Saturday, June 13, 2026

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?*

गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चारधाम यात्रा अपने चरम पर पहुंचने लगती है. हर साल लाखों श्रद्धालु बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के दर्शन के लिए हिमालय की ओर रुख करते हैं. इस यात्रा के दौरान बद्रीनाथ धाम पहुंचे श्रद्धालुओं से जब एनडीटीवी ने हिमालय में बढ़ते प्लास्टिक कचरे, पर्यावरण संरक्षण और बढ़ती भीड़ को लेकर बात की, तो कई दिलचस्प सुझाव और चिंताएं सामने आईं. श्रद्धालुओं ने सिविक सेंस, कचरा प्रबंधन, भीड़ नियंत्रण और सीवर व्यवस्था जैसे मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखी. इन सुझावों के बीच एक बड़ा सवाल यह सामने आया कि क्या आस्था और पर्यावरण संरक्षण के बीच बेहतर संतुलन बनाने की जरूरत है?

*क्या सिविक सेंस की कमी भी एक बड़ी वजह है?*

कर्नाटक के बेलगाम निवासी श्रीधर का मानना है कि समस्या की जड़ केवल व्यवस्थाओं में नहीं बल्कि लोगों की आदतों में भी है. उनका कहना है कि लोगों को बचपन से ही नदियों और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का भाव सिखाने की जरूरत है.

श्रीधर कहते हैं कि स्कूल स्तर पर बच्चों को यह समझाना होगा कि नदियां और पहाड़ केवल पर्यटन स्थल नहीं बल्कि जीवन का आधार हैं. उनका मानना है कि यदि बच्चों में शुरुआत से पर्यावरण संरक्षण की समझ विकसित की जाए तो आने वाली पीढ़ियां अधिक जिम्मेदार नागरिक बन सकती हैं.

चारधाम यात्रा मार्गों पर अक्सर देखा जाता है कि लोग पानी की खाली बोतलें, चिप्स के पैकेट और अन्य कचरा रास्तों में छोड़ देते हैं. पर्यावरण विशेषज्ञ भी समय-समय पर नागरिक जागरूकता को इस समस्या के समाधान का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते रहे हैं.

*क्या कचरा वापस लाने की व्यवस्था बन सकती है?*

मध्य प्रदेश के डबरा निवासी हर्षित गुप्ता का सुझाव है कि यात्रियों को अपने साथ लाया गया प्लास्टिक और अन्य कचरा वापस लेकर आना चाहिए.

हर्षित का कहना है कि पहाड़ों में प्लास्टिक का निस्तारण आसान नहीं होता. ऐसे में यात्रियों को स्वयं जिम्मेदारी लेते हुए अपने उपयोग के बाद बचा कचरा वापस मैदानों तक लाना चाहिए.

पहाड़ी क्षेत्रों में कचरा प्रबंधन हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है. ऊंचाई वाले इलाकों में रीसाइक्लिंग और कचरा निस्तारण की सुविधाएं सीमित होती हैं. ऐसे में पर्यावरणविद लंबे समय से 'कैरी इन, कैरी आउट' यानी जो सामान साथ ले जाएं, उसका कचरा भी वापस लेकर आने की अवधारणा पर जोर देते रहे हैं.

*क्या चारधाम यात्रा में भीड़ की सीमा तय होनी चाहिए?*

कानपुर निवासी और पेशे से डॉक्टर आयुष पांडे इस मुद्दे को पहाड़ों की वहन क्षमता यानी कैरिंग कैपेसिटी से जोड़कर देखते हैं. उनका मानना है कि किसी भी संवेदनशील क्षेत्र में आने वाले लोगों की संख्या उसकी क्षमता के अनुरूप होनी चाहिए.

डॉ. आयुष कहते हैं कि अत्यधिक भीड़ और बढ़ते प्रदूषण का असर सीधे पर्यावरण पर पड़ता है. उनके अनुसार चारधाम यात्रा के दौरान प्रतिदिन आने वाले यात्रियों की संख्या को लेकर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए.

उत्तराखंड में कैरिंग कैपेसिटी को लेकर सवाल नया नहीं है. केदारनाथ, बद्रीनाथ और अन्य लोकप्रिय पर्यटन स्थलों पर बढ़ती भीड़ के बीच कई बार यह सवाल सामने आया है कि क्या मौजूदा ढांचा इतनी बड़ी संख्या में यात्रियों का दबाव लंबे समय तक झेल सकता है.

*सीवर और अपशिष्ट प्रबंधन पर भी उठ रहे हैं सवाल*

डॉ. आयुष पांडे की बहन मंजुला पांडे का कहना है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं बल्कि प्रत्येक यात्री की भी जिम्मेदारी है.

मंजुला पांडे ने चारधाम क्षेत्रों में सीवर और अपशिष्ट प्रबंधन को लेकर भी सवाल उठाए. उनका कहना है कि यदि बड़ी संख्या में लोग तीर्थस्थलों पर पहुंच रहे हैं तो यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि वहां से निकलने वाले अपशिष्ट का उचित प्रबंधन हो. ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सीवेज और ठोस कचरा प्रबंधन की प्रभावी व्यवस्था न होने पर नदियों और जल स्रोतों पर दबाव बढ़ सकता है.

इन चिंताओं के बीच सरकारी आंकड़े भी बताते हैं कि बद्रीनाथ में सीवेज प्रबंधन के लिए बुनियादी ढांचा मौजूद है, हालांकि इसके रखरखाव और क्षमता को लेकर सवाल बने हुए हैं.

राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) को भेजी गई जुलाई 2024 की प्रगति रिपोर्ट के अनुसार, बद्रीनाथ के बामणी गांव में 0.26 MLD (करीब 2.6 लाख लीटर प्रतिदिन) क्षमता का सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) संचालित पाया गया. वहीं सस्पेंशन ब्रिज के पास 1.00 MLD (करीब 10 लाख लीटर प्रतिदिन) क्षमता का STP भी निर्धारित मानकों के अनुरूप कार्य कर रहा था. रिपोर्ट के मुताबिक, मंदिर के पास स्थित 0.01 MLD (करीब 10 हजार लीटर प्रतिदिन) क्षमता का STP मास्टर प्लान के तहत चल रहे निर्माण और ध्वस्तीकरण कार्य के कारण निरीक्षण के समय बंद पाया गया.

Friday, June 12, 2026

किताबों के बहाने समाज, साहित्य और समय को समझने की कोशिश

*किताबों के बहाने समाज, साहित्य और समय को समझने की कोशिश*

इस साल साहित्य, मीडिया और समाज को समझने की मेरी रुचि ने मुझे चार अलग-अलग लेकिन महत्वपूर्ण पुस्तकों से रूबरू करवाया. इनमें कहीं जीवन के अनुभवों से निकली सीख है, कहीं डिजिटल युग में बदलते मीडिया की पड़ताल, कहीं दलित चेतना और प्रतिरोध की कविताएं हैं, तो कहीं उत्तराखंड के सामाजिक सरोकारों और जनपक्षधर पत्रकारिता की स्मृतियां दर्ज हैं. इन पुस्तकों को पढ़ते हुए महसूस हुआ कि किताबें केवल ज्ञान का स्रोत नहीं होतीं, बल्कि वे अपने समय, समाज और मनुष्य की संवेदनाओं का दस्तावेज भी बन जाती हैं. यही कारण है कि ये चारों कृतियां अपने-अपने क्षेत्र में पाठकों को सोचने, सवाल करने और नए दृष्टिकोण विकसित करने का अवसर प्रदान करती हैं.

*जीवन के अनुभवों से निकली सीखों की किताब ‘अंतस’*

‘अंतस’ जीवन के अनुभवों, सामाजिक सरोकारों और नैतिक मूल्यों को सरल भाषा में प्रस्तुत करने वाली पुस्तक है. लेखक अपने अनुभवों के माध्यम से पाठकों को संवेदनशीलता, जिम्मेदारी और आत्मचिंतन का संदेश देते हैं. कुछ संपादकीय और वर्तनी संबंधी त्रुटियों के बावजूद यह पुस्तक पाठकों को सोचने के लिए प्रेरित करती है और विशेष रूप से युवाओं के लिए उपयोगी पाठ सिद्ध होती है.

*अनुभवों से उपजी जीवन दृष्टि*

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी निवासी लवकुश कुमार ने भौतिकी में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातक तथा आईआईटी दिल्ली से परास्नातक की शिक्षा प्राप्त की है. अपने जीवन के अनुभवों को उन्होंने लेखों के माध्यम से ‘अंतस’ नामक पुस्तक में संकलित किया है, जिसे नोशन प्रेस प्लेटफॉर्म से प्रकाशित किया गया है.

अपने जीवन के एक कटु अनुभव के माध्यम से किताब के पहले लेख में लेखक पाठकों को एक महत्वपूर्ण सीख देते हैं, “संवेदनशीलता इंसान को जिम्मेदार बनाती है.” लेखक इस विचार को किसी उपदेश की तरह नहीं, बल्कि अपने अनुभव के जरिए प्रस्तुत करते हैं, जिससे बात सहज रूप से पाठकों तक पहुंचती है. जीवन दर्शन से जुड़ा यह लेख शुरुआत से ही पाठकों पर प्रभाव छोड़ने में सफल रहता है और उन्हें आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है.

किताब की एक विशेषता यह है कि लेखक अपने अनुभवों को केवल व्यक्तिगत घटनाओं तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उनसे व्यापक सामाजिक और मानवीय निष्कर्ष निकालने की कोशिश करते हैं. यही कारण है कि पुस्तक के कई लेख पाठकों को अपने जीवन और व्यवहार पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं.

*सरल भाषा और कुछ संपादकीय कमियां*

किताब में कुछ वर्तनी संबंधी त्रुटियां भी दिखाई देती हैं. उदाहरण के तौर पर पृष्ठ संख्या 7 पर “मायने” शब्द की वर्तनी त्रुटिपूर्ण रूप में छपी है. हालांकि ऐसी त्रुटियां पुस्तक की विषयवस्तु को प्रभावित नहीं करतीं, लेकिन अगले संस्करण में इन्हें सुधारा जा सकता है.

लेखक ने कई लेखों के आरंभ या अंत में विषय से जुड़े महापुरुषों के कथनों को शामिल कर किताब को और प्रभावी बनाने का प्रयास किया है. उदाहरण के तौर पर अभिव्यक्ति से जुड़े लेख के अंत में महात्मा गांधी का एक कथन दिया गया है. ऐसे उद्धरण लेखों के संदेश को और स्पष्ट करते हैं तथा पाठकों को विषय पर गहराई से विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं.

*युवाओं और बच्चों के लिए उपयोगी विचार*

‘हमारे आदर्श और युवा’ शीर्षक लेख आज के दौर के बच्चों और युवाओं के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. इस लेख में लेखक लिखते हैं, “हमारे युवा और बच्चे उन लोगों की तरफ ही बढ़ेंगे जिनके बारे में बातें सुनेंगे.” यह पंक्ति बताती है कि समाज में जिन व्यक्तियों और मूल्यों को प्रमुखता दी जाती है, उनका सीधा प्रभाव नई पीढ़ी पर पड़ता है.

लेख केवल आदर्शों की चर्चा नहीं करता, बल्कि यह भी संकेत देता है कि बच्चों और युवाओं के सामने किस तरह के उदाहरण प्रस्तुत किए जा रहे हैं. इसी तरह के विचारोत्तेजक लेख इस किताब को हर उम्र के पाठकों के लिए प्रासंगिक बना देते हैं.

*लघुकथाओं में सामाजिक सरोकार*

किताब में कुछ लघुकथाएं भी शामिल हैं, जो इसकी विषयवस्तु को और विविध बनाती हैं. ये लघुकथाएं भ्रष्टाचार, वाहनों को तेज गति से चलाने जैसी सामाजिक समस्याओं पर केंद्रित हैं. संक्षिप्त होने के बावजूद इनमें एक स्पष्ट संदेश मौजूद है और ये पाठकों का ध्यान रोजमर्रा की उन समस्याओं की ओर आकर्षित करती हैं, जिन्हें अक्सर सामान्य मान लिया जाता है.

इन रचनाओं के माध्यम से लेखक सामाजिक जिम्मेदारी और जागरूकता का संदेश देते हैं तथा इन मुद्दों के खिलाफ आवाज उठाने का प्रयास करते हैं.

*पढ़ने और देखने की नई राहें*

किताब के अंत में लेखक ने पाठकों की समझ का दायरा बढ़ाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण किताबों और फिल्मों के नाम भी सुझाए हैं. यह प्रयास पुस्तक को केवल अनुभवों और विचारों के संकलन तक सीमित नहीं रहने देता, बल्कि आगे पढ़ने और सीखने की दिशा भी दिखाता है.

फिल्मों के महत्व को रेखांकित करते हुए लेखक ने ‘सिनेमा जीवन की पाठशाला’ के लेखक का उल्लेख किया है. इससे यह संदेश मिलता है कि सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन, समाज और मानवीय व्यवहार को समझने का एक महत्वपूर्ण साधन भी हो सकता है.

*न्यू मीडिया के बदलते परिदृश्य को समझने की एक सार्थक कोशिश*

'न्यू मीडिया के विविध आयाम' दिखाती है कि कैसे डिजिटल दौर ने लोगों की आदतों और समाज को किस तरह बदल दिया है. यह किताब बदलती पत्रकारिता और न्यू मीडिया की चुनौतियों को समझने का अच्छा अवसर देती है.

