Sunday, May 29, 2022

हिंदी पत्रकारिता दिवस : पत्रकारिता के छात्रों के लिए एक सन्देश.

पण्डित युगुल किशोर शुक्ल ने 30 मई 1826 में प्रथम हिन्दी समाचार पत्र उदन्त मार्तण्ड का प्रकाशन आरम्भ किया था. यह अखबार एक साल से ज्यादा नही चला पर हिंदी पत्रकारिता के ऐसे बीज बो गया कि हिंदी पत्रकारिता समय के साथ और भी मजबूत होती चली गई.

आज से दो साल पहले मई माह में ही मैंने कोरोना काल के दौरान स्वतंत्र पत्रकारिता शुरू की. नैनीताल समाचार के सम्पादक राजीव लोचन साह के मार्गदर्शन में मैं सामाजिक विषयों पर लिखने लगा. एक स्वतंत्र पत्रकार यह चाहता है कि उसका लिखा ज्यादा लोगों तक पहुंचे इसलिए मैं भी कई जगह लिखा भेजने लगा, बहुत से अनुभवी पत्रकारों से सम्पर्क बने और उनसे बहुत कुछ सीखने के लिए मिला.

पत्रकारिता के संस्थानों में शायद कोई छात्र वह सब न सीख सके जो जमीन पर कार्य कर चुके इन अनुभवी पत्रकारों ने अपनी कुछ पंक्तियों से ही मुझे सिखा दिया. इन अनुभवी और महत्वपूर्ण पत्रकारिता संस्थानों में काम कर चुके या कर रहे पत्रकारों के साथ मेरे संवाद हिंदी पत्रकारिता में शामिल होने जा रहे पत्रकारिता के छात्रों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं.

बीबीसी में वर्षों काम कर चुके और अब मीडिया स्वराज नामक पोर्टल चला रहे रामदत्त त्रिपाठी का सन्देश सबसे महत्वपूर्ण है.

 वह लिखते हैं समाचार संकलन/ विश्लेषण एवं लेखन के  मार्गदर्शक सिद्धांत /  नियम.

आप अपने आसपास की सामाजिक , राजनीतिक, आर्थिक , आध्यात्मिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक , खेल कूद  की संक्षिप्त रपट  भेज सकते हैं.

इस बात का ध्यान अवश्य रखें कि विषय सम-सामयिक और तात्कालिक महत्व का हो. निबंध में लम्बी भूमिका के बाद सबसे महत्वपूर्ण बात उपसंहार में लिखते हैं.
समाचार पोर्टल में उसका उल्टा है, सबसे पहले हेडलाइन लिखते हैं. फिर नई और महत्वपूर्ण बात सबसे पहले लिखी जाती है और फिर उसी क्रम में, ताकि कोई अगर केवल दो चार  पैरा पढ़ना चाहता है तो उसे मुख्य बात पता चल जाए, महत्वपूर्ण बात से वह वंचित न हो.

न्यूज रिपोर्ट तीन चार 400  से छह 600 सौ शब्दों के बीच और फीचर/ लेख अधिकतम 1000 हजार शब्दों तक होना चाहिए. विषय के साथ न्याय के लिए ज्यादा बड़ा लिखना आवश्यक है तो पहले सम्पादक से परामर्श कर लें.
रामदत्त त्रिपाठी Focus Key Phrase की महत्वता समझाते हुए लिखते हैं.
कृपया लेखन प्रारम्भ करने के पहले अधिकतम चार शब्दों का की फ्रेज / थीम चुनें , जिसके आधार पर सर्च इंजिन पहचाने.
फिर इसी की फ्रेज को केंद्र में रखकर हेडलाइन लिखें जो आकर्षक हो.
पहले पैरा में की फ्रेज जरूर शामिल करें और लेख के बीच में भी कई बार इसका प्रयोग करें.

न्यूज रिपोर्ट अनिवार्य रूप से तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए और जिसने तथ्य बताए हैं उसको उद्धृत करें.
किसी कारण से कोई नाम न देना चाहे तो भी उसकी पहचान बताए बिना पाठक को संकेत मिलना चाहिए ताकि वह तथ्यों की प्रामणिकता के बारे में आश्वस्त हो. खबरों में निजी राय न लिखें, जानकार, टीकाकार या विशेषज्ञ का उल्लेख करें.

कृपया वही विषय चुनें जिसके आप विशेषज्ञ हैं अथवा  कार्य अनुभव है.

कृपया इस बात का विशेष ध्यान लगभग पंचानबे  फीसदी  लोग स्मार्टफोन पर ही देखते , सुनते और पढ़ते हैं. इनमे बड़ी संख्या युवा लोगों की है इसलिए सामग्री उसके अनुकूल होनी चाहिए.

भाषा एवं लेखन शैली 

भाषा ऐसी हो कि नई पीढ़ी के लोग समझ सकें यानि आसान बोलचाल की हो. संस्कृत, हिंदी, अंग्रेज़ी, फारसी और उर्दू के कठिन शब्द न हों. मजबूरी में उद्धरण देना पड़े तो कृपया सरल अनुवाद कर दें.
भाषा संतुलित , विधि सम्मत एवं मर्यादित हो, न भड़काने वाली हो न अपमानजनक.

वेबसाइट दुनिया भर में कहीं भी पढ़ी जा सकती है , इसलिए ऐसे लोकल शब्द या मुहावरे इस्तेमाल बिल्कुल न करें  जो दूसरी जगह के लोग न समझें या अर्थ का अनर्थ हो जाए.
हर नया आइडिया नया पैरा में लिखे, दो लाइनों के बीच डबल स्पेस रखें.
आजकल स्मार्ट फोन पर हिंदी लिखना  बहुत आसान है. लैपटोप या डेस्क्टाप पर GoogleIndic के जरिए रोमन में लिखकर हिंदी परिवर्तित कर सकते हैं, बोलकर भी लिख सकते हैं।

जन्म तिथि, पुण्य तिथि अथवा पर्व के कारण निश्चित दिन तारीख वाले लेख कृपया एक सप्ताह पहले भेजें.

यदि कोई लेख कई जगह भेज रहें हैं तो तीन दिन का एम्बार्गो लगा दें, एक जगह छप जाने के बाद दूसरी जगह प्रकाशन में हिचक होती है.

स्वयं संपादन

बेहतर होगा कि हड़बड़ी में न भेजें , लेख / फीचर लिखने के बाद एक दो दिन के लिए भूल जायें और फिर उसे इस तरह संपादित  करें जैसे किसी और ने लिखा है. प्रूफ रीडिंग ठीक से करें, बोलकर पढ़ेंगे तो त्रुटि आसानी से पकड़ में आ जाएगी.
सबसे पहले एक आकर्षक शीर्षक सोचें और फिर पहला पैरा. शीर्षक और पहला पैर देखकर हाई पाठक आगे बढ़ता है.

अमर उजाला के सारंग उपाध्याय एक आलेख भेजने पर बेहद ही महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए लिखते हैं कि विकीपीडिया सोर्स नहीं हो सकता. आधिकारिक साइट का हवाला देते तो और अच्छा होता. इसके अतिरिक्त एक लेख की पृष्ठभूमि बेहद अलग होती है, विचार और कही जाने वाली बात का मूल्य होता है.
किसी दृष्टिकोण को सापेक्ष रखते तो और बेहतर होता.

हिंदी क्विंट के संतोष कुमार तत्कालिक महत्व के विषय पर ही लिखने पर जोर देते हैं.

इन सब सीखों से सबसे पहला काम जो मैंने किया वो ये कि अब मैं पहले की तरह दस जगह लिखा नही भेजता, दस जगह भेजने से सबसे पहली समस्या यह है कि उससे समाचार पोर्टल की गरिमा को नुकसान पहुंचता है कि वह कहीं और का छपा हुआ छापते हैं फिर दूसरी समस्या यह कि उस समाचार का लिंक गूगल में भी कॉपी माना जाएगा और गूगल रिजल्ट्स में पीछे के पन्नों में चला जाएगा.
जनता के मुद्दे उठाने वाले लोकप्रिय समाचार वेब पोर्टल 'जनज्वार' के सम्पादक अजय प्रकाश भी मुझे लिखने के लिए प्रोत्साहित करते गूगल में सर्च रिजल्ट वाली बात याद रखने के लिए कहते हैं.

 अब मैं सम्पादकों के सम्पर्क में रहते आलेख पूरे करता हूं. एक स्वतंत्र पत्रकार को इतनी स्वतंत्रता तो होती ही है कि वह अपने मन मुताबिक विषयों पर लिख सकता है.
लेकिन एक जगह ही आलेख भेजने में एक समस्या यह है कि कई बार मेहनत करके लिखा हुआ छपेगा या नही इस पर सम्पादक की तरफ से कोई उत्तर नही मिलता, फिर इंतजार में वह लिखा बासी हो जाता है.

इन सीखों का क्या लाभ

वरिष्ठ पत्रकारों से मिली सीखों का पालन करते मुझे अपने लिखे पर अपने-अपने क्षेत्रों में पहुंचे हुए लोगों की टिप्पणी मिली. बॉलीवुड के जाने माने अभिनेता मनोज बाजपेयी ने उनकी जीवनी पर मेरी समीक्षा के ट्वीट को रीट्वीट किया. निर्देशक शैफाली भूषण ने अपनी वेब सीरीज 'गिल्टी माइंड्स' पर मेरी लिखी समीक्षा तो
 लेखक विनोद कापड़ी और अशोक कुमार पाण्डे ने उनकी किताबों पर मेरी लिखी समीक्षाओं को अपने फेसबुक पोस्ट में जगह दी.
उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश के चुनावों पर लिखी एक रिपोर्ट पर पत्रकार साक्षी जोशी ने भी फेसबुक के 'जन विचार संवाद पेज' पर सकारात्मक टिप्पणी दी.
यहां पर मैं पत्रकारों के लिए सम्पर्क बनाने की आवश्यकता पर भी जोर देना चाहूंगा. सोशल मीडिया के विभिन्न मंच से किसी पत्रकार को उसके जैसे विचार रखने वाले लोगों को समझने का मौका मिलता है.

स्वतंत्र पत्रकारों का पारिश्रमिक

स्वतंत्र पत्रकारों के पारिश्रमिक पर भी इन दिनों खूब चर्चा है. मैं स्वतंत्र पत्रकारिता को पारिश्रमिक पाने का जरिया नही समझता, यदि आपके अंदर समाज बदलने का कीड़ा है तो उसके लिए पैसे की इच्छा रखना गलत है. अगर आप लिखे का पैसा लेने लगे तो आपको संस्था के अनुसार लिखना होगा. याद रखें महात्मा गांधी, भगत सिंह भी विभिन्न अखबारों के लिए लिखते थे और उनके लिखने की वज़ह पैसा नही बल्कि समाजसुधार था.

यदि आप स्वतंत्र रूप से काम करते पैसा ही कमाना चाहते हैं तो अपने विचारों का विस्तार करते जाइए, व्यक्तित्व विकास करिए. एक साल पहले मैं इंटरनेट रेडियो प्लेटफॉर्म 'रेडियो प्लेबैक इंडिया (आरपीआई)' के साथ फिल्म समीक्षक के तौर पर जुड़ा और बोलने में की गई गलतियों से सीखते आज मैं आरपीआई का महत्वपूर्ण सदस्य हूं. इससे मेहनताने मिलने के द्वार भी खुलने लगे हैं.
एक फिल्म समीक्षक के तौर पर मैं पहली बार किसी वीडियो में भी दिखा. 'कस्तूरी' ग्रुप के फेसबुक पेज में मुझे प्रो चन्द्रकला त्रिपाठी के साथ मंच साझा करने का मौका मिला.

वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा स्वतंत्र पत्रकारिता पर अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखते हैं.

स्वतंत्रता एक कठोर विनिमय है , यहां करेंसी नोट स्वीकार नहीं किये जाते 
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कल मेरी एक पोस्ट पर बहुत वाजिब सवाल उठाया गया कि स्वतंत्र रह कर एक पत्रकार  बेदाग , बे बाक और बेलौस अवश्य रह सकता है , पर जीविकोपार्जन कैसे हो ? बहुत जेनुइन प्रश्न है.
और इसका जेनुइन उत्तर भी यही है कि पत्रकारिता को मिशन बनाओ , और किसी अन्य कारोबार को प्रोफेशन.

