडम ऑफ गॉड विदिन यू' पर महात्मा गांधी ने लिखा कि इस पुस्तक ने मुझे अभिभूत कर दिया और इस पुस्तक की मुझ पर गहरी छाप पड़ी।

जब पढ़ेंगे ही नही तो महात्मा के 'म' से भी बराबरी कैसे

भारतीयों में किताबों से दूरी का हाल यह है कि महात्मा गांधी पर सोशल मीडिया पर भ्रामक जानकारी पढ़, उन्हें कोसने वाले लोग भी गांधी को कभी पढ़े ही नही होते हैं। शायद इसलिए ही अल्बर्ट आइंस्टीन ने महात्मा गांधी के बारे में कहा था कि “भविष्य की पीढ़ियों को इस बात पर विश्वास करने में मुश्किल होगी कि हाड़-मांस से बना ऐसा कोई व्यक्ति भी कभी धरती पर आया था।”

आज देश का अधिकतर युवा अपना ज्यादा वक्त स्मार्टफोन पर गुजार रहा है। 'एप एनी' की एक रिपोर्ट के अनुसार
साल 2021 में भारतीय स्मार्टफोन उपभोक्ताओं ने प्रतिदिन अपना लगभग 4.7 घंटे का वक्त मोबाइल फोन पर बिताया है और फोन पर सबसे ज्यादा वक्त बिताने वाले देशों में भारत का पांचवा स्थान है।

कॉमर्स कंपनी फ्लिपकार्ट ने इस शुक्रवार को यह जानकारी दी कि आठ दिनों तक चलने वाले त्योहारी सीजन की बिक्री के दौरान प्रीमियम मोबाइल फोन की बिक्री में 70 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
वहीं अगर हम फ्लिपकार्ट में बुकर प्राइज सम्मानित किताब रेत समाधि को सर्च करते हैं तो वहां दिखता है कि इसे पिछले तीस दिनों में मात्र 250 लोगों ने खरीदा है।
इस स्थिति में पुस्तकालयों की संख्या बढ़ाने के साथ पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देना जरूरी हो गया है।

बहुत कम हैं लाइब्रेरी

मार्च 2018 में आए शोधपत्र 'ए पॉलिसी रिव्यू ऑफ पब्लिक लाइब्रेरीज इन इंडिया' में लिखा है कि इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ लाइब्रेरी एसोसिएशंस एंड इंस्टीट्यूशंस के मानकों के अनुसार प्रत्येक 3000 लोगों के लिए एक सार्वजनिक पुस्तकालय होना चाहिए। 1.21 अरब से अधिक जनसंख्या वाले हमारे देश को 4,03,333 से अधिक सार्वजनिक पुस्तकालय इकाइयों की आवश्यकता है, इसका मतलब यह है कि भारत के आठ से दस गांवों में एक भी सार्वजनिक पुस्तकालय नही है।

क्या है समाधान, कुछ लोगों ने की है शुरुआत

सरकारी कार्यालयों, सार्वजनिक स्थानों, मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और गिरिजाघर में अगर एक छोटा सा पुस्तकालय  बना दिया जाए तो शिक्षा का प्रसार तेजी से हो सकता है। घूमने फिरने, जरूरी कार्यों और भक्ति के बीच भी लोग किताबों के प्रति आकर्षित हो सकते हैं।


  रात दस बजे सिटीजन लाइब्रेरी टनकपुर का एक दृश्य

उत्तराखंड के चम्पावत जिले की पूर्णागिरि तहसील में एसडीएम हिमांशु कफल्टिया ने कोरोना काल के दौरान पुस्तकालय खोला था, यह पुस्तकालय अब भी देर रात तक खुले रहता है। क्षेत्रीय लोग इसके लिए किताबों का योगदान देते रहते हैं। 'सिटीजन लाइब्रेरी मूवमेंट' अभियान चला कर एसडीएम के प्रयास से तहसील कार्यालय के अलावा चम्पावत जिले के अन्य गांवों में भी पुस्तकालय खोले जा रहे हैं।

ऐसे ही देश के बहुत से धार्मिक स्थलों में भी लाइब्रेरी खुलने के समाचार प्राप्त होने लगे हैं।

हम पुस्तकालयों की महत्वता देहरादून स्थित दून लाइब्रेरी एन्ड रिसर्च सेंटर की साल 2019-20 की वार्षिक रिपोर्ट के आंकड़ों से भी समझ सकते हैं।
 साल 2006-07 में लाइब्रेरी खुलने के बाद से साल 2019-20 तक इस पुस्कालय में पढ़कर 117 लोगों को रोज़गार प्राप्त हुआ। कोरोना काल में इस लाइब्रेरी के लगभग पच्चीस हजार सदस्य किताब पढ़ने से महरूम रहे थे लेकिन अब स्थिति सामान्य हो रही है।

हिमांशु जोशी
@himanshu28may
 

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...