Monday, August 30, 2021

कुछ लहूलुहान हथेलियों में कीचड़ भरा हुआ है।


सपने लिए ऊंची उड़ान भरने के वो मीठी सी नींद में सोए हुए थे,
किसी को हाथों में लगानी थी मेहंदी तो किसी ने बूढ़े बाबा का सहारा बनने के अरमान सजाए हुए थे।

सुबह आंख खुली तो अब बस तूफान के बाद की शांति थी, 
रातभर सबने डर के मारे सहमे हुए गरज के साथ प्रलय की आवाज़ सुनी थी।

आज विकास की इस अंधी दौड़ में पहाड़ों को बेच किसी की हथेली नोटों की गड्डी से भरी हुई है ,
तो टूटी चूड़ियों के साथ कुछ लहूलुहान हथेलियों में कीचड़ भरा हुआ है।

अमीरी गरीबी के इस बढ़ते फासले में क्या किसी पर इन हत्याओं के इल्ज़ाम लगाया जाएगा,
सबको पता है कि दोष फ़िर निर्दोष प्रकृति के मत्थे मढ़ा जाएगा।

दूर आलीशान बंगलों में बैठे क्या इन पहाड़ों का दर्द समझेंगे वो तो फिर खुदा की तरह आसमां से इन खून की नदियों को देख वापस लौट जाएंगे।

अब क्या कभी हम देखेंगे कि गौरा इनसे लड़ बैठी है,
नही क्योंकि हमने इन पहाड़ों को कब्रिस्तान बनने के लिए चुना है या सिर्फ़ सालों से डर के मारे यहां से भागते लोगों के पलायन के किस्सों को सुना है।

हिमांशु पहाड़ी।


Sunday, August 29, 2021

पुस्तक समीक्षा : क्रांतिकारियों की फ़ौज बढ़ते रहने में मदद करेगी 'जननायक डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट'

क्रांतिकारी बन सकने वाले प्रश्न पर 'अज्ञेय' की शेखर पाठक और शमशेर बिष्ट को कही पंक्तियां पुस्तक का विशेष आकर्षण हैं।


शमशेर सिंह बिष्ट के जीवन पर लिखी इस क़िताब का उद्देश्य लोकतांत्रिक समाज के निर्माण के लिए प्रयासरत लोगों को शमशेर की कहानी बताकर सही मार्ग दिखाना है।

लेखक ने इस क़िताब में शमशेर की बचपन से अंतिम दिनों तक की यात्रा को लिखा है।
लेखक ने इस क़िताब को शमशेर के साथ बातचीत और उनको करीब से जानने वाले लोगों का साक्षात्कार कर लिखा है।
 इस किताब से किसी की जीवनी लिख रहा नया लेखक काफ़ी कुछ सीख सकता है।

शराबी पिता की वज़ह से घर में रहती अशांति के बीच अपना बचपन बिताते बालक शमशेर को 'धर्मयुग', 'दिनमान' जैसी पत्रिकाओं को पढ़ शांति मिलती थी।
'साप्ताहिक हिंदुस्तान' में प्रकाशित एक लेख को पढ़ उन्होंने धूम्रपान छोड़ दिया था।
इंटर में नाम की गलतफहमी से जेल में बैठाने और पुलिस द्वारा एक मोची को सताने की घटना ने शमशेर को शमशेर बनाया।

लेखक ने शमशेर के कॉलेज अध्यक्ष और फिर जेएनयू में उनके छह महीनों के सफ़र पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला है। शमशेर में किताबों से दोस्ती की वज़ह से युवावस्था के दौरान ही ऐसे परिवर्तन आ गए थे कि वह नेताओं के पिछलग्गु न बन सुन्दरलाल बहुगुणा, मेधा पाटेकर, प्रशांत भूषण, प्रो आनन्द कुमार, स्वामी अग्निवेश, योगेंद्र यादव के नज़दीकी बने।

सुन्दरलाल बहुगुणा की प्रेरणा से शुरू हुई अस्कोट-आराकोट यात्रा का शमशेर, शेखर पाठक, प्रताप शिखर और कुंवर प्रसून के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा यह जानकारी देती क़िताब आगे बढ़ती है।

शमशेर 'पर्वतीय युवा मोर्चा', 'उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी', 'उत्तराखंड जन संघर्ष वाहिनी' और 'उत्तराखंड लोक वाहिनी' संगठनों के साथ जुड़े रहे, इन संगठनों की कार्यप्रणाली के बारे में लेखक ने विस्तार से बताया गया है जिन्हें पढ़ पाठक उत्तराखंड की वास्तविक समस्याओं को भी समझते चले जाते हैं।
साथ ही सुंदर लाल बहुगुणा की 'दिनमान' पत्रिका वाली रपट 'जाग जाग जाग ज्वान' का जिक्र किया गया है जो आज के युवाओं के लिए सीख है।

शमशेर ने कांग्रेस में शामिल होने का प्रस्ताव ठुकरा दिया था और उसका कारण बताया था कि पहाड़ की समस्या दलगत राजनीति से हल नही होंगी क्योंकि वह पूंजीपतियों के इशारे पर ही चुनाव लड़ते हैं, उनके लिए ही काम करते हैं। उन्हें जनता के हित से कोई मतलब नही है।
लेखक ने शमशेर की चुनाव में भागीदारी और उनमें मिली विफलता के बारे में बताया है पर पुस्तक का यह हिस्सा विस्तृत रूप से लिखा जाना चाहिए था, कोई जननायक होने के बाद भी जनता का वोट हासिल नही कर पाता यह शोध का विषय है।
इसके बाद शमशेर की पत्रकारिता को पन्ने भर में निपटा दिया गया है जो निराशा देती है क्योंकि किसी के व्यक्तित्व को उसके लिखे से अच्छी तरह समझा जा सकता है पर बाद में किताब के आख़िरी हिस्से में उनके महत्वपूर्ण आलेखों को स्थान दिया गया है।

शमशेर के विवाह में उत्तराखंड के जनकवि 'गिर्दा' का किरदार अहम था जिस पर पुस्तक में अच्छी तरह से प्रकाश डाला गया है। क्रांतिकारी बन सकने वाले प्रश्न पर 'अज्ञेय' की शेखर पाठक और शमशेर बिष्ट को कही पंक्तियां पुस्तक का विशेष आकर्षण हैं।

शमशेर की बीबीसी और किताबों से दोस्ती युवाओं के लिए समय के जुड़े रहने की सीख है और 'अग्नि दीक्षा' से शमशेर के जीवन पर जो प्रभाव पड़ा वह किसी के भी जीवन में किताबों की महत्वता बताता है।
एक कविता को पढ़ शमशेर रोने लगे थे, पुस्तक में शामिल यह किस्सा शमशेर जैसे मज़बूत व्यक्तित्व के अंदर छिपी संवेदनशीलता को दर्शाता है।

'बीमारी का सिलसिला' पाठ शमशेर की कहानी के साथ-साथ प्रसूताओं की पहाड़ों में हो रही मौत और अन्य गम्भीर बीमारियों के इलाज के लिए उत्तराखंडवासियों के दिल्ली जाने की मजबूरी को भी सामने रखता है।
'सम्मान एवं पुरस्कार' पाठ एक आंदोलनकारी और राजनीतिक व्यक्ति के बीच अंतर स्पष्ट करता है।

