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Monday, February 9, 2026
अरबपतियों का भारत और हाशिये की आवाजें
अरबपतियों का भारत और हाशिये की आवाजें
दून लाइब्रेरी में पी. साईनाथ का व्याख्यान
दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर में आयोजित तीसरे सुरजीत दास मेमोरियल लेक्चर में वरिष्ठ पत्रकार मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए। खचाखच भरे सभागार में छात्रों, पत्रकारों, शोधकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मौजूदगी के बीच साईनाथ ने भारत में असमानता, न्याय और पत्रकारिता के संकट पर व्यापक और विचारोत्तेजक व्याख्यान दिया।
वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि भारत अपने इतिहास के सबसे बड़े असमानता के दौर से गुजर रहा है, जो ब्रिटिश राज के समय से भी अधिक गंभीर है। उन्होंने चेताया कि असमानता अब देश की राजनीतिक अर्थव्यवस्था, न्याय प्रणाली और मीडिया संरचनाओं में गहराई से समा चुकी है।
दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर में तीसरे सुरजीत दास मेमोरियल लेक्चर को संबोधित करते हुए साईनाथ ने अपने वक्तव्य की शुरुआत इन शब्दों से की,
“Every Indian language is my language.”
उन्होंने कहा कि भारत को गांवों, मजदूरों, किसानों और हाशिये पर खड़े समुदायों की आवाजें सुने बिना नहीं समझा जा सकता, लेकिन मुख्यधारा का मीडिया लगातार इन आवाजों को मिटाता जा रहा है।
ब्रिटिश भारत से भी अधिक असमानता
कोविड के दौरान हुए रिवर्स माइग्रेशन और नीतिगत फैसलों का जिक्र करते हुए साईनाथ ने कहा कि भारत अत्यधिक धन संकेंद्रण के दौर में प्रवेश कर चुका है।
उन्होंने कहा कि कृषि संकट से दूरी ही यह बताती है कि किसान आंदोलन के दौरान दिल्ली की सीमाओं पर लगभग दो लाख किसानों के पहुंचने से शहरी भारत चौंक गया, जबकि यह उनके लिए कोई आश्चर्य नहीं था।
जहां किसान शादियां टाल रहे हैं, वहां करोड़ों की शादी
साईनाथ ने हाल में हुई एक अल्ट्रा लग्जरी कॉरपोरेट शादी का उल्लेख किया, जिस पर कथित तौर पर करोड़ों रुपये खर्च हुए। उन्होंने कहा कि मीडिया ने इस आयोजन का बिना किसी आलोचनात्मक दृष्टि के उत्सव मनाया, जबकि जिस महाराष्ट्र में यह शादी हुई, वही राज्य देश के सबसे गंभीर कृषि संकट से जूझ रहा है।
उन्होंने महाराष्ट्र सरकार के एक सर्वे का हवाला दिया, जिसमें विदर्भ के केवल छह जिलों में ही लाखों परिवारों ने कहा कि वे अपनी बेटियों की शादी का खर्च वहन नहीं कर सकते।
“आज ऐसे गांव हैं जहां तीस की उम्र पार कर चुके पुरुष अविवाहित हैं, क्योंकि कोई भी माता पिता अपनी बेटी किसी किसान को देने को तैयार नहीं,” साईनाथ ने कहा।
इस शादी को एक शानदार कारोबारी निवेश बताते हुए साईनाथ ने कहा कि ऐसे तमाशे सरकारों, नौकरशाहियों और सार्वजनिक संसाधनों पर प्रभाव जमाने में मदद करते हैं, जबकि अरबपतियों की कुल संपत्ति का यह बहुत छोटा हिस्सा होते हैं।
अरबपतियों की संपत्ति और सार्वजनिक संसाधन
साईनाथ ने कहा कि भारतीय अरबपतियों की संपत्ति का प्रमुख स्रोत किरायेदारी आय है, जो जंगलों, जमीन, खनिज, गैस, तेल और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं से आती है।
