Friday, April 30, 2021

सरदाना का जाना।

वो चमकता चेहरा, वो तीखे बोल।
जियो तो ऐसे जियो कि जाने पर ज़माना याद रखे।
याद आओगे सरदाना।

सरदाना की मौत पत्रकारिता की चकाचौंध के पीछे छिपे असली चेहरे को एकबार फिर से याद दिलाने के लिए काफ़ी है।


आजतक के पत्रकार रोहित सरदाना की मृत्यु की खबर आई।
यह खबर मेरे लिए उतना ही दुख देने वाली थी जितना दुख आजकल कोरोना से रोज़ हो रही तीन-चार हज़ार मौतें देती हैं।

ज़ाहिर है सरदाना पत्रकार उम्दा रहे होंगे इसलिए आजतक जैसे समाचार संस्थान में थे। अपने लगभग बीस साल के पत्रकारिता कैरियर में उन्होंने जितना नाम कमाया उसकी लिए बाकियों को अस्सी साल भी लग सकते हैं।

सरदाना 41 साल के थे, दूसरी लहर युवाओं को अपनी चपेट में ज्यादा ले रही है।
 क्या हमारे डॉक्टर इलाज में कहीं न कहीं चूक रहे हैं या सीमित संसाधन होने पर उन पर दबाव इतना अधिक हो गया है कि वह मरीज़ों पर चाहकर भी ध्यान नही दे पा रहे हैं।
रवीश कुमार ने देश में एक कमांड रूम बनाने की बात कही है जो देश भर के डॉक्टरों द्वारा कोरोना में दिए गए इलाज पर अध्ययन करे और कहां चूक हो रही है इसका पता लगाए।

प्रेस सुधार न होने की वज़ह से आज भारतीय मीडिया कुछ शक्तिशाली संस्थानों तक ही सिमट गई है, शायद छोटे मीडिया संस्थान अपना वजूद मिटाने का आरोप मुझ पर लगाएं पर वास्तविकता यही है कि लोग अब भी सोशल मीडिया पर मोटा पैसा देकर प्रमोट किए जा रहे इन्हीं संस्थानों की ख़बरों को ज्यादा देखते हैं और उन्हीं पर ज्यादा विश्वास करते हैं, लिहाज़ा सरदाना के जाने की ख़बर को बड़ा बनना ही था जबकि भारत में पिछले 28 दिनों के अंदर ही मरे अन्य 52 पत्रकारों के हमें नाम तक नही पता हैं ।

सरदाना की मौत की ख़बर फ़ैलते ही देश के बड़े-बड़े नेताओं ने ट्वीट कर उनकी मौत पर दुख जताया, मैंने जब सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के ट्विटर अकाउंट की ओर रुख किया तो वहां इस तरह का कोई ट्वीट नही था। 


एकाउंट पर महामारी की इस स्थिति में भी सरकार का बचाव करते हुए कोरोना की तीसरी लहर सम्बंधित ख़बर के फेक होने पर पीआइबी के एक ट्वीट को रीट्वीट जरूर किया गया था।


आजतक पर भी सरदाना की मौत की ख़बर देर से चलाने का आरोप लगा। मौत की खबर की सूचना देने का समय हर किसी के लिए बहुत मुश्किल काम होता है इस पर सवाल उठाना गलत है।

समाज में अपने प्रभाव को लेकर पिछले कुछ समय से मिडिया शक के घेरे में रही है।
सुशांत की मौत पर मीडिया के स्टूडियो खुद न्यायालय में तब्दील हो गए थे। पुलवामा हमले और अर्नब के सम्बन्धों पर खूब चर्चा हुई थी जिसे अब ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।
जमातियों को इन्हीं समाचारों ने पूरे देश में खलनायक के रूप में पेश किया जिससे एक धर्मविशेष के लिए लोगों के मन में नफ़रत पैदा हुई थी, यह वह पत्रकारिता थी जिसने लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ बनने के जगह बाकि तीन स्तम्भों को गिराने में कोई कसर नही छोड़ी थी।
किसान आंदोलन में कुछ मिडिया घरानों की इन्हीं करतूतों की वज़ह से पत्रकारों को आंदोलनकारियों का गुस्सा झेलना पड़ा।

आज जब सरदाना के जाने की ख़बर आजतक पर चलाई गई तो दृश्य कुछ इस तरह से थे।

ऊपर आजतक में रोहित की मौत की ख़बर सुनाते वक्त रोते एंकर, नीचे आईबीसी24 में अपने पति की मौत की ख़बर सुनाती सुरप्रीत

कोरोना महामारी की वजह से बने निराशा के इस दौर में जहां सकारात्मक ख़बर चलाने की मांग हो रही है वहीं आजतक की यह एंकर कैमरे के सामने फूट-फूट कर रो रही थी। 
पत्रकारिता की कक्षा में बैठा सबसे पिछड़ा छात्र भी यह बता सकता है कि यह सब पत्रकारिता के मूल्यों के खिलाफ था। 
एक राष्ट्रीय समाचार चैनल में ख़बर सामने रखने का शायद यह सही तरीका नही था। 

 इन तस्वीरों को देख मुझे 2018 में अपने पति की मौत से जुड़ा समाचार पढ़ने वाली आईबीसी24 चैनल की पत्रकार सुरप्रीत कौर का चेहरा याद आ गया था।

सरदाना अपने पीछे पत्नी के साथ दो बच्चियों को छोड़ गए हैं, शायद इस समय बहुत से परिवार अपनों को खो रहे हैं, यह सिलसिला बहुत जल्दी रोकना होगा नही तो समाचार चैनलों के एंकरों के साथ पाठकों के खत्म होने की यह चेन घूमते रहेगी।

सोशल मीडिया पर सरदाना के बारे में बहुत सी अच्छी बुरी टिप्पड़ियां चल रही हैं, जो चला गया उसकी आत्मा की शांति के लिए हमें प्रार्थना करनी चाहिए। निजी तौर पर सरदाना क्या थे यह शायद बहुत कम लोग ही जानते होंगे और उनके काम को लेकर उन पर टिप्पणी करना गलत है क्योंकि हम सब जानते हैं संस्थानों में किसके इशारों पर काम करना पड़ता है।
उनके परिवार को अभी शांति, ढांढस और बाद में मदद चाहिए। इतना तो हम कर ही सकते हैं!