*न्यू मीडिया के बदलते दौर की पड़ताल*

मीडिया से जुड़ी एक महत्वपूर्ण किताब ‘न्यू मीडिया के विविध आयाम’ समय साक्ष्य प्रकाशन से प्रकाशित होकर आई है. मीडिया से जुड़े 23 लेखों से मिलकर बनी इस किताब का संपादन डॉ. सुशील उपाध्याय ने किया है. भाषा, मीडिया और साहित्य पर कई किताबें लिख चुके सुशील उपाध्याय इस पुस्तक में न्यू मीडिया के बदलते परिदृश्य को अलग-अलग दृष्टियों से सामने लाते हैं.
किताब का कवर पेज पहली नजर में ही ध्यान खींचता है. इसमें इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब और लिंक्डइन जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से जुड़े लोगो दिखाई देते हैं. कवर यह संकेत देता है कि यह किताब सोशल मीडिया के दौर में बदलते मीडिया के नए स्वरूप को समझने की कोशिश करती है.

*एआई और मीडिया की नई चुनौतियां*

किताब की भूमिका में कुछ वर्तनी संबंधी त्रुटियां भी दिखाई देती हैं. उदाहरण के तौर पर कई जगह “डिजिटल” की जगह “डिजीटल” लिखा गया है. हालांकि ये त्रुटियां पुस्तक की विषयवस्तु के महत्व को बहुत प्रभावित नहीं करतीं, लेकिन संपादन के स्तर पर थोड़ी और सावधानी बरती जाती तो किताब और अधिक प्रभावी बन सकती थी.

संपादक डॉ. सुशील उपाध्याय के लिखे पहले लेख में एआई के मीडिया में बढ़ते प्रयोगों और उससे जुड़ी वर्तमान व भविष्य की चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की गई है. लेख केवल तकनीक की संभावनाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके खतरों और दुरुपयोग की ओर भी ध्यान दिलाता है. “रजत शर्मा वियाग्रा का प्रचार करते दिखाई दे रहे हैं” जैसे उदाहरण के जरिए सुशील उपाध्याय यह दिखाते हैं कि एआई की मदद से किस तरह भ्रामक और कृत्रिम सामग्री तैयार की जा सकती है, जो मीडिया की विश्वसनीयता के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है.

*न्यू मीडिया और सामाजिक बदलाव*

किताब में न्यू मीडिया से जुड़े सामाजिक मुद्दों पर भी विस्तार से लिखा गया है और यही इसकी एक बड़ी खासियत बनकर सामने आती है. ‘न्यू मीडिया और महिलाएं’ शीर्षक लेख में बताया गया है कि सोशल मीडिया केवल मनोरंजन या सूचना का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि सामाजिक बदलाव में भी उसकी महत्वपूर्ण भूमिका दिखाई देती है. लेख में यह बात सामने आती है कि घरेलू हिंसा जैसे मुद्दों पर बनाए गए वीडियो और अभियानों का लोगों पर असर पड़ता है. कई लोग ऐसे वीडियो देखकर प्रभावित होते हैं और बाद में इस तरह की घटनाओं को रोकने या उनके खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश भी करते हैं.

हालांकि कई लेखों में मुख्य विषय पर आने से पहले लंबी भूमिका दी गई है, जो कुछ जगहों पर पढ़ने में थोड़ी बोझिल महसूस हो सकती है. कई बार पाठक को शीर्षक से जुड़े मूल मुद्दे तक पहुंचने में अपेक्षा से अधिक समय लगता है. फिर भी अकादमिक किताबों में संदर्भ और पृष्ठभूमि को विस्तार से रखना एक जरूरी हिस्सा माना जाता है, इसलिए इसे पूरी तरह कमजोरी भी नहीं कहा जा सकता.

*न्यूज अवॉइडेंस और बदलती मीडिया संस्कृति*

‘न्यू मीडिया की चुनौती : न्यूज अवॉइडेंस’ शीर्षक लेख पाठकों को सीधे संबोधित करता है और यही बात इसे दिलचस्प बनाती है. यह लेख किताब को पूरी तरह अकादमिक और बोझिल होने से बचाता है. लेख की शुरुआत ही इस पंक्ति से होती है, “आप यह किताब पढ़ रहे हैं, तब भी संभव है कि आपने आज का अखबार नहीं पढ़ा होगा.” यह शैली पाठक को सीधे चर्चा का हिस्सा बना देती है.

लेखों की प्रामाणिकता बनाए रखने के लिए कई जगह आंकड़ों और रिपोर्टों का भी सहारा लिया गया है. उदाहरण के तौर पर रॉयटर्स की डिजिटल न्यूज रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया है कि 2017 के सर्वे में 29 प्रतिशत लोग अक्सर या कभी-कभार चुनिंदा खबरों से परहेज करते थे, जबकि 2022 तक यह आंकड़ा बढ़कर 38 प्रतिशत हो गया. इस तरह के संदर्भ लेखों को केवल विचार आधारित नहीं रहने देते, बल्कि उन्हें तथ्यात्मक आधार भी प्रदान करते हैं.

साथ ही लेख में मीडिया की बदलती दुनिया और नए ट्रेंड को भी सामने रखा गया है. “पत्रकारों का यूट्यूबर बनना आम हो गया है. शिक्षक भी ऑनलाइन है, डॉक्टर भी ऑनलाइन...” जैसी पंक्तियां दिखाती हैं कि डिजिटल दौर ने केवल मीडिया ही नहीं, बल्कि पेशों और संवाद के तरीकों को भी बदल दिया है. यही वजह है कि यह लेख सिर्फ सूचना नहीं देता, बल्कि बदलती मीडिया संस्कृति पर सोचने के लिए भी मजबूर करता है.

*प्रिंट मीडिया के भविष्य पर सवाल*

किताब में ‘प्रिंट इज डेड!’ जैसा गंभीर विषय भी शामिल किया गया है. इस लेख में प्रिंट मीडिया के बदलते भविष्य और उसके सामने खड़ी चुनौतियों पर चर्चा की गई है. लेख में लिखा गया है, “प्रिंट के भविष्य पर बात करते समय दुनिया भर में हो रहे घटनाक्रमों पर भी नजर रखनी होगी. पिछले अस्सी वर्षों से प्रिंट मीडिया में एक दिग्गज की पहचान रखने वाले प्रमुख अमेरिकी समाचार पत्र वाशिंगटन पोस्ट की बिक्री से स्पष्ट है कि अब अखबारों के परंपरागत शैली में काम करने का जमाना तेजी से खत्म हो रहा है.”

यह लेख केवल प्रिंट मीडिया के संकट की बात नहीं करता, बल्कि यह भी दिखाता है कि डिजिटल दौर ने समाचारों के उपभोग और प्रस्तुति के तरीके को किस तेजी से बदल दिया है. यही वजह है कि किताब मीडिया के वर्तमान के साथ-साथ उसके भविष्य को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े करती है.

*करुणा और आक्रोश के बीच चक्रव्यूह टूटेगा*

किताब की एक कविता में लिखा है, 'कच्ची पगडंडी पर नापा था रास्ता'. इससे यह पता चलता है कि यह कविताएं उन अनुभवों से निकली हैं, जिन्हें कवि ने खुद जिया है. कवि ने गांव से शहर तक का रास्ता किसी पक्की सड़क से नहीं, बल्कि कच्ची पगडंडी पर चलकर तय किया था और वह अपने जैसे लाखों लोगों की कहानी इन कविताओं के जरिए लिखते हैं.

*चक्रव्यूह तोड़ती कविताओं की रचना*

समय साक्ष्य प्रकाशन से आई नई किताब 'चक्रव्यूह टूटेगा' ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविताओं का संकलन है और इसका संपादन डॉ. नरेन्द्र वाल्मीकि ने किया है. कथाक्रम सम्मान, डॉ. अम्बेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार सहित कई पुरस्कार प्राप्त ओमप्रकाश वाल्मीकि का नाम हिंदी साहित्य में दलित विमर्श के अग्रणी हस्ताक्षरों में प्रमुखता से लिया जाता है. देहरादून में रहने वाले शिक्षाविद प्रोफेसर राजेश पाल ने किताब की भूमिका लिखी है. उन्होंने किताब में शामिल लगभग हर कविता का विश्लेषण किया है और इससे किताब को पढ़ने की इच्छा और भी बढ़ जाती है. किताब के शीर्षक 'चक्रव्यूह टूटेगा' कविता पर वह लिखते हैं 'यहां कवि और उसकी भाषा उस परंपरा को छद्म घोषित करती है, जो सदियों से उत्पीड़न को धर्म, मर्यादा और...'

संपादकीय में डॉ. नरेन्द्र वाल्मीकि लिखते हैं कि यह किताब ओमप्रकाश वाल्मीकि की बाईस असंकलित कविताओं का संग्रह है. ये रचनाएं उनके अब तक प्रकाशित चार काव्य संग्रहों में संकलित नहीं हुई हैं. संपादक का यह लिखना महत्वपूर्ण है क्योंकि यही इस किताब के महत्व को बढ़ाता है.

*शब्दों की चोट और समाज का सच*

'शब्द बोध' कविता ओमप्रकाश वाल्मीकि की इस किताब में पहले नंबर पर आती है. इसमें करुणा के साथ आक्रोश भी दिखाई देता है. “पीठ पीछे दिए गए विशेषण” और “फुसफुसाहटों” को कवि ने बिंब की तरह इस्तेमाल किया है. “शब्द बेधी बाणों की तरह” वाला बिंब दिखाता है कि शब्द भी चोट पहुंचाते हैं. हंसों की शक्ल में गिद्धों का बिंब उन लोगों की ओर इशारा करता है जो बाहर से साफ दिखते हैं लेकिन भीतर से हिंसा और शोषण में शामिल हैं. “बारूद” का बिंब कविता को और तीखा बना देता है, यह दबा हुआ गुस्सा कभी भी विस्फोट में बदल सकता है.

*भूख का अनुभव और यथार्थ*

इसके बाद किताब में 'भूख' कविता भी आती है, जिसमें करुण रस प्रमुख है. कविता भूख को बताती नहीं, दिखाती है. “पेड़ की तरह हिलता है” और “हवा की तरह चलता है” जैसे बिंब आदमी की कमजोरी को सामने लाते हैं. “पेट की आग में झुलसकर राख की तरह ठंडा हो जाता है” कविता का सबसे मजबूत बिंब है, यह भूख को पूरी तरह तोड़ देने वाली स्थिति बना देता है.

*संवेदना का दिखावा और यथार्थ*

'मेरे किस काम के' कविता में कवि उन लोगों पर तंज कसते हैं, जिन्हें दूर की चीजों की चिंता तो है लेकिन अपने आसपास के इंसान के दर्द से उनका कोई संबंध नहीं बन पाता.

नर्म हाथों से पोंछते हैं आंसू अपने प्रकृति विनाश पर
वे आंसू : जो कभी नहीं बहे
किसी निर्दोष की हत्या पर

इन पंक्तियों में कवि समाज की दोहरी संवेदना को सामने लाते हैं. यहां करुणा का दिखावा है लेकिन असली करुणा गायब है. प्रकृति के नाम पर बहाए जा रहे आंसू और इंसान की हत्या पर न बहने वाले आंसू के बीच का यह विरोध कविता को अधिक पठनीय बना देता है.

कविता का असर इसी विरोध में है कि संवेदना भी चयनित हो गई है, जहां कुछ दुख दिखाई देते हैं और कुछ को नजरअंदाज कर दिया जाता है.

*करुणा और आक्रोश से बनी कविताएं*

'चक्रव्यूह टूटेगा' सिर्फ कविताओं का संग्रह न होकर जीवन के उस सत्य का बयान है जिसे अक्सर दबा दिया जाता है. इन कविताओं में करुणा है, आक्रोश है और ये पाठक को असहज करने के साथ सोचने पर मजबूर कर देता है.
हालांकि कुछ जगहों पर बिंबों की समानता दिखती है लेकिन यह बात इन कविताओं के प्रभाव को बहुत कम नहीं करती.
यह संग्रह हिंदी कविता में उन आवाजों को मजबूती से सामने लाता है, जिन्हें लंबे समय तक हाशिए पर रखा गया.

*स्मृति से आगे बढ़कर उत्तराखंड के मुद्दों को सामने लाती स्मारिका*

स्मारिका अपने समय और समाज दोनों को दर्ज करने की कोशिश करती है. इसमें सामग्री की विविधता और सरोकार साफ दिखाई देते हैं. हालांकि संपादन की छोटी गलतियां इसके प्रभाव को थोड़ा कम कर देती हैं.

33वां उमेश डोभाल स्मृति सम्मान समारोह इस बार अल्मोड़ा में हुआ. 1988 में शराब माफियाओं द्वारा पौड़ी में पत्रकार उमेश डोभाल की हत्या कर दी गई थी और उन्हीं की याद में पत्रकारिता सहित सामाजिक कार्यों से जुड़े अन्य क्षेत्रों में यह प्रतिष्ठित पुरस्कार साल 1991 से लगभग हर साल प्रदान किया जाता है. इस साल प्रिंट मीडिया के लिए यह राजू सजवाण को दिया गया. समारोह के दौरान शामिल लोगों को उमेश डोभाल स्मृति ट्रस्ट की तरफ से प्रकाशित स्मारिका भी दी जाती है.

