Thursday, February 26, 2026

हार्दिक

*फैंस के लिए विलेन हार्दिक पांड्या कैसे बन गए कुंगफू पांड्या*

कभी फैंस के 'फेवरेट' न रहने वाले हार्दिक मुंबई इंडियंस के लिए कप्तानी को लेकर सोशल मीडिया पर ट्रॉल हुए और उनका निजी जीवन भी चर्चाओं में रहा लेकिन इन सब के बीच उनका प्रदर्शन कभी गिरा नहीं. अब टी20 विश्व कप 2026 में जिम्बाब्वे और इंग्लैंड के खिलाफ उनके प्रदर्शन ने दिखा दिया है कि दबाव के समय यह खिलाड़ी सबसे ज्यादा चमकता है क्योंकि ये फैंस को सबसे ज्यादा अखरता है.

*आईपीएल 2015 : जहाँ से टीम इंडिया का दरवाजा खुला*

मुंबई इंडियंस के लिए 2015 आईपीएल में हार्दिक पांड्या ने महज 9 मैचों में 180 से ज्यादा स्ट्राइक रेट से रन बनाए थे. उनके छोटे लेकिन प्रभावी कैमियो और मध्यम तेज गेंदबाजी ने उन्हें एक अलग पहचान दी. ये आंकड़े चयनकर्ताओं के लिए संकेत बने और भारत को एक ऐसा तेज गेंदबाज ऑलराउंडर मिला जिसकी तलाश कपिल देव के बाद से खत्म नहीं हुई थी.

*ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ डेब्यू और फिर दिखी पांड्या पॉवर*

27 जनवरी 2016 को एडिलेड में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ हार्दिक का टी20 डेब्यू हुआ. पहले ही ओवर में 19 रन लुटाने के बाद उन्होंने जिस तरह वापसी की, वह उनके करियर की दिशा तय करने वाला पल था. उन्होंने 3 ओवर में 37 रन देकर 2 विकेट लिए और भारत को 37 रन से जीत दिलाने में मदद की.

2017 की शुरुआत में बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी के दौरान वह टीम का हिस्सा तो थे, लेकिन उन्हें खेलने का मौका नहीं मिला. हालांकि, उसी साल श्रीलंका के खिलाफ पल्लेकेले टेस्ट में उन्होंने साबित किया कि वह रेड-बॉल क्रिकेट का भी बैलेंस बदल सकते हैं. इस टेस्ट सीरीज में उन्होंने 96 गेंदों पर 108 रन की तूफानी पारी खेली, जिसमें 7 छक्के शामिल थे. यहीं से उन्हें टेस्ट टीम का 'एक्स-फैक्टर' माना जाने लगा.

*ओवल की वह कसक और 2025 की चैंपियंस ट्रॉफी जीत*

2017 की चैंपियंस ट्रॉफी के फाइनल में हार्दिक की 43 गेंदों में 76 रनों की पारी एक अधूरी कहानी जैसी थी, जिसमें पाकिस्तान के खिलाफ वह अकेले लड़ते रह गए. लेकिन 2025 की चैंपियंस ट्रॉफी जीत ने उस पुराने जख्म को भर दिया. पूरे टूर्नामेंट और खास तौर पर नॉकआउट मैचों में हार्दिक ने गेंद और बल्ले से जो परिपक्वता दिखाई, उसने उन्हें दुनिया के सर्वश्रेष्ठ ऑलराउंडर्स की लिस्ट में सबसे ऊपर खड़ा कर दिया.

*ट्रोलिंग, नैरेटिव और निजी जिंदगी*

हाल के वर्षों में मुंबई इंडियंस की आईपीएल कप्तानी में बदलाव और रोहित शर्मा से जुड़े नैरेटिव के कारण हार्दिक को अभूतपूर्व हूटिंग और ऑनलाइन ट्रोलिंग झेलनी पड़ी. निजी जीवन भी चर्चाओं में रहा, साल 2020 में नताशा स्टेनकोविक से शादी और फिर अलगाव की खबरों ने मीडिया का खूब ध्यान खींचा. लेकिन एक मंझे हुए एथलीट की तरह, उन्होंने अपनी भावनाओं को मैदान पर कभी हावी नहीं होने दिया. आज वह चर्चा के मामले में शायद बड़े-बड़े सितारों को पीछे छोड़ चुके हैं.

https://www.instagram.com/p/DVB0LpVEpp4/?igsh=MTk1enNqaXpzczQ3eQ==


*T20 वर्ल्ड कप 2024 और 2026 का 'रिडेम्पशन'*

2024 वर्ल्ड कप के फाइनल में साउथ अफ्रीका के खिलाफ आखिरी ओवर डालकर भारत को चैंपियन बनाने के बाद हार्दिक की आंखों से निकले आंसू उनकी खुद पर जीत के गवाही रहे. मैच खत्म होने के बाद कंधे उचकाकर किया गया उनका सेलिब्रेशन काफी वायरल रहा.

https://www.instagram.com/p/DG_NNztPWg4/?igsh=MWk5OHBubnNpMzV6dQ==

और अब, 2026 विश्व कप में जब जब टीम पर दबाव आया, तब उन्होंने अपना श्रेष्ठ दिया. जिम्बाब्वे के खिलाफ उनके तेज अर्धशतक ने भारत को 256 रनों के विशाल लक्ष्य तक पहुंचाया और अब सेमीफाइनल में इंग्लैंड के खिलाफ अपने हरफनमौला प्रदर्शन से उन्होंने सबका दिल जीता है.

Wednesday, February 25, 2026

महिला दिवस स्पेशल : जब शशि ने कहा इज्जत चाहिए और मेड इन हेवन ने रिश्तों की सच्चाई खोल दी

*सिर्फ प्यार नहीं, इज्जत भी चाहिए : महिला दिवस पर पर्दे की दो कहानियां जो समाज से सवाल करती हैं*

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस नजदीक है और इस मौके पर अक्सर महिलाओं के अधिकार और समानता की बात होती है. भारतीय मनोरंजन जगत ने भी कई बार पर्दे पर ऐसे सवाल उठाए हैं जो हमारे समाज की गहरी सच्चाइयों को सामने रखते हैं. फिल्म English Vinglish और वेब सीरीज Made in Heaven दो अलग दौर और दो अलग सामाजिक वर्गों की कहानियां हैं, लेकिन दोनों का मूल संदेश एक ही है कि महिलाओं को सिर्फ प्यार नहीं, बल्कि बराबरी और सम्मान चाहिए.