Wednesday, April 28, 2021

soulify.org.in कुछ नया करके देखो। भाग-2

मंजुल भारद्वाज ने साल 1992 में  द एक्सपेरिमेंटल थियेटर फाउंडेशन की स्थापना की थी जो थिएटर आफ रेलेवेंस के सिद्धांत पर आधारित है।
उसके 25 साल पूरे होने पर स्मृति ने अपने जन्मदिन 17 मई 2017 पर, दिल्ली के मुक्तधारा और 'अलायन्स फ्रांसौयज़' सभागृह में 'थियटर आफ रेलेवंस नाट्य उत्सव' के अंतर्गत तीन नाटकों के मंचन के आयोजन का निर्णय लिया। 
अनहद नाद- अनहर्रड साउंड्स आफ यूनिवर्स, गर्भ, न्याय के भंवर में भंवरी।
 इन तीनों नाटकों के रचयिता मंजुल भारद्वाज हैं।

इसके साथ ही मस्केरी दम्पत्ति ने 'क्रिएटर एन्विज़निंग फॉर्म' का आयोजन भी किया जहां जीवन में कुछ अलग करने की चाह रखने वाले लोग भी आएं, उसमें राजनीतिक, कला, लेखन जैसे किसी भी क्षेत्र के लोग शामिल हो सकते थे। 
इसी आयोजन के बीच सिद्धार्थ की मंजुल भारद्वाज से पुनः मुलाकात हुई।

मंजुल ने सिद्धार्थ से पूछा कि तुम्हारे जीवन जीने की दृष्टि क्या है?
सिद्धार्थ बोले कि मैंने अपनी मां को वादा किया था कि वह ऑस्कर जीतेंगे और वही उनके जीवन की सबसे बड़ी सफलता होगी।
मंजुल ने सिद्धार्थ को बताया कि आप एक लक्ष्य लेकर चल रहे हैं पर आपकी जीवन दृष्टि तो है ही नही।

26 सितम्बर 2017 को मंजुल की यह बात सुनकर सिद्धार्थ अंदर तक हिल गए और उन्हें रात भर नींद नही आई।
सुबह उठते ही उन्होंने मंजुल से कहा कि वह लोगों को कहानियां सुनकर और सुनाकर खुशियां बांटना चाहते हैं और यही उनके जीवन का दर्शन है।
मंजुल ने सिद्धार्थ से बोला कि तुमने यह सन्तों वाली बात कही है।

किस्मत सिद्धार्थ के लिए आगे के रास्ते खोल रही थी। अगले दिन उनके ऑफिस पहुंचते ही बॉबी बेदी ने उनसे कहा कि गुरुद्वारे पर फ़िल्म वाले प्रोजेक्ट के फंड रुक गए हैं और हमें यह काम रोकना होगा।
सिद्धार्थ ने ऑफिस से नीचे आकर स्मृति को फोन किया और बोला कि हमारे मन की बात हो गई है। बह्मांड हमसे जो चाहता है वह हो रहा है। ऊपर वाले ने पेड़ की डाल काट कर बोला है उड़ो और वापस इस घोसले में कभी मत आना और न ही किसी दूसरे पेड़ पर जाना।

वापस ऑफिस जाकर सिद्धार्थ ने बॉबी को धन्यवाद ईमेल लिखा। उन्होंने लिखा कि बॉबी आपने मेरे लिए जो भी किया वह मेरे पिताजी ने भी कभी मेरे लिए नही किया, उन्होंने मुझे हमेशा बचाया ही पर आपने मुझ पर विश्वास किया कि मैं उड़ सकता हूं। ऊपरवाले ने आपको मेरी उड़ान के लिए एक ज़रिया बनने के लिए चुना है। इन सब के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

दिल की आवाज़ सुनने पर हमारे आगे के रास्ते खुद ही खुलने लगते हैं वैसे ही सिद्धार्थ के साथ हुआ। प्रोजेक्ट छोड़ते ही उन्हें अपने प्रोजेक्ट्स के लिए पार्टनर मिल गए जो उनके एनिमेशन को डेवलप कर आगे बेचने के लिए तैयार थे। एक एजुकेशन कम्पनी ने उन्हें हफ़्ते में तीन दिन अपने स्टूडियो में क्रिएटिव डायरेक्शन और ट्रेनिंग देने के लिए अस्सी हज़ार रुपए ऑफर किए।

    नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ डिज़ाइन अहमदाबाद के                           छात्र और सिद्धार्थ

नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ डिज़ाइन अहमदाबाद ने अपने छात्रों को थ्री डी एनिमेशन के ज़रिए कहानी सुनाने के लिए सिद्धार्थ को अहमदाबाद बुलाया। मस्केरी परिवार जनवरी 2018 को अपनी कार में Soulify का बैनर लगा कर दिल्ली से अहमदाबाद चल दिया।
सिद्धार्थ के नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ डिज़ाइन अहमदाबाद के सफ़र पर  एक किताब 'आई एम पॉसिबल' भी छपी है।