किसी के ऊपर लिखने के लिए यह जानना जरूरी है कि उससे जुड़े लोगों की अमुक व्यक्ति के बारे में क्या राय है इसलिए शमशेर के व्यक्तित्व के विविध आयामों को समझाने के लिए लेखक ने उनसे जुड़े लोगों के विचारों को सामने रखा है।
शेखर पाठक की बात से स्पष्ट है कि सामाजिक कार्यकर्ताओं का जीवन आसान नही होता, वह लिखते हैं कि यदि उनकी शिक्षिका पत्नी रेवती बिष्ट नही होती तो उनके परिवार को भी मुश्किल से रहना पड़ता।
खड़क सिंह खनी से लेखक की बातचीत में शमशेर पर मार्क्स, लेनिन और माओ के प्रभाव के बारे में पता चलता है।
दिवंगत त्रेपन सिंह चौहान ने शमशेर का बुखार होने के बावजूद यात्रा करने का किस्सा बताया है जो शमशेर के समाज के प्रति समर्पण भाव को दिखाता है।

शमशेर के राष्ट्रीय और क्षेत्रीय समाचार पत्रों, पत्रिकाओं में छपे आलेखों में से कुछ की झलक लेखक द्वारा पेश की गई है जो उनके विचारों को और अधिक स्पष्ट कर देते हैं।
'उत्तराखंड में आपदाओं का वास्तविक कारण' आज के उत्तराखंड में बने मुश्किल हालातों की वजह स्पष्ट करता है।
'आदिवासियों को लोकतंत्र से दूर धकेला जा रहा है' आलेख में डॉ बनवारी लाल शर्मा का कथन आज की राजनीति पर सटीक बैठता है।

अंतिम पाठ में लेखक ने शमशेर के पीएचडी के शोध कार्य पर विस्तार से प्रकाश डाला है, पूरा शोध कार्य उत्तराखंड के लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए लिखा गया है।

लेखक ने पुस्तक के अंत मे उपसंहार और ब्लैक एंड वाइट से होते हुए रंगीन चित्र लगाते शमशेर की जीवन यात्रा को संजोया गया है।


पुस्तक में एक बात जो सबसे ज्यादा अखरती है वह यह कि किसी पाठ को विस्तृत रूप दिया गया है तो किसी को जल्दी खत्म कर दिया है, लेखक इन्हें समान रूप से लिखते तो पुस्तक थोड़ी और प्रभावी बन सकती थी।
इसके बावजूद पुस्तक देश की नीतियों को गौर से देख और समझ रहे युवाओं को नई दृष्टि देने के अपने मूल उद्देश्य में सफल रही है।

लेखक- कपिलेश भोज
प्रकाशक- साहित्य उपक्रम
खरीदने का स्थान- अल्मोड़ा किताब घर
सम्पर्क- 9412044298
मूल्य- 250 रुपए

हिमांशु जोशी, उत्तराखंड।
संपर्क- 9720897941

Saturday, August 21, 2021

आसान नही है यहां रह पाना।

आसान नही है यहां रह पाना,
कंधे में बोझ लादे बस यूंही चलते जाना।

चिंता की लकीरों से चेहरों पर झुर्रियां पड़ जाना,
और वक्त से पहले बूढ़ा हो जाना।

रोज़ शाम होते ही इंसानों का घरों में छुप जाना,
और बैल-बकरियों का बाघ के डर से मिमियाना।

दाढ़ी-मूंछ निकलते ही रोटी के जुगाड़ में अपना घर छोड़ शहर जाना,
पीछे पलट मां को आंसू पोछते भी न देख पाना।


आसान नही है यहां रह पाना
कंधे में बोझ लादे बस यूंही चलते जाना।

उड़नखटोलों को देख नौनिहालों का सपनों में खो जाना,
फिर नन्हें पैरों से स्कूल पहुंचने के लिए पहाड़ नापना।

प्रसूता का वक्त पर इलाज न मिलने से दम तोड़ देना,
मरीजों को डोलियों में लादे गांववालों का आँसू बहाना।

पहाड़ियों का दर्द जाने कौन समझ पाएगा, 
शायद कभी कोई शेखर दा की तरह पैदल पहाड़ नाप इनके दुख दर्द समझ पाएगा।

गिर्दा के पीछे चलने वाला जन भटका और आगे रहने वाला तंत्र आज मरा हुआ है,
जाने कौन अब पहाड़ के लिए आवाज़ उठाएगा।

Friday, August 20, 2021

नड्डा जी एक नज़र ज़रा इधर भी घुमा लेते।

नवल बड़े होकर शिक्षक बनना चाहते हैं पर हर तरह की सुविधाओं के अभाव में बकरियों को घास चरा वह शिक्षक कैसे बनेंगे उन्हें नही पता और पिता के अकेले घर संभालने में समर्थ न होने पर घास चरा रहे उनके जैसे सैंकड़ों अन्य बच्चों को भी इस बारे में कुछ पता नही है।

पहले सिक्के का दूसरा पहलू तो देख लो

बात उत्तराखंड की है पर सवाल भाजपा अध्यक्ष से पूछा जा रहा है।
उत्तराखंड को करीब से न जानने वालों को ये बात जरूर खटकेगी पर जो उत्तराखंड की राजनीति का तिलिस्म जानते हैं वो इस बात पर मंद-मंद मुस्कुरायेंगे।
उत्तराखंड की राजनीति राज्य गठन के बाद से ही दिल्ली से नियंत्रित की जा रही है।
जागेश्वर मंदिर से कुछ दूरी पर हेलिकॉप्टर से उतरने के बाद जेपी नड्डा को शायद ही सड़क किनारे देश का भविष्य बकरी चराते दिखा हो।
 पिछले कुछ समय से पूरे देश में उत्तराखंड के युवा गायक पवनदीप राजन की लोकप्रियता सर चढ़ कर बोल रही है। इंडियन आइडल जीतने के बाद पूरे प्रदेश का एक सकारात्मक चेहरा लोगों के सामने आया है पर वास्तविकता ठीक इसके विपरीत है।

अल्मोड़ा से साठ किलोमीटर दूर स्थित झालडूंगरा गांव के नवल कुमार राजकीय माध्यमिक विद्यालय झालडूंगरा में कक्षा नौ के छात्र हैं।
गांव की दूरी मुख्य मार्ग से एक किमी दूर है, सुबह ग्यारह बजे वह मुझे अपने सहपाठी झालडूंगरा गांव के ही प्रकाश राम के साथ हाथ में स्मार्टफोन लिए बकरी चराते मिले।
प्रकाश तो कैमरे और मीडिया में आने के नाम पर पहाड़ियों में जाकर कहीं छिप गए पर नवल ने अपनी स्थिति पर मुझसे खुल कर बात करी।

सिर्फ़ मोबाइल गेम ही नही खेलता बकरी भी चराता है देश का भविष्य

नवल के पिता मिस्त्री हैं पर आजकल काम ठप है और
कोरोना काल के बाद से घर में खाने के लिए पैसे भी बड़ी मुश्किल से जुट पाते हैं।
पिता को मनरेगा से कभी-कभार काम मिलने पर कुछ कमाई हो जाती है या नैनीताल में काम करने वाले नवल के चाचा द्वारा भेजे पैसों से घर का चूल्हा जल जाता है।

उनकी छह बकरियां, एक भैंस और तीन बैल हैं। बकरी बड़ी होने पर उसे बेच देते हैं, जिससे 2500 रुपए प्रति बकरी तक की कमाई हो जाती है, भैंस का दूध परिवार के पीने के काम आता है।

प्रकाश के पिता घोड़े चराते हैं और किसी का घर बन रहा होता है तो उन्हीं घोड़ों पर मकान निर्माण के लिए पत्थर ढोते हैं।
नवल और प्रकाश सुबह नौ बजे बकरी को घास चराने घर से चले आते हैं और दिन में तीन बजे तक वापस जाते हैं। शाम को गांव के स्कूल में अन्य बच्चों के साथ खेलने जुटते हैं और रात थोड़ी बहुत पढ़ाई कर लेते हैं।

