Friday, June 30, 2023

दरवाजों में लटके तालों को देख, हार न मानने वाले बुजुर्ग की कहानी है डॉक्यूमेंट्री 'मोती बाग'.

बर्फ लदे पहाड़ और उनके सामने उड़ती पंक्तिबद्ध उड़ती चिड़ियों का झुंड, जिन्हें देखने मैदानी क्षेत्रों के लोग सैंकड़ों किलोमीटर दूर अपने घरों से चले आते हैं. इन
पहाड़ों के गांवों में अब बहुत से घरों के दरवाजों में सील लगे ताले लटके हुए हैं, स्थिति यह है कि अब वहां मुर्दा उठाने के लिए भी नेपालियों की जरूरत है. 
पहाड़ के इसी दर्द को साल 2019 में ऑस्कर के लिए नामित की गई डॉक्यूमेंट्री 'मोती बाग' दिखाया गया है, जिसकी स्क्रीनिंग दून लाइब्रेरी में इस शनिवार की गई.

दून लाइब्रेरी में अपनी डाक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग के बाद मध्य में खड़े निर्मल चन्द्र

पहाड़ के खालीपन को दिखाती एक कहानी.

प्रसार भारती, पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टिंग ट्रस्ट की मदद से निर्देशक निर्मल चन्द्र द्वारा बनाई गई 'मोतीबाग' डॉक्यूमेंट्री उत्तराखंड के पौड़ी नगर से पैंतीस किलोमीटर दूर गांव मोती बाग में रहने वाले एक बुजुर्ग की कहानी है. यह कहानी पहाड़ में रहने वाले लोगों की समस्याओं को दिखाती है तो इसमें इन समस्याओं का समाधान भी है.

 निर्मल चन्द्र ने मोती बाग में 22.750 किलो की मूली उगाने वाले बुजुर्ग विद्या दत्त शर्मा की कहानी इस डॉक्यूमेंट्री के जरिए दुनिया के सामने लाने की कोशिश की है.
इस डॉक्यूमेंट्री में निर्देशक ने लगभग एक साल विद्या दत्त शर्मा के साथ बिताया है, इसकी वजह से हम पूरे साल पहाड़ के जीवन और वहां की समस्याओं को करीब से समझते हैं. गर्मियों में जंगल में आग तो बरसात भी देखते हैं, जहां विद्या दत्त द्वारा पहाड़ में पानी की समस्या को वर्षा जल संरक्षण से दूर किया जाता है. घर में रहने वाले विद्या दत्त शर्मा के बच्चे उनसे मिलने त्योहारों और पूजा में ही घर आते हैं.

डॉक्यूमेंट्री में ऑल वेदर रोड पर सवाल करते हुए दिखाया गया है कि बाहर से आने वाले लोगों के लिए तो यह सड़क बन गई है पर पहाड़ में रहने वाले लोगों के लिए क्या है! वहां तो कई जगह आज भी तक सड़क नही है.

गांव में आने वाली रोकी गई एक बस को फिर से चलवाने के लिए बुजुर्ग को भागादौड़ी करते देखना, पहाड़ के खालीपन को हमारे सामने ले आता है. निर्देशक ने पहाड़ के दर्द को दर्शकों तक पहुंचाने के लिए एक बुजुर्ग की कहानी को शायद इसलिए ही चुना होगा ताकी उनकी समस्या, मेहनत और अनुभव से इसे देखने वालों को एक उम्मीद और उनकी समस्याओं का हल जरूर मिल जाए.


छायांकन ऐसा कि आंखों को खुला रख दे.