अपनी हैसियत और परिस्थिति के अनुरूप रोजी रोटी के लिए ढाबा खोलो , फैक्ट्री चलाओ , ट्रांसपोर्ट का धंधा करो , जूते गांठो , घरों में झाड़ू पोछा करो , खेती करो अथवा ज़मीनों की दलाली करो.
कबीर ने कविता को धंधा नहीं बनाया । रोटी के लिए वह लोई - कम्बल बुनते थे , बकरी पालते थे. 
गांधी भी सूत कात कर और बकरी पाल कर अपनी रसोई चलाते थे, भाषण देने के पैसे नहीं लेते थे.

तुलसी दास अपने जीवन काल मे ही मोरारी बापू की टक्कर के पॉपुलर कथा वाचक हो गए थे , पर राम कथा बाँचने की कभी किसी से फीस न ली.
तुम भी ऐसा ही करो,  कुछ नहीं बन पड़ता तो भोजन गुरुद्वारे में करो.
 लेकिन रहो स्वतंत्र.

हिमांशु जोशी
@himanshu28may

Thursday, May 26, 2022

पंचायत 2 : कहानी के दम पर अपना परचम फहराती ये पंचायत।

पंचायत वेब सीरीज की कहानी एक ऐसे युवा की है जो शहर में आधुनिक जीवन जीने के सपने देखता है पर उसे मजबूरी वश एक गांव आना पड़ता है और उसे यह पता नही चलता कि वो कब गांव का हो गया। पंचायत की कहानी यह साबित करती है कि अब सुपरस्टारों का जमाना नही रहा, अब दर्शक की नजरों में कहानी ही असली सुपरस्टार है।

पंचायत टीवीएफ द्वारा बनाई गई है, टीवीएफ का पूरा नाम 'द वायरल फीवर' है।
इसकी खासियत यह है कि टीवीएफ के ज्यादातर सदस्य गांव से जुड़े हैं। 
गांव से जुड़े होने के साथ ही टीवीएफ कि टीम आईआईटी के पूर्व छात्रों से भरी पड़ी है। गांव की मिट्टी से निकले तकनीक और रचनात्मकता के इस घोल ने शहरों में रह रहे गांव से जुड़े लोगों को गांव की कहानी दिखा कर, उन्हें अपने गांव की याद दिलाते हुए बहुत जल्दी ही लोकप्रियता पा ली है।


वेब सीरिज के मुख्य पात्र जितेन्द्र कुमार अभिनय की नई परिभाषा गढ़ रहे हैं, उनका आम भारतीयों वाला चेहरा अब किसी भी बड़े सुपरस्टार को टक्कर दे सकता है। चंदन रॉय का अभिनय बिल्कुल नैसर्गिक है, नीना गुप्ता और रघुवीर यादव तो युवाओं को अभिनय का पाठ पढ़ाते महसूस होते हैं।
फैसल मलिक बिना किसी शोर के साथ अपने अभिनय की छाप छोड़ते हैं , सान्विका को आप फिर से स्क्रीन पर देखना चाहेंगे।

इस वेब सीरीज में पात्रों को बेहतरीन तरीके से बुना गया है। कई सारे पात्रों की कैमेस्ट्री कमाल की है, जैसे चंदन रॉय-फैसल मलिक, नीना गुप्ता-रघुवीर यादव, रघुवीर यादव-जितेन्द्र कुमार।
दर्शक वेब सीरीज के पात्रों से खुद को जुड़ा महसूस करते हैं, जैसे जितेन्द्र कुमार को गाली पड़ने पर दर्शकों को भी दुख होता है।

निर्देशक ने वेब सीरीज के हर एपिसोड की शुरुआत में उसके इंट्रोडक्शन का बड़ा ख्याल रखा है और यह गांव की सच्चाई बयान करता है। इसमें दिखता है कि आज के गांव में ट्रैक्टर है तो वहां बैलों से भी हल जोते जाते हैं। इंट्रोडक्शन में यह भी दिखता है कि आज के गांवों में कुछ महिलाएं पशुपालन के लिए घास ढो रही हैं तो कुछ महिलाएं सिलाई-कड़ाई करके भी अपना घर चलाने लगी हैं।
हर एपिसोड के इंट्रोडक्शन से पहले उसका थोड़ा सा परिचय देना अब हर वेब सीरीज में ट्रेंड बन गया है और यह एपिसोड की कहानी के प्रति दर्शकों की रोचकता भी बढ़ा देता है।

निर्देशक ने वेब सीरीज में गांव के जीवन को हूबहू दिखाने की कोशिश की है, इसमें वहां का राजनीतिक और सामाजिक जीवन शामिल किया है।
निर्देशक ने अभिनेता जितेन्द्र कुमार के सहारे नौकरी करने वाले अकेले युवाओं की समस्याओं को भी दिखाया है। 
गांव में सीसीटीवी कैमरा आने पर जैसा कौतूहल मचता है ,उससे निर्देशक यह दिखाने में कामयाब हुए हैं कि गांव के लोग आधुनिकता से कैसे सामंजस्य स्थापित कर रहे हैं।

वेब सीरीज का सम्पादन कमाल का है, इसके एक दृश्य में बड़े होटल के अंदर पनीर के ऊंचे दाम पर बात चल रही थी तो अगले ही दृश्य में ऑफिस में पेट्रोमैक्स पर रखा कूकर सीटी बजाता है।

वेब सीरीज का संगीत इसकी सबसे अहम कड़ी है। यह दिल को छू जाता है। जितेन्द्र और सान्विका के रिश्तों की गर्माहट दिखाने में इसके संगीत का सबसे अहम योगदान है, वहीं कहानी में माहौल तनाव भरा होने पर बैकग्राउंड स्कोर दर्शकों को और भी मजा देता है।

पंचायत 2 का छायांकन पहली सीरीज की तरह ही गांव के रहन-सहन और खूबसूरती को करीब से दिखाने में सफल रहा है। खासतौर पर पूरे गांव को एक ही फ्रेम में दिखाने वाला दृश्य गांव की पूरी कहानी सी कह देता है।

वेब सीरीज के संवाद बड़े सुंदर रचे गए हैं।
'हर कोई कहीं न कहीं नाच ही रहा है सचिव जी' संवाद हर इंसान के जीवन की कहानी हमारे सामने ले आता है।
 'फौज में सिपाही रैंक में ज्यादातर लड़के तो यहीं गांव देहात के रहते होंगे' गांव के युवाओं की स्थिति वर्णित कर देता है, इस संवाद से हमें पता चलता है कि गांव के लड़के आज भी रोजगार के लिए भारतीय फौज पर निर्भर हैं।
'दुनिया में दो तरह का आदमी शराबी बनता है, पहला वो जो काम से ज्यादा कमाता है और दूसरा वो जो काम से कम कमाता है' संवाद शराबियों की मनोस्थिति बताता है।

वेब सीरीज की पटकथा को बड़े ही ध्यान से लिखा गया है। एक जगह जितेन्द्र की बाइक में हेलमेट सर पर न होकर बाइक के पीछे बंधा होता है, गांव और शहरों की यही सच्चाई है, हेलमेट का आज भी प्रयोग नही किया जाता। गांव में मच्छरदानी का प्रयोग और साथ ही मच्छर मारने वाला 'रैकेट' इलेक्ट्रिक स्विच बोर्ड में टँगा दिखा कर, गांव के घरों का वास्तविक दृश्य तैयार कर दिया गया है।

सान्विका और जितेन्द्र जब एक दूसरे का नम्बर सेव करते हैं, वह दृश्य दर्शकों के दिल के तार बजा जाता है। एक शराबी को देख उसे ही अपना भविष्य सोच जितेन्द्र द्वारा सिगरेट की कश लेने वाला दृश्य अद्भुत बन पड़ा है।

चंदन रॉय और सान्विका के कपड़ों के रंग वेब सीरीज में दर्शकों का विशेष रूप से ध्यान खींचते हैं।
पंचायत 2 देखने के बाद आपको इसके पात्रों से प्यार हो जाएगा और गांव की इस कहानी से आप हमेशा जुड़े रहना चाहेंगे।
 वेब सीरीज का अंत कुछ इस तरह से किया गया है कि दर्शक यह उम्मीद तो कर ही सकते हैं कि उन्हें जल्द पंचायत 3 देखने का मौका भी मिलेगा और वह अपने सचिव जी और उनके साथियों को फिर नई चुनौती से जीतते हुए देखेंगे।

कलाकार- जितेन्द्र कुमार, चंदन रॉय
निर्देशक- दीपक कुमार मिश्रा
ओटीटी- अमेजन प्राइम वीडियो
समीक्षक- @himanshu28may
हिमांशु जोशी

Tuesday, May 24, 2022

विश्व पर्यावरण दिवस : विनाश की कीमत पर विकास से क्या लाभ!

इन दिनों उत्तराखंड का जोशीमठ क्षेत्र भूस्खलन व घर में पड़ रही दरारों को लेकर चर्चा में है.
जोशीमठ के बारे में 1976 की मिश्रा कमेटी की रिपोर्ट ने इस क्षेत्र को आपदा की दृष्टि से बेहद संवेदनशील बताया था. रिपोर्ट के अनुसार जोशीमठ क्षेत्र ग्लेशियर के मलबे पर बसा है. 



विकास के नाम पर उत्तराखंड के पहाड़ों को जिस तरह फाड़ा जा रहा है, उससे उत्तराखंड में आने वाली आपदाओं का ग्राफ पिछले कुछ सालों से बढ़ गया है.
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड में साल 2021 के दौरान भूस्खलन व अन्य प्राकृतिक आपदाओं में जान गंवाने वालों की संख्या 298 थी.


उत्तराखंड के नक्शे में ये लाल हिस्से खतरनाक भूस्खलन के लिए जाने जाते हैं, स्रोत- https://dmmc.uk.gov.in

न्यू इंडियन एक्सप्रेस की अगस्त 2021 में आई एक रिपोर्ट दर्शाती है कि उत्तराखंड में साल 2015, 2016 और 2017 में भूस्खलनों की संख्या क्रमशः 33, 18 और 19 थी. वहीं साल 2018, 2019, 2020 और 2021 में भूस्खलन की यह घटनाएं बढ़कर क्रमशः 496, 291, 972 और 132 हो गई.
बरसात के दौरान प्रदेश में भूस्खलन की यह स्थिति बेहद ही खतरनाक हो जाती है. साल 2021 में प्रदेश भर में भूस्खलन के 84 डेंजर जोन सक्रिय थे.


बीमारी पुरानी पर इलाज नही ढूंढा गया

1 फरवरी 1978 को उत्तराखंड के प्रमुख समाचार पत्र नैनीताल समाचार में पर्यावरणविद और वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा ने भूस्खलन पर 'जमाना पूछेगा पहाड़ को किसने खाया' शीर्षक से एक रिपोर्ट लिखी थी. 
इस रिपोर्ट में उन्होंने उत्तराखंड की सड़कों पर कुछ इस तरह लिखा था 'इस प्रकार की बीमारी वाली सड़कों की मलबा सफाई करना उसी प्रकार है जैसे किसी पेड़ के शीर्ष पर कोई आदमी बैठा हो, पेड़ पर नीचे से ही आग की लपटें उठ रही और वह नासमझ बार-बार वहां पर आग बुझाता रहे.' उत्तराखंड को सड़कों पर यह बात आज भी सच बैठती है.


        ऑल वेदर रोड- (टनकपुर-पिथौरागढ़)

विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड में भूस्खलन ऑल वेदर रोड निर्माण के साथ बढ़ने लगे.
ऑल वेदर रोड यानी हर मौसम में खुली रहने वाले सड़कों के लिए बनाई गई चारधाम राजमार्ग विकास परियोजना है. इसका शुभारंभ दिसम्बर 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था.

जियोलॉजिस्ट डॉ नवीन जुयाल चारधाम परियोजना से जुड़ी सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित उच्चाधिकार समिति के सदस्य थे. वह कहते हैं 'निश्चित तौर पर केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजना ऑल वेदर रोड की वजह से भूस्खलन बढ़े हैं'. पहाड़ों की भूगर्भीय संरचना को नजरंदाज कर इन सड़कों का निर्माण किया जा रहा है. तेजी से सड़क बनाने के चक्कर में पहाड़ में सड़क बनाने वाली तकनीक का सही इस्तेमाल नही किया गया है. सड़क निर्माण में जल निकासी आवश्यक होती है पर उसे नजरंदाज किया गया.

नवीन जुयाल ने अपनी बात को आगे बढ़ाते कहा कि हिमालय में जगह-जगह अलग-अलग प्रकार की चट्टानें होती हैं, उन पर अध्ययन किए बिना सब जगह सड़क बनाने के लिए एक ही तरीका इस्तेमाल किया जाता है.
 टनकपुर-सुखीढांग इलाके में जमीन के नीचे होने वाली किसी भी हलचल का सबसे ज्यादा असर पड़ता है पर इसे भी खोद दिया गया है, वहां पर भारी भूस्खलन के रूप में इसका परिणाम हमारे सामने है.

