Thursday, July 29, 2021

बारिश

इन बारिश की बूंदों से डर लगता है मुझे,
बचपन से ही भीग जाने से डर बहुत लगता है मुझे।

कभी इन बादलों के गरजते ही वो घर के बिखरे चिल्लरों और गेंहू को अपने पल्लू की गांठ में समेट लेते हैं, 
तो कभी घर के नन्हें हाथों से गांधी के चश्में वाले चित्रों की किताबें भी साथ ही समेट ली जाती हैं।
यह सब देख इन बारिश की बूंदों से डर लगता है मुझे।


अब भी जब बादल गरजता है, इस बारिश के डर से कहीं छुप जाते हैं वो अधबनी सड़क और नालों के अभियंता, पर उनकी जगह कच्ची सड़क, नाली पर चल मिट जाने के डर से इन इन बारिश की बूंदों से डर लगता है मुझे।

ज़िद है उनकी उस अंधे विकास की, तभी तो इस बारिश में दरकता है हिमालय,
कहीं पत्थरों, मिट्टी के मलबे में दफ़न न हो जाए कोई मेरे अपने ये सोच सोच कर इन बारिश की बूंदों से डर लगता है मुझे।

बारिश का पानी आया है, फिर नदियां और तालाब भरने लगेंगे।
ज़ोर से गरजेंगे बादल और कागज़ की कश्तियों के साथ बहते रहेगा उस बारिश का पानी,
इसलिए कल सूखे तालाबों और खाली बर्तन के साथ तड़पते लोगों को सोच इन बारिश की बूंदों से डर लगता है मुझे।

हिमांशु 

Wednesday, July 28, 2021

मीडिया की स्वतंत्रता ख़तरे में दिखती है तो पत्रकारिता पर रवीश की किताब 'बोलना ही है' पढ़ सकते हैं

पत्रकारिता पर रवीश की किताब कहती है कि एक डरा हुआ पत्रकार एक मरा नागरिक पैदा करता है वाक्य आने वाले स्वतंत्रता दिवस से पहले बहुत सारे सवाल खड़े कर जाता है, जो हमें खुद से पूछने चाहिए।
जिस बात के लिए भगत सिंह, महात्मा गांधी शहीद हुए थे क्या यह वैसा ही राष्ट्र है ! यदि हां तो 15 अगस्त को मिठाई जरूर खाइए।

भविष्य के पत्रकारों के पाठ्यक्रम वाली किताब है पत्रकारिता पर रवीश की किताब

पिछले कुछ समय से बोलना, सुनना और समझना बड़े ही संकट में जान पड़ रहा है।
'लंकेश पत्रिका' का संचालन करने वाली गौरी लंकेश 2017 में मार दी गई, भारतीय फ़ोटो पत्रकार दानिश सिद्दीकी को अफगानिस्तान में एक रिपोर्टिंग के दौरान मार दिया गया, श्याम मीरा सिंह को सबसे तेज़ 'आजतक' ने तेज़ी के साथ सिर्फ इसलिए नौकरी से निकाल दिया क्योंकि वह सोशल मीडिया पर 'लोकतांत्रिक देश' के प्रधानमंत्री के खिलाफ़ लिख रहे थे, खुलकर लिख-बोल रहे मीडिया घरानों में छापों की बात तो सबको पता ही है।

कमी लोकतंत्र की नीति बनाने वालों में नही कमी पत्रकारिता के रखवालों में जान पड़ती है। कहीं पत्रकारिता में शोध करने वाले को यह कह दिया जाता है कि शोध का माध्यम राष्ट्रभाषा हिन्दी में नही सिर्फ़ अंग्रेज़ी में होगा तो कहीं पत्रकारिता छात्रों के मन में इस बात पहले ही डाल दिया जाता है कि 'तेरा तो भविष्य ही नही'
पत्रकारिता के वर्तमान हालातों को गहराई से समझाने वाली क़िताबें पत्रकारिता कोर्स से ग़ायब हैं।
 नेट परीक्षा में पत्रकारिता के छात्रों से वह सवाल पूछे जाते हैं जो ब्रिटिश छात्रों से पूछे जाने चाहिए।

पत्रकारिता अब दो धड़ों में बंट चुकी है गोदी पत्रकारिता और 'लात मारो' पत्रकारिता। गोदी पत्रकारिता का मतलब आप जानते ही हैं, खूब सारे पैसे और अवार्ड तो लात मारो पत्रकारिता मतलब तंत्र के खिलाफ़ लिखने वाले पत्रकारों को कभी भी अपशब्द बोल दो ,उनके साथ मारपीट कर लो या उन्हें कभी भी नौकरी से निकाल दो।

ख़ैर एक क़िताब है जो भारतीय पत्रकारिता को गहराई से समझाती है और पत्रकारिता कोर्स में जरूर शामिल की जानी चाहिए।
रवीश कुमार की 'बोलना ही है', क़िताब है लोकतंत्र, संस्कृति और राष्ट्र के बारे में।

 रवीश एनडीटीवी समाचार नेटवर्क के हिंदी समाचार चैनल एनडीटीवी में संपादक है और गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार, रेमन मैगसेसे पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं। 'इश्क़ में शहर होना' को मिला 'बोलना ही है' इनकी पांचवीं पुस्तक है।



जो लोगों को दिखाया जाता है, वह उसे ही सच मानने लगते हैं

क़िताब की भूमिका ही आपको हिलाने के लिए काफ़ी है, जिसमें रवीश लिखते हैं साम्प्रदायिक बातें अब राष्ट्रवादी बताई जाने लगी हैं।
2019 विश्व कप भारत मोदी की क़िस्मत के कारण जीतने वाला है पर बेरोज़गारी बढ़ना उनके कारण नही है, ठीक वैसे ही जैसे आज कोरोना से हुई मौतों के लिए वह जिम्मेदार नही थे पर मीराबाई चानू के सम्मान समारोह में मीराबाई से बड़ी तस्वीर प्रधानमंत्री की लगी है।

मीडिया में थ्योरी है 'कल्टीवेशन थ्योरी' जो लोगों को दिखाया जाता है, वह उसे ही सच मानने लगते हैं। हो भी यही रहा है मुझे अलग-अलग धर्मों के अपने दो दोस्त याद आते हैं, दोनों पिछले कुछ समय से एक-दूसरे धर्मों के प्रति नफ़रत भरे पोस्ट करने लगे, मेरे उनकी इस नफरत का कारण पूछने पर दोनों के एक ही जवाब थे।
यूट्यूब पर देखी गई वीडियो।

भारत प्रेस की आज़ादी में इसलिए पिछड़ रहा है क्योंकि पाठक भी यही चाहते हैं। जो चैनल, अखबार सरकार की जितनी तारीफ़ करे उसकी उतनी अधिक रेटिंग।
युवा पीढ़ी पर अज्ञानता का बोझ लाद, साम्प्रदायिकता का चश्मा पहना दिया गया है।

मीडिया से असली मुद्दे नदारद

लेखक चाहते हैं कि जब हम अपनी समस्याओं के लिए मीडिया का मुंह ताकें तो बिकी हुई मीडिया न मिले।