*श्रीदेवी ने English Vinglish से आवाज उठाई महिलाओं को प्यार नहीं, इज्जत चाहिए*

श्रीदेवी हिंदी सिनेमा की सबसे प्रभावशाली और लोकप्रिय अभिनेत्रियों में गिनी जाती हैं, जिन्हें चांदनी, मिस्टर इंडिया, इंग्लिश विंग्लिश जैसी फिल्मों के लिए याद किया जाता है. करीब 15 साल के लंबे ब्रेक के बाद साल 2012 में श्रीदेवी ने English Vinglish फिल्म से हिंदी सिनेमा में वापसी की थी. गौरी शिंदे के निर्देशन में बनी इस फिल्म में श्रीदेवी ने एक साधारण गृहिणी शशि का किरदार निभाया, शशि का किरदार यह याद दिलाता रहता है कि महिलाओं को किसी खास विशेषाधिकार की नहीं, बल्कि बराबरी और सम्मान की जरूरत है.

*एक साधारण गृहिणी का असाधारण संघर्ष*

फिल्म में शशि एक साधारण गृहिणी है, जो पत्नी, बहू और मां की जिम्मेदारियों को पूरी ईमानदारी से निभाती है, लेकिन अंग्रेजी न आने की वजह से खुद को परिवार के बीच कमतर महसूस करती है. “कितनी भी कोशिश करूं, किसी को खुश नहीं कर पाती” जैसे संवाद उसके भीतर के दबाव और अकेलेपन को सामने लाते हैं. कहानी का टर्निंग प्वाइंट तब आता है जब उसे अमेरिका जाना पड़ता है और वहीं अंग्रेजी सीखने के बहाने वह अपने आत्मविश्वास को फिर से गढ़ना शुरू करती है.

*याद रह जाने वाले दृश्य और अभिनय की खासियत*

फिल्म के कई दृश्य आज भी याद रह जाते हैं. कैफे में अंग्रेजी न बोल पाने की वजह से बाहर आकर शशि का चुपचाप रोना हो या फिर पहली बार अंग्रेजी क्लास में अपनी तारीफ सुनकर सड़क पर उसका खिल उठना, हर पल श्रीदेवी के अभिनय की बारीकियों को दिखाता है. यही वजह है कि यह फिल्म सिर्फ भाषा सीखने की कहानी न होकर आत्मसम्मान की यात्रा बन जाती है.

*मनु का नजरिया और पुरुषवादी सोच पर सवाल*

फिल्म में शशि की बहन मनु का किरदार भी एक अलग परत जोड़ता है, जहां वह यह कहते हुए कि “अगर उसने मुझे बढ़ावा नहीं दिया होता तो मैं वैसी की वैसी ही रह जाती”, अनजाने में उस मानसिकता को उजागर करती है जिसमें स्त्री की उपलब्धियों को पुरुष की स्वीकृति से जोड़कर देखा जाता है. इसके बरक्स शशि का नजरिया धीरे धीरे बदलता है और वह खुद की पहचान को समझने लगती है.

*संवाद जिन्होंने सोच बदलने पर मजबूर किया*

श्रीदेवी के कई संवाद आज भी सामाजिक सोच पर सवाल खड़े करते हैं. “मर्द खाना बनाए तो कला है, औरत बनाए तो उसका फर्ज है” जैसी लाइनें रोजमर्रा के जीवन में मौजूद लैंगिक असमानता को सीधे शब्दों में सामने लाती हैं. वहीं जब शशि कहती है, “राधा, मुझे प्यार की जरूरत नहीं है, जरूरत है तो सिर्फ थोड़ी इज्जत की”, तो यह सिर्फ एक पात्र का कथन न रहकर असंख्य महिलाओं के आत्मसम्मान की मांग बन जाता है.

*रिश्तों की परतें खोलती मेड इन हेवन और बदलते समाज की तस्वीर*

अमेजन प्राइम पर स्ट्रीम हो रही वेब सीरीज 'मेड इन हेवन' पहली नजर में शादियों की भव्य दुनिया की कहानी लगती है, लेकिन धीरे धीरे यह भारतीय समाज की कई जटिल सच्चाइयों को सामने लाती है. एक ऐसी टीम की कहानी, जो लोगों की शादी को शानदार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ती, दरअसल रिश्तों, पहचान और सामाजिक दबावों के भीतर छिपे सच को उजागर करने का माध्यम बन जाती है.

*किरदारों के निजी संघर्ष और पहचान की तलाश*

वेब सीरीज का कथानक केवल शादी की तैयारियों तक सीमित नहीं रहता. हर एपिसोड में कोई नया सामाजिक सवाल सामने आता है. सीरीज का प्रमुख किरदार समलैंगिक है, जो अपनी पहचान और निजी जीवन के संघर्षों से जूझता नजर आता है. वहीं उसकी साथी अपने वैवाहिक जीवन की उलझनों और भावनात्मक दबावों से गुजर रही है. इन व्यक्तिगत कहानियों के जरिए सीरीज रिश्तों की जटिलता और समाज की अपेक्षाओं के बीच खड़े इंसान की दुविधा को सामने लाती है.

*मानसिक वर्जनाओं को चुनौती देती कहानियां*

शादी से पहले संबंधों की स्वीकृति जैसे संवेदनशील विषय से शुरू होकर यह सीरीज भारतीय समाज की कई मानसिक वर्जनाओं को चुनौती देती है. विवाहेतर संबंध जैसे नाजुक मुद्दों को भी यह सीरीज सीधे और स्पष्ट तरीके से सामने रखती है. यह प्रस्तुति दर्शकों को असहज भी करती है और सोचने के लिए मजबूर भी.

*उम्र, प्रेम और दूसरा मौका*

सीरीज की एक महत्वपूर्ण परत उम्र और प्रेम के रिश्ते को लेकर है. साठ वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के संबंधों को जिस संवेदनशीलता से दिखाया गया है, वह खासतौर पर उन महिलाओं की कहानी कहती है जो विधवा होने या तलाक के बाद अपना पूरा जीवन बच्चों की परवरिश में लगा देती हैं. मेड इन हेवन यह सवाल उठाती है कि क्या ऐसे लोगों को दोबारा प्रेम पाने का अधिकार नहीं होना चाहिए.

*दहेज पर सीधा वार और साहस की मिसाल*

सीरीज का एक बेहद प्रभावशाली प्रसंग तब सामने आता है जब एक आईएएस दहेज की मांग करता है. वेब सीरीज में प्रियंका मिश्रा बनी श्वेता त्रिपाठी शादी को तोड़ देना बेहतर समझती है. यह दृश्य केवल एक कहानी नहीं, बल्कि सामाजिक संदेश बनकर उभरता है. यह बताता है कि गलत शर्तों पर रिश्ता निभाने से बेहतर है उसे ठुकरा देना. यही हिम्मत यह वेब सीरीज हमारे समाज की लड़कियों से मांगती हुई लगती है.

*उच्च वर्ग तक सीमित दुनिया की कमी*

हालांकि सीरीज की सबसे बड़ी सीमा इसका उच्च वर्ग तक सीमित रह जाना है. अधिकतर संवाद अंग्रेजी में हैं और कथानक मुख्य रूप से शहरी, सम्पन्न तबके के इर्दगिर्द घूमता है. जबकि जिन सामाजिक समस्याओं को यह उठाती है, वे केवल अमीर वर्ग तक सीमित नहीं हैं. गरीब और निम्न मध्यमवर्गीय समाज का लगभग नदारद होना इसकी यथार्थवादी ताकत को कुछ कमजोर कर देता है.