पहले लॉकडाउन में तो नवल के परिवार में कोई स्मार्टफोन नही था पर इस बार जैसे-तैसे पैसे जुटा उसकी पढ़ाई के लिए एक स्मार्टफोन खरीदा गया है।
फोन में जियो सिम है और उस पर रिचार्ज नैनीताल से चाचा द्वारा या गांव में पिता द्वारा मज़दूरी के पैसों से कराया जाता है।

सरकारी नौकरी के नाम पर उनके गांव से अब तक पांच जन फौज और एक पुलिस में भर्ती हुए हैं।
नवल बताते हैं कि दसवीं के बाद उन्हें बारहवीं तक पढ़ने पैदल रास्ते गांव से पांच किलोमीटर दूर गुणादिटी जाना होगा, सड़क मार्ग से यह दूरी और भी ज्यादा होगी। कॉलेज के लिए गांव के अन्य युवाओं की तरह अल्मोड़ा में किराए का कमरा लेकर रहना होगा।

नवल बड़े होकर शिक्षक बनना चाहते हैं पर हर तरह की सुविधाओं के अभाव में बकरियों को घास चरा वह शिक्षक कैसे बनेंगे उन्हें नही पता और पिता के अकेले घर संभालने में समर्थ न होने पर घास चरा रहे उनके जैसे सैंकड़ों अन्य बच्चों को भी इस बारे में कुछ पता नही है।
शायद पहाड़ से सैकड़ों किलोमीटर दूर देहरादून बैठे प्रदेश के आकाओं को इन सब बातों की कोई ख़बर भी नही है या वो रखना ही नही चाहते।

शायद इस तस्वीर में खुद को तपाते नवल का चेहरा दिखाना पत्रकारिता के मूल्यों से बाहर है पर रियलिटी शोज़ की चमक-धमक के बीच रह रहे बच्चों की तस्वीर दिखाने की जगह पत्रकारिता का यह फ़र्ज़ भी है कि समाज की वास्तविक तस्वीर भी जनता के सामने लाई जाए।
सिर्फ़ इंस्टा रील बना रहे और स्पोर्ट्स स्टेडियम में खुद का भाग्य चमका रहे बच्चों के साथ ऐसे बच्चों को भी अपने भविष्य के बारे में सोचने का पूरा हक़ है तो वहीं नीति निर्माताओं की भी इनके भविष्य के बारे में सोचने की पूरी जिम्मेदारी है।

राजनीति में बढ़ता और विकास में पिछड़ता उत्तराखंड

 हिंदुस्तान की एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड में कोरोना काल से बेरोज़गारी का आलम यह है कि यहां बेरोज़गारी दर पिछले पांच सालों में छह गुना बढ़ गई है। आंकड़ें बताते हैं कि प्रदेश में महामारी से पहले ही यह बेरोज़गारी दर तेज़ी से बढ़ने लगी थी और कोरोना की वज़ह से तो यह दोगुनी हो गई।
सेंटर फ़ॉर मोनिटरिंग इंडियन इकॉनमी के अनुसार वर्ष 2016-17 में बेरोज़गारी दर 1.61 थी जो अब 10.99 फ़ीसदी पहुंच गई है।

मई 2021 में आजतक की एक ख़बर बताती है कि प्रदेश में प्रवासियों के लौटने का सिलसिला भी जारी है।
 स्मार्ट सिटी पोर्टल के अनुसार 21 अप्रैल से 21 मई तक प्रदेश में 1,00,667 प्रवासियों ने उत्तराखंड में वापसी के लिए पंजीकरण कराया और उसमें सबसे अधिक 31,218 प्रवासी अल्मोड़ा में वापस लौटे।

वास्तविक मुद्दों को पहचानना है जरूरी।

अपनी वास्तविक समस्याओं को समझ शिक्षा, रोज़गार, पलायन पर बात किए बिना मुफ़्त बिजली, भुकानून को मुद्दा बना उत्तराखंड की जनता को गुमराह कर रही राजनीतिक पार्टियों से सवाल उत्तराखंड की जनता को ही पूछना है ,नही तो सालों से नवल जैसे बच्चे सड़कों पर दिखते रहे हैं और दिखते रहेंगें।

हिमांशु जोशी, उत्तराखंड।

Friday, August 13, 2021

इस स्वतंत्रता दिवस स्वतन्त्र मीडिया पर विचार भी है जरूरी।

आप खुद महसूस करते होंगे कि सस्ता-सस्ता कर इंटरनेट आपके जीवन का अभिन्न अंग बना दिया गया है, इसके बिना आप रह नही सकते। 
वाट्सएप, टीवी, यूट्यूब की खबरों पर आपको किताबों से ज्यादा भरोसा हो गया है और शायद आपने अरसे से कोई किताब पढ़ी भी न हो

पत्रकारिता आजकल

पिछले कुछ समय से बोलना, सुनना और समझना बड़े ही संकट में जान पड़ रहा है।
'लंकेश पत्रिका' का संचालन करने वाली गौरी लंकेश 2017 में मार दी गई, भारतीय फ़ोटो पत्रकार दानिश सिद्दीकी को अफगानिस्तान में एक रिपोर्टिंग के दौरान मार दिया गया, श्याम मीरा सिंह को सबसे तेज़ 'आजतक' ने तेज़ी के साथ सिर्फ इसलिए नौकरी से निकाल दिया क्योंकि वह सोशल मीडिया पर 'लोकतांत्रिक देश' के प्रधानमंत्री के खिलाफ़ लिख रहे थे, खुलकर लिख-बोल रहे मीडिया घरानों में छापों की बात तो सबको पता ही है।

देश के बड़े-बड़े टीवी चैनल अलग-अलग धर्मों के खरीदे हुए लोगों को बुला डिबेट करा लोगों के बीच नफ़रत के बीज बो रहे हैं।
पत्रकारिता अब जन का नही विशेष धर्म का पक्ष लेने लगी है, ये दो लिंक हैं जो आपको भारत में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के धर्मों के बीच खाई बनाने वाली पत्रकारिता से वाकिफ़ करायेंगें।


जंतर-मंतर पर ऐसी खबरों का तुरंत असर दिखता है और एक विशेष धर्म के खिलाफ़ नारे लगाए जाते हैं, मुख्य समाचार पत्रों और टीवी चैनलों से यह ख़बर गायब रहती है और खुद दिल्ली इससे अनजान है।
दिल्लीवासियों के इसी हवा में उड़ाने वाले रवैये ने उन्हें पिछले साल दंगों की आग में झोंका था पर वहां अब भी भाईचारे और अमन चाहकर ऐसे नफ़रत फ़ैलाने वाले लोगों को नेस्तनाबूद करने वाले लोग नदारद है।

स्वतंत्रता दिवस से ठीक पहले पत्रकार श्याम मीरा सिंह ने दिल्ली में इस नफ़रत फैलाने वाले एजेंडे का विरोध करने के लिए प्रदर्शन किया जिसमें उन्हें मशहूर लेखक अशोक कुमार पांडे व अन्य बहुत से सामाजिक कार्यकर्ताओं का भी साथ मिला।


इस प्रदर्शन को कवर करने के लिए भी मुख्यधारा मीडिया नदारद थी पर कुछ सच खोज लाने और सीना चौड़ा कर उसे जन को दिखा सकने की हिम्मत करने वाले पत्रकार वहां मौजूद थे।