पहाड़ पर कोई फिल्म फिल्मानी हो तो उसका छायांकन शानदार होना बहुत जरूरी है. पलायन पर बनी इस डॉक्यूमेंट्री में रहने वालों के इंतजार में खंडहर बन चुके घरों को उनके असली हाल में दिखाने में निर्देशक को कामयाबी मिली है. इन खंडहर बन चुके घरों में जिस तरह सील लगे तालों को दिखाया गया है, उससे पहाड़ से पलायन का दर्द दर्शकों के दिल में उतर आता है. मिट्टी के चूल्हे में हरी सब्जी बनते देखना शानदार है और यह दृश्य मुंह में पानी लाने में भी कामयाब रहा है.
खेत मे हल जोतने वाले दृश्य को भी कैमरे में बखूबी कैद किया गया है. बर्फ लदे पहाड़ के आगे उड़ती चिड़िया, स्क्रीन पर गेंहू और बुजुर्ग फिर उनके पीछे पहाड़, यह वह दृश्य हैं जिनकी वजह से निर्देशक को कुछ कहने की आवश्यकता नही रह जाती है. यहां पहाड़ की सुंदरता, पहाड़ में खेती की संभावना और पहाड़ से पलायन की समस्या को इन दृश्यों के जरिए ही समझा दिया गया है.

आवाज का असर कुछ ऐसा कि लगे पहाड़ हमारे सामने है.

डॉक्यूमेंट्री में आवाजों का बड़ा महत्व होता है, इनमें आवाजों के अनुसार दृश्य चुनने होते हैं क्योंकि फिल्मों की तरह संगीत देने पर डॉक्यूमेंट्री बनावटी लगने का खतरा बना रहता है. निर्देशक ने जिस तरह चिड़ियों का चहचहाना, बैलों के गले की घण्टियों की आवाज़, मक्खियों का भिनभिना दर्शकों को सुनाया है, वह दर्शकों के मन में उनके सामने चल रहे दृश्यों का गहरा असर छोड़ता है.
पहाड़ी कहावत और गीतों को सुनना अद्भुत अनुभव है. इंसानी रिश्तों को लेकर विद्या दत्त द्वारा गाया गया गीत 'मैं कई बार तुमसे हार, मेरी हार हुई तेरी जीत हुई' हर किसी को भावुक कर देगा.

कुछ ऐसा ही असर 'गरीबी मिट जाएगी जिस दिन इस देश का यारों का क्या होगा, महल अटारे चमके दमके पर झोपड़ी का क्या होगा' पंक्तियों से भी हुआ है. बाघ को इंसान से बेहतर परिभाषित करता एक गीत सुनने लायक है.

निर्देशक ने दर्शकों को बस दृश्यों से ही सोच में डुबोया है.

पहाड़ लौटकर अपने खाली पड़े घर की सफाई करने वाला दृश्य कैमरे पर लाकर निर्देशक ने पलायन का हर चेहरा दर्शकों के सामने लाने की कोशिश की है. 

बन्द पड़े स्कूलों की संख्या बताकर वह चौंकाते भी हैं. पहाड़ के गांव और शहर के बीच के अंतर को निर्देशक ने एक दृश्य के जरिए बखूबी दिखाया है, जिसकी वजह से दर्शक उन्हें हमेशा याद करेंगे, पहले दृश्य में हम गांव में लकड़ी का चूल्हा जलता देखते हैं और अगले ही दृश्य में हमें शहर में गैस चूल्हा जला दिखता है.

यहां बोला हर लफ्ज पहाड़ का दर्द बयां करता है तो उसका इलाज भी है.

निर्देशक ने जब लोगों से बातचीत की है तो उन लोगों ने पहाड़ों की समस्या को जिन शब्दों में बयां किया है, वह पहाड़ की सारी समस्याओं को समझाने के लिए काफी हैं.
'विकास तो देहरादून जैसी जगह में हुआ' वाक्य मैदानी और पहाड़ी क्षेत्रों में अंतर बताता है.
'पहाड़ों को काट के खेत बने, अब वो फिर जंगल बन रहे हैं' वाक्य से पलायन के वास्तविक हालातों की जानकारी मिलती है.
'पलायन रोको नही जो बचें हैं, उन्हें देखो' वाक्य पहाड़ के लिए नीति बनाने वालों के लिए एक सलाह है.
'पहाड़ की औरतें बहुत मेहनती होती थी, पहाड़ के लोग मेहनत नही करना चाहते' वह सत्य है जिसे समझना बहुत जरूरी है और इसे समझकर पहाड़ों से पलायन को रोकने के लिए ज्यादा श्रम वाली योजनाओं को न लाकर कम श्रम वाली योजनाओं पर काम करना होगा.
 विद्या दत्त अपने अनुभव से कहते हैं कि पहाड़ों को जीवित रखना है तो उनकी छितरी जोत को एक जगह दी जाए और वन्य जीव का समाधान चौकीदारी है. ऐसे शब्द हैं जिन्हें गांठ बांध कर पहाड़ों को विकसित किया जा सकता है.