*महिला दिवस के संदर्भ में अहम सवाल*

महिला दिवस के संदर्भ में देखें तो मेड इन हेवन केवल शादियों की कहानी नहीं, बल्कि महिलाओं की इच्छाओं, स्वतंत्रता और समाज द्वारा तय सीमाओं के बीच संघर्ष की कहानी भी है. यह वेब सीरीज दिखाती है कि रिश्ते केवल परंपराओं से नहीं, बल्कि ईमानदार संवाद और आत्मस्वीकृति से बनते हैं. यही वजह है कि English Vinglish और Made in Heaven जैसी रचनाएं केवल मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि हमारे समाज की सोच पर सवाल भी खड़े करती हैं. शायद इसी कारण अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस जैसे अवसर पर इन कहानियों को याद करना और भी जरूरी हो जाता है.

Saturday, February 21, 2026

पंचाचुली की परछाइयाँ : दारमा घाटी की दो प्राचीन लोककथाएँ

*पंचाचुली की परछाइयाँ : दारमा घाटी की दो प्राचीन लोककथाएँ*

*बर्फीली चोटी पर खिंची दूध की रेखा*

कुमाऊँ के धारचूला और मुनस्यारी के बीच बसे रं समुदाय की लोककथाओं मे दारमा घाटी की एक मार्मिक कहानी सुनाई जाती है। कहा जाता है कि बहुत पहले दारमा घाटी से एक युवती दूध से भरा डिब्बा लेकर पंचाचुली पर्वत पार करते हुए मुनस्यारी की ओर जा रही थी। उन दिनों यही ऊँचा पहाड़ी मार्ग लोगों की जीवनरेखा था। रास्ता कठिन था, चढ़ाई तीखी और चारों ओर बर्फ से ढकी चट्टानें थीं, फिर भी पहाड़ के लोग साहस के साथ इन पहाड़ी राहों पर चलते थे।

कथा के अनुसार, ऊँचाई पर पहुँचते ही उसका पैर अचानक फिसल गया। हाथ से दूध का डिब्बा छूट गया और वह ढलान की ओर गिरने लगी। गिरते हुए उसके मन में पीड़ा और आक्रोश भर उठा और उसने दुखी होकर कहा कि अब इस गंदे और खतरनाक रास्ते से कोई भी उस पार नहीं जा सकेगा। लोकविश्वास है कि उसके शब्द श्राप बन गए। उसी क्षण से पंचाचुली की चोटियों पर बर्फ का सिलसिला बढ़ गया और धीरे धीरे वह पुराना पैदल मार्ग हिम के नीचे दबकर खत्म हो गया।

रं बुजुर्ग यह भी बताते हैं कि जब वह गिरी, तब उसके डिब्बे से दूध बहता हुआ पहाड़ की ढलानों में फैल गया। आज पंचाचुली की बर्फीली चोटियों पर जो सफेद लकीरें दिखाई देती हैं, उन्हें लोग उसी दूध की धार का निशान मानते हैं।

*फिलम गांव की लोककथा : राख की पुड़ी और देवता का गुस्सा*

दारमा घाटी के फिलम गांव में रं समुदाय के बुजुर्ग एक पुरानी कथा सुनाते हैं, ये आज भी पहाड़ की स्मृतियों में जीवित है। कहा जाता है कि बहुत पहले इस गांव में भयंकर अकाल पड़ा। खेत सूख गए, अनाज खत्म होने लगा और लोग चिंता में डूब गए। तभी गांव के एक आदमी को रात में स्वप्न आया। स्वप्न में देवता प्रकट हुए और बोले कि यदि वह उन्हें कुत्ते की बलि के साथ राख की पुड़ी बनाकर खिलाएगा तो गांव की विपत्ति दूर हो जाएगी।

सुबह उठकर उस व्यक्ति ने वैसा ही किया। उसने श्रद्धा से कुत्ते की बलि देकर और राख की पुड़ी बनाकर देवता को अर्पित की। लोककथा कहती है कि उसी साल बारिश खूब हुई, खेत लहलहा उठे और गांव में समृद्धि लौट आई। लोगों ने इसे देवता की कृपा माना और गांव में फिर से खुशहाली छा गई।

अगले वर्ष फिर वही देवता उसके सपने में आए। इस बार उन्होंने कहा कि मुझे कल दिन के समय भोजन कराना, तभी सब ठीक रहेगा। आदमी के मन में संकोच आ गया। उसे लगा कि दिन में ऐसा करने पर लोग उसका मजाक उड़ाएंगे। इसलिए उसने रात के अंधेरे में ही, अच्छी फसल होने के बावजूद, फिर से कुत्ते की बलि दी और राख की पुड़ी बना कर देवता को दे दी। कहते हैं कि देवता इस बात से नाराज हो गए, क्योंकि उनकी आज्ञा का पालन सही ढंग से नहीं हुआ था।

लोककथा के अनुसार, उसी के बाद सामने का विशाल पहाड़ खिसककर फिलम गांव की ओर आ गया। गांव में अफरा तफरी मच गई। कई लोग अपनी जान बचाकर दूर भाग गए। कुछ ने पास ही नई जगह चुनकर बसना शुरू किया, जबकि कुछ परिवार अल्मोड़ा और आसपास के इलाकों की ओर चले गए। बुजुर्ग आज भी इस घटना को देवता के क्रोध और मनुष्य की झिझक के परिणाम के रूप में याद करते हैं।

हिमांशु जोशी

Thursday, February 19, 2026

*World Day of Social Justice : दस साल पहले ‘पिंक’ ने सिखाया 'No Means No'*

World Day of Social Justice पर जब बराबरी और अधिकारों की बात होती है, तो हिंदी सिनेमा की कुछ फिल्में खुद एक मिसाल बनकर सामने आती हैं.
साल 2016 में आई पिंक ऐसी ही फिल्म रही, जिसने सहमति और महिलाओं के अधिकारों पर समाज की सोच को नए ढंग से चुनौती दी.

*कोर्टरूम के अंदर बनी फिल्म का बैकग्राउंड*

निर्देशक अनिरुद्ध रॉय चौधरी की फिल्म पिंक साल 2016 में रिलीज हुई थी और शूजीत सरकार फिल्म के निर्माता थे. फिल्म में अमिताभ बच्चन, तापसी पन्नू, कीर्ति कुल्हारी और अंद्रिया तारियांग जैसे कलाकार नजर आए. दिल्ली की पृष्ठभूमि पर बनी इस कोर्टरूम ड्रामा की खास बात यह रही कि सिर्फ कहानी और संवादों के दम पर फिल्म से दर्शकों को बांधे रखा गया था. फिल्म की शूटिंग दिल्ली में ही की गई थी, शूटिंग के बीच में अमिताभ के ट्वीट से लोगों को कुछ धमाकेदार सामने आने की आहट लग गई थी.

https://x.com/i/status/708312436957249536

*कहानी, एक ' ना ' जो बहस बन गई*

'पिंक' तीन कामकाजी लड़कियों की कहानी है, वे सब एक पार्टी के बाद हुई घटना में फंस जाती हैं और समाज व कानून की नजर में कठघरे में खड़ी कर दी जाती हैं. एक रिटायर्ड वकील उनके पक्ष में खड़ा होता है और अदालत में सहमति, चरित्र और महिला स्वतंत्रता से जुड़े सवाल उठाता है. पूरी कहानी कोर्टरूम में हुई बहसों के जरिए यह दिखाती है कि 'ना' का मतलब हर परिस्थिति में 'ना' ही होता है.