उन्होंने कहा कि यह संविधान के उस सिद्धांत का सीधा उल्लंघन है, जिसमें कहा गया है कि समुदाय के संसाधन कुछ हाथों में केंद्रित नहीं होने चाहिए।
उन्होंने बताया कि 1991 में भारत में एक भी डॉलर अरबपति नहीं था, जबकि आज उनकी संख्या दो सौ से अधिक है। अरबपतियों की संख्या के मामले में भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर है, जबकि मानव विकास सूचकांक में देश अब भी निचले पायदान पर है।
जीडीपी घटी, अरबपतियों की संपत्ति दोगुनी हुई
साईनाथ ने कहा कि कोविड के पहले वर्ष में भारत की जीडीपी 7.7 प्रतिशत घट गई, लेकिन इसी दौरान अरबपतियों की संख्या और उनकी कुल संपत्ति दोगुनी हो गई।
उन्होंने मनरेगा को ग्रामीण भारत के लिए, खासतौर पर महिलाओं के लिए, जीवनरेखा बताया और कहा कि कृषि श्रम का 65 प्रतिशत काम महिलाएं करती हैं।
साईनाथ ने बोला कि अगर मेहनत से लोग अमीर बनते, तो भारत की हर ग्रामीण महिला अरबपति होती
मजदूरी की गणना के आधार पर साईनाथ ने कहा कि मनरेगा का एक मजदूर भारत के सबसे अमीर उद्योगपति के बराबर संपत्ति जुटाने में दस लाख साल लेगा।
न्याय व्यवस्था और असमान शक्ति
न्याय प्रणाली पर बोलते हुए साईनाथ ने कहा कि असमानता का सबसे क्रूर रूप पुलिस व्यवस्था और अदालतों में दिखाई देता है।
उन्होंने कहा कि जमानत की व्यवस्था वर्ग और शक्ति के अनुसार अलग अलग तरीके से काम करती है, जहां अमीर और प्रभावशाली आरोपी आसानी से बाहर आ जाते हैं, जबकि गरीब और असहमति जताने वाले लोग वर्षों तक जेल में बंद रहते हैं।
किसान आंदोलन और कॉरपोरेट ताकत
साईनाथ ने किसान आंदोलन को पिछले तीस वर्षों में दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक, संवैधानिक और शांतिपूर्ण न्याय संघर्ष बताया।
उन्होंने कहा कि यह ईस्ट इंडिया कंपनी के बाद पहली बार था जब भारतीय किसानों ने सीधे तौर पर कॉरपोरेट शक्ति का सामना किया, लेकिन मीडिया ने बड़े पैमाने पर किसानों के नारों और मांगों को नजरअंदाज किया।
मीडिया और पत्रकारिता एक नहीं
साईनाथ ने मीडिया कॉरपोरेशनों और पत्रकारिता के बीच स्पष्ट अंतर रेखांकित किया।
उन्होंने कहा कि मीडिया का अस्तित्व शेयरधारकों के लिए मुनाफा अधिकतम करने के लिए है, जबकि पत्रकारिता जनता के लिए होती है।
लॉकडाउन के दौरान आवश्यक सेवा घोषित होने के बावजूद, उन्होंने कहा कि कोविड काल में भारतीय मीडिया संस्थानों ने 3,500 से अधिक पत्रकारों और 15,000 अन्य मीडिया कर्मियों को नौकरी से निकाल दिया, जिसे उन्होंने अवैध बताया।
कम से कम 750 पत्रकारों की कोविड से मृत्यु हुई, जिनमें से कई को न तो संस्थानों ने स्वीकार किया और न ही कोई मुआवजा दिया।
पत्रकारिता का अर्थ न्याय
साईनाथ ने कहा कि कोई भी समाज इतनी चरम असमानता के साथ जीवित नहीं रह सकता। या तो हम असमानता को खत्म करेंगे या असमानता हमें खत्म कर देगी।
संवैधानिक नवीकरण की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि काम का अधिकार और भोजन का अधिकार निर्देशक सिद्धांतों तक सीमित नहीं रहने चाहिए, बल्कि उन्हें मौलिक अधिकार बनाया जाना चाहिए।
अपने व्याख्यान के समापन पर साईनाथ ने कहा, If journalism is to have any meaning, the J in journalism must stand for justice. Without justice it is not worth doing.