बेरोज़गारी जैसे आंकड़े बाहर न आएं इस डर से 'वित्त मंत्रालय' ने मान्यता प्राप्त पत्रकारों को बगैर अप्वाइंटमेंट के अंदर आने से मना किया और इस पर कोई विरोध भी नही हुआ, लेखक इससे खासे नाराज़ दिखते हैं।

लेखक कहते हैं कि लोग उन्हें अपनी समस्याओं को उठाने के लिए फोन करते हैं पर देखते उन चैनलों को हैं जो उनकी समस्या कभी उठाते ही नही।

लेखक भूमिका में ही सब लिख देने का कारण बताते हैं कि भूमिका ही वह जगह है जहां किताबों को जला देने वाले लोगों की कम नज़र पड़ती है।

किताब कोरोना काल से पहले लिखी गई है और अब पत्रकारिता की हालत उससे बदतर हो चुकी है इसलिए मेरा प्रयास यह रहा है कि किताब की वर्तमान हालात से तुलना करते आगे बढूं।

लिखने के लिए हिम्मत जरूरी है

क़िताब लेखक की आत्मकथा ही सही पर पूरी भारतीय पत्रकारिता के बदलते परिदृश्य की कहानी भी है। 
जज लोया की मौत पर प्राइम टाइम कर बोल पाने के बाद जो रवीश के अंदर आंतरिक द्वंद पैदा हुआ उसे वह पहले पाठ में बोल गए हैं।
वह बताते हैं कि इतना बड़ा पत्रकार होने के बावजूद रोज़ सुबह उठने पर उनके अंदर नौकरी खोने का डर रहता है।

आईटी सेल की मदद से वाट्सएप यूनिवर्सिटी का जनता के बीच प्रभाव कितना बढ़ गया है, इसको लेकर वह युवाओं में नफ़रत का ज़हर किस कदर घुल गया है का उदाहरण देते हैं। 
इस ज़हर को मैं खुद एक दिन उत्तराखंड के किसी फ़ेसबुक पेज़ पर झेल चुका हूं जब एक युवा को उत्तराखंड के जाने माने पेज़ में साक्षात्कार के लिए बुलाया जाना था पर अन्य युवा उसके धर्म विशेष से जुड़े होने पर उसे साक्षात्कार हेतु बुलाए जाने का विरोध करने लगे थे, जब मैंने इसके खिलाफ़ आवाज़ उठाई तो मुझे भी भला-बुरा कहा गया। मेरे समझ यह नही आया कि पहाड़ की शांत वादियों के युवाओं में आख़िर यह ज़हर आया कहां से!
शायद ज़हर फैलाने के लिए सस्ते कर दिए गए इंटरनेट से!

लेखक द्वारा महिलाओं के द्वारा राजनीतिक मसलों पर न लिखने की बात कही गई है, जिसे मैंने 'जनज्वार' की वीडियो समीक्षा में खुद महसूस किया है।
किसी राजनीतिक वीडियो पर महिलाओं की टिप्पणी न के बराबर होती है।

लेखक लिखते हैं कि फोन करने पर अधिकारी, मंत्री फ़ोन पर नही अभी वाट्सएप कॉल करते हैं कहते हैं, उनका वह डर आज किताब आने के बाद पैग़ासुस के रुप में सच ही साबित हुआ है।

रवीश ने आजकल बहुत से बड़े अखबारों में लेख के न छपने की बात लिखी है, मैं खुद यह सब महसूस करता हूं। बस गिने-चुने वेब पोर्टल्स और अख़बार आजकल सच लिख भेजा छापते हैं नही तो अधिकतर को बस 'कम चुभने वाले' समाचार ही भाते हैं।
जब आप सरकार पर सवाल करती ख़बर पढ़ेंगे ही नही तो उनका झूठ कैसे पकड़ेंगे और जब झूठ पकड़ेंगे ही नही तो वोट तो अपनी 'सच्ची' सरकार को ही देंगे।

फेक न्यूज़, समस्या बड़ी है

'फेक न्यूज़' से जनता पर पड़ रहे प्रभाव पर चर्चा करते वह गुजरात की एक घटना का उदाहरण देते हैं। 
फेक न्यूज़ सोची-समझी साजिश के तहत आपको नागरिक से रोबोट बना रही है।
सुमित्रा महाजन की पत्रकारों को सलाह का उदाहरण पत्रकारों को सिर्फ़ जी हुजूरी करने का फ़रमान है।

फेक न्यूज़ से नफ़रत पालने वाली फ़ौज वर्चुअल नही हमारे बीच तैयार हो गई है पंक्तियां आने वाले खतरे से आगाह कराती हैं।
महान बनाने का सपना बहुत खतरनाक है, वही सपना जो महान अमरीका और फ्रांस को भी दिखाया गया है। पूरी दुनिया हिटलर के महान जर्मनी बनाने वाले सपने की ओर अग्रसर है। हिटलर ने जो नफ़रत के बीज बोए थे वह अब भी बोए जा रहे हैं, उसकी बदला लेने की राजनीति अब भी हो रही है।
कभी आप दीदी की मिमिक्री सुनते हैं तो कभी पप्पु वाले व्यंग्य।
एक नेता की सोच पर लाखों यहूदियों को मारा गया था, उसमें मारने वाला सिर्फ़ हिटलर नही था उसकी सोच से प्रभावित नागरिक भी थे। अमरीका, अफगानिस्तान, चीन, भारत , फ्रांस सहित पूरी दुनिया में भी आज वही हो रहा है। 
निर्दोषों को भीड़ द्वारा घेरकर मारे जाने की खबरों से आप अनजान नही हैं , नक्सलवाद हो या रंगभेद सब एक ही सोच का परिणाम होते हैं।

लेखक ने टीवी, वाट्सएप पर इतिहास को लेकर ज्ञान बढ़ाने से बेहतर लाइब्रेरी में बैठने को बताया है।
वह लिखते हैं कि प्रधानमंत्री और मुख्यमन्त्रियों के खिलाफ़ लिखने भर से कितने ही लोगों को जेल डाल दिया गया है, क्या यही लोकतंत्र है!
सच बोलने पर जेल के भय को समाप्त किया जाना चाहिए, महात्मा गांधी ने भी यही किया था।
 लिखने का गला घोंटने पर कानून बनाए जा रहे हैं पर लिखिए आप तंत्र से ऊपर हैं, यही लोकतंत्र है।

पत्रकारिता वो जो समाज सुधारे

मज़बूत नेता और नेता का अंतर भी किताब पढ़ने पर समझ आता है, महात्मा गांधी के चारों और अम्बेडकर, सभाष चन्द्र बोस, नेहरू और पटेल थे पर आज के 'मज़बूत' नेता के पास दूसरों की बुराइयां हैं। नेता वही है जो सबको साथ लेकर चले।

फिल्मों से समाज बहुत कुछ सीखता है पर भारतीय फिल्मों ने कभी ऐसे मुद्दों को छुआ ही नही जिससे जाति-धर्म की दूरियां खत्म हों, वह बस सुंदरता और अमीरी-गरीबी ही बेचने में रहे।
पत्रकारिता पर रवीश की किताब इश्क़ जैसे अनछुए मुद्दे पर भी प्रकाश डालती है कि  इश्क़ के लिए हमारे समाज में जगह ही कितनी है। हमने लव पार्क कितने बनाए हैं!
अंकित सक्सेना की मौत का जिम्मेदार हमारा समाज ही है। अंत में सब राजनीतिक रंग में रंग दिया जाता है।
वह सब हत्यारें हैं जो इन मुद्दों पर इंटरनेट पर नफ़रत भरी टिप्पणी करते हैं, जोड़ों को पार्क में पीटते हैं, क्या यही आज़ादी थी!