ट्विटर और फेसबुक का पिछले कुछ समय से दुनिया के सबसे बड़े दो लोकतंत्रों में दुरुपयोग किया जा रहा है, वह विचारणीय विषय है।
सोशल मीडिया का वर्तमान पीढ़ी पर बड़ा प्रभाव है और इन प्लेटफार्मों को राजनीतिक पार्टियों ने अपना हित साधने वाला मैदान बना लिया है। फेसबुक, ट्विटर और सरकार तीनों की भूमिका इसमें संदिग्ध है

कमी कहां रह गई

लोकतंत्र जीवित रखने में महत्वपूर्ण मीडिया की इस कमज़ोरी के पीछे कमी लोकतंत्र की नीति बनाने वालों में नही कमी पत्रकारिता के रखवालों में जान पड़ती है। कहीं पत्रकारिता में शोध करने वाले को यह कह दिया जाता है कि शोध का माध्यम राष्ट्रभाषा हिन्दी में नही सिर्फ़ अंग्रेज़ी में होगा तो कहीं पत्रकारिता छात्रों के मन में इस बात को पहले ही डाल दिया जाता है कि 'तेरा तो भविष्य ही नही'
पत्रकारिता के वर्तमान हालातों को गहराई से समझाने वाली क़िताबें पत्रकारिता कोर्स से ग़ायब हैं।
 नेट परीक्षा में पत्रकारिता के छात्रों से वह सवाल पूछे जाते हैं जो ब्रिटिश छात्रों से पूछे जाने चाहिए।

पत्रकारिता अब दो धड़ों में बंट चुकी है गोदी पत्रकारिता और 'लात मारो' पत्रकारिता। गोदी पत्रकारिता का मतलब आप जानते ही हैं, खूब सारे पैसे और अवार्ड तो लात मारो पत्रकारिता मतलब तंत्र के खिलाफ़ लिखने वाले पत्रकारों को कभी भी अपशब्द बोल दो ,उनके साथ मारपीट कर लो या उन्हें कभी भी नौकरी से निकाल दो।

सोर्स का हवाला तो पत्रकारिता में पहले ही कम दिया जाता था, इसकी कोई अनिर्वायता भी नही थी क्योंकि तब समाचारों के बीच एक दूसरे से आगे निकलने की ऐसी प्रतिद्वंदिता नही थी। अब सैंकड़ों समाचारों चैनलों और पत्रों के बीच खुद को जीवित रखना मुश्किल हो गया है, कोरोना से मीडिया के बुरे हाल हैं। निजी विज्ञापन न मिलने की वजह से अब मीडिया घराने सरकार पर ज्यादा निर्भर हैं और ऐसे में आप अनुमान लगाइए कि आपको मिलने वाली खबरें कैसी होंगी, वह वास्तविक होंगी भी या नही।

जो लोगों को दिखाया जाता है, वह उसे ही सच मानने लगते हैं

मीराबाई चानू के सम्मान समारोह में मीराबाई से बड़ी तस्वीर प्रधानमंत्री की लगी है, नीरज चोपड़ा से बातचीत करते प्रधानमंत्री ही ज्यादा बोलते दिखते हैं।
ओलंपिक का हर पदक मोदीजी के नए भारत के लिए किए गए प्रयासों से आया है, व्यवस्थाओं के अभाव में भी पदक लाने वाले खिलाड़ियों का तो उसमें नाममात्र का योगदान है। 
रिकॉर्ड स्तर में पहुंच चुकी बेरोज़गारी का बढ़ना सरकार के कारण नही है, यह ठीक वैसा ही है जैसे कोरोना से हुई मौतों के लिए भी सरकार जिम्मेदार नही थी। 

मीडिया में थ्योरी है 'कल्टीवेशन थ्योरी' जो लोगों को दिखाया जाता है, वह उसे ही सच मानने लगते हैं। हो भी यही रहा है मुझे अलग-अलग धर्मों के अपने दो दोस्त याद आते हैं, दोनों पिछले कुछ समय से एक-दूसरे धर्मों के प्रति नफ़रत भरे पोस्ट करने लगे, मेरे उनकी इस नफरत का कारण पूछने पर दोनों के एक ही जवाब थे।
यूट्यूब पर देखी गई वीडियो।

भारत प्रेस की आज़ादी में इसलिए पिछड़ रहा है क्योंकि पाठक भी यही चाहते हैं। जो चैनल, अखबार सरकार की जितनी तारीफ़ करे उसकी उतनी अधिक रेटिंग।
युवा पीढ़ी पर अज्ञानता का बोझ लाद, साम्प्रदायिकता का चश्मा पहना दिया गया है।

सूचना की स्वतंत्रता के लिए रक्षक पेरिस स्थित अंतरराष्ट्रीय एनजीओ 'रिपोर्ट्स विदाउट बॉर्डर' के अनुसार वर्ष 2021 में विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक की 180 देशों के लिस्ट में नॉर्वे 1 नम्बर पर है तो भारत का 142 स्थान पर है।

मीडिया से असली मुद्दे नदारद

होना यह चाहिए कि जब हम अपनी समस्याओं के लिए मीडिया का मुंह ताकें तो बिकी हुई मीडिया न मिले।
हमारी टूटी सड़कों, बेरोजगारी, अक्सर गायब रहने वाली बिजली के मुद्दे मीडिया मजबूती के साथ उठाए पर हो क्या रहा है!
उत्तराखंड में मुख्यधारा मीडिया राजनीतिक पार्टियों के फ्री बिजली कनेक्शन विज्ञापन का प्रचार कर रही है जबकि अभी विद्युत विभाग पैसे लेकर भी चौबीस घण्टे बिजली देने में असमर्थ है।
ग्राहकों को मैसेज भेज बिजली कटने की सूचना दे दी जाती है और समय से बिजली कट भी जाती है पर फिर समय से आती नही।

बेरोज़गारी जैसे आंकड़े बाहर न आएं इस डर से 'वित्त मंत्रालय' ने मान्यता प्राप्त पत्रकारों को बगैर अप्वाइंटमेंट के अंदर आने से मना किया और इस पर कोई विरोध भी नही हुआ।

महिलाओं का राजनीतिक मसलों पर लिखना-पढ़ना न के बराबर हो गया है, यह मैंने 'जनज्वार' की वीडियो समीक्षा में यह खुद महसूस किया है।
किसी राजनीतिक वीडियो पर महिलाओं की टिप्पणी न के बराबर होती है और अगर महिलाओं की राजनीति पर रुचि ख़त्म हो जाएगी तो उनके मुद्दे सुने कैसे जाएंगे।
अपनी शिक्षा,सुरक्षा के लिए महिलाओं को राजनीति के मुद्दों पर अपनी राय खुल कर रखनी चाहिए


लिखने के लिए हिम्मत जरूरी है

आईटी सेल की मदद से वाट्सएप यूनिवर्सिटी का जनता के बीच प्रभाव कितना बढ़ गया है, 
इस ज़हर को मैं खुद एक दिन उत्तराखंड के किसी फ़ेसबुक पेज़ पर झेल चुका हूं जब एक युवा को उत्तराखंड के जाने माने पेज़ में साक्षात्कार के लिए बुलाया जाना था पर अन्य युवा उसके धर्म विशेष से जुड़े होने पर उसे साक्षात्कार हेतु बुलाए जाने का विरोध करने लगे थे, जब मैंने इसके खिलाफ़ आवाज़ उठाई तो मुझे भी भला-बुरा कहा गया। मेरे समझ यह नही आया कि पहाड़ की शांत वादियों के युवाओं में आख़िर यह ज़हर आया कहां से!
शायद ज़हर फैलाने के लिए सस्ते कर दिए गए इंटरनेट से!
तब मैंने महसूस भी किया लिखना है तो हिम्मत चाहिए, सच के साथ रहने के लिए।
फ़ोन उठाकर किसी भी सच लिखने, बोलने वाले पत्रकार का सोशल मीडिया अकाउंट खोल लीजिए, आपको वह गालियों और औचित्यहीन सवालों से भरा मिलेगा।