*उत्तराखंड को समझने के लिए आकर्षित करता कवर पेज*

स्मारिका का कवर पेज उत्तराखंड को समझने वाले हर व्यक्ति को आकर्षित करता है. आवरण चित्र में उत्तराखंड के पहाड़ों की सुंदरता दिखाई देती है और साथ ही उमेश डोभाल पर लिखा वाक्य “उमेश डोभाल एक व्यक्ति नहीं एक धारा थी..” पाठकों को उमेश डोभाल के योगदान की याद दिलाने में सफल रहा है. पिछले आवरण के पोस्टर को आशीष नेगी ने तैयार किया है, जिस पर पुस्तकालय के महत्व को सामने रखती एक कविता लिखी है और यह पत्रकारिता से जुड़ी किताब के लिए परफेक्ट आवरण बन जाता है.

*पुरस्कार की सार्थकता को सिद्ध करते लेख*

किताब में लिखे लेख उत्तराखंड की सामाजिक और बौद्धिक परंपरा को समृद्ध करने वाले कुछ लोगों के जीवन के संस्मरण हैं.

शुरुआत में उमेश डोभाल और ट्रस्ट के बारे में जानकारी देते हुए किताब पाठकों को पूर्व और वर्तमान पुरस्कार विजेताओं के बारे में जानकारी देती है. यह किसी स्मारिका को स्मारिका सा अहसास देने का महत्वपूर्ण हिस्सा है. राजेंद्र रावत राजू जनसरोकार सम्मान वर्ष 2026 किशन सिंह मलड़ा को दिया गया और उनके बारे में किताब में लिखा है कि बंजर भूमि में पौधरोपण करते हुए अब तक 'दस लाख पचहत्तर हजार' से अधिक पौधों का उत्पादन, प्रत्यारोपण और निशुल्क वितरण कार्य संपन्न किया जा चुका है. ऐसा परिचय पुरस्कार की सार्थकता को सिद्ध करने में सफल रहा है.

किताब के अंत में ट्रस्ट द्वारा आय विवरण भी दिया गया है, जो ट्रस्ट की तरफ से खर्चे को लेकर अपनाई गई पारदर्शिता को दिखाता है.

क्रम सूची में मात्राओं की गलती से अर्थ का अनर्थ हुआ है, जैसे कॉरपोरेट घरानों के कब्जे में 'मीडिया' की जगह 'कीडिया' लिखा है. इसे सुधारा जाना चाहिए था क्योंकि स्मारिका में अगले संस्करण तक सुधार के लिए लंबा समय लग जाता है.

*स्मारिका में दर्ज याद और विचार*

कई आलेखों के मिश्रण से तैयार इस स्मारिका का पहला आलेख रमेश पहाड़ी का लिखा है, 'उमेश जिनकी मौत से एकजुट हुआ था समाज', पत्रकार उमेश डोभाल की हत्या से लेकर समारोह की शुरुआत तक का पूरा घटनाक्रम इस आलेख में विस्तार से लिखा गया है.

रविन्द्र सिंह के लिखे अगले आलेख में एक पत्रकार कैसे समाज के लिए उदाहरण बन सकता है, इसे सहज भाषा में रखा गया है. 'अपने जीवन काल में उमेश डोभाल भले ही अकेले रहे थे, पर आज उनकी सोच को सैंकड़ों उमेश आगे बढ़ा रहे हैं'.

'गिर्दा और संघर्षों के वे दिन' आलेख में लेखक पी. सी. तिवारी ने उत्तराखंड के आंदोलनों की कुछ कहानियों को नई पीढ़ी के सामने रखा है. कैसे एक व्यक्ति ने वनों की नीलामी को रोक दिया था, यह किस्सा पढ़ने में बेहद रोचक है. 'लोगों पर नैनीताल की ठंड में पानी की बौछारें पड़ रही थीं, लाठी-डंडे चल रहे थे और गिर्दा गा रहे थे हमर हड़िकनै कि कुर्सी छू तुमरी'.

किताब में उत्तराखंड के जनकवि गिर्दा पर भी खूब जानकारी मिलती है, उनके निजी और सार्वजनिक जीवन पर बेहतरीन ढंग से लिखा गया है. 'यह कोठरी सब आंदोलनकारियों, रंगकर्मियों...'
'गिर्दा अब घर पर खुलेआम बीड़ी भी नहीं पी पाता था'.

*उत्तराखंड के मुद्दों को सामने लाते आलेख*

किताब के आलेखों से हमें उत्तराखंड की समस्याओं को समझने का मौका भी मिलता है, जैसे पृष्ठ संख्या 37 में लिखा है 'काश, पौड़ी अस्पताल में ऐसी गंभीर अवस्था का सामना करने के आवश्यक इंतजामात होते'.

उत्तराखंड के पच्चीस वर्षों पर लिखे आलेख भी किताब में शामिल हैं. जिनमें जय सिंह रावत के लिखे आलेख में पहाड़ की आर्थिक स्थिति पर गंभीरता से सोचने पर मजबूर करते हुए आंकड़े दिए गए हैं, 'पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि का योगदान राज्य की जीडीपी में लगातार गिरकर 2 प्रतिशत के आसपास सिमट जाना...'.

चारु तिवारी के लिखे आलेख में राज्य की बदहाल शिक्षा व्यवस्था को पाठकों के सामने रखा गया है. चारु लिखते हैं, 'इन पच्चीस सालों में 22 पॉलीटेक्निक और 45 आईटीआई सरकारें बंद कर चुकी हैं या वे जर्जर हालत में हैं'.

*समस्याओं पर सीधी बात*

'मनोहर चमोली के नरभक्षी जीव को हमेशा के लिए हटाना जरूरी' आलेख में पहाड़ों में गुलदार के मानव पर हमले की महत्वपूर्ण समस्या पर विस्तार से लिखा गया है और गुलदार के शिकार के कारणों को समझने के लिए यह आलेख बेहद महत्वपूर्ण है. जैसे उन्होंने लिखा है, '80 फीसदी का भूभाग छोड़कर कोई गुलदार 20 फीसदी में आए और निरपराध को अपना भोजन बना ले तो यह किस सूरत में स्वीकार्य होगा?'.








केतन लाल की मौत और उत्तराखंड का आईना: क्या बदल रहा है पहाड़ का समाज?

*केतन लाल की मौत और उत्तराखंड का आईना: क्या बदल रहा है पहाड़ का समाज?*

टिहरी में 18 वर्षीय केतन लाल की हत्या ने पूरे उत्तराखंड को झकझोर दिया है। पुलिस जांच के अनुसार केतन की दोस्ती एक नाबालिग लड़की से थी, जिसका परिवार इस रिश्ते का विरोध कर रहा था। आरोप है कि 7 जून की रात उसे बुलाकर बेरहमी से पीटा गया, जिससे उसकी मौत हो गई।

मामले की जांच जारी है, लेकिन इस घटना ने जातिगत भेदभाव, अंतरजातीय रिश्तों के प्रति समाज के रवैये, ऑनर किलिंग और मौजूदा कानूनी व्यवस्था को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

*उत्तराखंड में बदलते सामाजिक माहौल का संकेत है यह घटना*

उत्तराखंड को अक्सर अपेक्षाकृत शांत, सहिष्णु और प्रगतिशील समाज के रूप में देखा जाता है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अंतरजातीय रिश्तों को लेकर इतनी हिंसक प्रतिक्रिया क्यों देखने को मिल रही है और क्या यह किसी गहरे सामाजिक बदलाव का संकेत है?

देहरादून के सामाजिक कार्यकर्ता इंद्रेश मैखुरी कहते हैं कि केतन लाल हत्याकांड केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि समाज में मौजूद जातिगत पूर्वाग्रहों की एक गंभीर अभिव्यक्ति है। उनके मुताबिक सामान्य परिस्थितियों में उत्तराखंड में अक्सर यह दावा किया जाता है कि यहां जातिगत भेदभाव अपेक्षाकृत कम है, लेकिन अंतरजातीय प्रेम, मित्रता या विवाह जैसे मामलों में समाज का एक कठोर चेहरा सामने आ जाता है।

मैखुरी का मानना है कि जातिगत श्रेष्ठता का भाव लोगों को इस हद तक हिंसक बना सकता है कि वे प्रेम और मित्रता को भी अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा पर हमला समझने लगते हैं। उनके अनुसार केतन की हत्या इसी मानसिकता की एक भयावह मिसाल है, जहां एक दलित युवक और सवर्ण परिवार की लड़की के बीच मित्रता को स्वीकार करने के बजाय हिंसा का रास्ता चुना गया। वे इस घटना को वर्ष 2022 में अल्मोड़ा में दलित राजनीतिक कार्यकर्ता जगदीश चंद्र की हत्या जैसी घटनाओं की कड़ी में देखते हैं और कहते हैं कि सामाजिक बदलाव के दावों के बावजूद जाति का प्रश्न अब भी समाज के भीतर मौजूद है।

वहीं उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार बद्रीदत्त कसनियाल इस घटना को राज्य के सामाजिक चरित्र और सामूहिक संवेदनशीलता से जोड़कर देखते हैं। उनका कहना है कि सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी बर्बर घटना के बावजूद पूरा उत्तराखंड एकजुट होकर क्यों खड़ा नहीं दिखाई देता। वे मानते हैं कि उत्तराखंड लंबे समय से अपेक्षाकृत सहिष्णु और सामाजिक रूप से संवेदनशील समाज के रूप में पहचाना जाता रहा है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि आखिर समाज के भीतर ऐसी क्रूरता और असहिष्णुता क्यों बढ़ रही है और वे कौन से कारक हैं जो लोगों को इतनी जघन्य हिंसा के प्रति भी उदासीन बना रहे हैं।

कसनियाल कहते हैं कि इस घटना को केवल एक अपराध के रूप में नहीं, बल्कि उत्तराखंड के बदलते सामाजिक चरित्र के संदर्भ में भी देखने की जरूरत है। उनका मानना है कि राज्य की पहचान लंबे समय तक सह-अस्तित्व, सामाजिक संतुलन और सहिष्णुता से जुड़ी रही है, लेकिन अब उस छवि पर दबाव दिखाई दे रहा है। उनके अनुसार उत्तराखंडी समाज को अपनी पारंपरिक सहिष्णुता और सामाजिक सौहार्द को फिर से अपनी पहचान का हिस्सा बनाना होगा।

इसी सवाल पर हिंदी फिल्मों के लेखक हल्द्वानी निवासी दीपक तिरुआ इस घटना को भारतीय समाज में चल रहे एक बड़े वैचारिक संघर्ष के संदर्भ में देखते हैं। उनका कहना है कि पिछले 76 वर्षों में भारतीय संविधान ने समानता, स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के मूल्यों के आधार पर समाज को आगे बढ़ाने का प्रयास किया है, लेकिन प्रतिगामी और जातिवादी सोच लगातार उस प्रक्रिया को पीछे धकेलने का काम कर रही है।

तिरुआ मानते हैं कि केतन लाल हत्याकांड जैसी घटनाएं केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं हैं, बल्कि वे इस बात का संकेत भी हैं कि समाज के भीतर अब भी ऐसी मानसिकताएं मौजूद हैं जो संवैधानिक मूल्यों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। उनके अनुसार अंतरजातीय रिश्तों या सामाजिक बराबरी को हिंसा के जरिए दबाने की कोशिशें लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था की भावना के खिलाफ हैं।

वे कहते हैं कि ऐसी प्रवृत्तियों पर काबू पाना समाज और राज्य दोनों की प्राथमिकता होनी चाहिए। उनके मुताबिक भारत ने लंबे संघर्ष के बाद समानता और सामाजिक न्याय की दिशा में जो प्रगति हासिल की है, उसे जातिगत घृणा और हिंसा के जरिए कमजोर नहीं होने दिया जा सकता। तिरुआ के अनुसार समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह संविधान के मूल्यों और बर्बर सामाजिक प्रवृत्तियों के बीच किस पक्ष को चुनता है।

*क्या मौजूदा कानून पर्याप्त हैं?*

केतन लाल हत्याकांड ने कानून और न्याय व्यवस्था से जुड़े कई गंभीर सवाल भी खड़े किए हैं। यदि जांच में यह साबित होता है कि हत्या अंतरजातीय रिश्ते के विरोध और जातिगत पहचान की वजह से हुई, तो क्या मौजूदा कानून ऐसे अपराधों को रोकने और पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के लिए पर्याप्त हैं या फिर किसी नए कानूनी ढांचे की जरूरत है?