24 अगस्त 2017 को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने निजता को मौलिक अधिकार बताया था। पैग़ासुस, ट्विटर विवाद, आरोग्य सेतु और आधार कार्ड अनिवार्यता! क्या हम उस अधिकार का प्रयोग कर पाए हैं! क्या सरकार हमारे मौलिक अधिकार की सुरक्षा करने में सक्षम हुई?
किताब में लिखी पब्लिक स्पेस में निजता समाप्त नही होगी वाली बात गौर करने लायक है।

हम जागरूक नही होंगे तो मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ नही , राजनीतिक पार्टियों का पहला स्तम्भ बन जाएंगे।
1949 में लिखी जॉर्ज ऑरवेल के उपन्यास '1984' की 'विचार पुलिस' जल्द हमारे ऊपर कब्ज़ा कर लेगी। इसका उदाहरण देते रवीश 2019 में फ़ेसबुक पर बने 'क्लीन द नेशन' पेज़ के बारे में बताते हैं, शायद किताब में इसके बारे में पढ़कर आपकी आंखें खुली रह जाएं।

खैरात में नही बंटता लोकतंत्र

लोकतंत्र के महत्व को समझना है तो हांगकांग के संघर्ष को देखिए, उस कश्मीर को देखिए जहां सूचनातंत्र बंद होने पर भी हम शांत थे ।
मेनस्ट्रीम मीडिया लाठी खा रहे लोगों की खबरें नही दिखाता।
इस मुख्यधारा मीडिया में पैग़ासुस का बाज़ार मंदा हो गया है जबकि ऐसी जासूसी पर मीडिया ने आरोपियों को बेनकाब करना चाहिए था, चंगा हो रहा है तो राज कुंद्रा की पोर्न का मामला। 
बन्दा मिला है ख़बर बनाने के लिए जमकर बनेगी, वरना सुना बहुत बार है कि सरकार ने पोर्न साइट्स पर प्रतिबंध लगाया है।
एक बार गूगल पर 'पोर्न' लिख कर तो देखिए राज कुंद्रा को भूल जाएंगे।

 एक डरा हुआ पत्रकार एक मरा नागरिक पैदा करता है वाक्य आने वाले स्वतंत्रता दिवस से पहले बहुत सारे सवाल खड़े कर जाता है, जो हमें खुद से पूछने चाहिए।
जिस बात के लिए भगत सिंह, महात्मा गांधी शहीद हुए थे क्या यह वैसा ही राष्ट्र है ! यदि हां तो 15 अगस्त को मिठाई जरूर खाइए।

सही सूचना सुनें, देखें और पढ़ें

पत्रकारिता पर रवीश की किताब कहती है कि सूचनाओं की प्रमाणिकता जरूरी है और उसके लिए मुख्यधारा मीडिया से परे नागरिक पत्रकारिता का शुरू होना भी।
 फ़ेसबुक के एक पेज़ पर मुझे नफ़रत पाले युवाओं को देख दुख हुआ था तो कुछ पेज़ो पर नाज़ भी है, जहां कभी किसी युवा के स्वरोज़गार अपनाने की ख़बर को सकारात्मक रूप से दिखाया जाता है तो कभी जात-पात और धर्म से परे एक दूसरे की मदद वाली ख़बरों को फैला समाज़ में अच्छा सन्देश दिया जाता है।
वहां समय-समय पर अपने शहर-गांव में ख़राब सड़क बनाने वालों के साथ बिन सड़क पूरी किए टोल वसूलने वालों को घेरा भी जाता है।
यही तो नागरिक पत्रकारिता है।

गांधी जी का वक्तव्य इन टीवी चैनलों , अखबारों के लिए ठीक बैठता है "आप इन निकम्मे अखबारों को फेंक दें। कुछ ख़बर सुननी हो, तो एक दूसरे से पूछ लें।
अगर पढ़ना ही चाहें, तो सोच-समझकर अख़बार चुन लें, जो हिन्दुस्तानवासियों की सेवा के लिए चलाए जा रहे हों। जो हिन्दू और मुसलमान को मिलकर रहना सिखाते हों।"

पुस्तक- बोलना ही है।
लेखक- रवीश कुमार
प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन
मूल्य- 206
रेटिंग- 4.5/5

हिमांशु जोशी , उत्तराखंड।


Thursday, July 22, 2021

वो लोकलाश थी, हम ढोते चले गए।


वो एचमटी की घड़ियों के कलपुर्जों सा ही बिखरा था, 
वो तब का भारत था जो टूट कर पाक, हिन्द बना ।
असल में वो लोकलाश थी, जिसे हम ढोते चले गए।

वो नेहरू से बढ़ता भारत था तो हल चलाते किसान से खिंचता भारत भी था।
असल में वो लोकलाश थी, जिसे हम ढोते चले गए।

बात कुछ पुरानी थी जब कागज़ों से लिखी आज़ादी की कहानी थी, वो क़लम थी जिससे अम्बेडकर ने लिखी संविधान की कहानी थी।
असल में वो लोकलाश थी, जिसे हम ढोते चले गए।

सवाल या तंज उस संविधान पर नही है कमबख्तों, सवाल उससे है जो आपातकाल में भी मुँह छिपाए बैठा था।
हां वो असल में वो लोकलाश थी, जिसे हम ढोते चले गए।

फिर दौर आया नए जमाने का, दुनिया को अपनी ताकत दिखाने का। 
पर गोधरा, लोया, गौरी लंकेश, दामिनी पर भी वो हमें चकराते शांत थी,
असल में वो लोकलाश थी, जिसे हम ढोते चले गए।

अब जब दिल्ली जली, लाशें जली फिर भी यहां शांति थी।
असल में वो लोकलाश थी, जिसे हम ढोते चले गए।

आवाज़ उठाई किसी ने कोई दानिश था तो कोई भास्कर,
दिखाया तुम्हें कि वास्तव में वो दीए नही चिताए जल रही थी, वो थाली- ताली बज नही बल्कि चूड़ियां टूट रही थी।

पर तुम शांत थे, जैसे कुछ हुआ ही नही।
सिर्फ खुद से कुछ होने का जैसे मानो तुम्हें इंतज़ार है, 
भूल गया मैं ये लोकतंत्र नही असल में वो लोकलाश थी, जिसे हम ढोते चले गए।


Friday, July 16, 2021

पुस्तक समीक्षा : ख़ाकी में इंसान, पुलिस 'वाला' / ठुल्ला से पुलिसकर्मी कहने का संदेश देती एक आत्मकथा।