*‘No Means No’ के बाद संवाद और अभिनय से जानी गई पिंक*

फिल्म अपने संवादों के लिए आज तक याद की जाती है. अदालत में अमिताभ बच्चन का वह सीन, जहां वह कहते हैं कि उसे बोलने वाली लड़की कोई परिचित हो, फ्रेंड हो, गर्लफ्रेंड हो, कोई सेक्स वर्कर हो या आपकी अपनी बीवी ही क्यों न हो... No means No, आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार पलों में गिना जाता है. वहीं तापसी पन्नू ने मीनल के किरदार में डर, गुस्से और आत्मसम्मान के संघर्ष को बेहद सहजता से निभाया.
फलक के किरदार में कोर्टरूम के अंदर 'मैंने उसे ना बोला लगातार ना बोला..' कहने वाली कीर्ति कुल्हारी के अभिनय को कई पुरस्कारों और सराहनाओं से नवाजा गया.

*रीमेक, इंटरव्यू और ‘पिंक’ की लंबी विरासत*

साल 2016 में रिलीज हुई Pink की सफलता इतनी बड़ी रही कि इसका तमिल रीमेक Nerkonda Paarvai (2019) और तेलुगु रीमेक Vakeel Saab (2021) भी बनाए गए,  अलग-अलग भाषाओं में “No Means No” का संदेश आगे बढ़ा. वहीं 2024 में दिए एक इंटरव्यू में कीर्ति कुल्हारी ने फिल्म के प्रमोशन के दौरान खुद को साइडलाइन महसूस करने की बात कही थी, जिससे फिल्म से जुड़ी चर्चाएं फिर से सुर्खियों में आ गईं. हालांकि इस विवाद के बावजूद ‘पिंक’ की विरासत मजबूत बनी रही और आज भी सहमति, बराबरी और सामाजिक न्याय पर होने वाली चर्चाओं में यह फिल्म एक अहम संदर्भ के रूप में याद की जाती है.

Monday, February 16, 2026

लैला मजनू (1976) : पचास साल पहले आई वो प्रेम कहानी, जिसने रोमांस के साथ पितृसत्तात्मक सोच को भी सामान्य बनाया

 लैला मजनू (1976) : पचास साल पहले आई वो प्रेम कहानी, जिसने रोमांस के साथ पितृसत्तात्मक सोच को भी सामान्य बनाया

 हिंदी सिनेमा में प्रेम कहानियां हमेशा भावनाओं और त्याग की मिसाल बनकर सामने आई हैं. 1976 में रिलीज हुई फिल्म लैला मजनू भी लंबे समय तक एक अमर प्रेम कथा के रूप में याद की जाती रही. लेकिन आज जब फिल्मों को सामाजिक और नारीवादी नजरिए से पढ़ा जा रहा है, तब यह सवाल भी उठता है कि क्या इस फिल्म ने अनजाने में पितृसत्तात्मक सोच को और मजबूत किया.

फिल्म की कहानी प्रेम के विद्रोह की बात करती है, लेकिन बड़े फैसलों की बागडोर पुरुषों और परिवार के हाथ में ही रहती है. लैला अपने प्रेम को लेकर स्पष्ट है, मगर उसकी जिंदगी का रास्ता परिवार की इजाजत और सामाजिक प्रतिष्ठा तय करती है. यह वही सामाजिक ढांचा है जिसमें लड़की की इच्छा से ज्यादा परिवार की इज्जत को महत्व दिया जाता है. फिल्म इसे चुनौती देने की कोशिश करती है, लेकिन अंततः उसी व्यवस्था को सामान्य भी बना देती है.

फिल्म का नैरेटिव भी मुख्य रूप से मजनू के अनुभवों और उसके दर्द के इर्द गिर्द घूमता है. कैमरा और कहानी दोनों मिलकर पुरुष नायक के जुनून को केंद्र में रखते हैं, जबकि लैला की पीड़ा अक्सर प्रतीकात्मक बनकर रह जाती है. इस तरह की प्रस्तुति ने उस दौर के हिंदी सिनेमा में पुरुष केंद्रित प्रेम कहानियों की परंपरा को और मजबूत किया, जहां महिला पात्र प्रेरणा या त्याग की छवि में सीमित रह जाती थी.

परिवार और समाज की इज्जत को लेकर जो दबाव फिल्म में दिखाया गया है, वह उस समय की सामाजिक मानसिकता का हिस्सा था. प्रेम करने वाले दो लोग सिर्फ अपने रिश्ते से नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक ढांचे से लड़ते दिखाई देते हैं. दिलचस्प यह है कि फिल्म प्रेम को महान बताती है, लेकिन अंत में वही पितृसत्तात्मक व्यवस्था कहानी को दुखांत की ओर ले जाती है. यह विरोधाभास आज के दर्शकों को सोचने पर मजबूर करता है कि क्या ऐसी कहानियां प्रेम की आजादी के साथ साथ सामाजिक नियंत्रण को भी वैधता देती थीं.

आज जब हिंदी सिनेमा में महिला पात्रों की एजेंसी और स्वतंत्रता पर ज्यादा चर्चा हो रही है, तब लैला मजनू जैसी फिल्में हमें यह समझने का मौका देती हैं कि रोमांस के सुनहरे फ्रेम के भीतर समाज की सत्ता संरचनाएं किस तरह काम करती थीं. पचास साल बाद इस फिल्म को सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं, बल्कि उस दौर की सामाजिक सोच के आईने के रूप में भी देखा जा सकता है.

Monday, February 9, 2026

अरबपतियों का भारत और हाशिये की आवाजें

अरबपतियों का भारत और हाशिये की आवाजें

दून लाइब्रेरी में पी. साईनाथ का व्याख्यान

दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर में आयोजित तीसरे सुरजीत दास मेमोरियल लेक्चर में वरिष्ठ पत्रकार मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए। खचाखच भरे सभागार में छात्रों, पत्रकारों, शोधकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मौजूदगी के बीच साईनाथ ने भारत में असमानता, न्याय और पत्रकारिता के संकट पर व्यापक और विचारोत्तेजक व्याख्यान दिया।

वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि भारत अपने इतिहास के सबसे बड़े असमानता के दौर से गुजर रहा है, जो ब्रिटिश राज के समय से भी अधिक गंभीर है। उन्होंने चेताया कि असमानता अब देश की राजनीतिक अर्थव्यवस्था, न्याय प्रणाली और मीडिया संरचनाओं में गहराई से समा चुकी है।
दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर में तीसरे सुरजीत दास मेमोरियल लेक्चर को संबोधित करते हुए साईनाथ ने अपने वक्तव्य की शुरुआत इन शब्दों से की,
“Every Indian language is my language.”