इस सवाल पर उत्तराखंड हाईकोर्ट के अधिवक्ता देहरादून निवासी अभिजय नेगी कहते हैं कि टिहरी में जो हुआ वह केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि समाज और कानून दोनों के लिए गंभीर चेतावनी है। उनके अनुसार एक युवा दलित लड़के की हत्या, केवल इसलिए कि उसकी दोस्ती एक उच्च जाति के परिवार की लड़की से थी, ऑनर किलिंग और जातिगत अत्याचार के व्यापक प्रश्नों को सामने लाती है।

नेगी बताते हैं कि वर्तमान मामले में भारतीय न्याय संहिता और एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत कार्रवाई के पर्याप्त कानूनी आधार मौजूद हैं। हत्या के लिए भारतीय न्याय संहिता की प्रासंगिक धाराएं लागू होती हैं, जबकि यह एक सामूहिक कृत्य होने के कारण साझा आपराधिक मंशा से जुड़े प्रावधान भी लागू किए जा सकते हैं। इसके अलावा यदि यह साबित होता है कि अपराध पीड़ित की जातिगत पहचान के कारण किया गया, तो एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धाराएं भी लागू होंगी।

नेगी कहते हैं कि पुलिस ने एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(2)(v) भी लगाई है, जो किसी गैर-अनुसूचित जाति/जनजाति व्यक्ति द्वारा अनुसूचित जाति या जनजाति के सदस्य के खिलाफ उसकी जातिगत पहचान के आधार पर गंभीर अपराध किए जाने पर लागू होती है।

उनका कहना है कि अधिनियम की धारा 15A पीड़ित परिवार, गवाहों और अन्य प्रभावित व्यक्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी राज्य पर डालती है। साथ ही भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता, अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता के उन्मूलन की गारंटी देता है। ऐसे में जाति के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ हिंसा केवल आपराधिक कृत्य नहीं बल्कि संवैधानिक मूल्यों पर भी सीधा आघात है।

हालांकि नेगी मानते हैं कि यह मामला एक महत्वपूर्ण कानूनी कमी की ओर भी ध्यान दिलाता है। भारत में ऑनर किलिंग को अलग और विशिष्ट अपराध के रूप में परिभाषित करने वाला कोई विशेष कानून नहीं है। उनके अनुसार भारतीय विधि आयोग ने अपनी 242वीं रिपोर्ट में सम्मान और परंपरा के नाम पर होने वाले अपराधों को रोकने के लिए विशेष कानून का सुझाव दिया था, लेकिन अब तक ऐसा कानून नहीं बन पाया है।

नेगी का कहना है कि बदलते सामाजिक हालात को देखते हुए ऑनर किलिंग के खिलाफ विशेष कानून और अंतरजातीय संबंधों से जुड़ी हिंसा को लेकर कानूनी प्रावधानों को और मजबूत करने पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। उनके अनुसार केतन लाल का मामला केवल एक मुकदमा नहीं, बल्कि विधायिका और नीति निर्माताओं के लिए भी एक चेतावनी है कि ऐसे अपराधों की रोकथाम और पीड़ितों की सुरक्षा के लिए कानूनों को समय के अनुरूप और अधिक प्रभावी बनाया जाए।

Wednesday, June 10, 2026

केतन लाल हत्याकांड: क्या उत्तराखंड के सामने खड़े होते समाज और कानून से जुड़े बड़े सवाल?

*केतन लाल हत्याकांड: क्या उत्तराखंड के सामने खड़े हो रहे हैं समाज और कानून से जुड़े बड़े सवाल?*

टिहरी के प्रतापनगर में 18 वर्षीय केतन लाल की हत्या ने पूरे उत्तराखंड को झकझोर दिया है. पुलिस जांच अभी जारी है, लेकिन इस घटना ने कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या यह केवल एक आपराधिक मामला है या समाज में मौजूद जातिगत पूर्वाग्रहों, बढ़ती असहिष्णुता और बदलते सामाजिक माहौल का संकेत भी है?
 एक सवाल ये भी है कि अगर ये मामला ऑनर किलिंग और जातिगत हिंसा से जुड़ा साबित होता है, तो क्या मौजूदा कानून पर्याप्त हैं?

पुलिस के अनुसार, देवल गांव का रहने वाला केतन लाल दलित समुदाय से था. जांच में सामने आया है कि पिछले करीब छह महीनों से उसकी दोस्ती पड़ोसी गांव खोलगढ़ की एक नाबालिग लड़की से थी. बताया जा रहा है कि लड़की का परिवार इस रिश्ते का विरोध कर रहा था और पहले भी केतन के परिवार को इस संबंध को लेकर चेतावनी दी गई थी.

आरोप है कि 7 जून की रात करीब 11 बजे केतन को लड़की के फोन से कॉल किया गया. इसके बाद वह अपने दोस्त दिवाकर डिमरी के साथ खोलगढ़ गांव पहुंचा. परिजनों का आरोप है कि वहां पहुंचते ही दोनों युवकों को एक कमरे में बंद कर दिया गया और रातभर उनकी बेरहमी से पिटाई की गई.

केतन के पिता धनपाल लाल का कहना है कि उनके बेटे को लाठियों, डंडों और लोहे की रॉड से पीटा गया. उन्होंने आरोप लगाया है कि हमलावरों ने अमानवीय यातनाएं भी दीं. परिवार का दावा है कि केतन के पैरों में कीलें ठोंकी गईं और उसके नाखून उखाड़ने की कोशिश की गई.


*उत्तराखंड में बदलते सामाजिक माहौल का संकेत यह घटना*

उत्तराखंड को अक्सर अपेक्षाकृत शांत, सहिष्णु और प्रगतिशील समाज के रूप में देखा जाता है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अंतरजातीय रिश्तों को लेकर इतनी हिंसक प्रतिक्रिया क्यों देखने को मिल रही है और क्या यह किसी गहरे सामाजिक बदलाव का संकेत है?

देहरादून के सामाजिक कार्यकर्ता इंद्रेश मैखुरी के अनुसार केतन लाल हत्याकांड केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि समाज में मौजूद जातिगत पूर्वाग्रहों की एक गंभीर अभिव्यक्ति है. उनके मुताबिक सामान्य परिस्थितियों में उत्तराखंड में अक्सर यह दावा किया जाता है कि यहां जातिगत भेदभाव अपेक्षाकृत कम है, लेकिन अंतरजातीय प्रेम, मित्रता या विवाह जैसे मामलों में समाज का एक कठोर चेहरा सामने आ जाता है.

मैखुरी का मानना है कि जातिगत श्रेष्ठता का भाव लोगों को इस हद तक हिंसक बना सकता है कि वे प्रेम और मित्रता को भी अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा पर हमला समझने लगते हैं. उनके अनुसार केतन की हत्या इसी मानसिकता की एक भयावह मिसाल है, जहां एक दलित युवक और सवर्ण परिवार की लड़की के बीच मित्रता को स्वीकार करने के बजाय हिंसा का रास्ता चुना गया. वे इस घटना को वर्ष 2022 में अल्मोड़ा में दलित राजनीतिक कार्यकर्ता जगदीश चंद्र की हत्या जैसी घटनाओं की कड़ी में देखते हैं और मानते हैं कि सामाजिक बदलाव के दावों के बावजूद जाति का प्रश्न अब भी समाज के भीतर मौजूद है.

वहीं उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार बद्रीदत्त कसनियाल इस घटना को राज्य के सामाजिक चरित्र और सामूहिक संवेदनशीलता से जोड़कर देखते हैं. उनके अनुसार सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी बर्बर घटना के बावजूद पूरा उत्तराखंड एकजुट होकर क्यों खड़ा नहीं दिखाई देता. उनका मानना है कि उत्तराखंड लंबे समय से अपेक्षाकृत सहिष्णु और सामाजिक रूप से संवेदनशील समाज के रूप में पहचाना जाता रहा है. ऐसे में यह समझना जरूरी है कि आखिर समाज के भीतर ऐसी क्रूरता और असहिष्णुता क्यों बढ़ रही है और वे कौन से कारक हैं जो लोगों को इतनी जघन्य हिंसा के प्रति भी उदासीन बना रहे हैं.

कसनियाल के मुताबिक इस घटना को केवल एक अपराध के रूप में नहीं, बल्कि उत्तराखंड के बदलते सामाजिक चरित्र के संदर्भ में भी देखने की जरूरत है. उनका मानना है कि राज्य की पहचान लंबे समय तक सह-अस्तित्व, सामाजिक संतुलन और सहिष्णुता से जुड़ी रही है, लेकिन अब उस छवि पर दबाव दिखाई दे रहा है. उनके अनुसार उत्तराखंडी समाज को अपनी पारंपरिक सहिष्णुता और सामाजिक सौहार्द को फिर से अपनी पहचान का हिस्सा बनाना होगा.

इसी सवाल पर हिंदी लेखक दीपक तिरुआ इस घटना को भारतीय समाज में चल रहे एक बड़े वैचारिक संघर्ष के संदर्भ में देखते हैं. उनके अनुसार पिछले 76 वर्षों में भारतीय संविधान ने समानता, स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के मूल्यों के आधार पर समाज को आगे बढ़ाने का प्रयास किया है, लेकिन प्रतिगामी और जातिवादी सोच लगातार उस प्रक्रिया को पीछे धकेलने का काम कर रही है.

तिरुआ का मानना है कि केतन लाल हत्याकांड जैसी घटनाएं केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं हैं, बल्कि वे इस बात का संकेत भी हैं कि समाज के भीतर अब भी ऐसी मानसिकताएं मौजूद हैं जो संवैधानिक मूल्यों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं. उनके अनुसार अंतरजातीय रिश्तों या सामाजिक बराबरी को हिंसा के जरिए दबाने की कोशिशें लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था की भावना के खिलाफ हैं.

वे मानते हैं कि ऐसी प्रवृत्तियों पर काबू पाना समाज और राज्य दोनों की प्राथमिकता होनी चाहिए. उनके मुताबिक भारत ने लंबे संघर्ष के बाद समानता और सामाजिक न्याय की दिशा में जो प्रगति हासिल की है, उसे जातिगत घृणा और हिंसा के जरिए कमजोर नहीं होने दिया जा सकता. तिरुआ के अनुसार समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह संविधान के मूल्यों और बर्बर सामाजिक प्रवृत्तियों के बीच किस पक्ष को चुनता है.

*क्या मौजूदा कानून पर्याप्त हैं?*

केतन लाल हत्याकांड ने कानून और न्याय व्यवस्था से जुड़े कई गंभीर सवाल भी खड़े किए हैं. यदि जांच में यह साबित होता है कि हत्या अंतरजातीय रिश्ते के विरोध और जातिगत पहचान की वजह से हुई, तो क्या मौजूदा कानून ऐसे अपराधों को रोकने और पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के लिए पर्याप्त हैं या फिर किसी नए कानूनी ढांचे की जरूरत है?

इस सवाल पर उत्तराखंड हाईकोर्ट के अधिवक्ता अभिजय नेगी का मानना है कि टिहरी में जो हुआ वह केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि समाज और कानून दोनों के लिए गंभीर चेतावनी है. उनके अनुसार एक युवा दलित लड़के की हत्या, केवल इसलिए कि उसकी दोस्ती एक उच्च जाति के परिवार की लड़की से थी, ऑनर किलिंग और जातिगत अत्याचार के व्यापक प्रश्नों को सामने लाती है.

नेगी के मुताबिक वर्तमान मामले में भारतीय न्याय संहिता और एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत कार्रवाई के पर्याप्त कानूनी आधार मौजूद हैं. हत्या के लिए भारतीय न्याय संहिता की प्रासंगिक धाराएं लागू होती हैं, जबकि यह एक सामूहिक कृत्य होने के कारण साझा आपराधिक मंशा से जुड़े प्रावधान भी लागू किए जा सकते हैं. इसके अलावा यदि यह साबित होता है कि अपराध पीड़ित की जातिगत पहचान के कारण किया गया, तो एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धाराएं भी लागू होंगी.

नेगी के अनुसार पुलिस ने एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(2)(v) भी लगाई है, जो किसी गैर-अनुसूचित जाति/जनजाति व्यक्ति द्वारा अनुसूचित जाति या जनजाति के सदस्य के खिलाफ उसकी जातिगत पहचान के आधार पर गंभीर अपराध किए जाने पर लागू होती है.

उनके अनुसार अधिनियम की धारा 15A पीड़ित परिवार, गवाहों और अन्य प्रभावित व्यक्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी राज्य पर डालती है. साथ ही भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता, अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता के उन्मूलन की गारंटी देता है. ऐसे में जाति के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ हिंसा केवल आपराधिक कृत्य नहीं बल्कि संवैधानिक मूल्यों पर भी सीधा आघात है.

हालांकि नेगी का मानना है कि यह मामला एक महत्वपूर्ण कानूनी कमी की ओर भी ध्यान दिलाता है. भारत में ऑनर किलिंग को अलग और विशिष्ट अपराध के रूप में परिभाषित करने वाला कोई विशेष कानून नहीं है. उनके अनुसार भारतीय विधि आयोग ने अपनी 242वीं रिपोर्ट में सम्मान और परंपरा के नाम पर होने वाले अपराधों को रोकने के लिए विशेष कानून का सुझाव दिया था, लेकिन अब तक ऐसा कानून नहीं बन पाया है.

नेगी के मुताबिक बदलते सामाजिक हालात को देखते हुए ऑनर किलिंग के खिलाफ विशेष कानून और अंतरजातीय संबंधों से जुड़ी हिंसा को लेकर कानूनी प्रावधानों को और मजबूत करने पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए. उनके अनुसार केतन लाल का मामला केवल एक मुकदमा नहीं, बल्कि विधायिका और नीति निर्माताओं के लिए भी एक चेतावनी है कि ऐसे अपराधों की रोकथाम और पीड़ितों की सुरक्षा के लिए कानूनों को समय के अनुरूप और अधिक प्रभावी बनाया जाए.
केतन लाल हत्याकांड: क्या उत्तराखंड के सामने खड़े हो रहे हैं समाज और कानून से जुड़े बड़े सवाल?