इस यात्रा के बाद वह लोग दिल्ली में अपने घर पर हर रविवार Soulify- Creators connect नाम से कहानी सुनने सुनाने का एक सत्र रखने लगे।

इसके बाद Soulify परिवार ने पूरी धरती को ही अपना घर मानते हुए पूरी दुनिया में अपनी कहानी सुनने सुनाने और खुशियां बांटने का निर्णय लिया।

soulify.org.in के द्वारा यह परिवार कहानी कहने के माध्यम से लोगों को उनके अपने दिल की आवाज़ तक पहुंचाते हैं। 
इसमें वह 'थिएटर आफ रेलेवंस' की प्रकिया द्वारा लोगों के मुखोटे को उतार जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। यह वही मुखोटा होता है जो उन्होंने समाज के सामने खुद को भुलने के बाद लगाया होता है।
इस प्रक्रिया में सहभागी खुद के सृजनात्मक, रचनात्मक और कलात्मक अभिव्यक्तियों द्वारा अपने आयामों को गढ़ने की दृष्टि निर्माण करते हैं।
जैसे जो लोग सालों से शारीरिक जड़ता में हैं , स्वाभाविक है कि वह मानसिक और भावनात्मक तनाव से जूझ रहे हों। उन्हें नाट्यशाला द्वारा अपनी जड़ता को आत्मचेतना की ओर बढ़ने की संभावनाओं से मुलाकात करवाई जाती है।
सहभागी नाचना, गाना, लिखना, नाटक का मंचन करने के आनंद में बखूबी खुद को निखारते हैं। नाटक का मुख्य उद्देश्य रूढ़िवादिता तोड़ जीवन को खुल कर जीना होता है।

प्रकृति से हमारे रिश्तों के बारे में बात की जाती है जैसे प्रकृति में सब बराबर हैं और उससे छेड़छाड़ करने का परिणाम हम सब भुगतेंगे।
स्मृति नाटकों के माध्यम से मनुष्य के व्यवहार में परिवर्तन लाने के साथ उनके दिलों की दबी आवाज़ को बाहर निकालती हैं।
सिद्धार्थ अपने फ़िल्म लेखन के अनुभवों का प्रयोग करते हैं। वह लोगों को यह बताते हैं कि कहानी कैसे लिखी जाती है। उनका मानना है कि हर किसी में कोई न कोई गुण अवश्य होते हैं जो वह किसी और के साथ बांट सकता है।

कहानी लिखने के तरीके को समझाने के लिए सिद्धार्थ ने 'कहानी के सात रंग' नाम से एक टूल बनाया है।
जिसके अनुसार कहानी वह होती है जो लोगों को प्रभावित करे, यह कोई घटना हो सकती है जो लिखने वाले का अपना अनुभव होगा। लोग कहानी के पात्रों से प्रभावित होंगे जिसकी अपनी सीमाएं भी होंगी।  कहानी में उतार चढ़ाव होने चाहिए।
कहानी का नायक जब कोई सपना देखता है तभी कहानी बननी शुरू होती है।
हम हमेशा कहानी के खलनायक से नफ़रत करते हैं और खुद को एक पीड़ित के रूप में देखते हैं जबकि हमें उस खलनायक को धन्यवाद कहना चाहिए कि उसकी वज़ह से हमने खुद को समझा और मज़बूत किया। 
हम भी किसी की कहानी में खलनायक हो सकते हैं जो कहीं न कहीं उसका रास्ता रोक रहे होते हैं।

यह प्रक्रिया खलनायकों के प्रति प्रतिभागियों के दिल में करुणा की भावना पैदा करती है।

'कहानी के सात रंग' मुख्य रूप से हमारा जीवन जीने का तरीका ही है। नायक की कहानी उसके वातावरण और उसको मिलने वाले सहयोग के अनुसार अलग-अलग हो जाती हैं। अगर हम अपने जीवन के सभी रंगों को समझ लें तो खुद को भी समझ जाएंगे।

अद्वैत भी soulify.org.in में अहम भूमिका निभाते हैं। मस्केरी दम्पत्ति के इस सफर में जब कुछ बातें जटिल हो जाती हैं तो अद्वैत के पास उनका सीधा और सरल रास्ता होता है। अद्वैत की रुचि एरोनॉटिक्स में है जिसके लिए उन्होंने मात्र ग्यारह वर्ष की उम्र में 'एम्बरी रिडल एरोनॉटिकल यूनिवर्सिटी अमरीका' से ऑनलाइन कोर्स भी कर लिया है।

Soulify परिवार की यह यात्रा गांधी जी की किताब 'एक्सपेरिमेंट विद ट्रुथ' से बहुत अधिक प्रभावित है जिसमें वह गांधी जी की तरह ही आत्म-जागरूकता विकसित करने के लिए प्रयोग करते जा रहे हैं।

अपने इस सफ़र में मस्केरी दम्पति ने अब तक बहुत कुछ सीखा और सिखाया है।

                    रामगढ़ में कार्यशाला

उन्होंने अरबिंदो आश्रम स्कूल, नई दिल्ली में बच्चों के साथ वोकेशनल ट्रेनिंग में थिएटर का आयोजन किया।

 उत्तराखंड स्थित रामगढ़ के एक विद्यालय में अपनी कार्यशाला आयोजित करने के बाद सिद्धार्थ ने उस पर 'हमारा रामगढ़' नाम से एक किताब भी लिखी है।



उन्होंने मेघालय स्थित 'बेथानी सोसाइटी' में अपने मिशन को साझा किया और तिरना गांव में कार्यशाला आयोजित की। बेथानी सोसाइटी शिक्षा और पर्यावरण के अनुकूल आजीविका के माध्यम से दिव्यांगों के लिए अवसर पैदा करती है।