उन्होंने लेखकों, फिल्मकारों और नागरिकों से अपील की कि वे स्वतंत्र मीडिया का समर्थन करें, लुप्तप्राय भाषाओं का दस्तावेजीकरण करें और गलत सूचना के इस दौर में बौद्धिक आत्मरक्षा का अभ्यास करें।
हिमांशु जोशी
@himanshu28may
Sunday, February 8, 2026
Inequality in India Is Now Structural : P.Sainath
From Farmers’ Distress to Billionaire Spectacle: Who Does the Media Serve
Speaking at the Third Surjit Das Memorial Lecture at the Doon Library and Research Centre Sainath began his address by saying
“Every Indian language is my language.”
He said India cannot be understood without listening to its villages workers farmers and marginalised communities voices that mainstream media has increasingly erased.
Greater inequality than British India
Referring to Covid reverse migration and policy choices Sainath said India has entered a phase of extreme concentration of wealth.
He said disengagement from the agrarian crisis explains why the arrival of nearly two lakh farmers at Delhi’s borders during the farmers’ protest shocked urban India though it did not surprise him.
Crores wedding in a state where farmers cancel marriages
Sainath referred to a recent ultra luxury corporate wedding that reportedly cost crores rupees. He said the media celebrated it uncritically even as Maharashtra where the wedding took place remains the worst affected state in India’s agrarian crisis.
He cited a Maharashtra government survey showing that in just six districts of Vidarbha lakhs of families declared they could not afford to marry their daughters.
“Today there are villages full of men in their thirties who remain unmarried because no parent wants to give their daughter to a farmer,” he said.
Calling the wedding a brilliant business investment Sainath said such spectacles help consolidate influence over governments bureaucracies and public resources while costing billionaires only a tiny fraction of their wealth.
Billionaire wealth comes from public resources
Sainath said the dominant source of Indian billionaire wealth is rentier income derived from forests land minerals gas oil and infrastructure contracts.
“This is a direct violation of the constitutional principle that the resources of the community should not be concentrated in a few hands,” he said.
He noted that India had zero dollar billionaires in nineteen ninety one but now has more than two hundred ranking third globally in billionaire numbers while remaining near the bottom of the Human Development Index.
GDP fell but billionaire wealth doubled
Sainath said during the first year of Covid India’s GDP contracted by seven point seven percent yet the number of billionaires and their combined wealth doubled.
He said if the cake was shrinking that wealth did not come from above. It was sucked up from below.
He described MGNREGA as a lifeline for rural India especially women noting that sixty five percent of agricultural labour is done by women.
If hard work made people rich every rural woman in India would be a billionaire, he said.
Using wage calculations Sainath said an MGNREGA worker would need million years to accumulate wealth equivalent to India’s richest industrialist.
Justice system and unequal power
On the justice system Sainath said inequality manifests most brutally in policing and courts. Quoting a Dalit rural activist he said All the learned judges of the Supreme Court do not have the power of my local havaldar.
He said bail operates differently depending on class and power with wealthy and influential accused walking free while poor dissenters remain imprisoned for years.
Farmers protest and corporate power
Sainath described the farmers movement as the largest democratic constitutional and peaceful struggle for justice in the world in the last thirty years.
He said the movement marked the first direct confrontation between Indian farmers and corporate power since the East India Company adding that the media largely ignored farmers slogans and demands.
Media and journalism are not the same
Sainath drew a sharp distinction between media corporations and journalism.
He said media exist to maximise profit for shareholders. Journalism exists for the public.
Despite being declared an essential service during the lockdown he said Indian media organisations sacked more than three thousand five hundred journalists and fifteen thousand other media workers during Covid which he described as illegal.
At least seven hundred and fifty journalists died of Covid many without acknowledgement or compensation from their employers.
