Wednesday, April 29, 2026

परंपरा, पहचान और प्रदर्शन के बीच रील्स के दौर में नृत्य

*परंपरा, पहचान और प्रदर्शन के बीच रील्स के दौर में नृत्य*

रील्स और सोशल मीडिया के दौर में नृत्य तेजी से मनोरंजन तक सीमित होता जा रहा है. पश्चिमी शैलियों के बढ़ते प्रभाव के बीच भारतीय शास्त्रीय और लोक नृत्य अपनी पहचान और सम्मान के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

इसी संदर्भ में कथक नर्तक आशीष सिंह का दृष्टिकोण सामने आता है, वह वाराणसी से हैं और वर्तमान में वृन्दावन धाम में रहकर नृत्य साधना कर रहे हैं. उन्होंने कथक की प्रारंभिक शिक्षा पंडित बिरजू महाराज की शिष्या संगीता सिन्हा से प्राप्त की और बनारस घराने की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से संगीत एवं मंच कला में स्नातक और परास्नातक करने के बाद वे देश-विदेश में कई प्रस्तुतियां दे चुके हैं.

*पश्चिमी झुकाव और भारतीय नृत्य का भविष्य*

आशीष सिंह के अनुसार भारत में पाश्चात्य नृत्य शैलियों को जिस तरह बढ़ावा मिल रहा है, उसका असर युवाओं पर स्पष्ट दिखाई देता है. युवा यह देख रहे हैं कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य को साधने में लंबा समय और गहन अभ्यास लगता है, जबकि पश्चिमी शैलियों में अपेक्षाकृत कम समय में पहचान और आमदनी के अवसर मिल जाते हैं. यह स्थिति भारतीय कला और संस्कृति के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है.

उनके मुताबिक विडंबना यह है कि अपनी ही संस्कृति उपेक्षा का शिकार हो रही है. बड़े आयोजनों में भी अक्सर पारंपरिक कलाकारों के बजाय फिल्मी कलाकारों को प्राथमिकता दी जाती है. अगर यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले समय में भारतीय नृत्य परंपराओं को आगे बढ़ाना और कठिन हो जाएगा.

*रियलिटी शो और नृत्य का बदलता स्वरूप*

रियलिटी शो ने नृत्य को लोकप्रिय बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है, लेकिन इसके साथ नृत्य के मूल स्वरूप में बदलाव भी साफ दिखता है. आशीष सिंह के अनुसार नृत्य को प्रसिद्धि तो मिल रही है, लेकिन उसकी मूल आत्मा के साथ नहीं. प्रस्तुतियां अब इस तरह तैयार की जाती हैं कि वे तुरंत दर्शकों को आकर्षित करें, जिससे गहराई और पारंपरिक तत्व पीछे छूटते जा रहे हैं.

इस प्रवृत्ति के कारण भारतीय नृत्य शैलियों की मौलिकता प्रभावित हो रही है. बाहरी आकर्षण और प्रदर्शन की चमक बढ़ी है, जबकि साधना और परंपरा का पक्ष कमजोर पड़ता दिख रहा है. जरूरत इस बात की है कि रियलिटी शो भी पारंपरिक स्वरूप के प्रति संवेदनशील रहें और नृत्य की असली पहचान को बनाए रखें.

*सोशल मीडिया और नृत्य की गंभीरता*

सोशल मीडिया के दौर में नृत्य तेजी से छोटे वीडियो और रील्स तक सीमित होता जा रहा है. आशीष सिंह का मानना है कि इससे नृत्य की गंभीरता प्रभावित हुई है. नृत्य, जो कभी ईश्वर को समर्पित साधना माना जाता था, अब अधिकतर मनोरंजन का माध्यम बनता जा रहा है.

भारतीय नृत्य परंपरा को कुछ सेकंड की रील में समेट पाना संभव नहीं है. इसके लिए समय, गहराई और निरंतर अभ्यास की आवश्यकता होती है. नृत्य को समझने और साधने के लिए कठिन परिश्रम जरूरी है, तभी उसकी असली भावना सामने आ सकती है.

*नई पीढ़ी और अवसरों की जरूरत*

नई पीढ़ी को भारतीय नृत्य से जोड़ने के लिए आशीष सिंह व्यवस्था में बदलाव की जरूरत पर जोर देते हैं. उनके अनुसार अगर युवाओं को अपने शहरों में बेहतर मंच, प्रदर्शन के अवसर और रोजगार की संभावनाएं मिलें, तो वे खुद ही इस कला की ओर आकर्षित होंगे.

वे मानते हैं कि समय के साथ बदलाव स्वाभाविक है, लेकिन मूल तत्वों से समझौता नहीं होना चाहिए. सही अवसर मिलने पर नई पीढ़ी इस परंपरा को आगे बढ़ाने में सक्षम है.

*संघर्ष और समाज के लिए संदेश*

कथक जैसे शास्त्रीय नृत्य को अपनाने के कारण आशीष सिंह को सामाजिक तानों का सामना भी करना पड़ा, लेकिन उन्होंने इसे अपनी राह में बाधा नहीं बनने दिया. लगातार प्रयास और समर्पण के जरिए उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई.

समाज के लिए उनका संदेश स्पष्ट है कि अगर सहयोग नहीं कर सकते, तो अपमान भी न करें. व्यक्ति की क्षमता और भविष्य को लेकर कोई निश्चित धारणा नहीं बनाई जा सकती. जब लक्ष्य स्पष्ट होता है, तो बाहरी आवाजें धीरे-धीरे महत्व खो देती हैं और ध्यान केवल मंजिल तक पहुंचने पर केंद्रित रहता है.

Tuesday, April 28, 2026

आज 29 अप्रैल, विश्व नृत्य दिवस है. ऐसे मौकों पर हम नृत्य की बात तो करते हैं, लेकिन यह कम सोचते हैं कि नृत्य हमारे समय में किस दिशा में जा रहा है.
नृत्य अब मंच से निकलकर मोबाइल स्क्रीन तक आ गया है. कुछ सेकंड के वीडियो में कला भी है और पहचान की तलाश भी. लोकप्रियता बढ़ी है, लेकिन सवाल यह है कि क्या समझ भी उतनी ही बढ़ी है.
भारत में नृत्य हमेशा परंपरा और संस्कृति से जुड़ा रहा है, फिर भी नई पीढ़ी का झुकाव तेजी से पश्चिमी शैलियों की ओर दिखता है. रियलिटी शो और सोशल मीडिया ने अवसर दिए हैं, लेकिन उन्होंने नृत्य को किस रूप में बदला है, यह देखना जरूरी है.
आज का दिन शायद इसी पर ठहरकर सोचने का है कि नृत्य हमारे लिए सिर्फ प्रदर्शन है या हमारी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा भी. इसी विषय को समझने के लिए हमने कथक नर्तक आशीष सिंह (नृत्य मंजरी दास) से बातचीत की.

आशीष सिंह वाराणसी से हैं और इस समय वृन्दावन धाम में रहकर अपनी नृत्य साधना कर रहे हैं. इन्होंने कथक की प्रारंभिक शिक्षा पंडित बिरजू महाराज की शिष्या श्रीमती संगीता सिन्हा से प्राप्त की और बनारस घराने की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से संगीत एवं मंच कला में स्नातक और परास्नातक करने के साथ इन्होंने देश और विदेश में कई प्रस्तुतियां दी हैं.

इन दिनों भारत में युवाओं का झुकाव पश्चिमी नृत्य शैलियों की ओर बढ़ रहा है, ऐसे में भारतीय शास्त्रीय और लोक नृत्यों का भविष्य आप कैसे देखते हैं?
इस सवाल पर आशीष कहते हैं पाश्चात्य नृत्य को अपने ही देश में ज्यादा बढ़ावा दिया जा रहा है और उसका असर आज के युवाओं पर साफ दिखता है. युवा यह देख रहे हैं कि भारतीय नृत्य को साधने में जितनी मेहनत और समय लगता है, उतनी चुनौती पाश्चात्य शैलियों में नहीं है. उसमें कम समय में जल्दी पहचान भी मिल जाती है और आमदनी के मौके भी ज्यादा दिखते हैं.
यह दुखद है कि अपनी ही संस्कृति उपेक्षा का शिकार हो रही है. हम अपनी कला और कलाकारों को वह सम्मान और संरक्षण नहीं दे पा रहे हैं, जिसके वे हकदार हैं. हमारे यहां जो बड़े आयोजन होते हैं, उनमें भी अक्सर बाहर के फिल्मी कलाकारों को प्राथमिकता दी जाती है, इस पर सोचने की जरूरत है.
अगर यही स्थिति बनी रही तो आने वाले समय में भारतीय परंपरा और नृत्य को आगे ले जाना और भी कठिन हो जाएगा.


रियलिटी शो नृत्य को लोकप्रिय बनाने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं, ये भारतीय नृत्य शैलियों की गहराई और मूल स्वरूप को कमजोर भी कर रहे हैं! यह पूछने पर उन्होंने कहा, बिलकुल ऐसा ही हो रहा है. नृत्य को प्रसिद्धि तो मिल रही है, लेकिन अपने मूल रूप के लिए नहीं, बल्कि वैसा रूप सामने आ रहा है जो समाज को तुरंत पसंद आ जाए.
इसी कारण भारतीय नृत्य शैलियों की गहराई और उनके मूल तत्व धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं. प्रस्तुति में बाहरी आकर्षण ज्यादा हो गया है और परंपरा पीछे छूटती दिख रही है.
जरूरत इस बात की है कि रियलिटी शो अपनी मूल परंपरा के अनुरूप भी आयोजित हों, ताकि हम अपनी संस्कृति का असली रूप दर्शकों तक पहुँचा सकें.

सोशल मीडिया के दौर में नृत्य तेजी से छोटे वीडियो और रील्स तक सीमित होता जा रहा है. इस पर आशीष सिंह कहते हैं कि नृत्य अब कला के बजाय मनोरंजन का जरिया बनता जा रहा है. पहले नृत्य भगवान के चरणों में समर्पित किया जाता था, उन्हें प्रसन्न करने का माध्यम था, लेकिन आज वही नृत्य लोगों को रिझाने का साधन बन गया है.
हमारी भारतीय नृत्य परंपरा एक साधना है, जिसे कुछ सेकंड की रील में पूरी तरह नहीं दिखाया जा सकता. इसके लिए गहराई, समय और निरंतर अभ्यास की जरूरत होती है.
नृत्य को समझने और साधने के लिए कठिन परिश्रम जरूरी है, तभी उसकी असली भावना सामने आ सकती है.

नई पीढ़ी को भारतीय नृत्य से जोड़ने के सवाल पर आशीष सिंह कहते हैं कि बदलाव करना है तो अपनी व्यवस्थाओं में करना होगा. जब युवाओं को अपने शहरों में नृत्य के लिए सही मंच मिलेगा, प्रदर्शन के मौके मिलेंगे और अलग अलग आयोजनों में भागीदारी का अवसर मिलेगा, साथ ही इस कला से जुड़ी रोजगार की संभावनाएं भी सामने आएंगी, तो वे खुद ही इससे जुड़ेंगे.
वह कहते हैं कि थोड़ा बहुत बदलाव हर समय में होता रहा है, लेकिन मूल तत्व से समझौता नहीं होना चाहिए. अगर आज की युवा पीढ़ी को सही अवसर मिले, तो वे इस कला से जरूर जुड़ेंगे.

एक लड़का होकर कथक करने के कारण आशीष सिंह को समाज के ताने भी सुनने पड़े. लेकिन उन्होंने इन बातों को अपनी राह में रुकावट नहीं बनने दिया और नृत्य के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई.
विश्व नृत्य दिवस के मौके पर वह समाज को एक सीधा संदेश देते हैं कि अगर आप किसी का सहयोग नहीं कर सकते, तो उसे अपमानित भी मत करिए. किसकी किस्मत में क्या लिखा है, यह कोई नहीं जानता.
वह कहते हैं कि जब इंसान अपनी मंजिल पर ध्यान केंद्रित कर लेता है, तो लोगों के ताने और अशब्द सुनाई नहीं देते. बस एक ही बात समझ आती है कि हमें अपनी मंजिल तक पहुँचना है.