Soulify परिवार अपनी इस यात्रा के दौरान 'पीपल्स एक्शन ग्रुप फ़ॉर इंक्लूशन एंड राइट्स' पागीर से भी मिला। पागीर लद्दाख में दिव्यांग जनों के अधिकारों की वकालत करता है।

लद्दाख में ही Soulify परिवार की मुलाकात सोनम वांगचुक से हुई। सोनम एक इंजीनियर, अन्वेषक और शिक्षा सुधारक हैं, वह साल 1988 में बने स्टूडेंट्स एजुकेशनल एन्ड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (सेकमोल) के संस्थापक निदेशक भी हैं। सेकमोल की स्थापना लद्दाख के शिक्षा तंत्र में सुधार लाने के लिए की गई थी। सेकमोल में भी Soulify की कथाकारिता पर कार्यशाला का आयोजन हुआ।

सेकमोल से ही निकले स्टांज़िन दोरज़ाई से मिलकर भी मस्केरी परिवार को काफ़ी कुछ सीखने और समझने का मौका मिला।
स्टांज़िन अपनी वृतचित्र 'द शिफ़र्ड्स ऑफ द ग्लेशियर' के लिए कई राष्ट्रीय,अंतरराष्ट्रीय अवॉर्ड जीत चुके हैं

लेह की जेल में भी Soulify ने कैदियों के साथ एक कार्यशाला का आयोजन किया था।

               लेह जेल में मस्केरी दम्पति

वह अपने आप में अनोखी राजस्थान की मशहूर 'स्वराज यूनिवर्सिटी' भी गए, यह यूनिवर्सिटी आत्म निर्देशन में सीखने पर ज़ोर देती है।
वहां उन्होंने अपनी कार्यशाला का आयोजन किया।

इस यात्रा की शुरुआत करने के लिए मस्केरी परिवार ने अपनी आर्थिक जरूरतों को कम किया। पुणे का अपना एक फ़्लैट बेच अस्सी प्रतिशत लोन खत्म किया और दूसरे फ़्लैट के दस हज़ार किराए से उनका काम चल जाता है। उनके हर पड़ाव पर कोई अगर उनके रहने, खाने और गाड़ी के तेल का ख़र्च देना चाहता है तो वह खुशी से उसे रख लेते हैं।

देश के अलग-अलग कोनों पर जाने पर इस परिवार को हर जगह अलग मौसम भी मिलता है जिसकी वजह से इनका स्वास्थ्य भी खराब रहता था पर अब वह बदलते मौसम की आदत और अपने खान-पान में सुखद बदलाव ला रहे हैं।

            देहरादून में Soulify परिवार

 soulify.org.in के सफर में मेरी मुलाकात इस अद्भुत दम्पत्ति से देहरादून में हुई थी और अब कोरोना की इस दूसरी लहर में यह परिवार जयप्रकाश नारायण के सहयोगी और सर्वोदय के अध्यक्ष रहे वरिष्ठ गांधीवादी अमरनाथ भाई के साथ हिमाचल प्रदेश के पालमपुर नगर में हैं और वहां दिन भर खेती करने के बाद रात सुकून से सोते हुए भी उनका सफर दुनिया को खोजते हुए चलता जा रहा है।

ऐसे नाटक देखने और कहानी सुनने से अपने भविष्य की उम्मीदें खो चुके अनाथ बच्चों, जेल में बंद कैदियों और कोरोना की वजह से अवसाद में जी रहे लोगों के चेहरे पर मुस्कान और अपने भविष्य को लेकर सकारात्मकता तो आ ही सकती है।

हिमांशु जोशी, उत्तराखंड
मोबाइल- 9720897941

Tuesday, April 27, 2021

soulify.org.in कुछ नया करके देखो। भाग-1

दुनिया में हर किसी का मुख्यतः एक ही सपना होता है। पैदा होने के बाद पारम्परिक शिक्षा ग्रहण करते हुए बड़ा होना और फिर अच्छी नौकरी प्राप्त कर समाज में यश प्राप्ति करते हुए आगे बढ़ना। अंत में अपने परिवार के लिए बहुत सा धन छोड़ इस दुनिया से चले जाना।

क्या हम अपने ही समाज के बने इसी ढांचे पर ढल गए हैं जहां उपभोक्ता संस्कृति ही जीवन में सफलता का पैमाना है। हम मीडिया के माध्यम से समाज के सबसे अमीर लोगों को देख उनके जैसा बनने के सपने बुनते-बुनते अपना जीवन निकाल देते हैं और हम जो वास्तव में हैं उसे कहीं खो देते हैं।

Soulify.org.in यह सिर्फ़ खुद को खोजने वाली वाली वेबसाइट नही है, यह कहानी है ऐसे परिवार की जिसने खुद को समझा और अपना एक अलग रास्ता चुना।

                           Soulify दम्पति

स्मृति राज का जन्म पटना निवासी जयंत प्रसाद साह और कंचन माला के घर में हुआ। पेशे से इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर जयंत प्रसाद ने अपनी बेटी को बचपन से ही कॉन्वेंट स्कूल में शिक्षा दी जिसकी वजह से स्मृति ने बचपन से ही बड़े सपने देखने शुरू कर दिए थे। यही सपने बड़े होने पर उन्हें मुंबई खींच कर ले गए।