उन्होंने कहा कि भारत को गांवों, मजदूरों, किसानों और हाशिये पर खड़े समुदायों की आवाजें सुने बिना नहीं समझा जा सकता, लेकिन मुख्यधारा का मीडिया लगातार इन आवाजों को मिटाता जा रहा है।

ब्रिटिश भारत से भी अधिक असमानता

कोविड के दौरान हुए रिवर्स माइग्रेशन और नीतिगत फैसलों का जिक्र करते हुए साईनाथ ने कहा कि भारत अत्यधिक धन संकेंद्रण के दौर में प्रवेश कर चुका है।
उन्होंने कहा कि कृषि संकट से दूरी ही यह बताती है कि किसान आंदोलन के दौरान दिल्ली की सीमाओं पर लगभग दो लाख किसानों के पहुंचने से शहरी भारत चौंक गया, जबकि यह उनके लिए कोई आश्चर्य नहीं था।

जहां किसान शादियां टाल रहे हैं, वहां करोड़ों की शादी

साईनाथ ने हाल में हुई एक अल्ट्रा लग्जरी कॉरपोरेट शादी का उल्लेख किया, जिस पर कथित तौर पर करोड़ों रुपये खर्च हुए। उन्होंने कहा कि मीडिया ने इस आयोजन का बिना किसी आलोचनात्मक दृष्टि के उत्सव मनाया, जबकि जिस महाराष्ट्र में यह शादी हुई, वही राज्य देश के सबसे गंभीर कृषि संकट से जूझ रहा है।

उन्होंने महाराष्ट्र सरकार के एक सर्वे का हवाला दिया, जिसमें विदर्भ के केवल छह जिलों में ही लाखों परिवारों ने कहा कि वे अपनी बेटियों की शादी का खर्च वहन नहीं कर सकते।

“आज ऐसे गांव हैं जहां तीस की उम्र पार कर चुके पुरुष अविवाहित हैं, क्योंकि कोई भी माता पिता अपनी बेटी किसी किसान को देने को तैयार नहीं,” साईनाथ ने कहा।

इस शादी को एक शानदार कारोबारी निवेश बताते हुए साईनाथ ने कहा कि ऐसे तमाशे सरकारों, नौकरशाहियों और सार्वजनिक संसाधनों पर प्रभाव जमाने में मदद करते हैं, जबकि अरबपतियों की कुल संपत्ति का यह बहुत छोटा हिस्सा होते हैं।

अरबपतियों की संपत्ति और सार्वजनिक संसाधन

साईनाथ ने कहा कि भारतीय अरबपतियों की संपत्ति का प्रमुख स्रोत किरायेदारी आय है, जो जंगलों, जमीन, खनिज, गैस, तेल और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं से आती है।
उन्होंने कहा कि यह संविधान के उस सिद्धांत का सीधा उल्लंघन है, जिसमें कहा गया है कि समुदाय के संसाधन कुछ हाथों में केंद्रित नहीं होने चाहिए।

उन्होंने बताया कि 1991 में भारत में एक भी डॉलर अरबपति नहीं था, जबकि आज उनकी संख्या दो सौ से अधिक है। अरबपतियों की संख्या के मामले में भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर है, जबकि मानव विकास सूचकांक में देश अब भी निचले पायदान पर है।

जीडीपी घटी, अरबपतियों की संपत्ति दोगुनी हुई

साईनाथ ने कहा कि कोविड के पहले वर्ष में भारत की जीडीपी 7.7 प्रतिशत घट गई, लेकिन इसी दौरान अरबपतियों की संख्या और उनकी कुल संपत्ति दोगुनी हो गई।

उन्होंने मनरेगा को ग्रामीण भारत के लिए, खासतौर पर महिलाओं के लिए, जीवनरेखा बताया और कहा कि कृषि श्रम का 65 प्रतिशत काम महिलाएं करती हैं।
साईनाथ ने बोला कि अगर मेहनत से लोग अमीर बनते, तो भारत की हर ग्रामीण महिला अरबपति होती

मजदूरी की गणना के आधार पर साईनाथ ने कहा कि मनरेगा का एक मजदूर भारत के सबसे अमीर उद्योगपति के बराबर संपत्ति जुटाने में दस लाख साल लेगा।

न्याय व्यवस्था और असमान शक्ति

न्याय प्रणाली पर बोलते हुए साईनाथ ने कहा कि असमानता का सबसे क्रूर रूप पुलिस व्यवस्था और अदालतों में दिखाई देता है।

उन्होंने कहा कि जमानत की व्यवस्था वर्ग और शक्ति के अनुसार अलग अलग तरीके से काम करती है, जहां अमीर और प्रभावशाली आरोपी आसानी से बाहर आ जाते हैं, जबकि गरीब और असहमति जताने वाले लोग वर्षों तक जेल में बंद रहते हैं।

किसान आंदोलन और कॉरपोरेट ताकत

साईनाथ ने किसान आंदोलन को पिछले तीस वर्षों में दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक, संवैधानिक और शांतिपूर्ण न्याय संघर्ष बताया।
उन्होंने कहा कि यह ईस्ट इंडिया कंपनी के बाद पहली बार था जब भारतीय किसानों ने सीधे तौर पर कॉरपोरेट शक्ति का सामना किया, लेकिन मीडिया ने बड़े पैमाने पर किसानों के नारों और मांगों को नजरअंदाज किया।

मीडिया और पत्रकारिता एक नहीं

साईनाथ ने मीडिया कॉरपोरेशनों और पत्रकारिता के बीच स्पष्ट अंतर रेखांकित किया।
उन्होंने कहा कि मीडिया का अस्तित्व शेयरधारकों के लिए मुनाफा अधिकतम करने के लिए है, जबकि पत्रकारिता जनता के लिए होती है।

लॉकडाउन के दौरान आवश्यक सेवा घोषित होने के बावजूद, उन्होंने कहा कि कोविड काल में भारतीय मीडिया संस्थानों ने 3,500 से अधिक पत्रकारों और 15,000 अन्य मीडिया कर्मियों को नौकरी से निकाल दिया, जिसे उन्होंने अवैध बताया।
कम से कम 750 पत्रकारों की कोविड से मृत्यु हुई, जिनमें से कई को न तो संस्थानों ने स्वीकार किया और न ही कोई मुआवजा दिया।

पत्रकारिता का अर्थ न्याय

साईनाथ ने कहा कि कोई भी समाज इतनी चरम असमानता के साथ जीवित नहीं रह सकता। या तो हम असमानता को खत्म करेंगे या असमानता हमें खत्म कर देगी।

संवैधानिक नवीकरण की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि काम का अधिकार और भोजन का अधिकार निर्देशक सिद्धांतों तक सीमित नहीं रहने चाहिए, बल्कि उन्हें मौलिक अधिकार बनाया जाना चाहिए।

अपने व्याख्यान के समापन पर साईनाथ ने कहा, If journalism is to have any meaning, the J in journalism must stand for justice. Without justice it is not worth doing.