 उन्होंने यह भी कहा कि उच्चाधिकार समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि चारधाम परियोजना के अवैज्ञानिक व अनियोजित क्रियान्वयन से हिमालय के इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचा है और भूस्खलन जैसी आपदाओं को बुलावा दिया जा रहा है.

पेड़ नही तो जमीन तो खिसकेगी ही

भूस्खलन का सबसे बड़ा कारण पेड़ों का अंधाधुंध कटान होना भी है, पिछले बीस सालों में उत्तराखंड के लगभग पचास हजार हेक्टेयर पेड़ काट दिए गए. इसमें से अधिकतर पेड़ खनन और सड़क के लिए काटे गए.

पर्यावरणविद सुरेश भाई के अनुसार गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर 15 किलोमीटर कार्य अभी शेष है. यहां पर देवदार व सिल्वर ओक जैसे दुर्लभ प्रजाति के पेड़ हैं जिनको काटा जाना है. सबसे अधिक पेड़ सुक्खी बैंड से और झाला नामक स्थान तक हैं. इस सड़क का मार्ग यदि रेखांकन के समय थोड़ा बदला जाता तो इन पेड़ों को बचाया जा सकता था.

वह कहते हैं कि गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग चौड़ीकरण (ऑलवेदर रोड़) के अन्तर्गत दुर्लभ वन प्रजाति देवदार के लाखों छोटे-बड़े पेड़ों को काटा जाना है. इसमें से छोटे-छोटे पौधे जो अधिकतम 30 फीट तक ऊंचे हैं, उन्हें दूसरी जगह रोपा जा सकता है. यह अनुभव हमें दिल्ली में निर्माणाधीन सेन्ट्रल विस्टा परियोजना से मिला है.

कारण यह भी है.

साल 1998 में भूस्खलन पर वाडिया इंस्टिट्यूट ऑफ हिमालयन जिओलॉजी देहरादून के पीयूष रौतेला ने एक शोधपत्र लिखा था, जिसके अनुसार पहाड़ी क्षेत्रों में आजकल सीढ़ीनुमा खेती की पद्धति में कमी आई. इस तरह की खेती से मिट्‍टी का जमाव बना रहता है, जो कि लैंडस्लाइड जैसी घटनाओं को रोकती है.

नैनीताल में अंग्रेजी दौर के दौरान 1867, 1880,1898 व 1924 में भयंकर भूस्खलन हुआ था. साल 1880 में आए भूस्खलन से 151 लोगों जिंदा दफन हो गए थे और साथ ही नगर का नक्शा भी बदल गया था. साल 1867 और 1873 में अंग्रेजी शासकों ने नगर की सुरक्षा के लिए हिल साइड सेफ्टी कमेटी का गठन किया था. इस समिति की रिपोर्ट के आधार पर नगर में बेहद मजबूत नाला तंत्र विकसित किया गया, जिसे नगर की सुरक्षा का मजबूत आधार बताया गया. पिछले साल आई रिकॉर्डतोड़ बारिश के बाद भी नैनीताल में भूस्खलन न के बराबर हुआ. प्रदेश के अन्य पहाड़ी स्थानों को भी इस तरह के नालों की आवश्यकता है जो अंग्रेजों के जाने के बाद कभी बनाए ही नही गए. कंस्ट्रक्शन को हमेशा पहाड़ों का दुश्मन बताया जाता रहा है पर सही तरीके से हुए कंस्ट्रक्शन से नैनीताल आज भी जिंदा है.

हिमांशु जोशी
@Himanshu28may

Monday, May 23, 2022

सालों बाद मासूम : एक फिल्म के जरिए जानें महिलाओं का तब और अब..

महिलाओं को शुरू से ही पुरुषों के मुकाबले कमजोर माना जाता है, यह अवधारणा बना ली जाती है कि उनका जन्म ही पुरुषों की सेवा के लिए हुआ है. बाद में इसी अवधारणा के शिकार कई पुरुष महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों में शामिल रहते हैं या महिलाओं की तरक्की पर उन पर तंज कसते हैं.

निर्देशक शेखर कपूर साल 1983 में उस समय के नए चेहरे नसरुद्दीन शाह और सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त शबाना आजमी के साथ फिल्म मासूम लेकर आए. 
शेखर कपूर तब खुद इतना बड़ा नाम नही थे पर बाद में उन्हें इस फिल्म से जो विश्वास मिला, उसकी वजह से वह बैंडिट क्वीन, मिस्टर इंडिया और एलिजाबेथ जैसी फिल्में हमारे सामने लेकर आए.

गुलजार ने फिल्म मासूम की कहानी लिखी थी, इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा जगत में कुछ इस तरह का तहलका मचाया कि ये फिल्म साल 1984 के फिल्मफेयर पुरस्कारों में छा गई थी. मासूम ने फिल्मफेयर पुरस्कारों की चार श्रेणियों में अपना कब्जा जमाया, ये श्रेणियां थी- सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक, सर्वश्रेष्ठ गीतकार और सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका.

मासूम की कहानी यह सन्देश देती थी कि हर औरत के अंदर एक मां की ममता जन्म ले ही लेती है.
फिल्म में नसरुद्दीन शाह और शबाना आजमी का एक हंसता-खेलता परिवार होता है पर उस परिवार में तब दरार पड़ जाती है, जब इन दोनों को ये पता चलता है कि नैनीताल में नसरुद्दीन का दूसरी महिला से जन्मा एक और बच्चा है. शबाना और नसरुद्दीन के बीच की बढ़ती हुई दूरी को फिल्म में शानदार तरीके से फिल्माया गया है और इसके साथ ही दूसरी औरत के बच्चे की समझदारी भरी हरकतों से उसके प्रति ममता उड़ेलती शबाना ने दर्शकों का दिल जीता है.
निर्देशक ने छोटी-छोटी घटनाओं से ही पति-पत्नी और मां-बच्चों के बीच के रिश्तों को जिस तरह बुना है, वह हमेशा के लिए याद रखने वाला है.

शबाना आजमी एक गृहिणी के किरदार में पूरी तरह से डूबी हैं, फिल्म में बेहद ही खूबसूरत दिखी शबाना अपने अभिनय के जरिए इस फिल्म की जान कही जा सकती हैं. नसरुद्दीन शाह का साधारण दिखता चेहरा फिल्म में उनके द्वारा निभाए किरदार पर बिल्कुल सटीक बैठता है, एक अच्छे पिता और पति की भूमिका में नसरुद्दीन ने जिस तरह से रिश्तों की उलझनों को सुलझाया है वह हमेशा के लिए याद रखने लायक है.
सईद जाफरी भी फिल्म में अपने छोटे से किरदार के जरिए छाप छोड़ जाते हैं. उर्मिला मातोंडकर और आराधना श्रीवास्तव भी छोटी बच्चियों के रूप में प्रभावित करती हैं, उर्मिला ने 'पूत के पांव पालने में ही दिखने लगते हैं' कहावत को सही साबित किया है.

बाल जुगल हंसराज की मासूम आंखे ही शायद फ़िल्म का नाम 'मासूम' रखवा गई होंगी. इतनी मासूम आंखों वाले जुगल को हम साल 1995 में उनकी युवावस्था के दौरान आई फिल्म 'पापा कहते हैं' के लिए भी याद रखते हैं.  जुगल हंसराज ने फिल्म 'मोहब्बतें', 'कभी खुशी कभी गम', 'सलाम नमस्ते', 'आ जा नचले', 'प्यार इम्पॉसिबल' और 'कहानी 2' में भी काम किया पर चेहरे और अभिनय का मेल न होने के कारण फिल्म मासूम में खिला यह फूल बॉलीवुड की गलियों में कभी इतनी महक नही छोड़ पाया.

मासूम का छायांकन बड़ा ही बेहतरीन था, फिल्म में नैनीताल की खूबसूरती को बड़े ही शानदार तरीके से कैद कर लिया गया था. नैनीताल की झील, पहाड़, इमारतें सब कुछ इस तरह से दिखाए गए कि आज भी लोग नैनीताल में फिल्माई गई सबसे बेहतरीन फिल्मों में 'मासूम' को पहले नम्बर पर रखते हैं.

फिल्म के संवाद बड़े ही प्रभावी थे, 'टूटा हुआ तारा देख लो तो जो भी मांगो मिला जाता है' संवाद आज भी वास्तविक माना जाता है.
'अगर मैं सिर्फ औरत होती तो ठीक था लेकिन मां भी तो हूं' संवाद, किसी महिला की एक मां होने की जिम्मेदारी को दिखाता है.

मासूम का संगीत आरडी बर्मन द्वारा तैयार किया गया था. फिल्म का संगीत इसकी कहानी को और भी अधिक खिंचाव भरा बनाने में कामयाब रहा था. इससे कहानी के दौरान ममता भरा माहौल पैदा होता था और फिल्म के गाने भी कुछ इसी तरह का काम कर गए.
इसका गाना 'दो नैना एक कहानी' एक मां के लिए उसके बच्चों को सुलाने का जरिया बन गया, 'लकड़ी की काठी' गाना सुनकर देश के बहुत से बच्चे बड़े हुए.
फिल्म का सबसे ज्यादा सुना गया गाना 'तुझसे नाराज नही जिंदगी' आज भी न जाने कितने ही लोगों की तन्हाई का साथी बना हुआ है.
'हुजूर इस कदर' गाने में जिस तरह का अभिनय हुआ है, वह फिल्म देखने का आनन्द चौगुना कर देता है, आजकल की फिल्मों के गानों में ऐसा अभिनय नदारद ही रहता है..

जब यह फिल्म आई तब समय ऐसा था कि टीवी या बड़े पर्दे पर दिखाए जाने वाले कंटेंट का असर दर्शकों पर कुछ ज्यादा ही पड़ता था. समाज बड़े पर्दे पर दिखाए जाने वाले कपड़ों, व्यसनों, रिश्ते के ताने-बाने, धार्मिक सीखों को बहुत जल्दी आत्मसात कर रहा था. फिल्म मासूम में शबाना आज़मी को अपने पति नसरुद्दीन को तैयार करते, पति के लिए चाय बनाते दिखाया गया है. एक पुरूष प्रधान समाज में तब की फिल्मों में दिखाए गए ऐसे दृश्यों से बहुत फर्क पड़ा, आज भी भारतीय परिवारों में खाना बनाना और बच्चों को तैयार करना सिर्फ महिलाओं का कर्तव्य समझा जाता है. यह कड़वा है मगर सत्य है कि हम अपने घर की बेटियों से बेटों को पानी पिलवाते हैं, उनके कपड़े धुलवाते हैं.

महिलाओं को शुरू से ही पुरुषों के मुकाबले कमजोर माना जाता है, यह अवधारणा बना ली जाती है कि उनका जन्म ही पुरुषों की सेवा के लिए हुआ है. बाद में इसी अवधारणा के शिकार कई पुरुष महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों में शामिल रहते हैं या महिलाओं की तरक्की पर उन पर तंज कसते हैं.

आज ओटीटी आने के बाद से स्थिति थोड़ी बदल रही है, ओटीटी पर आ रहे बहुत से कंटेंट महिला सशक्तिकरण पर वास्तव में अच्छा काम कर रहे हैं. 
मासूम फिल्म में महिलाओं के आधुनिकीकरण को सिर्फ उनके द्वारा सिगरेट जलाने तक सीमित रखा गया है पर महिलाओं का वास्तविक आधुनिकीकरण उनको समाज में बेहतर माहौल देकर ही हो सकता है. यह माहौल उनको घर में या काम के दौरान सुरक्षित माहौल देकर मिल सकता है , जो मासूम फिल्म के सालों बाद भी उनको नसीब नही हुआ है.

 हिमांशु जोशी.
@himanshu28may

Monday, May 16, 2022

रात और दिन

रात


वो रात बड़ी गहरी थी,
इतनी गहरी कि कुछ दिखता नही था,
उस रात हवा नही थी.
मच्छर थे जो इंसान का खून भी चूसते थे,
सर में अलग-अलग कपड़ा बांधे लोग भी थे ,जो एक दूसरे से लड़ते थे.
आज रात कुछ अलग है, शायद चाँदनी 
तेज़ हवा, हल्की बारिश.
सड़क पर कुछ पेड़ भी गिरे हैं,
सर में अलग-अलग कपड़ा बांधे कुछ लोग फिर जमा हैं,
पर शायद वो मिलकर सड़क पर गिरा पेड़ हटा रहे हैं.
और हां आज वो मच्छर भी नही है, जो खून चूसते थे.