वहीं सिद्धार्थ मस्केरी का जन्म मुंबई में ही हुआ था और उनके पिता प्रमोद मस्केरी बैंक ऑफ इंडिया में और माता शर्दिनी 'किंग एडवर्ड मेमोरियल हॉस्पिटल एल्फिंस्टोन, मुंबई' की एक पुरस्कार विजेता नर्स थी। सिद्धार्थ का बचपन अपने पिता की नौकरी की वजह से लंदन और हांगकांग जैसे शहरों में गुजरा फिर वापस उनका परिवार मुंबई आ गया।

सिद्धार्थ को शुरू से ही कहानी लिखना पसन्द था पर उनके माता-पिता को यह पसन्द नही था इसलिए सिद्धार्थ ने पढ़ाई के लिए माइक्रोबायोलॉजी को चुना पर वह खुद ही एनिमेशन सीखने लगे और उसे पढ़ाते भी थे।
स्मृति ने भी ग्राफिक डिजाइन की पढ़ाई के लिए मुंबई स्थित सी-डैक को चुना।

        सी-डैक मुुंबई (फ़ोटो साभार सी-डैक वेबसाइट)

इस बीच ही सिद्धार्थ और स्मृति की एक पारस्परिक मित्र ने स्मृति का परिचय सिद्धार्थ से कराया ताकि खुद से एनिमेशन सीख और पढ़ा रहे सिद्धार्थ से स्मृति कुछ नया सीख सके।

इस बीच सिद्धार्थ सी-डैक में पढ़ाने लगे और स्मृति वेब डिजाइनिंग का काम करने लगी।
स्मृति और सिद्धार्थ उत्साही स्वभाव के थे और हमेशा ही कुछ नया करना चाहते थे। किसी जगह नौकरी के बजाए इन दोनों को उद्यमिता पर ज्यादा भरोसा था। अपनी इसी समानता की वज़ह से दोनो करीब आते गए और लिव इन रिलेशनशिप में रहने लगे।

स्मृति के घरवाले इस रिश्ते के खिलाफ नही थे पर सिद्धार्थ के घर में उस समय मुंबई में मीडिया द्वारा बिहारियों को लेकर बनाई गई नकारात्मक छवि की वजह से इस रिश्ते को लेकर डर था। साल 2002 में अपनी माँ की मृत्यु के बाद 2003 में सिद्धार्थ दिवाली के दौरान जनरल टिकट पर स्मृति के घरवालों से मिलने मुंबई से बिहार पहुंचे थे।


         विश्व समाजिक मंच मुंबई 2004- फ़ोटो साभार                                   yachana.org

स्मृति हमेशा से यह सोचती थी कि हम उपभोगवादी समाज में रहते हैं और हमेशा अपना फायदा-नुकसान देखते रहते हैं। समाज में महंगे ब्रांडेड कपड़े पहनना, अच्छा खाना खाते दूसरे को दिखाना, हम सब समाज में प्रतिष्ठा पाने के लिए यह कार्य क्यों करते हैं। कभी-कभी उन्हें लगता था कि वह गलत हैं और समाज सही है।
विश्व सामाजिक मंच में जाकर उन्हें लगा कि वह सही हैं और उनकी सोच की तरह सोचने वाले दुनिया में और लोग भी हैं।
वहां उनकी मुलाकात मंजुल भारद्वाज से हुई। “थिएटर ऑफ रेलेवेंस” नाट्य सिद्धांत के सर्जक व प्रयोगकर्त्ता मंजुल भारद्वाज वह थिएटर शख्सियत हैं, जो राष्ट्रीय चुनौतियों को न सिर्फ स्वीकार करते हैं, बल्कि अपने रंग विचार “थिएटर आफ रेलेवेंस” के माध्यम से वह राष्ट्रीय एजेंडा भी तय करते हैं। स्मृति ने वहां मंजुल के चाइल्ड थियेटर वर्कशॉप को देखा, यह उनके लिए कुछ नया सीखने और खुद को खोजने का अवसर था।

स्मृति सोचती थी कि हम जो शिक्षा अपने बच्चों को दे रहे हैं उसमें व्यक्तित्व निर्माण की जगह कहां है। 

हमारे बच्चे ऐसे बच्चों के साथ क्यों बड़े नही होते जो आम बच्चों से अलग हैं। क्यों ऐसे बच्चे जो चल नही सकते , देख नही सकते उन्हें और आम बच्चों को बचपन से ही अलग- अलग रखा जाता है, उन्हें समाज क्यों छुपाने की कोशिश करता है।

स्मृति ने कमाठीपुरा में नाटक का मंचन किया जहां एड्स जैसी गम्भीर बीमारी से ग्रस्त बच्चे रहते हैं। उन्होंने 'पॉपुलेशन फर्स्ट' नाम की संस्था द्वारा कन्या भ्रूण हत्या पर चलाई जा रही मुहिम के अंतर्गत मुंबई के मशहुर 'टाटा थियेटर' पर नाटक का मंचन किया।
जैसे गांधी जी ने राजा हरिश्चंद्र का नाटक देख कर सत्य और अहिंसा पर चलने की प्रेरणा ली थी, ठीक वैसे ही स्मृति भी अपने नाटकों के माध्यम से अपने दिखावे के मुखोटे उतार लोगों को प्रेरणा देना चाहती थी।

यह नाटक का काम चल तो रहा था पर इससे आजीविका नही होती थी और घरवालों के दबाब में फिर स्मृति ने एडवरटाइजिंग, पब्लिकेशन का काम किया और मुंबई की तेज़ रफ़्तार जिंदगी में खो गई।

धीरे- धीरे उन्हें यह महसूस होने लगा कि वह फिर मुखोटे में जीने लगी हैं और खुद से ज्यादा झूठ नही बोल सकती।