नेपाली अब भी नेपाली ही हैं?

'मुर्दा उठाने को कोई नही है, नेपाली ढूंढे तब उठी' पंक्ति से पहाड़ों में नेपालियों की अहमियत सामने आई है. डॉक्यूमेंट्री में नेपालियों की जिंदगी को काफी करीब से दिखाया गया है. 

निर्देशक ने नेपाली लोगों से जुड़े बहूत से अनछुए पहलुओं को दर्शकों के सामने लाने का सफल प्रयास किया है.
काम की तलाश में सात-आठ दशक पहले काम की तलाश में भारत आए नेपालियों की अब यहां दूसरी तीसरी पीढ़ी रह रही है, वह पहाड़ छोड़ कर जा चुके लोगों के खेतों में खेती कर अच्छा पैसा कमा रहे हैं. शायद उससे भी ज्यादा जितना पलायन कर गए लोग शहरों में कमा रहे हैं.
नेपालियों की नई पीढ़ी जिनका जन्म ही यहां हुआ है, वह अब नेपाल वापस नही जाना चाहते, उन्हें 'डोटियाल' कहा जाना पसंद नही आता.

हिमांशु जोशी.
@himanshu28may


Saturday, June 24, 2023

अब शॉर्ट फिल्म को नही ले सकते 'पार्ट टाइम'.

ओटीटी के इस दौर में अब दर्शक घण्टों लम्बी वेब सीरीज़ देखना पसंद कर रहे हैं तो एक तरफ बीस से तीस मिनट की शॉर्ट फिल्मों को देखने में भी उनकी रुचि बढ़ी है.
इसी को देखते हुए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के अग्रणी चैनलों में काम कर चुके और एक्टर मनोज बाजपेयी की जीवनी लिखने वाले पत्रकार पीयूष पांडे युट्यूब के 'द शॉर्ट कट' चैनल में 21:05 मिनट की शॉर्ट फ़िल्म 'पार्ट टाइम जॉब' हमारे सामने लाए हैं.


काम काम और काम.

पिछले पांच-छह दशकों में भारतीय समाज में एकल परिवार का चलन बढ़ा है. ज्यादा पैसा कमाने की चाह, इन परिवारों में माता-पिता को अपने बच्चों से दूर कर रही है. यह शॉर्ट फ़िल्म भी इसी गम्भीर विषय पर बनाई गई है. फिल्म की कहानी ऐसे दंपत्ति की है जो काम की वजह से अपने बच्चे को वक्त नहीं दे पाते और इसका अंजाम आंखें खोलने वाला है. ऐसे अलग विषयों पर भारतीय सिनेमा में बहुत कम फिल्मों का निर्माण किया गया है. पीयूष ने ऐसा विषय हमारे सामने लाकर वाकई हिम्मत भरा काम किया है.

राज को आखिर तक राज ही रखते हैं पीयूष.

