अरबपतियों का भारत और हाशिये की आवाजें
दून लाइब्रेरी में पी. साईनाथ का व्याख्यान
दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर में आयोजित तीसरे सुरजीत दास मेमोरियल लेक्चर में वरिष्ठ पत्रकार मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए। खचाखच भरे सभागार में छात्रों, पत्रकारों, शोधकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मौजूदगी के बीच साईनाथ ने भारत में असमानता, न्याय और पत्रकारिता के संकट पर व्यापक और विचारोत्तेजक व्याख्यान दिया।
वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि भारत अपने इतिहास के सबसे बड़े असमानता के दौर से गुजर रहा है, जो ब्रिटिश राज के समय से भी अधिक गंभीर है। उन्होंने चेताया कि असमानता अब देश की राजनीतिक अर्थव्यवस्था, न्याय प्रणाली और मीडिया संरचनाओं में गहराई से समा चुकी है।
दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर में तीसरे सुरजीत दास मेमोरियल लेक्चर को संबोधित करते हुए साईनाथ ने अपने वक्तव्य की शुरुआत इन शब्दों से की,
“Every Indian language is my language.”
उन्होंने कहा कि भारत को गांवों, मजदूरों, किसानों और हाशिये पर खड़े समुदायों की आवाजें सुने बिना नहीं समझा जा सकता, लेकिन मुख्यधारा का मीडिया लगातार इन आवाजों को मिटाता जा रहा है।
ब्रिटिश भारत से भी अधिक असमानता
कोविड के दौरान हुए रिवर्स माइग्रेशन और नीतिगत फैसलों का जिक्र करते हुए साईनाथ ने कहा कि भारत अत्यधिक धन संकेंद्रण के दौर में प्रवेश कर चुका है।
उन्होंने कहा कि कृषि संकट से दूरी ही यह बताती है कि किसान आंदोलन के दौरान दिल्ली की सीमाओं पर लगभग दो लाख किसानों के पहुंचने से शहरी भारत चौंक गया, जबकि यह उनके लिए कोई आश्चर्य नहीं था।
जहां किसान शादियां टाल रहे हैं, वहां करोड़ों की शादी
साईनाथ ने हाल में हुई एक अल्ट्रा लग्जरी कॉरपोरेट शादी का उल्लेख किया, जिस पर कथित तौर पर करोड़ों रुपये खर्च हुए। उन्होंने कहा कि मीडिया ने इस आयोजन का बिना किसी आलोचनात्मक दृष्टि के उत्सव मनाया, जबकि जिस महाराष्ट्र में यह शादी हुई, वही राज्य देश के सबसे गंभीर कृषि संकट से जूझ रहा है।
उन्होंने महाराष्ट्र सरकार के एक सर्वे का हवाला दिया, जिसमें विदर्भ के केवल छह जिलों में ही लाखों परिवारों ने कहा कि वे अपनी बेटियों की शादी का खर्च वहन नहीं कर सकते।
“आज ऐसे गांव हैं जहां तीस की उम्र पार कर चुके पुरुष अविवाहित हैं, क्योंकि कोई भी माता पिता अपनी बेटी किसी किसान को देने को तैयार नहीं,” साईनाथ ने कहा।
इस शादी को एक शानदार कारोबारी निवेश बताते हुए साईनाथ ने कहा कि ऐसे तमाशे सरकारों, नौकरशाहियों और सार्वजनिक संसाधनों पर प्रभाव जमाने में मदद करते हैं, जबकि अरबपतियों की कुल संपत्ति का यह बहुत छोटा हिस्सा होते हैं।
अरबपतियों की संपत्ति और सार्वजनिक संसाधन
साईनाथ ने कहा कि भारतीय अरबपतियों की संपत्ति का प्रमुख स्रोत किरायेदारी आय है, जो जंगलों, जमीन, खनिज, गैस, तेल और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं से आती है।
उन्होंने कहा कि यह संविधान के उस सिद्धांत का सीधा उल्लंघन है, जिसमें कहा गया है कि समुदाय के संसाधन कुछ हाथों में केंद्रित नहीं होने चाहिए।