इस बीच सिद्धार्थ कला से जुड़े बहुत से प्रतिष्ठित संस्थानों में काम कर रहे थे। वह बॉलीवुड के मशहूर फ़िल्म निर्माता और निर्देशक सुभाष घई के विश्व प्रसिद्ध फ़िल्म संस्थान 'व्हिस्टलिंग वुड्स इंटरनेशनल' में पढ़ाते थे। उन्होंने मुंबई के ऐतिहासिक फ़ेमस स्टूडियो और वैभव स्टूडियो के साथ भी काम किया।
 वह बॉलीवुड फ़िल्म 'तारे ज़मीन पर' और 'मस्ती एक्सप्रेस' के साथ जुड़े थे।
 उनकी एनिमेटेड सीरीज़ 'एनको द एस्किमो- ए किड्स' कार्टून नेटवर्क यूएसए के बैनर तले निर्माणाधीन है। जिसमें वह 'एमी' मनोनीत लेखक माइक ब्लम के साथ सह निर्माता हैं।
उन्हें साल 2012 में अपनी कहानी 'द पिकल कार एडवेंचर' को 'एनेसी फेस्टिवल'
में साझा करने के लिए फ्रेंच एम्बेसी द्वारा प्रायोजित किया गया था।

सिद्धार्थ को पटना स्थित बिहार संग्रहालय बनाने वाली टीम में भी जगह मिली।  यह संग्रहालय पूरी दुनिया में भारतीय कला के सबसे समृद्ध संग्रह में से एक के विश्व स्तरीय प्रदर्शन का अनुभव करने के लिए एक जगह है।

स्मृति की तरह ही अच्छी जगह काम करने और ऊंचा वेतन पाने के बाद भी सिद्धार्थ अपनी नौकरियों से संतुष्ट नही थे क्योंकि उनका सपना अपनी कहानी पर काम करने का था।

दिसम्बर 2006 में स्मृति की नानी के मंत्रों के बीच दोनों की कोर्ट में शादी हुई और सिद्धार्थ के पिता की जिद पर बाद में मुंबई में ही शादी का रिसेप्शन दिया गया।

                        स्मृति और अद्वैत

6 अगस्त 2009 में स्मृति और सिद्धार्थ के पुत्र अद्वैत का जन्म हुआ। यहां से यह दम्पति सोचने लगा कि उन्हें अपने बेटे की छवि एक लड़के और लड़की से दूर एक इंसान के रूप में बनानी है। उन दोनों में अब राजनीतिक और सामाजिक सोच की जगह आध्यात्मिक सोच बढ़ने लगी।

मस्केरी दम्पत्ति ने अद्वैत को 'वाल्डोर्फ प्रणाली' की शिक्षा प्रदान करने का निर्णय लिया। यहां पर स्मृति का थिएटर वाला अनुभव काम कर रहा था। उन्हें यह लगता था कि जब बच्चा बड़ा होने लगता है तो हम उसे जबर्दस्ती पेन पकड़ा देते हैं और हम उसके विकास के अनुक्रम को जबर्दस्ती प्रभावित करने लगते हैं।
वाल्डोर्फ प्रणाली के जनक रुडोल्फ स्टीनर का मानना ​​था कि बच्चों के विकास में कुत्रिम रूप से तेजी लाने की आवश्यकता नही है, बच्चे को नया कौशल सीखने के लिए समय चाहिए।
 
अद्वैत ने मुंबई के प्रतिष्ठित इनोदय और कैम्ब्रिज स्कूलों में अपनी शिक्षा ग्रहण की पर इस बीच उसका स्वास्थ्य भी ख़राब रहने लगा। मस्केरी दम्पत्ति को यह लगने लगा था कि हर स्कूली संस्थान का उद्देश्य मुनाफ़ा कमाना ही होता है। 
स्कूलों से यह बोला जाता कि आपका बच्चा पिछड़ रहा है पर वह अद्वैत को स्कूलों के मानदंडों पर नही तोलते थे। वह इस बात को लेकर जागरूक थे कि अद्वैत की समझ घर में ही शिक्षा देने पर कितनी विकसित हो रही है। वह अद्वैत की किसी भी इच्छा को दबाते नही थे, वह चाहता तो कमीज़ के बटन लगाता था, बर्तन धोता था, कपड़े समेटता, सब्जी काटता और छह साल का होते किचन के सारे काम करने लगा था। मस्केरी दम्पत्ति अद्वैत पर प्रयोग करते हुए उसे खुद को खोजने का अवसर दे रहे थे।
मस्केरी दम्पत्ति अद्वैत को किसी स्कूल में न भेजकर घर पर ही पढ़ाना चाहते थे पर अपने परिवारों के दबाव की वज़ह से ऐसा नही कर पाते थे।

साल 2017 में मस्केरी दम्पत्ति दिल्ली के साकेत स्थित एक पॉश इलाके में शिफ्ट हो गए। सिद्धार्थ दिल्ली में बैंडिट क्वीन, मकबूल जैसी मशहूर फिल्मों के निर्देशक बॉबी बेदी के गुरुद्वारे से जुड़े एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे।

यह समय मस्केरी दम्पत्ति के जीवन का सबसे बुरा समय था। उनको लगने लगा था कि वह एक मशीन की तरह जीवन जी रहे हैं, अद्वैत का काम करने एक बाई घर आती थी जो उसे सुबह स्कूल भेजती और फिर वह वापस लौटने पर गृहकार्य में ही व्यस्त रहता। वह दोनों सुबह ही अपने काम पर निकल जाते थे। दिन भर एक दूसरे से दूर रह उनके बीच परिवार जैसा कुछ नही था।
 इस वजह से उन्हें एक घुटन सी महसूस होने लगी थी और उनके वैवाहिक जीवन में भी तनाव आने लगा था। 