 साल 2017 में आई फिल्म 'ब्लू माउंटेंस' फ़िल्म में एसोसिएट निर्देशक के तौर पर काम करने वाले पीयूष पांडे ने फ़िल्म देखते हुए शुरू से आखिर तक दर्शकों को सोचने पर मजबूर किया है. कुछ मिनटों के अंदर ही हम सारे पात्रों और घटनाक्रमों से परिचित होते जाते हैं, पर निर्देशक ने इस कहानी के एक महत्वपूर्ण राज़ को अंत में ही खोला है.
कभी दर्शकों को लगेगा कि यह शॉर्ट फिल्म, पति-पत्नी के बीच किसी तीसरे की कहानी है, कभी वह सोचेंगे कि यह भूत प्रेत से जुड़ी कहानी है पर अंत में वह सन्न रह जाते हैं.
इस शॉर्ट फिल्म की एक खासियत यह भी है कि इसमें अन्य बहुत सी शॉर्ट फिल्मों की तरह एक या दो लोकेशन तक ही सीमित नही रहा गया है. इसमें आपको बहुत से लोकेशन दिखाई देंगे जो इसकी कहानी को और बड़ा होता महसूस करवाते हैं.

फ़िल्म में एक दृश्य है, जहां अच्छा टेबल टेनिस खेलने पर बच्चे के लिए खूब तालियां बजती हैं पर उन तालियों को सुनने के लिए उस बच्चे के माता-पिता के पास वक्त नही है. यह दृश्य दिखा कर निर्देशक अपने अंदर बच्चों के भविष्य के प्रति बढ़ रही बेचैनी को दर्शकों के सामने प्रस्तुत करने में कामयाब रहे हैं.

शॉर्ट फिल्म में दिख रहे हैं बेहतरीन कलाकार.

इस फ़िल्म में कलाकार श्रेया नारायण हैं, जो रॉकस्टार, सुपर नानी, साहेब बीवी और गैंगस्टर जैसी बड़ी फिल्मों में दिखाई दी थी. श्रेया के पति का किरदार निभाने वाले अभिनेता हेमंत माहोर हैं. एनएसडी से पासआउट हेमंत 'हाइवे' और 'फैंटम' में भी दिखाई दिए थे.
श्रेया एक ऐसी महिला के किरदार में हैं जो अपने पति के साथ काम करते हुए ,अपने परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत रखना चाहती है. श्रेया नारायण ने बड़े पर्दे से चाहे लोकप्रियता न पाई हो पर इस शॉर्ट फिल्म के जरिए उन्होंने खुद की पहचान जरूर बनाई है. वह खूबसूरत भी हैं और उन्होंने कामकाजी के साथ घरेलू महिला का किरदार बखूबी निभाया है.
हेमंत फ़िल्म में हिंदी के अध्यापक बने हैं, जो काम की वजह से न जिम्मेदार पति बन पा रहा है और न ही पिता के तौर पर अपने बच्चे को समय दे पाता है. उनकी और श्रेया की जोड़ी जमी है। हेमंत माहोर गम्भीर और हास्य, दोनों तरह के किरदारों को बखूबी निभाने की क्षमता रखने वाले कलाकार लगते हैं. उनकी संवाद अदायगी में बेहद स्पष्टता है.
संवाद 'हिंदी कौन पढ़ना चाहता है आजकल. हिंदी के टीचरों को ट्यूशन नहीं मिलते, हिंदी मातृभाषा है बाजार की भाषा है. ट्यूशन की भाषा नहीं है.' इसका उदाहरण है.


तकनीकी रूप से मजबूत है यह फ़िल्म.

पटकथा लेखन की वजह से ही फ़िल्म अपने जबरदस्त अंत को दर्शकों को सही तरीके से समझाने में कामयाब रही है.

कलाकारों की वेशभूषा पर भी खासा ध्यान दिया गया है. कामकाजी महिला की तरह कपड़े, शिक्षक की तरह कुर्ता, यह सब फ़िल्म को तकनीकी रुप से मजबूत बनाता है.
साउंड डिज़ाइन पर ध्यान दिया जाए तो वह भी आला दर्जे का है, इसकी वजह से यह शॉर्ट फिल्म शुरू से दर्शकों को रोमांचित करती है.
रबीउल एजाज़ का छायांकन प्रभावित करता है. फ़िल्म का पहला दृश्य ही देखने में ध्यान खींचता है. टेबल टेनिस मैच से जुड़े दृश्य भी देखने में अच्छे लगते हैं.