उन्होंने बताया कि 1991 में भारत में एक भी डॉलर अरबपति नहीं था, जबकि आज उनकी संख्या दो सौ से अधिक है। अरबपतियों की संख्या के मामले में भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर है, जबकि मानव विकास सूचकांक में देश अब भी निचले पायदान पर है।
जीडीपी घटी, अरबपतियों की संपत्ति दोगुनी हुई
साईनाथ ने कहा कि कोविड के पहले वर्ष में भारत की जीडीपी 7.7 प्रतिशत घट गई, लेकिन इसी दौरान अरबपतियों की संख्या और उनकी कुल संपत्ति दोगुनी हो गई।
उन्होंने मनरेगा को ग्रामीण भारत के लिए, खासतौर पर महिलाओं के लिए, जीवनरेखा बताया और कहा कि कृषि श्रम का 65 प्रतिशत काम महिलाएं करती हैं।
साईनाथ ने बोला कि अगर मेहनत से लोग अमीर बनते, तो भारत की हर ग्रामीण महिला अरबपति होती
मजदूरी की गणना के आधार पर साईनाथ ने कहा कि मनरेगा का एक मजदूर भारत के सबसे अमीर उद्योगपति के बराबर संपत्ति जुटाने में दस लाख साल लेगा।
न्याय व्यवस्था और असमान शक्ति
न्याय प्रणाली पर बोलते हुए साईनाथ ने कहा कि असमानता का सबसे क्रूर रूप पुलिस व्यवस्था और अदालतों में दिखाई देता है।
उन्होंने कहा कि जमानत की व्यवस्था वर्ग और शक्ति के अनुसार अलग अलग तरीके से काम करती है, जहां अमीर और प्रभावशाली आरोपी आसानी से बाहर आ जाते हैं, जबकि गरीब और असहमति जताने वाले लोग वर्षों तक जेल में बंद रहते हैं।
किसान आंदोलन और कॉरपोरेट ताकत
साईनाथ ने किसान आंदोलन को पिछले तीस वर्षों में दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक, संवैधानिक और शांतिपूर्ण न्याय संघर्ष बताया।
उन्होंने कहा कि यह ईस्ट इंडिया कंपनी के बाद पहली बार था जब भारतीय किसानों ने सीधे तौर पर कॉरपोरेट शक्ति का सामना किया, लेकिन मीडिया ने बड़े पैमाने पर किसानों के नारों और मांगों को नजरअंदाज किया।
मीडिया और पत्रकारिता एक नहीं
साईनाथ ने मीडिया कॉरपोरेशनों और पत्रकारिता के बीच स्पष्ट अंतर रेखांकित किया।
उन्होंने कहा कि मीडिया का अस्तित्व शेयरधारकों के लिए मुनाफा अधिकतम करने के लिए है, जबकि पत्रकारिता जनता के लिए होती है।
लॉकडाउन के दौरान आवश्यक सेवा घोषित होने के बावजूद, उन्होंने कहा कि कोविड काल में भारतीय मीडिया संस्थानों ने 3,500 से अधिक पत्रकारों और 15,000 अन्य मीडिया कर्मियों को नौकरी से निकाल दिया, जिसे उन्होंने अवैध बताया।
कम से कम 750 पत्रकारों की कोविड से मृत्यु हुई, जिनमें से कई को न तो संस्थानों ने स्वीकार किया और न ही कोई मुआवजा दिया।
पत्रकारिता का अर्थ न्याय
साईनाथ ने कहा कि कोई भी समाज इतनी चरम असमानता के साथ जीवित नहीं रह सकता। या तो हम असमानता को खत्म करेंगे या असमानता हमें खत्म कर देगी।
संवैधानिक नवीकरण की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि काम का अधिकार और भोजन का अधिकार निर्देशक सिद्धांतों तक सीमित नहीं रहने चाहिए, बल्कि उन्हें मौलिक अधिकार बनाया जाना चाहिए।
अपने व्याख्यान के समापन पर साईनाथ ने कहा, If journalism is to have any meaning, the J in journalism must stand for justice. Without justice it is not worth doing.
उन्होंने लेखकों, फिल्मकारों और नागरिकों से अपील की कि वे स्वतंत्र मीडिया का समर्थन करें, लुप्तप्राय भाषाओं का दस्तावेजीकरण करें और गलत सूचना के इस दौर में बौद्धिक आत्मरक्षा का अभ्यास करें।
हिमांशु जोशी
@himanshu28may
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