Saturday, June 13, 2026
आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?
Friday, June 12, 2026
किताबों के बहाने समाज, साहित्य और समय को समझने की कोशिश
केतन लाल की मौत और उत्तराखंड का आईना: क्या बदल रहा है पहाड़ का समाज?
*केतन लाल की मौत और उत्तराखंड का आईना: क्या बदल रहा है पहाड़ का समाज?*
टिहरी में 18 वर्षीय केतन लाल की हत्या ने पूरे उत्तराखंड को झकझोर दिया है। पुलिस जांच के अनुसार केतन की दोस्ती एक नाबालिग लड़की से थी, जिसका परिवार इस रिश्ते का विरोध कर रहा था। आरोप है कि 7 जून की रात उसे बुलाकर बेरहमी से पीटा गया, जिससे उसकी मौत हो गई।
मामले की जांच जारी है, लेकिन इस घटना ने जातिगत भेदभाव, अंतरजातीय रिश्तों के प्रति समाज के रवैये, ऑनर किलिंग और मौजूदा कानूनी व्यवस्था को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
*उत्तराखंड में बदलते सामाजिक माहौल का संकेत है यह घटना*
उत्तराखंड को अक्सर अपेक्षाकृत शांत, सहिष्णु और प्रगतिशील समाज के रूप में देखा जाता है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अंतरजातीय रिश्तों को लेकर इतनी हिंसक प्रतिक्रिया क्यों देखने को मिल रही है और क्या यह किसी गहरे सामाजिक बदलाव का संकेत है?
देहरादून के सामाजिक कार्यकर्ता इंद्रेश मैखुरी कहते हैं कि केतन लाल हत्याकांड केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि समाज में मौजूद जातिगत पूर्वाग्रहों की एक गंभीर अभिव्यक्ति है। उनके मुताबिक सामान्य परिस्थितियों में उत्तराखंड में अक्सर यह दावा किया जाता है कि यहां जातिगत भेदभाव अपेक्षाकृत कम है, लेकिन अंतरजातीय प्रेम, मित्रता या विवाह जैसे मामलों में समाज का एक कठोर चेहरा सामने आ जाता है।
मैखुरी का मानना है कि जातिगत श्रेष्ठता का भाव लोगों को इस हद तक हिंसक बना सकता है कि वे प्रेम और मित्रता को भी अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा पर हमला समझने लगते हैं। उनके अनुसार केतन की हत्या इसी मानसिकता की एक भयावह मिसाल है, जहां एक दलित युवक और सवर्ण परिवार की लड़की के बीच मित्रता को स्वीकार करने के बजाय हिंसा का रास्ता चुना गया। वे इस घटना को वर्ष 2022 में अल्मोड़ा में दलित राजनीतिक कार्यकर्ता जगदीश चंद्र की हत्या जैसी घटनाओं की कड़ी में देखते हैं और कहते हैं कि सामाजिक बदलाव के दावों के बावजूद जाति का प्रश्न अब भी समाज के भीतर मौजूद है।
वहीं उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार बद्रीदत्त कसनियाल इस घटना को राज्य के सामाजिक चरित्र और सामूहिक संवेदनशीलता से जोड़कर देखते हैं। उनका कहना है कि सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी बर्बर घटना के बावजूद पूरा उत्तराखंड एकजुट होकर क्यों खड़ा नहीं दिखाई देता। वे मानते हैं कि उत्तराखंड लंबे समय से अपेक्षाकृत सहिष्णु और सामाजिक रूप से संवेदनशील समाज के रूप में पहचाना जाता रहा है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि आखिर समाज के भीतर ऐसी क्रूरता और असहिष्णुता क्यों बढ़ रही है और वे कौन से कारक हैं जो लोगों को इतनी जघन्य हिंसा के प्रति भी उदासीन बना रहे हैं।
कसनियाल कहते हैं कि इस घटना को केवल एक अपराध के रूप में नहीं, बल्कि उत्तराखंड के बदलते सामाजिक चरित्र के संदर्भ में भी देखने की जरूरत है। उनका मानना है कि राज्य की पहचान लंबे समय तक सह-अस्तित्व, सामाजिक संतुलन और सहिष्णुता से जुड़ी रही है, लेकिन अब उस छवि पर दबाव दिखाई दे रहा है। उनके अनुसार उत्तराखंडी समाज को अपनी पारंपरिक सहिष्णुता और सामाजिक सौहार्द को फिर से अपनी पहचान का हिस्सा बनाना होगा।
इसी सवाल पर हिंदी फिल्मों के लेखक हल्द्वानी निवासी दीपक तिरुआ इस घटना को भारतीय समाज में चल रहे एक बड़े वैचारिक संघर्ष के संदर्भ में देखते हैं। उनका कहना है कि पिछले 76 वर्षों में भारतीय संविधान ने समानता, स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के मूल्यों के आधार पर समाज को आगे बढ़ाने का प्रयास किया है, लेकिन प्रतिगामी और जातिवादी सोच लगातार उस प्रक्रिया को पीछे धकेलने का काम कर रही है।
