Friday, February 25, 2022

विश्व महिला दिवस के बीच उन दिनों की बात.

 
 8 मार्च 2022 को विश्व महिला दिवस मनाया जाएगा। इस बार यूएन की तरफ से 'बेहतर कल के लिए आज लैंगिक समानता जरूरी है' को विश्व महिला दिवस की थीम रखा गया है।

लैंगिक समानता की बात कागज़ों में करते तो अच्छी लगती है पर वास्तव में यह अभी दूर की कौड़ी है। अपने उन दिनों में लगे प्रतिबन्धों की वजह से महिलाएं आज भी घुट कर जीने के लिए मज़बूर हैं। उन दिनों के बीच अच्छा माहौल पाने के लिए महिलाएं पूरे विश्व भर में आवाज़ उठाने लगी हैं। 

भारत की बात करें तो ग्रामीण इलाकों में लड़कियों के सामने अपने पीरियड्स के दिनों बड़ी समस्या खड़ी हो जाती है, उनके पास सेनेटरी पैड खरीदने के पैसे नही होते जिस वज़ह से वो सेनेटरी पैड की जगह कपड़ा इस्तेमाल करती हैं और उससे उन्हें कई तरह के इंफेक्शन होने का खतरा बना रहता है।
गांव तो गांव शहर की लड़कियां भी मेडिकल स्टोर से सेनेटरी पैड तब खरीदती हैं जब दुकान पर कोई नहीं होता है, इसका समाधान यह जरूर हो सकता है कि सरकारी अस्पतालों में सेनेटरी पैड को फ्री बांटा जाए लेकिन समस्या यह है कि शायद उसके बाद भी महिलाएं सेनेटरी पैड लेने के लिए सामने आएं। इसका उदाहरण हम कंडोम को लेकर ले सकते हैं सरकारी अस्पतालों में कंडोम फ्री बांटे जाते हैं लेकिन वहां भी इसे लेने में लोग सकुचाते हैं। 

इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च सेंटर के आंकड़ों के अनुसार भारत में 88 प्रतिशत महिलाएं अपने उन दिनों सैनेटरी पैड की जगह कपड़ों का इस्तेमाल करती हैं।
यही वज़ह है कि भारत में साल में 70,000 सर्वाइकल कैंसर के मामले सामने आते हैं जो विश्व भर में सबसे अधिक सर्वाइकल कैंसर के मामलों में से एक हैं।

उन दिनों में महिलाओं पर अन्य तरह के सामाजिक प्रतिबंध भी लगाए जाते हैं। उनको मंदिर में आने की मनाही होती है, उनको खाना अलग बर्तनों में दिया जाता है, उनको छुआ नही जाता।

फ़ोटो, सोशल मीडिया


कामकाजी महिलाएं अपने उन दिनों में भी काम पर जाने के लिए मजबूर होती हैं, लोकसभा में भी उन दिनों में अवकाश दिलाने के लिए 'The Menstruation Benefit Bill 2017' पेश हुआ था पर बात बनी नही।

पत्रकारिता के अध्यापन कार्य से लंबे समय से जुड़ी और पत्रकारिता में नेट क्वालीफाई श्वेता रानी भारद्वाज ने कामकाजी महिलाओं को उनके उन दिनों में अधिकार दिलाने के लिए अपने फेसबुक अकाउंट पर एक पोस्ट साझा की है, जिसे कार्पोरेट जगत के दबाव तले दबे नीति निर्माताओं को जरूर पढ़ना चाहिए।

गाहे-बगाहे।।

2018 में मैं एक रिसर्च एसोसिएट कम कंटेंट क्रिएटर के तौर पर  हाइटेक सिटी, हैदराबाद में जॉब कर रही थी। एक दिन मैंने एक Urgent Leave application मेल लिखा। एचआर ने कहा कि मैं cc में बाकी बॉस को भी रख लूं। मैंने वैसा ही किया। फिर आधे घंटे के बाद एचआर का कॉल आ गया। उन्होंने कहा, "Rani, what kind of cause u have mentioned in your mail" don't you know to mention the medical cause in a proper way"
मैंने कहा," sorry, I didn't get you! And I think, I haven't mentioned anything inappropriate in the mail. I only mentioned the right cause ma'am.
उन्होंने कहा,You shouldn't have written "Urgent Leave Due to Menstrual Period Cramps". Just write it "Female Problem" from next time. और इतना कहकर मोहतरमा फोन कट कर दी। और ऐसा ही ज्ञान मुझे मेरे Leave Application के प्रतिउत्तर में भी मिला।

मैं भी प्रतिउत्तर का उत्तर देना ही उचित समझी। 

Hello Sir/Ma'am
Happy Pongal!

I apologise for the inconvenience you had after knowing the reason of my urgent leave. At first, the company asked me to mention the exact reason of my leave but it seems inappropriate for them to accept that I directly stated  "MenstruaI Cramps" being the reason of my sickness. They sincerely suggested me to use "Female Problem" instead of what I mentioned.

Therefore, I request you to take a time to reflect on this situation where a word that disgusted you immensely, we deal with it every single month. Also, we always make sure that it never hinders with our work commitments.  

At last, I am obliged to enlighten you that Menstruation is the elimination of the thickened lining of the uterus (endometrium) from the body through the vagina and not only a 'Female Problem'. I hope you will reflect on this and together we can help the society to end this taboo.

Thanks!

Sincerely
Sweta Rani

(उसी दिन कंपनी ने मेरा हिसाब किताब कर दिया। 😅)

#hyderabaddiaries 
#menstrualcycle

रिपोर्ट- हिमांशु जोशी.

Sunday, February 20, 2022

साइकिल

3 जून 2018 में संयुक्त राष्ट्र ने साईकिल उपयोग को बढ़ावा देने के लिये पहली बार विश्व साईकिल दिवस मनाने की शुरुआत की थी। आज यह तीसरी बार मनाया जा रहा है। इस बीच मुझे कुछ महीने पुराना किस्सा याद आ गया ।
कोरोना काल से पहले मुंबई से स्थान्तरित हो चंडीगढ़ आये अपने भाईसाहब से मेरी चंडीगढ़ के परिवहन साधनों पर चर्चा हो रही थी। चंडीगढ़ में मुंबई लोकल की तरह परिवहन का सस्ता और सुलभ साधन नही है। कार, स्कूटी के विकल्प पर विचार किया जा रहा था पर चीनियों से उपहार में आयी कोरोना महामारी ने देश की सभी योजनाओं की तरह हमारी भी इस योजना पर पानी फेर दिया।
सार्वजनिक परिवहन में कोरोना संक्रमण के खतरे को देखते हुए काम पर जाने के लिये भाईसाहब ले आए एक चमचमाती नई साईकिल।
कोरोना काल न होता तो शायद उनकी इस पाषाण युग की पसंद का मैं जम कर उपहास बनाता पर वक़्त की नज़ाकत को भांपते हुए मुझे उनकी समझदारी से ईर्ष्या होने लगी। कोरोना से एकमात्र बचाव सामाजिक दूरी के लिये इससे अच्छा परिवहन साधन और कुछ हो ही नही सकता।

यूरोपीय देशों में 18वीं शताब्दी के दौरान जन्म ले चुकी साईकिल का रखरखाव बहुत ही आसान है। साईकिल की चेन में समय-समय पर तेल डालते रहने, पहियों में समय से हवा भरते रहने, समय-समय पर साईकिल के नट बोल्टों को कस कर, उसके ब्रेकों का ध्यान रख, समय से साईकिल की सफाई कर उसे जंग मुक्त रख कर और पहिये का पंक्चर बनाने का ज्ञान रख साईकिल को लम्बे समय तक प्रयोग में लाया जा सकता है।

मोटरसाईकिल, कारों के दाम समय के साथ आसमान छूने लगे पर साईकिल अब भी बेहद ही किफायती दाम में मिल जाती है। 
गरीब इसे लेकर घरेलू सामान बेचने के लिये फेरी लगाकर या इससे सम्बन्धित कोई अन्य स्वरोज़गार अपना कर अपने परिवार का भरण-पोषण आसानी से कर सकता है।
सुबह फैक्ट्री जाने के लिये साईकिल की सवारी करते सड़कों पर लम्बी श्रृंखला में जाते मज़दूरों के लिये उनका यह वाहन वरदान है।