टिहरी के प्रतापनगर में 18 वर्षीय केतन लाल की हत्या ने पूरे उत्तराखंड को झकझोर दिया है. पुलिस जांच अभी जारी है, लेकिन इस घटना ने कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या यह केवल एक आपराधिक मामला है या समाज में मौजूद जातिगत पूर्वाग्रहों, बढ़ती असहिष्णुता और बदलते सामाजिक माहौल का संकेत भी है? क्या उत्तराखंड का सामाजिक चरित्र बदल रहा है? और यदि यह मामला ऑनर किलिंग और जातिगत हिंसा से जुड़ा साबित होता है, तो क्या मौजूदा कानून पर्याप्त हैं?

पुलिस के अनुसार, देवल गांव का रहने वाला केतन लाल दलित समुदाय से था. जांच में सामने आया है कि पिछले करीब छह महीनों से उसकी दोस्ती पड़ोसी गांव खोलगढ़ की एक नाबालिग लड़की से थी. बताया जा रहा है कि लड़की का परिवार इस रिश्ते का विरोध कर रहा था और पहले भी केतन के परिवार को इस संबंध को लेकर चेतावनी दी गई थी.

आरोप है कि 7 जून की रात करीब 11 बजे केतन को लड़की के फोन से कॉल किया गया. इसके बाद वह अपने दोस्त दिवाकर डिमरी के साथ खोलगढ़ गांव पहुंचा. परिजनों का आरोप है कि वहां पहुंचते ही दोनों युवकों को एक कमरे में बंद कर दिया गया और रातभर उनकी बेरहमी से पिटाई की गई.

केतन के पिता धनपाल लाल का कहना है कि उनके बेटे को लाठियों, डंडों और लोहे की रॉड से पीटा गया. उन्होंने आरोप लगाया है कि हमलावरों ने अमानवीय यातनाएं भी दीं. परिवार का दावा है कि केतन के पैरों में कीलें ठोंकी गईं और उसके नाखून उखाड़ने की कोशिश की गई.

परिजनों के मुताबिक, अगली सुबह उन्हें फोन कर बताया गया कि दोनों लड़कों के हाथ-पैर तोड़ दिए गए हैं और उन्हें नाले के पास फेंक दिया गया है. जब परिवार मौके पर पहुंचा तो केतन गंभीर रूप से घायल अवस्था में मिला. उसे अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई. उसका दोस्त दिवाकर डिमरी गंभीर रूप से घायल है और अस्पताल में उपचाराधीन है.

मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है. पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की हत्या से संबंधित धाराओं के साथ-साथ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत भी मुकदमा दर्ज किया है.

क्या यह उत्तराखंड में बदलते सामाजिक माहौल का संकेत है?

यह घटना ऐसे समय में सामने आई है जब उत्तराखंड को अक्सर अपेक्षाकृत शांत, सहिष्णु और प्रगतिशील समाज के रूप में देखा जाता है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अंतरजातीय रिश्तों को लेकर इतनी हिंसक प्रतिक्रिया क्यों देखने को मिल रही है और क्या यह किसी गहरे सामाजिक बदलाव का संकेत है?

देहरादून के सामाजिक कार्यकर्ता इंद्रेश मैखुरी के अनुसार केतन लाल हत्याकांड केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि समाज में मौजूद जातिगत पूर्वाग्रहों की एक गंभीर अभिव्यक्ति है. उनके मुताबिक सामान्य परिस्थितियों में उत्तराखंड में अक्सर यह दावा किया जाता है कि यहां जातिगत भेदभाव अपेक्षाकृत कम है, लेकिन अंतरजातीय प्रेम, मित्रता या विवाह जैसे मामलों में समाज का एक कठोर चेहरा सामने आ जाता है.

मैखुरी का मानना है कि जातिगत श्रेष्ठता का भाव लोगों को इस हद तक हिंसक बना सकता है कि वे प्रेम और मित्रता को भी अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा पर हमला समझने लगते हैं. उनके अनुसार केतन की हत्या इसी मानसिकता की एक भयावह मिसाल है, जहां एक दलित युवक और सवर्ण परिवार की लड़की के बीच मित्रता को स्वीकार करने के बजाय हिंसा का रास्ता चुना गया. वे इस घटना को वर्ष 2022 में अल्मोड़ा में दलित राजनीतिक कार्यकर्ता जगदीश चंद्र की हत्या जैसी घटनाओं की कड़ी में देखते हैं और मानते हैं कि सामाजिक बदलाव के दावों के बावजूद जाति का प्रश्न अब भी समाज के भीतर मौजूद है.

वहीं उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार बद्रीदत्त कसनियाल इस घटना को राज्य के सामाजिक चरित्र और सामूहिक संवेदनशीलता से जोड़कर देखते हैं. उनके अनुसार सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी बर्बर घटना के बावजूद पूरा उत्तराखंड एकजुट होकर क्यों खड़ा नहीं दिखाई देता. उनका मानना है कि उत्तराखंड लंबे समय से अपेक्षाकृत सहिष्णु और सामाजिक रूप से संवेदनशील समाज के रूप में पहचाना जाता रहा है. ऐसे में यह समझना जरूरी है कि आखिर समाज के भीतर ऐसी क्रूरता और असहिष्णुता क्यों बढ़ रही है और वे कौन से कारक हैं जो लोगों को इतनी जघन्य हिंसा के प्रति भी उदासीन बना रहे हैं.

कसनियाल के मुताबिक इस घटना को केवल एक अपराध के रूप में नहीं, बल्कि उत्तराखंड के बदलते सामाजिक चरित्र के संदर्भ में भी देखने की जरूरत है. उनका मानना है कि राज्य की पहचान लंबे समय तक सह-अस्तित्व, सामाजिक संतुलन और सहिष्णुता से जुड़ी रही है, लेकिन अब उस छवि पर दबाव दिखाई दे रहा है. उनके अनुसार उत्तराखंडी समाज को अपनी पारंपरिक सहिष्णुता और सामाजिक सौहार्द को फिर से अपनी पहचान का हिस्सा बनाना होगा.

इसी सवाल पर हिंदी लेखक दीपक तिरुआ इस घटना को भारतीय समाज में चल रहे एक बड़े वैचारिक संघर्ष के संदर्भ में देखते हैं. उनके अनुसार पिछले 76 वर्षों में भारतीय संविधान ने समानता, स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के मूल्यों के आधार पर समाज को आगे बढ़ाने का प्रयास किया है, लेकिन प्रतिगामी और जातिवादी सोच लगातार उस प्रक्रिया को पीछे धकेलने का काम कर रही है.

तिरुआ का मानना है कि केतन लाल हत्याकांड जैसी घटनाएं केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं हैं, बल्कि वे इस बात का संकेत भी हैं कि समाज के भीतर अब भी ऐसी मानसिकताएं मौजूद हैं जो संवैधानिक मूल्यों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं. उनके अनुसार अंतरजातीय रिश्तों या सामाजिक बराबरी को हिंसा के जरिए दबाने की कोशिशें लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था की भावना के खिलाफ हैं.

वे मानते हैं कि ऐसी प्रवृत्तियों पर काबू पाना समाज और राज्य दोनों की प्राथमिकता होनी चाहिए. उनके मुताबिक भारत ने लंबे संघर्ष के बाद समानता और सामाजिक न्याय की दिशा में जो प्रगति हासिल की है, उसे जातिगत घृणा और हिंसा के जरिए कमजोर नहीं होने दिया जा सकता. तिरुआ के अनुसार समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह संविधान के मूल्यों और बर्बर सामाजिक प्रवृत्तियों के बीच किस पक्ष को चुनता है.

क्या मौजूदा कानून पर्याप्त हैं?

केतन लाल हत्याकांड ने कानून और न्याय व्यवस्था से जुड़े कई गंभीर सवाल भी खड़े किए हैं. यदि जांच में यह साबित होता है कि हत्या अंतरजातीय रिश्ते के विरोध और जातिगत पहचान की वजह से हुई, तो क्या मौजूदा कानून ऐसे अपराधों को रोकने और पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के लिए पर्याप्त हैं या फिर किसी नए कानूनी ढांचे की जरूरत है?

इस सवाल पर उत्तराखंड हाईकोर्ट के अधिवक्ता अभिजय नेगी का मानना है कि टिहरी में जो हुआ वह केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि समाज और कानून दोनों के लिए गंभीर चेतावनी है. उनके अनुसार एक युवा दलित लड़के की हत्या, केवल इसलिए कि उसकी दोस्ती एक उच्च जाति के परिवार की लड़की से थी, ऑनर किलिंग और जातिगत अत्याचार के व्यापक प्रश्नों को सामने लाती है.

नेगी के मुताबिक वर्तमान मामले में भारतीय न्याय संहिता और एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत कार्रवाई के पर्याप्त कानूनी आधार मौजूद हैं. हत्या के लिए भारतीय न्याय संहिता की प्रासंगिक धाराएं लागू होती हैं, जबकि यह एक सामूहिक कृत्य होने के कारण साझा आपराधिक मंशा से जुड़े प्रावधान भी लागू किए जा सकते हैं. इसके अलावा यदि यह साबित होता है कि अपराध पीड़ित की जातिगत पहचान के कारण किया गया, तो एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धाराएं भी लागू होंगी.

उनके अनुसार अधिनियम की धारा 15A पीड़ित परिवार, गवाहों और अन्य प्रभावित व्यक्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी राज्य पर डालती है. साथ ही भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता, अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता के उन्मूलन की गारंटी देता है. ऐसे में जाति के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ हिंसा केवल आपराधिक कृत्य नहीं बल्कि संवैधानिक मूल्यों पर भी सीधा आघात है.

हालांकि नेगी का मानना है कि यह मामला एक महत्वपूर्ण कानूनी कमी की ओर भी ध्यान दिलाता है. भारत में ऑनर किलिंग को अलग और विशिष्ट अपराध के रूप में परिभाषित करने वाला कोई विशेष कानून नहीं है. उनके अनुसार भारतीय विधि आयोग ने अपनी 242वीं रिपोर्ट में सम्मान और परंपरा के नाम पर होने वाले अपराधों को रोकने के लिए विशेष कानून का सुझाव दिया था, लेकिन अब तक ऐसा कानून नहीं बन पाया है.

नेगी के मुताबिक बदलते सामाजिक हालात को देखते हुए ऑनर किलिंग के खिलाफ विशेष कानून और अंतरजातीय संबंधों से जुड़ी हिंसा को लेकर कानूनी प्रावधानों को और मजबूत करने पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए. उनके अनुसार केतन लाल का मामला केवल एक मुकदमा नहीं, बल्कि विधायिका और नीति निर्माताओं के लिए भी एक चेतावनी है कि ऐसे अपराधों की रोकथाम और पीड़ितों की सुरक्षा के लिए कानूनों को समय के अनुरूप और अधिक प्रभावी बनाया जाए.

फिलहाल इस मामले में निष्पक्ष जांच, सभी संभावित आरोपियों की भूमिका की पड़ताल, पीड़ित परिवार और गवाहों की सुरक्षा तथा त्वरित न्याय सुनिश्चित करना सबसे बड़ी प्राथमिकता माना जा रहा है. वहीं केतन लाल की मौत ने उत्तराखंड के सामने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या राज्य अपनी सहिष्णु और समावेशी सामाजिक पहचान को बनाए रख पाएगा या ऐसी घटनाएं किसी गहरे सामाजिक बदलाव की ओर इशारा कर रही हैं.

Sunday, June 7, 2026

बारूद के साये में फुटबॉल : जब जब युद्ध के बीच खेला गया विश्व कप

*बारूद के साये में फुटबॉल : जब युद्ध और संघर्षों के साये में खेला गया विश्व कप*

*इन दिनों 2026 फुटबॉल विश्व कप का आधिकारिक थीम सॉन्ग "दाई दाई" धूम मचा रहा है, लेकिन यह टूर्नामेंट एक ऐसे दौर में खेला जा रहा है जब मेजबान देशों में से एक अमेरिका और प्रतिभागी देश ईरान के बीच गहरे राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी तनाव मौजूद हैं.*

दुनिया के कई हिस्सों में इस समय युद्ध और संघर्ष जारी हैं. पश्चिम एशिया में तनाव चरम पर है, यूरोप में रूस-यूक्रेन युद्ध का असर अब भी दिखाई दे रहा है और इसी अशांत माहौल के बीच 2026 फीफा विश्व कप 11 जून 2026 से अमेरिका, मेक्सिको और कनाडा में संयुक्त रूप से शुरू हो रहा है. 

*जब युद्ध ने विश्व कप ही रोक दिया*

विश्व कप के इतिहास में केवल दो बार ऐसा हुआ है जब टूर्नामेंट आयोजित नहीं हो सका. 1942 और 1946 के विश्व कप, द्वितीय विश्व युद्ध की वजह से रद्द कर दिए गए थे. 1938 के बाद दुनिया को अगला विश्व कप देखने के लिए 1950 तक इंतजार करना पड़ा था.

द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने से ठीक पहले फ्रांस में 1938 का विश्व कप खेला गया था. उस समय यूरोप में तनाव चरम पर था. ऑस्ट्रिया की टीम विश्व कप के लिए क्वालिफाई कर चुकी थी, लेकिन जर्मनी द्वारा ऑस्ट्रिया के विलय (Anschluss) के बाद वह टूर्नामेंट में हिस्सा नहीं ले सकी.