दिन

चटक धूप, चढ़ते पारे के बीच नए सेंट्रल विस्टा भवन में आज खूब चहल पहल थी,
नए लेबर कोड बिल पेश कराने मंत्री जी सीढ़ी चढ़ चुकी थी.
भवन की नई कैंटीन में मरम्मत होनी थी,
वो आज अपनी बीमार बेटी को घर छोड़ ईंट की ट्रॉली पर फिर जुटा हुआ था.
दोपहर वो गश खाकर गिर पड़ा, एम्बुलेंस बुलाई गई,
जाम में फंसते फंसाते एम्बुलेंस देर से पहुंची.
उसका एक हाथ नीचे लटका पड़ा था, 
जिससे जमीन पर सत्तू बिखर रहे थे.
भारत माता की जय,
नया लेबर कोड पास होते ही आसमान गुंजयमान हो चला था.

हिमांशु.


थार: हिंसा की इस अति को लगाम लगाना जरूरी.

थार फिल्म में एक ही खास बात है जो ध्यान खींचने लायक है, वह है इसका छायांकन।
फिल्म में छायांकन श्रेया देव दुबे का है जिन्होंने साल 2020 में आई एक शॉर्ट फिल्म 'बिट्टू' में भी छायांकन किया था। बिट्टू फिल्म वर्ष 2021 के ऑस्कर अवॉर्ड में 'लाइव एक्शन शॉर्ट फिल्म' के लिए नामित हुई थी और इस श्रेणी में शीर्ष दस के अंदर जगह बनाने में कामयाब भी रही थी।
थार फिल्म की शूटिंग के लिए अजमेर जिले की पहाड़ियों को चुना गया है और श्रेया ने इसके कोने-कोने को बखूबी अपने कैमरे पर उतारा है। जब बार-बार एक मरी हुई भैंस पर कैमरा जा टिकता है तो फिल्म में थोड़ी रोचकता आने की उम्मीद बंधती है। ऐसे ही बुजुर्ग के चेहरे के जरिए निर्देशक को उसकी बेचारगी झलकाने में कामयाबी मिली है। अंधेरे से उजाले के तरफ जाने वाले दृश्य भी आंखों को स्वतः ही आकर्षित कर देते हैं।

फिल्म- थार
निर्देशक- राज सिंह चौधरी
छायांकन- श्रेया देव दुबे
कॉस्ट्यूम डिजाइन- प्रियंका अग्रवाल
अभिनय- अनिल कपूर, हर्षवर्धन कपूर, फातिमा साना शेख
ओटीटी- नेटफ्लिक्स


कई हत्याओं से शुरू हुई कहानी में पुलिस अफसर बने अनिल कपूर पर इन हत्याओं रोकने का जिम्मा है। अनिल कपूर की डील डौल के सामने अब भी बॉलीवुड के कई युवा अभिनेता पानी मांगते नजर आ सकते हैं। बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन के बाद किसी अभिनेता की दमदार आवाज है तो वह अनिल कपूर ही हैं पर इस फिल्म में उन्होंने अपनी उस आवाज को गालियां देने में ही बर्बाद किया है, यह सोचने वाली बात है कि अपने कैरियर के इस पड़ाव पर अनिल को इतनी गालियों की जरूरत क्यों पड़ी।
फिल्म की कहानी ड्रग्स और पाकिस्तान से भी जुड़ती जाती है। सतीश कौशिक अनिल कपूर के साथ ही एक पुलिसकर्मी बने हैं और अपने अभिनय की छाप छोड़ जाते हैं। हर्षवर्धन कपूर इस फिल्म में बोले कम हैं और दिखे ठीक हैं, बिना बोले बॉलीवुड में अपना सफर कहां तक तय किया जा सकता है ये बात हर्षवर्धन को भी पता है। एक बात जरूर है कि उन्होंने इस फिल्म के जरिए बॉलीवुड में अपने बेहतर भविष्य की उम्मीद जरूर जगाई है।
दंगल गर्ल फातिमा साना शेख एक बेहतरीन अभिनेत्री हैं पर इस फिल्म में उनकी अभिनय क्षमता का बिल्कुल भी उपयोग नही किया गया है और उन्हें सिर्फ सौंदर्य उत्पाद की तरह पेश कर दिया गया है। उस दौर में जहां अभिनेत्रियों के लिए जबरदस्त कंटेंट लिखे जा रहे हैं, फातिमा को सिर्फ चेहरा दिखाने के लिए फिल्म में रखना समझ से परे है।

निर्देशक राज सिंह चौधरी, साल 2021 में एक नए विषय पर आई फिल्म 'शादिस्तान' के निर्देशक थे और साल 2009 में आई चर्चित फिल्म गुलाल की कहानी भी उन्होंने ही लिखी थी पर इस फिल्म से सभी को निराश किया है।

बॉलीवुड के एक और बड़े नाम अनुराग कश्यप ने इस फिल्म के संवाद लिखे हैं और उनके काम को हम इस संवाद के जरिए समझ सकते हैं 'हुक्म, अंग्रेजी पिक्चर का हीरो लागे है'।

फिल्म की पटकथा भी कई जगह पटरी से उतरी हुई लगती है,  अनिल कपूर के परिवार और नौकरी से जुड़ी कई बातों को खुलकर नही दिखाया गया है। राजस्थान की इतनी गर्मी में अनिल कपूर का जैकेट पहनना- उतारना अखरता है। गांव में मुरझाए चेहरों के बीच फातिमा का इतना सुंदर चेहरा अजूबा जैसा लगता है।

राजस्थानी बैकग्राउंड का संगीत सुनने में अच्छा लगता है और पर साउंड डिजाइन फिल्म के कई हिस्सों में ठूंसा हुआ सा लगता है।

निर्देशक ने फिल्म में जातिवाद जैसे विषय को उठाया है पर घरेलू हिंसा के दृश्य दिखा उस सामाजिक सन्देश पर अपना किया धराया खुद ही खत्म भी कर दिया। फिल्मों के एक-एक दृश्य का अनुकरण समाज द्वारा किया जाता है, फिल्म में पक्षियों का शिकार करने वाला दृश्य इन ओटीटी प्लेटफॉर्म पर नजर रखने वाली संस्थाओं की आंखों में क्यों नही आया यह बड़े अचरज की बात है।

अचरज यह भी है कि आजकल की फिल्मों में जो हिंसा, गाली परोसी जा रही है, उन पर लगाम क्यों नही लग रही। पहले हम हॉलीवुड की 'रॉन्ग टर्न' और 'सॉ' जैसी फिल्मों में ही अति हिंसा देखते थे पर उन्हें देखने से बचा जा सकता था। ओटीटी के इस जमाने में कोई भी कंटेंट बच्चों की पहुंच से दूर नही है।

अगर निर्देशक, निर्माता इन्हें ही फिल्मों या वेब सीरीज की सफलता का पैमाना मानते हैं तो इतिहास गवाह है कि बॉलीवुड की साफ सुथरी फिल्में ही कमाई के मामले में आगे रही हैं। लगान, रंग दे बसंती, थ्री इडियट्स जैसी फिल्मों में ऐसी अति हिंसा दिखाने की जरूरत नही पड़ी। हमारे आसपास बहुत से ऐसे मामले भरे पड़े हैं, जहां हत्याओं और लूट की योजना फिल्मों को देखकर ही बनी हैं और अगर इन फिल्मों को देखकर भी कोई अपराध करेगा तो क्या कोई उसकी जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार होगा! कान, उंगली काटने और जिंदा जलाने के दृश्यों से समाज को क्या दिखाने की कोशिश करी जाती है!

अपने परिवार के साथ राह चलते आप जब किन्हीं अनजान बच्चों को वो शब्द बोलते सुनते हैं जो आप अपने घर में गलती से भी बोलते, तो आप शर्म से पानी हो ही जाते हैं। लेकिन याद कीजिए ऐसे ही शब्दों को ओटीटी पर सुनना शायद धीरे-धीरे आपका शौक बन गया है और शायद उन बच्चों का भी।

समीक्षक - हिमांशु जोशी.

Friday, May 13, 2022

निर्देशक के नाम पर न जाइए, पहले एक नज़र ज़रा यहां डालिए.

निर्देशक सचिन पाठक को आज भी फ़िल्म दृश्यम के लिए याद किया जाता है पर वेब सीरीज़ 'लंदन फाइल्स- सीजन 1' में उन्होंने ऐसा काम नही किया, जिसके लिए लंदन फाइल्स को लंबे समय तक याद रखा जाए.


वेब सीरीज- लंदन फाइल्स- सीजन 1
ओटीटी प्लेटफार्म- वूट
निर्देशक- सचिन पाठक
अभिनय- अर्जुन रामपाल, पूरब कोहली
लेखक- प्रतीक पायोधी

वेब सीरीज का एकमात्र प्लस प्वाइंट इसका संगीत है. हर एपिसोड के इंट्रो पर बजता संगीत भी आप मिस नही करना चाहेंगे, सीरीज की कहानी और उसमें आने वाले रोमांचक मोड़ों के अनुसार इसका चयन किया गया है.
 यह तेज और दिल की धड़कनों को बढ़ाने वाला है. 

वेब सीरीज के जरिए आप्रवासियों की समस्या को दिखाने की कोशिश करी गई है और निर्देशक ने महिला उत्पीड़न, ड्रग्स जैसे मुद्दे को भी अपनी कहानी में जगह दी है.

दृश्यम में निर्देशक सचिन पाठक ने पात्रों को बुना था. एक रोमांचक कहानी के साथ अजय देवगन, तब्बू और श्रिया सरन ने मिलकर ऐसा काम किया था, जो दर्शकों के मन में आज भी ताज़ा है. इस वेब सीरीज की कहानी शुरू से ही दर्शकों को बांधे तो रखती है पर ऐसा कोई रोमांच पैदा नही पाती जिससे दर्शकों का दिमाग हिलता रहे.
 कहानी के ज़रिए एक डिटेक्टिव की जिंदगी को करीब से दिखाने की कोशिश की गई है.
कहानी यह सन्देश भी देती है कि हिंसा किसी बात का समाधान नही होती और माफी ही किसी इंसान को
बड़ा बनाती है.

वेब सीरीज की स्क्रिप्ट अच्छे से लिखी गई है और ढूंढ कर भी उसमें कोई कमी नही लगती.
वेब सीरीज का छायांकन अच्छा है और इसमें लंदन की खूबसूरती को जस का तस दिखा दिया गया है.

हर वेब सीरीज के एपिसोड्स में उसका इंट्रोडक्शन आने से पहले कहानी का कुछ भाग दिखाने का ट्रेंड सा बन गया है. निर्देशक ने अपनी वेब सीरीज में भी वही राह पकड़ी है.

अभिनय की बात की जाए तो वेब सीरीज पूरी तरह से अर्जुन रामपाल की है. नशे में डूबे एक डिटेक्टिव के रोल में वह पूरी तरह से खो गए हैं, ओम सिंह का किरदार शायद उनसे बेहतर कोई और निभा भी नही सकता था.
सीरीज में 'जल' फेम पूरब कोहली भी हैं पर निर्देशक ने उन्हें इतना मौका नही दिया कि उन पर ज्यादा कुछ लिखा जाए.

वेब सीरीज का यह संवाद आज के दौर में मजदूरों की आवाज बन सकता है 'हम मजदूर हैं, हम ही ने रखी है उनके महलों, उनके संसदों की नींव और उन नींव की ईंटो के नीचे हमने अपने सपने रखे हैं. उनको याद दिलाना होगा कि अगर हमारे सपने टूट गए तो, उनकी नींव की ईंट भी टूट जाएगी और धरधरा कर टूट जाएंगे उनके महल और उनकी संसदें'.

अगर आप आजकल आए कुछ बेहतरीन कंटेंट देख-देख कर ऊब चुके हैं ,तो एक बार 'लंदन फाइल्स' देखने में कोई हर्ज भी नही है.

हिमांशु जोशी.

Tuesday, May 10, 2022

मंटो, नवाजुद्दीन सिद्दीकी और उनके संवाद.

सआदत हसन मंटो वो तरक्कीपसंद लेखक थे जो समाज के लिए गरीबी में रहे, समाज के लिए कोर्ट में
मुकदमा लड़ अपनी रचनाओं को हम तक लाए. हमारा भी फर्ज बनता है कि उन्हें पढ़ें और उनके विचारों पर चलें.