यह पूरी प्रक्रिया वर्तमान में हर परिवार के साथ होती है, हर दम्पत्ति का अब मशीनी जीवन हो गया है जहां भावनाओं के लिए कोई जगह नही रह जाती पर मस्केरी दम्पत्ति ने इसे समझा और वह उस चक्र से अलग हटना चाहते थे जहां पूरी दुनिया जीने लगी है, जिसमें पैदा होना, पढ़ना, डिग्री लेना, बच्चे पैदा करना ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। उन्होंने निर्णय लिया कि वह इस चक्र को तोड़ेंगे।

मस्केरी दम्पत्ति ने इसके लिए एक प्रयोग किया और अपने घर के एक कमरे को समुदाय के लिए खोल दिया। वह कमरा उन्होंने एक मंच के रूप में ऐसे लोगों के लिए खोल दिया जो अपना हुनर दूसरों के साथ बांटना चाहते थे। ऐसे लोगों में रचनात्मक प्रकार के लोग होते थे जिसमें बड़े और बूढ़े सब समान थे क्योंकि सीखने की कोई उम्र नही होती।

मस्केरी दम्पति के दिल्ली स्थित घर में Soulify की कार्यशाला

जैसे हम अपने कमरे को किराए पर देने के लिए ओएलएक्स जैसी वेबसाइट का प्रयोग करते हैं वैसे ही मस्केरी दम्पति ने अपना कमरा निःस्वार्थ भाव से जरूरतमन्दों की मदद के लिए बनाए गए एक फेसबुक पेज दरिया दिल की दुकान पर साझा किया था।

अब उनके इस कमरे पर नए नए प्रयोग होने लगे थे। वहां डॉक्टर, इंजीनियर, बैंकिंग, लेखन हर क्षेत्र से जुड़े लोग अपने अनुभव साझा करने आने लगे।

बॉबी बेदी के गुरुद्वारे वाले प्रोजेक्ट पर काम करते हुए सिद्धार्थ ने गुरुनानक देव जी के बारे में समझा कि उन्होंने घूम-घूम कर कैसे ज्ञान अर्जित किया और उस ज्ञान को वह कैसे लोगों के बीच बांटते चले गए।

 मस्केरी दम्पति को अब खुद को समझने का मौका मिला कि उनकी भाषा कितनी मशीनी हो गई है वह सिर्फ अपने काम में इस्तेमाल होने वाली भाषा बोलते हैं जिसमें न दिल को छूने वाली गर्माहट होती है और न ही रिश्तों को बांधने वाली कोई डोर। 

उन्हें दुनिया की सच्चाई को समझने का मौका मिला कि हम सब उपभोगता वाद के पीछे अंधे होकर भाग रहे हैं। जो जितना ज्यादा पैसा, बड़ा घर, महंगे सामान जोड़ेगा समाज और उसके खुद के परिवार में उसकी उतनी ही अधिक इज्ज़त होगी।

सिद्धार्थ ने पच्चीस सौ रुपए महीने से कमाना शुरू किया और उस समय वह डेढ़ लाख रुपए महीना कमा रहे थे पर लोन, घर के खर्चे पर सारा कमाया चला जाता था, उन्हें ऐसा लगता था कि वह शीशम के बेड पर लेटे तो हैं पर वहां उन्हें नींद नही है।

अपनी पहली कार्यशाला के लिए अहमदाबाद निकलता मस्केरी परिवार

अब उन्होंने निर्णय लिया कि वह अब अपने दिल की सुनेंगे और यहीं से Soulify.org.in की नींव पड़ी।

हिमांशु जोशी, उत्तराखंड।
मोबाइल-9720897941

Thursday, April 22, 2021

कोरोना के सत्रह महीने।

एक अंजानी बीमारी।

जनवरी 2020 से कवारन्टीन, सेनेटाइजर, लॉकडाउन जैसे कुछ शब्द हमारी आम बोलचाल की भाषा में शामिल हो गए। शायद इनको अपनी जिंदगी में कोई भी नही घोलना चाहता था। विदेशी बीमारी पर पहले हम भारतीयों ने बहुत से मीम्स बनाए। इसे अमीरों की बीमारी का दर्जा दिया गया। धीरे-धीरे यह महामारी भारत में पैर पसारने लगी। मार्च में प्रधानमंत्री ने टीवी पर आकर सम्पूर्ण भारत में लॉकडाउन की घोषणा कर दी।
बिना सोचे समझे और परिणाम की परवाह किए लगाए गए इस लॉकडाउन की वज़ह से हर दिन दो वक्त की रोटी का जुगाड़ कर जीने वाला आधा भारत अपना भविष्य अंधेरे में देख सड़कों पर आ गया।
अप्रैल, मई, जून आते आते यह बीमारी बड़े-बड़े शहरों से घर लौट रहे कोरोना पॉजिटिव मरीज़ों से भारत के गांवों में भी पहुंच गई।
लॉकडाउन की वज़ह से छात्रों की पढ़ाई लिखाई चौपट होने लगी।

अपनी कमाई का जरिया बंद होते देख शिक्षा माफियाओं ने ऑनलाइन शिक्षा का नया पैंतरा अपनाया। ऑनलाइन पढ़ाई के नाम पर स्कूली छात्रों के अभिवावकों से स्कूल, कॉलेजों द्वारा मोटी फ़ीस वसूलने का क्रम जारी रहा।
 नेताओं के साथ मिल इन शिक्षा माफियाओं ने इसके खिलाफ़ उठ रही विरोध की आवाज़ दबा दी।
ऑनलाइन सिक्षा इतनी कारगर है तो सरकार को अनएकेडमी, बॉयज़ू और युट्यूब को भी शिक्षा संस्थानों का दर्जा दे देना चाहिए। 
आईआईएमसी, आईआईटी, दिल्ली यूनिवर्सिटी संस्थानों में भौतिक रूप से मौजूद रहने से जो शैक्षिक माहौल बनता है उससे ही इन संस्थाओं का वजूद है।

