केदारनाथ धाम में आई 2013 की आपदा अब भी लोगों की यादों में ताजा है.
अब फिर से केदारनाथ धाम के चोराबाड़ी ग्लेशियर के कैचमेंट में 22 सितम्बर की शाम हिमस्खलन हुआ और फिर इसी क्षेत्र के आसपास 1 अक्टूबर की सुबह भूस्खलन हुआ. इन दोनों हिमस्खलन में किसी को नुकसान नही पहुंचा.
https://twitter.com/ANINewsUP/status/1576036923138662401
4 अक्टूबर को उत्तरकाशी के द्रोपदी का डांडा में हिमस्खलन।
भारत और पाकिस्तान में इस साल भीषण गर्मी पड़ी थी, जिनसे ग्लेशियर पिघलने और बाढ़ आने का खतरा बढ़ गया। पाकिस्तान में इस साल तापमान सामान्य से पांच से सात डिग्री सेल्सियस ज्यादा रहा।
विश्व के पर्यावरण पर नज़र रखने वाली संस्था विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार
ग्रीनलैंड में इस बार दर्ज आंकड़ों में सबसे ज्यादा गर्म सितम्बर रहा है।
https://twitter.com/WMO/status/1577980140457541633
पाकिस्तान में जो इस साल हुआ उसका अंदेशा पहले से ही था।
2019 में विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने यह वीडियो साझा करी थी, जिसमें पाकिस्तान के पिघलते ग्लेशियरों को देखा गया था।
https://twitter.com/WMO/status/1081207753698435074
जलविद्युत बांध पहले के अनुमान से कहीं अधिक ग्लोबल वार्मिंग के लिए दोषी है। अध्ययन में दावा किया गया है कि 100 साल पुराने बांध, धान के खेतों और बायोमास जलाने से भी अधिक मीथेन का उत्सर्जन करते है। हिमालयी प्रदेश उत्तराखंड में ऐसे कई बांध हैं म
आई. पी. सी. सी. रिपोर्ट के अनसार दक्षिण एशिया की लगभग ¾ अर्थव्यवस्था मानसूनी वर्षा पर आधारित है । जलवाय परिवर्तन से उत्पन्न मानसूनी वर्षा में उतार चढाव किसानों की आय प्रभावित कर सकता है क्योंकि ज्यादातर किसानों की आय का एक मात्र स्त्रोत कृषि है । दक्षिण एशिया के उष्णकटिबधीय वाले भागों में जहा फसलें पहले से ही अपने तापमान सहिष्णुता सीमा के करीब है, इन क्षेत्रो में मखु्यतः धान और गेहू की पैदावार पर तापमान वद्धिृ का नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है । आई. पी. सी. सी. के अनसार जलवाय परिवर्तन के कारण दक्षिण एशिया में यदि सदी के मध्य तक फसलों की पैदावार में 30 प्रतिशत तक की गिरावट हो सकती है । इसका सबसे अधिक प्रभाव वर्षा आधारित छोटे किसान की आजीविका पर पड़ सकता है ।अध्यन्नो से यह स्पष्ट है कि प्रत्येक एक डिग्री सल्सिेयस तापमान बढ़ने पर गहेू का उत्पादन 4 स 5 करोड़ टन कम होता जाएगा । इसी प्रकार 2 डिग्री सल्सिे यस तापमान बढ़ने स धान का उत्पादन 0.75 टन प्रति हेक्टेयर कम हो जायगा । जलवायु परिवर्तन से फसलों की उत्पादकता ही प्रभावित नहीं होगी बल्कि उनकी गणवुत्ता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा । अनाज में पोषक तत्वों एवं प्रोटीन की कमी पाई जाएगी जिसके कारण सन्तुलित भोजन लेने पर भी मनुष्यों का स्वास्थ्य प्रभावित होगा।
जलवाय परिवर्तन के कारण कीट एवं रोगों की मात्रा बढ़ेगी । गर्म जलवायु होने के कारण कीट-पतगों की प्रजनन क्षमता भी बढ़ जाएगी जिससे कीटों में वृद्धि होगी और उसके साथ ही उनके नियत्रंण हेतु अत्यधिक कीटनाशकों का प्रयोग किया जायगा। जो जानवरों तथा मनुष्यों में अनेक प्रकार की बीमारियों को जन्म देगा। वसै भी गेंहू , मटर और चने में तापमान बढ़ने से फंफूदी जनित रोग की सम्भावना बढ़न लगती है।
घोंघे का देशी जैव विविधता, और कृषि और बागवानी फसलों पर प्रभाव पड़ता है। भारत में, यह देशी पौधों और कृषि फसलों की पचास से अधिक प्रजातियों को खिलाने के लिए जाना जाता है
आईपीसीसी की रिपोर्ट में ज़ोर दिया गया है कि वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री (2.7F) तक सीमित रखने के लिये, वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जनों में वृद्धि 2025 तक उच्च बिन्दु पर पहुँचना ज़रूरी है ताकि उसके बाद वर्ष 2030 तक 43 प्रतिशत की कमी लाई जा सके.
अमरीका के फ्लोरिडा में इयान चक्रवात ने भीषण तबाही मचाई है और इस पर अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने भी कहा कि अब जलवायु परिवर्तन के विषय पर कुछ करने का वक्त आ गया है।
https://twitter.com/greg_price11/status/1577736426590027782
सौर ऊर्जा का इस्तेमाल पॉवर कट से बचा पाया
https://twitter.com/SecGranholm/status/157687293781830041
जलवायु परिवर्तन के लिए चल रहे अभियान में इन दिनों इंग्लैंड का 'जस्ट स्टॉप ऑयल' अभियान चर्चा है। यह लोग लन्दन में प्रदर्शन कर रहे हैं इनकी मांग है कि यूके में जीवाश्म ईंधन की खोज, उसके विकास और उत्पादन के लिए भविष्य के सभी लाइसेंस और सहमति पर तुरंत रोक लगाई जाए।
'मैं यह अपने बच्चे के लिए कर रही हूं' कहती इस महिला का वीडियो अब तक लगभग 11 मिलियन लोग देख चुके हैं। यह दिखाता है कि दुनिया अब जलवायु परिवर्तन के गम्भीर परिणामों को रोकने के लिए आवाज़ उठाने लगी है।
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