*अब रूस पर प्रतिबंध और यूक्रेन की मुश्किलें*

यूक्रेन पर हमले के बाद फीफा और यूईएफए (UEFA) ने रूस पर कड़ा रुख अपनाया. इसका सीधा असर विश्व कप पर पड़ा और प्रतिबंध के कारण रूस 2026 विश्व कप की क्वालिफिकेशन प्रक्रिया का हिस्सा ही नहीं बन सका. इसे आधुनिक खेल इतिहास के सबसे बड़े प्रतिबंधों में से एक माना जा रहा है.

दूसरी ओर, यूक्रेन की टीम को अपने कई घरेलू मुकाबले देश से बाहर न्यूट्रल वेन्यू पर खेलने पड़े. युद्ध के कारण देश के स्टेडियम, प्रशिक्षण सुविधाएं और खेल ढांचा पूरी तरह प्रभावित हुआ, लेकिन इसके बावजूद टीम ने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अपनी खेल भावना और मौजूदगी को बनाए रखा. युद्ध की मार झेल रही यूक्रेनी टीम का सफर मार्च 2026 में समाप्त हो गया, जब विश्व कप प्ले-ऑफ के सेमीफाइनल में उसे स्वीडन के हाथों 3-1 से हार का सामना करना पड़ा.

*इस विश्व कप में फिलिस्तीन की अधूरी कहानी*

2026 विश्व कप क्वालिफिकेशन में फिलिस्तीन ने अपने इतिहास का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया. गाजा संघर्ष की विभीषिका के बीच टीम को अपने सभी घरेलू मैच भी तटस्थ मैदानों पर खेलने पड़े. विपरीत परिस्थितियों के बावजूद यह टीम पहली बार विश्व कप के बेहद करीब पहुंच गई थी.

क्वालिफिकेशन के निर्णायक दौर में ओमान के खिलाफ मुकाबले में फिलिस्तीन जीत की ओर बढ़ रहा था, लेकिन इंजरी टाइम में विपक्षी टीम को मिले पेनाल्टी गोल ने उसका सपना तोड़ दिया. 1-1 की इस बराबरी ने फिलिस्तीन को विश्व कप की दौड़ से बाहर कर दिया. 

*इस विश्व कप की सबसे असाधारण कहानी*

अगर 2026 विश्व कप की सबसे असाधारण कहानी लिखी जाएगी तो वह ईरान की होगी.

एक तरफ ईरान और अमेरिका के बीच गंभीर भू-राजनीतिक तनाव है. दोनों देशों के संबंध दशकों से बेहद खराब रहे हैं और हाल के महीनों में हालात और ज्यादा जटिल हुए हैं. दूसरी तरफ, ईरान ने शानदार खेल दिखाते हुए विश्व कप के लिए क्वालिफाई किया है और उसे अपने ग्रुप चरण के मुकाबले अमेरिका की धरती पर ही खेलने हैं.

स्थिति इतनी असामान्य है कि सुरक्षा और राजनीतिक कारणों से ईरानी टीम ने अमेरिका के बजाय मेक्सिको के सीमावर्ती शहर तिजुआना (Tijuana) में अपना बेस कैंप बनाया है.

हाल ही में वीजा को लेकर हुआ विवाद भी सुर्खियों में रहा. खिलाड़ियों को तो अमेरिका में प्रवेश की अनुमति मिल गई, लेकिन ईरान के कुछ प्रमुख अधिकारियों और सहयोगी स्टाफ को वीजा देने से इनकार कर दिया गया.

क्या उत्तराखंड जलवायु संकट की सबसे खतरनाक कतार में खड़ा है? IIT मद्रास की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता

*IIT मद्रास की रिपोर्ट: जलवायु जोखिम के लिहाज से उत्तराखंड पर बढ़ी चिंता*

उत्तराखंड में मानसून की हर बारिश में अब सड़कें धंस रही हैं और जगह जगह पहाड़ भी दरक रहे हैं. पिछले कुछ वर्षों में जोशीमठ धंसाव, सिलक्यारा सुरंग धंसने की घटना, केदारनाथ क्षेत्र में बार-बार आने वाली आपदाएं और चारधाम मार्ग पर लगातार हो रहे भूस्खलन हिमालयी क्षेत्र की बढ़ती संवेदनशीलता की ओर संकेत करते हैं.

अब भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मद्रास के शोधकर्ताओं की एक रिपोर्ट ने इस चिंता को और गहरा कर दिया है. अध्ययन के अनुसार भारतीय हिमालयी क्षेत्र के जिलों में पश्चिमी हिमालय, जिसमें उत्तराखंड भी शामिल है, पूर्वी हिमालय की तुलना में जलवायु परिवर्तन से पैदा होने वाले खतरों के प्रति अधिक जोखिमग्रस्त पाया गया है.

*क्या कहती है यह चौंकाने वाली रिपोर्ट?*

IIT मद्रास के शोधकर्ताओं कृष्णा मलाकर और आयुष शाह द्वारा तैयार अध्ययन "Climate-change-induced risk mapping of the Indian Himalayan districts using the latest IPCC framework" में भारतीय हिमालयी क्षेत्र के 109 जिलों का विश्लेषण किया गया. शोध में जलवायु जोखिम का आकलन करने के लिए इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) के नवीनतम ढांचे का इस्तेमाल किया गया.

अध्ययन में उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर सहित कई हिमालयी राज्यों को उच्च जलवायु जोखिम वाले क्षेत्रों में रखा गया है. हालांकि पूर्वी हिमालय में सामाजिक और आर्थिक कमजोरियां अधिक हैं, लेकिन प्राकृतिक खतरों और जोखिमों के मामले में पश्चिमी हिमालय आगे है.

रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में खतरों की तीव्रता और उनका प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देता है.

*शिमला सबसे अधिक खतरे वाला जिला*

अध्ययन में हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले को पूरे भारतीय हिमालयी क्षेत्र का सबसे अधिक खतरे वाला जिला बताया गया है. इसके बाद पूर्वी सिक्किम का स्थान आता है.

शोधकर्ताओं ने भूकंप, बाढ़, ठंड की लहर, बर्फबारी और ओलावृष्टि जैसी 11 भौतिक परिस्थितियों को आधार बनाकर जोखिम का आकलन किया. अध्ययन में पाया गया कि पश्चिमी हिमालय के 47 जिलों में से 34 जिले उच्च या अत्यधिक जोखिम वाले वर्ग में आते हैं.

यह निष्कर्ष इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश दोनों राज्यों में तेजी से सड़क, सुरंग और पर्यटन अवसंरचना का विस्तार हो रहा है.

*उत्तराखंड के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह चेतावनी?*

उत्तराखंड पिछले एक दशक में कई बड़ी प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर चुका है. 2013 की केदारनाथ त्रासदी में हजारों लोगों की जान गई थी. 2021 में चमोली जिले में ऋषिगंगा क्षेत्र में आई आपदा ने फिर दिखाया कि हिमालयी इलाकों में छोटे बदलाव भी कितने बड़े संकट का रूप ले सकते हैं.

2023 में जोशीमठ में जमीन धंसने की घटना ने विकास परियोजनाओं, भूगर्भीय अस्थिरता और जलवायु परिवर्तन पर विमर्श को नए सिरे से शुरू कर दिया. इसके बाद से राज्य में भूस्खलन, बादल फटने और अतिवृष्टि की घटनाओं पर लगातार चिंता व्यक्त की जाती रही है.

*IIT रुड़की के अध्ययन ने क्या पाया?*

IIT रुड़की के जल विज्ञान विभाग के शोधकर्ताओं स्पंदिता मित्रा, दिव्या सरदाना और अंकित अग्रवाल द्वारा किए गए अध्ययन "Seasonal Shifts and Structural Changes in Western Disturbances Over Hindu Kush Himalayas" ने हिमालयी क्षेत्र के मौसम में आ रहे बदलावों को लेकर नई चिंता जताई है.

International Journal of Climatology में प्रकाशित इस अध्ययन में 1950 से 2022 तक के मौसम संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण किया गया. शोधकर्ताओं ने पाया कि पश्चिमी विक्षोभों के स्वरूप और समय में बदलाव आ रहा है. पहले जहां इनकी सक्रियता मुख्य रूप से सर्दियों के महीनों में रहती थी, वहीं अब प्री-मानसून अवधि में भी इनके प्रभाव बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं.

अध्ययन के अनुसार इस बदलाव का असर वर्षा के पैटर्न पर पड़ सकता है. इससे हिमालयी क्षेत्रों में अतिवृष्टि, फ्लैश फ्लड और भूस्खलन जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है. उत्तराखंड जैसे राज्यों में बड़ी आबादी पहाड़ी ढलानों पर रहती है और वहां महत्वपूर्ण सड़कें, पुल तथा अन्य अवसंरचनाएं मौजूद हैं. इसलिए मौसम में ऐसे बदलावों का असर यहां अधिक पड़ सकता है.

*क्या सिर्फ जलवायु परिवर्तन जिम्मेदार है?*

रिपोर्ट में यह भी लिखा है कि जोखिम का स्तर इस बात पर निर्भर करता है कि कोई समाज आपदा का सामना करने और उससे उबरने के लिए कितना तैयार है.

यानी समस्या सिर्फ बढ़ती बारिश या बदलते मौसम की नहीं है. स्वास्थ्य सेवाएं, संचार व्यवस्था, रोजगार के अवसर, शिक्षा, सुरक्षित आवास और स्थानीय आजीविका भी किसी क्षेत्र की जलवायु संवेदनशीलता तय करते हैं.

उत्तराखंड जैसे राज्य में जहां बड़ी आबादी पहाड़ी और दूरस्थ क्षेत्रों में रहती है, वहां यह चुनौती और जटिल हो जाती है.

*केदारनाथ से मिली सीख*

रिपोर्ट में 2013 की केदारनाथ आपदा का जिक्र करते हुए बेहतर संचार व्यवस्था और शुरुआती चेतावनी प्रणाली को बेहद महत्वपूर्ण बताया गया है. शोधकर्ताओं का मानना है कि दूरदराज के इलाकों तक सूचना तेजी से पहुंचाने की व्यवस्था विकसित की जाए तो जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है.

इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाने, स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने, शिक्षा तक पहुंच आसान बनाने और कृषि पर निर्भरता कम कर आय के विविध स्रोत विकसित करने की भी सिफारिश की गई है.

Saturday, June 6, 2026

*लाइक एंड शेयर से जंतर-मंतर तक: क्या CJP ने अपनी पहली परीक्षा पास कर ली?*

कुछ दिन पहले तक सवाल यह था कि क्या कोकरोच जनता पार्टी (CJP) का डिजिटल आंदोलन सोशल मीडिया की स्क्रीन से निकलकर सड़कों तक पहुंच पाएगा. लाखों-करोड़ों फॉलोअर्स, वायरल वीडियो और ट्रेंडिंग हैशटैग के बीच यह आशंका भी जताई जा रही थी कि कहीं यह सिर्फ "स्लैकटिविज्म" यानी ऑनलाइन सक्रियता का एक और उदाहरण बनकर न रह जाए.

लेकिन 6 जून को दिल्ली के जंतर-मंतर पर जुटी भीड़ ने कम से कम इस सवाल का एक जवाब जरूर दे दिया. यह स्पष्ट हो गया कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाला असंतोष पूरी तरह आभासी नहीं है. युवाओं का एक हिस्सा अपनी नाराजगी को लेकर सड़क पर उतरने के लिए भी तैयार है.

*डिजिटल समर्थन से वास्तविक उपस्थिति तक*

पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया राजनीतिक और सामाजिक असहमति का बड़ा मंच बनकर सामने आया है. लेकिन किसी भी आंदोलन की असली परीक्षा तब होती है जब लोगों को घरों से निकलकर सार्वजनिक रूप से अपनी मौजूदगी दर्ज करानी पड़ती है.

CJP के लिए जंतर-मंतर का प्रदर्शन ऐसी ही परीक्षा था. प्रदर्शन में शामिल लोगों की संख्या को लेकर अलग-अलग दावे हो सकते हैं, लेकिन यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि बड़ी संख्या में युवा राजधानी में जुटे और उन्होंने बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को केंद्र में रखा.

इस लिहाज से देखा जाए तो CJP ने अपनी पहली राजनीतिक परीक्षा में उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया है.

*भीड़ थी, लेकिन अव्यवस्था भी थी*

हालांकि किसी भी नए आंदोलन की तरह इस प्रदर्शन ने अपनी सीमाएं भी उजागर कीं.

वरिष्ठ पत्रकार राजीव लोचन साह ने जंतर-मंतर के घटनाक्रम को देखते हुए 1994 के उत्तराखंड राज्य आंदोलन और बाद में अन्ना हजारे आंदोलन की याद का जिक्र किया है. उन्होंने कहा प्रदर्शन में जोश, ऊर्जा और भारी उत्साह तो दिखाई दिया, लेकिन साथ ही अव्यवस्था और अनुशासनहीनता भी नजर आई.

साह का कहना है कि कई मौकों पर मंच संचालन और वक्ताओं को सुनाने में कठिनाई दिखाई दी. यहां तक कि आंदोलन का समर्थन करने पहुंचे Sonam Wangchuk को भी अपनी बात रखने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी. यह स्थिति बताती है कि डिजिटल लोकप्रियता हासिल कर लेना और एक संगठित जनआंदोलन खड़ा कर देना दो अलग-अलग बातें हैं.