उन्होंने लेखकों, फिल्मकारों और नागरिकों से अपील की कि वे स्वतंत्र मीडिया का समर्थन करें, लुप्तप्राय भाषाओं का दस्तावेजीकरण करें और गलत सूचना के इस दौर में बौद्धिक आत्मरक्षा का अभ्यास करें।

हिमांशु जोशी
@himanshu28may


Sunday, February 8, 2026

Inequality in India Is Now Structural : P.Sainath

From Farmers’ Distress to Billionaire Spectacle: Who Does the Media Serve

P. Sainath at Doon Library

Justice and the crisis of journalism in India

At the Doon Library and Research Centre journalist P. Sainath marked the Third Surjit Das Memorial Lecture. The packed auditorium included students, journalists, researchers and social activists as Sainath delivered a wide ranging lecture on inequality, justice and the crisis of journalism in India.

Veteran journalist said India is living through the greatest inequality in its history greater even than during the British Raj. He warned that inequality has now become embedded in the country’s political economy justice system and media structures.

Speaking at the Third Surjit Das Memorial Lecture at the Doon Library and Research Centre Sainath began his address by saying
“Every Indian language is my language.”
He said India cannot be understood without listening to its villages workers farmers and marginalised communities voices that mainstream media has increasingly erased.

Greater inequality than British India

Referring to Covid reverse migration and policy choices Sainath said India has entered a phase of extreme concentration of wealth. 

He said disengagement from the agrarian crisis explains why the arrival of nearly two lakh farmers at Delhi’s borders during the farmers’ protest shocked urban India though it did not surprise him.

Crores wedding in a state where farmers cancel marriages

Sainath referred to a recent ultra luxury corporate wedding that reportedly cost  crores rupees. He said the media celebrated it uncritically even as Maharashtra where the wedding took place remains the worst affected state in India’s agrarian crisis.

He cited a Maharashtra government survey showing that in just six districts of Vidarbha lakhs of families declared they could not afford to marry their daughters.
“Today there are villages full of men in their thirties who remain unmarried because no parent wants to give their daughter to a farmer,” he said.

Calling the wedding a brilliant business investment Sainath said such spectacles help consolidate influence over governments bureaucracies and public resources while costing billionaires only a tiny fraction of their wealth.

Billionaire wealth comes from public resources

Sainath said the dominant source of Indian billionaire wealth is rentier income derived from forests land minerals gas oil and infrastructure contracts.
“This is a direct violation of the constitutional principle that the resources of the community should not be concentrated in a few hands,” he said.

He noted that India had zero dollar billionaires in nineteen ninety one but now has more than two hundred ranking third globally in billionaire numbers while remaining near the bottom of the Human Development Index.

GDP fell but billionaire wealth doubled

Sainath said during the first year of Covid India’s GDP contracted by seven point seven percent yet the number of billionaires and their combined wealth doubled.
He said if the cake was shrinking that wealth did not come from above. It was sucked up from below.

He described MGNREGA as a lifeline for rural India especially women noting that sixty five percent of agricultural labour is done by women.
If hard work made people rich every rural woman in India would be a billionaire, he said.

Using wage calculations Sainath said an MGNREGA worker would need million years to accumulate wealth equivalent to India’s richest industrialist.

Justice system and unequal power

On the justice system Sainath said inequality manifests most brutally in policing and courts. Quoting a Dalit rural activist he said All the learned judges of the Supreme Court do not have the power of my local havaldar.

He said bail operates differently depending on class and power with wealthy and influential accused walking free while poor dissenters remain imprisoned for years.

Farmers protest and corporate power

Sainath described the farmers movement as the largest democratic constitutional and peaceful struggle for justice in the world in the last thirty years.

He said the movement marked the first direct confrontation between Indian farmers and corporate power since the East India Company adding that the media largely ignored farmers slogans and demands.

Media and journalism are not the same

Sainath drew a sharp distinction between media corporations and journalism.
He said media exist to maximise profit for shareholders. Journalism exists for the public.

Despite being declared an essential service during the lockdown he said Indian media organisations sacked more than three thousand five hundred journalists and fifteen thousand other media workers during Covid which he described as illegal.

At least seven hundred and fifty journalists died of Covid many without acknowledgement or compensation from their employers.

Journalism must stand for justice

Sainath said no society has survived such extreme inequality. Either we destroy inequality or inequality will destroy us.

Calling for constitutional renewal he argued that the Right to Work and the Right to Food must become fundamental rights not merely directive principles.

Concluding his lecture Sainath said
If journalism is to have any meaning the J in journalism must stand for justice. Without justice it is not worth doing.

He urged writers filmmakers and citizens to support independent media document endangered languages and practise intellectual self defence in an age of misinformation.


'असमानता अब व्यवस्था की संरचना बन चुकी है' पी साईनाथ

*'असमानता अब व्यवस्था की संरचना बन चुकी है' पी साईनाथ*

दून लाइब्रेरी में हुए व्याख्यान में वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ ने मौजूदा व्यवस्था और पत्रकारिता की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए.

*अपनी अब तक की सबसे गंभीर असमानता के दौर से गुजरता भारत*

दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर में आयोजित तीसरे सुरजीत दास मेमोरियल लेक्चर में वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ मुख्य वक्ता के तौर पर शामिल हुए.
सभागार में बड़ी संख्या में छात्र, शोधार्थी, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे. व्याख्यान के दौरान साईनाथ ने असमानता, न्याय और मीडिया की भूमिका पर तीखे सवाल उठाए.

वरिष्ठ पत्रकार ने कहा है कि भारत आज अपनी अब तक की सबसे गंभीर असमानता के दौर से गुजर रहा है. यह असमानता केवल आमदनी या संपत्ति तक सीमित नहीं है बल्कि न्याय व्यवस्था, मीडिया, राजनीति, सार्वजनिक संसाधनों और नागरिक अधिकारों, हर स्तर पर एक संगठित ढांचे का रूप ले चुकी है. दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर में आयोजित तीसरे सुरजीत दास मेमोरियल लेक्चर में साईनाथ ने कहा कि मौजूदा दौर में पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि वह सत्ता और मुनाफ़े के साथ खड़ी होगी या न्याय के साथ.