Saturday, April 25, 2026

छात्रों पर शिक्षा का दबाव, क्या है समाधान

*छात्रों पर शिक्षा का दबाव, क्या है समाधान*

मैं गणित और विज्ञान में हमेशा से कमजोर रहा हूं और यह बात रिश्तेदारों और दोस्तों को भी पता थी. विषयों में प्राप्त अंकों का सार्वजनिक होना एक तरह से निजता का हनन था, लेकिन शायद उस समय मैंने इसे सहजता से झेल लिया. मेरे भीतर बेशर्मी की एक मोटी परत थी, जिसने मुझे बचाए रखा.

आज भी जब परिवार वाले या दोस्त पड़ोसी टॉपरों की तस्वीरें साझा करते हैं, तो लगता है कि सफलता का जश्न मनाने में हम कितने उदार हैं, लेकिन कम अंक लाने वाले या असफल छात्रों के दुख को साझा करने में उतने ही कंजूस. यह असंतुलन ही समस्या की जड़ है.
हारना-जीतना, पास-फेल होना जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन हमने इसे इंसान को परखने का पैमाना बना दिया है. यही वह सोच है, जो बच्चों पर अनावश्यक दबाव डालती है और कई बार उन्हें ऐसे कदम उठाने पर मजबूर कर देती है. इन घटनाओं के पीछे केवल एक छात्र की व्यक्तिगत कमजोरी नहीं, बल्कि हमारा वही समाज खड़ा है, जो अंकों को इंसान से बड़ा बना देता है.

*73 प्रतिशत अंक और फिर भी निराशा*

उत्तराखंड हाईस्कूल बोर्ड परीक्षा का परिणाम आने के बाद विकास खंड लोहाघाट के एक गांव से चिंताजनक खबर सामने आई है. यहां एक छात्र ने फंदे में लटककर आत्महत्या करने का प्रयास किया. बताया जा रहा है कि छात्र ने हाईस्कूल बोर्ड परीक्षा में 73 फीसदी अंक प्राप्त किए थे. अच्छे अंक होने के बावजूद यह कदम उठाया जाना परीक्षा परिणाम और उससे जुड़े दबाव पर गंभीर सवाल खड़े करता है.

*आंकड़े जो चुपचाप बहुत कुछ कहते हैं*

इसके आगे अगर व्यापक तस्वीर देखें तो राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट Accidental Deaths & Suicides in India 2022 के अनुसार देश में परीक्षा में असफलता के कारण 2,248 लोगों ने आत्महत्या की. इसी वर्ष 13 हजार से अधिक छात्रों ने आत्महत्या की, यानी औसतन हर दिन 35 से ज्यादा छात्र अपनी जान गंवा रहे हैं. ये आंकड़े बताते हैं कि परीक्षा और अंकों का दबाव अब केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक संकट बन चुका है.

*अंकों की अंधी दौड़ और खत्म होती सृजनशीलता*

छात्रों की आत्महत्याओं पर शिक्षक महेश पुनेठा कहते हैं कि जब तक हम परीक्षा में प्राप्त अंकों का सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन करना और उसका जश्न मनाना बंद नहीं करते हैं, तब तक अंकों के लिए लगने वाली अंधी दौड़ और उससे पैदा होने वाला दबाव खत्म नहीं कर सकते हैं. उनके अनुसार यही दबाव बच्चों को गहरे अवसाद की ओर ले जाता है और आत्महत्याओं जैसी घटनाओं को जन्म देता है.

वे कहते हैं कि अंकों के लिए लगने वाली यह अंधी दौड़ बच्चों की सारी सृजनशीलता को सोख लेती है और उनके स्वाभाविक विकास को अवरुद्ध कर देती है. यह स्थिति कुछ वैसी ही है जैसे अधिक दूध प्राप्त करने के लिए दुधारू पशुओं को इंजेक्शन लगाए जाते हैं. महेश पुनेठा ने आगे कहा कि दुनिया के कुछ देशों में बच्चों के अंकों को पूरी तरह गोपनीय रखा जाता है, यहां तक कि सहपाठियों को भी इसकी जानकारी नहीं होती और इसे बच्चे की निजता के अधिकार से जोड़कर देखा जाता है.

*दिखावे का समाज और अंकों की संस्कृति*

इस विषय पर ‘मेरी स्कूल डायरी’ किताब की लेखिका रेखा चमोली लिखती हैं कि हमारे जैसे समाज में यह व्यवस्था अभी संभव नहीं लगती, जहां लोग अपने कपड़ों, गहनों, गाड़ी, घर, बगीचे और यहां तक कि खाने-पीने तक को दूसरों को दिखाना अपनी शान समझते हैं. ऐसे माहौल में अंकों को गोपनीय रखने की बात व्यवहार में लागू करना कठिन दिखाई देता है.

वे आगे लिखती हैं कि शिक्षा लगातार अपने मूल उद्देश्य से भटकती जा रही है. एक अच्छा और संवेदनशील मनुष्य बनाने की प्रक्रिया के बजाय यह केवल अंकों की प्राप्ति तक सिमटती जा रही है. यही वजह है कि पढ़ाई का अर्थ सीखना नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धा में आगे निकलना रह गया है.

मासूमियत बनाम युद्ध : सिनेमा में बच्चों की त्रासदी

*मासूमियत बनाम युद्ध, सिनेमा में बच्चों की त्रासदी*

जापान के सार्वजनिक प्रसारक एनएचके को दिए गए साक्षात्कार में यूनिसेफ की कार्यकारी निदेशक कैथरीन रसेल ने मध्य पूर्व में तत्काल और स्थायी युद्धविराम की अपील करते हुए कहा है कि संघर्षों का सबसे ज्यादा खामियाजा बच्चों को भुगतना पड़ता है. एनएचके की एक रिपोर्ट के अनुसार संबंधित देशों द्वारा एजेंसी को सौंपी गई रिपोर्टों में दावा किया गया है कि दो महीने पहले अमेरिका-इजरायल सैन्य अभियान शुरू होने के बाद से ईरान में 220 से अधिक बच्चे और लेबनान में कम से कम 177 बच्चे मारे गए हैं. इस घटना में इजराइल में चार बच्चों की मौत हुई, जबकि कुवैत में एक बच्चे की मौत हुई.

https://www.instagram.com/p/DWjjEpMDNwJ/?igsh=NmFqNXlzNzRjd2Qw

*जब सिनेमा में दिखी युद्ध की त्रासदी*

युद्ध का सबसे गहरा असर बच्चों पर पड़ता है यह बात सिनेमा में बेहद संवेदनशील और असरदार ढंग से दिखाई गई है. कुछ फिल्में ऐसी हैं जो बच्चों की नजर से युद्ध की त्रासदी को इस तरह दिखाती हैं कि दर्शक विचलित हो जाते हैं.

*Grave of the Fireflies*

Isao Takahata द्वारा निर्देशित यह एनिमेटेड फिल्म 1988 में रिलीज हुई थी. यह कहानी बमबारी से तबाह एक शहर में रह रहे भाई-बहन की है. बड़ा भाई अपनी छोटी बहन से मां की बमबारी में हुई मौत की सच्चाई छिपा लेता है और यह बात आंटी से कहता है.

युद्ध के बीच एक भाई द्वारा अपनी बहन को खिलाते हुए और उसे छोटी-छोटी खुशियों में झूमते देख यह एहसास होता है कि हालात कैसे भी हों, बचपन अपनी मासूमियत बनाए रखता है, लेकिन युद्ध धीरे-धीरे उसे छीन लेता है. फिल्म में चिड़ियों का चहचहाना और समुद्र की लहरों की आवाज जैसे दृश्य यह महसूस कराते हैं कि युद्ध इस खूबसूरत दुनिया से हमसे कितना कुछ छीन लेता है.
खाने की व्यवस्था के लिए बड़े भाई को अपनी मां के कपड़े आंटी को देने पड़ते हैं, जिसे देखकर उसकी बहन रो पड़ती है. फिल्म में ऐसे कई दृश्य हैं जो दर्शकों को युद्धग्रस्त क्षेत्रों में रह रहे बच्चों की वास्तविक स्थिति से परिचित कराते हैं. फिल्म का अंत इतना मार्मिक है कि इसे देखने वालों की आंखें नम हो जाती हैं और यह सोचकर और भी भर आती हैं कि ऐसी त्रासदियां फिल्म के वर्षों बाद भी दुनिया में कहीं न कहीं जारी हैं.

https://youtu.be/lhlh7JVcTt8

*The Boy in the Striped Pajamas*

2008 में आई इस फिल्म का निर्देशन Mark Herman ने किया है.
यह फिल्म दो मासूम बच्चों की दोस्ती के जरिए यह दिखाती है कि नफरत और युद्ध की राजनीति किस तरह निर्दोष जीवन को निगल जाती है.
एक तार के दोनों तरफ दो ऐसे बच्चे हैं जो एक दूसरे की दुनिया से अंजान हैं. एक तरफ सेना के अफसर का बेटा है, तो दूसरी तरफ एक कैदी बच्चा. इन दोनों की दोस्ती यह दिखाती है कि देशों के नागरिकों के बीच दुश्मनी स्वाभाविक नहीं होती, बल्कि यह राजनीति की उपज होती है. The Boy in the Striped Pajamas हमें यह भी दिखाती है कि युद्ध के दौरान सैनिकों और उनके परिवारों पर किस तरह का मानसिक दबाव पड़ता है.
इस तरह की फिल्में, सिनेमा के उस मूल उद्देश्य को पूरा करती हैं, जिसके तहत सिनेमा समाज को जागरूक, जिम्मेदार और संवेदनशील बनाने का माध्यम बनता है.

https://youtu.be/Mu8uIOjLKwg

*Life Is Beautiful*

Roberto Benigni द्वारा निर्देशित यह फिल्म 1997 में रिलीज हुई थी. फिल्म ने तीन श्रेणियों में Academy Awards जीते.

https://youtu.be/gtBbi-0Ryq0

Roberto Benigni ने ही फिल्म में 'गुइडो' नाम के व्यक्ति का किरदार निभाया है. एक जिंदादिल व्यक्ति से अपने बेटे के साथ युद्धबंदी बनने के बाद भी गुइडो अपने बेटे के लिए एक सुपरहीरो बना रहता है और उसे यह एहसास नहीं होने देता कि वे कैद में हैं. वह अपने बेटे को यह विश्वास दिलाता है कि यह सब एक गेम है और गेम जीतने पर उसे टैंक पर बैठाया जाएगा.
यह फिल्म दिखाती है कि युद्ध जैसी भयावह स्थिति में भी एक पिता अपने बच्चे के बचपन को बचाने के लिए किस हद तक जा सकता है. Roberto Benigni के शानदार अभिनय ने फिल्म को और भी प्रभावशाली बनाया है.

Wednesday, April 22, 2026

विश्व पुस्तक दिवस: चार किताबें, चार रंग और एक समाज की पूरी कहानी

विश्व पुस्तक दिवस पर हम साल 2022 में प्रकाशित होकर आई चार किताबों की बात करेंगे, इन चार किताबों में पहाड़ का संघर्ष, बचपन की मासूमियत, स्त्री मन की जटिलता और समाज पर व्यंग्य एक साथ दर्ज है. ये किताबें अपने समय और समाज को समझने के लिए चुनी गई हैं.

