*लाइक एंड शेयर प्लीज : क्या CJP का डिजिटल आंदोलन बनेगा जन आंदोलन*
कोकरोच जनता पार्टी (CJP) ने कुछ ही दिनों में करोड़ों फॉलोअर्स जुटाकर यह दिखा दिया है कि युवाओं के भीतर असंतोष कितना गहरा है. लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह असंतोष सोशल मीडिया से निकलकर सड़कों पर भी दिखाई देगा? 6 जून को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन इसी सवाल का जवाब तलाशेगा.
*फॉलो, लाइक और शेयर से आगे की चुनौती*
इन दिनों सोशल मीडिया ने विरोध दर्ज कराने का तरीका बदल दिया है. अब किसी मुद्दे पर नाराजगी जताने के लिए लोगों को किसी संगठन का सदस्य बनने या सड़कों पर उतरने की जरूरत नहीं पड़ती. एक पोस्ट शेयर करना, किसी हैशटैग को ट्रेंड कराना या किसी अभियान को फॉलो करना ही समर्थन की पहचान बन जाता है.
इंटरनेट की भाषा में इसे "स्लैकटिविज्म" कहा जाता है. इसका अर्थ ऐसे सक्रियतावाद से है जो ऑनलाइन दुनिया तक सीमित रहता है. लेकिन जब बात तपती धूप, तेज बारिश में सड़क पर उतरकर प्रदर्शन में शामिल होने और फिर पुलिस कार्रवाई या कानूनी जोखिम का सामना करने की आती है, तो ऑनलाइन समर्थन का एक बड़ा हिस्सा पीछे छूट जाता है.
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कोकरोच जनता पार्टी के मामले में भी यही सवाल उठ रहा है. यदि उसके करोड़ों ऑनलाइन समर्थकों में से केवल 22 हजार लोग भी 6 जून को जंतर-मंतर पहुंचते हैं, तो कुल संख्या के हिसाब से यह महज 0.1 प्रतिशत होगी. लेकिन दिल्ली की राजनीति और राष्ट्रीय मीडिया के लिए यह भी एक बड़ी भीड़ मानी जाएगी.
*क्यों चर्चा में है CJP?*
कोकरोच जनता पार्टी का उभार किसी पारंपरिक राजनीतिक अभियान की तरह नहीं हुआ. यह पार्टी एक व्यंग्यात्मक डिजिटल आंदोलन के रूप में शुरू हुई, इसके केंद्र में बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियां, शिक्षा व्यवस्था पर सवाल और युवाओं की बढ़ती निराशा जैसे मुद्दे रहे हैं. यही कारण है कि बड़ी संख्या में छात्र और युवा इससे जुड़ते दिखाई दिए.
सोशल मीडिया पर इसकी लोकप्रियता ने पारंपरिक राजनीतिक दलों का भी ध्यान खींचा है. ऐसे समय में जब अधिकांश राजनीतिक दल युवाओं को अपने साथ जोड़ने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, CJP ने बिना किसी स्थापित संगठनात्मक ढांचे के बड़ी डिजिटल पहुंच हासिल कर ली.
*आंदोलन को संस्थागत रूप देने की कोशिश*
किसी भी आंदोलन की सबसे बड़ी चुनौती उसकी निरंतरता होती है. सोशल मीडिया पर लोकप्रियता जल्दी मिल सकती है, लेकिन उसे लंबे समय तक बनाए रखने के लिए संगठन और नेतृत्व की जरूरत होती है.
शायद यही कारण है कि इसके फाउंडर अभिजीत दिपके के नेतृत्व में CJP ने हाल के दिनों में अपने संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने की कोशिश शुरू की है. इसी कड़ी में पत्रकार सौरव दास को मुख्य प्रवक्ता बनाया गया है, जबकि राजनीतिक शोधकर्ता एवं फिल्मकार विजेता दहिया और पूर्व प्रबंधन सलाहकार अशुतोष रांका को प्रवक्ता नियुक्त किया गया है. इसे आंदोलन को एक संस्थागत स्वरूप देने की दिशा में शुरुआती कदम माना जा रहा है.
*किन लोगों ने दिया समर्थन?*
अब तक इस आंदोलन को सबसे चर्चित समर्थन शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता Sonam Wangchuk का मिला है. वांगचुक ने शिक्षा व्यवस्था, भर्ती परीक्षाओं और युवाओं के मुद्दों पर चिंता जताते हुए आंदोलन के प्रति सार्वजनिक समर्थन व्यक्त किया है. उन्होंने यहां तक कहा है कि यदि संबंधित मुद्दों पर संतोषजनक कार्रवाई नहीं होती है तो वह 6 जून के प्रदर्शन में शामिल होंगे.
वांगचुक का समर्थन इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उनकी पहचान किसी राजनीतिक दल के नेता की नहीं, बल्कि शिक्षा और सामाजिक मुद्दों पर काम करने वाले एक विश्वसनीय सार्वजनिक चेहरे की है. इससे आंदोलन को केवल सोशल मीडिया ट्रेंड से आगे बढ़कर एक गंभीर सामाजिक विमर्श का रूप देने में मदद मिली है.
कुछ अन्य सार्वजनिक हस्तियों और शिक्षाविदों ने भी सोशल मीडिया पर युवाओं की चिंताओं को जायज बताते हुए इस बहस का समर्थन किया है. हालांकि अभी तक यह आंदोलन किसी बड़े राजनीतिक गठजोड़ या संगठित विपक्षी मंच का हिस्सा नहीं बना है.
*क्या सोशल मीडिया की ताकत राजनीति बदल सकती है?*
भारत में बड़े आंदोलनों का इतिहास बताता है कि केवल डिजिटल पहुंच काफी नहीं होती. अन्ना आंदोलन, निर्भया आंदोलन और किसान आंदोलन जैसे अभियानों की सफलता उनके जमीनी नेटवर्क, स्थानीय संगठनों और प्रत्यक्ष भागीदारी में थी. सोशल मीडिया ने इन आंदोलनों को गति जरूर दी, लेकिन उनकी सफलता का आधार सड़कों पर मौजूद लोग थे.
CJP के सामने भी वही चुनौती है. उसके पास विशाल डिजिटल पहुंच है, लेकिन उसे यह साबित करना होगा कि यह समर्थन वास्तविक जनभागीदारी में बदल सकता है. अगर जंतर-मंतर पर बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं, तो यह भारतीय राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत होगा कि युवा पारंपरिक राजनीतिक दलों से अलग अपनी नई राजनीतिक भाषा और नए प्रयोगों के साथ सामने आ रहे हैं.
लेकिन यदि प्रदर्शन उम्मीद से कमजोर रहता है, तो आलोचक इसे सोशल मीडिया के क्षणिक उत्साह का उदाहरण बताने से नहीं चूकेंगे.
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