अपने व्याख्यान की शुरुआत करते हुए साईनाथ ने कहा Every Indian language is my language. उन्होंने कहा कि भारत को समझने के लिए उसकी भाषाओं, गांवों, श्रमिकों, किसानों और हाशिये पर खड़े समाज की आवाज़ को सुनना जरूरी है, लेकिन मौजूदा मीडिया उस भारत से लगातार दूर होता चला गया है.

साईनाथ ने कहा कि कोविड, रिवर्स माइग्रेशन और नीतिगत फैसलों ने भारत को उसके इतिहास की सबसे बड़ी असमानता तक पहुंचा दिया है.

*करोड़ों की शादी और टली हुई किसान शादियां*

साईनाथ ने कॉरपोरेट जगत से जुड़े परिवार में हुए हालिया विवाह का जिक्र करते हुए कहा कि उसमें करोड़ों रुपये खर्च किए गए और इस शादी को मीडिया ने उत्सव में बदल दिया. उन्होंने कहा कि यह शादी केवल सामाजिक आयोजन नहीं थी, बल्कि सत्ता, नौकरशाही और सार्वजनिक संसाधनों तक पहुंच मजबूत करने का बेहद सफल कारोबारी निवेश थी.

वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि महाराष्ट्र ऐसा राज्य है जहां हर साल सैकड़ों किसान परिवार शादियां इसलिए रद्द कर देते हैं क्योंकि उनके पास खर्च करने की क्षमता नहीं होती.
उन्होंने विदर्भ के सरकारी सर्वे का हवाला देते हुए कहा कि सिर्फ छह जिलों में लाखों परिवारों ने यह घोषित किया था कि वे अपनी बेटियों की शादी कराने की स्थिति में नहीं हैं. साईनाथ ने कहा कि आज हालत यह है कि गांवों में 30-30 साल के युवक अविवाहित हैं, क्योंकि कोई भी किसान परिवार अपनी बेटी किसान से ब्याहने को तैयार नहीं है.

*अरबपतियों की दौलत और सार्वजनिक संसाधन*

साईनाथ ने कहा कि भारत के अरबपतियों की संपत्ति का बड़ा हिस्सा जंगल, जमीन, खनिज, गैस और तेल जैसे सार्वजनिक संसाधनों से आता है. यह संविधान के उस मूल सिद्धांत के खिलाफ है, जो कहता है कि समाज के संसाधन कुछ गिने-चुने हाथों में केंद्रित नहीं होने चाहिए.

उन्होंने कहा कि 1991 में भारत में एक भी अरबपति नहीं था, जबकि आज उनकी संख्या 200 से अधिक है. हम अरबपतियों की संख्या में दुनिया में तीसरे नंबर पर हैं, लेकिन मानव विकास सूचकांक में 130 से नीचे.

*कोविड में GDP गिरी, अरबपतियों की दौलत दोगुनी हुई*

साईनाथ ने कहा कि कोविड के पहले साल में अर्थव्यवस्था 7.7 प्रतिशत गिरी, लेकिन उसी दौरान अरबपतियों की संख्या और उनकी कुल संपत्ति दोगुनी हो गई. अगर GDP गिर रही थी, तो यह दौलत ऊपर से नहीं आई, यह नीचे से खींची गई.

उन्होंने मनरेगा को ग्रामीण भारत, खासकर महिलाओं के लिए जीवन रेखा बताया. साईनाथ ने आगे कहा कि अगर मेहनत से अमीरी आती, तो ग्रामीण भारत की हर महिला अरबपति होती.
उन्होंने गणना पेश करते हुए कहा कि मनरेगा की औसत दिहाड़ी पर काम करने वाले व्यक्ति को देश के सबसे अमीर उद्योगपति की संपत्ति तक पहुंचने में लाखों साल लगेंगे.

*न्याय व्यवस्था और दंडहीनता*

न्याय प्रणाली पर बोलते हुए साईनाथ ने कहा कि असमानता की सबसे खतरनाक तस्वीर अदालतों और पुलिस व्यवस्था में दिखाई देती है. उन्होंने एक दलित ग्रामीण नेता के हवाले से कहा सुप्रीम कोर्ट के सारे जज मेरे लोकल हवलदार की ताकत के सामने कुछ नहीं हैं.

उन्होंने कहा कि ताकतवर और अमीर आरोपी आसानी से जमानत पर बाहर आ जाते हैं, जबकि गरीब और असहमत आवाज़ों को सालों तक जेल में रखा जाता है. बेल इस बात पर निर्भर करती है कि आप कौन हैं.

*किसान आंदोलन और मीडिया की चुप्पी*

साईनाथ ने किसान आंदोलन को बीते तीन दशकों का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक संघर्ष बताया. उन्होंने कहा कि 54 हफ्तों तक चले इस आंदोलन में सैकड़ों किसानों की मौत हुई, लेकिन मीडिया ने न तो आंदोलन की मांगें ठीक से बताईं और न ही किसानों के नारों को.

उन्होंने कहा कि 1857 के बाद यह पहली बार था जब भारतीय किसान सीधे कॉरपोरेट ताकत से टकराए.

*मीडिया और पत्रकारिता एक नहीं*

साईनाथ ने कहा मीडिया और पत्रकारिता एक चीज़ नहीं हैं. उन्होंने कहा कि मीडिया कॉरपोरेट संस्थाएं हैं, जिनका उद्देश्य मुनाफा है, जबकि पत्रकारिता का उद्देश्य जनहित और न्याय होना चाहिए.

उन्होंने कहा कि कोविड के दौरान मीडिया को आवश्यक सेवा घोषित किए जाने के बावजूद हजारों पत्रकारों और मीडिया कर्मचारियों को नौकरी से निकाला गया. कम से कम 750 पत्रकार कोविड में मरे, जिनके संस्थानों ने उनके नाम तक नहीं छापे.

*‘पत्रकारिता में J का मतलब Justice’*

साईनाथ ने कहा कि अगर पत्रकारिता को बचाना है, तो उसके केंद्र में न्याय होना होगा. अगर पत्रकारिता में न्याय नहीं है, तो वह करने लायक नहीं है.
उन्होंने लेखकों, फिल्मकारों और युवाओं से अपील की कि वे असमानता पर लिखें, फिल्म बनाएं और स्वतंत्र मीडिया का समर्थन करें.

हत्या, प्रेम और सिस्टम के सवालों का थ्रिलर : ‘उसने बुलाया था’

*हत्या, प्रेम और सिस्टम के सवालों का थ्रिलर : ‘उसने बुलाया था’*

थ्रिलर के वादे के साथ एक नई किताब

मनोज बाजपेयी की बायोग्राफी के लिए मशहूर हुए लेखक पीयूष पांडे की नई किताब ‘उसने बुलाया था’ पेंगुइन स्वदेश प्रकाशन से प्रकाशित होकर आई है. किताब का आवरण पाठकों को थ्रिल करता है और पिछले आवरण पर भी यही दावा किया गया है कि यह ‘एक ऐसा थ्रिलर है जिसे शुरू करने के बाद आप रुक नहीं पाएंगे’. अनसुलझी प्रेम कहानी और एक हत्या की गुत्थी सुलझाते हुए लेखक किताब की शुरुआत में ही एक हत्या से पाठकों के भीतर उत्सुकता और थ्रिल पैदा कर देते हैं.

