महिलाओं को शुरू से ही पुरुषों के मुकाबले कमजोर माना जाता है, यह अवधारणा बना ली जाती है कि उनका जन्म ही पुरुषों की सेवा के लिए हुआ है. बाद में इसी अवधारणा के शिकार कई पुरुष महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों में शामिल रहते हैं या महिलाओं की तरक्की पर उन पर तंज कसते हैं.
निर्देशक शेखर कपूर साल 1983 में उस समय के नए चेहरे नसरुद्दीन शाह और सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त शबाना आजमी के साथ फिल्म मासूम लेकर आए.
शेखर कपूर तब खुद इतना बड़ा नाम नही थे पर बाद में उन्हें इस फिल्म से जो विश्वास मिला, उसकी वजह से वह बैंडिट क्वीन, मिस्टर इंडिया और एलिजाबेथ जैसी फिल्में हमारे सामने लेकर आए.
गुलजार ने फिल्म मासूम की कहानी लिखी थी, इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा जगत में कुछ इस तरह का तहलका मचाया कि ये फिल्म साल 1984 के फिल्मफेयर पुरस्कारों में छा गई थी. मासूम ने फिल्मफेयर पुरस्कारों की चार श्रेणियों में अपना कब्जा जमाया, ये श्रेणियां थी- सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक, सर्वश्रेष्ठ गीतकार और सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका.
मासूम की कहानी यह सन्देश देती थी कि हर औरत के अंदर एक मां की ममता जन्म ले ही लेती है.
फिल्म में नसरुद्दीन शाह और शबाना आजमी का एक हंसता-खेलता परिवार होता है पर उस परिवार में तब दरार पड़ जाती है, जब इन दोनों को ये पता चलता है कि नैनीताल में नसरुद्दीन का दूसरी महिला से जन्मा एक और बच्चा है. शबाना और नसरुद्दीन के बीच की बढ़ती हुई दूरी को फिल्म में शानदार तरीके से फिल्माया गया है और इसके साथ ही दूसरी औरत के बच्चे की समझदारी भरी हरकतों से उसके प्रति ममता उड़ेलती शबाना ने दर्शकों का दिल जीता है.
निर्देशक ने छोटी-छोटी घटनाओं से ही पति-पत्नी और मां-बच्चों के बीच के रिश्तों को जिस तरह बुना है, वह हमेशा के लिए याद रखने वाला है.
शबाना आजमी एक गृहिणी के किरदार में पूरी तरह से डूबी हैं, फिल्म में बेहद ही खूबसूरत दिखी शबाना अपने अभिनय के जरिए इस फिल्म की जान कही जा सकती हैं. नसरुद्दीन शाह का साधारण दिखता चेहरा फिल्म में उनके द्वारा निभाए किरदार पर बिल्कुल सटीक बैठता है, एक अच्छे पिता और पति की भूमिका में नसरुद्दीन ने जिस तरह से रिश्तों की उलझनों को सुलझाया है वह हमेशा के लिए याद रखने लायक है.
सईद जाफरी भी फिल्म में अपने छोटे से किरदार के जरिए छाप छोड़ जाते हैं. उर्मिला मातोंडकर और आराधना श्रीवास्तव भी छोटी बच्चियों के रूप में प्रभावित करती हैं, उर्मिला ने 'पूत के पांव पालने में ही दिखने लगते हैं' कहावत को सही साबित किया है.
बाल जुगल हंसराज की मासूम आंखे ही शायद फ़िल्म का नाम 'मासूम' रखवा गई होंगी. इतनी मासूम आंखों वाले जुगल को हम साल 1995 में उनकी युवावस्था के दौरान आई फिल्म 'पापा कहते हैं' के लिए भी याद रखते हैं. जुगल हंसराज ने फिल्म 'मोहब्बतें', 'कभी खुशी कभी गम', 'सलाम नमस्ते', 'आ जा नचले', 'प्यार इम्पॉसिबल' और 'कहानी 2' में भी काम किया पर चेहरे और अभिनय का मेल न होने के कारण फिल्म मासूम में खिला यह फूल बॉलीवुड की गलियों में कभी इतनी महक नही छोड़ पाया.
