Thursday, March 28, 2024

जब दिल्ली उजड़ गई तो महफिलें कैसे आबाद रहती 'दिल्ली की चटखारे'।

वक्त सब कुछ भुला देता है लेकिन अपने इतिहास को जानना इंसान के लिए जरूरी है, नही तो उसकी खुद की कोई पहचान नही रहती। दिल्ली में रहने वाले, दिल्ली को समझने वाले लोग अगर यह जानना चाहते हैं कि सालों पहले दिल्ली कैसे जिंदा थी तो उन्हें इस किताब को जरूर पढ़ना चाहिए।

रेख्ता बुक्स और राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित किताब 'दिल्ली के चटकारे' के लेखक शाहिद अहमद देहलवी हैं और इस किताब का संकलन एवं संपादन शुऐब शाहिद द्वारा किया गया है।
'बीवी कैसी होनी चाहिए' किताब का आवरण चित्र तैयार करने वाले विक्रम नायक ने ही इस किताब का आवरण चित्र भी तैयार किया है। इसे देख दिल्ली की तस्वीर मन में उतर आती है, पिछले आवरण में सालों पुरानी दिल्ली पर लिखा किताब का एक अंश है जो पाठकों को किताब पढ़ने के लिए आतुर कर देगा।


चटखारों लगवाती किताब।

दिल्ली के चटखारे नाम से किताब का शीर्षक पृष्ठ 16 में बिल्कुल सटीक बैठता दिखता जब हम इसमें दिल्ली के खाने के बारे में यह पढ़ते हैं 'गरीबों में अब भी किसी किसी के यहां ताहरी ऐसी पकती है कि बिर्यानी उसके आगे हेच है।' 
ऐसे ही पृष्ठ 20-21 में नहारी बनाने का फॉर्मूला लिख दिया गया है, जिसे पढ़कर इसको चाहने वाले खुद भी घर में नहारी बनाना ट्राई कर सकते हैं। 'शोरबे का लबधड़ा बनाने के लिए आलन डाला जाता है। पानी में आटा घोल कर आलन बनाया जाता है'।
'दिल्ली वाले बड़े चटोरे मशहूर थे, इन्हें ज़बान के चटखारों ने मार रखा था' लिखते लेखक दिल्ली के खोए हुए चटोरों को ढूंढते दिखते हैं।

मज़दूरों की जो स्थिति लेखक ने नजदीक से देखी।

लेखक ने इस किताब में दिल्ली के मजदूरों को खोजते उन पर लिखा है, मजदूरों के बारे में पढ़ते ऐसा लगता है कि लेखक इन मजदूरों के जीवन को काफी करीब से देख रहे थे। पृष्ठ 27, 28 की पंक्तियां में हमें यह सब दिखता है 'अस्ल में नहारी गरीब गुर्ब का मन भाता खाना है। दस्तकार, मजदूर और कारीगर सुबह- सुबह काम पर जाने से पहले चार पैसे में अपना पेट भर लेते थे। दो पैसे की नहारी और दो पैसे की दो रोटियां उनके दिन भर का सहारे को काफी होती'।

इसी के साथ लेखक ने बदलते वक्त, महंगाई और पेट पालने की चुनौती को भी अपनी लेखनी के जरिए पाठकों के सामने लाने की कोशिश की है 'सस्ते और बा बरकत समय थे। एक कमाता दस खाते थे और अब दस कमाते हैं और एक को भी नही खिला सकते'।

'दिल्ली के गरीब कमाते भी खूब थे मगर अपनी आदतों के पीछे मुहल्ले के बनिए के कर्जदार अक्सर रहते थे' पंक्ति से लेखक ने मजदूर वर्ग के व्यसनों भरे जीवन की तरफ बड़े ही व्यंग्यात्मक तरीके से इशारा किया है।

इतनी गम्भीरता लाते हुए भी लेखक किताब में 'तन को नही लत्ता, पान खाए अलबत्ता' , 'जिसने दिया है तन को वही देगा कफ़न को' लिखते रहे, जो आज भी कोई पाठक अपनी शेखी बघारने के लिए कह सकता है।

