Thursday, July 22, 2021

वो लोकलाश थी, हम ढोते चले गए।


वो एचमटी की घड़ियों के कलपुर्जों सा ही बिखरा था, 
वो तब का भारत था जो टूट कर पाक, हिन्द बना ।
असल में वो लोकलाश थी, जिसे हम ढोते चले गए।

वो नेहरू से बढ़ता भारत था तो हल चलाते किसान से खिंचता भारत भी था।
असल में वो लोकलाश थी, जिसे हम ढोते चले गए।

बात कुछ पुरानी थी जब कागज़ों से लिखी आज़ादी की कहानी थी, वो क़लम थी जिससे अम्बेडकर ने लिखी संविधान की कहानी थी।
असल में वो लोकलाश थी, जिसे हम ढोते चले गए।

सवाल या तंज उस संविधान पर नही है कमबख्तों, सवाल उससे है जो आपातकाल में भी मुँह छिपाए बैठा था।
हां वो असल में वो लोकलाश थी, जिसे हम ढोते चले गए।

फिर दौर आया नए जमाने का, दुनिया को अपनी ताकत दिखाने का। 
पर गोधरा, लोया, गौरी लंकेश, दामिनी पर भी वो हमें चकराते शांत थी,
असल में वो लोकलाश थी, जिसे हम ढोते चले गए।

अब जब दिल्ली जली, लाशें जली फिर भी यहां शांति थी।
असल में वो लोकलाश थी, जिसे हम ढोते चले गए।

आवाज़ उठाई किसी ने कोई दानिश था तो कोई भास्कर,
दिखाया तुम्हें कि वास्तव में वो दीए नही चिताए जल रही थी, वो थाली- ताली बज नही बल्कि चूड़ियां टूट रही थी।

पर तुम शांत थे, जैसे कुछ हुआ ही नही।
सिर्फ खुद से कुछ होने का जैसे मानो तुम्हें इंतज़ार है, 
भूल गया मैं ये लोकतंत्र नही असल में वो लोकलाश थी, जिसे हम ढोते चले गए।


No comments:

Post a Comment

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...