 मंटो का जन्म 11 मई, 1912 को पंजाब के समराला में हुआ था और 18 जनवरी,1955 को पाकिस्तान के लाहौर में मात्र 42 वर्ष की आयु में वह इस दुनिया से चले गए.
उन्होंने अपने छोटे से जीवनकाल में बाइस लघु कथा संग्रह, एक उपन्यास, रेडियो नाटक के पांच संग्रह, रचनाओं के तीन संग्रह और व्यक्तिगत रेखाचित्र के दो संग्रह प्रकाशित किए. मंटों पर उनकी रचनाओं को लेकर पांच मुकदमे चले जो काफी चर्चित हुए.

जिन युवाओं में समाज के लिए कुछ कर गुजरने की लौ जल रही है, उनके लिए साल 2018 में कगार, बवंडर और फॉयर जैसी मशहूर फिल्मों में अभिनय कर चुकी अभिनेत्री नंदिता दास अपने निर्देशन में फ़िल्म 'मंटो' लेकर आई थी. इस फ़िल्म के जबरदस्त छायांकन, संवादों के साथ नवाजुद्दीन सिद्दीकी और रसिका दुग्गल के अभिनय में इतना दम है कि लोग इसे देख मंटो की सारी रचनाओं को पढ़ डालें.

निर्देशक ने फिल्म का कलर डार्क ही रखा है, फिल्म के सेट और किरदारों के कपड़ों को बिल्कुल ब्रितानी राज के समय की तरह दिखाया गया है.
 
अपने शहर मुंबई छूटने के गम में शराब और सिगरेट को गले लगाए, जबरदस्त संवादों को बोलते मंटो का किरदार नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने बखूबी निभाया है.
हर कदम में मंटो का साथ देती उनकी पत्नी सोफिया का किरदार निभाती रसिका दुग्गल ने खुद को सोफिया के रूप में अमर कर दिया. फिल्म में राजश्री देशपाण्डे, परेश रावल, ऋषि कपूर, ईला अरुण, शशांक अरोड़ा और ताहिर भसीन भी महत्वपूर्ण भूमिका में हैं.

फिल्म में मंटो की कहानी देश की आजादी से शुरू होती है.
 देश का बंटवारा हुआ तो मंटो ने हिंदुस्तान में रहना ही चुना, इस बीच उनके स्टूडियो को जलाने की धमकियां भी लगातार मिल रही थी.

उन्ही दिनों मंटो मुंबई में अपने घर में अपनी पत्नी से कहते हैं 'इसलिए खरीदनी पड़ती है टोपियां. एक हिन्दू टोपी एक मुसलमान टोपी. क्या करें जब मजहब दिलों से निकल सर पर चढ़ जाए तो पहननी पड़ती हैं.'
मंटो के चले जाने के इतने सालों बाद भी आज देश हिन्दू-मुस्लिम तनाव से गुजर रहा है, यह देख बड़ा दुख होता है पर धर्मांधता में डूबे लोगों के लिए मंटो की यह पंक्तियां आंख खोलने वाली हैं.

फिल्म में मंटो का किरदार जीते नवाजुद्दीन को देखते समय कब निकल रहा है दर्शकों को इसका पता भी नही चलेगा.

मंटो और उनकी पत्नी को अफसाना बुनते देखना बताता है कि एक लेखक की रचनाओं के लिए उसकी साथी भी महत्व रखती है.
यहां ये भी पता चलता है कि मंटो अपने पिता की जगह अपनी मां से ज्यादा प्यार करते थे.

फिल्म के संगीत पर बिल्कुल ध्यान नही जाता क्योंकि मंटो के लिखे हर शब्दों को नवाजुद्दीन ने इस तरह कहा है कि दर्शक बस उन्हें ही ध्यान से सुनते रहेंगे. एक दृश्य में मंटो अपने मरने की बात कहते अपनी पत्नी से कहते हैं 'वो अब भी मानो मिट्टी के नीचे सोच रहा है कि वो बड़ा अफसाना निगार है या खुदा'.

भारत छोड़ने और विस्थापितों पर मंटो कहते हैं 'वो हड्डियां कहां जलाई या दफनाई जाएंगी, जिन पर से मजहब का गोश्त चीलें नोच-नोच कर खा गई'.

मुंबई छोड़ने से पहले मंटो अपने दोस्त अभिनेता श्याम से मुंबई के लिए कहते हैं ' मैं चाहता हूं कि मैं जिंदगी भर इस शहर का कर्जदार रहूं'. इसी समय रेलवे स्टेशन में देश छोड़ रहे लोगों का दृश्य दिखता है और श्याम-मंटो एक दूसरे से बिछड़ते पाकिस्तान जिंदाबाद, हिंदुस्तान जिंदाबाद कहते हैं. यह दृश्य ह्र्दय विदारक है.

निर्देशक ने दृश्यों और नवाजुद्दीन की नजरों से ही स्क्रीन पर कमाल का प्रभाव छोड़ा है. लाहौर में जले हुए घर, उनसे सामान समेटते बुजुर्ग. दुकानों का नाम बदलना और विस्थापितों के टैंट, इन सब को देखते मंटो से दर्शकों को यह अहसास हो जाता है कि मंटो जो देखते थे वही लिख देते थे.
फिल्म में एक जगह मंटो का संवाद भी है 'मैं वही लिखता हूं जो जानता हूं जो देखता हूं'. 

कहानी में मंटो और इस्मत चुगताई की दोस्ती को भी बड़ी करीबी से दिखाया गया है.

फिल्म में मंटो की 'ठंडा गोश्त' कहानी को बड़े बेहतरीन अंदाज में दिखाया है. रणवीर शौरी और दिव्या दत्ता ने इस लघुकथा के किरदारों को जीवंत कर दिया है. 

ठंडा गोश्त कहानी को मंटो ने ऐसे लिखा है जैसे सब कुछ पाठकों की आंखों के सामने चल रहा है ,उसे पढ़ते ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि आप कोई अश्लील साहित्य पढ़ रहे हैं जो किसी को सुना नही सकते.
इस कहानी में एक औरत है जो अपने साथी की जिंदगी में किसी दूसरी औरत को बर्दाश्त नहीं कर सकती, वह औरत अपने पति पर विश्वास नहीं करती. इस कहानी का मर्द अपने रिश्ते के प्रति जिम्मेदार नहीं है, मंटो ने अपनी इस लघु कथा को कई रंगों से रंगा है और शायद यही इसकी खूबी है.

मंटो को जब इस कहानी को लेकर मुकदमे का सामना करना पड़ा तब उन्हें अपने मुकदमे से ज्यादा इस बात की चिंता थी कि फैज द्वारा उनके अफसाने को लिटरेचर के पैमाने पर पूरा नही माना गया है.

फिल्म में मंटो की टोबा टेक सिंह की कहानी भी दिखाई गई है.
टोबा टेक सिंह कहानी में मंटो ने पागलों को एक जरिया बना कर हिंदुस्तान-पाकिस्तान बंटवारे के कई पहलुओं को छुआ है.  यह वो विचार हैं जो एक आम भारतीय के मन में इस कहानी को पढ़ने से पहले कभी नही आए होंगे.

मंटो की सारी रचनाएं इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध हैं, जिन्हें पढ़ युवाओं द्वारा तरक्की के रास्ते को अपने तरीके से खोजा जा सकता है.

हिमांशु जोशी.


एक क़लम जिसकी स्याही आज भी पक्की है.

एक हीरे के लिए लाख जिगर तोड़े हैं,

घर तो घर शम्अ मजारों की भी बुझ जाती है,

जब कहीं इसके नगीनों में चमक आती है...

ऐसी कई पंक्तियां लिखने वाले कैफ़ी आज़मी का जन्म 14 जनवरी, 1919 को आज़मगढ़ के छोटे से गांव मिजवां में हुआ थी. कैफ़ी के बचपन का नाम अख्तर हुसैन रिज़वी था. 


कैफ़ी में हुकूमत से ख़िलाफ़त के गुण बचपन से ही दिखने लगे थे, उनके पिता सैयद फतेह हुसैन रिज़वी ने जब उन्हें पढ़ने के लिए 'सुल्तान उल मदारस' लखनऊ में भेजा तो कैफ़ी ने वहां हड़ताल करा दी , जिस वजह से उन्हें मदरसे से निकाल दिया गया और वह मौलवी नही बन सके.

कैफी के पिता और दादा अच्छे शायर थे, जिसका असर उन पर भी पड़ा. कैफी अपनी पढ़ाई के दौर में गांधी और नेहरू के स्वराज आंदोलन से प्रभावित होकर कानपुर पहुंचे , वहां साल 1942 के दौरान 19 साल की आयु में एक मिल में काम करते हुए उन्होंने मजदूरों की समस्या देखी और वह उससे प्रभावित हुए और कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए.

इसके बाद उन्होंने पार्टी के अखबार 'कौमी जंग' के लिए लिखना शुरू कर दिया और बॉम्बे चले गए. कौमी जंग में काम करते उन्हें 45 रुपए महीना पगार मिलने लगी.

1947 में औरंगाबाद के एक मुशायरे में उन्होंने ताज के खिलाफ एक नज़्म पढ़ी, वहीं उनकी होने वाली पत्नी शौकत साहिबा का ध्यान उनकी तरफ गया.

दूरदर्शन से बात करती हुई शौकत कहती हैं कि कैफी साहब की यह खूबी थी कि लोग मुश्किल नज़्म भी उनके हाथों के इशारे और आवाज़ से समझ जाते थे.

शौकत साहिबा ,कैफी की नज़्म 'औरत' से बेहद प्रभावित हुई थी. जिसकी कुछ पंक्तियां हैं-

'तुझे क़द्र अब तक तिरी तारीख़ ने जानी ही नहीं 

तुझ में शोले भी हैं बस अश्क-फ़िशानी ही नहीं 

तू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं 

तेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहीं 

अपनी तारीख़ का उन्वान बदलना है तुझे 

उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है'

कैफी बहुत गरीब थे, उनके कमरे में एक मेज़ और पलंग थी. वह नज़्म से ही कमाते थे. एक दिन पीसी जोशी कैफी के घर आए तो उन्होंने शौकत से कहा कि लड़की को भी काम करना चाहिए, जिसके बाद वह भी काम करने लगी.

साल 1935 में मुंशी प्रेमचंद की मौजूदगी में पहली प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन सम्मेलन का आयोजन हुआ तो वहां कैफी एक नौजवान की हैसियत से जुड़ गए. इलाहाबाद से लेखक प्रो. ए.ए फ़ातिमी कहते हैं कि कैफी हुकूमत और अमीरों के खिलाफ दबंगई से बोलते थे.

इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन के लिए उन्होंने 'भूत गाड़ी' के रूप में पहला नाटक लिखा. उनका लिखा नाटक 'आखिरी शमां' बहुत हिट हुआ. इस रास्ते पर चलते कैफी का परिवार गरीबी से गुज़र रहा था और उनका एक बच्चा भी गुज़र गया.

शबाना आज़मी के पैदा होने से पहले कैफी फिल्मों में लिखने लगे.

उन्होंने 1952 में शाहिद लतीफ द्वारा निर्देशित फिल्म बुज़दिल के लिए अपना पहला गीत लिखा.

उनके प्रसिद्ध फिल्मी गीत शमा, कागज के फूल, शोला और शबनम, अनुपमा, आखिरी खत, हकीकत, हंसते ज़ख्म, अर्थ जैसी फिल्मों से हैं .

कागज के फूल फ़िल्म के लिए लिखे गीत बहुत लोकप्रिय हुए थे.

गीत लिखने के अलावा, उन्होंने चेतन आनंद की फिल्म 'हीर रांझा' की पटकथा लिखी, इसके सभी चरित्रों के संवादों को उन्होंने पूरी तरह से पद्य शैली में लिखा.

कैफी ने कहा था कि निर्देशक चेतन आनंद को जो चाहिए होता था वो दो मिनट में आपसे निकाल लेते थे, चेतन आनंद ने हीर रांझा के लिए उनसे पहले कुछ अन्य शायरों को भी आज़माया था पर बात नही बनी थी.

उन्होंने एमएस सथ्यू की उत्कृष्ट कृति 'गर्म हवा' की पटकथा और संवाद के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार और फिल्मफेयर पुरस्कार जीता. गर्म हवा में काम कर चुके अभिनेता विकास आनन्द कहते हैं कि कैफी ने गर्म हवा में मुझे रोल ऑफर न किया होता तो आज जो मैं हूं वो न होता.

कैफी ने बच्चों की भावनाओं पर आधारित फिल्म 'नौनिहाल' के गीत लिखे, इन गीतों की रिकॉर्डिंग के समय रफी साहब गाना गाते बीच में रो पड़ते थे.