तिरुआ मानते हैं कि केतन लाल हत्याकांड जैसी घटनाएं केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं हैं, बल्कि वे इस बात का संकेत भी हैं कि समाज के भीतर अब भी ऐसी मानसिकताएं मौजूद हैं जो संवैधानिक मूल्यों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। उनके अनुसार अंतरजातीय रिश्तों या सामाजिक बराबरी को हिंसा के जरिए दबाने की कोशिशें लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था की भावना के खिलाफ हैं।
वे कहते हैं कि ऐसी प्रवृत्तियों पर काबू पाना समाज और राज्य दोनों की प्राथमिकता होनी चाहिए। उनके मुताबिक भारत ने लंबे संघर्ष के बाद समानता और सामाजिक न्याय की दिशा में जो प्रगति हासिल की है, उसे जातिगत घृणा और हिंसा के जरिए कमजोर नहीं होने दिया जा सकता। तिरुआ के अनुसार समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह संविधान के मूल्यों और बर्बर सामाजिक प्रवृत्तियों के बीच किस पक्ष को चुनता है।
*क्या मौजूदा कानून पर्याप्त हैं?*
केतन लाल हत्याकांड ने कानून और न्याय व्यवस्था से जुड़े कई गंभीर सवाल भी खड़े किए हैं। यदि जांच में यह साबित होता है कि हत्या अंतरजातीय रिश्ते के विरोध और जातिगत पहचान की वजह से हुई, तो क्या मौजूदा कानून ऐसे अपराधों को रोकने और पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के लिए पर्याप्त हैं या फिर किसी नए कानूनी ढांचे की जरूरत है?
इस सवाल पर उत्तराखंड हाईकोर्ट के अधिवक्ता देहरादून निवासी अभिजय नेगी कहते हैं कि टिहरी में जो हुआ वह केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि समाज और कानून दोनों के लिए गंभीर चेतावनी है। उनके अनुसार एक युवा दलित लड़के की हत्या, केवल इसलिए कि उसकी दोस्ती एक उच्च जाति के परिवार की लड़की से थी, ऑनर किलिंग और जातिगत अत्याचार के व्यापक प्रश्नों को सामने लाती है।
नेगी बताते हैं कि वर्तमान मामले में भारतीय न्याय संहिता और एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत कार्रवाई के पर्याप्त कानूनी आधार मौजूद हैं। हत्या के लिए भारतीय न्याय संहिता की प्रासंगिक धाराएं लागू होती हैं, जबकि यह एक सामूहिक कृत्य होने के कारण साझा आपराधिक मंशा से जुड़े प्रावधान भी लागू किए जा सकते हैं। इसके अलावा यदि यह साबित होता है कि अपराध पीड़ित की जातिगत पहचान के कारण किया गया, तो एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धाराएं भी लागू होंगी।
नेगी कहते हैं कि पुलिस ने एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(2)(v) भी लगाई है, जो किसी गैर-अनुसूचित जाति/जनजाति व्यक्ति द्वारा अनुसूचित जाति या जनजाति के सदस्य के खिलाफ उसकी जातिगत पहचान के आधार पर गंभीर अपराध किए जाने पर लागू होती है।
उनका कहना है कि अधिनियम की धारा 15A पीड़ित परिवार, गवाहों और अन्य प्रभावित व्यक्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी राज्य पर डालती है। साथ ही भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता, अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता के उन्मूलन की गारंटी देता है। ऐसे में जाति के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ हिंसा केवल आपराधिक कृत्य नहीं बल्कि संवैधानिक मूल्यों पर भी सीधा आघात है।
हालांकि नेगी मानते हैं कि यह मामला एक महत्वपूर्ण कानूनी कमी की ओर भी ध्यान दिलाता है। भारत में ऑनर किलिंग को अलग और विशिष्ट अपराध के रूप में परिभाषित करने वाला कोई विशेष कानून नहीं है। उनके अनुसार भारतीय विधि आयोग ने अपनी 242वीं रिपोर्ट में सम्मान और परंपरा के नाम पर होने वाले अपराधों को रोकने के लिए विशेष कानून का सुझाव दिया था, लेकिन अब तक ऐसा कानून नहीं बन पाया है।
नेगी का कहना है कि बदलते सामाजिक हालात को देखते हुए ऑनर किलिंग के खिलाफ विशेष कानून और अंतरजातीय संबंधों से जुड़ी हिंसा को लेकर कानूनी प्रावधानों को और मजबूत करने पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। उनके अनुसार केतन लाल का मामला केवल एक मुकदमा नहीं, बल्कि विधायिका और नीति निर्माताओं के लिए भी एक चेतावनी है कि ऐसे अपराधों की रोकथाम और पीड़ितों की सुरक्षा के लिए कानूनों को समय के अनुरूप और अधिक प्रभावी बनाया जाए।
Wednesday, June 10, 2026
केतन लाल हत्याकांड: क्या उत्तराखंड के सामने खड़े होते समाज और कानून से जुड़े बड़े सवाल?
