Friday, February 25, 2022
विश्व महिला दिवस के बीच उन दिनों की बात.
Sunday, February 20, 2022
साइकिल
Thursday, February 17, 2022
Decoding why beautiful story of master and disciple 'Lapujhanna' will be a 21st century's first blockbuster book.
Tuesday, February 15, 2022
खंडित मूर्ति वाले के विचारों से निकले 'हिन्द स्वराज' के ज़रिए कल और आज..
Saturday, February 12, 2022
सेक्स एजुकेशन पर गहरी बात कर गई दीपिका की 'गहराइयां'
Friday, February 11, 2022
उस्ताद और शागिर्द की खूबसूरत कहानी है 'लपूझन्ना'
Wednesday, February 2, 2022
बेरोज़गारी से छटपटाता भारत और अब कृषि ही समाधान.
अरुण कुमार कहते हैं जिस तरह की नीतियां हम अपना रहे हैं, उससे अर्थव्यवस्था में रोजगार नहीं पैदा होता है। सन् 1991 के बाद हमने नई आर्थिक नीतियों को अपनाया और उसके चलते जो ये सारी नीतियां हैं, ये प्रो बिजनेस नीतियां हैं, जिसको सप्लाई साइड कहते हैं। ये मार्केट के आधार पर है यानी कि बाजारीकरण के आधार पर है, बाजार आगे है और समाज पीछे है।
बाजार की जो नीतियां होती हैं, उसमें डॉलर वोट चलता है। डॉलर वोट का मतलब है कि अगर मेरे पास एक डॉलर है तो एक वोट है और अगर एक लाख डॉलर है तो एक लाख वोट है।
बाजार में उसकी चलेगी जिसके पास एक लाख डॉलर है, जिसके पास एक डॉलर है, उसकी नहीं चलेगी। अभी पूंजी वहां जाती है, जहां बाजार है। जैसे अगर हम उत्तर प्रदेश की बात करें तो जो पूंजी है वो बांदा में नहीं जायेगी, वो आसपास के इलाकों में जाएगी जैसे कि दिल्ली और एनसीआर नोएडा और गाजियाबाद। मतलब यूपी का मतलब बांदा नहीं है, उसका मतलब है नोएडा और गाजियाबाद। यही कारण है की कानपुर जो कभी इंडस्ट्रीयल शहर होता था, अब वहां उद्योग धंधे बंद हो चुके हैं।
हमारे देश में रोजगार नहीं बढ़ रहा है लेकिन बेरोजगारी का आंकड़ा भी बढ़ता नहीं दिखता है। वजह यह है कि हमारे यहां सोशल सिक्योरिटी नहीं है। अगर आपको रोजगार नहीं मिल रहा हो तो आप ये नहीं कह सकते कि जब तक मुझे मेरे मुताबिक काम न मिल जाए तब तक मैं घर बैठ जाऊंगा। अमेरिका, ब्रिटेन या यूरोप में आपको बेरोजगारी भत्ता मिलता है तो वहां आप वहां सही काम मिलने तक इंतजार कर सकते हैं।
इसलिए हमारे यहां पेट भरने के लिये इस बीच लोग ठेला चलायेंगे, रिक्शा चलायेंगे या सिर पर बोझा उठायेंगे तब यह मान लिया जाएगा कि उनको रोजगार मिल गया। यही कारण है कि बेरोजगारी का जो आंकड़ा पहले 3-4 प्रतिशत के आसपास रहता था, अब वो 7-8 प्रतिशत के आसपास रहता है। वो ज्यादा बढ़ता नहीं दिखता इसलिए हमारे यहां अंडर एम्प्लॉयमेंट बढ़ जाता है।
रिक्शा वाला अगर अपने स्टैंड पर 12 घंटे खड़ा रहता है तो उसको दो-तीन घंटे का काम मिलता है, ऐसा ही हाल ठेली वाले, चना-मूंगफली बेचने वाले, सब पर लागू होता है। लेकिन उन सभी को रोजगार वाला मान लिया जाता है। मतलब हमारे यहां डिसगाइज एम्प्लॉयमेंट (छुपी ही बेरोज़गारी) है , यह कृषि क्षेत्र में सबसे अधिक है जहां खेत में जरूरत तो चार लोगों की होती है पर लगे दस लोग होते हैं।
सड़क चमका देने भर से ही नही मिल जाएगा रोजगार
बेरोज़गारी के सवाल पर फ़िल्म और पत्रकारिता जगत से जुड़े पौड़ी निवासी गौरव नौडियाल कहते हैं कि सरकार ने रोज़गार की जगह पुल बनाने और सड़कें चमकाने को प्राथमिकता में रखा। सारे बज़ट को कंस्ट्रक्शन में डाल दिया गया। इको-टूरिज्म से देश के कई हिस्सों में नौकरियां लाई जा सकती थी पर उसके लिए योजनाएं बनानी होंगी, मूलभूत ढांचे तैयार करने होंगे, वर्कशॉप के ज़रिए स्किल्ड लोग तैयार करने होंगे।
हिमांशु जोशी।
Tuesday, February 1, 2022
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश में बढ़ती बेरोज़गारी पर बात भी जरूरी.
यूट्यूब चैनल 'अनसुनी आवाज़' चलाने वाले रुद्रपुर निवासी वरिष्ठ पत्रकार रूपेश कुमार बताते हैं कि सिडकुल के शुरुआती दौर में लगभग 450 कम्पनी रजिस्टर थी पर उसमें से लगभग 30 प्रतिशत के प्लॉट अब भी खाली हैं। अभी मात्र 150 प्लांटों में काम चल रहा है, उनमें भी अधिकतर कम्पनियां बड़ी कम्पनियों की वेंडर हैं। सिडकुल से उत्तराखंड के युवाओं को रोज़गार तो मिला नही ,ऊपर से पंतनगर यूनिवर्सिटी की हज़ारों एकड़ की खेती वाली भूमि भी बेकार हो गई।
अल्मोड़ा निवासी ललित नैनवाल कहते हैं कि मेरा वोट उस पार्टी को जो उत्तराखंड से पलायन को रोक सकें और कम कर सके। जो युवा पीढ़ी के दर्द को पहचान सकें। उत्तराखंड में रोजगार के लिये सिडकुल और कम्पनियां बहुत हैं पर फिर भी पलायन क्यों कम नही हो पा रहा हैं। अपने राज्य में रोजगार होने के बावजूद भी उत्तराखंड का युवा वर्ग यहां काम नही करना चाहता है क्योंकि यहां कम्पनियों का मानदेय 8 से 10 हजार रुपये है ,इतनी कम सैलरी में क्या हो पाता है। आज भी उत्तराखंड के युवा वर्ग को 18-20 हज़ार कमाने के लिये दूसरे राज्यों को पलायन करना पड़ता है, ऐसा क्यों!
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