Journalism must stand for justice
Sainath said no society has survived such extreme inequality. Either we destroy inequality or inequality will destroy us.
Calling for constitutional renewal he argued that the Right to Work and the Right to Food must become fundamental rights not merely directive principles.
Concluding his lecture Sainath said
If journalism is to have any meaning the J in journalism must stand for justice. Without justice it is not worth doing.
He urged writers filmmakers and citizens to support independent media document endangered languages and practise intellectual self defence in an age of misinformation.
'असमानता अब व्यवस्था की संरचना बन चुकी है' पी साईनाथ
*'असमानता अब व्यवस्था की संरचना बन चुकी है' पी साईनाथ*
दून लाइब्रेरी में हुए व्याख्यान में वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ ने मौजूदा व्यवस्था और पत्रकारिता की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए.
*अपनी अब तक की सबसे गंभीर असमानता के दौर से गुजरता भारत*
दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर में आयोजित तीसरे सुरजीत दास मेमोरियल लेक्चर में वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ मुख्य वक्ता के तौर पर शामिल हुए.
सभागार में बड़ी संख्या में छात्र, शोधार्थी, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे. व्याख्यान के दौरान साईनाथ ने असमानता, न्याय और मीडिया की भूमिका पर तीखे सवाल उठाए.
वरिष्ठ पत्रकार ने कहा है कि भारत आज अपनी अब तक की सबसे गंभीर असमानता के दौर से गुजर रहा है. यह असमानता केवल आमदनी या संपत्ति तक सीमित नहीं है बल्कि न्याय व्यवस्था, मीडिया, राजनीति, सार्वजनिक संसाधनों और नागरिक अधिकारों, हर स्तर पर एक संगठित ढांचे का रूप ले चुकी है. दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर में आयोजित तीसरे सुरजीत दास मेमोरियल लेक्चर में साईनाथ ने कहा कि मौजूदा दौर में पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि वह सत्ता और मुनाफ़े के साथ खड़ी होगी या न्याय के साथ.
अपने व्याख्यान की शुरुआत करते हुए साईनाथ ने कहा Every Indian language is my language. उन्होंने कहा कि भारत को समझने के लिए उसकी भाषाओं, गांवों, श्रमिकों, किसानों और हाशिये पर खड़े समाज की आवाज़ को सुनना जरूरी है, लेकिन मौजूदा मीडिया उस भारत से लगातार दूर होता चला गया है.
साईनाथ ने कहा कि कोविड, रिवर्स माइग्रेशन और नीतिगत फैसलों ने भारत को उसके इतिहास की सबसे बड़ी असमानता तक पहुंचा दिया है.
*करोड़ों की शादी और टली हुई किसान शादियां*
साईनाथ ने कॉरपोरेट जगत से जुड़े परिवार में हुए हालिया विवाह का जिक्र करते हुए कहा कि उसमें करोड़ों रुपये खर्च किए गए और इस शादी को मीडिया ने उत्सव में बदल दिया. उन्होंने कहा कि यह शादी केवल सामाजिक आयोजन नहीं थी, बल्कि सत्ता, नौकरशाही और सार्वजनिक संसाधनों तक पहुंच मजबूत करने का बेहद सफल कारोबारी निवेश थी.
वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि महाराष्ट्र ऐसा राज्य है जहां हर साल सैकड़ों किसान परिवार शादियां इसलिए रद्द कर देते हैं क्योंकि उनके पास खर्च करने की क्षमता नहीं होती.
उन्होंने विदर्भ के सरकारी सर्वे का हवाला देते हुए कहा कि सिर्फ छह जिलों में लाखों परिवारों ने यह घोषित किया था कि वे अपनी बेटियों की शादी कराने की स्थिति में नहीं हैं. साईनाथ ने कहा कि आज हालत यह है कि गांवों में 30-30 साल के युवक अविवाहित हैं, क्योंकि कोई भी किसान परिवार अपनी बेटी किसान से ब्याहने को तैयार नहीं है.