बहुत से बड़े अखबार असल मुद्दों में लेख छापने से कतराने लगे है,  बस गिने-चुने वेब पोर्टल्स और अख़बार आजकल सच लिख भेजा छापते हैं नही तो अधिकतर को बस 'कम चुभने वाले' समाचार ही भाते हैं।
जब आप सरकार पर सवाल करती ख़बर पढ़ेंगे ही नही तो उनका झूठ कैसे पकड़ेंगे और जब झूठ पकड़ेंगे ही नही तो वोट तो अपनी 'सच्ची' सरकार को ही देंगे।

फेक न्यूज़, समस्या बड़ी है

महान बनाने का सपना बहुत खतरनाक है, वही सपना जो महान अमरीका और फ्रांस को भी दिखाया गया है। पूरी दुनिया हिटलर के महान जर्मनी बनाने वाले सपने की ओर अग्रसर है। हिटलर ने जो नफ़रत के बीज बोए थे वह अब भी बोए जा रहे हैं, उसकी बदला लेने की राजनीति अब भी हो रही है।
कभी आप दीदी की मिमिक्री सुनते हैं तो कभी पप्पु वाले व्यंग्य।
एक नेता की सोच पर लाखों यहूदियों को मारा गया था, उसमें मारने वाला सिर्फ़ हिटलर नही था उसकी सोच से प्रभावित नागरिक भी थे। अमरीका, अफगानिस्तान, चीन, भारत , फ्रांस सहित पूरी दुनिया में भी आज वही हो रहा है। 
निर्दोषों को भीड़ द्वारा घेरकर मारे जाने की खबरों से आप अनजान नही हैं , नक्सलवाद हो या रंगभेद सब एक ही सोच का परिणाम होते हैं, महान।

आप खुद महसूस करते होंगे कि सस्ता-सस्ता कर इंटरनेट आपके जीवन का अभिन्न अंग बना दिया गया है, इसके बिना आप रह नही सकते। 
वाट्सएप, टीवी, यूट्यूब की खबरों पर आपको किताबों से ज्यादा भरोसा हो गया है और शायद आपने अरसे से कोई किताब पढ़ी भी न हो।

 फ़ोटो ज़ूम करके देखी जाए तो हर कोई फ़ोन में व्यस्त है


टीवी, वाट्सएप पर इतिहास को लेकर ज्ञान बढ़ाने से बेहतर लाइब्रेरी में बैठना है, वाट्सएप यूनिवर्सिटी इतनी लोकप्रिय हो गई है कि वहां कोरोना का हर सम्भव इलाज है तो नेहरू, गांधी, मोदी को लेकर अथाह अज्ञानता भरे आलेख।
खबरों के डिजिटल होने के बाद हर कोई ख़बर अपने फोन पर पाना चाहता है, वह उसे ही सच मानता है जो उसे वेब पोर्टल दिखाता है। पत्रकार ख़बर मसालेदार भी बना सकता है और सादी भी, ख़बर डाइनिंग टेबल में लगे खाने की तरह हो गई है। ख़बर को पाठकों के सामने जैसा परोसा जाएगा वह उसे वैसा ही खा लेगा।
सोशल मीडिया का भी वही हाल है, जबकि वहां तो खबरों में और झन्नाटेदार तड़का लगा दिया जाता है क्योंकि लोगों को पता है कि जो भी लिखो उसकी सच्चाई को जांचने परखने वाला कोई टूल अभी तक आया नही है।

जेल का भय

प्रधानमंत्री और मुख्यमन्त्रियों के खिलाफ़ लिखने भर से कितने ही लोगों को जेल डाल दिया गया है, ह्यूमन राइट्स वॉच की यह रिपोर्ट आपकी आंख खोलने के लिए काफ़ी है। 

पत्रकारिता की स्वतंत्रता और पत्रकारों के हितों की रक्षा करने वाली संस्था ' कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट' की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1992-2021 के बीच भारत के 53 पत्रकारों की जान गई और वर्ष 2020 में ही चार पत्रकारों को जेल डाल दिया गया था।

सच बोलने पर जेल के भय को समाप्त किया जाना चाहिए, महात्मा गांधी ने भी यही किया था। महात्मा गांधी अन्याय के खिलाफ़ जेल गए और उन्हें देख लोगों ने जेलें भर दी थी।
लिखने का गला घोंटने पर कानून बनाए जा रहे हैं पर आप लिखिए और पढ़िए क्योंकि आप तंत्र से ऊपर हैं और यही लोकतंत्र है।
बेख़ौफ़ लिखने और बेबाक बोलने के लिए आपको लक्ष्मी का मोह त्यागना होगा, अगर आप इन सब के पत्रकारिता में आए हैं तो आपके लिए बेहतर मीडिया घरानों के मैनेजमैंट में जाना रहेगा।

नफ़रत ख़त्म कर ही देश आगे बढ़ेगा

यदि आप इस स्वतंत्रता दिवस से पहले समय निकाल कर भारतीय इतिहास की किताबों को टटोलें तो उसमें आपको महात्मा गांधी के चारों और अम्बेडकर, सभाष चन्द्र बोस, नेहरू और पटेल दिखेंगे पर आज के 'मज़बूत' नेता के पास दूसरों की बुराइयां हैं। 
तथ्य के तौर पर अक्सर चुनाव प्रचारक का कार्य करते 'मज़बूत' नेता का चुनाव रैलियों वाला आप कोई भी वीडियो देख सकते हैं।
असली नेता वही होता है जो सबको साथ लेकर चले।

फिल्मों से समाज बहुत कुछ सीखता है पर भारतीय फिल्मों ने कभी ऐसे मुद्दों को छुआ ही नही जिससे जाति-धर्म की दूरियां खत्म हों, वह बस सुंदरता और अमीरी-गरीबी ही बेचने में रहे।

मुख्य अख़बार, टीवी चैनल ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं जिससे प्रेम को लेकर लोगों के मन में नकारात्मक भावना ही जन्म लेती है, आज भी जोड़ों को सुरक्षा नही मिलती। कहीं कोई इश्क़ फ़रमाते दिख जाए तो पहले उसका जाति-धर्म पूछा जाता है और अगर वह वहां पास भी हो जाए तो सार्वजनिक स्थान पर इश्क़ करने के लिए उसकी इज्ज़त को तार-तार किया जाता है।
समाज को ऐसे लव पार्कों की सख़्त आवश्यकता है जहां किसी की काली नज़रें न पहुंचें और साथ ही ऐसी खबरों की भी जो किसी के प्यार को धर्म-जाति का नाम दे।
संविधान में वयस्क वाली अवधारणा कुछ सोच कर ही रखी गई है।
यही युवा पीढ़ी को आज़ादी का उपहार होगा।

निजता है जरूरी

 24 अगस्त 2017 को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने निजता को मौलिक अधिकार बताया था। 
पैग़ासुस, ट्विटर विवाद, आरोग्य सेतु और आधार कार्ड अनिवार्यता वह मुद्दे हैं जो हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या हम उस अधिकार का सही प्रयोग कर पाए हैं और क्या सरकार हमारे मौलिक अधिकार की सुरक्षा करने में सक्षम हुई हैं।