लॉकडाउन में हम यह देख चुके हैं कि बिना वाहनों और फैक्ट्रियों के चले यह हवा कितनी शुद्ध रहती है।
साईकिल के प्रयोग से पृथ्वी के लिये गम्भीर होते जा रहे वायु प्रदूषण की इस समस्या पर लगाम लगायी जा सकती है।

बुज़ुर्ग, जवान और बच्चें हर आयु वर्ग के लोग साईकिल की सवारी कर खुद को चुस्त और दुरस्त रख सकते हैं। साईकिल की सवारी मनुष्य को मानसिक और शारीरिक रूप से मज़बूत बनाने का कार्य करती है। इसमें अन्य व्यायामों की तरह ना चोटिल होने का डर है औऱ ना ही इसे चलाने में किसी विशेष तकनीकी ज्ञान की जानकारी की आवश्यकता।
रोज़ाना साईकिल चलाने से शरीर की मांसपेशियां मज़बूत होती हैं और शरीर में वसा भी नही बनता।
उच्च रक्तचाप और ह्रदय रोगों को साईकिल की सवारी पीछे छोड़ देती है। शोध में सामने आया है कि निरंतर साईकिल चलाने वालों को मधुमेह और ह्रदयाघात का खतरा अन्य लोगों से कम रहता है।

यह सच है कि साईकिल को वक़्त ने चुनौती दी है। सड़क पर दोड़ती बसें, ट्रक, कार, महंगी मोटरसाईकिल साईकिल चलाने वाले को रफ़्तार में कहीं पीछे छोड़ देती हैं। इस तेज़ रफ़्तार के साथ चल रही ज़िंदगी में हर किसी को वक्त की कमी है। मनुष्य ने विकास के पीछे अंधी दौड़ लगायी हुई है। उसमें साईकिल के सफ़र में लगता ज्यादा समय मनुष्य को चुभने लगता है।
पर कोरोना ने दिखा दिया है कि कैसे प्रकृति मनुष्य की रफ़्तार को कभी भी रोक सकती है और वैसे भी मेट्रो स्टेशनों की भीड़, बसों की दमघोंटू भीड़ और असुरक्षित तेज़ दौड़ती मोटरसाईकिलों से दूर एक साईकिल के सफ़र का आनन्द ही कुछ और है। साईकिल चलाते ना ऑटो का कानफोड़ू संगीत है ना एक दूसरे को घूरते सफ़र करते लोगों के बनावटी चेहरे। वहाँ है तो सिर्फ आपका सुधरता स्वास्थ्य और आपकी खुद से होती बात जो आज के सामाजिक परिदृश्य में कहीं खो सी गयी है।

साईकिल सवारों के लिये मुख्य सड़क से अलग लेन का निर्माण इस सफर को सड़क पर तेज़ दौड़ते वाहनों से सुरक्षित बना सकता है। साईकिल सवारी के दौरान हेल्मेट का प्रयोग अनिवार्य करना चाहिए और इस विश्व साईकिल दिवस के दिन सरकार को बिना किसी देरी के साईकिल की सवारी को शान की सवारी बनाने पर गम्भीरता से विचार करना शुरू कर देना चाहिये।

Thursday, February 17, 2022

Decoding why beautiful story of master and disciple 'Lapujhanna' will be a 21st century's first blockbuster book.

Lappujhanna is a beautiful story written for a master by his disciple. The author has not forgotten the memory of his childhood till date and in those memories the author's special friend is also there, the special friend who had been there at some point in our life and is always remembered. 

Lappujhanna is our own story, Lappujhanna is us, for whom this world is too small, so small that we want to take full measure of it by making a ruckus with our friends.

Publisher - Hind yugm
Price- 199₹
Edition- First and Second in January
Writer- Ashok Pandey
 
The cover picture of the book defies the English proverb 'Don't judge a book by its cover', It gives a zeal towards the book. Try to identify this enthusiasm, it looks the same as it was during the childhood. It gives the feeling of playing cricket barefoot and driving an aluminum wire car. The last cover introduces the writer with a photo of him, which was necessary.

The book begins with a letter written by Sanjay Chaturvedi in which Arabic words like Sadiq, Makhluk have been used.The letter depicts that the book is written on the background of Ramnagar, a small town in Uttarakhand.

After this the story of 'Manzaro mai tha jo shahar basa' begins. The author has written amazingly using the mixture of indigenous and foreign words. 
The author takes the book forward by telling the story of his childhood to the readers. Knowing the questions arising in the child's mind about other religions and other genders, will hook the readers mind in the book.

If you read the catchy headline like 'Bagad bille ka toncha', you will start remembering the sharp mind of children, then the word like 'padaya' will also be recalled again in your forgotten dictionary.

Author is also seen playing with words and thoughts while delivering his experience to the readers through the book.
On one hand, the author makes the readers chuckle by writing the sentence "Paitai Kato Uncleji Aul Apna Kaam Kalo" coming from his friend Lafattu, and on the other hand, the way the eye of the bagarbilla has been described makes the picture of such in the mind of the readers. 
The blueprint of the geographical location of Ramnagar has also been drawn in an excellent way.

In the Internet era, where we hardly know our neighborhood, this story seems like a fairy tale to read about the relationship of the author with his neighbors in his childhood, going to Ramlila, playing cricket etc.

The author keeps the readers connected throughout in the book by delivering his life stances in the form of a text. 
The story of the Bonne's cycle and his life with the words like 'Chote Lafattu' will make you laugh.

It is not that the book is written just to make the readers laugh. 'Tanda fitabl club aur Pele ka bada bhai' begins with narrating the plight of the local players and ends with narrating the story of the players who didn't get the chance to play at high level.

Reading 'Nau fut ki khaat aur australia k rashtrapti ka aagman' will make you curious to visit Ramnagar. Reading about cricket will also make you remember the recent film '83'. The scene of the arrival of the Australian President will then take readers back in time. 
Till now the readers will be immersed in the native-foreign language of the book.

Lafattu Aur Tiwari Masab Ka Duo will make you laugh out loud while reminding you of your school days. The lines' Lafattu tab tak mahachor k roop mai is kadar vikhyat ho chuka tha ki apne ghar se use ek purana akhbaar tak laane nahi dia jata tha. Jab vah ek baar dress pehan kar ready ho jata to uske pitaji use dubara nanga karte aur basta khaali karwakar jaamatalashi lete the ' will tell the readers that Lafattu is the Rajpal Yadav of the book and these lines written above in his glorification also proves it. 

In 'Brace Brace, Bresu Tea Thani Jo Dal Gaya Wo Mal Gaya', falling in love with Madhubala and the rumor of Saibaba  writer has been shown towards a different stretch of child's mind. In the book, the impact of films on the child's mind has been explained to the readers in a very effective manner.

In the game of swapping 'B' and 'Bh', the author has proved his writing skills. In the book you also get to read the less heard word 'Guruputra'.

Reading the title 'Fuchchi Kaptan ki Aashiqui' reminds me of the dying loveletter trend, then Lafattu saying to his father "Balb ko bhalb kaite ho aap! kya khak englit palaoge papa" makes you also a character of the book. All these are the parts of the book that can start the trend of reading Hindi books again. In the hindi movie Pushpa, as pushpa says 'Jhukhega Nahi' the same way Lafattu also has the potential to become a known character of the country.

The story behind giving Pet name like Gobar Doctor, Jagua Ponk is also written in detail by the author. 
A line like 'Ramnagar ka Kalaparakhi Samaj Purnamudit ho jaata' indicates the writer's excellent command in Hindi.

Reading 'Jyaul, Urus ki Moofalli, Morram and Brichharaupad' reveales  the thoughts in the minds of children and how the seeds of distance between Hindus and Muslims are planted in their childhood. Reading further, the book also reminds us of the days when rich and poor children used to study together in government schools.

The story of Lafattu driving a beggar sitting in a barring cart will make a lot of laughs, then after some time the book will start making the readers emotional. 
Now a great story seems to be moving towards its end.
Naseem Anjum's entry is no less than an actress.

The introduction of 'Nasbandi aur lakdi ka rack' makes your mouth watery. The story of the sugar's vegetable continues to tickle the readers even in the last pages of the book.