Sunday, June 7, 2026
बारूद के साये में फुटबॉल : जब जब युद्ध के बीच खेला गया विश्व कप
*बारूद के साये में फुटबॉल : जब युद्ध और संघर्षों के साये में खेला गया विश्व कप*
*इन दिनों 2026 फुटबॉल विश्व कप का आधिकारिक थीम सॉन्ग "दाई दाई" धूम मचा रहा है, लेकिन यह टूर्नामेंट एक ऐसे दौर में खेला जा रहा है जब मेजबान देशों में से एक अमेरिका और प्रतिभागी देश ईरान के बीच गहरे राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी तनाव मौजूद हैं.*
दुनिया के कई हिस्सों में इस समय युद्ध और संघर्ष जारी हैं. पश्चिम एशिया में तनाव चरम पर है, यूरोप में रूस-यूक्रेन युद्ध का असर अब भी दिखाई दे रहा है और इसी अशांत माहौल के बीच 2026 फीफा विश्व कप 11 जून 2026 से अमेरिका, मेक्सिको और कनाडा में संयुक्त रूप से शुरू हो रहा है.
*जब युद्ध ने विश्व कप ही रोक दिया*
विश्व कप के इतिहास में केवल दो बार ऐसा हुआ है जब टूर्नामेंट आयोजित नहीं हो सका. 1942 और 1946 के विश्व कप, द्वितीय विश्व युद्ध की वजह से रद्द कर दिए गए थे. 1938 के बाद दुनिया को अगला विश्व कप देखने के लिए 1950 तक इंतजार करना पड़ा था.
द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने से ठीक पहले फ्रांस में 1938 का विश्व कप खेला गया था. उस समय यूरोप में तनाव चरम पर था. ऑस्ट्रिया की टीम विश्व कप के लिए क्वालिफाई कर चुकी थी, लेकिन जर्मनी द्वारा ऑस्ट्रिया के विलय (Anschluss) के बाद वह टूर्नामेंट में हिस्सा नहीं ले सकी.
*अब रूस पर प्रतिबंध और यूक्रेन की मुश्किलें*
यूक्रेन पर हमले के बाद फीफा और यूईएफए (UEFA) ने रूस पर कड़ा रुख अपनाया. इसका सीधा असर विश्व कप पर पड़ा और प्रतिबंध के कारण रूस 2026 विश्व कप की क्वालिफिकेशन प्रक्रिया का हिस्सा ही नहीं बन सका. इसे आधुनिक खेल इतिहास के सबसे बड़े प्रतिबंधों में से एक माना जा रहा है.
दूसरी ओर, यूक्रेन की टीम को अपने कई घरेलू मुकाबले देश से बाहर न्यूट्रल वेन्यू पर खेलने पड़े. युद्ध के कारण देश के स्टेडियम, प्रशिक्षण सुविधाएं और खेल ढांचा पूरी तरह प्रभावित हुआ, लेकिन इसके बावजूद टीम ने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अपनी खेल भावना और मौजूदगी को बनाए रखा. युद्ध की मार झेल रही यूक्रेनी टीम का सफर मार्च 2026 में समाप्त हो गया, जब विश्व कप प्ले-ऑफ के सेमीफाइनल में उसे स्वीडन के हाथों 3-1 से हार का सामना करना पड़ा.
*इस विश्व कप में फिलिस्तीन की अधूरी कहानी*
2026 विश्व कप क्वालिफिकेशन में फिलिस्तीन ने अपने इतिहास का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया. गाजा संघर्ष की विभीषिका के बीच टीम को अपने सभी घरेलू मैच भी तटस्थ मैदानों पर खेलने पड़े. विपरीत परिस्थितियों के बावजूद यह टीम पहली बार विश्व कप के बेहद करीब पहुंच गई थी.
