Sunday, April 19, 2026

*नोएडा मजदूर आंदोलन के बीच जानें एक मजदूर का समीकरण*

मजदूरों की कमाई का गणित, सीजन पर निर्भरता और सालभर के आर्थिक संतुलन पर एक रिपोर्ट 

नोएडा में मजदूरों के आंदोलन ने पूरे देशभर में मजदूरों की कमाई पर एक नई बहस छेड़ दी है. मजदूर


मूल रूप से के रहने वाले वीरेंद्र सिंह देहरादून में मौसमी काम करते हैं. गर्मी के चार से पांच महीनों में गन्ने के जूस के कारोबार से वह करीब डेढ़ लाख रुपये कमा लेते हैं. वहीं साल के बाकी सात महीनों में अपने कस्बे लौटकर बर्गर और चाउमीन का ठेला लगाते हैं, जिससे 60 से 70 हजार रुपये की आमदनी हो जाती है. इस तरह साल भर में उनकी कुल कमाई लगभग दो लाख रुपये तक पहुंचती है.

खर्च का दबाव. बचत की असली चुनौती
देहरादून में वह अपने चार साथियों के साथ एक कमरे में रहते हैं और प्रति व्यक्ति 3500 रुपये किराया देते हैं. खाने पीने पर करीब 100 रुपये रोज यानी महीने में लगभग 3000 रुपये खर्च हो जाते हैं. सीमित आय के बीच ये बुनियादी खर्च ही उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा खा जाते हैं. साल भर के हिसाब से देखें तो करीब एक लाख रुपये की ही बचत हो पाती है, जो उनकी मेहनत और संयम का परिणाम है.

जिम्मेदारियां और भविष्य. परिवार के लिए संघर्ष
वीरेंद्र के तीन बेटे और दो बेटियां हैं, सभी ने सरकारी स्कूलों से पढ़ाई की है और अब कॉलेज में हैं. बड़ी बेटी बारहवीं के बाद सिलाई सीख रही है और उसकी शादी की तैयारी भी चल रही है. वीरेंद्र अब तक करीब साढ़े चार लाख रुपये के जेवर बनवा चुके हैं और आगे शादी के खर्च के लिए बचत कर रहे हैं. वह अपने बेटे को भी इस काम से जोड़ने के लिए 70 हजार रुपये की मशीन खरीदने वाले हैं. बदलते हालात और तेल की अनिश्चितता से वह वाकिफ हैं, लेकिन उनका कहना है कि हालात जैसे भी हों, काम करना ही पड़ेगा.

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