Page 216 is the essence of the book. After finishing the book, you will definitely feel like meeting the writer and asking him a lot of questions about Lafattu, Bagadbilla and eating Bumpakoda in Ramangar with the help of map drawn in the author's imagination.

Review by - Himanshu Joshi

Tuesday, February 15, 2022

खंडित मूर्ति वाले के विचारों से निकले 'हिन्द स्वराज' के ज़रिए कल और आज..

बिहार के चंपारण में महात्मा गांधी की प्रतिमा तोड़ने के ख़िलाफ़ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मौन सत्याग्रह शुरू कर दिया है।
12 फरवरी की रात महात्मा गांधी की प्रतिमा को तोड़ा गया था। वेब पोर्टल 'मीडिया स्वराज' की खबर के अनुसार 14 फरवरी की रात पुलिस ने प्रतिमा तोड़ने वाले को गिरफ्तार कर लिया है और राजकुमार मिश्र नाम के इस आदमी से पुलिस पूछताछ कर रही है।

गांधीवादी सौरभ बाजपेयी ने इस पर कहा '"गांधी को मर जाने दो— बिरला हाउस में गांधी उपवास में थे. उसके बाहर खड़े स्वयंसेवक यही नारा लगाते थे. लेकिन गांधी नहीं मरे, तीन गोली खाकर नहीं मरे. तो गांधी की मूर्तियाँ तोड़ने से क्या होगा? गांधी ख़ुद अपनी मूर्तियों को तोड़ने को कहते थे. तो आपने कौन बड़ा काम कर दिया? 

बेचारे निर्बुद्धि लोग गांधी की मूर्ति तोड़ रहे हैं. मैं उनसे प्रार्थना करता हूँ कि वो दिन की रौशनी में ऐसा करें. यकीन मानिए हम कोई मुक़दमा नहीं करेंगे. हम तो बस जानना चाहते हैं कि आपमें इतनी हिम्मत है कि नहीं? अगर आपमें इतनी हिम्मत है तो सामने आइये. क्योंकि जिनके दिल में गांधी के लिए नफरत है वो भी ऐसी हरकतों को “दिल से माफ़” नहीं कर पाते. 

आज गांधी फिर सीना तान नफ़रत की ताकतों के सामने खड़े हैं. “गांधी को मर जाने दो”— गांधी नहीं मरेंगे. गांधी की देह मर्त्य थी, मिट गई। गांधी का विचार अमर्त्य है, नहीं मिटेगा।"

फोटो साभार मीडिया स्वराज


बीते कुछ समय से वाट्सएप यूनिवर्सिटी के ज़रिए युवाओं में महात्मा गांधी के नाम को लेकर जो नफ़रत फैलाई जा रही थी, यह घटना उसी का परिणाम जान पड़ती है। 
हाल ही में मध्य प्रदेश के ग्वालियर में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे की पूजा की गई थी।

समय की सुई को थोड़ा उल्टा घुमाया जाए तो पता चलता है कि दो अक्टूबर, 1944 को महात्मा गांधी के 75वें जन्मदिवस पर आइंस्टीन ने अपने संदेश में लिखा था, ‘आने वाली नस्लें शायद मुश्किल से ही विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस से बना हुआ कोई ऐसा व्यक्ति भी धरती पर चलता-फिरता था’।
वर्तमान हालातों को देखते आइंस्टीन का यह कथन न सिर्फ सत्य साबित होता दिखता है बल्कि अब हालात और भी बदतर होकर विश्वास न करने से आगे बढ़कर मूर्ति खंडित करने तक पहुंच गए हैं।

 महात्मा गांधी ने वर्ष 1908 में लंदन से दक्षिण अफ्रीका लौटते 'हिन्द स्वराज' को लिखा था और उसमें उन्होंने जो लिखा वो आज उसे लिखने के सौ सालों से ज्यादा के अंतराल बाद भी प्रासंगिक है।

हिंद स्वराज में महात्मा गांधी दादाभाई नौरोजी, प्रोफ़ेसर गोखले जैसी हस्तियों की इज़्ज़त करने के लिए कहते हैं उनका कहना था ' हम बचपन से जवानी में आते हैं तब बचपन से नफ़रत नही करते, बल्कि उन दिनों को प्यार से याद करते हैं। स्वराज भुगतने की इच्छा रखने वाली प्रजा अपने बुजुर्गों का तिरस्कार नही कर सकती '।
इसे लिखते महात्मा गांधी को शायद यह नही पता होगा कि उनके इस दुनिया से चले जाने के सालों बाद उनके प्रति खोते सम्मान को वापस लाने मुझ जैसे किसी लेखक को उनके लिए कुछ ऐसे ही शब्द लिखने पड़ेंगे।

तब गांधी के पास 'हिन्द स्वराज' के अपने विचार लोगों तक पहुंचाने के लिए एकमात्र साधन 'इंडियन ओपिनियन' था पर अब हमारे पास उनके विचारों को समझने के लिए ढेरों डिजिटल, प्रिंट साधन उपलब्ध हैं।
दुख इस बात का है कि इन सब के बावजूद आज की पीढ़ी से गांधी को समझने में गलती हो रही है और उनकी मूर्ति को इस तरह खंडित किया जा रहा है।

महात्मा गांधी उस वक्त अपनी पीढ़ी के ऐसे ही बहके लोगों के लिए 'हिन्द स्वराज' में लिखते हैं ' लंदन में रहने वाले हर एक नामी अराजकतावादी हिन्दुस्तानी के सम्पर्क में मैं आया था। उनकी शूरवीरता का असर मेरे मन पर पड़ा था, लेकिन मुझे लगा कि उनके जोश ने उलटी राह पकड़ ली । मुझे लगा कि हिंसा हिंदुस्तान के दुखों का इलाज नही है और उसकी संस्कृति को देखते हुए उसे आत्मरक्षा के लिए कोई अलग और ऊंचे प्रकार का शस्त्र काम में लाना चाहिए'।


मेरे विचार से वही जरूरत आज के युवाओं की भी है, जिनमें देशभक्ति तो है पर उनकी उस देशभक्ति को सत्ता के भूखों द्वारा धर्मभक्ति में बदल दिया गया है। उनको बरगलाने के लिए धर्म की सुरक्षा का हवाला दिया जा रहा है। जहां युवाओं को पढ़ लिख कर देश को विकसित राष्ट्र बनाना था, वही युवा अब धर्म के उन्माद में डूब इस देश को किसी एक धर्म के खूंटे पर टांगना चाहता है। जबकि धर्म एक बेहद ही निजी मसला होता है, पर अब युवाओं को भरमाने के बाद इसे सार्वजनिक रूप से राष्ट्रीय मसला बना दिया गया है।

तब उनके पास बड़े से बड़े असंतोष का भी था जवाब

हाल ही में पेगासुस और राफेल डील जैसे विवाद सामने आए हैं। किसान आंदोलन को लेकर देश के एक हिस्से में भारी असंतोष देखने को मिला है। बैंक के घोटालों को लेकर भी मुख्यधारा के समाचारों और सोशल मीडिया पर जोरों की चर्चा छिड़ी हुई है।
बैंकों में इन्हीं घोटालों को लेकर राहुल गांधी ट्वीट करते हैं-
मोदी काल में अब तक ₹5,35,000 करोड़ के बैंक फ़्रॉड हो चुके हैं- 75 सालों में भारत की जनता के पैसे से ऐसी धांधली कभी नहीं हुई।
लूट और धोखे के ये दिन सिर्फ़ मोदी मित्रों के लिए अच्छे दिन हैं।

महात्मा गांधी ने हिन्द स्वराज में लिखा था कि सुधार के लिए असंतोष होना ठीक है। 'यह असंतोष बहुत उपयोगी चीज़ है। जब तक आदमी अपनी चालू हालत में खुश रहता है , तब तक उसमें से निकलने के लिए उसे समझाना मुश्किल है। इसलिए हर एक सुधार से पहले असंतोष होना ही चाहिए। चालू चीज़ से ऊब जाने पर ही उसे फेंक देने का मन करता है'।