*अरबपतियों की दौलत और सार्वजनिक संसाधन*
साईनाथ ने कहा कि भारत के अरबपतियों की संपत्ति का बड़ा हिस्सा जंगल, जमीन, खनिज, गैस और तेल जैसे सार्वजनिक संसाधनों से आता है. यह संविधान के उस मूल सिद्धांत के खिलाफ है, जो कहता है कि समाज के संसाधन कुछ गिने-चुने हाथों में केंद्रित नहीं होने चाहिए.
उन्होंने कहा कि 1991 में भारत में एक भी अरबपति नहीं था, जबकि आज उनकी संख्या 200 से अधिक है. हम अरबपतियों की संख्या में दुनिया में तीसरे नंबर पर हैं, लेकिन मानव विकास सूचकांक में 130 से नीचे.
*कोविड में GDP गिरी, अरबपतियों की दौलत दोगुनी हुई*
साईनाथ ने कहा कि कोविड के पहले साल में अर्थव्यवस्था 7.7 प्रतिशत गिरी, लेकिन उसी दौरान अरबपतियों की संख्या और उनकी कुल संपत्ति दोगुनी हो गई. अगर GDP गिर रही थी, तो यह दौलत ऊपर से नहीं आई, यह नीचे से खींची गई.
उन्होंने मनरेगा को ग्रामीण भारत, खासकर महिलाओं के लिए जीवन रेखा बताया. साईनाथ ने आगे कहा कि अगर मेहनत से अमीरी आती, तो ग्रामीण भारत की हर महिला अरबपति होती.
उन्होंने गणना पेश करते हुए कहा कि मनरेगा की औसत दिहाड़ी पर काम करने वाले व्यक्ति को देश के सबसे अमीर उद्योगपति की संपत्ति तक पहुंचने में लाखों साल लगेंगे.
*न्याय व्यवस्था और दंडहीनता*
न्याय प्रणाली पर बोलते हुए साईनाथ ने कहा कि असमानता की सबसे खतरनाक तस्वीर अदालतों और पुलिस व्यवस्था में दिखाई देती है. उन्होंने एक दलित ग्रामीण नेता के हवाले से कहा सुप्रीम कोर्ट के सारे जज मेरे लोकल हवलदार की ताकत के सामने कुछ नहीं हैं.
उन्होंने कहा कि ताकतवर और अमीर आरोपी आसानी से जमानत पर बाहर आ जाते हैं, जबकि गरीब और असहमत आवाज़ों को सालों तक जेल में रखा जाता है. बेल इस बात पर निर्भर करती है कि आप कौन हैं.
*किसान आंदोलन और मीडिया की चुप्पी*
साईनाथ ने किसान आंदोलन को बीते तीन दशकों का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक संघर्ष बताया. उन्होंने कहा कि 54 हफ्तों तक चले इस आंदोलन में सैकड़ों किसानों की मौत हुई, लेकिन मीडिया ने न तो आंदोलन की मांगें ठीक से बताईं और न ही किसानों के नारों को.
उन्होंने कहा कि 1857 के बाद यह पहली बार था जब भारतीय किसान सीधे कॉरपोरेट ताकत से टकराए.
*मीडिया और पत्रकारिता एक नहीं*
साईनाथ ने कहा मीडिया और पत्रकारिता एक चीज़ नहीं हैं. उन्होंने कहा कि मीडिया कॉरपोरेट संस्थाएं हैं, जिनका उद्देश्य मुनाफा है, जबकि पत्रकारिता का उद्देश्य जनहित और न्याय होना चाहिए.
उन्होंने कहा कि कोविड के दौरान मीडिया को आवश्यक सेवा घोषित किए जाने के बावजूद हजारों पत्रकारों और मीडिया कर्मचारियों को नौकरी से निकाला गया. कम से कम 750 पत्रकार कोविड में मरे, जिनके संस्थानों ने उनके नाम तक नहीं छापे.
*‘पत्रकारिता में J का मतलब Justice’*
साईनाथ ने कहा कि अगर पत्रकारिता को बचाना है, तो उसके केंद्र में न्याय होना होगा. अगर पत्रकारिता में न्याय नहीं है, तो वह करने लायक नहीं है.