आखिर स्त्री ही क्यों! पर फिर भी शुरुआत तो हुई.

फ़िल्म में एक स्त्री को बच्चे की परवरिश ठीक से न कर पाने की वजह से खुद को कोसते दिखाया गया है, यह हमारे समाज का दर्पण है.
किसी के दाम्पत्य जीवन में पुरुष और महिला दोनों की ही अपने बच्चे के पालन पोषण को लेकर बराबर जिम्मेदारी होती है. यदि यह कहानी स्त्री केंद्रित न होकर पुरुष पर केंद्रित होती तो इस नए विषय में और भी जान फूंकी हुई लगती.

हिमांशु जोशी
@himanshu28may

Monday, June 19, 2023

विमर्श का नया अड्डा दून लाइब्रेरी. साबित हुआ नेहरू या गांधी नही, जिन्ना थे विभाजन के जिम्मेदार.

अच्छी किताबें और फिल्में देखना और उन पर चर्चा होना, किसी भी समाज के लिए जरूरी है. देहरादून में दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र लोगों को यह अवसर पिछले अट्ठारह सालों से देता आ रहा है. इसी कड़ी में आगे बढ़ते देहरादून ने अब विश्व विख्यात राजनीति शास्त्री इश्तियाक अहमद को देखा, भारत-पाकिस्तान रिश्तों के विशेषज्ञ स्वीडिश नागरिक इश्तियाक अहमद ने कहा कि उनका शोध इस बात को स्पष्ट करता है कि भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के लिए नेहरू- गांधी नही बल्कि जिन्ना ही जिम्मेदार थे.

सोशल मीडिया से जकड़ा कोई इंसान अगर देहरादून पहुंच कर परेड ग्राउंड की तरफ रुख करता है तो दून पुस्तकालय के दरवाजे उसके लिए दिन भर खुले रहते हैं. बड़े हॉल, अलमारियों में सजी ढेर सारी किताबें, लिफ्ट, किताब पढ़ते युवा, यह सब देखने में सुखद है.

पुस्तकालय की शुरूआत और विशेषता.

दून पुस्तकालय एवम् शोध केन्द्र साल 2006 से देहरादून परेड ग्राउंड स्थित एक परिसर में शुरू हुआ था. अब इस साल यह संस्था लैंसडाउन चौक पर अपने नये भवन में स्थापित हो चुकी है.

 प्रो.बी. के जोशी, चंद्रशेखर तिवारी, सुरजीत किशोर दास व श्री एम. रामचंद्रन के कुशल निर्देशन में यह संस्थान उत्तराखंड में पढ़ने लिखने की संस्कृति को आगे बढ़ाने का शानदार काम कर रहा है. पुस्तकालय में उत्तराखंड के इतिहास, राजनीति, संस्कृति, कला, पर्यावरण के साथ कई अन्य विषयों पर पुस्तकें उपलब्ध हैं और यह आपसी चर्चा को भी महत्वपूर्ण मंच प्रदान कर रहा है.

बन रहा है सांस्कृतिक अड्डा.

 पुस्तकालय में विषय विशेषज्ञों के व्याख्यान, गोष्ठी, समूह चर्चा, पुस्तक समीक्षा और प्रदर्शनी जैसे कार्यक्रमों का आयोजन होते रहते हैं. पुस्तकालय द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2007 से 2022 तक दून पुस्तकालय एवम् शोध केन्द्र द्वारा विविध माध्यमों के अन्तर्गत 175 से अधिक कार्यक्रम आयोजित किये जा चुके हैं.


23 जून से पुस्तकालय में माउंटेन फ़िल्म फेस्टिवल का आयोजन किया जा रहा है. इस फेस्टिवल में भारत के साथ-साथ विदेशों के पर्वतीय परिवेश पर बनी फीचर फिल्मों, वृत्तचित्रों और एनिमेशन शॉर्ट्स को प्रदर्शित किया जायेगा. खास बात यह है कि फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित की जाने वाली सभी फिल्मों का प्रवेश पुस्तकालय में होने वाले अधिकतर कार्यक्रमों की तरह निशुल्क ही रखा गया है.