दो भाई साथ रहेंगे तो तकरार होगी ही

पिछले कुछ दिनों से हिन्दू-मुसलमान के बीच नफ़रत की दीवार को खड़ा करने की कोशिश करी जा रही है, इसको लेकर सबसे ताज़ा उदाहरण हिजाब विवाद है।

कर्नाटक के उडुपी में स्कूल-कॉलेजों में हिजाब पहनने को लेकर शुरू हुआ विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। इस विवाद की शुरुआत पिछले साल 31 दिसंबर को हुई थी जब उडुपी के सरकारी पीयू कॉलेज में हिजाब पहन कर आई छह छात्राओं को कक्षा में प्रवेश करने से रोक दिया गया था। इसके बाद कॉलेज के बाहर प्रदर्शन भी हुआ था। 

हिन्द स्वराज में इसका समाधान कुछ इस तरह से है, महात्मा गांधी ने लिखा ' मैं यह नही कहना चाहता कि हिन्दू मुसलमान कभी झगड़ेंगे ही नही। दो भाई साथ रहते हैं तो उनके बीच तकरार होती है ।  कभी हमारे सिर भी फूटेंगे । ऐसा होना जरूरी नही है , लेकिन सब लोग एक सी अक्ल के नही होते। दोनों जोश में आते हैं तब अकसर गलत काम कर बैठते हैं। उन्हें हमें सहन करना होगा।' 

हिजाब को लेकर अब कानूनी, राजनीतिक और धार्मिक विवाद पर कर्नाटक हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही है। हिन्द स्वराज में इसको लेकर लिखा है ' हिन्दू-मुसलमान आपस में लड़े हैं। तटस्थ आदमी उनसे कहेगा कि आप गयी-बीती को भूल जायें। इसमें दोनों का कसूर रहा होगा। अब दोनों मिलकर रहिये। लेकिन वे वकील के पास जाते हैं। वकील का फर्ज हो जाता है कि वह मुवक्किल की ओर जोर लगाये। मुवक्किल के खयाल में भी न हों ऐसी दलीलें मुवक्किल की ओर से ढुंढ़ना वकील का काम है। अगर वह ऐसा नहीं करता तो माना जायेगा कि वह अपने पेशे को बट्टा लगाता है। इसलिए वकील तो आम तौर पर झगड़ा आगे बढ़ने की ही सलाह देगा।' 

कोर्ट कचहरी के चक्कर में पड़ने से पहले हिन्द स्वराज के अनुसार अगर चला जाए तो जब यह विवाद शुरू हुआ था तब ही इसे थाम लिया जाना चाहिए था और शहर के सभी सम्भ्रान्त लोगों को आपस में बैठ कर यह कोशिश करनी थी कि यह विवाद बने ही न । 
जब अब यह विवाद बन ही गया है तो अब भी कौन सा देर हुई है, गांधी हमारे विचारों में तो ज़िंदा हैं ही।

हिमांशु जोशी।



Saturday, February 12, 2022

सेक्स एजुकेशन पर गहरी बात कर गई दीपिका की 'गहराइयां'

ओटीटी पर फ़िल्म रिलीज़ होने के बाद से फिल्मों के लिए केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड सर्टिफिकेट की अहमियत कुछ ज्यादा नही रह गई है क्योंकि घर में बच्चों द्वारा मोबाइल पर क्या देखा जा रहा है, इसमें माता-पिता का नियंत्रण सीमित है।
फ़िर भी 'गहराइयां' के दो दृश्य ऐसे हैं जिनके लिए फ़िल्म को 'ए' की जगह 'यू-ए' सर्टिफिकेट दिया जाना चाहिए था।

हम भारत में अभी भी सेक्स एजुकेशन पर ज्यादा बात नही करते और भारतीय परिवारों में लड़कियों द्वारा रिश्तों में की गई गलती पर पर्दा डाल दिया जाता है। दीपिका पादुकोण ने अपने बेहतरीन अभिनय के साथ फ़िल्म में 'दो' ऐसे दृश्य दिए हैं जिनके बारे में हर माता-पिता को अपनी समझदार होती बेटी को समझाना चाहिए। 
गौर करने वाली बात यह है कि फ़िल्म में मुश्किल समय के दौरान अपनी बेटी को समझने वाला भी उसका पिता ही है।

फ़िल्म में मिडल फिंगर दिखाए जाने पर बोले जाने वाले शब्द की भरमार है पर आप सिर्फ़ उसकी वज़ह से बच्चों को साथ बैठा इस फ़िल्म को देखने से डरेंगे तो यह जान लीजिए कि बच्चों के बीच यह शब्द अब आम है। 

यंग सोच रखने वाले यंग डायरेक्टर शकुन बत्रा इस बार यंग लोगों के लिए गहराइयां लेकर आए हैं। साल 2012 में निर्देशक के तौर पर अपनी पहली फ़िल्म 'एक मैं और एक तू' से शुरुआत करने वाले शकुन साल 2016 में 'कपूर एंड सन्स' से चर्चा में आए थे और अब उन्होंने 'गहराइयां' से हिंदी सिनेमा में खुद को साबित करने की कोशिश करी है।

त्रिकोणीय प्रेम सम्बन्ध विषय पर आधारित यह फ़िल्म दर्शकों को बीते कल से सीख लेने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से बनाई गई है।
दीपिका ने फ़िल्म में अलीशा का किरदार निभाया है, जो एक योगा इंस्ट्रक्टर है। दीपिका का चेहरा हमेशा की तरह ताज़गी भरा लगा है और उसमें चार चांद लगाती है उनकी ड्रेस।
उन्होंने अपने किरदार को पूरी तरह से जिया है और सबसे ज्यादा प्रभावित भी करती हैं।

फ़िल्म की पटकथा कसी हुई है और एक घण्टा पूरा होने के बाद फ़िल्म की कहानी गति पकड़ती है, जो आख़िर तक दर्शकों को खुद से थामे रखती है।

जेन के किरदार में सिद्धान्त चतुर्वेदी दीपिका के बाद अपने अभिनय से सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं, फ़िल्म में उनकी ड्रेसों का चयन भी शानदार है।
 'गली ब्वॉय' के बाद सिद्धान्त के पास यहां काफ़ी कुछ करने के लिए था और उन्होंने इस फ़िल्म से अपनी अलग पहचान बनाई भी है।

जेन की गर्लफ्रैंड बनी अनन्या पांडे 'टीया' के किरदार में हैं और अनन्या ने अपनी पिछली फिल्मों से काफ़ी अच्छा किया है।

धैर्य करवा और नसरुद्दीन शाह ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिकाओं के साथ न्याय किया है। धैर्य को हम इससे पहले '83' में देख चुके हैं। रजत कपूर को कैमरे के सामने बहुत वक्त मिला है और फ़िल्म में उनका होना भर ही काफ़ी होता है।

फ़िल्म के गीतों की बात की जाए तो सिर्फ़ 'बेक़ाबू' ही ऐसा गाना है जिसे दर्शक लंबे समय तक अपनी कार में सफ़र के दौरान सुनना पसंद करेंगे।

गहराइयां का बैकग्राउंड स्कोर बेहतरीन है, फ़िल्म देखते यह माहौल सा बना देता है। समुद्र की लहरों की आवाज़ बार-बार दिल को छूती जाती हैं।

फ़िल्म का छायांकन भी बेहतरीन है। मुंबई में समुद्र की खूबसूरती हो या होटल ताज, सब कुछ आंखों को रिझाता जाता है।
फ़िल्म की विशेषता यह है कि इसमें दीपिका और सिद्धान्त के बीच के करीबी दृश्य इस तरह फिल्माए गए हैं कि वह अश्लीलता की श्रेणी में नही लगते बल्कि उनके स्पर्शों से सीधे दिल में असर होता है।

फ़िल्म में नए ज़माने के रिश्तों को भी दिखाया गया है जो चेहरों पर हावभावों के साथ मोबाइल पर ही बनते हैं। ये अलग बात है कि साथी से वीडियो कॉल के दौरान किसी दूसरे के नोटिफिकेशन वाला सीन दिखा रिश्ते टूटने का कारण भी दिखा दिया गया है।