*कहानी की शुरुआत और एक चूक*

जब पाठक कहानी और पात्रों से परिचय बना ही रहे होते हैं, उसी दौरान पेंगुइन स्वदेश जैसे बड़े प्रकाशक की एक बड़ी गलती खटकती है. पृष्ठ संख्या 11 में इंस्पेक्टर आदित्य के नाम की जगह मृतक राघव का नाम लिखा गया है. यह चूक इसलिए ज्यादा अखरती है क्योंकि यह किताब की शुरुआती संरचना में आती है और पाठक का ध्यान भंग करती है. इसके बावजूद लेखक दृश्यात्मक लेखन के जरिए कहानी को आगे बढ़ाते रहते हैं. ‘लेकिन थानों की शामें कई बार अलग होती हैं. दिन ढलते ढलते..’ जैसे वाक्य कहानी का दृश्य पाठकों के सामने रख देते हैं.

*फिल्मी शिल्प और फ्लैशबैक की तकनीक*

पीयूष पांडे ने किताब को बिल्कुल किसी सस्पेंस थ्रिलर हिंदी फिल्म की तरह लिखा है. ‘छह महीने पहले’ जैसे संकेतों के साथ कहानी फ्लैशबैक में जाती है और पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे पाठक किसी फिल्म के दृश्य देख रहा हो. उदाहरण देने में लेखक जगह जगह दक्ष नजर आते हैं. आईएसओ मार्का निशान की तुलना प्रोफेसर पाठक की विश्वसनीयता से करना कहानी को और रोचक बनाता है.

*समकालीन यथार्थ और सामाजिक टिप्पणी*

कहानी के साथ साथ लेखक देश के मौजूदा हालातों पर भी टिप्पणी करते चलते हैं, जिससे किताब समसामयिक लगती है. ‘इस देश में अभी भी लाखों लोगों के लिए चपरासी की नौकरी हासिल करना किसी उपलब्धि से कम नहीं है’ जैसी पंक्तियां सामाजिक यथार्थ को सामने लाती हैं. खासी जनजाति के बारे में दी गई जानकारी किताब को और खास बनाती है. लीशा के पात्र को नॉर्थ ईस्ट से जोड़कर लेखक एक महत्वपूर्ण सामाजिक संदर्भ सामने लाते हैं और उसका बयान ‘कैसा लगेगा..’ पढ़ने योग्य बन पड़ता है.

*पत्रकारिता, कोर्टरूम और डिजिटल दुनिया*

लेखक का पत्रकार होना कहानी में साफ दिखाई देता है. ‘एंकर बनने के लिए सिर्फ अच्छा दिखना काफी नहीं है. भाषा की शुद्धता, विषय पर पकड़, कैमरे के सामने सहजता और घंटों काम करने की योग्यता चाहिए’ जैसी पंक्तियां इस अनुभव का उदाहरण हैं. ‘जिस तरह एक आम कार्यकर्ता के लिए टिकट का निर्णय करने वाले आलाकमान तक पहुंचना आसान नहीं होता, उसी तरह एक सामान्य इंस्पेक्टर के लिए कमिश्नर तक पहुंचना आसान नहीं होता’ जैसी पंक्तियों के जरिए लेखक सिस्टम पर व्यंग्य करते हैं.

कोर्ट रूम और ऑनलाइन दुनिया के दृश्य, जैसे ‘पेन को अपने घुंघराले बालों में फंसा लिया’ या ‘आदित्य ने फेसबुक के सर्च बॉक्स में विराट का प्रोफाइल सर्च…’, कहानी को आज के समय से जोड़ते हैं. हैशटैग का प्रयोग इसे युवाओं की पहुंच तक लाता है और ‘रेपिस्ट तो वो सांप हैं, जो समाज को डसते ही चले जाते हैं’ जैसे संवाद इस थ्रिलर को फिल्म या वेब सीरीज के अनुकूल बनाते हैं.

Sunday, February 1, 2026

ऋषिकेश का बापू ग्राम वन भूमि विवाद की जद में, बिजली पानी रोके जाने पर सड़कों पर उतरे हजारों लोग

*ऋषिकेश का बापू ग्राम वन भूमि विवाद की जद में, बिजली पानी रोके जाने पर सड़कों पर उतरे हजारों लोग*

सालों से रह रहे निवासियों का दावा, सरकार 500 परिवार बता रही है जबकि आबादी एक लाख के करीब

*प्रशासनिक कार्रवाई के विरोध में सड़क पर उतरे लोग*


ऋषिकेश के बापू ग्राम में वन भूमि विवाद को लेकर हालात लगातार तनावपूर्ण होते जा रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद प्रशासन ने नए निर्माण पर रोक लगाने के साथ ही नए मकानों को बिजली और पानी के कनेक्शन देने बंद कर दिए हैं. इसके विरोध में स्थानीय लोग 'बापू ग्राम बचाओ संघर्ष समिति' के बैनर तले सड़कों पर उतर आए. रैली में बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है.

*लीज पर दी गई जमीन और बढ़ती आबादी का दावा*


स्थानीय निवासी राकेश चौरसिया पिछले 25 वर्षों से बापू ग्राम में रह रहे हैं, वह बताते हैं कि मीरा बेन ने यह जमीन सरकार को वापस दी थी. इसके बाद सरकार ने 51 परिवारों को 99 साल की लीज पर भूमि दी, जिनमें 50 अनुसूचित जाति और एक सामान्य वर्ग का परिवार शामिल था. उनका कहना है कि समय के साथ बापू ग्राम की आबादी बढ़कर लगभग एक लाख तक पहुंच गई है, लेकिन सरकार अब भी यहां केवल 500 परिवार होने का दावा कर रही है.

*जमीनी हकीकत और सरकारी आंकड़ों में फर्क*


1998 से बापू ग्राम में रह रहे ओम प्रकाश नौटियाल का कहना है कि जमीनी हकीकत सरकारी आंकड़ों से बिल्कुल अलग है और यहां करीब 30 हजार परिवार रहते हैं. लोगों का आरोप है कि वर्षों से बसे होने के बावजूद उन्हें अतिक्रमणकारी माना जा रहा है, अगर वह अवैध रूप से रह रहे हैं तो उन्हें सालों से बिजली, पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं दी ही क्यों गई थी. पच्चीस सालों से बापू ग्राम के निवासी वेल्डिंग का काम करने वाले योगेश बिष्ट ने बताया कि एक तरफ तो यहां सीवर लाइन का काम चल रहा है और दूसरी तरफ प्रशासन का यह रवैया है.

प्रशासन की कार्रवाई और अदालत में लंबित मामले के बीच बापू ग्राम के हजारों परिवार अपने भविष्य को लेकर असमंजस में हैं.

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...