क्वालिफिकेशन के निर्णायक दौर में ओमान के खिलाफ मुकाबले में फिलिस्तीन जीत की ओर बढ़ रहा था, लेकिन इंजरी टाइम में विपक्षी टीम को मिले पेनाल्टी गोल ने उसका सपना तोड़ दिया. 1-1 की इस बराबरी ने फिलिस्तीन को विश्व कप की दौड़ से बाहर कर दिया.
*इस विश्व कप की सबसे असाधारण कहानी*
अगर 2026 विश्व कप की सबसे असाधारण कहानी लिखी जाएगी तो वह ईरान की होगी.
एक तरफ ईरान और अमेरिका के बीच गंभीर भू-राजनीतिक तनाव है. दोनों देशों के संबंध दशकों से बेहद खराब रहे हैं और हाल के महीनों में हालात और ज्यादा जटिल हुए हैं. दूसरी तरफ, ईरान ने शानदार खेल दिखाते हुए विश्व कप के लिए क्वालिफाई किया है और उसे अपने ग्रुप चरण के मुकाबले अमेरिका की धरती पर ही खेलने हैं.
स्थिति इतनी असामान्य है कि सुरक्षा और राजनीतिक कारणों से ईरानी टीम ने अमेरिका के बजाय मेक्सिको के सीमावर्ती शहर तिजुआना (Tijuana) में अपना बेस कैंप बनाया है.
हाल ही में वीजा को लेकर हुआ विवाद भी सुर्खियों में रहा. खिलाड़ियों को तो अमेरिका में प्रवेश की अनुमति मिल गई, लेकिन ईरान के कुछ प्रमुख अधिकारियों और सहयोगी स्टाफ को वीजा देने से इनकार कर दिया गया.
क्या उत्तराखंड जलवायु संकट की सबसे खतरनाक कतार में खड़ा है? IIT मद्रास की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता
*IIT मद्रास की रिपोर्ट: जलवायु जोखिम के लिहाज से उत्तराखंड पर बढ़ी चिंता*
उत्तराखंड में मानसून की हर बारिश में अब सड़कें धंस रही हैं और जगह जगह पहाड़ भी दरक रहे हैं. पिछले कुछ वर्षों में जोशीमठ धंसाव, सिलक्यारा सुरंग धंसने की घटना, केदारनाथ क्षेत्र में बार-बार आने वाली आपदाएं और चारधाम मार्ग पर लगातार हो रहे भूस्खलन हिमालयी क्षेत्र की बढ़ती संवेदनशीलता की ओर संकेत करते हैं.
अब भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मद्रास के शोधकर्ताओं की एक रिपोर्ट ने इस चिंता को और गहरा कर दिया है. अध्ययन के अनुसार भारतीय हिमालयी क्षेत्र के जिलों में पश्चिमी हिमालय, जिसमें उत्तराखंड भी शामिल है, पूर्वी हिमालय की तुलना में जलवायु परिवर्तन से पैदा होने वाले खतरों के प्रति अधिक जोखिमग्रस्त पाया गया है.
*क्या कहती है यह चौंकाने वाली रिपोर्ट?*
IIT मद्रास के शोधकर्ताओं कृष्णा मलाकर और आयुष शाह द्वारा तैयार अध्ययन "Climate-change-induced risk mapping of the Indian Himalayan districts using the latest IPCC framework" में भारतीय हिमालयी क्षेत्र के 109 जिलों का विश्लेषण किया गया. शोध में जलवायु जोखिम का आकलन करने के लिए इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) के नवीनतम ढांचे का इस्तेमाल किया गया.
अध्ययन में उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर सहित कई हिमालयी राज्यों को उच्च जलवायु जोखिम वाले क्षेत्रों में रखा गया है. हालांकि पूर्वी हिमालय में सामाजिक और आर्थिक कमजोरियां अधिक हैं, लेकिन प्राकृतिक खतरों और जोखिमों के मामले में पश्चिमी हिमालय आगे है.
रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में खतरों की तीव्रता और उनका प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देता है.
*शिमला सबसे अधिक खतरे वाला जिला*
अध्ययन में हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले को पूरे भारतीय हिमालयी क्षेत्र का सबसे अधिक खतरे वाला जिला बताया गया है. इसके बाद पूर्वी सिक्किम का स्थान आता है.