हम जागरूक नही होंगे तो मीडिया घराने लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ नही , राजनीतिक पार्टियों का पहला स्तम्भ बन जाएंगे।
1949 में लिखी जॉर्ज ऑरवेल के उपन्यास '1984' की 'विचार पुलिस' जल्द हमारे ऊपर कब्ज़ा कर लेगी। 
इस किताब में लेखक ने अपने समय से बहुत आगे की सोचते हुए लिखा था कि राज सत्ता अपने नागरिकों पर नजर रखती है और उन्हें बुनियादी आजादी देने के पक्ष में नही है।
लेखक इस किताब में तकनीक से घिरे उस दुनिया की बात करते हैं जहां आदमी की निजता के कोई मायने नहीं है, निजता मानवाधिकार ना रहकर सिर्फ कुछ मुट्ठी भर लोगों का ही विशेषाधिकार हो चुका है।

 ऑरवेल अपनी इस किताब में ‘बिग ब्रदर इज वाचिंग यू’ जैसी अवधारणाओं की बात करते हैं जो आज वाकई में तकनीक और गैजेट से घिरी हुई इस दुनिया में अस्तित्व में है।

खैरात में नही बंटता लोकतंत्र

लोकतंत्र के महत्व को समझना है तो हमें हांगकांग के संघर्ष को देखना चाहिए, हमें उस कश्मीर को देखना चाहिए जहां सूचनातंत्र बंद होने पर भी हम शांत थे ।
अफगानिस्तान अपने वजूद को बचाने के लिए लड़ रहा है और वो खुद को स्वतंत्र रखने की लड़ाई है।

भारत के मेनस्ट्रीम मीडिया ने लाठी खा रहे लोगों की खबरों को दिखाना बंद कर दिया है, अशोक कुमार पांडे और श्याम मीरा सिंह इस आज़ादी के लिए दिल्ली में अकेले ही जूझ रहे हैं।
इस मुख्यधारा मीडिया में पैग़ासुस के बाद भी शांति बनी हुई है जबकि ऐसी जासूसी पर मीडिया ने आरोपियों को बेनकाब करना चाहिए था, पर ट्रेंड रहा है तो राज कुंद्रा की पोर्न का मामला और ओलम्पियनों के स्वागत की खबरें।
बन्दा मिला है ख़बर बनाने के लिए जमकर बनेगी, वरना सुना बहुत बार है कि सरकार ने पोर्न साइट्स पर प्रतिबंध लगाया है।
एक बार गूगल पर 'पोर्न' लिख कर तो देखिए राज कुंद्रा को भूल जाएंगे।
यही एथेलीट कर्ज़ा ले विदेश कोचिंग करते हैं, बज़री वाले ग्राउंड पर हॉकी खेलते हैं तब कभी ख़बर नही बनते।

एक मरी मीडिया लाखों मरे नागरिक पैदा करती है वाक्य अगर आप अपने ज़ेहन में लाएं तो स्वतंत्रता दिवस से पहले यह वाक्य बहुत सारे सवाल खड़े कर जाता है, जो हमें खुद से पूछने चाहिए।
जिस बात के लिए भगत सिंह, महात्मा गांधी शहीद हुए थे क्या यह वैसा ही राष्ट्र है !

सही सूचना सुनें, देखें और पढ़ें

 फ़ेसबुक के एक पेज़ पर मुझे नफ़रत पाले युवाओं को देख दुख हुआ था तो कुछ पेज़ो पर नाज़ भी है, जहां कभी किसी युवा के स्वरोज़गार अपनाने की ख़बर को सकारात्मक रूप से दिखाया जाता है तो कभी जात-पात और धर्म से परे एक दूसरे की मदद वाली ख़बरों को फैला समाज़ में अच्छा सन्देश दिया जाता है।
वहां समय-समय पर अपने शहर-गांव में ख़राब सड़क बनाने वालों के साथ बिन सड़क पूरी किए टोल वसूलने वालों को घेरा भी जाता है।
यही तो नागरिक पत्रकारिता है और यही हर सच्चे पत्रकार का फ़र्ज़ भी है।

गांधी जी का वक्तव्य इन टीवी चैनलों , अखबारों के लिए ठीक बैठता है "आप इन निकम्मे अखबारों को फेंक दें। कुछ ख़बर सुननी हो, तो एक दूसरे से पूछ लें।
अगर पढ़ना ही चाहें, तो सोच-समझकर अख़बार चुन लें, जो हिन्दुस्तानवासियों की सेवा के लिए चलाए जा रहे हों। जो हिन्दू और मुसलमान को मिलकर रहना सिखाते हों।"
आपको भी समय रहते यह समझना होगा क्योंकि फिजाओं में नफ़रत घोली जा रही है।
अगर आप यह सब अभी नही समझे तो जब मेरी दिल्ली जली थी, मुझे बहुत दुख हुआ था। 
शायद सुरेश और सद्दाम के जाने का आपको दुख न हुआ हो क्योंकि वो आपके रिश्तेदार नही थे, पर शायद कल उनकी जगह आप हों।

मीडिया को मजबूत और स्वतन्त्र बनाइए क्योंकि उसी से लोकतंत्र जिंदा है नही तो आप सब सिर्फ़ एक लोक'लाश' हैं जो प्रभावशाली लोगों द्वारा दाना-पानी देकर सिर्फ़ हाँके जा रहे हैं।

हिमांशु जोशी , उत्तराखंड।

Sunday, August 1, 2021

उत्तराखंड के जनांदलनों का प्रतिबिंब रहा है 1977 के स्वतंत्रता दिवस से शुरू हुआ 'नैनीताल समाचार'

वर्ष था 1977, जब उत्तराखंड में नैनीताल की खूबसूरत वादियों के बीच नैनीताल समाचार की शुरुआत हुई। नैनीताल समाचार ने इमरजेंसी के बाद बने मुश्किल हालातों के बीच अपने लिए एक अलग राह चुनी, यह वो राह थी जो पथरीली थी और जिस पर आजकल के समाचार पत्र चलने से कतराते हैं। यह राह थी सच्ची पत्रकारिता की जिसमें पैसा नही था पर आत्मसंतुष्टि थी, दुनिया बदलने की। 
चाटुकारिता पत्रकारिता के बीच नैनीताल समाचार की सच्ची पत्रकारिता आज भी जीवित है, ठीक वैसे ही जैसे उसे गिरीश तिवाड़ी 'गिर्दा' और सुंदरलाल बहुगुणा छोड़ गए हैं।


नैनीताल के राजीव लोचन साह बचपन से ही लिखने पढ़ने के शौकीन थे, कॉलेज जाते ही उनका यह शौक परवान चढ़ा और उस समय की लोकप्रिय पत्रिका 'नई कहानियां' में उनकी दो कहानियां प्रकाशित भी हो गई।

वर्ष 1971 में 'पहल' के सम्पादक ज्ञानरंजन का नैनीताल आना हुआ तो राजीव की उनके साथ जम कर घुमक्कड़ी हुई, हिंदी को लेकर अपने अंदर उथल-पुथल मचा रहे विभिन्न प्रश्नों के बारे में राजीव ने ज्ञानरंजन से बातचीत करी।
ज्ञानरंजन से मिले प्रेस खोल प्रकाशन के क्षेत्र में जाने के सुझाव को दिल से लगा राजीव अपने परिवार से बातचीत करने के बाद 'प्रेस' की एबीसीडी सीखने इलाहाबाद चले गए।
वहां अपने रिश्तेदार मनोहर लाल जगाती के घर रहते हुए उनका सम्पर्क रामाप्रसाद घिडियाल से हुआ और उनसे राजीव को प्रेस के बारे में बहुत कुछ सीखने को मिला। इलाहाबाद से वापस आ उन्होंने वर्ष 1973 में राजहंस प्रेस खोला पर जब तक वह जमा तब तक देश में इमरजेंसी का साइरन बज गया और समाचार पत्र शुरू करने में देरी हुई।