जनांदोलन, पहाड़ और बदलता उत्तराखंड

उपन्यास 'देवभूमि डेवलपर्स' में नायक और नायिका अपने-अपने सफर पर निकलते हैं, उनका ये सफर बाद में एक बन जाता है. नायक नायिका के इस सफर को 'दावानल' उपन्यास के लिए मशहूर लेखक नवीन जोशी ने उत्तराखंड के पिछले कुछ सालों में महत्वपूर्ण रहे जनांदोलनों के साथ जोड़ते हुए लिखा है. लेखक इस किताब को लिखते हुए उत्तराखंड के राजनीतिक और सामाजिक ढांचे पर भी पाठकों की समझ बनाने में कामयाब रहे हैं. 'लपूझन्ना' के लेखक अशोक पांडे द्वारा खींचा गया चित्र इस किताब का आवरण चित्र है. बर्फ से लदे हिमालय, रोलर, सड़क और बच्चे के साथ साधारण कपड़ों में खड़ी महिला को देख कर ,यह अनुमान लगाया जा सकता है कि किताब हिमालय के साथ हो रही छेड़छाड़ और पहाड़ों में रहने वाले लोगों के कठिन जीवन पर लिखी गई है. 'कूच करो भई कूच करो' इस किताब का पहला भाग है, जो हमें साल 1984 के उत्तराखंड में पहुंचा देता है. लेखक द्वारा यह किताब बहुत ही आसान भाषा में लिखी गई है , जिसकी वजह से पाठक किताब की शुरुआत में इसे पढ़ने में रुचि लेने लगते हैं. शराब के विरुद्ध आंदोलनों के दौर के साथ दुनिया भर में मशहूर चिपको आंदोलन पर लिखते हुए लेखक अपनी कहानी के मुख्य पात्र पुष्कर से पाठकों का परिचय कराते हैं. कहानी पढ़ते हुए आपकी समझ में आने लगेगा कि इसमें शामिल बहुत से पात्र और घटनाएं वास्तविक हैं. किताब के दूसरे भाग में पुष्कर की पत्नी कविता के जरिए हम सच्चे और अच्छे पत्रकार के गुण जान सकते हैं. कविता के जरिए लेखक ने पत्रकारिता के छात्रों को बहुत सारी सीखें देने की कोशिश करी है. 'बहुत सुंदर है हमारा गांव. कविता की नजरें हिमालय के शिखरों पर टिकी थी. काश,जीवन भी सुंदर होता. पुष्कर ने आह भरी' यह पंक्ति पहाड़ में रहने वाले लोगों के द्वारा उठाए जा रहे कष्टों की तरफ इशारा करती है. इस भाग को आगे पढ़ते हुए हमें पहाड़ों में पिनालु का साग उगाने और मधुमक्खी पालन जैसे स्वरोजगारों के बारे में जानकारी मिलती है. 'कोई कह रहा है छोटी जात की है. किसी ने चला दी, मुशई (मुसलमान) से ब्या किया है. मैंने बता रखा है, देसी है मगर बामण है. तू यही कहना' पंक्ति पहाड़ में व्याप्त जातिवाद को दर्शाती हैं. इस किताब में अन्य कई जगह भी उत्तराखंड में व्याप्त जातिवाद के कारणों को गहराई से समझाया गया है, पुष्कर का जातिवाद के खिलाफ आवाज उठाना कहानी का सबसे जरूरी हिस्सा भी जान पड़ता है. किताब का तीसरा भाग 'बाँध दी गई नदी में डूबता समाज' है.  यह उत्तराखंड के निर्भीक पत्रकार उमेश डोभाल के बारे  में बहुत सी जानकारी देता है. यहां पर उत्तराखंड में जल-जंगल-जमीन के लिए सालों से लड़ रहे लोगों के आपसी सम्बन्धों के बारे में भी लिखा है. टिहरी बांध बनने से रोकने के लिए चले संघर्ष और उस संघर्ष की नाकामी पर लेखक ने यहां बहुत कुछ लिखा है.  'विस्थापन सिर्फ मकान और आदमी का नही होता, पूरी सभ्यता, समाज, संस्कृति और जीवन स्त्रोतों से उखड़ जाना होता है' पंक्ति लिख कर लेखक ने विस्थापितों का दर्द समझाने की कोशिश की है. 'राजधानी से राज्य छुड़ाकर लाना है' इस रोचक उपन्यास का अगला भाग है और इस भाग में शराब से पहाड़ के जीवन पर पड़ते बुरे असर की शुरुआत को सामने लाया गया है. खटीमा, मसूरी गोलीकांड के समय में मीडिया की क्या भूमिका रही थी,  किताब पढ़ते हमें इसकी जानकारी भी मिलती जाती है. 'शांत हिमालय धधक रहा है' किताब का पांचवा भाग है और इसे पढ़ते कहानी के समय में उत्तराखंड को लेकर चल रही फेक न्यूज बनाम 'समाचार' के बारे में जानकारी मिलती है. समाचार द्वारा साल 1994 में जनता तक सही खबरें पहुंचाए जाने का तरीका पढ़ने योग्य है. मैदान से पहाड़ जाने के दौरान बदलती दशा को सामने लाने के लिए किताब की यह पंक्ति 'हल्द्वानी से आगे पहाड़ चढ़ने पर प्राकृतिक दृश्य ही नही बदलता, आबादी की संरचना और हालात भी बहुत बदल जाते हैं' महत्वपूर्ण है. किताब के इस भाग में अतुल शर्मा और नरेंद्र सिंह नेगी जैसे जन कवियों की कविताओं के साथ ही उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था, राजनीति के बारे में भी लिखा गया है. किताब में बहुत सी जगह ऐसी हैं जहां लेखक ने अपने शब्दों के जरिए उत्तराखंड के पहाड़ों की खूबसूरती का मनमोहक दृश्य पाठकों की आंखों के सामने साक्षात रख दिया है. अगला भाग आपको उत्तराखंड राज्य गठन के आसपास वाले समय में पहुंचा देता है और इसकी शुरुआत पुष्कर द्वारा नए राज्य को लेकर बुने गए सपनों के टूटने से शुरू होती है.  उत्तराखंड गठन के दिन को लेखक ने बड़े बेहतरीन तरीके से लिखा है. इसे पढ़ते नायक की उधेड़बुन पाठक को खुद की उधेड़बुन महसूस होने लगती है. पृष्ठ संख्या 205 में लिखी हुई पंक्ति 'कुंदन को अफसोस हुआ कि वह लखनऊ में उत्तराखण्डियों को सस्ते प्लॉट दिखाने में इतना व्यस्त रहा कि अपनी मातृभूमि की ओर उसका ध्यान ही नही गया' उत्तराखंड में भूमाफियाओं के कब्जे की शुरुआती दिनों की स्थिति दर्शाती है. इस कहानी की मदद से आप उत्तराखंड की राजनीति में दो पार्टियों के बढ़ते वर्चस्व और क्षेत्रीय पार्टियों के पतन की गणित भी समझ सकते हैं. किताब में लेखक ने उत्तराखंड से पलायन करने के नुकसान और पलायन रोकने के समाधान को भी बड़े ही रोचक तरीके से लिखा है. 'श्याम दत्त जी के लिए सबसे पीड़ादायक अपने बैल से बिछड़ना रहा। उनसे अपने कान खुजलाए बिना वह गोठ में  बंधता न था' पंक्ति को पलायन झेलने वाला ही समझ सकता है. पृष्ठ संख्या 227 और 228 में गैरसैंण राजधानी आंदोलन की घटना को इस तरह से लिखा गया है ,मानों वह सब आंखों के सामने ही घटित हो रहा हो. अगले भाग 'विकास अर्थात ट्रिकल डाउन इकोनॉमी' में कहानी डाम से जूझते हुए उत्तराखंड पर पहुंचती है और फिर त्रेपन सिंह चौहान द्वारा चलाए गए फलेण्डा आंदोलन पर लिखा गया है.  किताब का अंतिम भाग 'देवी का थान पतुरिया नीचे' कुछ सालों पहले घटित नानीसार की घटनाओं पर केंद्रित है और इसे पढ़ाते हुए लेखक आपको उत्तराखंड के आज तक पहुंचा देते हैं. लेखक नवीन जोशी ने इस उपन्यास के जरिए पाठकों को अपने लोगों और उनके साथ अपनी धरती से जो प्रेम करने की सीख दी है, उसके लिए यह उपन्यास खरीदना आवश्यक है.


बचपन, दोस्ती और छोटे शहर की दुनिया


2022 में 'लपूझन्ना' एक उस्ताद के लिए उसके शागिर्द की तरफ़ से लिखी खूबसूरत कहानी है। लेखक अपने बचपन की याद अब तक नही भुला सके हैं और उन यादों में लेखक का ख़ास दोस्त भी है, ये वो ख़ास दोस्त है जो हम सब की ज़िंदगी में कभी न कभी तो रहा ही है और उसको हम हमेशा याद करते हैं।  अपनी दीदी की घड़ी चोर उसके पैसे से जियाउल को घड़ी गिफ़्ट करने वाला लफत्तू लेखक असोक का हीरो है। लपूझन्ना हमारी अपनी ही कहानी है, इसमें लपूझन्ना हम ही हैं जिसके लिए ये दुनिया बहुत छोटी है इतनी छोटी कि हम अपने दोस्तों के साथ धमाचौकड़ी मचाते इसे पूरा नाप लेना चाहते हैं। 