पुस्तक- ख़ाकी में इंसान
लेखक- अशोक कुमार ,साथ में लोकेश ओहरी।
प्रकाशन- राजकमल पेपरबॉक्स
मूल्य-199
रेटिंग- 4/5


अगर आप ऐसी किसी ख़ालिस किताब के बारे में सोच रहे हैं जो आपको साहित्यिक पाठ पढ़ाए या आपकी राजनीतिक विचारधारा को बदले तो आप ग़लत जगह हैं।

सड़क में आप कई बार ख़ाकी की तरफ से खुद को रोके जाने पर उससे भिड़े होंगे। 
नाटकों में बिन दाढ़ी बनाए इन्स्पेक्टर के 'सिपाही साहब के लिए कुर्सी लगाओ' आदेश पर खुद को वही इंस्पेक्टर समझ इतराए होंगे या अस्त व्यस्त वर्दी पहने फ़िल्मी आईपीएस को दो कारों के बीच टांग फ़ैलाए देखने से खुद को रुबिनहुड या दबंग समझे होंगे पर सच यह है कि आप वास्तविकता को नही जानते।

उत्तराखंड पुलिस के डीजीपी की पहली किताब जो उनकी डायरी से निकले अनुभवों से बनी आत्मकथा के रूप में है ,आपको मेरी तरह सात से आठ घण्टे लगातार बांधे रह सकती है।
जिसके लिए अशोक कुमार कहते हैं कि इसे लिखने के लिए उन्हें वी•सी•गोयल की पुस्तक 'द पॉवर ऑफ इथिकल पुलिसिंग' से प्रेरणा मिली और इस पुस्तक को सजाने के लिए वह हिंदी के प्रसिद्ध लेखक लक्ष्मण सिंह बटरोही को धन्यवाद देते हैं।
यह ऐसी किताब है जिस पर वास्तविक हालातों को दिखाते हुए 'दबंग' से ज्यादा हिट हिंदी फिल्म बनाई जा सकती है।

गांव से आईआईटी का सफ़र करने वाले अशोक के मन में भारत के अमीर-गरीब की दूरी को पाटने का एक ही समाधान सिविल सर्विसेज था और वह उससे जुड़ गए। 
किताब में लेखक ने अपनी इसी नौकरी के अब तक मिले अनुभव को सोलह भागों में बांटा। 

वह अपनी नौकरी के शुरुआती दिनों में आई मुश्किलों से आगे बढ़ते धीरे-धीरे खुद को समाजहित में समर्पित कर देते हैं।

हर पाठ की शुरुआत किसी मशहूर कविता, गद्य काव्य या लेखक की डायरी में लिखी कुछ पंक्तियों से की गई है जो यह स्पष्ट कर देती हैं कि आने वाला पाठ किस ओर रुख मोड़ेगा, उदाहरण के तौर पर भूमाफियाओं पर तंज कसने के लिए टॉलस्टॉय की कहानी के किरदार पाहोम के लिए इस्तेमाल की गई पंक्ति।

पहले ही पाठ में लेखक अपने ही सिस्टम से लड़ते पीड़ित को जिस तरह न्याय दिलाते हैं वह अन्य युवा अधिकारियों के लिए भी उदाहरण है।
आगे लेखक पुलिस के अंदर अंग्रेज़ी शासन के प्रभाव और एक आम आदमी को साहेब बना देने पर भी चर्चा करते हैं।

ट्रेनिंग में किताबों से वास्तविक परिस्थितियों से परिचय कराता सफ़र लेखक को बहुत कुछ सिखाता है और वह उसे जनता को भी समझाना चाहते हैं, जैसे रजिस्टर नम्बर आठ का वर्णन।

'कहीं-कहीं तो बैलों की जगह जुता हाड़मांस का पिंजर इंसान' जैसी पंक्तियां साहित्यिक तो वहीं आम बोलचाल की भाषा को जस को तस लिखी 'यदि अधिकारी बनकर तने रहोगे तो जिंदगी पर कुछ नही सीख पाओगे' पंक्ति दिल को छू जाती हैं।

अपहृत की स्थिति बताने के प्रयोग की गई पंक्ति 'पानी की कमी से उनके होठों पर पपड़ियां जम गई थी और उनके चेहरे पर मौत का खौफ़ साफ़ झलक रहा था' अपहृत की स्थिति का वास्तविक चित्रण करती है।

महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों की बहुत सी घटनाओं पर लिखा गया है और साथ ही उसमें प्रयोग की जाने वाली धाराओं से परिचय भी कराया गया है।
पंचायत के फरमान पर सोलह लोगों द्वारा महिला से किए गए सामूहिक बलात्कार की घटना हमारे समाज में आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी हो रही तालिबानी हुकूमत को दिखाती हैं।
छोटी लड़की के साथ हुए घृणित कार्य वाले किस्से में समाज में रक्तदान को लेकर व्याप्त भ्रांतियों को भी दूर करते सामाजिक सन्देश देने की कोशिश भी की गई है।

वर्तमान पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में तीन दशक पूर्व शुरू हुए आतंकवाद को ख़त्म करने के अपने अनुभवों को याद करते लेखक बताते हैं कि जनता और पुलिस एक दूसरे के सहयोग बिना अधूरी है।

आतंकियों के परिवार या आतंक का रास्ता छोड़ चुके इंसान पर पुलिस की तलाशी का क्या फ़र्क पड़ता है और खुद पुलिस तब क्या सोचती है यह आप क़िताब पड़ जान सकेंगे। 
साथ ही आतंकवादी रह चुके आदमी से मिलते समय उसके और उसके परिवार के बीच पैदा हुआ खौफ़ लेखक को अपने शहीद पुलिस अधिकारी के परिवार की याद दिलाता है, यह वृतांत भावुक करता है।

हरिद्वार हो या मथुरा की कहानी लेखक अपने अनुभवों को जिस तरह लिखते हैं वह रोचकता तो बनाए ही रखते हैं साथ ही समाज में पुलिस की भूमिका को भी स्पष्ट करते हैं।
इन अनुभवों को पढ़ते ही क़िताब आगे बढ़ती है और पाठकों को बांधे रखती है।
किसी भी नए पाठ, विषय या घटना को शुरू करने से पहले लेखक ने उसकी पृष्टभूमि भी भलीभांति समझाई है।

'सड़क पर पड़ रही डकैती' खबर का इस्तेमाल जस का तस करना लेखक की वर्तमान व्यवस्था पर चोट पहुंचाने की कला है।

साहब और सन्तरी के बीच की दूरी कविता से शुरु हुआ अंतिम पाठ पुलिस और समाज के सम्बंध को पूरी तरह से हमारे सामने रख देता है।

अक्सर पुलिस के भ्र्ष्टाचारी कहलाने पर पर वह पुलिस का पक्ष रखते हैं जो प्रभावित करता है।
ठुल्ला, निठल्ला जैसे तंज सुनते रहने का वह पुलिस की कठिन ड्यूटियों का हवाला देते जवाब देते हैं तो पुलिस पर पड़ रहे राजनीतिक प्रभावों पर भी पूरी तरह से स्थिति स्पष्ट कर देते हैं।

किताब का उद्देश्य कि आम आदमी पुलिस के अंदर झांक उसके बारे में सब समझ सके भी अब पूरा हो जाता है।