शोधकर्ताओं ने भूकंप, बाढ़, ठंड की लहर, बर्फबारी और ओलावृष्टि जैसी 11 भौतिक परिस्थितियों को आधार बनाकर जोखिम का आकलन किया. अध्ययन में पाया गया कि पश्चिमी हिमालय के 47 जिलों में से 34 जिले उच्च या अत्यधिक जोखिम वाले वर्ग में आते हैं.
यह निष्कर्ष इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश दोनों राज्यों में तेजी से सड़क, सुरंग और पर्यटन अवसंरचना का विस्तार हो रहा है.
*उत्तराखंड के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह चेतावनी?*
उत्तराखंड पिछले एक दशक में कई बड़ी प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर चुका है. 2013 की केदारनाथ त्रासदी में हजारों लोगों की जान गई थी. 2021 में चमोली जिले में ऋषिगंगा क्षेत्र में आई आपदा ने फिर दिखाया कि हिमालयी इलाकों में छोटे बदलाव भी कितने बड़े संकट का रूप ले सकते हैं.
2023 में जोशीमठ में जमीन धंसने की घटना ने विकास परियोजनाओं, भूगर्भीय अस्थिरता और जलवायु परिवर्तन पर विमर्श को नए सिरे से शुरू कर दिया. इसके बाद से राज्य में भूस्खलन, बादल फटने और अतिवृष्टि की घटनाओं पर लगातार चिंता व्यक्त की जाती रही है.
*IIT रुड़की के अध्ययन ने क्या पाया?*
IIT रुड़की के जल विज्ञान विभाग के शोधकर्ताओं स्पंदिता मित्रा, दिव्या सरदाना और अंकित अग्रवाल द्वारा किए गए अध्ययन "Seasonal Shifts and Structural Changes in Western Disturbances Over Hindu Kush Himalayas" ने हिमालयी क्षेत्र के मौसम में आ रहे बदलावों को लेकर नई चिंता जताई है.
International Journal of Climatology में प्रकाशित इस अध्ययन में 1950 से 2022 तक के मौसम संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण किया गया. शोधकर्ताओं ने पाया कि पश्चिमी विक्षोभों के स्वरूप और समय में बदलाव आ रहा है. पहले जहां इनकी सक्रियता मुख्य रूप से सर्दियों के महीनों में रहती थी, वहीं अब प्री-मानसून अवधि में भी इनके प्रभाव बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं.
अध्ययन के अनुसार इस बदलाव का असर वर्षा के पैटर्न पर पड़ सकता है. इससे हिमालयी क्षेत्रों में अतिवृष्टि, फ्लैश फ्लड और भूस्खलन जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है. उत्तराखंड जैसे राज्यों में बड़ी आबादी पहाड़ी ढलानों पर रहती है और वहां महत्वपूर्ण सड़कें, पुल तथा अन्य अवसंरचनाएं मौजूद हैं. इसलिए मौसम में ऐसे बदलावों का असर यहां अधिक पड़ सकता है.
*क्या सिर्फ जलवायु परिवर्तन जिम्मेदार है?*
रिपोर्ट में यह भी लिखा है कि जोखिम का स्तर इस बात पर निर्भर करता है कि कोई समाज आपदा का सामना करने और उससे उबरने के लिए कितना तैयार है.
यानी समस्या सिर्फ बढ़ती बारिश या बदलते मौसम की नहीं है. स्वास्थ्य सेवाएं, संचार व्यवस्था, रोजगार के अवसर, शिक्षा, सुरक्षित आवास और स्थानीय आजीविका भी किसी क्षेत्र की जलवायु संवेदनशीलता तय करते हैं.
उत्तराखंड जैसे राज्य में जहां बड़ी आबादी पहाड़ी और दूरस्थ क्षेत्रों में रहती है, वहां यह चुनौती और जटिल हो जाती है.
*केदारनाथ से मिली सीख*
रिपोर्ट में 2013 की केदारनाथ आपदा का जिक्र करते हुए बेहतर संचार व्यवस्था और शुरुआती चेतावनी प्रणाली को बेहद महत्वपूर्ण बताया गया है. शोधकर्ताओं का मानना है कि दूरदराज के इलाकों तक सूचना तेजी से पहुंचाने की व्यवस्था विकसित की जाए तो जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है.
इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाने, स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने, शिक्षा तक पहुंच आसान बनाने और कृषि पर निर्भरता कम कर आय के विविध स्रोत विकसित करने की भी सिफारिश की गई है.
Saturday, June 6, 2026
Friday, June 5, 2026
राहुल गांधी ने उठाए कुछ अहम सवाल, लेकिन क्या पहाड़ के बड़े मुद्दों पर हुई पूरी बात?