वर्ष 1977 में इमरजेंसी समाप्त होने के बाद 'नवनीत' पत्रिका से प्रभावित राजीव लोचन साह ने अपने साथ नैनीताल के दो युवाओं हरीश पन्त और पवन राकेश को भी जोड़ा और लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ को मजबूत करने के लिए वर्ष 1977 के स्वतंत्रता दिवस को 'नैनीताल समाचार' की शुरुआत करने के लिए चुना।

 'नैनीताल समाचार' नाम राजीव के द्वारा समाचार पत्र स्वीकृत कराने के लिए भेजे गए नामों में तीसरे नम्बर पर था, राजीव कहते हैं कि वह समाचार पत्र का नाम 'देवदार' रखना चाहते थे।

नैनीताल समाचार एक पाक्षिक अखबार के रुप में शुरू हुआ जिसको अपनी शुरुआत से ही गांधीवादी चंडी प्रसाद भट्ट और सुंदर लाल बहुगुणा का मार्गदर्शन मिला। दिल्ली से छप रहे अखबारों के उत्तराखंड में देर से पहुंचने की वज़ह से यहां खबरों का सूखा बना रहता था, नैनीताल समाचार के आगमन ने उसे दूर किया और देखते ही देखते अख़बार अपने पहले अंक से ही उत्तराखंडवासियों के बीच लोकप्रिय हो गया।

लेखकों, पत्रकारों की बात की जाए तो वर्तमान समय के प्रसिद्ध इतिहासकार पद्मश्री शेखर पाठक के साथ नवीन जोशी, गोविंद पन्त राजू जैसे भविष्य के नामी पत्रकारों के साथ इस अखबार की शुरुआत हुई।

उत्तराखंड के लिए हमेशा से ही मुख्य समस्या रहे प्रवास पर इस अख़बार के दूसरे अंक से ही 'प्रवास की डायरी' छपी जो अगले सात साल तक जारी रही और तीसरे अंक में तवाघाट दुर्घटना पर एक रपट प्रकाशित हुई जिसमें पत्रकार के नाम की जगह लिखा तो विशेष प्रतिनिधि गया था पर वह ख़बर सुंदर लाल बहुगुणा ने लिखी थी।

6 अगस्त 1977 को नैनीताल में वनों की नीलामी पर ख़बर करने राजीव अपने मित्र विनोद पांडे के साथ गए थे पर वहां स्थिति ऐसी बनी कि उसको लेकर राजीव लोचन साह कहते हैं कि " मैं वहां गया तो एक पत्रकार के तौर पर था पर जब बाहर आया तो एक आंदोलनकारी बन चुका था।"
उसी साल नवंबर में वनों की नीलामी के विरोध में हुए प्रदर्शनों में गिरीश तिवारी 'गिर्दा' भी आंदोलनकारी बन गए और नैनीताल समाचार के साथ उनका अटूट सम्बन्ध शुरू हुआ।
नैनीताल में पढ़ते हुए पलाश विश्वास और कपिलेश भोज भी नैनीताल समाचार के साथ जुड़ गए।

मई 1982 में समाचार पत्र का कार्य पूरा समझकर इसके कर्ताधर्ताओं ने इसे बंद करने की ठानी और इसको लेकर अख़बार में एक छोटा सा सन्देश भी लिख दिया पर उसके बाद पत्रों से पाठकों के इसे बंद न करने की गुज़ारिश पर अख़बार चलता रहा।
वर्ष 1983 में 'उत्तराखंड की बाढ़, भूस्खलन और तबाही' शीर्षक से छपा आलेख उत्तराखंड के इतिहास में हुई प्राकृतिक आपदाओं को दिखाता है और उन पर शोध करने का बेहतरीन माध्यम है।
इतिहास पर नित्यानन्द मिश्रा की लिखी श्रृंखला पर तो 'कुर्मांचल गौरव गाथा' नाम से पुस्तक भी छप गई है।

शेखर पाठक बताते हैं कि "1974 की अस्कोट - आराकोट यात्रा में उन्हें इम्तिहान की वज़ह से जल्दी वापस लौटना पड़ा था पर जब वह 1984 में इस यात्रा पर वापस गए तो नैनीताल समाचार के बहुत से नए सदस्य बने।
गोविंद पन्त राजू नैनीताल समाचार की रसीद यात्रा के दौरान अपने हाथों में ही पकड़े रहते थे।"

जनांदोलनों का प्रतिबिंब

उत्तराखंड से उत्तरांचल और फिर उत्तराखंड बनने का पूरा सफ़र हम नैनीताल समाचार में पढ़ सकते हैं, यह यात्रा भी नैनीताल समाचार के साथ ही चलती प्रतीत होती है। प्रदेश में होने वाले हर प्रकार के जनांदोलनों की यह आवाज़ बनते गया। 
नन्द किशोर भगत समाचार से जुड़ उसमें नयापन लाने का प्रयास करते रहते थे तो देवेंद्र नैलवाल और लक्ष्मण  बिष्ट 'बटरोही' जैसे साहित्यिक लोग भी इसके लिए लिखते रहे।

वर्ष 1984 में प्रदेश के अंदर शराब विरोध में चल रहे आंदोलन की ख़बर को समाचार पत्र ने 'नशा नही रोज़गार दो' शीर्षक से छापा और उसकी वज़ह से जन इस आंदोलन से जुड़ता चला गया।
'अल्मोड़ा मैग्नेसाइट लिमिटेड' को लेकर यह कहा जाता था कि उसकी वज़ह से स्थानीय लोगों को नुक़सान और उद्योगपतियों को फ़ायदा हो रहा है तो वर्ष 1988 में अख़बार ने जनता की आवाज़ बन एक आलेख छापा जिसका शीर्षक था 'ईस्ट इंडिया कम्पनी उत्तराखंड में उग गई है'।

गोविंद पन्त राजू के लखनऊ चले जाने के बाद महेश जोशी ने नैनीताल समाचार की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली, उन्होंने अकेले ही समाचार के लिए सदस्यता अभियान चलाया।
विजय मोहन सिंह खाती, राजीव नयन बहुगुणा, प्रदीप टम्टा, चंद्रशेखर तिवारी, ताराचन्द्र त्रिपाठी, यशोधर मठपाल, राजशेखर पन्त, दिनेश उपाध्याय भी समय के साथ नैनीताल समाचार से जुड़ते चले गए और ख़बरों का सिलसिला आगे बढ़ता रहा।
वर्ष 1994 में उत्तराखंड राज्य आंदोलन के बीच हुए मसूरी हत्याकांड पर अख़बार ने ख़बर छापी 'मसूरी : लाशों को बो कर उत्तराखंड के फूल उगाओ'।

नया राज्य बनने के बाद भी नैनीताल समाचार ने जन की ख़बरों को छापना नही छोड़ा और अपना पत्रकारिता धर्म निभाते हुए समाचार पत्र जन की आवाज़ बना रहा। अगस्त 2011 में प्रदेश में बन रहे बांधों से पर्यावरण को होने वाले नुक़सान पर 'बांध के लिए वन कानून आड़े नही आते' नाम से ख़बर छपी।
अख़बार सिर्फ़ उत्तराखंड ही नही राष्ट्रीय स्तर की महत्वपूर्ण घटनाओं पर भी अपनी राय मज़बूती के साथ रखता रहा।

शेखर पाठक के अनुसार नैनीताल समाचार की यह विशेषता रही है कि उसके सदस्यों में अधिकतर सदस्यों के आंदोलनकारी होने बावजूद उसने दूसरा पक्ष भी अपने पाठकों के सामने अच्छे तरीके से रखा।