जब पुस्तकालय में पहुंचे विश्व प्रसिद्ध राजनीति शास्त्री.

 19 जून की शाम दून पुस्तकालय एवम् शोध केन्द्र और 'उत्तराखंड इंसानियत मंच' ने साथ मिलकर एक कार्यक्रम आयोजित किया. इस कार्यक्रम में इन दिनों भारत दौरे पर चल रहे पाकिस्तानी मूल के स्वीडिश नागरिक विश्व प्रसिद्ध राजनीति शास्त्री इश्तियाक अहमद को बुलाया गया था. उन्होंने स्टॉकहोम विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में पीएचडी प्राप्त की है.


कार्यक्रम में इश्तियाक को सुनकर महसूस हुआ कि धर्म के आधार पर राष्ट्र को बांटना कितना गलत है. आज़ादी के सालों बाद भी भारत में हिन्दू-मुस्लिम छोटे मोटे झगड़ों के बावजूद मिल कर साथ रह रहे हैं, कुछ लोग हैं जो फूट डालते हैं पर उनको सालों पहले यही कार्य कर चुके लोगों के अनुभवों को जानना जरूरी है.

इश्तियाक के यूट्यूब पेज को अस्सी लाख से ज्यादा बार देखा गया है. उनकी किताबें 'द पंजाब ब्लडीड,पार्टिशंड एन्ड क्लींज़्ड' , 'पाकिस्तान द गैरीज़न स्टेट', 'द पाकिस्तान मिलिट्री इन पॉलिटिक्स', ' द कॉन्सेप्ट ऑफ एन इस्लामिक स्टेट' काफी जानकारी भरी हैं.

विश्व प्रसिद्ध लेखक ने इस कार्यक्रम में भी अपनी किताबों पर बात करी. उन्होंने कहा कि पंजाब का साहित्य जगत में तो बहुत काम है पर शोध कार्य बहुत कम है. 14 अगस्त 1947 से 31 दिसंबर 1947 के बीच तीस प्रतिशत पंजाब की जनता अपने घर से बेघर हुई.
भारत-पाकिस्तान विभाजन एक ऐसी त्रासदी है जिस पर आज तक कोई कोर्ट केस नही हुआ.

उन्हें यह किताबें लिखनी की इच्छा बचपन से ही थी. दो घटनाओं का उन पर असर था, वह कहते हैं कि 12 अगस्त 1947 को उनकी मम्मी घर की खिड़की से बाहर देख रही थी तो घर के दाहिने तरफ कुछ बदमाश किस्म के लोग जमा थे. उन्होंने बाईं तरफ से आने वाले एक सरदार पर हमले का प्रयास किया पर वो वहां से बचकर चले गए पर उसके बाद साइकिल में खाना बांधकर आते एक सरदार का इन लोगों ने बेरहमी से कत्ल कर दिया.
इस हत्याकांड को देखने का मानसिक आघात मेरी माँ के साथ हमेशा बना रहा और 1990 में उनकी मृत्यु तक इसका असर उन पर रहा.

ऐसे ही 1953 में पाकिस्तान में मार्शल लॉ के दौरान उनके घर के पास बंटवारे के दौरान अपने बेटे को खोने पर दिमागी रूप से अस्थिर एक मुस्लिम व्यक्ति पर फौज द्वारा गोली मारने के प्रयास ने भी इश्तियाक पर गहरा असर डाला था.

'द पंजाब ब्लडीड,पार्टिशंड एन्ड क्लींज़्ड' पर बात करते प्रोफेसर इश्तियाक अमहद ने बताया कि साल 2003 से 2005 तक की सर्दियों में मैंने अपनी किताब पर काम किया. कोई रिसर्च करना हो तो पागल बनना ही पड़ता है और इस पागलपन में ग्यारह साल लग गए. फिर ये किताब तैयार हुई और इसने करांची, लाहौर, देहरादून में साहित्यिक पुरस्कार जीते.