यह किताब आपको रह रहकर बिकरु कांड की याद दिलाएगी तो अपने थाने चौकियों में लगे चक्कर भी आपको याद आ जाएंगे।
उस ख़ाकी में इंसान को जिसके पास कोई जाना नही चाहता पर उसकी जरूरत हर किसी को है जानने के लिए यह किताब जरूर पढ़नी चाहिए।






Thursday, July 8, 2021

हमने तस्दीक कर लिये हैं वो लोग जो हमें गले लगने से रोकते हैं।

इतनी नफ़रत है फ़िज़ाओं में भी अब यहां कि मुर्दों पर भी तंज कसे जाते हैं,

लेकिन हमने तस्दीक कर लिये हैं वो लोग जो हमें गले लगने से रोकते हैं।

वो दिलीप था या युसुफ अब ये सवाल उठाते हैं,
अरे अहमक़ वो सिर्फ़ भारत था।

वो भारत जो तुमने-हमने नही बांटा, जिसे तोड़ा गया था।

गांधी के बाद वो पहला था जो रिश्तों की डोर बांधे हुआ था,
क्योंकि वो निशान-ए-इम्तियाज भी था वो पद्म विभूषण भी था।

पता है तुम्हें अब हमें कौन जोड़ेगा, क्या वापस लौटेगा वो जिसे कभी ट्रेनों में लाशों के साथ लाद अटारी के आर-पार भेजा गया था।

क्या ये देश है उन वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का जो उनकी बनाई नफ़रत की दीवार तोड़ेंगे।
क्या हम कभी सचिन, शोएब, तमीम को नीली जर्सी में एकसाथ खेलते देखेंगे।

मुझे तो अब ये सम्भव नज़र नही आता क्योंकि इतनी नफ़रत है फ़िज़ाओं में भी अब यहां कि मुर्दों पर भी तंज कसे जाते हैं,
लेकिन हमने तस्दीक कर लिये हैं वो लोग जो हमें गले लगने से रोकते हैं

हिमांशु।

ख़त्म नही हुआ अभी यहां कुछ क्योंकि वो हमारे बीच हमेशा जिंदा हैं वही यूसुफ है वही दिलीप है,
वही भारत है वही पाकिस्तान है, कश्मीर, ढाका, इस्लामाबाद एक हैं।

बस एक बार नफ़रत की दीवार गिरा कर तो देखो।

Monday, July 5, 2021

उत्तराखंड की कहानी, दिल्ली के दरबारियों की प्रयोगशाला उत्तराखंड।

उत्तराखंड के सियासी हाल की कहानी को आप कहां से समेटना पसंद करेंगे! चलिये शुरू से ही शुरुआत करते हैं। उत्तराखंड के भाग्य में अब तक आया हर मुख्यमंत्री गद्दी संभालते ही बेलगाम 'ब्यूरोक्रेसी' पर नियंत्रण करने के इरादे तो जाहिर करता रहा, लेकिन ऐसा हो नहीं सका। इस मामले में मरहूम नारायण दत्त तिवारी अपवाद की तरह नजर आते हैं, जिन्होंने उत्तराखंड के विकास के लिए नौकरशाही को नियंत्रित करते हुये ​नवनिर्मित राज्य के विकास की बुनियाद रखने का काम किया।

बेरोज़गारी की बेरहम लपटों में घिरे सूबे के लिये तिवारी कार्यकाल में सिडकुल की स्थापना महत्वपूर्ण निर्णय रहा है। इस तरह के विकास कार्य कर कोई नेता उत्तराखंडवासियों के बीच लोकप्रिय होता, तब शायद दिल्ली सूबे की सियासत में हस्तक्षेप करने से कतराती, लेकिन यहां तमाशे ही ज्यादा दिखते हैं। 20 साल में 11 मुख्यमंत्री! इसे आप क्या कहेंगे! नारायण दत्त तिवारी के बाद एक दौर भुवन चंद्र खंडूरी का याद आता है, जिनकी लोकप्रियता इतनी थी कि वह खुद ही चुनाव हार गये। बाकी बीच में आयाराम-गयाराम वाले मुख्यमंत्री ही याद आते हैं।

https://twitter.com/uttarakhand/status/1410995904870453248?s=20

शायद भारत में उत्तराखंड एकमात्र ऐसा प्रदेश है, जहां कपड़ों की तरह मुख्यमंत्रियों को बदला जा रहा है। भाजपा हो या कांग्रेस प्रदेश की सियासत के फरमान दिल्ली से ही जारी किए जाते हैं, जो इस छोटे से पहाड़ी राज्य से खिलवाड़ ही ज्यादा नजर आता है। ऐसा लगता है कि जनता को राजनीतिक दलों ने बहुत पहले ही हाशिए पर छोड़ दिया और इस सूबे को अपने सियासी प्रयोगों की जमीन में तब्दील कर दिया है। ऐसा लगता है जैसे उत्तराखंड नेताओं की अतिमहत्वकांक्षा का अड्डा बन गया है, जहां सूबे के संसाधनों पर नियत्रंण के लिये ही हर पार्टी का नेता रेस लगा रहा हो! आपको लगता है कि ऐसा नहीं है, तब आप इस सूबे का छोटा सा राजनीतिक इतिहास खंगालने की कोशिश कर सकते हैं। 

अपने इस्तीफे में उन्होंने लिखा कि आर्टिकल 164-ए के हिसाब से उन्हें मुख्यमंत्री बनने के बाद छह महीने में विधानसभा का सदस्य बनना था, लेकिन आर्टिकल 151 कहता है कि अगर विधानसभा चुनाव में एक वर्ष से कम का समय बचता है, तब उप-चुनाव नहीं कराए जा सकते हैं। यह कोरी गप्प है, जिसे सूबे का हर बाशिंदा बखूबी जानता है। बजाय कि अपनी कमियों के संवैधानिक मजबूरी की आड़ लेना हास्यास्पद स्टंट है। सवाल यह भी उठता है कि संविधान कोई तीरथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद तो लिखा नही गया, जब यह सब पहले से ही पता था, तब उन्हें मुख्यमंत्री बनाया ही क्यों गया! असल में इसके पीछे भी भाजपा की आंतरिक गुटबाजी ही प्रमुख रही और जब पार्टी को लगा कि तीरथ रेस का वो घोड़ा नहीं हैं, जिन पर दांव लगाया जा सके, तब बड़ी चालाकी से संवैधानिक कारणों को आगे कर दिया गया। यह सूबे के बाशिंदों का सामूहिक दुर्भाग्य ही कहलाएगा कि पूर्ण बहुमत देने के बाद भाजपा ने जनता को हाशिए पर धकेल दिया है। चुनावी वर्ष में प्रवेश से पहले सरकार भीतरघात से ही ज्यादा जूझ रही है।

सिर्फ विवाद जो याद रहेंगे!