*आंदोलन की अगली चुनौती*

राजीव लोचन साह के अनुसार भीड़ जुटा लेना किसी आंदोलन की अंतिम सफलता नहीं होती.

1994 का उत्तराखंड आंदोलन राज्य निर्माण तक पहुंचा, लेकिन राज्य बनने के बाद उससे जुड़ी उम्मीदों का बड़ा हिस्सा अधूरा रह गया. अन्ना आंदोलन ने देश की राजनीति को झकझोरा और आम आदमी पार्टी जैसी नई राजनीतिक शक्ति को जन्म दिया, लेकिन समय के साथ वह भी अपने अंतर्विरोधों से जूझती रही.

CJP के सामने भी यही चुनौती है. क्या यह आंदोलन सिर्फ एक प्रदर्शन तक सीमित रहेगा या एक दीर्घकालिक संगठनात्मक ढांचे में बदल पाएगा? क्या इसके पास स्पष्ट नेतृत्व, रणनीति और दीर्घकालिक कार्यक्रम हैं? आने वाले महीनों में इन्हीं सवालों के जवाब इसकी दिशा तय करेंगे.

*सरकार के लिए भी एक संकेत*

जंतर-मंतर का प्रदर्शन केवल CJP की परीक्षा नहीं था. यह सरकार के लिए भी एक संकेत है.

राजीव कहते हैं कि यदि बड़ी संख्या में युवा बेरोजगारी, भर्ती प्रक्रियाओं और शिक्षा व्यवस्था को लेकर सड़क पर उतर रहे हैं, तो इसे केवल सोशल मीडिया का शोर कहकर खारिज करना आसान नहीं होगा. यह उस असंतोष का संकेत है जो लंबे समय से विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं, भर्ती प्रक्रियाओं और रोजगार के अवसरों को लेकर युवाओं के बीच मौजूद है.

यही कारण है कि कई राजनीतिक विश्लेषक इस प्रदर्शन को केवल एक वायरल अभियान नहीं, बल्कि युवाओं की बेचैनी की सार्वजनिक अभिव्यक्ति के रूप में देख रहे हैं.

*क्या नया राजनीतिक अध्याय शुरू हो रहा है?*

यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि CJP भारतीय राजनीति में कोई बड़ा बदलाव ला देगी. यह भी संभव है कि कुछ समय बाद इसका प्रभाव सीमित हो जाए. लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि जंतर-मंतर की भीड़ ने यह साबित कर दिया है कि सोशल मीडिया पर पैदा हुआ असंतोष वास्तविक दुनिया में भी मौजूद है.

6 जून का प्रदर्शन शायद किसी बड़े आंदोलन की शुरुआत हो, शायद एक क्षणिक उभार साबित हो. इसका फैसला आने वाला समय करेगा. फिलहाल इतना साफ है कि CJP को अब केवल एक इंटरनेट ट्रेंड मानना मुश्किल होगा.

Friday, June 5, 2026

राहुल गांधी ने उठाए कुछ अहम सवाल, लेकिन क्या पहाड़ के बड़े मुद्दों पर हुई पूरी बात?

*राहुल गांधी ने उठाए कुछ अहम सवाल, लेकिन क्या पहाड़ के बड़े मुद्दों पर हुई पूरी बात?*


लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी 4 और 5 जून को प्रस्तावित दो दिवसीय उत्तराखंड दौरे पर पहुंचे, लेकिन खराब मौसम के कारण उनका अल्मोड़ा और पौड़ी का कार्यक्रम प्रभावित हो गया. हेलीकॉप्टर उड़ान संभव नहीं होने के कारण वह निर्धारित सभाओं में प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं हो सके और उन्होंने फोन के माध्यम से लोगों को संबोधित किया. अपने संबोधन में राहुल गांधी ने अग्निवीर योजना और अंकिता भंडारी हत्याकांड जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया. ये दोनों ऐसे विषय हैं जो पिछले कुछ वर्षों से उत्तराखंड की राजनीति और सामाजिक विमर्श के केंद्र में रहे हैं.

हालांकि उत्तराखंड के सामने मौजूद चुनौतियां केवल इन्हीं मुद्दों तक सीमित नहीं हैं. रोजगार, पलायन, पहाड़ की स्वास्थ्य सेवाएं, धार्मिक पर्यटन का बढ़ता दबाव, पर्यावरणीय संकट और दलबदल की राजनीति जैसे कई सवाल आज भी लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर रहे हैं. ऐसे में राहुल गांधी के संबोधन के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या राज्य के इन व्यापक मुद्दों पर भी उतनी ही स्पष्टता और विस्तार से बात हुई, जितनी अग्निवीर और अंकिता भंडारी मामले पर दिखाई दी.

*वीरभूमि के युवाओं का सवाल, अग्निवीर के साथ रोजगार पर क्या है रोडमैप?*

उत्तराखंड को लंबे समय से सैनिकों का प्रदेश माना जाता है. राज्य के हजारों युवा सेना में भर्ती होने का सपना देखते हैं. ऐसे में अग्निवीर योजना को लेकर यहां लगातार बहस होती रही है. राहुल गांधी ने अपने संबोधन में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया और योजना की आलोचना भी की.

लेकिन युवाओं के सामने सवाल केवल अग्निवीर तक सीमित नहीं है. राज्य में बेरोजगारी और रोजगार के अवसरों की कमी भी बड़ी चिंता है. हरिद्वार, पंतनगर और सेलाकुई के औद्योगिक क्षेत्रों से स्थानीय युवाओं को बड़ी उम्मीदें थीं. हालांकि विभिन्न युवा संगठनों और स्थानीय लोगों के बीच यह शिकायत अक्सर सुनाई देती है कि उद्योगों में स्थानीय युवाओं को अपेक्षित अवसर नहीं मिल रहे हैं और बाहरी राज्यों के लोगों की संख्या अधिक दिखाई देती है.

पहाड़ के कई गांव आज भी बेहतर रोजगार की तलाश में हो रहे पलायन की कहानी कहते हैं. ऐसे में युवाओं की नजर केवल अग्निवीर योजना पर नहीं, बल्कि इस सवाल पर भी है कि रोजगार सृजन को लेकर राजनीतिक दलों का ठोस रोडमैप क्या है.

*अंकिता भंडारी का नाम आज भी क्यों चर्चा में रहता है?*

सितंबर 2022 में हुए अंकिता भंडारी हत्याकांड ने पूरे उत्तराखंड को झकझोर दिया था. राहुल गांधी ने अपने संबोधन में इस मामले का जिक्र किया और इसे न्याय तथा महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा बताया.

यह मामला सिर्फ एक आपराधिक घटना न रहकर उत्तराखंड में महिलाओं की सुरक्षा, सत्ता के प्रभाव और न्याय व्यवस्था पर भरोसे का सवाल बन गया. पौड़ी जिले की रहने वाली अंकिता के परिवार और कई सामाजिक संगठनों की ओर से समय-समय पर मामले के सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच की मांग उठती रही है. राज्य में आज भी यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का हिस्सा बना हुआ है.

हालांकि महिलाओं की सुरक्षा के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े सवाल भी महिलाओं के जीवन को सीधे प्रभावित करते हैं. इसलिए महिला सुरक्षा के मुद्दे को व्यापक सामाजिक संदर्भ में देखने की मांग भी उठती रही है.

*पहाड़ के अस्पताल, जहां इलाज से पहले मिलता है रेफर*

उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति लंबे समय से चिंता का विषय रही है. चमोली, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ जैसे जिलों में रहने वाले लोगों को गंभीर बीमारी की स्थिति में अक्सर देहरादून, ऋषिकेश या हल्द्वानी जाना पड़ता है.

विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, आधुनिक उपकरणों का अभाव और दूर-दराज के इलाकों तक स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित पहुंच को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं. जिला अस्पतालों को मजबूत किए बिना पहाड़ की स्वास्थ्य व्यवस्था में बड़ा बदलाव संभव नहीं है.

स्वास्थ्य सेवाएं हर चुनाव में एक बड़ा मुद्दा बनती हैं, लेकिन चुनावी भाषणों में यह विषय अक्सर उतनी प्रमुखता नहीं पा पाता जितनी अन्य राजनीतिक मुद्दों को मिलती है.

*आस्था भी जरूरी, लेकिन पहाड़ कितना बोझ उठाए?*

चारधाम यात्रा उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है. लाखों लोगों की आजीविका इससे जुड़ी हुई है. लेकिन बढ़ती भीड़ के साथ पर्यावरण और बुनियादी ढांचे पर दबाव भी बढ़ा है.

जोशीमठ भू-धंसाव के बाद विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन पर विमर्श और तेज हुआ है. पर्यावरणविदों का एक वर्ग लंबे समय से मांग कर रहा है कि धार्मिक पर्यटन को रोकने के बजाय उसे वैज्ञानिक और नियंत्रित तरीके से संचालित किया जाए, ताकि पर्यावरण को नुकसान कम हो और स्थानीय लोगों को ट्रैफिक, कूड़ा प्रबंधन तथा संसाधनों पर बढ़ते दबाव से राहत मिल सके.

उत्तराखंड में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन का सवाल आने वाले वर्षों में और महत्वपूर्ण होने वाला है.

*कैंची धाम का जाम और बढ़ती चिंता"

नैनीताल जिले का कैंची धाम पिछले कुछ वर्षों में देश के सबसे लोकप्रिय धार्मिक स्थलों में शामिल हुआ है. छुट्टियों और विशेष अवसरों पर यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या इतनी बढ़ जाती है कि भवाली-अल्मोड़ा राष्ट्रीय राजमार्ग पर कई किलोमीटर लंबा जाम लग जाता है.

पर्यटन से स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ जरूर मिला है, लेकिन लगातार बढ़ती भीड़ ने यातायात, पार्किंग और बुनियादी सुविधाओं पर दबाव भी बढ़ाया है. स्थानीय निवासियों, स्कूली बच्चों और मरीजों को भी कई बार घंटों जाम में फंसना पड़ता है.

ऐसे में धार्मिक पर्यटन के बेहतर प्रबंधन और दीर्घकालिक योजना की मांग लगातार उठ रही है. यह मुद्दा स्थानीय लोगों के लिए किसी राजनीतिक सवाल से ज्यादा रोजमर्रा की परेशानी का विषय बन चुका है.

*दलबदल की राजनीति पर क्या होगी स्पष्ट नीति?*

उत्तराखंड की राजनीति में दलबदल कोई नया विषय नहीं है. राज्य गठन के बाद कई बड़े नेता और विधायक समय-समय पर राजनीतिक दल बदलते रहे हैं. इससे राजनीतिक दलों की वैचारिक प्रतिबद्धता और जनता के भरोसे को लेकर सवाल उठते रहे हैं.

युवा मतदाताओं के बीच यह चर्चा आम है कि जो नेता एक विचारधारा और पार्टी के नाम पर वोट मांगते हैं, वे बाद में दूसरी पार्टी में क्यों चले जाते हैं. ऐसे में यह सवाल केवल कांग्रेस ही नहीं, बल्कि सभी राजनीतिक दलों के सामने है कि वे दलबदल को लेकर कितनी स्पष्ट नीति अपनाते हैं और अपने पुराने कार्यकर्ताओं को कितना महत्व देते हैं.

हिमांशु जोशी

Thursday, June 4, 2026

जीवन के अनुभवों से निकली सीखों की किताब ‘अंतस’

*जीवन के अनुभवों से निकली सीखों की किताब ‘अंतस’*

‘अंतस’ जीवन के अनुभवों, सामाजिक सरोकारों और नैतिक मूल्यों को सरल भाषा में प्रस्तुत करने वाली पुस्तक है. लेखक अपने अनुभवों के माध्यम से पाठकों को संवेदनशीलता, जिम्मेदारी और आत्मचिंतन का संदेश देते हैं. कुछ संपादकीय और वर्तनी संबंधी त्रुटियों के बावजूद यह पुस्तक पाठकों को सोचने के लिए प्रेरित करती है और विशेष रूप से युवाओं के लिए उपयोगी पाठ सिद्ध होती है.

*अनुभवों से उपजी जीवन दृष्टि*

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी निवासी लवकुश कुमार ने भौतिकी में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातक तथा आईआईटी दिल्ली से परास्नातक की शिक्षा प्राप्त की है. अपने जीवन के अनुभवों को उन्होंने लेखों के माध्यम से ‘अंतस’ नामक पुस्तक में संकलित किया है, जिसे नोशन प्रेस प्लेटफॉर्म से प्रकाशित किया गया है.

अपने जीवन के एक कटु अनुभव के माध्यम से किताब के पहले लेख में लेखक पाठकों को एक महत्वपूर्ण सीख देते हैं, “संवेदनशीलता इंसान को जिम्मेदार बनाती है.” लेखक इस विचार को किसी उपदेश की तरह नहीं, बल्कि अपने अनुभव के जरिए प्रस्तुत करते हैं, जिससे बात सहज रूप से पाठकों तक पहुंचती है. जीवन दर्शन से जुड़ा यह लेख शुरुआत से ही पाठकों पर प्रभाव छोड़ने में सफल रहता है और उन्हें आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है.