*राहुल गांधी ने उठाए कुछ अहम सवाल, लेकिन क्या पहाड़ के बड़े मुद्दों पर हुई पूरी बात?*
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी 4 और 5 जून को प्रस्तावित दो दिवसीय उत्तराखंड दौरे पर पहुंचे, लेकिन खराब मौसम के कारण उनका अल्मोड़ा और पौड़ी का कार्यक्रम प्रभावित हो गया. हेलीकॉप्टर उड़ान संभव नहीं होने के कारण वह निर्धारित सभाओं में प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं हो सके और उन्होंने फोन के माध्यम से लोगों को संबोधित किया. अपने संबोधन में राहुल गांधी ने अग्निवीर योजना और अंकिता भंडारी हत्याकांड जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया. ये दोनों ऐसे विषय हैं जो पिछले कुछ वर्षों से उत्तराखंड की राजनीति और सामाजिक विमर्श के केंद्र में रहे हैं.
हालांकि उत्तराखंड के सामने मौजूद चुनौतियां केवल इन्हीं मुद्दों तक सीमित नहीं हैं. रोजगार, पलायन, पहाड़ की स्वास्थ्य सेवाएं, धार्मिक पर्यटन का बढ़ता दबाव, पर्यावरणीय संकट और दलबदल की राजनीति जैसे कई सवाल आज भी लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर रहे हैं. ऐसे में राहुल गांधी के संबोधन के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या राज्य के इन व्यापक मुद्दों पर भी उतनी ही स्पष्टता और विस्तार से बात हुई, जितनी अग्निवीर और अंकिता भंडारी मामले पर दिखाई दी.
*वीरभूमि के युवाओं का सवाल, अग्निवीर के साथ रोजगार पर क्या है रोडमैप?*
उत्तराखंड को लंबे समय से सैनिकों का प्रदेश माना जाता है. राज्य के हजारों युवा सेना में भर्ती होने का सपना देखते हैं. ऐसे में अग्निवीर योजना को लेकर यहां लगातार बहस होती रही है. राहुल गांधी ने अपने संबोधन में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया और योजना की आलोचना भी की.
लेकिन युवाओं के सामने सवाल केवल अग्निवीर तक सीमित नहीं है. राज्य में बेरोजगारी और रोजगार के अवसरों की कमी भी बड़ी चिंता है. हरिद्वार, पंतनगर और सेलाकुई के औद्योगिक क्षेत्रों से स्थानीय युवाओं को बड़ी उम्मीदें थीं. हालांकि विभिन्न युवा संगठनों और स्थानीय लोगों के बीच यह शिकायत अक्सर सुनाई देती है कि उद्योगों में स्थानीय युवाओं को अपेक्षित अवसर नहीं मिल रहे हैं और बाहरी राज्यों के लोगों की संख्या अधिक दिखाई देती है.
पहाड़ के कई गांव आज भी बेहतर रोजगार की तलाश में हो रहे पलायन की कहानी कहते हैं. ऐसे में युवाओं की नजर केवल अग्निवीर योजना पर नहीं, बल्कि इस सवाल पर भी है कि रोजगार सृजन को लेकर राजनीतिक दलों का ठोस रोडमैप क्या है.
*अंकिता भंडारी का नाम आज भी क्यों चर्चा में रहता है?*
सितंबर 2022 में हुए अंकिता भंडारी हत्याकांड ने पूरे उत्तराखंड को झकझोर दिया था. राहुल गांधी ने अपने संबोधन में इस मामले का जिक्र किया और इसे न्याय तथा महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा बताया.
यह मामला सिर्फ एक आपराधिक घटना न रहकर उत्तराखंड में महिलाओं की सुरक्षा, सत्ता के प्रभाव और न्याय व्यवस्था पर भरोसे का सवाल बन गया. पौड़ी जिले की रहने वाली अंकिता के परिवार और कई सामाजिक संगठनों की ओर से समय-समय पर मामले के सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच की मांग उठती रही है. राज्य में आज भी यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का हिस्सा बना हुआ है.
हालांकि महिलाओं की सुरक्षा के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े सवाल भी महिलाओं के जीवन को सीधे प्रभावित करते हैं. इसलिए महिला सुरक्षा के मुद्दे को व्यापक सामाजिक संदर्भ में देखने की मांग भी उठती रही है.