तीरथ के पिछले चार महीनों के कार्यकाल को देखें तब त्रिवेंद्र सिंह रावत के कुम्भ में आने वाले लोगों के लिए आरटी-पीसीआर निगेटिव रिपोर्ट जरूरी वाले निर्णय और गैरसैंण को कमिश्नरी बनाने वाले निर्णय को स्थगित कर हंगामे के अलावा उनके हिस्से महिलाओं के पहनावे पर अभद्र टिप्पणी ही याद रह जाती है। तीरथ सिंह रावत के बाद मुख्यमंत्री कौन के सवाल पर कुछ समय अनिश्चय की स्थिति बनी रही और अंत में खटीमा से दो बार के युवा विधायक पुष्कर सिंह धामी के नाम पर मुहर तो लग गई, लेकिन पार्टी के भीतर कलह का दौर जारी है।

हरक से नहीं जनता से हो रहा है धोखा


सूबे के अखबारों में हरक सिंह रावत के बगावती तेवर अभी से दिखने लगे हैं। वो इसे खुद के साथ 'धोखे' और पार्टी की ओर से अविश्वास जैसी स्थिति बता रहे हैं, लेकिन वो सूबे की जनता को मिल रहे धोखों का जिक्र करना भूल जाते हैं। वो भूल जाते हैं कि पहाड़ की जनता ने उन्हें बिना शर्त लंबे वक्त से सिर आंखों पर बिठाया हुआ है। वो जब खुद की महत्वकांक्षाओं को जाहिर करते हैं, तब वो हजारों बेरोजगार नौजवानों की आंकाक्षाओं को भी कुचल रहे होते हैं।

सत्ता के इस खेल पर वरिष्ठ पत्रकार और पर्यावरणविद राजीव नयन बहुगुणा ने पहाड़ी भाषा में लिखा-

जेठ बिते , चौमासू ऐगे , भैर लग्यूँ बसकाळ

हरक फ़र्किगे , खंडुडी खँडेगे , खौळीगे सतपाल 

बड़ा बड़ों न मथेण्ड पकड़ी , धम धम आये धामी

सबकू भड्डू धरयूँ रैगे , चपट फुकेगें दाळ। ।

जिसका हिंदी अर्थ है जेठ का महीना बीत गया, मानसून आ गया और तेज़ बरसात हो गई।

हरक गिर गए, खंडूरी धंस गए और सतपाल आग बबूला हो गए।

बड़ों-बड़ों ने अपना माथा पकड़ लिया जब धमाके के साथ धामी आ गए।

इन सबका बर्तन चूल्हें में ही रह गया और सबके सामने ही उनकी दाल जल गई।


मीम्स जो बन गए राज्य का सच

सोशल मीडिया पर उत्तराखंड की राजनीति को लेकर तरह-तरह के मीम्स साझा किए जा रहे हैं, जो सूबे की स्थिति पर इस दौर के मारक व्यंग्य है। साल 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग होने के बाद हमेशा से अपने विकास की जगह राजनीति को लेकर देशभर में चर्चित रहने वाले इस राज्य का भविष्य अब भी अधर में ही ज्यादा लटका हुआ दिखता है। एक लंबी लड़ाई के बाद पहाड़ियों का सपना अधर में लटके उस घड़े की तरह है, जिसे फोड़कर उत्सव का आगाज करने की तैयारी तो है, लेकिन ये उत्सव राज्य के बाशिंदों के लिये कभी आ ही नहीं सका।

https://twitter.com/FakirHu/status/1411352184122351616?s=20

इतिहास में दफ्न सपने और सियासत


इतिहास में झांके तब साल 1897 में इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया के समक्ष कुमाऊं को प्रान्त का दर्जा देने की मांग पहली बार रखी गई। नए मुख्यमंत्री के शहर खटीमा में ही दो सितंबर 1994 को पृथक राज्य के लिए जुलूस निकाल रहे आंदोलनकारियों पर पुलिस ने फायरिंग की, फिर आंदोलन की यह आग पूरे उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली तक फैल गई। 15 अगस्त 1996 को तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा ने लाल किले से उत्तराखंड राज्य बनाने की ऐतिहासिक घोषणा की, जिसके बाद 9 नवम्बर 2000 को यह राज्य बना। लंबी लड़ाई के बाद मिले राज्य को लेकर जनता ने जिस तरह की उम्मीदें पाली थी, वो अब नेताओं के विकास के जुमलों का अंश बन चुके हैं। 

रबर स्टाम्प वाले मुख्यमंत्री


जानकार उत्तराखंड में दिल्ली से बनाए जाते इन मुख्यमंत्रियों को सिर्फ रबर स्टाम्प वाला मुख्यमंत्री मानते हैं। कारण, छोटे राज्यों के नेताओं को दिल्ली दरबार में कम भाव मिलना और अधिकतर निर्णयों की दिल्ली पर निर्भरता ही अब तक देखने को मिली है। अब मौजूदा मुख्यमंत्री की लोकप्रियता को ही सूबे में नापा जाये तब मुझे मेरे दूधवाले की बात याद आती है, जिसका कहना था- 'पुष्कर सिंह धामी गढ़वाल से आते हैं!' असल में यही सच भी है कि मौजूदा मुख्यमंत्री के बारे में राज्य के एक बड़े हिस्से की जनता कुछ भी नहीं जानती। वो परंपरा का निर्वहन करते हुये दिल्ली से थोप दिये गये हैं।  

बड़े दिग्गजों की जमीन विवेकहीन कैसे हो गई!


गोविंद वल्लभ पन्त, हेमवती नन्दन बहुगुणा और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के तौर पर अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाले एकमात्र नेता नारायण दत्त तिवारी जैसे राजनीतिक दिग्गजों ने उत्तराखंड से निकल अपनी छाप पूरे देश में छोड़ी थी। तमिलनाडु में अम्मा कैंटीन, अम्मा फार्मेसी जैसी योजनाएं चला जयललिता जिस तरह लोकप्रिय हुई, ठीक वैसे ही उत्तराखंड में नारायण दत्त तिवारी लोकप्रिय हुये थे, लेकिन उनके बाद कोई भी मुख्यमंत्री अपना कार्यकाल ही पूरा नहीं कर सका। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि लोकप्रिय होने का दावा करने वाले नेता असल में कितने कमजोर हैं!

नेता मस्त और जनता त्रस्त।


अब इसके उलट जरा नेताओं की शानो शौकत और सुविधाओं को सुरक्षित करने की जंग पर नजर डालें! एक ओर सूबे में ​आए दिन सियासी संकट के चलते जनता त्रस्त है और दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्रियों को दी जाने वाली सुविधा को लेकर सरकार का अड़ियल रुख जारी है। हिंदुस्तान की एक ख़बर से पता चलता है कि पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी आवास के किराए में राहत दिलाने को लेकर, अब सरकार सुप्रीम कोर्ट में विशेष रिट याचिका दायर करेगी। मामला यह है कि उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्रियों को राज्य सरकार की ओर से आवास, गाड़ी समेत कई तरह सुविधाएं मिलती थी। साल 2019 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि पूर्व मुख्यमंत्रियों को सभी सुविधाओं का किराया बाजार भाव से देना होगा। हाईकोर्ट ने सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों से छह महीने में पूरा पैसा जमा करने का आदेश दिया था।