किताब का आवरण चित्र अंग्रेज़ी की कहावत 'डोंट जज ए बुक बाई इट्स कवर' को झुठला देता है, यह किताब के प्रति एक उमंग सी जगा देता है, इस उमंग को पहचानने की कोशिश करो तो यह वही जान पड़ती है जो बचपन के दिनों दिन भर नंगे पैर क्रिकेट खेलते, एल्युमिनियम के तार वाली गाड़ी चलाते महसूस होती थी। पिछले आवरण में लेखक की फ़ोटो के साथ उनका परिचय दिया गया है, जो जरूरी था। क़िताब की शुरुआत संजय चतुर्वेदी के लिखे पत्र से होती है। जिसमें सादिक, मख्लूक जैसे अरबी शब्दों का इस्तेमाल किया गया है, पत्र से पता चलता है कि क़िताब उत्तराखंड के छोटे से कस्बे रामनगर के बैकग्राउंड पर लिखी गई है। इसके बाद 'मंज़रों में था जो शहर बसा' किस्सा शुरू होता है, लेखक ने देशज और विदेशज शब्दों के मिश्रण का प्रयोग कर कमाल लिखा है।  लेखक पाठकों को अपने बचपन की कहानी बताते  किताब आगे बढ़ाते हैं, बाल मन के अंदर दूसरे धर्म और दूसरे लिंग के प्रति उमड़ते सवालों को जानते आपका मन किताब में लगना शुरू हो जाएगा। 'बागड़ बिल्ले का टौंचा' जैसा शीर्षक पढ़ आपको बच्चों के खुराफाती दिमाग की याद आने लगेगी तो 'पदाया' शब्द आपकी भूली बिसरी डिक्शनरी में फिर जुड़ जाएगा। लेखक पाठकों को क़िताब पढ़ाते उनके दिमाग और ज़ुबान के साथ खेलते भी दिखते हैं। एक तरफ़ अपने दोस्त लफत्तू की तुतलाती ज़ुबान से निकला "पैतै काटो अंकलजी औल अपना काम कलौ" वाक्य हूबहू लिख लेखक पाठकों को तुतला बनाते हैं तो दूसरी तरफ़ बागड़बिल्ले की आंख का वर्णन जिस तरह किया गया है वह ऐसी आंखों की तस्वीर सचमुच मन में बना देता है। रामनगर की भौगोलिक स्थिति का खाका भी बेहतरीन तरीके से खींचा गया है। इंटरनेट युग में जब हम अपने आसपड़ोस में रहने वाले लोगों को जानते तक नही हैं। तब लेखक के उनके बचपन में पड़ोसियों से सम्बंध के बारे में पढ़ना, घर से दूर तक की जानकारी रखना, रामलीला जाना, क्रिकेट खेलना एक परीकथा सा लगता है। लेखक अपने जीवन के किस्सों को पाठ का रूप देते पाठकों को किताब से जोड़े रखते हैं। 'चोट्टे लफत्तू' शब्द के साथ बौने की साइकिल और उसकी जिंदगी की कहानी आपको हंसा देगी। ऐसा नही है कि किताब पाठकों को सिर्फ़ हंसाने भर के लिए ही लिखी गई है 'टांडा फिटबाल किलब और पेले का बड़ा भाई' खिलाड़ियों की बदहाली बताने के साथ शुरू होता है और मौका न मिलने वाले खिलाड़ियों की आंखों देखी दास्तान सुनाने के साथ ख़त्म होता है। 'नौ फुट की खाट और ऑस्ट्रेलिया के राष्ट्रपति का आगमन' पढ़ आपका मन रामनगर घूम आने को करने लगेगा। क्रिकेट के बारे में लिखा पढ़ आपको हाल ही में आई फ़िल्म '83' भी याद आ जाएगी। ऑस्ट्रेलियाई राष्ट्रपति के आगमन का दृश्य तो पाठकों को उसी समय में वापस ले जाएगा।  अब तक पाठक किताब की देशज-विदेशज भाषा में रम जाएंगे। लफत्तू और तिवारी मास्साब का डुओ आपको अपने स्कूली दिन याद दिलाने के साथ हंसाते हुए लोटपोट भी कर देगा। लफत्तू इस किताब का जॉनी लीवर है और उसके महिमामंडन में लिखी यह पंक्ति इसे साबित भी करती है ' लफत्तू तब तक महाचोर के रूप में इस कदर विख्यात हो चुका था कि अपने घर से उसे एक अख़बार तक लाने नही दिया जाता था। जब वह एक बार ड्रेस पहनकर रेडी हो जाता तो उसके पिताजी उसे दुबारा पूरी तरह नंगा करते और बस्ता खाली करवाकर जमातलाशी लेते थे'। 'ब्रेस ब्रेस, ब्रेसू टी थानी जो दल गया वो मल गया' में साईंबाबा की अफवाह और मधुबाला से आशिकी करवा लेखक द्वारा बाल मन के एक अलग खिंचाव की तरफ चमक मारी गई है। किताब में बाल मन पर फिल्मों से पड़ने वाले प्रभाव को बड़े प्रभावी तरीके से पाठकों को समझाया गया है। 'ख' और 'भ' की अदला बदली वाले खेल में लेखक ने अपनी लेखन कला के झंडे गड़वा दिए हैं। किताब में आपको कम सुनाई देने वाला 'गुरुपुत्र' शब्द भी पढ़ने को मिलता है। शीर्षक 'फुच्ची कप्तान की आसिकी' पढ़ने से विलुप्त होती लवलैटर प्रथा फ़िर याद आती है तो लफत्तू का अपने पापा को "बल्ब को भल्ब कैते हो आप! क्या खाक इंग्लित पलाओगे पापा" कहना आपको भी किताब का हिस्सा बनाता है। ये सब किताब के वो हिस्से हैं जो हिंदी किताबों को पढ़ने का ट्रेंड फिर शुरू करा सकते हैं, 'झुकेगा नही' कहने वाले पुष्पा की तरह लफत्तू भी देश का जाना माना पात्र बनने की क्षमता रखता है। गोबर डॉक्टर, जगुआ पौंक जैसे नाम दिए जाने के पीछे की कहानी भी लेखक द्वारा विस्तार से लिखी गई है।  'रामनगर का कलापारखी समाज पूर्णमुदित हो जाता' जैसी पंक्ति लेखक की हिंदी में मज़बूत पकड़ की तरफ़ इशारा करती है। 'ज्याउल ,उरस की मूफल्ली, मोर्रम और ब्रिच्छारौपड़' पढ़ते पता चलता है कि बच्चों के मन में कैसे बचपन में ही हिन्दू-मुसलमान के बीच दूरी के बीज उगा दिए जाते हैं। आगे पढ़ते किताब वो दिन भी याद दिलाती है जब अमीर-गरीब के बच्चे साथ ही पढ़ा करते थे। लफत्तू द्वारा भिखारी को बैरिंगगाड़ी में बैठा घुमाने वाला किस्सा खूब हंसाएगा, तो कुछ समय बाद किताब पाठकों को इमोशनल करना शुरू हो जाएगी।  अब एक बेहतरीन कहानी अपने अंत की तरफ़ बढ़ती दिखती है। नसीम अंजुम की एंट्री किसी अभिनेत्री से कम नही है। 'नसबंदी और लकड़ी का रैक' की शुरुआत मुंह में पानी ले आती है। चीनी की सब्ज़ी का किस्सा पाठकों को किताब के आख़िरी पन्नों में भी फिर से गुदगुदाता है। पृष्ठ 216 में किताब का सार है, क़िताब खत्म करने पर आपका मन जरूर करेगा कि कभी लेखक से मिल उनसे लफत्तू, बागड़बिल्ले के बारे में ढेर सारे सवाल पूछ लिए जाएं और बमपकौड़ा खाने के लिए लेखक की कल्पनाओं के खुले आकाश में उड़ रहे नक्शे अनुसार रामनगर पहुंचा जाए। 

स्त्री मन, पहचान और सामाजिक सच्चाई

अमूमन कई मर्द ये मानते हैं कि औरत का सिर्फ एक ही रूप है और औरत ने वो रूप सिर्फ उसके लिए ही धारण किया है. लेकिन एक औरत के कई रूप होते हैं और सिर्फ उसका रूप रंग ही उसकी पहचान नही है.  साठ से अधिक फिल्मों में काम कर चुकी अभिनेत्री सुष्मिता मुखर्जी की लिखी किताब 'बांझ' एक औरत के ढेर सारे रंगों को हमारी आंखों के सामने लाती है. 

2022 में प्रकाशित इस शानदार किताब के आवरण चित्र में एक स्त्री की पेंटिंग है और इसे गौर से देखा जाए तो ऐसा लगता है मानो स्त्री में पूरी सृष्टि ही समाहित है. पिछले आवरण में आपको किताब के अनुवादक दीपक दुआ और लेखिका सुष्मिता मुखर्जी के बारे में जानकारी मिलती है. इसमें लिखा है यह किताब 11 कहानियों का संग्रह है और यह कहानियां इस बात को स्थापित करती हैं कि एक औरत का महत्व समाज द्वारा उस पर लगाए गए ठप्पों से कहीं अधिक है. यह बात सत्य तो है पर किताब की कहानियां इस सत्य के साथ कितना न्याय कर सकी हैं यह आप किताब पूरी पढ़ने के बाद ही बता सकेंगे. 'समर्पण' के दो शब्द 'खुरदुरी बुनाई' ही आपके दिल के तार हिला देंगे.यहां पाठकों के मन में 'शुरुआत ऐसी तो अंत कैसा' विचार आने लगेगा. किताब के परिचय में सुष्मिता ने जिस तरह से अपनी जीवन यात्रा को समेटा है ,उसे पढ़ ऐसा लगता है मानो वह इस किताब के जरिए ऐसा कुछ कहना चाहती हैं जो वह आज तक किसी से कह न पाई हों. अनुवादक दीपक दुआ ने भी सुष्मिता के उन विचारों को भली-भांति समझ कर बड़ी खूबसूरती से हिंदी पाठकों तक पहुंचाया है. किताब का शीर्षक बांझ, इस किताब की पहली कहानी का नाम भी है. रुक्मिणी के चेहरे और बिछौने का वर्णन जिस तरह से किया गया है, वह उसके नीरस जीवन की तरफ इशारा कर देता है. कहानी में एक के बाद एक कई पंक्तियां आपको एक स्त्री के जीवन की सच्चाई से परिचित कराती हैं. 'शादी के बाद माता पिता ने उसे ऐसे भुला दिया जैसे कोई हिसाब पूरा हो जाने के बाद पर्चा फाड़ दिया जाता है' पंक्ति हमारे देश की बहुत सी औरतों की सच्चाई सामने रखती है. बांझ कहानी में लेखिका द्वारा हमारे समाज में पितृसत्ता के वर्चस्व और उसके खात्मे के समाधान को लिख दिया गया है, पितृसत्तात्मक समाज के अंत का जो तरीका इस कहानी में लिखा गया है शायद वो कई पाठकों को सही न लगे पर यह पाठकों पर है कि वह इसे कैसे रूप में लेते हैं. किताब की दूसरी कहानी भारत के उन लोगों की सच्चाई है ,जो बड़ी-बड़ी इमारतों के पीछे छिपे रहते हैं और हम उनके बारे में कुछ भी नहीं जानते. पेट की मजबूरी इन गरीबों से क्या कुछ कर कराती है ,लेखिका अपनी कहानी के जरिए पाठकों तक उनकी कहानी बड़े ही भावुक तरीके से पहुंचाती हैं. 'साकरी बाई' की शुरुआत में पाठक भी साकरी बाई को पुकारने लगेंगे. इस कहानी में हम पढ़ते हैं कि हमारे समाज में एक औरत ही औरत की सबसे बड़ी दुश्मन है. किताब में आपको बार-बार महिलाओं की पहचान उनकी सुंदरता (जिसमें रंग और कद काठी को मानक बना दिया जाता है) से किए जाने का अहसास होगा और हम अपने आसपास देखें तो यह वास्तविकता ही है. 'यादें, लाल नाक की' कहानी में 'सफेद, शोक में डूबे रंग वाली' पंक्ति में लेखिका सफेद रंग को शोक वाला रंग करार दे पाठकों को ऐसी शोक सभाओं की याद दिला देती हैं ,जहां सभी लोग सफेद वस्त्र धारण किए होते हैं. रिश्तो की जटिल गणित पर लिखी गई यह कहानी अपने अंत से पाठकों को कुछ देर तक फिर से इस कहानी को सोचने पर मजबूर कर देगी. हम सब अपनी जिंदगी में कुछ ना कुछ ढो ही रहे हैं और उससे मुक्ति चाहते हैं. रिश्तो से मुक्ति भी इसमें शामिल है और इसी मुक्ति से जुड़ी एक कहानी भी लेखिका ने बड़ी रोचकता के साथ लिख डाली है. स्टारबज्ज कहानी में दुर्गा का ड्राइवर के सामने लगे शीशे में खुद को निहारना, पसंद करना, इस बात की निशानी है की अधिकांश महिलाएं खुद को एक सौंदर्य उत्पाद के रूप में स्वीकार कर चुकी हैं. वह खुद चाहती हैं कि लोग उनके रूप रंग को निहारे लेकिन वह अपनी असली ताकत को नहीं पहचानती. कहानी में लेखिका ने दुर्गा के वर्तमान से शुरू होकर उसके अतीत की कहानी को बड़े ही बेहतर तरीके से लिखा है और इस कहानी का अंत भी किताब की अन्य कहानियों की तरह ही पाठकों की सोच से परे है. बड़ी बिंदी और छोटी ड्रेस कहानी के कुछ शब्द कई पाठकों को अश्लील लग सकते हैं और हो भी सकता है कि वो इनको लेकर हो-हल्ला मचाएं. ऐसे देश में जहां महिलाओं के प्रति अपराध बढ़ते जा रहे हैं, ऐसे शब्द महिलाओं का सम्मान न करने वाले लोगों की सोच को आइना दिखाने के लिए बिल्कुल सही हैं  औरतों का बड़ी बिंदी वाली औरत और छोटी ड्रेस वाली औरत के रूप में बंटवारा, भारत के घर-घर की कहानी है. महिलाओं को इस रूप में भी बांट दिया गया है. किताब में कहानियों के शीर्षक बड़े ही सटीक हैं और नीचे दिए गए पृष्ठों की संख्या के चारों और की गई ग्रे शेड पाठकों का ध्यान खींचती हैं. लेखिका ने कभी खुद ही कहानी का एक पात्र बनकर कहानी लिखी है तो कभी दर्शक बनकर. 'मुझे लगता है इस किस्म के रचनात्मक लोगों की बीच प्यार का अंकुर नहीं फूटता, सीधे फूल ही खिलता है' पंक्ति लेखिका खुद रचनात्मक होने की वजह से ही लिख पाई हैं. बे-पर परिंदा कहानी में एक मां बनने जा रही महिला का कबूतर के बच्चों से लगाव, इस किताब का आकर्षण है. ये कहानी सन्देश देती है कि एक औरत ही अपने परिवार को एक साथ रखती है.  'उम्र भर के दोस्त' कहानी ऐसे लिखी गई है मानो सुष्मिता पाठकों के सामने बैठकर उन्हें यह कहानी सुना रही हों. यह किताब की एकमात्र ऐसी कहानी है जिसमें स्त्री से ज्यादा पुरुष को महत्व दिया गया है. 'शालीमार' वो कहानी है जिसे पढ़कर लगता है कि अगर किताब का नाम बांझ न होता तो शालीमार होता. पृष्ठ संख्या 76 के अंत की कुछ पंक्तियां पढ़ एक औरत की मजबूरी समझी जा सकती है. किताब की अंतिम कहानी 'अफेयर' में श्रीला ने उन महिलाओं का प्रतिनिधित्व किया है जो अपना परिवार संभालने की व्यस्तता में अपना सपना भूल चुकी हैं. कहानी का अंत पढ़ आप महसूस करेंगे कि महिलाएं हमेशा से ही पुरुषों से ऊंचा उड़ सकती हैं. लेखिका भी तो यही चाहती थी कि समाज ने जो ठप्पा औरत की छवि पर लगा दिया है इस किताब को पढ़ समाज समझे कि औरत को ऐसे किसी ठप्पे की जरूरत नही है. बहुत सी किताबों से अलग इस किताब का आभार अंत में है. लेखिका ने दीपक दुआ द्वारा किए अनुवाद में जिन रूपकों के प्रयोग की बात करी है, वास्तव में उनसे कहानियों की खूबसूरती बढ़ी है.  आखिरी पन्नों में लेखिका और अनुवादक का परिचय पिछले आवरण में भी दिया है इसलिए उसकी कोई आवश्यकता नही लगती, हां प्रकाशक के बारे में जानकारी वाला पन्ना सही है. 