मासूम का छायांकन बड़ा ही बेहतरीन था, फिल्म में नैनीताल की खूबसूरती को बड़े ही शानदार तरीके से कैद कर लिया गया था. नैनीताल की झील, पहाड़, इमारतें सब कुछ इस तरह से दिखाए गए कि आज भी लोग नैनीताल में फिल्माई गई सबसे बेहतरीन फिल्मों में 'मासूम' को पहले नम्बर पर रखते हैं.
फिल्म के संवाद बड़े ही प्रभावी थे, 'टूटा हुआ तारा देख लो तो जो भी मांगो मिला जाता है' संवाद आज भी वास्तविक माना जाता है.
'अगर मैं सिर्फ औरत होती तो ठीक था लेकिन मां भी तो हूं' संवाद, किसी महिला की एक मां होने की जिम्मेदारी को दिखाता है.
मासूम का संगीत आरडी बर्मन द्वारा तैयार किया गया था. फिल्म का संगीत इसकी कहानी को और भी अधिक खिंचाव भरा बनाने में कामयाब रहा था. इससे कहानी के दौरान ममता भरा माहौल पैदा होता था और फिल्म के गाने भी कुछ इसी तरह का काम कर गए.
इसका गाना 'दो नैना एक कहानी' एक मां के लिए उसके बच्चों को सुलाने का जरिया बन गया, 'लकड़ी की काठी' गाना सुनकर देश के बहुत से बच्चे बड़े हुए.
फिल्म का सबसे ज्यादा सुना गया गाना 'तुझसे नाराज नही जिंदगी' आज भी न जाने कितने ही लोगों की तन्हाई का साथी बना हुआ है.
'हुजूर इस कदर' गाने में जिस तरह का अभिनय हुआ है, वह फिल्म देखने का आनन्द चौगुना कर देता है, आजकल की फिल्मों के गानों में ऐसा अभिनय नदारद ही रहता है..
जब यह फिल्म आई तब समय ऐसा था कि टीवी या बड़े पर्दे पर दिखाए जाने वाले कंटेंट का असर दर्शकों पर कुछ ज्यादा ही पड़ता था. समाज बड़े पर्दे पर दिखाए जाने वाले कपड़ों, व्यसनों, रिश्ते के ताने-बाने, धार्मिक सीखों को बहुत जल्दी आत्मसात कर रहा था. फिल्म मासूम में शबाना आज़मी को अपने पति नसरुद्दीन को तैयार करते, पति के लिए चाय बनाते दिखाया गया है. एक पुरूष प्रधान समाज में तब की फिल्मों में दिखाए गए ऐसे दृश्यों से बहुत फर्क पड़ा, आज भी भारतीय परिवारों में खाना बनाना और बच्चों को तैयार करना सिर्फ महिलाओं का कर्तव्य समझा जाता है. यह कड़वा है मगर सत्य है कि हम अपने घर की बेटियों से बेटों को पानी पिलवाते हैं, उनके कपड़े धुलवाते हैं.
महिलाओं को शुरू से ही पुरुषों के मुकाबले कमजोर माना जाता है, यह अवधारणा बना ली जाती है कि उनका जन्म ही पुरुषों की सेवा के लिए हुआ है. बाद में इसी अवधारणा के शिकार कई पुरुष महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों में शामिल रहते हैं या महिलाओं की तरक्की पर उन पर तंज कसते हैं.
आज ओटीटी आने के बाद से स्थिति थोड़ी बदल रही है, ओटीटी पर आ रहे बहुत से कंटेंट महिला सशक्तिकरण पर वास्तव में अच्छा काम कर रहे हैं.
मासूम फिल्म में महिलाओं के आधुनिकीकरण को सिर्फ उनके द्वारा सिगरेट जलाने तक सीमित रखा गया है पर महिलाओं का वास्तविक आधुनिकीकरण उनको समाज में बेहतर माहौल देकर ही हो सकता है. यह माहौल उनको घर में या काम के दौरान सुरक्षित माहौल देकर मिल सकता है , जो मासूम फिल्म के सालों बाद भी उनको नसीब नही हुआ है.
हिमांशु जोशी.
@himanshu28may
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