समाज सेवा या लूट का मेवा


साल 2018 में हिंदुस्तान में एक ख़बर आई कि उत्तराखंड के विधायक भी अब मालदार हो गए हैं। विधायकों के वेतन भत्तों में कुल 120 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की गई थी। विधेयक के तहत विधायकों के लिए होम लोन की सीमा 30 लाख से बढ़ाकर पचास लाख कर दी गई। यह वही समय था जब उत्तराखंड में बेरोज़गारी की दर तेज़ी से बढ़ रही थी। पिछले पांच सालों में उत्तराखंड की बेरोजगारी दर छह गुना से ज्यादा बढ़ गई है। कोरोना महामारी के दौरान इसमें सबसे तेजी से वृद्धि हुई। लॉकडाउन के बाद कामकाज ठप होने और काम के अभाव में घर लौटे प्रवासियों के चलते प्रदेश में अब जबकि बेरोजगारी बेकाबू हो चुकी है, तब सरकार की ओर से राहत के बजाय सियासी खेल ही जनता को तोहफे में दिया जा रहा है।

मुख्यमंत्री बनते ही पुष्कर सिंह धामी ने देहरादून स्थित उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी शहीद स्मारक पर जा पुष्पांजलि अर्पित की और ट्वीट कर शहीदों के सपनों का राज्य बनाने की बात तो कह दी, लेकिन वो कम समय में ऐसा किस जादू की छड़ी से करेंगे, यह बताना भूल गये। इसके इतर कोरोना महामारी की तीसरी लहर दरवाजे के करीब है और रोजगार का संकट अभूतपूर्व स्थितियों में पहुंच गया है। 

https://twitter.com/pushkardhami/status/1411361627648061445?s=20

राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच कैसी है कोरोना के खिलाफ़ जंग


उत्तराखंड में अप्रैल माह में हुए कुम्भ के बाद कोरोना तेज़ी से फ़ैला। 13 अप्रैल 2021 को कोरोना से हो रही मौत दो अंकों तक पहुंची और 17 मई को यह आंकड़ा एक दिन में 223 तक भी पहुंचा। इस दौरान प्रदेश में हुआ देश का सबसे बड़ा कोविड टेस्ट घोटाला भी अब सामने है। रिपोर्ट्स के मुताबिक इसमें सरकार द्वारा अनुबंधित जांच प्रयोगशालाओं ने कम से कम कोविड की एक लाख फर्जी रिपोर्ट जारी की हैं।

बुरे हाल में है स्वास्थ्य सुविधाएं

यहां उत्तराखंड हाईकोर्ट में दायर नवनीश नेगी की याचिका पर भी ध्यान देना जरूरी है, जहां उन्होंने अपनी याचिका में कोर्ट का ध्यान पौढ़ी गढ़वाल जिले की ओर खींचा और नोडल ऑफिसर द्वारा प्राप्त हुए जिले के विभिन्न अस्पतालों के आंकड़े दिए गए। इन आंकड़ों के अनुसार जिला अस्पतालों के कोविड हेल्थ सेंटरों में दस वेंटिलेटर हैं, उनमें कोई भी एक्टिव मोड में नही है। आंकड़ों से पता चलता है कि जिले के अस्पतालों में आईसीयू के केवल चार बेड हैं। हाईकोर्ट से फटकार के बावजूद सरकार कोविड नियंत्रण की तैयारियों के बजाय, मुख्यमंत्री बदलने पर ज्यादा ताकत खर्च करती हुई नजर आई है।

इन तमाम बातों के बीच फिलवक्त उत्तराखंड मंझधार में नजर आता है, जहां जनता नाउम्मीद खड़ी अपने दिन गुजार रही है और पार्टियां अगले चुनाव के लिये जुमलों का घोल तैयार करने में मशगूल। उत्तराखंड जनता के सपनों का राज्य तो न बन सका, लेकिन नेताओं के सपनों और महत्वकांक्षाओं को पंख देने का राज्य जरूर बन गया है।

Sunday, July 4, 2021

वीडियो विश्लेषण, भगवा गमछे में जय श्री राम कहती अंधी भीड़ द्वारा अकेले डॉक्टर को प्रताड़ित किया गया तो लोगों ने कहा तालिबानी राज अभी मंज़ूर नही।

इससे पूर्व के वीडियो विश्लेषणों की तरह यहां पर महिलाएं अपने विचार रखने में पीछे नही थी, बीस प्रतिशत महिलाओं ने घटना पर अपनी टिप्पणी दी। महिलाओं को भी भगवान राम के नाम का प्रयोग करते हुए किसी के साथ बदतमीजी करना नागवार गुजरा।

सोशल मीडिया एक खुला मंच है, जहां लोग किसी घटना या मुद्दे पर अपनी राय खुल कर रखते हैं ।
 वहां लिखी हर एक बात दस्तावेज़ है जिसके आधार पर हम कभी भी यह जान सकते हैं कि सम्बंधित विषय पर लोगों की क्या राय है।

'जनज्वार' ने एक विशेष श्रृंखला 'पत्रकारिता में पहला प्रयोग, ख़बर का दर्शकों की राय के आधार पर विश्लेषण' पर शुरू की है, इसी श्रृंखला की पांचवीं कड़ी का वीडियो विश्लेषण 'भाजपा नेता की गुंडागर्दी देख कानून से आपका भरोसा उठ जाएगा' शीर्षक वाले वीडियो पर जनता के विचार सामने लाता है और भगवा गमछा ओढ़े दादागिरी करने वालों को आईना दिखाता है।

  'भाजपा नेता की गुंडागर्दी देख कानून से आपका भरोसा उठ जाएगा' शीर्षक से यह वीडियो 'जनज्वार' के फ़ेसबुक पेज़ पर 13 अगस्त 2020 को अपलोड किया गया था।
अब तक सत्तर लाख से ज्यादा बार देखे जा चुके इस वीडियो पर 71000 लोगों ने अपनी प्रतिक्रियाएं दी हैं, जिसमें 50000 लाइक चिन्ह वाली प्रतिक्रियाएं हैं, 19000 गुस्से वाली प्रतिक्रियाएं हैं और 2000 प्रतिक्रियाओं में दुख प्रकट किया गया है।
दो लाख बार साझा किए जा चुके इस वीडियो पर 14000 लोगों की टिप्पणी आई हैं।

वीडियो की शुरुआत में भगवा गमछा ओढ़े एक व्यक्ति अपने समर्थकों के साथ 'जय श्री राम' के नारे लगाते एक डॉक्टर को थप्पड़ मारता दिखता है। वीडियो आगे देखने पर पता चलता कि वीडियो तालिबान का नही भारत में बिहार के छपरा जिले का है।
इस थप्पड़ और हंगामे की वज़ह डॉक्टर द्वारा सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री मोदी की एक आपत्तिजनक फ़ोटो को साझा किया जाना था।
गमछा ओढ़े व्यक्ति डॉक्टर को धमकाते हुए कहता है कि मोदी को हम भगवान मानते हैं, पब्लिक तुम्हें काट देगी, हिंदुस्तान है यह पाकिस्तान नही है।
तुम हमारे दोस्त बनकर रहोगे तभी हिंदुस्तान में रहोगे, फिर वह व्यक्ति डॉक्टर को कान पकड़ उठक-बैठक लगाने के लिए कहता है।
डॉक्टर बार-बार कहता है कि वीडियो उसके नही बच्चें द्वारा डाला गया है इस पर वह व्यक्ति उस मासूम को भी भविष्य का आतंकवादी कहता है।
हमने हिंदी फिल्मों में गुंडों द्वारा शहर जलाने की धमकी देते देखा है, यहां पर भी वह व्यक्ति ऐसी ही धमकी देता है जिसपर भीड़ उसका 'जय श्री राम' नारों के साथ समर्थन करती है।