फ़िल्म अपने अंत में हैरान करती है।

फ़िल्म में सिर्फ एक कमी ही है, जो इसके हिट न होने का कारण भी बनेगी। वह यह कि इसमें अंग्रेज़ी में बोले गए 'ऑलवेज चूस टू मूव ऑन', 'वॉट्स योर टाइप' जैसे कुछ संवाद शामिल हैं।
इन्हें हिंदी में प्रभावी ढंग से पेश कर हिंदी सिनेमा के आम दर्शकों के ज्यादा क़रीब पहुंचा जा सकता था।
'जब कोई तुम्हारे बारे में न सोच रहा हो न खुद को अपने बारे में सोचना पड़ता है' संवाद इसका उदाहरण है।

निर्देशक- शकुन बत्रा
निर्माता- धर्मा प्रोडक्शन
अभिनय- दीपिका पादुकोण, सिद्धान्त चतुर्वेदी, अनन्या पांडे, धैर्य करवा, रजत कपूर, नसरुद्दीन शाह
संगीत- कबीर कठपालिया
ओटीटी- अमेज़न प्राइम वीडियो
रेटिंग- 2.5/5

Friday, February 11, 2022

उस्ताद और शागिर्द की खूबसूरत कहानी है 'लपूझन्ना'

लपूझन्ना एक उस्ताद के लिए उसके शागिर्द की तरफ़ से लिखी खूबसूरत कहानी है। लेखक अपने बचपन की याद अब तक नही भुला सके हैं और उन यादों में लेखक का ख़ास दोस्त भी है, ये वो ख़ास दोस्त है जो हम सब की ज़िंदगी में कभी न कभी तो रहा ही है और उसको हम हमेशा याद करते हैं। 
अपनी दीदी की घड़ी चोर उसके पैसे से जियाउल को घड़ी गिफ़्ट करने वाला लफत्तू लेखक असोक का हीरो है।
लपूझन्ना हमारी अपनी ही कहानी है, इसमें लपूझन्ना हम ही हैं जिसके लिए ये दुनिया बहुत छोटी है इतनी छोटी कि हम अपने दोस्तों के साथ धमाचौकड़ी मचाते इसे पूरा नाप लेना चाहते हैं।


प्रकाशक - हिन्द युग्म
मूल्य- 199₹
संस्करण- जनवरी में पहला फ़िर दूसरा भी
लेखक- हल्द्वानी वाले अशोक पाण्डे

किताब का आवरण चित्र अंग्रेज़ी की कहावत 'डोंट जज ए बुक बाई इट्स कवर' को झुठला देता है, यह किताब के प्रति एक उमंग सी जगा देता है, इस उमंग को पहचानने की कोशिश करो तो यह वही जान पड़ती है जो बचपन के दिनों दिन भर नंगे पैर क्रिकेट खेलते, एल्युमिनियम के तार वाली गाड़ी चलाते महसूस होती थी। पिछले आवरण में लेखक की फ़ोटो के साथ उनका परिचय दिया गया है, जो जरूरी था।

क़िताब की शुरुआत संजय चतुर्वेदी के लिखे पत्र से होती है। जिसमें सादिक, मख्लूक जैसे अरबी शब्दों का इस्तेमाल किया गया है, पत्र से पता चलता है कि क़िताब उत्तराखंड के छोटे से कस्बे रामनगर के बैकग्राउंड पर लिखी गई है।
इसके बाद 'मंज़रों में था जो शहर बसा' किस्सा शुरू होता है, लेखक ने देशज और विदेशज शब्दों के मिश्रण का प्रयोग कर कमाल लिखा है। 
लेखक पाठकों को अपने बचपन की कहानी बताते  किताब आगे बढ़ाते हैं, बाल मन के अंदर दूसरे धर्म और दूसरे लिंग के प्रति उमड़ते सवालों को जानते आपका मन किताब में लगना शुरू हो जाएगा।

'बागड़ बिल्ले का टौंचा' जैसा शीर्षक पढ़ आपको बच्चों के खुराफाती दिमाग की याद आने लगेगी तो 'पदाया' शब्द आपकी भूली बिसरी डिक्शनरी में फिर जुड़ जाएगा।

लेखक पाठकों को क़िताब पढ़ाते उनके दिमाग और ज़ुबान के साथ खेलते भी दिखते हैं।
एक तरफ़ अपने दोस्त लफत्तू की तुतलाती ज़ुबान से निकला "पैतै काटो अंकलजी औल अपना काम कलौ" वाक्य हूबहू लिख लेखक पाठकों को तुतला बनाते हैं तो दूसरी तरफ़ बागड़बिल्ले की आंख का वर्णन जिस तरह किया गया है वह ऐसी आंखों की तस्वीर सचमुच मन में बना देता है।
रामनगर की भौगोलिक स्थिति का खाका भी बेहतरीन तरीके से खींचा गया है।

इंटरनेट युग में जब हम अपने आसपड़ोस में रहने वाले लोगों को जानते तक नही हैं। तब लेखक के उनके बचपन में पड़ोसियों से सम्बंध के बारे में पढ़ना, घर से दूर तक की जानकारी रखना, रामलीला जाना, क्रिकेट खेलना एक परीकथा सा लगता है।

लेखक अपने जीवन के किस्सों को पाठ का रूप देते पाठकों को किताब से जोड़े रखते हैं।
'चोट्टे लफत्तू' शब्द के साथ बौने की साइकिल और उसकी जिंदगी की कहानी आपको हंसा देगी।

ऐसा नही है कि किताब पाठकों को सिर्फ़ हंसाने भर के लिए ही लिखी गई है 'टांडा फिटबाल किलब और पेले का बड़ा भाई' खिलाड़ियों की बदहाली बताने के साथ शुरू होता है और मौका न मिलने वाले खिलाड़ियों की आंखों देखी दास्तान सुनाने के साथ ख़त्म होता है।

'नौ फुट की खाट और ऑस्ट्रेलिया के राष्ट्रपति का आगमन' पढ़ आपका मन रामनगर घूम आने को करने लगेगा। क्रिकेट के बारे में लिखा पढ़ आपको हाल ही में आई फ़िल्म '83' भी याद आ जाएगी। ऑस्ट्रेलियाई राष्ट्रपति के आगमन का दृश्य तो पाठकों को उसी समय में वापस ले जाएगा। 
अब तक पाठक किताब की देशज-विदेशज भाषा में रम जाएंगे।

लफत्तू और तिवारी मास्साब का डुओ आपको अपने स्कूली दिन याद दिलाने के साथ हंसाते हुए लोटपोट भी कर देगा। लफत्तू इस किताब का जॉनी लीवर है और उसके महिमामंडन में लिखी यह पंक्ति इसे साबित भी करती है ' लफत्तू तब तक महाचोर के रूप में इस कदर विख्यात हो चुका था कि अपने घर से उसे एक अख़बार तक लाने नही दिया जाता था। जब वह एक बार ड्रेस पहनकर रेडी हो जाता तो उसके पिताजी उसे दुबारा पूरी तरह नंगा करते और बस्ता खाली करवाकर जमातलाशी लेते थे'।

'ब्रेस ब्रेस, ब्रेसू टी थानी जो दल गया वो मल गया' में साईंबाबा की अफवाह और मधुबाला से आशिकी करवा लेखक द्वारा बाल मन के एक अलग खिंचाव की तरफ चमक मारी गई है। किताब में बाल मन पर फिल्मों से पड़ने वाले प्रभाव को बड़े प्रभावी तरीके से पाठकों को समझाया गया है।

'ख' और 'भ' की अदला बदली वाले खेल में लेखक ने अपनी लेखन कला के झंडे गड़वा दिए हैं। किताब में आपको कम सुनाई देने वाला 'गुरुपुत्र' शब्द भी पढ़ने को मिलता है।

शीर्षक 'फुच्ची कप्तान की आसिकी' पढ़ने से विलुप्त होती लवलैटर प्रथा फ़िर याद आती है तो लफत्तू का अपने पापा को "बल्ब को भल्ब कैते हो आप! क्या खाक इंग्लित पलाओगे पापा" कहना आपको भी किताब का हिस्सा बनाता है। ये सब किताब के वो हिस्से हैं जो हिंदी किताबों को पढ़ने का ट्रेंड फिर शुरू करा सकते हैं, 'झुकेगा नही' कहने वाले पुष्पा की तरह लफत्तू भी देश का जाना माना पात्र बनने की क्षमता रखता है।