व्यंग्य, किस्से और समाज का आईना

साल 2022 की एक और शानदार कृति 'बब्बन कार्बोनेट' कई किस्सों को साथ मिलाकर लिखी गई एक ऐसी किताब है जिसमें सामाजिक कुरीतियों, दिखावे के ऊपर पारंपरिक तरीके से नही बल्कि व्यंग्यात्मक तरीके से प्रहार किया गया है.  

 किताब का आवरण चित्र 'द जंगल बुक' की याद दिलाता है और आपको इस चित्र के चित्रकार के बारे में किताब के शुरुआत में जानकारी मिल जाती है. 'सियाही स्टूडियो' ने किताब के आवरण को जिस मेहनत से तैयार किया है, उसका नतीजा यह है कि पाठक किताब हाथ में पकड़ते ही खुद को तरोताज़ा सा महसूस करेंगे.  किताब का पहला पन्ना तीन दशक का लेखन अनुभव लिए किताब के लेखक अशोक पाण्डे का परिचय देता है. इन तीन दशकों में लेखक ने 'लपूझन्ना' जैसी चर्चित किताब लिखी है तो वह लोकप्रिय वेबसाइट का 'काफल ट्री'के संस्थापक संपादक भी रहे हैं. 'विलक्षण हाजिर जवाब एंग्री यंग मैन के साथ' हिंदी के मशहूर कवि मृत्युंजय का लिखा है, किताब में इस्तेमाल की गई भाषा पर मृत्युंजय लिखते हैं 'वैसे तो यह किताब देशज भाषा में लिखी गई है, जहां स्थानीयता की बहार है पर संस्कृत शब्दावली को व्यंग के लिए इस्तेमाल करने की तकनीक में यह किताब दक्ष है'. किताब पढ़ने के बाद आप लेखक की इस बात पर ही सबसे ज्यादा प्रभावित भी होंगे. अनुक्रम के ज़रिए यह पता चलता है कि किताब में 49 अलग-अलग किस्सों को लिखा गया है. किताब हर उम्र के लोगों के लिए लिखी गई, इसमें बच्चों के मन मे चलने वाली खुराफात है तो वयस्कों के संसार से जुड़े किस्से भी हैं. 'गरमपानी के नारायण राम मास्साब का किस्सा' जैसे शुरुआती शीर्षक से आपको यह विश्वास हो जाएगा कि इतने शानदार आवरण के बाद पाठकों को किताब के अंदर भी कुछ ना कुछ शानदार पढ़ने को जरूर मिलेगा. 'मैग्नीफाइंग' ,'अप्रेंटिस' जैसे विदेशज शब्द और 'झूलसैंण', 'भिन्नोट' जैसे देशज शब्द के साथ लिखे गए किस्से आपको अपनी ज़िंदगी के रोज़ के किस्से जैसे ही लगेंगे. किताब में एक जगह हनीमून को 'मधुमास' लिख दिया गया है. यह शब्द विश्वास दिलाता है कि ऐसे प्रयोगधर्मी हिंदी लेखक ही हिंदी भाषा को अंग्रेज़ी पर बढ़त दिलाएंगे. 'टेलर मास्साब' खिताब की तुलना 'शास्त्रीय गायक उस्ताद' से करना लेखक का अपना ही कमाल है.  किताब पढ़ते आप उत्तराखंड भ्रमण पर भी रहेंगे, खासतौर पर नैनीताल के आसपास पड़ने वाले इलाकों में ही अधिकतर कहानी अपने अंजाम पर पहुंची थी. 'फलाणी चीज़ के चक्कर में मित्र कुत्ता बन गया है' पंक्ति जिस किस्से में इस्तेमाल की गई है, वह हम अपने मित्रों के साथ दिन भर कई बार साझा करते हैं और लेखक की यही खूबी है कि वह ऐसे विचारों को सही जगह सही समय पर इस्तेमाल करने के लिए सहेज कर रखते हैं. इस किताब के किस्से ऐसे नही हैं कि आप उन्हें पढ़ें और फिर भूल जाएं, इन पन्नों को आप हमेशा के लिए याद रखना चाहेंगे ताकी चालीस साल बाद भी आप उन्हें किसी को सुना सकें. लेखक की एक खास बात है, उन्होंने बहुत सी कहानियों को व्यंगात्मक तरीके का इस्तेमाल करते हुए खुद से जोड़ा है. जैसे एक जगह वो लिखते हैं 'उन्हीं के धूम्र भण्डार में डाका डाल कर मैंने और खानदान के तकरीबन दस चचेरे-ममेरे भाइयों ने सिगरेट की लत हासिल की थी'. 'माधुरी दीक्षित, नानाजी और पानी की बोतल' किताब का सबसे खूबसूरत किस्सा है. इस किस्से में एक आदमी का अपने रिश्तों के प्रति प्रेम दिखता है, साथ उसका सामाजिक विषयों पर आत्ममंथन भी है. इस तरह व्यक्ति के सामाजिक और व्यक्तिगत, दोनों तरह के जीवन पर सुंदरता से प्रकाश डाला गया है. पृष्ठ 28 में शव के हालात का लेखक ने जिस तरह से वर्णन किया है उसके बाद लेखक का नाम स्वतः ही भारत के अग्रणी हिंदी लेखकों में दर्ज हो जाएगा. इस किताब में आपको 'पदिया गांठी', 'गुट्टू भाई', 'जिबुवा बिरालु' जैसे कई मज़ेदार नाम भी मिलते हैं और उनके पीछे की कहानी भी बड़ी रोचक है. लेखक ने कुछ इसी तरह का प्रयोग अपनी किताब 'लपूझन्ना' में भी किया था, जो काफी सफल रहा था. आगे पढ़ते आपको लेखक द्वारा वर्तमान पत्रकारिता पर लेखक द्वारा किया गया एक तगड़ा व्यंग्य दिखेगा, जो आज के हालातों पर बिल्कुल फिट बैठता है. लेखक लिखते हैं 'अपने असमय निधन से पहले 'हिमालयी नवोन्मेष' नाम से बेहैसियत प्रकाशक-सम्पादक-पत्रकार-हॉकर एक टुकड़िया अनियतकालीन पाक्षिक अख़बार भी निकालने लगे थे क्योंकि उन्हें भनक थी कि ऐसे टुच्चकर्मों को बहुत सम्मान दिए जाने का युग जल्द ही आने को था'. लेखक ने किताब में कई प्रयोग किए हैं जैसे एक जगह उन्होंने लिखा है 'गुट्टू भाई की ज़बानी है' यहां लेखक गुट्टू भाई बन खुद के शब्द लिख पाठकों को ही गुट्टू भाई बना देते हैं. एक जगह लेखक लिखते हैं 'आंख बंद कर के पैले दिमाग के अंदर लाल पॉइंट को ढूंढना होगा और उसके बाद उसी को देखता रैना' इसे पढ़ पाठक लेखक के कहे का अनुसरण भी करने लगते हैं. 'मारुति वैन में इस जगह बैठने वाली सवारी को अपनी दोनों टांगे गीयर के इधर-उधर रखनी होती थी' इस पंक्ति में इतनी क्षमता है कि पाठकों के मन में इस तरह वैन में बैठने की छवि उभर आना स्वाभाविक है. इसी तरह अंग्रेज द्वारा बोले गए 'टुमको दो गन्टा दीया नरेन' वाक्य से आप भी हेनरू लाटा बन जाएंगे. किताब के ज़रिए पाठक को 'सांप के कान के नीचे वाले माल' जैसा नया मुहावरा सीखने को मिलता है. सामाजिक कुरीतियों पर व्यंग्य करती कहावत 'भूसा भरण और शादी के रिसेप्शन,आंधी-तूफान या बर्फ बाढ़ की परवाह नहीं करते, होकर रहते हैं' इस किताब का आकर्षण है. लेखक ने किताब के ज़रिए पहाड़ों से जुड़ी कहावतों को दुनिया तक पहुंचाने का प्रयास किया है, जैसे वह लिखते हैं 'हमारे इधर तिवारी लोग तिवाड़ी कहे जाते हैं'. आगे के किस्सों में टीनएजर्स में नशाखोरी की आदत पर भी लिखा गया है. लेखक लगभग हर किस्सों में पाठकों के लिए संस्पेंस बनाए रखने में कामयाब रहे हैं. 'तस्व्वुर' शब्द का प्रयोग पढ़ने में अच्छा लगता है तो 'स्कूलसखा' शब्द भविष्य में प्रयोग होने के लिए पाठकों की डिक्शनरी में खुदबखुद शामिल हो जाता है. बीयर और रम के लिए 'पी गई' की जगह 'समझी गई' का प्रयोग करना हिंदी जगत में नया-नया है. किताब में पहाड़ पर भी बहुत कुछ लिखा गया है. 'पहाड़ के लिए कुछ करने का जज़्बा' में लेखक द्वारा पहाड़ों से हो रहे पलायन जैसे गम्भीर मुद्दे को बड़ी खूबसूरती से छू लिया गया है.  'हिमालय की धवल श्रंखलाएं अपनी पूरी धज में थी' पंक्ति के ज़रिए हिमालय की जो छवि पाठकों के मन में छोड़ी जाती है, वह उनको हिमालय भ्रमण के लिए उकसाने में कामयाब रही है. 'दलिद्दर कथा' किस्से के ज़रिए लेखक ने एक ऐसे विषय पर बात की है जिसे अक्सर गम्भीरता से नही लिया जाता. उन्होंने पीढ़ियों से पहाड़ों में रह रहे मुसलमानों के प्रति हो रहे व्यवहार पर बड़े व्यंग्यात्मक तरीके से लिखा है. बड़ी-बड़ी बातों को सहजता से लिख जाना ही लेखक की सबसे बड़ी खूबी है. पति-पत्नी की झिकझिक वाली प्यारी कहानी और उसमें पीक भरे मुंह से निकले शब्दों को वैसा ही लिख देना, किताब से पाठकों को बांधे रखता है. 'भीमताल का सुतली वाला कुत्ता' किस्से में कुत्ते के गले में सुतली की बात सोच कर ही आप हंसने लगेंगे. कुत्ते के रंग और शरीर का वर्णन लाजवाब है. पृष्ठ '86' वह पन्ना है जिसके लिए आप किसी किताब को खरीदने के लिए दस हज़ार रुपए भी खर्च कर दें तो कम हैं. इस किस्से को पढ़कर लगता है कि अगर लेखक ने किताब का नाम 'सुतली वाला कुत्ता' रख दिया होता तो बेहतर होता. किताब को प्रचारित करने का एक उपाय यह भी हो सकता था कि इस पन्ने को देश की गली-गली पर चिपका दिया जाता. किताब का शीर्षक जिस किस्से से लिया गया है, लेखक के सामने उस किस्से को पाठकों के सामने साबित करने का भारी दबाव है , क्योंकि किताब के अन्य किस्से बहुत ही आला दर्जे कह रहे हैं. यह वाला किस्सा थोड़ा अडल्ट टाइप का है और किस्से में लिखी गई कुछ जगहों के बारे में जानकारी लेने के लिए आपको गूगल का सहारा लेना होगा क्योंकि किताब के सारे पाठक तो नैनीताल से नहीं होंगे ना. 'जयसंकर सिज़लर' किस्से में छोटे शहर के लोग बड़े शहरों के बारे में जो कुछ भी सोचते हैं उस सच्चाई को लेखक द्वारा बड़े ही व्यंग्यात्मक तरीके से लिख दिया गया है. 'पूरन दा और तेल का कनस्तर' किस्सा किताब के हर किस्से की किसी न किसी खूबी को खुद में समेटा हुआ है. 'हम सब तोंदू हैं' में लेखक ने जिस तरह से श्मशान का लाइव चित्रण किया है, उसे आप बड़े ध्यान से पढ़ेंगे. किताब खत्म होते-होते 'लौंडा पटवारी का' किस्सा आपको पेट पकड़ हंसा देता है. इस किताब के ज़रिए लेखक ने समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को पूरा कर उसे समझने का भार अपने पाठकों पर छोड़ दिया है, यह अब 'बब्बन' के पाठकों पर है कि वह अपने प्रिय लेखक की बातों को किस तरह से लेते हैं, वह इसे गम्भीरता से समझते हैं या हंस कर भूल जाते हैं.


