रात
इतनी गहरी कि कुछ दिखता नही था,
उस रात हवा नही थी.
मच्छर थे जो इंसान का खून भी चूसते थे,
सर में अलग-अलग कपड़ा बांधे लोग भी थे ,जो एक दूसरे से लड़ते थे.
आज रात कुछ अलग है, शायद चाँदनी
तेज़ हवा, हल्की बारिश.
सड़क पर कुछ पेड़ भी गिरे हैं,
सर में अलग-अलग कपड़ा बांधे कुछ लोग फिर जमा हैं,
पर शायद वो मिलकर सड़क पर गिरा पेड़ हटा रहे हैं.
और हां आज वो मच्छर भी नही है, जो खून चूसते थे.
दिन
चटक धूप, चढ़ते पारे के बीच नए सेंट्रल विस्टा भवन में आज खूब चहल पहल थी,
नए लेबर कोड बिल पेश कराने मंत्री जी सीढ़ी चढ़ चुकी थी.
भवन की नई कैंटीन में मरम्मत होनी थी,
वो आज अपनी बीमार बेटी को घर छोड़ ईंट की ट्रॉली पर फिर जुटा हुआ था.
दोपहर वो गश खाकर गिर पड़ा, एम्बुलेंस बुलाई गई,
जाम में फंसते फंसाते एम्बुलेंस देर से पहुंची.
उसका एक हाथ नीचे लटका पड़ा था,
जिससे जमीन पर सत्तू बिखर रहे थे.
भारत माता की जय,
नया लेबर कोड पास होते ही आसमान गुंजयमान हो चला था.
हिमांशु.
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