कैफी की रचनाओं में यथार्थ का मर्म झलकता है, इसका कारण यह था कि उन्होंने जीवन की पाठशाला से ज्ञान अर्जित किया था.

एक बार कैफी लखनऊ जाने वाले थे,कुछ ही दिन पहले वहां दंगे हुए थे. लोग उम्मीद कर रहे थे कि कैफी आदत के मुताबिक, लखनऊ की तारीफ करेंगे. लेकिन कैफी ने जो बोला वो ये था.

'अज़ा में बहते थे आँसू यहाँ, लहू तो नहीं
ये कोई और जगह है ये लखनऊ तो नहीं
यहाँ तो चलती हैं छुरिया ज़ुबाँ से पहले
ये मीर अनीस की, आतिश की गुफ़्तगू तो नहीं'

कैफी आज़मी भारत सरकार के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कारों में से एक पद्मश्री थे, कैफी ने इस पुरस्कार को यह कहते लौटा दिया था कि पद्मश्री अवार्ड मुझे दिया गया था उर्दू शायर की हैसियत से. आप मुझे अवार्ड दे रहे हैं, मेरी ज़ुबान को कोई हक नही दे रहे.

 इसके अलावा उन्हें उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी पुरस्कार और उनके संग्रह 'आवारा सजदे' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, महाराष्ट्र उर्दू अकादमी का विशेष पुरस्कार, सोवियत भूमि नेहरू पुरस्कार, एफ्रो-एशियन राइटर्स एसोसिएशन से लोटस अवार्ड और राष्ट्रीय एकीकरण के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया. 

वर्ष 1998 में महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें ज्ञानेश्वर पुरस्कार से सम्मानित किया. उन्हें आजीवन उपलब्धि के लिए प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी फैलोशिप से भी सम्मानित किया गया था.

साल 2000 में उन्हें दिल्ली सरकार और दिल्ली उर्दू अकादमी द्वारा पहले मिलेनियम पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. उन्हें विश्व भारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन से डॉक्टरेट की मानद उपाधि से भी सम्मानित किया गया.

दूरदर्शन से बात करते शबाना आज़मी कहती हैं कि उनके पिता ने उनसे कहा था कि तुम्हें एक्टिंग में जाने की इच्छा है तो साइकोलॉजी लो. तुम एक्टिंग करोगी तो इतनी अच्छी एक्ट्रेस बनो कि लोग कहें सचमुच ये बहुत अच्छी है.

अपने गांव मिजवां से उनका खासा लगाव था, वहां उन्होंने मुख्य सड़क से गांव को जोड़ने के लिए दो किलोमीटर सड़क बनाई और गांव की छोटी रेल लाइन को बड़ी लाइन में बदलवाया. ये कराने वह व्हीलचेयर में आए थे.

डॉ मोहम्मद आरिफ़ उनके गांव प्रेम पर ज्यादा प्रकाश डालते हैं.

इतिहासकार डॉ मोहम्मद आरिफ़ बताते हैं कैफ़ी साहब की सेहत उनके गांव में लगातार बिगड़ती जा रही थी. बच्चों की ज़िद भी उन्हें मुम्बई ले जाने पर राज़ी न कर सकी, इस बीच वे अपने महिला इंटरमीडिएट कॉलेज का विस्तार डिग्री कॉलेज के रूप में करने पर आमादा रहे. गिरती सेहत के बावजूद गवर्नर से लेकर कुलपति तक उन्होंने इस बाबत बातचीत की, उनका उत्साह देखते बनता था. कभी-कभी घंटों आंखें मूंदे रहते थे, पास बैठे लोगों का भान तक नही होता था लेकिन जैसे ही किसी के मुंह से डिग्री कॉलेज की बात निकलती ऐसे आंखें खोल देते जैसे सोए ही न हों.

 ये थी उनकी तल्लीनता और फ़िक्रमन्दी. एक बार मैने कैफ़ी साहब से पूछा कि डिग्री कॉलेज में कौन – कौन सा विषय पढ़ाया जाएगा, उन्होंने तपाक से जवाब दिया –इंसानियत और मोहब्बत का. बात को और आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा क्यों न ऐसे कोर्स की डिज़ाइन तैयार की जाए जिसमें लोगों को एक दूसरे से नफ़रत और मारकाट की जगह मोहब्बत हो, खुलूस हो,एक दूसरे के दुःख दर्द से दिली रिश्ता और अमन-चैन लिखा हो और उस पेपर का नाम Indian Culture of Love रखा जाए.

बदलते ज़माने के साथ कैफ़ी साहब ने अपने गांव में स्कूल,लड़कियों का कॉलेज, कंप्यूटर शिक्षा के साथ-साथ लघु उद्योगों को बढ़ावा देने की एक वृहत योजना बनाई और उसे अमली जामा पहनाने के लिए अपने गांव के नाम पर  ‘मिजवां वेलफ़ेयर सोसायटी ‘ बनाई. वो चाहते तो ज़माने के दस्तूर के मुताबिक़ अपने वालिदैन के नाम पर सोसायटी बना सकते थे. गांव के सादात परिवार  के साथ ही पुश्तैनी ज़मींदार भी थे लेकिन उन्हें अपने खानदान की मक़बूलियत से ज़्यादा गांव की मक़बूलियत व तरक़्क़ी पसंद थी.

इस सिलसिले में मैंने एक बार उनसे पूछा कि कैफ़ी साहब इस सोसायटी का नाम कुछ अनजाना सा है. अगर आप अपने या अपने बुज़ुर्गों के नाम पर इसका नामकरण करते तो बहुत जल्द मंज़र-ए-आम पर होती. कैफ़ी साहब मुस्कुराये ,कहा -आरिफ साहब सोसाइटी मेरे नाम पर जानी जाए या लोग कहें कि कैफ़ी साहब की सोसाइटी है यह मुझे मंज़ूर नही.

मैं चाहता हूं कि लोग कुछ अरसे बाद ये कहें कि  ‘मिजवां वेलफ़ेयर सोसायटी’  के लिए कैफ़ी साहब भी काम करते हैं। मिजवां मेरा गांव, मेरा वजूद सबकी ज़बान पर हो.

आखिर मिट्टी का क़र्ज़ तो चुकाना ही है.

फ़र्ज़

जब लाल बहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री थे उस समय  भारत-पाकिस्तान के बीच जंग चल रही थी. कैफी ने एक कविता इसी जंग के समय लिखी थी, कविता का शीर्षक था 'फर्ज'. उसकी कुछ पंक्तियां हैं.

रिश्‍ते सौ, जज्‍बे भी सौ, चेहरे भी सौ होते हैं,

फ़र्ज़ सौ चेहरों में शक्‍ल अपनी ही पहचानता है,

वही महबूब वही दोस्‍त वही एक अज़ीज़,

दिल जिसे इश्‍क़ और इदराक अमल मानता है,

इस कविता का अर्थ था कि जंग अगर हो ही रही है तो उससे डरना या उससे दूर खड़े रहना ,कोई विकल्प नहीं है. जन्नत या जहन्नुम का फैसला कोई और करेगा, हमें तो अपना फर्ज निभाना है.

मुंबई के आज़ाद मैदान में एक जलसे के दौरान जब कैफी ने यह कविता सुनाई तो लाल बहादुर शास्त्री ने उन्हें गले लगाते कहा तुम मजदूरों के नही, पूरे हिंदुस्तान के शायर हो.

10 मई 2002 को इस दुनिया से दूर जाने के बाद भी कैफी अपनी रचनाओं के ज़रिए हमारे बीच ज़िंदा हैं. उनके फिल्मी गीतों का संकलन 'मेरी आवाज सुनो' वर्ष 2001 में प्रकाशित हुआ था. उनकी किताब 'नई गुलिस्तां' दो भागों में प्रकाशित हुई है, उनकी रचनाओं का अंग्रेजी अनुवाद पवन वर्मा द्वारा 'सिलेक्टेड पॉइम्स' नाम से प्रकाशित हुआ है.

साँप और आज

कवि दिनेश उपाध्याय, कैफी की कविता 'साँप' को आज के दौर के लिए सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं, जिसमें कहा गया है कि इंसान किसी धर्म का होने से पहले एक इंसान ही था और धर्म के नाम पर मरने-मारने पर उतारू हो चुका इंसान एक दिन फिर से सिर्फ 'इंसान' के तौर पर ही पहचाना जाएगा.

साँप

    ये साँप आज जो फन उठाए

    मिरे रास्ते में खड़ा है

    पड़ा था क़दम चाँद पर मेरा जिस दिन

    उसी दिन इसे मार डाला था मैं ने

    उखाड़े थे सब दाँत कुचला था सर भी

    मरोड़ी थी दुम तोड़ दी थी कमर भी

    मगर चाँद से झुक के देखा जो मैं ने

    तो दुम इस की हिलने लगी थी

    ये कुछ रेंगने भी लगा था

    ये कुछ रेंगता कुछ घिसटता हुआ

    पुराने शिवाले की जानिब चला

    जहाँ दूध इस को पिलाया गया

    पढ़े पंडितों ने कई मंतर ऐसे

    ये कम-बख़्त फिर से जिलाया गया

    शिवाले से निकला वो फुंकारता

    रग-ए-अर्ज़ पर डंक सा मारता

    बढ़ा मैं कि इक बार फिर सर कुचल दूँ

    इसे भारी क़दमों से अपने मसल दूँ

    क़रीब एक वीरान मस्जिद थी, मस्जिद में

    ये जा छुपा

    जहाँ इस को पेट्रोल से ग़ुस्ल दे कर

    हसीन एक तावीज़ गर्दन में डाला गया

    हुआ जितना सदियों में इंसाँ बुलंद

    ये कुछ उस से ऊँचा उछाला गया

    उछल के ये गिरजा की दहलीज़ पर जा गिरा

    जहाँ इस को सोने की केचुल पहनाई गई

    सलीब एक चाँदी की सीने पे उस के सजाई गई

    दिया जिस ने दुनिया को पैग़ाम-ए-अम्न

    उसी के हयात-आफ़रीं नाम पर

    उसे जंग-बाज़ी सिखाई गई

    बमों का गुलू-बंद गर्दन में डाला

    और इस धज से मैदाँ में उस को निकाला

    पड़ा उस का धरती पे साया

    तो धरती की रफ़्तार रुकने लगी

    अँधेरा अँधेरा ज़मीं से

    फ़लक तक अँधेरा

    जबीं चाँद तारों की झुकने लगी

    हुई जब से साइंस ज़र की मुतीअ

    जो था अलम का ए'तिबार उठ गया

    और इस साँप को ज़िंदगी मिल गई

    इसे हम ने ज़ह्हाक के भारी काँधे पे देखा था इक दिन

    ये हिन्दू नहीं है मुसलमाँ नहीं

    ये दोनों का मग़्ज़ और ख़ूँ चाटता है

    बने जब ये हिन्दू मुसलमान इंसाँ

    उसी दिन ये कम-बख़्त मर जाएगा.

    हिमांशु जोशी

    Tuesday, May 3, 2022

    ऊलजलूल वेब सीरीजों से आगे बढ़कर युगांतरकारी रहेगी 'गिल्टी माइंड्स'

    'गिल्टी माइंडस' वेब सीरीज़ का वो पड़ाव है जो यह साबित कर देगा कि वेब सीरीज़ उसकी पूरी टीम के लिए एक टेस्ट मैच की तरह है, जहां उसकी टीम के पास इतने मौके होते हैं कि वो अपने आप को पूरी तरह साबित कर सकते हैं.


    ओटीटी प्लेटफॉर्म- अमेज़न प्राइम
    अभिनय- श्रिया पिलगांवकर, वरुण मित्रा, नम्रता सेठ, सतीश कौशिक, कुलभूषण खरबंदा, वीरेंद्र सक्सेना, अरुण कालरा
    निर्देशक- शेफाली भूषण, जयंत दिगम्बर सोमलकर

    साल 2016 में शैफाली भूषण के निर्देशन में फ़िल्म आई थी 'जुगनी', फ़िल्म और शैफाली को उतनी चर्चा नही मिली जितनी मिलनी चाहिए थी. अपनी पहचान बनाने की जिद में शैफाली ने 'गिल्टी माइंड्स' बनाने की ठानी, पर कोरोना ने उनके सामने मुसीबत खड़ी कर दी. 
    हिंदी मनोरंजन उद्योग में पहली बार इतना जबरदस्त कंटेंट लाने जा रही शैफाली की हिम्मत कोरोना से बिल्कुल भी नही टूटी और उन्होंने 'गिल्टी माइंड्स' दर्शकों तक पहुंचा ही दी.