वीडियो विश्लेषण के लिए 14000 टिप्पणियों में 'सबसे अधिक प्रासंगिक' फ़िल्टर का प्रयोग कर पहली 500 टिप्पणियों का विश्लेषण किया गया और उनमें हर बीसवीं टिप्पणी में से कुछ को यहां लिखा गया है।
अमर्यादित भाषा का प्रयोग हुई टिप्पणियों को छोड़ दिया गया या उसे साधारण भाषा में लिख दिया गया है।

 रंजीत चुनारा लिखते हैं भाई जी की बात सही है, विरोध के नाम पर पीएम की नंगी तस्वीर नही लगानी चाहिए। कल को कोई कांग्रेस पार्टी के विरोध में पार्टी अध्यक्ष की आपत्तिजनक तस्वीर लगा दे तो मुश्किल होगी पर मारपीट नही करनी चाहिए।

नेहा सिद्दकी लिखती हैं  नाकाम सरकार अर्थव्यवस्था बर्बाद करती है पर किसी की आपत्तिजनक तस्वीर लगाना गलत है। कानून को अपना काम करना था, यह लोग जय श्री राम भगवान का नाम भी बदनाम कर रहे हैं।

स्नेहलता गोयल मारपीट करने वालों के पक्ष में लिखती हैं कि बहुत बढ़िया किया, अपने हिन्दू होने पर गर्व करो। जय श्री राम। इतनी हिंसा हो रही है, उन पर तो कोई कुछ नही बोलता।

मो वसीम अंसारी मारपीट करने वालों को कानून अपने हाथों में न लेने की सलाह देते हुए लिखते हैं की डॉक्टर की गलती पर आप एफआईआर करवाइए। ऐसा कर आप मोदीजी और रामजी को बदनाम कर रहे हैं।

अशोक यादव सबसे एक कदम आगे दिखते हैं और लिखते हैं एकदम सही किए, साथ ही वह पत्रकार पर भी भद्दी टिप्पणी करते हैं।

नीलम सजवाण कहती हैं विरोध करने का तरीका गलत था पर प्रधानमंत्री की बेइज़्ज़ती करना ठीक नही।

सुजीत कुमार लिखते हैं तुम भगवान मानो दूसरों को क्यों मज़बूर करते हो।


वीडियो विश्लेषण का निष्कर्ष

वीडियो को 'जनज्वार' के पाठकों ने जमकर देखा और साझा किया है , इससे यह पता चलता है कि भगवा पहने या अन्य राजनीतिक दलों के लोगों के ऐसे लोगों के कृत्यों पर जनता की खासी रुचि रहती है।
इन दलों को चाहिए कि वह जानें कि जनतंत्र में जनता क्या कह रही है क्योंकि जब जनतंत्र में जनता की आवाज़ ही दबा दी जाए या सुनी न जाए तो वह तानाशाही बन जाती है, साथ ही राजनीतिक पार्टियों को अपने कार्यकर्ताओं के कार्यकलापों पर जनता के रुख को जानने के लिए जनता के विचारों को जानना भी जरूरी है।

'जय श्री राम' के नारे लगा किसी पर अत्याचार करते लोग 'जनज्वार' के दर्शकों को बिल्कुल पसंद नही आए, इस घटना के पक्ष में या यूं कहें भाजपा कार्यकर्ताओं के इस कृत्य के पक्ष में मात्र दस प्रतिशत लोगों ने अपनी टिप्पणी दी, बाकी नब्बे प्रतिशत लोग घटना के विपक्ष में खड़े थे।

इससे पूर्व के वीडियो विश्लेषणों की तरह यहां पर महिलाएं अपने विचार रखने में पीछे नही थी, बीस प्रतिशत महिलाओं ने घटना पर अपनी टिप्पणी दी। अधिकतर महिलाओं को भगवान राम के नाम का प्रयोग करते हुए किसी के साथ बदतमीजी करना नागवार गुजरा।

अल्पसंख्यक समुदाय घटना पर खासा नाराज़ दिखा और अधिकतर टिप्पणी करने वाले अल्पसंख्यक समुदाय के लोग थे, ऐसा बिल्कुल नही है कि अन्य समुदाय के लोग घटना के पक्ष में खड़े थे, उनमें भी घटना को लेकर भारी रोष था। 
एक बड़ी राजनीतिक पार्टी से जुड़े लोगों का यह तालिबानी तरीका लोगों को बिल्कुल पसंद नही आया।

नोट- यह श्रृंखला जनज्वार के फेसबुक पेज पर आने वाले वीडियो की टिप्पणियों पर आधारित होगी। यह भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में पहला प्रयोग है जिसका प्रयोग पत्रकारिता में अब तक लगभग असंभव माने जाने वाले फीडबैक को प्राप्त करने के लिए होगा।

 इस विश्लेषण का प्रयोग शोधों, आंदोलनों, चुनावों में सहायता प्राप्त करने के लिए किया जा सकता है।

 विश्लेषण से हम यह जान सकेंगे कि समाचारों में दिखाई जा रही इन खबरों के प्रति समाज के लोगों का क्या नज़रिया है, क्या ऐसी खबरों को दिखाए जाने के बाद लोग अपराध कम करते हैं , क्या अपने मन में इतनी नफ़रत पाले लोगों को पत्रकारिता के माध्यम से जागरूक कर सुधारा जा सकता है, क्या वह खबरों के आधार पर किसी चुनाव में अपनी पार्टी चुनते हैं, क्या वह किसी छुपी प्रतिभा को सामने लाने में सहयोग करते हैं, क्या पाठक किसी भ्रष्ट व्यक्ति को सजा दिलाने में अहम किरदार निभाते हैं।

यह वीडियो विश्लेषण उन वीडियो का होगा जिनको कम से कम 5 लाख दर्शकों ने देखा होगा और 500 से अधिक कमेंट होंगे। 

जाते जाते

भारत में मेनस्ट्रीम मीडिया पर आपको जो दिखाया जा रहा है वह आपकी आंखों पर पट्टी बांध रहा है (कल्टीवेशन थ्योरी ऑफ कम्युनिकेशन पढ़ सकते हैं), वैकल्पिक मीडिया कोशिश कर रहा है कि आप सच जानें। janjwar.com  का यह प्रयोग इस थ्योरी को सही साबित कर रहा है, वैकल्पिक मीडिया को सहारा दीजिए क्योंकि यही लोकतंत्र बचा रहे हैं।
मेनस्ट्रीम मीडिया तो अपने मरे पत्रकारों तक का साथ नही दे रही, आपका क्या देगी!

हिमांशु जोशी, उत्तराखंड।

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...