*पहाड़ के अस्पताल, जहां इलाज से पहले मिलता है रेफर*
उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति लंबे समय से चिंता का विषय रही है. चमोली, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ जैसे जिलों में रहने वाले लोगों को गंभीर बीमारी की स्थिति में अक्सर देहरादून, ऋषिकेश या हल्द्वानी जाना पड़ता है.
विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, आधुनिक उपकरणों का अभाव और दूर-दराज के इलाकों तक स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित पहुंच को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं. जिला अस्पतालों को मजबूत किए बिना पहाड़ की स्वास्थ्य व्यवस्था में बड़ा बदलाव संभव नहीं है.
स्वास्थ्य सेवाएं हर चुनाव में एक बड़ा मुद्दा बनती हैं, लेकिन चुनावी भाषणों में यह विषय अक्सर उतनी प्रमुखता नहीं पा पाता जितनी अन्य राजनीतिक मुद्दों को मिलती है.
*आस्था भी जरूरी, लेकिन पहाड़ कितना बोझ उठाए?*
चारधाम यात्रा उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है. लाखों लोगों की आजीविका इससे जुड़ी हुई है. लेकिन बढ़ती भीड़ के साथ पर्यावरण और बुनियादी ढांचे पर दबाव भी बढ़ा है.
जोशीमठ भू-धंसाव के बाद विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन पर विमर्श और तेज हुआ है. पर्यावरणविदों का एक वर्ग लंबे समय से मांग कर रहा है कि धार्मिक पर्यटन को रोकने के बजाय उसे वैज्ञानिक और नियंत्रित तरीके से संचालित किया जाए, ताकि पर्यावरण को नुकसान कम हो और स्थानीय लोगों को ट्रैफिक, कूड़ा प्रबंधन तथा संसाधनों पर बढ़ते दबाव से राहत मिल सके.
उत्तराखंड में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन का सवाल आने वाले वर्षों में और महत्वपूर्ण होने वाला है.
*कैंची धाम का जाम और बढ़ती चिंता"
नैनीताल जिले का कैंची धाम पिछले कुछ वर्षों में देश के सबसे लोकप्रिय धार्मिक स्थलों में शामिल हुआ है. छुट्टियों और विशेष अवसरों पर यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या इतनी बढ़ जाती है कि भवाली-अल्मोड़ा राष्ट्रीय राजमार्ग पर कई किलोमीटर लंबा जाम लग जाता है.
पर्यटन से स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ जरूर मिला है, लेकिन लगातार बढ़ती भीड़ ने यातायात, पार्किंग और बुनियादी सुविधाओं पर दबाव भी बढ़ाया है. स्थानीय निवासियों, स्कूली बच्चों और मरीजों को भी कई बार घंटों जाम में फंसना पड़ता है.
ऐसे में धार्मिक पर्यटन के बेहतर प्रबंधन और दीर्घकालिक योजना की मांग लगातार उठ रही है. यह मुद्दा स्थानीय लोगों के लिए किसी राजनीतिक सवाल से ज्यादा रोजमर्रा की परेशानी का विषय बन चुका है.
*दलबदल की राजनीति पर क्या होगी स्पष्ट नीति?*
उत्तराखंड की राजनीति में दलबदल कोई नया विषय नहीं है. राज्य गठन के बाद कई बड़े नेता और विधायक समय-समय पर राजनीतिक दल बदलते रहे हैं. इससे राजनीतिक दलों की वैचारिक प्रतिबद्धता और जनता के भरोसे को लेकर सवाल उठते रहे हैं.
युवा मतदाताओं के बीच यह चर्चा आम है कि जो नेता एक विचारधारा और पार्टी के नाम पर वोट मांगते हैं, वे बाद में दूसरी पार्टी में क्यों चले जाते हैं. ऐसे में यह सवाल केवल कांग्रेस ही नहीं, बल्कि सभी राजनीतिक दलों के सामने है कि वे दलबदल को लेकर कितनी स्पष्ट नीति अपनाते हैं और अपने पुराने कार्यकर्ताओं को कितना महत्व देते हैं.
हिमांशु जोशी
Thursday, June 4, 2026
जीवन के अनुभवों से निकली सीखों की किताब ‘अंतस’
*अनुभवों से उपजी जीवन दृष्टि*
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी निवासी लवकुश कुमार ने भौतिकी में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातक तथा आईआईटी दिल्ली से परास्नातक की शिक्षा प्राप्त की है. अपने जीवन के अनुभवों को उन्होंने लेखों के माध्यम से ‘अंतस’ नामक पुस्तक में संकलित किया है, जिसे नोशन प्रेस प्लेटफॉर्म से प्रकाशित किया गया है.