Sunday, April 19, 2026

चारदीवारी से पहचान तक: महिलाओं और ट्रांसमैन की कहानियां

*चारदीवारी से पहचान तक: महिलाओं और ट्रांसमैन की कहानियां*

महिलाओं को घर की चारदीवारी में सीमित रखने, ट्रांसमैन और वर्जिनिटी टेस्ट जैसे मुद्दों पर Public Service Broadcasting Trust द्वारा बनाई गई ये तीन डॉक्यूमेंट्री LGBTQ और महिला विमर्श के लिए देखने लायक हैं. 

*महिलाएं बदल रही हैं*

https://youtu.be/QOfWCOPOtpc?si=FK7a1W_UMztpLlIN

माधुरी मोहिंदर निर्देशित 'Can't Hide Me' डॉक्यूमेंट्री में अलग-अलग राज्यों की कुछ महिलाओं को दिखाया गया है जो उपेक्षित किए जाने के बाद भी डांस, स्पोर्ट्स, फोटोग्राफी जैसे क्षेत्रों में अपनी पहचान बना रही हैं.

'औरत घर की जीनत है, बाहर के माहौल में घूमेगी तो बेकार हो जाएगी.'
'लड़की कलंक होती है टाइम से शादी नहीं करोगी तो गलत काम कर सकती है.' जैसे कथनों के साथ डॉक्यूमेंट्री में हीना अपनी कहानी बताती हैं, जिनकी जल्दी शादी कर दी गई और उनके साथ पति द्वारा मारपीट की गई और यहां तक कि चाकू से हमला भी किया गया.

डॉक्यूमेंट्री दिखाती है कि महिलाएं घर में ही सुरक्षित नहीं हैं. लोगों के साक्षात्कार में उनकी विचारधारा दिखाई जाती है, वे कहते हैं कि बहन को बाहर भेजना और इज्जत नीलाम करना दोनों बराबर है. 

इसके बाद डॉक्यूमेंट्री में एक सफल महिला रग्बी खिलाड़ी का इंटरव्यू दिखाया जाता है, जिसका भारतीय टीम के लिए कैंप सिलेक्शन हुआ.

मंगलौर में महिलाओं की कहानी देखते हुए हमें यक्षगान नृत्य शैली की जानकारी मिलती है, जिसमें महिलाओं की एंट्री बैन थी. लेकिन अब महिलाएं उस नृत्य शैली को सीखती हैं, इनमें स्कूल ड्रॉपआउट भी शामिल हैं. नृत्य के दौरान किसी महिला के निभाए किरदार को देखकर लोग पहचान नहीं सकते कि यह एक महिला है.

डॉक्यूमेंट्री में 'आवाज ए निस्वान ग्रुप' की महिलाओं की फोटोग्राफी को भी कवर किया गया है, वे बुर्का पहन कर भी फोटोग्राफी करती रहीं.
पुरुषों के साक्षात्कार शामिल हैं, जो महिलाओं की ड्रेस और स्वतंत्रता पर अपने विचार रखते हैं. अधिकतर यही कहते हैं कि लड़कियां बाहर निकलेंगी तो परिवार का नाम खराब होगा.
डॉक्यूमेंट्री में फोटोग्राफी सीखी हुई हीना की बेटी जब कहती है 'मुझे भी सीखनी है फोटोग्राफी', यह दृश्य शानदार है और उम्मीद जगाता है कि महिलाएं बदल रही हैं.

*इज्जत का दूसरा नाम है लड़की*

https://youtu.be/pEyFWUxEIQw?si=C8uNIvF_RSZDmCwa

'My Sacred Glass Bowl' डॉक्यूमेंट्री में हम महिलाओं को ही महिलाओं का विरोध करते देखते हैं, साक्षात्कार में एक महिला लड़कियों के घर से बाहर ना निकलने को सही ठहराती हैं.

प्रिया थुवासरी द्वारा निर्देशित इस डॉक्यूमेंट्री में हमें बाटला हाउस की रुखसाना तलत दिखती हैं जो कहती हैं कि लड़कियों की वजह से उन पर प्रेशर होता है क्योंकि लड़कियों के लिए ज्यादा हिफाजत की जरूरत होती है. कुछ भी हो मां पर ही आरोप लगाया जाएगा कि क्या सही है और क्या गलत.

डॉक्यूमेंट्री में वर्जिनिटी टेस्ट को लेकर कुछ सिहरन पैदा करने वाली रिपोर्ट्स दिखाई गई हैं. 
'कुकरी रस्म' पर एक महिला कहती है कि सफेद पेटीकोट पहना कर लड़की को पति के पास भेजा जाता है, खून नहीं निकला तो पंचायत होगी और लड़की के भविष्य पर फैसला लिया जाता है, यह सब कुछ दर्शकों के लिए चौंकाने वाला और नया हो सकता है.

डॉक्यूमेंट्री में हम देखते हैं कि लोगों की मानसिकता है कि महिलाओं की चाल से पता चलता जाता है कि लड़की वर्जिन है या नहीं. इसके उदाहरण स्वरूप लड़के लड़कियों की चाल को दिखाया जाता है, यह डॉक्यूमेंट्री का सबसे शानदार हिस्सा है और इसमें यह भी कहा जाता है कि ऐसी बातें बस लड़कियों के लिए ही कही जाती हैं.
सेब को वर्जिनिटी का प्रतीक के रूप में दिखाया जाना भी निर्देशक की रचनात्मकता का उत्कृष्ट उदाहरण है.

*ट्रांसमैन के लिए अधिकार पर बात करती एक डॉक्यूमेंट्री*

https://youtu.be/0N9h88x7rNY?si=MJJg9VPTIZkxnAMt

मिताली त्रिवेदी और गगनदीप सिंह द्वारा निर्देशित डॉक्यूमेंट्री 'Please Mind the Gap' ट्रांसमैन श्वेतांजलि डॉन की कहानी है. उन्होंने इसमें अपने शरीर के बदलावों और जीवन में आने वाली चुनौतियों पर खुलकर बातचीत की है और यह दर्शकों के लिए बिल्कुल नया विषय है.
इस तरह की डॉक्यूमेंट्री देखनी और प्रसारित की जानी बहुत जरूरी लगती है क्योंकि इन विषयों पर अज्ञानता ही समाज में भ्रम और सवाल पैदा करती है.

डॉक्यूमेंट्री के मुख्य किरदार अपने लिए 'भाई' और 'लड़का' जैसे शब्दों में संतुष्टि महसूस करता है. वह पब्लिक टॉयलेट में जाने के अपने अनुभव साझा करता है, जिसमें उसके लिए अजीब स्थिति बन जाती है.

ऐसा ही कुछ मेट्रो स्टेशन में एंट्री पर चेकिंग के दौरान श्वेतांजलि के साथ हमेशा घटित होता है, जब चेकिंग के दौरान उसके शरीर को हाथ लगाया जाता है और यह दृश्य ट्रांसमैन के लिए अलग से अधिकार लागू करवाने की पैरवी करता है.
डॉक्यूमेंट्री शानदार ढंग से फिल्माई गई है, जिसमें श्वेतांजलि को महिलाओं के लिए आरक्षित डिब्बे में चढ़ते और महिलाओं को उसे घूरते हुए दिखाया गया है.

*नोएडा मजदूर आंदोलन के बीच जानें एक मजदूर का समीकरण*

मजदूरों की कमाई का गणित, सीजन पर निर्भरता और सालभर के आर्थिक संतुलन पर एक रिपोर्ट 

नोएडा में मजदूरों के आंदोलन ने पूरे देशभर में मजदूरों की कमाई पर एक नई बहस छेड़ दी है. मजदूर


मूल रूप से के रहने वाले वीरेंद्र सिंह देहरादून में मौसमी काम करते हैं. गर्मी के चार से पांच महीनों में गन्ने के जूस के कारोबार से वह करीब डेढ़ लाख रुपये कमा लेते हैं. वहीं साल के बाकी सात महीनों में अपने कस्बे लौटकर बर्गर और चाउमीन का ठेला लगाते हैं, जिससे 60 से 70 हजार रुपये की आमदनी हो जाती है. इस तरह साल भर में उनकी कुल कमाई लगभग दो लाख रुपये तक पहुंचती है.

खर्च का दबाव. बचत की असली चुनौती
देहरादून में वह अपने चार साथियों के साथ एक कमरे में रहते हैं और प्रति व्यक्ति 3500 रुपये किराया देते हैं. खाने पीने पर करीब 100 रुपये रोज यानी महीने में लगभग 3000 रुपये खर्च हो जाते हैं. सीमित आय के बीच ये बुनियादी खर्च ही उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा खा जाते हैं. साल भर के हिसाब से देखें तो करीब एक लाख रुपये की ही बचत हो पाती है, जो उनकी मेहनत और संयम का परिणाम है.

जिम्मेदारियां और भविष्य. परिवार के लिए संघर्ष
वीरेंद्र के तीन बेटे और दो बेटियां हैं, सभी ने सरकारी स्कूलों से पढ़ाई की है और अब कॉलेज में हैं. बड़ी बेटी बारहवीं के बाद सिलाई सीख रही है और उसकी शादी की तैयारी भी चल रही है. वीरेंद्र अब तक करीब साढ़े चार लाख रुपये के जेवर बनवा चुके हैं और आगे शादी के खर्च के लिए बचत कर रहे हैं. वह अपने बेटे को भी इस काम से जोड़ने के लिए 70 हजार रुपये की मशीन खरीदने वाले हैं. बदलते हालात और तेल की अनिश्चितता से वह वाकिफ हैं, लेकिन उनका कहना है कि हालात जैसे भी हों, काम करना ही पड़ेगा.

Thursday, April 16, 2026

चौंकाती और सोचने पर मजबूर करती तीन डॉक्यूमेंट्री

*चारदीवारी से पहचान तक: महिलाओं और ट्रांसमेन की कहानियां*

महिलाओं को घर की चारदीवारी में सीमित रखने, ट्रांसमेन और वर्जिनिटी टेस्ट जैसे मुद्दों पर Public Service Broadcasting Trust द्वारा बनाई गई ये तीन डॉक्यूमेंट्री LGBTQ और महिला विमर्श के लिए देखने लायक हैं. इन डॉक्यूमेंट्री का प्रदर्शन इस बृहस्पतिवार दून लाइब्रेरी में किया गया और ये यूट्यूब पर भी उपलब्ध हैं.