उन्होंने लेखकों, फिल्मकारों और युवाओं से अपील की कि वे असमानता पर लिखें, फिल्म बनाएं और स्वतंत्र मीडिया का समर्थन करें.
हत्या, प्रेम और सिस्टम के सवालों का थ्रिलर : ‘उसने बुलाया था’
*हत्या, प्रेम और सिस्टम के सवालों का थ्रिलर : ‘उसने बुलाया था’*
थ्रिलर के वादे के साथ एक नई किताब
मनोज बाजपेयी की बायोग्राफी के लिए मशहूर हुए लेखक पीयूष पांडे की नई किताब ‘उसने बुलाया था’ पेंगुइन स्वदेश प्रकाशन से प्रकाशित होकर आई है. किताब का आवरण पाठकों को थ्रिल करता है और पिछले आवरण पर भी यही दावा किया गया है कि यह ‘एक ऐसा थ्रिलर है जिसे शुरू करने के बाद आप रुक नहीं पाएंगे’. अनसुलझी प्रेम कहानी और एक हत्या की गुत्थी सुलझाते हुए लेखक किताब की शुरुआत में ही एक हत्या से पाठकों के भीतर उत्सुकता और थ्रिल पैदा कर देते हैं.
*कहानी की शुरुआत और एक चूक*
जब पाठक कहानी और पात्रों से परिचय बना ही रहे होते हैं, उसी दौरान पेंगुइन स्वदेश जैसे बड़े प्रकाशक की एक बड़ी गलती खटकती है. पृष्ठ संख्या 11 में इंस्पेक्टर आदित्य के नाम की जगह मृतक राघव का नाम लिखा गया है. यह चूक इसलिए ज्यादा अखरती है क्योंकि यह किताब की शुरुआती संरचना में आती है और पाठक का ध्यान भंग करती है. इसके बावजूद लेखक दृश्यात्मक लेखन के जरिए कहानी को आगे बढ़ाते रहते हैं. ‘लेकिन थानों की शामें कई बार अलग होती हैं. दिन ढलते ढलते..’ जैसे वाक्य कहानी का दृश्य पाठकों के सामने रख देते हैं.
*फिल्मी शिल्प और फ्लैशबैक की तकनीक*
पीयूष पांडे ने किताब को बिल्कुल किसी सस्पेंस थ्रिलर हिंदी फिल्म की तरह लिखा है. ‘छह महीने पहले’ जैसे संकेतों के साथ कहानी फ्लैशबैक में जाती है और पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे पाठक किसी फिल्म के दृश्य देख रहा हो. उदाहरण देने में लेखक जगह जगह दक्ष नजर आते हैं. आईएसओ मार्का निशान की तुलना प्रोफेसर पाठक की विश्वसनीयता से करना कहानी को और रोचक बनाता है.
*समकालीन यथार्थ और सामाजिक टिप्पणी*
कहानी के साथ साथ लेखक देश के मौजूदा हालातों पर भी टिप्पणी करते चलते हैं, जिससे किताब समसामयिक लगती है. ‘इस देश में अभी भी लाखों लोगों के लिए चपरासी की नौकरी हासिल करना किसी उपलब्धि से कम नहीं है’ जैसी पंक्तियां सामाजिक यथार्थ को सामने लाती हैं. खासी जनजाति के बारे में दी गई जानकारी किताब को और खास बनाती है. लीशा के पात्र को नॉर्थ ईस्ट से जोड़कर लेखक एक महत्वपूर्ण सामाजिक संदर्भ सामने लाते हैं और उसका बयान ‘कैसा लगेगा..’ पढ़ने योग्य बन पड़ता है.