नैनीताल समाचार में विशेष

आज जब उत्तराखंड के दूरस्थ क्षेत्रों में पहुंचना आसान है तब भी बहुत से क्षेत्रीय व राष्ट्रीय समाचार पत्र, वेब पोर्टल्स वहां घटित कोई घटना पर किसी अन्य की ली तस्वीरों, वीडियो के माध्यम से अपनी ख़बर देते हैं पर आज से चार दशक पहले जब उत्तराखंड के दूरस्थ क्षेत्रों में पहुंचना आसान नही था तब वहां घटित किसी आपदा में नैनीताल समाचार के संवाददाता पहुंच जाते थे और अपने पाठकों तक ग्राउंड रिपोर्ट पहुंचाते थे।

नैनीताल समाचार अपने पाठकों के साथ जुड़ने के लिए नए-नए प्रयोग करता रहा है।
1990 में चल रहे आरक्षण आंदोलन के दौरान दो पृष्ठ के परिशिष्ट छाप सड़कों पर बेचे गए थे।
वर्ष 1993 में राकेश लाम्बा द्वारा शुरू गई निबंध प्रतियोगिता का छात्रों को इंतज़ार रहता था।

साल 1994 के राज्य आन्दोलन के दौरान नैनीताल समाचार का 'सांध्यकालीन उत्तराखंड बुलेटिन' बेहद लोकप्रिय हुआ। 3 सितंबर से 25 अक्टूबर तक नैनीताल के दो स्थानों पर रेडियो बुलेटिन की तर्ज़ पर बुलेटिन पढ़ा गया। जिसका प्रयोग बाद में देश के अन्य हिस्सों दिल्ली के जंतरमंतर, उत्तराखंड के गोपेश्वर और उत्तरकाशी में भी किया गया।
अंटार्कटिक की धरती पर पहली बार गए पत्रकार गोविंद पन्त राजू की डायरी भी बहुत लोकप्रिय हुई।



समाचार पत्र में चिट्ठी पत्र , सौल कठौल और आशल कुशल भाग अपने आप में अनोखे हैं।
 'आशल कुशल' उत्तराखंड की जिलावार ख़बरों से एकसाथ रूबरू करवाता है।

साहित्य अंक, पर्यावरण अंक, होली अंक, हरेला अंक एक नया प्रयोग थे। होली अंक में होली के गीत रंगीन पृष्ठों पर प्रकाशित होने के बाद उत्तराखंड की होली का अहसास कराते अलग ही आनन्द देते हैं।
उत्तराखंड के लोकपर्व हरेला के लिए हर साल एक विशेष हरेला अंक आता है, अंक के साथ पाठकों के लिए हरेले का तिनका भी भेजा जाता है।
होली अंक और हरेला अंक के यह प्रयोग भारत या विश्व के किसी समाचार पत्र में शायद ही देखने को मिले।

शेखर पाठक बताते हैं कि "सौल कठौल स्तम्भ को देख नैनीताल समाचार की रचनात्मकता की तारीफ़ तब के वरिष्ठ पत्रकार कैलाश साह ने भी की थी।"

नैनीताल समाचार को लेकर दो भावनात्मक किस्सों को याद करते हुए शेखर पाठक कहते हैं कि "लखनऊ में उन्होंने किसी के घर में हरेले अंक को फ्रेम किया हुआ देखा था और ऐसे ही किसी ने वहां अपने घर के ड्राइंग रूम की टेबल में उसका होली अंक फिक्स किया था।"

शेखर कहते हैं "नैनीताल समाचार में फ़ैज़ की कविताओं के पोस्टर अपने आप में अनोखे होते थे। 
तवाघाट घटना पर लेटर प्रेस में मेटल को टेढ़ा कर नक्शा बनाया गया था, तकनीक के अभाव में भी समय से आगे की सोच वाले ऐसे बहुत से प्रयोग नैनीताल स्थित नैनीताल समाचार के कार्यालय में देखे जा सकते हैं।"



डिजिटल, कोरोना काल में नैनीताल समाचार
 
मोबाइल इंटरनेट लोकप्रिय होने के बाद बहुत से समाचार पत्रों, टीवी चैनलों ने अपने संस्थान के वेब पोर्टल बनाए तो कुछ समाचार संस्थानों ने वेब पोर्टल पर ही जन्म लिया। समय की मांग को देखते हुए नैनीताल समाचार भी वेब पर उपलब्ध है और इसका श्रेय वर्तमान समय में नैनीताल समाचार का डिजिटल कार्य देख रही विनीता यशस्वी के साथ रोहित जोशी को भी जाता है। 

समय के साथ बहुत से नए साथी भी नैनीताल समाचार के साथ जुड़ते रहे पर नैनीताल समाचार अपने साथ किसी अन्य की आर्थिक जरूरत कभी पूरी नही कर पाया इसलिए कोई भी इससे लंबे समय तक नही जुड़े रहा।

कोरोना काल में लगभग सभी समाचार पत्र विज्ञापन न मिलने की वज़ह से बुरी स्थिति से गुज़र रहे हैं, पहले से ही आर्थिक संकट से जूझ रहा नैनीताल समाचार भी इससे अछूता नही रहा पर फिर भी अपने पाठकों के सहयोग, राजीव लोचन साह की जमापूंजी और विनीता यशस्वी के साथ दिनेश उपाध्याय की कर्तव्यनिष्ठा से यह निरंतर प्रकाशित होता रहा।
नैनीताल समाचार के वाट्सएप ग्रुप 'समाचार की टीम' में समाचार के भविष्य को लेकर समय-समय पर रणनीति बनाई जाती है और ग्रुप के सदस्य वास्तविक पत्रकारिता को जीवित रखने के लिए अपना आर्थिक सहयोग भी देते रहते हैं।

नैनीताल समाचार वेब में 17 सितंबर 2020 को प्रकाशित आलेख ' 18 सितंबर नैनीताल क्लीनअप डे : क्या देश कुछ अनोखा देखेगा' पढ़ने के बाद नैनीताल में स्वच्छता अभियान से जुड़ी संस्था 'ग्रीन आर्मी' के जय जोशी कहते हैं कि यह आलेख पढ़ने के बाद उनमें कुछ करने का जोश भर गया।
वर्ष 2021 के अप्रैल अंक की ख़बर 'ये आग तो बुझ जाएगी, मगर सवाल तो सुलगते रहेंगे' के साथ उत्तराखंड की वनाग्नि पर सवाल उठाते नैनीताल समाचार भारतीय हिंदी पत्रकारिता में अपना काम करते जा रहा है।

शेखर पाठक कहते हैं कि "समाचार से नए लोग अधिक संख्या में जुड़ने चाहिए जिससे युवाओं के बीच भी यह लोकप्रिय हो, फेक न्यूज़ के सहारे कोई अधिक समय तक नही टिक सकता।
समाचार की दुनिया में वही टिके रहेगा जो रचनात्मकता के साथ सही खबरें दिखाएगा।
इन सब के लिए नैनीताल समाचार को आर्थिक रूप से मज़बूत करने की योजना भी बनानी होगी।"


 सोशल मीडिया पर कई गैरजरूरी मुद्दों को हाईलाइट किया जाता है और वास्तविक मुद्दों को दबा दिया जाता है, फेक न्यूज़ का मकड़जाल इतना मज़बूत हो गया है कि उससे बाहर निकलना मुश्किल होता जा रहा है।
युवाओं को जरूरत है कि वह उनके मुद्दों को उठा रहे समाचार पत्रों के बारे में जानें और जन के मुद्दों को उठाने के लिए इन्हें मज़बूत करें।

हिमांशु जोशी, उत्तराखंड।
मोबाइल- 9720897941

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...