*महिलाएं बदल रही हैं*

https://youtu.be/QOfWCOPOtpc?si=FK7a1W_UMztpLlIN

माधुरी मोहिंदर निर्देशित 'Can't Hide Me' डॉक्यूमेंट्री में अलग-अलग राज्यों की कुछ महिलाओं को दिखाया गया है जो उपेक्षित किए जाने के बाद भी डांस, स्पोर्ट्स, फोटोग्राफी जैसे क्षेत्रों में अपनी पहचान बना रही हैं.

'औरत घर की जीनत है, बाहर के माहौल में घूमेगी तो बेकार हो जाएगी.'
'लड़की कलंक होती है टाइम से शादी नहीं करोगी तो गलत काम कर सकती है.' जैसे कथनों के साथ डॉक्यूमेंट्री में हीना अपनी कहानी बताती हैं, जिनकी जल्दी शादी कर दी गई और उनके साथ पति द्वारा मारपीट की गई और यहां तक कि चाकू से हमला भी किया गया.

डॉक्यूमेंट्री दिखाती है कि महिलाएं घर में ही सुरक्षित नहीं हैं. लोगों के साक्षात्कार में उनकी विचारधारा दिखाई जाती है, वे कहते हैं कि बहन को बाहर भेजना और इज्जत नीलाम करना दोनों बराबर है. 

इसके बाद डॉक्यूमेंट्री में एक सफल महिला रग्बी खिलाड़ी का इंटरव्यू दिखाया जाता है, जिसका भारतीय टीम के लिए कैंप सिलेक्शन हुआ.

मंगलौर में महिलाओं की कहानी देखते हुए हमें यक्षगान नृत्य शैली की जानकारी मिलती है, जिसमें महिलाओं की एंट्री बैन थी. लेकिन अब महिलाएं उस नृत्य शैली को सीखती हैं, इनमें स्कूल ड्रॉपआउट भी शामिल हैं. नृत्य के दौरान किसी महिला के निभाए किरदार को देखकर लोग पहचान नहीं सकते कि यह एक महिला है.

डॉक्यूमेंट्री में 'आवाज ए निस्वान ग्रुप' की महिलाओं की फोटोग्राफी को भी कवर किया गया है, वे बुर्का पहन कर भी फोटोग्राफी करती रहीं.
पुरुषों के साक्षात्कार शामिल हैं, जो महिलाओं की ड्रेस और स्वतंत्रता पर अपने विचार रखते हैं. अधिकतर यही कहते हैं कि लड़कियां बाहर निकलेंगी तो परिवार का नाम खराब होगा.
डॉक्यूमेंट्री में फोटोग्राफी सीखी हुई हीना की बेटी जब कहती है 'मुझे भी सीखनी है फोटोग्राफी', यह दृश्य शानदार है और उम्मीद जगाता है कि महिलाएं बदल रही हैं.

*इज्जत का दूसरा नाम है लड़की*

https://youtu.be/pEyFWUxEIQw?si=C8uNIvF_RSZDmCwa

'My Sacred Glass Bowl' डॉक्यूमेंट्री में हम महिलाओं को ही महिलाओं का विरोध करते देखते हैं, साक्षात्कार में एक महिला लड़कियों के घर से बाहर ना निकलने को सही ठहराती हैं.

प्रिया थुवासरी द्वारा निर्देशित इस डॉक्यूमेंट्री में हमें बाटला हाउस की रुखसाना तलत दिखती हैं जो कहती हैं कि लड़कियों की वजह से उन पर प्रेशर होता है क्योंकि लड़कियों के लिए ज्यादा हिफाजत की जरूरत होती है. कुछ भी हो मां पर ही आरोप लगाया जाएगा कि क्या सही है और क्या गलत.

डॉक्यूमेंट्री में वर्जिनिटी टेस्ट को लेकर कुछ सिहरन पैदा करने वाली रिपोर्ट्स दिखाई गई हैं. 
'कुकरी रस्म' पर एक महिला कहती है कि सफेद पेटीकोट पहना कर लड़की को पति के पास भेजा जाता है, खून नहीं निकला तो पंचायत होगी और लड़की के भविष्य पर फैसला लिया जाता है, यह सब कुछ दर्शकों के लिए चौंकाने वाला और नया हो सकता है.

डॉक्यूमेंट्री में हम देखते हैं कि लोगों की मानसिकता है कि महिलाओं की चाल से पता चलता जाता है कि लड़की वर्जिन है या नहीं. इसके उदाहरण स्वरूप लड़के लड़कियों की चाल को दिखाया जाता है, यह डॉक्यूमेंट्री का सबसे शानदार हिस्सा है और इसमें यह भी कहा जाता है कि ऐसी बातें बस लड़कियों के लिए ही कही जाती हैं.
सेब को वर्जिनिटी का प्रतीक के रूप में दिखाया जाना भी निर्देशक की रचनात्मकता का उत्कृष्ट उदाहरण है.

*ट्रांसमेन के लिए अधिकार पर बात करती एक डॉक्यूमेंट्री*

https://youtu.be/0N9h88x7rNY?si=MJJg9VPTIZkxnAMt

मिताली त्रिवेदी और गगनदीप सिंह द्वारा निर्देशित डॉक्यूमेंट्री 'Please Mind the Gap' ट्रांसमेन श्वेतांजलि डॉन की कहानी है. उन्होंने इसमें अपने शरीर के बदलावों और जीवन में आने वाली चुनौतियों पर खुलकर बातचीत की है और यह दर्शकों के लिए बिल्कुल नया विषय है.
इस तरह की डॉक्यूमेंट्री देखनी और प्रसारित की जानी बहुत जरूरी लगती है क्योंकि इन विषयों पर अज्ञानता ही समाज में भ्रम और सवाल पैदा करती है.

डॉक्यूमेंट्री के मुख्य किरदार अपने लिए 'भाई' और 'लड़का' जैसे शब्दों में संतुष्टि महसूस करता है. वह पब्लिक टॉयलेट में जाने के अपने अनुभव साझा करता है, जिसमें उसके लिए अजीब स्थिति बन जाती है.

ऐसा ही कुछ मेट्रो स्टेशन में एंट्री पर चेकिंग के दौरान श्वेतांजलि के साथ हमेशा घटित होता है, जब चेकिंग के दौरान उसके शरीर को हाथ लगाया जाता है और यह दृश्य ट्रांसमेन के लिए अलग से अधिकार लागू करवाने की पैरवी करता है.
डॉक्यूमेंट्री शानदार ढंग से फिल्माई गई है, जिसमें श्वेतांजलि को महिलाओं के लिए आरक्षित डिब्बे में चढ़ते और महिलाओं को उसे घूरते हुए दिखाया गया है.

Wednesday, April 8, 2026

जीने की शिक्षा या समझ की कमी? दून लाइब्रेरी में मानव शिक्षा पर मंथन

*जीने की शिक्षा या समझ की कमी? दून लाइब्रेरी में मानव शिक्षा पर मंथन*

राजेश बहुगुणा की वार्ता में शिक्षा, अस्तित्व और मानव समझ पर चर्चा

देहरादून के दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में ‘मानव शिक्षा: आवश्यकता, प्रक्रिया, उपलब्धि’ विषय पर एक वार्ता का आयोजन किया गया. कार्यक्रम में वक्ता राजेश बहुगुणा ने मानव शिक्षा के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से अपनी बात रखी और कहा कि शिक्षा केवल जानकारी नहीं, बल्कि समझ विकसित करने की प्रक्रिया है.

*ए. नगराज और शिक्षा की अवधारणा*

ए नगराज जी 1920 में कर्नाटक में पैदा हुए, उनका परिवार वैदिक परंपरा से था. राजेश बहुगुणा ने कहा कि उन्होंने धर्म ग्रन्थ पढ़ने के बाद भी कई सवालों के उत्तर ढूंढे, उनसे कहा गया कि इनका जवाब साधना से मिल सकता है. 15-20 साल साधना के बाद उन्हें समझ आया कि जो उन्हें समझ आया वह सब समझना चाहते हैं, लेकिन जिस विधि से उन्हें समझ आया, उससे कोई और नहीं समझ सकता, शिक्षा विधि से सब कुछ समझा जा सकता है. साल 1975 के बाद दो विश्वविद्यालय मानवीय शिक्षा प्रोग्राम पर चलते हैं.

*मानव की जरूरत और अस्तित्व की समझ*

राजेश बहुगुणा कहते हैं कि मानव की दो तरह की आवश्यकताएं होती हैं, परिस्थितिजन्य और अस्तित्वजन्य. शिक्षा मानव की अस्तित्वजन्य आवश्यकता है. वे कहते हैं कि हम आज भी तय नहीं कर पाए हैं कि मानव की शिक्षा कैसी हो, इसलिए हमें अस्तित्व को समझना होगा. अस्तित्व चार क्रियाशील अवस्थाओं से मिलकर बना है, जिसमें पदार्थ जगत, वनस्पति जगत, जीव जंतु जगत और मानव जगत शामिल हैं. वार्ता में शामिल हुए हिमांशु बहुगुणा ने कहा कि पहिए, संदूक के अविष्कार को दस हजार साल हो गए हैं, फिर भी लोग संदूक को कंधे पर ढो रहे हैं, अस्तित्व की सच्चाई को समझकर ही लोग आगे बढ़ सकते हैं.

*सीखने की प्रक्रिया और मानव का लक्ष्य*

राजेश बहुगुणा ने सीखने की प्रक्रिया पर बात करते हुए कहा कि सीखना जीव जंतु जगत में शुरू होता है, जैसे शेर का बच्चा शिकार करना सीखता है. पशु जीवित रहना सीखते हैं लेकिन हमें वहां कोई शिक्षा व्यवस्था नहीं दिखती. उन्होंने कहा कि मानव का लक्ष्य जिंदा रहना नहीं है,  उसे सुखी रहने के लिए समझ की जरूरत है इसलिए मानव को शिक्षा की आवश्यकता पड़ती है. सुख के लिए मनुष्य के लिए अपनी पहचान जरूरी है और इसके लिए वह रूप, बल, पद, धन पर काम करता है, जिसमें शिक्षा उसकी मदद करती है. उन्होंने इसका उदाहरण देते हुए कहा कि हमने कार को अपना सम्मान मान लिया है, जबकि वह मात्र सुविधा है.

*शिक्षा व्यवस्था और मूल्यों का सवाल*

राजेश बहुगुणा मूल्यों के सवाल पर कहते हैं कि न्याय, धर्म और सत्य सिखाने के लिए हमारे पास सिर्फ उपदेश हैं, जबकि जिंदा रहने की शिक्षा के लिए हमारी शिक्षा व्यवस्था में सब कुछ है. उन्होंने कहा कि यही कारण है कि शिक्षा व्यवस्था में समझ और मूल्यों के बीच संतुलन बनाने की जरूरत है, ताकि मनुष्य केवल जीवित ही न रहे, बल्कि समझ के साथ जीवन जी सके.

Monday, April 6, 2026

*दून लाइब्रेरी में दो दिन, दो विमर्श: हम्पी के इतिहास से हिमालय के संकट तक चर्चा*

*दून लाइब्रेरी में दो दिन, दो विमर्श: हम्पी से हिमालय तक उठे सवाल*

देहरादून के दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में तीन दिन के अंदर दो अलग-अलग महत्वपूर्ण आयोजन हुए, जिनमें इतिहास और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई. एक ओर ‘हम्पी: उत्कर्ष से अपकर्ष तक’ पुस्तक के जरिए इतिहास और दावों पर सवाल उठे, वहीं ‘खबरपात’ के मंच पर हिमालय, पर्यावरण और मीडिया विषय पर चर्चा हुई.

*बाली के महल पर सवाल, हम्पी की कहानी पर चर्चा: दून लाइब्रेरी में किताब का लोकार्पण*

दून लाइब्रेरी, देहरादून में इस शनिवार लेखक तापस चक्रबर्ती की पुस्तक ‘हम्पी: उत्कर्ष से अपकर्ष तक’ का लोकार्पण किया गया और इसके साथ ही किताब पर चर्चा भी हुई. यह पुस्तक विनसर प्रकाशन से प्रकाशित होकर आई है.