किताब की एक विशेषता यह है कि लेखक अपने अनुभवों को केवल व्यक्तिगत घटनाओं तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उनसे व्यापक सामाजिक और मानवीय निष्कर्ष निकालने की कोशिश करते हैं. यही कारण है कि पुस्तक के कई लेख पाठकों को अपने जीवन और व्यवहार पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं.

*सरल भाषा और कुछ संपादकीय कमियां*

किताब में कुछ वर्तनी संबंधी त्रुटियां भी दिखाई देती हैं. उदाहरण के तौर पर पृष्ठ संख्या 7 पर “मायने” शब्द की वर्तनी त्रुटिपूर्ण रूप में छपी है. हालांकि ऐसी त्रुटियां पुस्तक की विषयवस्तु को प्रभावित नहीं करतीं, लेकिन अगले संस्करण में इन्हें सुधारा जा सकता है.

लेखक ने कई लेखों के आरंभ या अंत में विषय से जुड़े महापुरुषों के कथनों को शामिल कर किताब को और प्रभावी बनाने का प्रयास किया है. उदाहरण के तौर पर अभिव्यक्ति से जुड़े लेख के अंत में महात्मा गांधी का एक कथन दिया गया है. ऐसे उद्धरण लेखों के संदेश को और स्पष्ट करते हैं तथा पाठकों को विषय पर गहराई से विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं.

*युवाओं और बच्चों के लिए उपयोगी विचार*

‘हमारे आदर्श और युवा’ शीर्षक लेख आज के दौर के बच्चों और युवाओं के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. इस लेख में लेखक लिखते हैं, “हमारे युवा और बच्चे उन लोगों की तरफ ही बढ़ेंगे जिनके बारे में बातें सुनेंगे.” यह पंक्ति बताती है कि समाज में जिन व्यक्तियों और मूल्यों को प्रमुखता दी जाती है, उनका सीधा प्रभाव नई पीढ़ी पर पड़ता है.

लेख केवल आदर्शों की चर्चा नहीं करता, बल्कि यह भी संकेत देता है कि बच्चों और युवाओं के सामने किस तरह के उदाहरण प्रस्तुत किए जा रहे हैं. इसी तरह के विचारोत्तेजक लेख इस किताब को हर उम्र के पाठकों के लिए प्रासंगिक बना देते हैं.

*लघुकथाओं में सामाजिक सरोकार*

किताब में कुछ लघुकथाएं भी शामिल हैं, जो इसकी विषयवस्तु को और विविध बनाती हैं. ये लघुकथाएं भ्रष्टाचार, वाहनों को तेज गति से चलाने जैसी सामाजिक समस्याओं पर केंद्रित हैं. संक्षिप्त होने के बावजूद इनमें एक स्पष्ट संदेश मौजूद है और ये पाठकों का ध्यान रोजमर्रा की उन समस्याओं की ओर आकर्षित करती हैं, जिन्हें अक्सर सामान्य मान लिया जाता है.

इन रचनाओं के माध्यम से लेखक सामाजिक जिम्मेदारी और जागरूकता का संदेश देते हैं तथा इन मुद्दों के खिलाफ आवाज उठाने का प्रयास करते हैं.

*पढ़ने और देखने की नई राहें*

किताब के अंत में लेखक ने पाठकों की समझ का दायरा बढ़ाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण किताबों और फिल्मों के नाम भी सुझाए हैं. यह प्रयास पुस्तक को केवल अनुभवों और विचारों के संकलन तक सीमित नहीं रहने देता, बल्कि आगे पढ़ने और सीखने की दिशा भी दिखाता है.

फिल्मों के महत्व को रेखांकित करते हुए लेखक ने ‘सिनेमा जीवन की पाठशाला’ के लेखक का उल्लेख किया है. इससे यह संदेश मिलता है कि सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन, समाज और मानवीय व्यवहार को समझने का एक महत्वपूर्ण साधन भी हो सकता है.

लाइक एंड शेयर प्लीज : क्या CJP का डिजिटल आंदोलन बनेगा जन आंदोलन

*लाइक एंड शेयर प्लीज : क्या CJP का डिजिटल आंदोलन बनेगा जन आंदोलन*

कोकरोच जनता पार्टी (CJP) ने कुछ ही दिनों में करोड़ों फॉलोअर्स जुटाकर यह दिखा दिया है कि युवाओं के भीतर असंतोष कितना गहरा है. लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह असंतोष सोशल मीडिया से निकलकर सड़कों पर भी दिखाई देगा? 6 जून को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन इसी सवाल का जवाब तलाशेगा.

*फॉलो, लाइक और शेयर से आगे की चुनौती*

इन दिनों सोशल मीडिया ने विरोध दर्ज कराने का तरीका बदल दिया है. अब किसी मुद्दे पर नाराजगी जताने के लिए लोगों को किसी संगठन का सदस्य बनने या सड़कों पर उतरने की जरूरत नहीं पड़ती. एक पोस्ट शेयर करना, किसी हैशटैग को ट्रेंड कराना या किसी अभियान को फॉलो करना ही समर्थन की पहचान बन जाता है.

इंटरनेट की भाषा में इसे "स्लैकटिविज्म" कहा जाता है. इसका अर्थ ऐसे सक्रियतावाद से है जो ऑनलाइन दुनिया तक सीमित रहता है. लेकिन जब बात तपती धूप, तेज बारिश में सड़क पर उतरकर प्रदर्शन में शामिल होने और फिर पुलिस कार्रवाई या कानूनी जोखिम का सामना करने की आती है, तो ऑनलाइन समर्थन का एक बड़ा हिस्सा पीछे छूट जाता है.

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कोकरोच जनता पार्टी के मामले में भी यही सवाल उठ रहा है. यदि उसके करोड़ों ऑनलाइन समर्थकों में से केवल 22 हजार लोग भी 6 जून को जंतर-मंतर पहुंचते हैं, तो कुल संख्या के हिसाब से यह महज 0.1 प्रतिशत होगी. लेकिन दिल्ली की राजनीति और राष्ट्रीय मीडिया के लिए यह भी एक बड़ी भीड़ मानी जाएगी.

*क्यों चर्चा में है CJP?*

कोकरोच जनता पार्टी का उभार किसी पारंपरिक राजनीतिक अभियान की तरह नहीं हुआ. यह पार्टी एक व्यंग्यात्मक डिजिटल आंदोलन के रूप में शुरू हुई, इसके केंद्र में बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियां, शिक्षा व्यवस्था पर सवाल और युवाओं की बढ़ती निराशा जैसे मुद्दे रहे हैं. यही कारण है कि बड़ी संख्या में छात्र और युवा इससे जुड़ते दिखाई दिए.

सोशल मीडिया पर इसकी लोकप्रियता ने पारंपरिक राजनीतिक दलों का भी ध्यान खींचा है. ऐसे समय में जब अधिकांश राजनीतिक दल युवाओं को अपने साथ जोड़ने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, CJP ने बिना किसी स्थापित संगठनात्मक ढांचे के बड़ी डिजिटल पहुंच हासिल कर ली.

*आंदोलन को संस्थागत रूप देने की कोशिश*

किसी भी आंदोलन की सबसे बड़ी चुनौती उसकी निरंतरता होती है. सोशल मीडिया पर लोकप्रियता जल्दी मिल सकती है, लेकिन उसे लंबे समय तक बनाए रखने के लिए संगठन और नेतृत्व की जरूरत होती है.

शायद यही कारण है कि इसके फाउंडर अभिजीत दिपके के नेतृत्व में CJP ने हाल के दिनों में अपने संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने की कोशिश शुरू की है. इसी कड़ी में पत्रकार सौरव दास को मुख्य प्रवक्ता बनाया गया है, जबकि राजनीतिक शोधकर्ता एवं फिल्मकार विजेता दहिया और पूर्व प्रबंधन सलाहकार अशुतोष रांका को प्रवक्ता नियुक्त किया गया है. इसे आंदोलन को एक संस्थागत स्वरूप देने की दिशा में शुरुआती कदम माना जा रहा है.

*किन लोगों ने दिया समर्थन?*

अब तक इस आंदोलन को सबसे चर्चित समर्थन शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता Sonam Wangchuk का मिला है. वांगचुक ने शिक्षा व्यवस्था, भर्ती परीक्षाओं और युवाओं के मुद्दों पर चिंता जताते हुए आंदोलन के प्रति सार्वजनिक समर्थन व्यक्त किया है. उन्होंने यहां तक कहा है कि यदि संबंधित मुद्दों पर संतोषजनक कार्रवाई नहीं होती है तो वह 6 जून के प्रदर्शन में शामिल होंगे.

वांगचुक का समर्थन इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उनकी पहचान किसी राजनीतिक दल के नेता की नहीं, बल्कि शिक्षा और सामाजिक मुद्दों पर काम करने वाले एक विश्वसनीय सार्वजनिक चेहरे की है. इससे आंदोलन को केवल सोशल मीडिया ट्रेंड से आगे बढ़कर एक गंभीर सामाजिक विमर्श का रूप देने में मदद मिली है.

कुछ अन्य सार्वजनिक हस्तियों और शिक्षाविदों ने भी सोशल मीडिया पर युवाओं की चिंताओं को जायज बताते हुए इस बहस का समर्थन किया है. हालांकि अभी तक यह आंदोलन किसी बड़े राजनीतिक गठजोड़ या संगठित विपक्षी मंच का हिस्सा नहीं बना है.

*क्या सोशल मीडिया की ताकत राजनीति बदल सकती है?*

भारत में बड़े आंदोलनों का इतिहास बताता है कि केवल डिजिटल पहुंच काफी नहीं होती. अन्ना आंदोलन, निर्भया आंदोलन और किसान आंदोलन जैसे अभियानों की सफलता उनके जमीनी नेटवर्क, स्थानीय संगठनों और प्रत्यक्ष भागीदारी में थी. सोशल मीडिया ने इन आंदोलनों को गति जरूर दी, लेकिन उनकी सफलता का आधार सड़कों पर मौजूद लोग थे.

CJP के सामने भी वही चुनौती है. उसके पास विशाल डिजिटल पहुंच है, लेकिन उसे यह साबित करना होगा कि यह समर्थन वास्तविक जनभागीदारी में बदल सकता है. अगर जंतर-मंतर पर बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं, तो यह भारतीय राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत होगा कि युवा पारंपरिक राजनीतिक दलों से अलग अपनी नई राजनीतिक भाषा और नए प्रयोगों के साथ सामने आ रहे हैं.

लेकिन यदि प्रदर्शन उम्मीद से कमजोर रहता है, तो आलोचक इसे सोशल मीडिया के क्षणिक उत्साह का उदाहरण बताने से नहीं चूकेंगे.

Tuesday, June 2, 2026

श्रद्धालुओं को पीठ पर ढोने वाले कंडी मजदूरों के लिए शौचालय तक नहीं

*श्रद्धालुओं को पीठ पर ढोने वाले कंडी मजदूरों के लिए शौचालय तक नहीं*

उत्तराखंड के बद्रीनाथ धाम में हर साल हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं. इनमें बुजुर्ग, बीमार और चलने में असमर्थ लोगों को कंडी में बैठाकर मंदिर तक पहुंचाने वाले मजदूर यात्रा व्यवस्था का अहम हिस्सा हैं. लेकिन जिन लोगों के कंधों पर यह यात्रा टिकी है, उनके लिए बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं.

*पीठ पर श्रद्धालु और खुद टेंट में जिंदगी*

नेपाल के मुगु जिले के रहने वाले करन सिंह बद्रीनाथ में कंडी चलाते हैं. वह बताते हैं कि बुखार होने के बावजूद उन्हें काम करना पड़ रहा है, क्योंकि सीजन की कमाई से ही परिवार चलता है. करन यहां पन्नी का टेंट बनाकर रहते हैं, जिसका एक हजार रुपए किराया देना पड़ता है.

*कंडी मजदूरों के लिए शौचालय तक नहीं*

करन बताते हैं कि शौचालय के लिए उन्हें सुलभ शौचालय का इस्तेमाल करना पड़ता है, जहां हर बार दस रुपए देने पड़ते हैं. बद्रीनाथ में करीब चार सौ कंडी मजदूर काम करते हैं. इनमें 27 वर्षीय जंग सिंह भी शामिल हैं. जंग बताते हैं कि उन्होंने बारहवीं तक पढ़ाई की है, लेकिन रोजगार नहीं मिलने के कारण भारत आना पड़ा.

कंडी चलाने के लिए दो हजार रुपए का पंजीकरण कराना पड़ता है. पूरे सीजन में उनकी कमाई करीब बीस से तीस हजार रुपए तक होती है, जबकि रोजाना लगभग तीन सौ रुपए खाने में खर्च हो जाते हैं.

चारधाम यात्रा की व्यवस्था में अदृश्य श्रमिक

जंग सिंह का कहना है कि यात्रा सीजन खत्म होने के बाद कंडी वालों को निचले इलाकों में मजदूरी करने जाना पड़ता है. कई मजदूर अस्थायी टेंट में रहकर पूरा सीजन बिताते हैं. स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं और रहने की व्यवस्था भी बेहद साधारण है. उन्होंने बताया कि ऑनलाइन पेमेंट आने के बाद से उन्हें अब घर रुपए भेजने में आसानी हुई है, नेपाल लौटते वक्त नकद धनराशि रखने का डर दूर हुआ है.

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...