*पत्रकारिता, कोर्टरूम और डिजिटल दुनिया*
लेखक का पत्रकार होना कहानी में साफ दिखाई देता है. ‘एंकर बनने के लिए सिर्फ अच्छा दिखना काफी नहीं है. भाषा की शुद्धता, विषय पर पकड़, कैमरे के सामने सहजता और घंटों काम करने की योग्यता चाहिए’ जैसी पंक्तियां इस अनुभव का उदाहरण हैं. ‘जिस तरह एक आम कार्यकर्ता के लिए टिकट का निर्णय करने वाले आलाकमान तक पहुंचना आसान नहीं होता, उसी तरह एक सामान्य इंस्पेक्टर के लिए कमिश्नर तक पहुंचना आसान नहीं होता’ जैसी पंक्तियों के जरिए लेखक सिस्टम पर व्यंग्य करते हैं.
कोर्ट रूम और ऑनलाइन दुनिया के दृश्य, जैसे ‘पेन को अपने घुंघराले बालों में फंसा लिया’ या ‘आदित्य ने फेसबुक के सर्च बॉक्स में विराट का प्रोफाइल सर्च…’, कहानी को आज के समय से जोड़ते हैं. हैशटैग का प्रयोग इसे युवाओं की पहुंच तक लाता है और ‘रेपिस्ट तो वो सांप हैं, जो समाज को डसते ही चले जाते हैं’ जैसे संवाद इस थ्रिलर को फिल्म या वेब सीरीज के अनुकूल बनाते हैं.
Sunday, February 1, 2026
ऋषिकेश का बापू ग्राम वन भूमि विवाद की जद में, बिजली पानी रोके जाने पर सड़कों पर उतरे हजारों लोग
*ऋषिकेश का बापू ग्राम वन भूमि विवाद की जद में, बिजली पानी रोके जाने पर सड़कों पर उतरे हजारों लोग*
सालों से रह रहे निवासियों का दावा, सरकार 500 परिवार बता रही है जबकि आबादी एक लाख के करीब
*प्रशासनिक कार्रवाई के विरोध में सड़क पर उतरे लोग*
ऋषिकेश के बापू ग्राम में वन भूमि विवाद को लेकर हालात लगातार तनावपूर्ण होते जा रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद प्रशासन ने नए निर्माण पर रोक लगाने के साथ ही नए मकानों को बिजली और पानी के कनेक्शन देने बंद कर दिए हैं. इसके विरोध में स्थानीय लोग 'बापू ग्राम बचाओ संघर्ष समिति' के बैनर तले सड़कों पर उतर आए. रैली में बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है.
*लीज पर दी गई जमीन और बढ़ती आबादी का दावा*
स्थानीय निवासी राकेश चौरसिया पिछले 25 वर्षों से बापू ग्राम में रह रहे हैं, वह बताते हैं कि मीरा बेन ने यह जमीन सरकार को वापस दी थी. इसके बाद सरकार ने 51 परिवारों को 99 साल की लीज पर भूमि दी, जिनमें 50 अनुसूचित जाति और एक सामान्य वर्ग का परिवार शामिल था. उनका कहना है कि समय के साथ बापू ग्राम की आबादी बढ़कर लगभग एक लाख तक पहुंच गई है, लेकिन सरकार अब भी यहां केवल 500 परिवार होने का दावा कर रही है.
*जमीनी हकीकत और सरकारी आंकड़ों में फर्क*
1998 से बापू ग्राम में रह रहे ओम प्रकाश नौटियाल का कहना है कि जमीनी हकीकत सरकारी आंकड़ों से बिल्कुल अलग है और यहां करीब 30 हजार परिवार रहते हैं. लोगों का आरोप है कि वर्षों से बसे होने के बावजूद उन्हें अतिक्रमणकारी माना जा रहा है, अगर वह अवैध रूप से रह रहे हैं तो उन्हें सालों से बिजली, पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं दी ही क्यों गई थी. पच्चीस सालों से बापू ग्राम के निवासी वेल्डिंग का काम करने वाले योगेश बिष्ट ने बताया कि एक तरफ तो यहां सीवर लाइन का काम चल रहा है और दूसरी तरफ प्रशासन का यह रवैया है.
प्रशासन की कार्रवाई और अदालत में लंबित मामले के बीच बापू ग्राम के हजारों परिवार अपने भविष्य को लेकर असमंजस में हैं.
आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?
*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...
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