नेहरू और गांधी नही जिन्ना थे विभाजन के जिम्मेदार.

अपनी किताब 'पाकिस्तान द गैरीज़न स्टेट' का हवाला देते उन्होंने कहा कि लोग नेहरू और गांधी को विभाजन का जिम्मेदार मानते हैं पर 22 मार्च 1940 में अपने एक भाषण में जिन्ना ने दो राष्ट्रों की थ्योरी दी थी. उनके अनुसार हिन्दू मुसलमान साथ नही रह सकते थे और जिन्ना ने यह कभी नही कहा कि भारत पाकिस्तान बंटवारा न हो. वहीं अंग्रेज़ अगर बंटवारा नही चाहते तो यह कभी सम्भव भी नही होता और जिन्ना खाली हाथ ही रहते. जिन्ना को बंटवारे पर बाद में पछतावा भी हुआ था और उन्होंने कहा भी कि उन्हें कीड़ों का खाया पाकिस्तान मिला.

नफरत पर बाद में पछतावा ही होता है.

इश्तियाक अहमद इस सवाल पर कि जिन्ना को चाहने वाले वो लोग जिन्होंने बंटवारे के दौरान हत्याएं करी, वो अब उन हत्याओं पर क्या सोचते हैं, कहते हैं कि इन लोगों से आप यह सवाल अकेले पूछें तो उन्हें अपने द्वारा की इन हत्याओं पर दुख होता है पर जहां यह सवाल कई लोगों के साथ होने पर पूछा जाए तो वह इस पर पछतावा नही करते.

इश्तियाक कहते हैं कि तब आगजनी करने वाले एक पाकिस्तानी व्यक्ति ने उनसे कहा कि मैं अल्लाह से माफी मांगता हूं, पाकिस्तान वह नही बन पाया जैसा हमने सोचा था. उस व्यक्ति ने कहा कि जब वह दिल्ली गया तो वहां लाहौर के एक हिन्दू ने उसे पहचान लिया और कहा कि कोई दिक्कत हो तो उसे बताए.

मुश्किल रहा विभाजन पर शोध कार्य.

अपनी किताब लिखते हुए शोध कार्य में आई समस्याओं पर प्रोफेसर ने कहा कि विभाजन को लेकर जो दस्तावेज उपलब्ध हैं वह 14 अगस्त तक अंग्रेजों के बनाए हुए थे. उन सरकारी दस्तावेजों को ढूंढना मुश्किल था और बंटवारे की कहानी 15 अगस्त के बाद शुरू हुई और 1947 साल के अंत तक खत्म भी हो गई इसलिए शोध के लिए हमने गांवों में जाकर बात करी और ट्रिब्यून की खबरों को जोड़ते हुए ये सब तैयार किया.
अंग्रेज़ों ने जैसा उनका मन था, जिससे उनको आगे लाभ होने वाला था वैसा बंटवारा किया.

विभाजन के वक्त कांग्रेस ने रोका था कत्लेआम.

इश्तियाक अहमद ने कांग्रेस पर यह महत्वपूर्ण वक्तव्य दिया कि कांग्रेस ने कत्लेआम को रोकने की बहुत कोशिश की थी, जो मुसलमान भारत में रहना चाहते थे कांग्रेस ने उन्हें यहां रोकने की कोशिश की.

पाकिस्तान से हिन्दू और सिखों का भारत के मुसलमानों की तुलना ज्यादा पलायन हुआ. उन लोगों से पाकिस्तान में रुकने की मर्जी नही पूछी गई, अगर हिन्दू सिख वहां रुके होते तो पाकिस्तान में इनकी आबादी आज बीस प्रतिशत के आसपास होती.

हिमांशु जोशी.
@himanshu28may


Sunday, June 11, 2023

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आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...