गोबर डॉक्टर, जगुआ पौंक जैसे नाम दिए जाने के पीछे की कहानी भी लेखक द्वारा विस्तार से लिखी गई है। 
'रामनगर का कलापारखी समाज पूर्णमुदित हो जाता' जैसी पंक्ति लेखक की हिंदी में मज़बूत पकड़ की तरफ़ इशारा करती है।

'ज्याउल ,उरस की मूफल्ली, मोर्रम और ब्रिच्छारौपड़' पढ़ते पता चलता है कि बच्चों के मन में कैसे बचपन में ही हिन्दू-मुसलमान के बीच दूरी के बीज उगा दिए जाते हैं। आगे पढ़ते किताब वो दिन भी याद दिलाती है जब अमीर-गरीब के बच्चे साथ ही पढ़ा करते थे।

लफत्तू द्वारा भिखारी को बैरिंगगाड़ी में बैठा घुमाने वाला किस्सा खूब हंसाएगा, तो कुछ समय बाद किताब पाठकों को इमोशनल करना शुरू हो जाएगी। 
अब एक बेहतरीन कहानी अपने अंत की तरफ़ बढ़ती दिखती है।
नसीम अंजुम की एंट्री किसी अभिनेत्री से कम नही है।

'नसबंदी और लकड़ी का रैक' की शुरुआत मुंह में पानी ले आती है। चीनी की सब्ज़ी का किस्सा पाठकों को किताब के आख़िरी पन्नों में भी फिर से गुदगुदाता है।

पृष्ठ 216 में किताब का सार है, क़िताब खत्म करने पर आपका मन जरूर करेगा कि कभी लेखक से मिल उनसे लफत्तू, बागड़बिल्ले के बारे में ढेर सारे सवाल पूछ लिए जाएं और बमपकौड़ा खाने के लिए लेखक की कल्पनाओं के खुले आकाश में उड़ रहे नक्शे अनुसार रामनगर पहुंचा जाए।

समीक्षक- हिमांशु जोशी
@Himanshu28may
पढ़ने में लगा समय- पोज़िशन बदलते लगभग 9 घण्टे..

Wednesday, February 2, 2022

बेरोज़गारी से छटपटाता भारत और अब कृषि ही समाधान.

बेरोजगारी पर चर्चा करते हुए सरकार ने राज्यसभा को बताया कि 2018- 2020 के बीच देशभर में लगभग 25 हजार लोगों ने बेरोजगारी और कर्ज के बोझ के चलते आत्महत्या की हैं।

व्यापार में नुकसान और नौकरी न मिलने की वज़ह से देश में परिवार की जिम्मेदारी का बोझ लादी हुई जनता मानसिक रूप से परेशान है।

इस मंगलवार बागपत के बड़ौत शहर में जूते के थोक व्यापारी ने फेसबुक लाइव पर कैमरे के सामने ज़हर खाकर सुसाइड करने की कोशिश करी। 
व्यापारी को ज़हर खाता देख उनकी पत्नी ने ज़हर की पुड़िया छीनने को कोशिश की, लेकिन तब तक व्यापारी ने लोगों से वीडियो का वायरल करने की अपील करते हुए पानी के साथ ज़हर निगल लिया। इसके बाद उनकी पत्नी ने भी बचा हुआ ज़हर खा लिया।
व्यापारी ने वीडियो में कहा कि सरकार छोटे दुकानदारों और किसानों की हितैषी नही है।

उत्तराखंड में रहने वाला 24 साल का सोनू बिष्ट एक साल से बेरोजगार था। उसके पिता नहीं थे और मां भी गंभीर रूप से बीमार थी। 
कुछ समय उसने सीटीआर निदेशक के कार्यालय में कंप्यूटर ऑपरेटर का कार्य किया, बाद में उसे हटा दिया गया। वह तीन-चार बार सेना में भर्ती के लिए भी गया पर भर्ती न हो पाया। पिछले साल कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के बिजरानी रेंज जंगल में उसका पेड़ से लटका शव मिला था, दुनिया छोड़ने से पहले उसने अपने शैक्षिक प्रमाण-पत्रों को भी जला दिया था।

आज संसद के बजट सत्र में बेरोजगारी पर चर्चा करते हुए सरकार ने राज्यसभा को बताया कि 2018- 2020 के बीच देशभर में लगभग 25 हजार लोगों ने बेरोजगारी और कर्ज के बोझ के चलते आत्महत्या की हैं। जिसमें से 9,140 लोगों ने बेरोजगारी और 16,091 लोगों ने कर्ज के बोझ के चलते अपनी जान गवाई। एक लिखित उत्तर के जवाब में जानकारी देते हुए केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों का हवाला देते हुए राज्यसभा को यह जानकारी दी।

कुछ दिन पहले ही राहुल गांधी ने दो हिंदुस्तान की बात क्या कही थी, बवाल मच गया। बवाल इसलिए क्योंकि गरीबी और बेरोज़गारी हमारे देश में कभी मुद्दा ही नही रही।

हाल ही में निकली रेलवे भर्ती में कुल पदों की संख्या 1 लाख 40 हजार थी, लेकिन उसके लिये ढ़ाई करोड़ लोगों ने आवेदन किया था। देश में बढ़ती बेरोज़गारी का यह एक और ताज़ा उदाहरण है।

बेरोज़गारी की परिभाषा समझना चाहें तो जब देश में कार्य करने वाली जनशक्ति अधिक होती है और काम करने पर राजी भी होती है परंतु उन्हें प्रचलित मजदूरी दर पर कार्य नहीं मिल पाता है तो इसी अवस्था को बेरोजगारी कहते हैं।

आंकड़ों पर नज़र दौड़ाई जाए तो सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) भारत की अर्थव्यवस्था पर नज़र रखने वाली संस्था है, उसके अनुसार दिसंबर 2021 में बेरोजगारी दर बढ़कर 7.9 फीसदी हो गई। नवंबर में यह 7 फीसदी थी। एक साल पहले दिसंबर 2020 में बेरोजगारी दर 9.1 फीसदी से ज्यादा थी। हाल के दिनों में अनुभव किए गए स्तरों की तुलना में भारत में बेरोजगारी दर में वृद्धि हुई है। 
2018-19 में बेरोजगारी दर 6.3 फीसदी और 2017-18 में 4.7 फीसदी थी।

आंकड़ों से साफ है कि कोरोना काल में बेरोज़गारी बढ़ी है, यह हाल तब हुए जब केंद्र सरकार ने कोविड-19 के कारण बने आर्थिक हालात को संभालने और आम लोगों की मदद के लिए मई 2020 में 20 लाख करोड़ रुपये के प्रोत्‍साहन पैकेज की घोषणा की थी।

बेरोज़गारी का मुख्य कारण है कृषि क्षेत्र में सिकुड़ता भारत

स्टेटिस्ता द्वारा दिए इन आंकड़ों के अनुसार भारत में साल 2009 से 2019 तक आर्थिक क्षेत्रों में कार्यबल का वितरण देखने से साफ पता चलता है कि कोरोना काल में पलायन कर गांवों में लौटे प्रवासियों के बेरोज़गार रहने का मूल कारण उनके द्वारा ही छोड़ी गई कृषि है। साल 2009 में कृषि क्षेत्र में कार्यबल 52.5 प्रतिशत था जो साल 2019 आते-आते 42.6 प्रतिशत रह गया था।

कृषि का महत्व हम धर्मवीर का उदाहरण देख समझ सकते हैं।
छह लोगों के परिवार वाले धर्मवीर उत्तराखंड के रुद्रपुर में दूधियानगर इलाके में रहते हैं और पिछले सोलह वर्षों से गोलगप्पे का ठेला लगाते हैं। जब मेरी उनसे मुलाकात हुई तो धर्मवीर ने बताया कि आज महीनों बाद फिर से ठेला लगाया है। कोरोना काल में लॉकडाउन के दौरान उन्होंने रुद्रपुर की ही एक धान मिल में काम किया। 
 ऐसे लाखों लोग थे जिन्हें संकट की इस घड़ी में सिर्फ कृषि आधारित उद्योगों का ही सहारा था। 