अपने जीवन के एक कटु अनुभव के माध्यम से किताब के पहले लेख में लेखक पाठकों को एक महत्वपूर्ण सीख देते हैं, “संवेदनशीलता इंसान को जिम्मेदार बनाती है.” लेखक इस विचार को किसी उपदेश की तरह नहीं, बल्कि अपने अनुभव के जरिए प्रस्तुत करते हैं, जिससे बात सहज रूप से पाठकों तक पहुंचती है. जीवन दर्शन से जुड़ा यह लेख शुरुआत से ही पाठकों पर प्रभाव छोड़ने में सफल रहता है और उन्हें आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है.
किताब की एक विशेषता यह है कि लेखक अपने अनुभवों को केवल व्यक्तिगत घटनाओं तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उनसे व्यापक सामाजिक और मानवीय निष्कर्ष निकालने की कोशिश करते हैं. यही कारण है कि पुस्तक के कई लेख पाठकों को अपने जीवन और व्यवहार पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं.
*सरल भाषा और कुछ संपादकीय कमियां*
किताब में कुछ वर्तनी संबंधी त्रुटियां भी दिखाई देती हैं. उदाहरण के तौर पर पृष्ठ संख्या 7 पर “मायने” शब्द की वर्तनी त्रुटिपूर्ण रूप में छपी है. हालांकि ऐसी त्रुटियां पुस्तक की विषयवस्तु को प्रभावित नहीं करतीं, लेकिन अगले संस्करण में इन्हें सुधारा जा सकता है.
लेखक ने कई लेखों के आरंभ या अंत में विषय से जुड़े महापुरुषों के कथनों को शामिल कर किताब को और प्रभावी बनाने का प्रयास किया है. उदाहरण के तौर पर अभिव्यक्ति से जुड़े लेख के अंत में महात्मा गांधी का एक कथन दिया गया है. ऐसे उद्धरण लेखों के संदेश को और स्पष्ट करते हैं तथा पाठकों को विषय पर गहराई से विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं.
*युवाओं और बच्चों के लिए उपयोगी विचार*
‘हमारे आदर्श और युवा’ शीर्षक लेख आज के दौर के बच्चों और युवाओं के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. इस लेख में लेखक लिखते हैं, “हमारे युवा और बच्चे उन लोगों की तरफ ही बढ़ेंगे जिनके बारे में बातें सुनेंगे.” यह पंक्ति बताती है कि समाज में जिन व्यक्तियों और मूल्यों को प्रमुखता दी जाती है, उनका सीधा प्रभाव नई पीढ़ी पर पड़ता है.
लेख केवल आदर्शों की चर्चा नहीं करता, बल्कि यह भी संकेत देता है कि बच्चों और युवाओं के सामने किस तरह के उदाहरण प्रस्तुत किए जा रहे हैं. इसी तरह के विचारोत्तेजक लेख इस किताब को हर उम्र के पाठकों के लिए प्रासंगिक बना देते हैं.
*लघुकथाओं में सामाजिक सरोकार*
किताब में कुछ लघुकथाएं भी शामिल हैं, जो इसकी विषयवस्तु को और विविध बनाती हैं. ये लघुकथाएं भ्रष्टाचार, वाहनों को तेज गति से चलाने जैसी सामाजिक समस्याओं पर केंद्रित हैं. संक्षिप्त होने के बावजूद इनमें एक स्पष्ट संदेश मौजूद है और ये पाठकों का ध्यान रोजमर्रा की उन समस्याओं की ओर आकर्षित करती हैं, जिन्हें अक्सर सामान्य मान लिया जाता है.
इन रचनाओं के माध्यम से लेखक सामाजिक जिम्मेदारी और जागरूकता का संदेश देते हैं तथा इन मुद्दों के खिलाफ आवाज उठाने का प्रयास करते हैं.
*पढ़ने और देखने की नई राहें*
किताब के अंत में लेखक ने पाठकों की समझ का दायरा बढ़ाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण किताबों और फिल्मों के नाम भी सुझाए हैं. यह प्रयास पुस्तक को केवल अनुभवों और विचारों के संकलन तक सीमित नहीं रहने देता, बल्कि आगे पढ़ने और सीखने की दिशा भी दिखाता है.
फिल्मों के महत्व को रेखांकित करते हुए लेखक ने ‘सिनेमा जीवन की पाठशाला’ के लेखक का उल्लेख किया है. इससे यह संदेश मिलता है कि सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन, समाज और मानवीय व्यवहार को समझने का एक महत्वपूर्ण साधन भी हो सकता है.
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Tuesday, June 2, 2026
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