दिल्ली की वो महफ़िल जो कहीं खो गई।

दिल्ली के खाने पीने वाले माहौल के बाद लेखक ने किताब को दिल्ली के नाच गाने के रंग के साथ आगे बढ़ाया है। 'जिस जमाने में गाने- बजाने को ऐब नही, हुनर समझा जाता था' पंक्ति से गाने बजाने था बदलता अर्थ समझ आता है।
 'जब दिल्ली उजड़ गई तो महफिलें कैसे आबाद रहती' पंक्ति अब बदलते समाज की ओर इशारा करती है, मशीन बनते इंसान को भागने दौड़ने से अब चैन नही है और लोगों के लिए मनोरंजन का अर्थ बदल गया है, लोग मोबाइल तक ही सीमित हो गए हैं। लेखक यही सब कहना चाहते थे और कामयाब भी रहे हैं।

बटेरों, तोतों, कबूतरों के खेल, भेड़ पालने वाली पुरानी दिल्ली के किस्से पढ़ने में बड़े रोचक हैं। वक्त के साथ खत्म हो गए कई किस्सों को लेखक ने किताब में समेटा है जैसे पृष्ठ 58 में वह लिखते हैं 'शाही जमाने में सुना है कि ऐसे भी परिंदे होते थे जो झपट कर हिरण की आंख फोड़ डालते थे। हिरण अंधा हो कर चौकड़ी भूल जाता और शिकारी दौड़कर उसे पकड़ लेते थे।

इस किताब में लेखक ने बार बार साल 1947 के बाद दिल्ली के उजड़ जाने का जिक्र किया है, वह कभी जामा मस्जिद के जुनूबी चौराहे के सामने वाले रास्ते को याद करते हैं तो कभी चावड़ी के बारे में लिखते हैं।
'और सन 47 में जैसी खाक उड़ी वो हमने भी देखी और आपने भी' जैसी पंक्तियों से दिल्ली उजड़ जाने से खुद को मिले दर्द को लेखक इस किताब में लिखते गए हैं। भविष्य में अगर सड़कों, मेट्रो और इमारतों के जाल में उलझी दिल्ली के बारे में चर्चा करते कोई इस किताब का जिक्र करेगा तो उसे शायद विश्वास न हो कि दिल्ली ऐसी भी थी।

जान बनाए रखने का होश, किताब का सबसे खूबसूरत हिस्सा।
 
दिल्ली वालों के खुद के शरीर को चुस्त दुरुस्त रखने शौक के बारे में लिखते हुए जैसे लेखक कई सालों तक पूरे देश की जनता को इससे सीख देना चाहते थे।
इंटरनेट के गुलाम बन चुके युवाओं को इन किताबों को जरूर पढ़ना चाहिए, इनसे हम अपने इतिहास से वाकिफ होते रहते हैं, लेखक ने दिल्ली वालों के इस शौक पर कुछ ऐसे लिखा है 'दिल्ली वालों को अपनी जान बनाए रखने का बड़ा शौक था। इस शौक को पूरा करने के लिए वर्जिश किया करते थे और वर्जिशी खेलों में शरीक होते थे'।

पाठकों को सम्बोधित करते लेखक।

पृष्ठ 77 में लेखक ने गिल्ली डण्डा खेलना शब्दों के जरिए सिखाया है, इससे आगे शतरंज से जुड़े किस्से पाठकों को हंसाते रहेंगे। लेखक कई जगह पाठकों को सम्बोधित करते हैं और यह कला पाठकों को किताब से जोड़े रखने के लिए सीखनी बहुत जरूरी है, 'अब इन मियाँ- बीवी को मीठी मीठी बातें करने दीजिए'. ऐसे ही 'आइए, हम आप चलें यहां से'।

किताब पढ़ते कहीं कहीं महसूस होता है कि लेखक ने कुछ आसान और रोजमर्रा के जीवन में बोले जाने वाले उर्दू शब्दों का हिंदी अर्थ तो बताया है लेकिन कहीं कहीं उनसे कठिन उर्दू शब्दों का हिंदी अर्थ बताना रह गया।

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