देश की आर्थिक स्थिति मज़बूत करने के लिए कृषि क्षेत्र में भी चाहिए कोई वर्गीज कुरियन

भारत में कृषि क्षेत्र को अब किसी नए प्रयोग की उम्मीद है। वर्गीज कुरियन दूध उत्पादन में एक क्रांति ला आने वाली पीढ़ी को कुछ नया करने की सीख दे गए थे।
वर्गीज कुरियन को 'भारत का मिल्कमैन' भी कहा जाता है। एक समय जब भारत में दूध की कमी हो गई थी, कुरियन के नेतृत्व में भारत को दूध उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम शुरू हुआ। कुरियन ने देश में बिलियन लीटर आइडिया, ऑपरेशन फ्लड और डेयरी फार्मिंग जैसे अभियान शुरू किए। आज इन्हीं की बदौलत भारत दूध उत्पाद में विश्व में नंबर एक पर है। इन्हीं की बदौलत एक तिहाई ग्रामीण आय का स्रोत दुग्ध उत्पादन है।

 भारत में बढ़ती बेरोज़गारी पर अर्थशास्त्री अरुण कुमार की टिप्पणी

अरुण कुमार कहते हैं जिस तरह की नीतियां हम अपना रहे हैं, उससे अर्थव्यवस्था में रोजगार नहीं पैदा होता है। सन् 1991 के बाद हमने नई आर्थिक नीतियों को अपनाया और उसके चलते जो ये सारी नीतियां हैं, ये प्रो बिजनेस नीतियां हैं, जिसको सप्लाई साइड कहते हैं। ये मार्केट के आधार पर है या​नी कि बाजारीकरण के आधार पर है, बाजार आगे है और समाज पीछे है।

बाजार की जो नीतियां होती हैं, उसमें डॉलर वोट चलता है। डॉलर वोट का मतलब है कि अगर मेरे पास एक डॉलर है तो एक वोट है और अगर एक लाख डॉलर है तो एक लाख वोट है।

 बाजार में उसकी चलेगी जिसके पास एक लाख डॉलर है, जिसके पास एक डॉलर है, उसकी नहीं चलेगी। अभी पूंजी वहां जाती है, जहां बाजार है। जैसे अगर हम उत्तर प्रदेश की बात करें तो जो पूंजी है वो बांदा में नहीं जायेगी, वो आसपास के इलाकों में जाएगी जैसे कि दिल्ली और एनसीआर नोएडा और गाजियाबाद। मतलब यूपी का मतलब बांदा नहीं है, उसका मतलब है नोएडा और गाजियाबाद। यही कारण है की कानपुर जो कभी इंडस्ट्रीयल शहर होता था, अब वहां उद्योग धंधे बंद हो चुके हैं।

हमारे देश में रोजगार नहीं बढ़ रहा है लेकिन बेरोजगारी का आंकड़ा भी बढ़ता नहीं दिखता है। वजह यह है कि हमारे यहां सोशल सिक्योरिटी नहीं है। अगर आपको रोजगार नहीं मिल रहा हो तो आप ये नहीं कह सकते कि जब तक मुझे मेरे मुताबिक काम न मिल जाए तब तक मैं घर बैठ जाऊंगा। अमेरिका, ब्रिटेन या यूरोप में आपको बेरोजगारी भत्ता मिलता है तो वहां आप वहां सही काम मिलने तक इंतजार कर सकते हैं।

 इसलिए हमारे यहां पेट भरने के लिये इस बीच लोग ठेला चलायेंगे, रिक्शा चलायेंगे या सिर पर बोझा उठायेंगे तब यह मान लिया जाएगा कि उनको रोजगार मिल गया। यही कारण है कि बेरोजगारी का जो आंकड़ा पहले 3-4 प्रतिशत के आसपास रहता था, अब वो 7-8 प्रतिशत के आसपास रहता है। वो ज्यादा बढ़ता नहीं दिखता इसलिए हमारे यहां अंडर एम्प्लॉयमेंट बढ़ जाता है। 

रिक्शा वाला अगर अपने स्टैंड पर 12 घंटे खड़ा रहता है तो उसको दो-तीन घंटे का काम मिलता है, ऐसा ही हाल ठेली वाले, चना-मूंगफली बेचने वाले, सब पर लागू होता है। लेकिन उन सभी को रोजगार वाला मान लिया जाता है। मतलब हमारे यहां डिसगाइज एम्प्लॉयमेंट (छुपी ही बेरोज़गारी) है , यह कृषि क्षेत्र में सबसे अधिक है जहां खेत में जरूरत तो चार लोगों की होती है पर लगे दस लोग होते हैं।

सड़क चमका देने भर से ही नही मिल जाएगा रोजगार

बेरोज़गारी के सवाल पर फ़िल्म और पत्रकारिता जगत से जुड़े पौड़ी निवासी गौरव नौडियाल कहते हैं कि सरकार ने रोज़गार की जगह पुल बनाने और सड़कें चमकाने को प्राथमिकता में रखा। सारे बज़ट को कंस्ट्रक्शन में डाल दिया गया। इको-टूरिज्म से देश के कई हिस्सों में नौकरियां लाई जा सकती थी पर उसके लिए योजनाएं बनानी होंगी, मूलभूत ढांचे तैयार करने होंगे, वर्कशॉप के ज़रिए स्किल्ड लोग तैयार करने होंगे।

हिमांशु जोशी।

Tuesday, February 1, 2022

उत्तराखंड विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश में बढ़ती बेरोज़गारी पर बात भी जरूरी.

एक फेसबुक पेज़ था, उत्तराखंड से जुड़ा हुआ। धर्म पर बड़ी जबरदस्त बहस छिड़ी हुई थी, मैं वहां पांच मिनट बिताने के बाद ही पेज़ से बाहर निकल गया। वहां खुद में नफ़रत समेटे ज्यादातर युवा थे।
दिल्ली दंगो के बाद मन बड़ा व्यथित था कि कहां आईटी हब घोषित होता देश धर्म पर लड़ने लगा और उत्तराखंड में अपने भाई-बहनों के भी ऐसे विचार देख मानो रूह कांप गई।

कारण पर नज़र डालें तो खाली पड़े हुए और ऊपर से वाट्सएप यूनिवर्सिटी में डूबे युवाओं से इससे ज्यादा क्या उम्मीद करी जा सकती है, मैं चाहता हूं कि उत्तराखंड विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश में बढ़ती बेरोज़गारी पर बात की जाए। चुनावी मौसम में युवाओं को भी चाहिए कि वह जाति, धर्म से जुड़े भरमाने वाले मुद्दों को छोड़ अपने असल मुद्दे बेरोज़गारी पर सरकार से बात करें। खुद का भी अच्छा करें और देश को भी आगे ले कर जाएं।

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी के बेरोजगारी के आंकड़ों का विश्लेषण करने से पता चला है कि यूपी, पंजाब, गोवा और उत्तराखंड में दिसंबर 2021 के दौरान नौकरी पेशा लोगों की कुल संख्या पांच साल पहले से भी कम थी।


इन आंकड़ों के सामने आने के बाद और बिहार में रेलवे अभ्यर्थियों के आंदोलन के बाद से उत्तराखंड में भी विधानसभा चुनावों से पहले बेरोज़गारी एक बड़ा मुद्दा बन कर सामने आया है।
 कांग्रेस ने बेरोजगारी को लेकर भाजपा के विरोध में अभियान छेड़ दिया है। पार्टी को उम्मीद है कि इस पर उसे विधानसभा चुनाव में मतदाताओं का समर्थन मिलेगा।

कोरोना की वज़ह से और अधिक बढ़ी बेरोज़गारी

कोरोना के बाद वापस आए प्रवासियों की वज़ह से प्रदेश में बेरोज़गारी और भी अधिक बढ़ गई है। ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग, उत्तराखंड पौड़ी द्वारा जून 2021 में दिए गए आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में पहली लहर के दौरान सितंबर 2020 तक 3,57,536 प्रवासी वापस लौटे थे, जिसमें से सितंबर अंत तक 1,04,849 प्रवासी पुनः वापस चले गए।
 जो प्रवासी प्रदेश में रहे अगर उनके रोज़गार पर नज़र दौड़ाएं तो उनमें से 38 प्रतिशत की आजीविका का मुख्य स्रोत मनरेगा था। जिसका बजट इस बार के बजट में केन्द्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कम कर दिया है।
 कृषि, बागबानी और पशुपालन को आजीविका के तौर पर 33 प्रतिशत लोगों ने अपनाया और स्वरोज़गार अपनाने वाले प्रवासियों का प्रतिशत 12 था।
आंकड़ों से स्पष्ट हो जाता है कि प्रवासियों द्वारा
प्रच्छन्न बेरोजगारी या छुपी हुई बेरोज़गारी की गई थी।