    वकीलों के परिवार पर आधारित इस पूरी वेब सीरीज में लगभग चार प्रेम कहानियां साथ चलती हैं, जिसमें एक समान लिंग के बीच भी है. कोर्ट में नए-नए केसों में वकीलों का आमना-सामना होता है, जिनकी जिरह देखने लायक है. दर्शक हर केस में खुद को ऐसा महसूस करेंगे जैसे वह भी केस से जुड़े हैं और कोर्टरूम में बैठे हैं.

    वेब सीरीज़ में निर्देशक ने वकीलों के निजी जीवन को बखूबी समझाया है, साथ ही वकीलों और उनके मुवक्किलों के आपसी सम्बन्धों को भी बड़ी करीबी से दिखाया गया है. निर्देशक ने सीरीज के कलाकारों द्वारा एकदूसरे को किए स्पर्शों के जरिए दर्शकों के दिल को भी छू लिया है.

    श्रिया पिलगांवकर फ़िल्म फैन में शाहरुख खान के साथ दिख चुकी हैं पर उन्होंने बॉलीवुड में अपने काम से कोई धमाल नही मचाया था, यहां पर अपने सिद्धांतों पर चलने वाली वकील का किरदार निभा उन्होंने यह काम पूरा कर लिया है.
    वरुण मित्रा लगभग दस साल से बॉलीवुड में हैं और तेजस जैसी फ़िल्म में भी दिखे ,लेकिन 'गिल्टी माइंड्स' वेब सीरीज के जरिए ही भविष्य में उन्हें जाना जाएगा. म्यूजिक वीडियोज में दिख चुकी शुभांगी को इस वेब सीरीज की खोज कहा जा सकता, उनकी आवाज और चेहरा दर्शकों के दिलों में छप जाएगा. सतीश कौशिक, कुलभूषण खरबंदा, वीरेंद्र सक्सेना, अरुण कुमार कालरा ने बेहतरीन काम किया है. निर्देशक शैफाली भूषण ने जिस तरह यहां युवा चेहरों को स्क्रीन पर ज्यादा मौका दिया है उसी तरह उन्हें अनुभवी कलाकारों के चरित्रों को भी ज्यादा बुनना था, अनुभवी कलाकारों को स्क्रीन पर ज्यादा देखना अच्छा अनुभव रहता.

    दिल्ली, मुंबई और पहाड़ों की खूबसूरती हूबहू दिखाई गई है, जिससे कहा जा सकता है कि वेब सीरीज का छायांकन बेमिसाल है. पहाड़ के सीढ़ीनुमा खेतों को देखना आंखों को रिझा जाता है.
    कोर्टरूम में मौजूद लोगों पर तेजी से भागता कैमरा वहां के दृश्यों को और भी दिलचस्प बना देता है.

    हर एपिसोड के इंट्रोडक्शन में बजने वाला बैकग्राउंड स्कोर उसमें दिखाए जाने वाले ग्राफिक्स के साथ हर आने वाले एपिसोड का प्लॉट तैयार कर देता है.
    वकील और मुवक्किल की आपसी बातचीत के दौरान बजता बैकग्राउंड स्कोर दृश्य में और अधिक रोचकता पैदा करने में कामयाब रहा है.

    निर्देशक की ये खासियत है कि वो निर्जीव वस्तुओं से भी दृश्यों में जान भर देती हैं जैसे एक पेंटिंग के जरिए ही वह वकीलों के पेशे पर चर्चा कराती हैं.
    ऐसे ही एक दृश्य में कॉफी में दिल दिखाकर ही रिश्तों की गर्मी का अहसास दिला जाती हैं.
    मुंबई में समुद्र की पीछे सूरज के छिपने वाला दृश्य अमेजन प्राइम के सब्सक्राइबर्स को 'वाह' कहने को मजबूर कर देगा.
    श्रिया के नृत्य वाला दृश्य रिश्तों और काम की उधेड़बुन से आजादी पाने वाला महसूस होता है.

    इस वेब सीरीज़ की खासियत यह है कि इसके हर एपिसोड में जो विषय है, वह हमारी सोच से कहीं आगे हैं. यह ठीक वैसे ही हैं जैसे हम हॉलीवुड के विषय में सोचते हैं. एक डेटिंग एप को लेकर मुकदमा, स्वचलित कार को लेकर मुकदमा, कास्टिंग काउच, लिंगानुपात, पानी और गेम्स को लेकर मुकदमा, यह सब वो विषय हैं जो आने वाले कल के लिए महत्वपूर्ण हैं लेकिन हम इस पर आंखे मूंदे हुए हैं. 
    निर्देशक शैफाली ने जिस तरह से इन केसों का चित्रण किया है वह काबिलेतारीफ है और इस वेब सीरीज़ को श्रेष्ठतम बनाता है. पानी को आर्टिकल 21 से जोड़ लेना, इसका उदाहरण है कि निर्देशक ने इस वेब सीरीज पर कितना शोध किया है.

    हर एपिसोड के लोकेशन चुनने में भी निर्देशक ने कमाल दिखाया है, वो किसी सूखाग्रस्त इलाके के हों या किसी मल्टीनेशनल कंपनी की बिल्डिंग, इसको देखने का अनुभव अद्भुत है. निर्देशक ने अलग-अलग केसों के लिए कोर्ट भी अलग-अलग चुनी हैं, इसमें कुछ शहरी इलाकों की हैं तो कुछ ग्रामीण.
    सोशल मीडिया पर किसी को ट्रोल करने का ट्रेंड सा बन गया है, वेब सीरीज में इसके असर को दिखाने की कोशिश की गई है.
    पहली कहानी में निर्देशक ने जिस तरह महिलाओं से जुड़े केस में कोर्टरूम के अंदर महिलाओं के साथ किए जाने वाले व्यवहार को दिखाया है, उससे महसूस होता है कि वह इसमें सुधार आने की उम्मीद रखती हैं.

    निर्देशक ने वेब सीरीज के संवादों पर भी डूब कर काम किया है जैसे इसमें पत्रकारिता पर एक संवाद है 'पहले सवाल पूछने पर हमें विद्रोही कहा जाता था और अब देशद्रोही', यह संवाद देश की वर्तमान पत्रकारिता पर तीखा व्यंग्य है.
    राजनीति पर इसमें सच्चाई के करीब एक संवाद इस प्रकार है 'ये बिजनेस और राजनीति एक ही सिक्के के दो पहलू तो हैं भाई'.
    रेप के आरोपों पर मुकदमें के दौरान संवाद 'माला ने नो नही भी कहा तो हां भी तो नही कहा था' फ़िल्म पिंक के संवादों से भी ज्यादा गहरा असर करता है.
    'There is always some proof' और 'lawyer job is not to make any moral judgement'
    जैसे प्रभावकारी अंग्रेजी संवाद भी इस सीरीज में मौजूद हैं.

    आजकल की वेब सीरीज में अश्लील दृश्यों की भरमार है, इसके साथ ही शराब और सिगरेट को भी जमकर दिखाया जाता है. इस वेब सीरीज में निर्देशक ने इतनी जान फूंकी है कि यह इन सब के बिना भी अपने में अलग रहती पर शायद उन्हें ट्रेंड के साथ चलना अच्छा लगा होगा.

    हिमांशु जोशी.


    Monday, May 2, 2022

    ताकी पहाड़ में ठंडी हवा चलती रहे.

    आपदा और कोरोना से उबरने के बाद उत्तराखंड के पहाड़ इस बार पर्यटकों के भारी दबाव से गुज़र रहे हैं, यह भीड़ उत्तराखंड के क्षेत्रीय लोगों के लिए नुकसानदेह तो है ही साथ में पर्यावरण की दुश्मन भी है.

    उत्तराखंड सरकार ने चार धाम आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या को सीमित कर दिया है, प्रतिदिन केवल 15,000 श्रद्धालु ही बाबा बद्रीनाथ के दर्शन करने जा सकेंगे और केदारनाथ धाम के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की संख्या 12,000 प्रतिदिन निर्धारित की गई है.
    दो दिन पहले केदारनाथ यात्रा से लौटे गैरसैंण निवासी उमेश नैलवाल बताते हैं कि मैंने केदारनाथ जाने के लिए रजिस्ट्रेशन करवाया था, वहां रास्ते में गाड़ियों की लाइन लगी हुई है, लोगों की भारी भीड़ है पर रजिस्ट्रेशन जांचने वाला कोई नही है.
    केदारनाथ मार्ग पर पर्यटकों की लाइन- फोटो- उमेश नैलवाल

    उत्तराखंड टूरिज्म द्वारा उनकी साइट पर जारी आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में भारतीयों के पसंदीदा टूरिस्ट स्पॉट देहरादून, मसूरी, टिहरी और बद्रीनाथ हैं. साल 2018 और 2019 के आंकड़ों पर नज़र डालें तो पता चलता है कि इन दोनों ही सालों में लगातार दस लाख से ऊपर पर्यटकों की आमद इन पर्यटक स्थलों में हो रही थी, मैदानी धार्मिक शहर हरिद्वार की बात करें तो वहां जाने वाले पर्यटकों की संख्या करोड़ों में थी.

    साल 2019 में उत्तराखंड के औली में कचरा फैलाने के लिए दक्षिण अफ्रीका के व्यवसायी बंधुओं अजय और अतुल गुप्ता पर 2.5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया था, यह वह कचरा था जो कुछ लोगों की वजह से एक सीमित क्षेत्र में हुआ और मीडिया में भी खूब उछला था पर उत्तराखंड में आने वाले करोडों पर्यटकों की वजह से जो कचरा हो रहा है उसकी वज़ह से पर्यावरण को हो रहे नुकसान पर कभी कोई बात नही हुई.

    इस कचरे की वजह से उत्तराखंड की वादियों की खूबसूरती तो खराब हो ही रही है, साथ में भूमि को जो नुकसान होता है उसकी भरपाई कर पाना भी असम्भव हो जाता है. 

    सारे पर्यावरणविद व वैज्ञानिक इस मामले में एक मत हैं कि पर्यटन को बंद नही किया जा सकता पर कम से कम नियंत्रित तो किया ही जाए. 

    पर्यटन को बढ़ावा देने से पहले उत्तराखंड सरकार के लिए इस कचरे का समाधान खोजना आवश्यक है, जैसे नैनीताल और मसूरी जैसी सुंदर जगहों में शराब की फेंकी हुई बोतलें बड़ी समस्या है.
    पर्यटकों को उत्तराखंड में प्रवेश देने से पहले उनके द्वारा लाए जा रहे सामान से पर्यावरण को होने वाले नुकसान के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए.

    पहाड़ों को मिटा कर सड़क तो बन रही है पर उसकी कीमत कौन चुकाएगा.

    भाजपा के सड़कों के जाल अभियान के तहत वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए सारे नियम कायदों को ताक पर रख ऑल वेदर रोड कार्य शुरू हुआ. इस सड़क को तीर्थाटन और पर्यटन के साथ ही सामरिक महत्व के लिहाज से महत्वपूर्ण बताया गया.

    पहाड़ न दरके इसके लिए पत्थर लगा पहाड़ों पर बाउंड्री की गई, जाल बांध फ़िर सरिया लगा भी पहाड़ों को रोकने की ‘रॉक ट्रीटमेंट’ स्कीम चली. सड़क की चौड़ाई दस मीटर से अधिक ही रखी गई थी.

    इस सड़क से पर्यावरण को होने वाले नुक़सान को देखते सुप्रीम कोर्ट ने एक हाई पॉवर कमेटी गठित की, जिसके अध्यक्ष रवि चोपड़ा ने अपनी रिपोर्ट में सड़क की चौड़ाई 12 मीटर रखना ठीक नही बताया था और इसको सिर्फ 5.5 मीटर तक ही रखने की सिफारिश की थी पर महत्वाकांक्षी सत्ता के आगे सब फीके थे और इसके बाद सड़क बारिश या उसके बिना भी कई बार किसी न किसी बाधा से बंद रहने लगी.

    इस 1 मई एक्टिविस्ट अतुल सती द्वारा ऑल वेदर रोड की सच्चाई दिखाता यह ट्वीट खासा वायरल हुआ था. जिसमें उत्तराखंड घूमने आने वालों को ऑल वेदर रोड का कितना फायदा मिला यह साफ हो गया.