लेखक ने बताया कि वे यात्रा-वृत्तांत इस तरह लिखते हैं कि पाठक किताब को उनकी नजर से देख सके और उसे लगे कि वह उस क्षेत्र में स्वयं घूम रहा है. उन्होंने कहा कि जब यूनेस्को ने 2019 में हम्पी को “must see destination” की सूची में डाला, तब से वे वहां घूमना चाहते थे.

उन्होंने कहा कि यह जगह एक भौगोलिक करिश्मा है, जहां छोटे-छोटे पत्थरों पर विशालकाय पत्थर रखे हुए हैं.

*किष्किंधा से विजयनगर तक: इतिहास और वैभव*

तापस कहते हैं कि हम्पी में कोरेकल राइड होती है, जो काफी रोचक है. उन्होंने बताया कि हम्पी का पुराना नाम किष्किंधा है, जिसका रामायण से संबंध रहा है. बाली और सुग्रीव से जुड़े स्थलों का उल्लेख वहां किया जाता है.

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य बताते हुए तापस ने कहा कि हम्पी, विजयनगर राज्य की राजधानी थी. तेनालीराम का संबंध भी वहीं से रहा था. उन्होंने कहा कि विजयनगर की आबादी उस समय 5 लाख से ज्यादा थी, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह कितना समृद्ध था. 50 रुपए के नोट में जो रथ है, वह हम्पी में ही स्थित है.

तापस कहते हैं कि विजय विट्ठल मंदिर के अंदर ऐसे स्तंभ हैं, जिनसे अलग-अलग ध्वनियां निकलती हैं और यह बेहद अद्भुत है. जब वे वहां गए, तो उनकी किस्मत अच्छी थी कि उन्हें पूरा परिसर देखने का अवसर मिला और वहां के दृश्य बेहद शानदार थे.

किताब के बारे में बात करते तापस ने आगे बताया कि साल 1565 के दौरान राज्य में युद्ध हुआ और हार के बाद राजा का परिवार विजयनगर से पलायन कर गया. इसके बाद दूसरी जगह उनका राज्य सीमित ही रह गया.

*किताब और बाली के महल पर सवाल*

तापस कहते हैं कि किताब में उन्होंने अपनी खींची 200 तस्वीरें शामिल की हैं. वे कहते हैं कि उन्हें ये पत्थर खंडहर नहीं लगते, बल्कि बोलते पत्थर लगते हैं.

किताब पर बात करते हुए लेखक एवं साहित्यकार मुकेश नौटियाल ने कहा कि उन्होंने इस किताब को तीन बार पढ़ा है. इसमें इतिहास की अच्छी जानकारी है और लेखक इसमें गाइड की भूमिका में भी नजर आते हैं.

कार्यक्रम की मुख्य अतिथि दून विश्वविद्यालय की कुलपति डॉक्टर सुरेखा डंगवाल ने कहा कि साहित्यकार इतिहासकार भी हो तो हम्पी जैसी किताब निकल सकती है. इस पुस्तक के पन्ने पलटने से हम्पी जाने की जिज्ञासा बढ़ती रहती है. उन्होंने यह भी कहा कि यह किताब स्कूली छात्रों के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है, इससे वे अपने इतिहास को ज्यादा गहराई से समझ सकेंगे.

कार्यक्रम में डॉक्टर जितेन ठाकुर ने कहा कि किताब पठनीय है. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि किताब में बाली के महल की बात कही गई है, लेकिन यह संदेहास्पद लगता है कि त्रेता युग के अंत से अब तक बाली का महल किसी न किसी रूप में मौजूद हो. उनका मानना है कि संभवतः उस क्षेत्र को लोकप्रिय बनाने के लिए उसे बाली का महल कहा जाता है.

*आपदाओं से पर्यावरण तक: ‘खबरपात’ में हिमालय और रिपोर्टिंग पर उठे सवाल*


देहरादून के दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में आज 'खबरपात' का आयोजन किया गया. खबरपात, उत्तराखंड के मासिक समाचारों और विचारों को परस्पर साझा करने का एक नागरिक विमर्श मंच है और वरिष्ठ पत्रकार त्रिलोचन भट्ट द्वारा इसका संचालन किया जाता है. इस वर्ष उमेश डोभाल पत्रकारिता पुरस्कार प्राप्त पत्रकार राजू सजवाण ने हिमालय, पर्यावरण और मीडिया विषय पर कार्यक्रम में अपने विचार रखे. उन्होंने कहा कि हमारे यहां की आपदाओं को ‘इवेंट’ कहा जाता है.

*हिमालय में बढ़ता संकट और जल स्रोतों की अनदेखी*


हिमालय में पर्यावरणीय संकट पर राजू सजवाण ने कहा कि हिमालय वैश्विक औसत से अधिक तेजी से गर्म हो रहा है और ग्लेशियर पिघल रहे हैं. जल चक्र और हिमपात में बदलाव की वजह से खेती, बागवानी चौपट हो रही है. पहाड़ों में जाकर यह दिखता है कि इससे खेती पर कितना असर हो रहा है. राजू कहते हैं कि हिमालय की हर कहानी पर्यावरण की कहानी है, बस उसे देखने का नजरिया चाहिए. इस बार जल स्त्रोत सूख रहे हैं लेकिन इस पर कोई रिपोर्ट नहीं हुई है, जब लोग पानी की कमी को लेकर आंदोलन करेंगे तब इस पर रिपोर्ट होगी.

*पर्यावरण रिपोर्टिंग, लोकल पत्रकारिता का अभाव और प्रेस नोट*


राजू कहते हैं कि हेमवती नंदन बहुगुणा विश्वविद्यालय के एक रिसर्च पेपर के अनुसार केवल 4.82% खबरें पर्यावरण से जुड़ी होती हैं, इसमें सबसे ज्यादा कवरेज प्राकृतिक आपदाओं पर होती हैं. उन्होंने कहा कि खबरों में ‘क्या हुआ’ बताया जाता है लेकिन ‘क्यों हुआ’ नहीं बताया जाता है. राजू कहते हैं कि उत्तराखंड में मजबूत लोकल रिपोर्टिंग का अभाव है, 2022 में जोशीमठ की आपदा का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि तब आपदा को इतना सही तरीके से नहीं दिखाया गया लेकिन 2023 की आपदा के बाद हमने देखा कि उसे राष्ट्रीय खबर बना दिया गया, अगर 2022 की घटना की ही सही रिपोर्टिंग कर ली जाती तो अगले वर्ष हुई घटना के लिए सही समय से जागरूक रहा जा सकता था. उन्होंने प्रेस नोट से परे हटकर जमीनी पत्रकारिता पर जोर दिया.

*बर्फबारी का पैटर्न, खनन और खेती का संकट*


राजू ने कहा कि दिसंबर, जनवरी में जो बर्फ गिरनी थी वह नहीं गिरी और यह चिंताजनक पहलू था पर उस पर कोई खबर नहीं हुई, लेकिन फरवरी में बर्फबारी होते ही यह खबर बन गई, खनन व भूमि उपयोग पर कोई बात नहीं होती. उन्होंने कहा खेती का संकट उत्तराखंड के लिए एक बड़ा संकट है, पारंपरिक खेती छोड़ने जैसे विषय पर गहराई से काम करने की जरूरत है. हिमाचल प्रदेश का उदाहरण देते उन्होंने कहा कि कैसे वहां सेब की खेती में कीटनाशकों के प्रयोग ने कैंसर जैसी बीमारी को न्यौता दिया है.


Saturday, April 4, 2026

बाली के महल पर सवाल, हम्पी की कहानी पर चर्चा: दून लाइब्रेरी में किताब का लोकार्पण

*बाली के महल पर सवाल, हम्पी की कहानी पर चर्चा: दून लाइब्रेरी में किताब का लोकार्पण*


‘हम्पी: उत्कर्ष से अपकर्ष तक’ पर चर्चा, इतिहास और दावों पर भी सवाल


दून लाइब्रेरी, देहरादून में इस शनिवार लेखक तापस चक्रबर्ती की पुस्तक ‘हम्पी: उत्कर्ष से अपकर्ष तक’ का लोकार्पण किया गया और इसके साथ ही किताब पर चर्चा भी हुई. यह पुस्तक विनसर प्रकाशन से प्रकाशित होकर आई है.

लेखक ने बताया कि वे यात्रा-वृत्तांत इस तरह लिखते हैं कि पाठक किताब को उनकी नजर से देख सके और उसे लगे कि वह उस क्षेत्र में स्वयं घूम रहा है. उन्होंने कहा कि जब यूनेस्को ने 2019 में हम्पी को “must see destination” की सूची में डाला, तब से वे वहां घूमना चाहते थे.

उन्होंने कहा कि यह जगह एक भौगोलिक करिश्मा है, जहां छोटे-छोटे पत्थरों पर विशालकाय पत्थर रखे हुए हैं.

*किष्किंधा से विजयनगर तक: इतिहास और वैभव*


तापस कहते हैं कि हम्पी में कोरेकल राइड होती है, जो काफी रोचक है. उन्होंने बताया कि हम्पी का पुराना नाम किष्किंधा है, जिसका रामायण से संबंध रहा है. बाली और सुग्रीव का किला वहां आज भी मौजूद बताया जाता है.

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य बताते हुए तापस ने कहा कि हम्पी, विजयनगर राज्य की राजधानी थी. तेनालीराम का संबंध भी वहीं से रहा था. उन्होंने कहा कि विजयनगर की आबादी उस समय 5 लाख से ज्यादा थी, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह कितना समृद्ध था. 50 रुपए के नोट में जो रथ है, वह हम्पी में ही स्थित है.

तापस कहते हैं कि विजय विट्ठल मंदिर के अंदर ऐसे स्तंभ हैं, जिनसे अलग-अलग ध्वनियां निकलती हैं और यह बेहद अद्भुत है. जब वे वहां गए, तो उनकी किस्मत अच्छी थी कि उन्हें पूरा परिसर देखने का अवसर मिला और वहां के दृश्य बेहद शानदार थे.

किताब के बारे में बात करते तापस ने आगे बताया कि साल 1565 के दौरान राज्य में युद्ध हुआ और हार के बाद राजा का परिवार विजयनगर से पलायन कर गया. इसके बाद दूसरी जगह उनका राज्य सीमित ही रह गया.

*किताब और बाली के महल पर सवाल*


तापस कहते हैं कि किताब में उन्होंने अपनी खींची 200 तस्वीरें शामिल की हैं. वे कहते हैं कि उन्हें ये पत्थर खंडहर नहीं लगते, बल्कि बोलते पत्थर लगते हैं.

किताब पर बात करते हुए लेखक एवं साहित्यकार मुकेश नौटियाल ने कहा कि उन्होंने इस किताब को तीन बार पढ़ा है. इसमें इतिहास की अच्छी जानकारी है और लेखक इसमें गाइड की भूमिका में भी नजर आते हैं.

कार्यक्रम की मुख्य अतिथि दून विश्वविद्यालय की कुलपति डॉक्टर सुरेखा डंगवाल ने कहा कि साहित्यकार इतिहासकार भी हो तो हम्पी जैसी किताब निकल सकती है. इस पुस्तक के पन्ने पलटने से हम्पी जाने की जिज्ञासा बढ़ती रहती है. उन्होंने यह भी कहा कि यह किताब स्कूली छात्रों के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है, इससे वे अपने इतिहास को ज्यादा गहराई से समझ सकेंगे.

कार्यक्रम में डॉक्टर जितेन ठाकुर ने कहा कि किताब पठनीय है. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि किताब में बाली के महल की बात कही गई है, लेकिन यह संदेहास्पद लगता है कि त्रेता युग के अंत से अब तक बाली का महल किसी न किसी रूप में मौजूद हो. उनका मानना है कि संभवतः उस क्षेत्र को लोकप्रिय बनाने के लिए उसे बाली का महल कहा जाता है.

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...