जो रोज़गार में थे उनके क्या हाल

संगीत की शिक्षा प्राप्त करे देहरादून निवासी राहुल थापा कोरोना काल से पहले एक नामी स्कूल में संगीत सिखाते थे, कोरोना की वज़ह से स्कूल बंद होने पर वह ज़ोमेटो में डिलीवरी का काम करने लगे। कहने को रोज़गार के नाम पर और बेरोज़गारी के अवसाद से दूर रहने के लिए राहुल के पास नौकरी तो है पर महंगाई के इस दौर में उनके पास महीने के दस हज़ार रुपए ही बचते हैं जो एक बेहतर भविष्य के लिए नाकाफ़ी हैं।
यही हाल मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के विधानसभा क्षेत्र खटीमा में रहने वाले विजय राणा के भी हैं, जो अमेज़न में डिलीवरी का काम करते हैं।

 खटीमा के ही रहने वाले भास्कर चौसाली लॉकडाउन से पहले दिल्ली के चाणक्यपुरी में एक होटल में कार्य करते थे। अब उन्होंने अपने गांव में ही एक फ़ास्ट फूड रेस्टोरेंट खोला है। भास्कर कहते हैं कि गांव में इतना काम है कि मुझे अपने साथ दो-तीन सहयोगियों की आवश्यकता है लेकिन गांव में मनमाफ़िक काम भी नही किया जा सकता क्योंकि लोग खुद के काम से ज्यादा दूसरों के कामों पर ज्यादा ध्यान देते हैं। शहर की तेज़ जिंदगी में तो पड़ोसियों के नाम तक नही पता होते।

प्रदेशवासियों के रोज़गार की उम्मीद पंतनगर सिडकुल के हालात

प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी की वज़ह से पंतनगर में सिडकुल की स्थापना हुई थी। शुरू में दी गई सब्सिडी की वज़ह से बहुत से कम्पनियों ने सिडकुल में अपना डेरा डाल था, पर अब कोरोना की वज़ह और सब्सिडी समाप्त होने के बाद से बहुत सी कम्पनियां या तो वापस चले गई हैं या उन्होंने कर्मचारियों की छंटनी शुरू कर दी है।
जैसे बहुराष्ट्रीय कंपनी एचपी इंडिया द्वारा अपना प्लांट अचानक बंद कर दिया गया था।

  यूट्यूब चैनल 'अनसुनी आवाज़' चलाने वाले रुद्रपुर निवासी वरिष्ठ पत्रकार रूपेश कुमार बताते हैं कि सिडकुल के शुरुआती दौर में लगभग 450 कम्पनी रजिस्टर थी पर उसमें से लगभग 30 प्रतिशत के प्लॉट अब भी खाली हैं। अभी मात्र 150 प्लांटों में काम चल रहा है, उनमें भी अधिकतर कम्पनियां बड़ी कम्पनियों की वेंडर हैं। सिडकुल से उत्तराखंड के युवाओं को रोज़गार तो मिला नही ,ऊपर से पंतनगर यूनिवर्सिटी की हज़ारों एकड़ की खेती वाली भूमि भी बेकार हो गई।

अल्मोड़ा निवासी ललित नैनवाल कहते हैं कि मेरा वोट उस पार्टी को जो उत्तराखंड से पलायन को रोक सकें और कम कर सके। जो युवा पीढ़ी के दर्द को पहचान सकें। उत्तराखंड में रोजगार के लिये सिडकुल और कम्पनियां बहुत हैं पर फिर भी पलायन क्यों कम नही हो पा रहा हैं। अपने राज्य में रोजगार होने के बावजूद भी उत्तराखंड का युवा वर्ग यहां काम नही करना चाहता है क्योंकि यहां कम्पनियों का मानदेय 8 से 10 हजार रुपये है ,इतनी कम सैलरी में क्या हो पाता है। आज भी उत्तराखंड के युवा वर्ग को 18-20 हज़ार कमाने के लिये दूसरे राज्यों को पलायन करना पड़ता है, ऐसा क्यों!

 क्या यहां की सरकारें यहां की कम्पनियों द्वारा दिया जाने वाला मानदेय तय नही कर सकती हैं!
 अगर उत्तराखंड के सिडकुलों में 18 से 20 हजार रुपये मानदेय सरकार तय कर देती है तो उत्तराखण्ड से पलायन खुद कम होना शुरू हो जाएगा, आने वाली सरकार इस बारे में सोचे।

क्या है समाधान

उत्तराखंड में बेरोज़गारी के सवाल पर फ़िल्म और पत्रकारिता जगत से जुड़े पौड़ी निवासी गौरव नौडियाल कहते हैं कि सरकार ने रोज़गार की जगह पुल बनाने और सड़कें चमकाने को प्राथमिकता में रखा। प्रदेश के सारे बज़ट को कंस्ट्रक्शन में डाल दिया गया। इको-टूरिज्म से प्रदेश में नौकरियां लाई जा सकती थी पर उसके लिए योजनाएं बनानी होंगी, मूलभूत ढांचे तैयार करने होंगे, वर्कशॉप के ज़रिए स्किल्ड लोग तैयार करने होंगे।

उत्तराखंड कांग्रेस के फेसबुक पेज़ में हरीश रावत लिखते हैं
#हमने_किया_है_आगे_भी_करके_दिखाएंगे 
#जय_जैविकता
जीवन के लक्ष्य होते हैं, मेरे अवशेष जीवन का लक्ष्य अब उत्तराखंड और #उत्तराखंडियत है, अब उसमें मैंने एक और लक्ष्य जोड़ दिया है जैविक उत्तराखंड, राज्य के आर्थिक उन्नयन के लिए जैविकता मिशन आवश्यक है और जैविकता के लिए खाद बनाओ का नारा गांव-गांव गूंजना आवश्यक है। सरकार आएगी आपके गाय-भैंस का गोबर, कांग्रेस की सरकार खरीदेगी, वर्मी कंपोस्ट बनायेगी उसमें गांव के इर्द-गिर्द का सारे झाड़-झंकार से वर्मी कंपोस्ट बनेगा। राज्य के प्रत्येक गांव में एक वर्मी कंपोस्ट प्रतिनिधि का चयन कर, उसे प्रशिक्षित कर वर्मी कंपोस्ट को एक बड़े व्यवसाय के रूप में विकसित करेंगे। मैंने कहा था न कि "मेरा गांव-मेरा रोजगार", उस नारे का यह एक कदम है । 
                   जय हिंद, 
जय उत्तराखंड, जय उत्तराखंडियत, जय जैविकता।
----  Harish Rawat


उत्तराखंड के केबर्स गांव में कोरोना के बाद बिगड़ी भारतीय अर्थव्यवस्था के चलते गांव के 18 से 25 साल तक के करीब 55 लड़के घर पर हैं। इनमें से कई लॉकडाउन से पहले शहरों में काम करते थे, लेकिन अब वो खाली हैं। 
ग्राम प्रधान कैलाश सिंह रावत पास गांव में रोज़गार पैदा करने के कुछ उपाय हैं जो रोज़गार को लेकर शोर मचाने वालों को ध्यान से सुनने चाहिए।
वह कहते हैं कि गांव के खाली पड़े हुए घरों को रहने लायक बनाकर 'विलेज टूरिज्म' की दिशा में बढ़ा जा सकता है।
साइटसीइंग, बर्ड वॉचिंग और फॉरेस्ट वॉक के साथ ही परफॉर्मिंग आर्ट को आय के साधन के रूप में विकसित कर सकते हैं।
इकॉनमी का सस्टेनेबल मॉडल तैयार करना होगा, जिससे गांव में ही रोजगार सृजित हो सके।

हिमांशु जोशी, उत्तराखंड।

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...