     पिछले साल टनकपुर से पिथौरागढ़ जाने वाली सड़क रिकॉर्ड सात दिनों से अधिक समय तक बंद रही थी.
    टनकपुर से चंपावत की दूरी मात्र 70 किलोमीटर है पर पर सड़क बंद होने की वजह से रीठासाहिब के वैकल्पिक मार्ग से होता यह सफ़र 140 किलोमीटर का बन गया था.

    ऑल वेदर ने कइयों को लीला.

    विकास के नाम पर बनाई जा रही इस सड़क के निर्माण के दौरान अब तक कई घरों के चिराग भी बुझ चुके हैं.
    साल 2018 में रुद्रप्रयाग जिले में केदारनाथ मार्ग पर बांसवाड़ा के पास कार्य करने वाले  मजदूरों पर गिरी चट्टान से एक बड़ा हादसा हुआ था, जिसमें सात लोगों ने अपनी जान गंवाई.
    मार्च 2020 में बद्रीनाथ हाईवे पर ऑल वेदर रोड कटिंग के दौरान एक और हादसा हुआ और चट्टान में दबने से तीन लोगों की मौत हो गई.
    अक्टूबर 2020 में घाट-पिथौरागढ़ हाइवे पर एक कैंटर के ऊपर मलबा गिर जाने से उसमें सवार दो लोगों की मौके पर ही मौत हो गई.

    सड़क की नाकामी के कारण और निवारण

    हिमालय के दो ढाल हैं: उत्तरी और दक्षिणी. दक्षिणी में भारत, नेपाल, भूटान हैं. उत्तराखण्ड को सामने रख हम दक्षिणी हिमालय को समझ सकते हैं. उत्तराखण्ड की पर्वत श्रृंखलाओं के तीन स्तर हैं- शिवालिक, उसके ऊपर लघु हिमालय और उसके ऊपर ग्रेट हिमालय. इन तीन स्तरों मे सबसे अधिक संवेदनशील ग्रेट हिमालय और मध्य हिमालय की मिलान पट्टी हैं.
    इस संवेदनशीलता की वजह इस मिलान पट्टी में मौजूद गहरी दरारें हैं.
    बद्रीनाथ, केदारनाथ, रामबाड़ा, गौरीकुण्ड, गुप्तकाशी, पिंडारी नदी मार्ग, गौरी गंगा और काली नदी – ये सभी इलाके दरारयुक्त हैं.

    यहां भूस्खलन का होते रहना स्वाभाविक घटना है, किंतु इसकी परवाह किए बगैर किए निर्माण को स्वाभाविक कहना नासमझी कहलायेगी. यह बात समझ लेनी जरूरी है कि मलवे या सड़कों में यदि पानी रिसेगा, तो विभीषिका सुनिश्चित है.

    दरारों से दूर रहना, हिमालयी निर्माण की पहली शर्त है. जल निकासी मार्गों की सही व्यवस्था को दूसरी शर्त मानना चाहिए. हमें चाहिए कि मिट्टी-पत्थर की संरचना कोे समझकर निर्माण स्थल का चयन करें, जल निकासी के मार्ग में निर्माण न करें. नदियों को रोकें नही और बहने दें.

     जापान और ऑस्ट्रेलिया में भी ऐसी दरारें हैं लेकिन सड़क मार्ग का चयन और निर्माण की उनकी तकनीक ऐसी है कि सड़कों के भीतर पानी रिसने की गुंजाइश नगण्य है इसलिए सड़कें बारिश में भी स्थिर रहती हैं.

    उत्तराखंड के पहाड़ों में सड़क बनाते समय उसके मलबे को नदियों में फेंका जा रहा है.


    पहाड़ों में सड़क बनाने के सही तरीके को लेकर पर्यावरण के मुद्दों में सालों से गहरी नज़र रखते आ रहे वरिष्ठ पत्रकार विनोद पांडे से बात की गयी. उन्होंने बताया कि पहले पहाड़ों में सड़क कट एंड फिल’ तकनीक से बनती थी. सड़क बनाने के लिए पहाड़ काट सड़क के लिए आधा हिस्सा छोड़ा जाता था और आधे में उसी के मलबे की दीवार दी जाती थी. हल्द्वानी- नैनीताल रोड इसका उदाहरण है.

                          हल्द्वानी-नैनीताल रोड

    जेसीबी आने के बाद से इस ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गयापहाड़ काट उसका मलबा सड़क पर कहीं भी बेतरतीब तरीके से फेंक दिया जाता है. वो मलबा नीचे बह रही नदियों पर गिरता है और इससे जल प्रवाह में विघ्न आता है. सड़क बनाते समय पानी की निकासी का ध्यान भी नहीं दिया जाता और बाद में पानी अपना रास्ता खुद बनाते हुए भारी नुकसान भी करता जाता है.

    सड़क की वजह से पर्यावरण को हो रहा नुकसान.

    टाइम्स ऑफ इंडिया' ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि चार धाम सड़क को चौड़ा करने के लिए काटे जाने वाले 6000 देवदार के पेड़ों को चिह्नित करने पर ग्रामीण और कार्यकर्ता, राज्य वन विभाग के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि पारिस्थितिक रूप से कमजोर भागीरथी इको-सेंसिटिव जोन में इन पेड़ों की कटाई से क्षेत्र में 'केदारनाथ जैसी आपदा' आ सकती है.
     देहरादून के आशारोड़ी में भी सड़क के चौड़ीकरण के नाम पर हज़ारों पेड़ काटे जा रहे हैं, जिससे पर्यावरण को सीधा नुकसान पहुंच रहा है.

    देशभर में इस साल भीषण गर्मी पड़ रही है और चार धाम में भी इस बार अप्रैल माह की जगह मार्च में ही बर्फ पिघलने लगी है. जल, जंगल और जमीन का अतिदोहन ही इसके लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार है.

    भूगर्भशास्त्री प्रोफ़ेसर खड्ग सिंह वल्दिया ने कहा था  जब बड़ी-बड़ी गाड़ियां, ट्रक व बसें पहाड़ के इन कमजोर रास्तों पर चलतीं हैं तो भी धरती की पुरानी दरारें माइक्रो भूकम्पों से थरथरातीं हैं, हर रोज लाखों की संख्या में उठने वाले ये माइक्रो भूकंप पहाड़ों को कमजोर करते चले जाते हैं.

    इस बीच चारधाम परियोजना की निगरानी करने वाली सुप्रीम कोर्ट की हाई पॉवर कमेटी के चेयरमैन पद से रवि चोपड़ा ने भी इस साल की शुरुआत में इस्तीफा दे दिया है.
    पर्यावरणविद रवि चोपड़ा ने अपने इस्तीफा-पत्र में कहा था कि यह विश्वास टूट सा गया है कि उच्च अधिकार प्राप्त समिति इस बेहद नाजुक पारिस्थतिकी को संरक्षित कर सकती है. मैं अब और काम नहीं कर सकता, इसलिए इस समिति से मैं इस्तीफा दे रहा हूं.

    पर्यटक सीज़न में ट्रैफिक और उससे पर्यटकों के साथ-साथ क्षेत्रीय लोगों की परेशानी.

    पर्यटक सीज़न में पर्यटकों की भीड़ जगह-जगह बंद रहने वाली इस ऑल वेदर रोड वजह से परेशानी तो झेलती ही है, साथ में उत्तराखंड के क्षेत्रीय लोग भी इस वज़ह से परेशानी उठाते हैं. सड़क पर लगे लंबे जाम की वजह से उत्तराखंड के दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले मरीजों के लिए और मुसीबत खड़ी हो जाती है.

    नैनीताल में इस सोमवार को बगैर किसी अवकाश के भी पार्किंग फुल थी. फोटो- सोनाली मिश्रा

    कई पर्यटक जब अपना महत्वपूर्ण समय और पैसा खर्च कर कुछ सुकून पाने की तलाश लिए मंजिल के करीब पहुंचते हैं तो उन्हें ट्रैफिक की वजह से वहां से वापस लौटा दिया जाता है.

    पर्यटकों का सामना कुछ इस तरह की सूचना से होता है.

    इंटरनेट, मोबाइल के इस युग में उत्तराखंड पर्यटन से जुड़े लोगों को चाहिए कि वह इन डिजिटल साधनों का सही प्रयोग करते उत्तराखंड आने वाले पर्यटकों तक सड़कों, पार्किंग की ताजा जानकारी पहुंचाते रहें.


    ये सभी पर्यटक नही, अब उत्तराखंड की जमीनों के मालिक भी हैं.

    उत्तराखंड में आने वाली पर्यटकों की इस भीड़ में अपनी जेब में नोटों की गड्डी भरे वह लोग भी हैं जो उत्तराखंड को एक बाजार के तौर पर देख रहे हैं या जिन्होंने पहाड़ को अपना दूसरा घर बनाने की ठानी है. ऐसे लोग अपना तो हित देख रहे हैं पर वह यह नही समझते कि अपने सुख के लिए उन्होंने पहाड़ को भी नगरों की तरह बनाना शुरू कर दिया है, जहां कंक्रीट का जाल है. 'हिमान्तर' पत्रिका में तरुण जोशी की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि एक अनुमान के मुताबिक उत्तराखंड की अब तक लगभग एक लाख हैक्टेयर जमीन उत्तराखंड के स्थानीय लोगों के हाथ से निकल बाहरी लोगों के हाथों में चली गई है.
    पहाड़ की वादियां महानगरों की गलियों सा महसूस कराना शुरू करें उससे पहले उत्तराखंड में भूमि की खरीद फरोख्त को लेकर भूकानून लागू करने की आवश्यकता भी है.

    आध्यात्मिक पर्यटन से ईको टूरिज़्म को जोड़ना पलायन भी रोकेगा और किसी एक पर्यटक स्थल पर दबाव भी कम करेगा.

     उत्तराखंड से पलायन को रोकने के लिए बातें तो हमेशा की जाती है पर प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर उत्तराखंड में पलायन महत्वपूर्ण समस्या रहा है. उत्तराखंड के कई युवा नोएडा, दिल्ली के होटलों में काम करते गुमनामी के अंधेरों में खोए रहते हैं.
    लाखों में एक प्रदीप मेहरा भी निकलता है, जिसकी कहानी चर्चा पा जाती है.
    ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग, उत्तराखंड पौड़ी द्वारा जून 2021 में दिए गए आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में पहली लहर के दौरान सितंबर 2020 तक 3,57,536 प्रवासी वापस लौटे थे, जिसमें से सितंबर अंत तक 1,04,849 प्रवासी एक बार फिर से वापस मैदानी क्षेत्रों में पलायन कर गए.

    अपने उत्तराखंड दौरे में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि देश को बचाना है तो उत्तराखंड के पलायन को रोकना होगा क्योंकि उत्तराखंड देश की उत्तरी सीमा है. वृक्षारोपण, जल संरक्षण को बढ़ावा देना होगा. उत्तराखंड मे आध्यात्मिक पर्यटन को इको पर्यटन से जोड़ना होगा. 
    उनकी इस बात को गम्भीरता से किया जाए तो उत्तराखंड के स्थानीय लोगों के साथ पर्यटकों के लिए भी उत्तराखंड एक आदर्श पर्यटक स्थल बन सकता है.

    इको टूरिज़्म का अर्थ है पर्यटन और प्रकृति संरक्षण का प्रबंधन इस ढंग से करना कि एक तरफ पर्यटन और पारिस्थितिकी की आवश्यकताएं पूरी हों साथ ही दूसरी तरफ स्थानीय समुदायों के लिए बेहतर जीवन स्तर सुनिश्चित किया जा सके.
    आध्यात्मिक पर्यटन में पर्यटक, आध्यात्म से जुड़ी जगह जाना पसंद करते हैं. 

    उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में पर्यटक या तो चारधाम से जुड़ी आध्यात्मिक पर्यटन में रुचि लेता है या वो नैनीताल, मसूरी में जाकर इको टूरिज़्म को बढ़ावा देता है. इससे उत्तराखंड के बाकी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को पर्यटन से जुड़े रोज़गार का खास फायदा नही मिलता. उत्तराखंड के हर जिले में धार्मिक महत्व के तीन- चार दर्शनीय स्थल जरूर हैं और अगर उनका प्रचार-प्रसार वहां की प्राकृतिक सुंदरता से जोड़कर किया जाएगा तो स्थानीय लोगों को तो इसका फायदा मिलेगा ही साथ ही मुख्य रूप से पर्यटकों के दबाव वाली तीन-चार जगहों से हट कर अन्य जगहों में भी पर्यटक घूमना शुरू कर देंगे. इससे उत्तराखंड को ट्रैफिक जाम, प्रदूषण जैसी समस्याओं से भी निजात मिल सकता है.

    हिमांशु जोशी.

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