रोज़गार ख़त्म होने से युवाओं को निराशा घेरने लगी। एक उम्मीद थी कि हालात सुधरेंगे और इस अंधेरी रात का भी कभी अंत होगा।
सितम्बर की शुरुआत होते ही मैं भी कोरोना पॉजिटिव हो गया उस दौरान मैं अपने रोज़ के हालातों पर यह डायरी लिखता गया।

एक कोरोना मरीज़ की डायरी।

बारिश में भीग कपड़े न बदल पाना मेरे लिए इतना महंगा पड़ने वाला है यह मैंने सोचा नही था।
शाम से ही मुझे ठंड महसूस हुई और मैंने अपने पास पहले से उपलब्ध काढ़ा पिया। 

अगली सुबह मुझे हल्का बुखार महसूस हुआ पर फिर दो तीन बार काढ़ा पी वह बुखार जाता रहा।

भीगने के तीसरे दिन मेरा कोरोना टेस्ट हुआ उस समय मुझे फिर से हल्का बुखार महसूस हो रहा था पर रात वह बुखार भी उतर गया था।

दूसरे दिन आई कोरोना रिपोर्ट में मेरा नाम नही था पर अपने आसपास लगातार कोरोना पॉजिटिव मरीज़ मिलने से मेरी चिंता स्वभाविक थी।
बाद में अस्पताल से मुझे अपने कोरोना पॉजिटिव होने की सूचना मिली और मैं अब एक होटल में पहुँच चुका था जहां मुझे दस दिन संगरोध में रहना था।

नकारात्मक विचार मन में आ रहे थे पर तभी कुछ दिन पहले बॉलीवुड एक्टर पूरब कोहली से जुड़ा समाचार याद आया । 
कोरोना पॉजिटिव आने पर उन्होंने कैसे आराम पाने के लिए गुनगुने पानी का गरारा, प्लास्टिक की बोतल में गर्म पानी डाल छाती की सिकाई, भाप लेना सुझाया था। अदरक, शहद , हल्दी का काढ़ा लेने के साथ ही भरपूर आराम को उन्होंने कोरोना का तोड़ बताया था।

उस रात मैंने अपने आने वाले दिनों के लिए एक समय-तालिका तैयार की , परिवार को बताने में हिचकिचाहट थी तो अपने एक मित्र को खुद के पॉजिटिव होने की ख़बर दी और समय से रात दस बजे सो गया।

संगरोध का दूसरा दिन मोबाइल रिसीव करने में ही निकल गया। अगर कोई कोरोना से परेशान नही होगा तो वह इन फोन कॉल्स से तो अवश्य ही मर जाएगा।
एक्टर ड्वेन जॉनसन, फुटबॉलर नेमार के कोरोना पॉजिटिव होने की खबर देखी। ड्वेन जॉनसन (द रॉक) ने कोरोना को हराने के लिए अनुशासन को आवश्यक बताया है।
शायद खाना बदलने या यूं कहें राशन बदलने की वज़ह से मुझे पेट में दिक्कत महसूस हो रही है उम्मीद है दो-तीन दिन में यह ठीक हो जाएगी। शाम पांच बजे बाबा रामदेव के कोरोना से लड़ने के लिए बताए योग किए।
परिवार को खुद के कोरोना पॉजिटिव होने की जानकारी दी और यह भी दिलासा दी कि स्थिति गम्भीर नही है। परिवार को बताना जरूरी है कोरोना पॉजिटिव होना कोई अपराध नही है, मन का एक बोझ हल्का हो जाता है।
खाने का स्तर आज दूसरे दिन भी गिरा हुआ ही रहा , मैं खाने पर कभी कटाक्ष नही करता पर तनाव भरे दिनों में यह मन को उचेटता है।
छाती में आज खिचांव सा महसूस होने लगा है शायद यह कोरोना ही है , नकारात्मक विचार मन को घेरने लगे हैं पर समय-सारणी के अनुसार कार्य कर रहा हूँ।

सोने का समय नज़दीक है, सब कुछ ठीक रहा तो कल मिलते हैं और जानेंगे संगरोध में एक कोरोना रोगी का तीसरा दिन।

तीसरे दिन की सुबह अब तक कि सबसे बेहतरीन है, मैं खुद को पिछले कुछ दिनों में सबसे स्वस्थ महसूस कर रहा हूँ। एक टेस्ट के नतीज़े के परिणामस्वरूप किसी को दस से बीस दिनों के लिए संगरोध में ठूस देना कितना सही है इसका आप खुद निर्णय ले सकते हैं। अभी तक मेरा कोई दूसरा टेस्ट नही हुआ है न ही मुझे कोई दवा दी गई है। साधारण बुखार भी रोगी के शरीर में कुछ दिन रहता ही है।
अखबार में बार, पब और मेट्रो शुरू होने की खबरें छायी हुई हैं। 
यह तो तय है सरकार को चालीस लाख के करीब पहुंच चुके कोरोना मरीज़ों की ज्यादा चिंता नही है।

पहले तो विदेश से आने वाले यात्रियों को पूरे देश में फैलने देना और फिर लॉकडाउन लगा ख़ौफ़ज़दा मज़दूरों को भारत के दूरस्थ क्षेत्रों में कोरोना वाहक बना भेजना। सरकार की रणनीतियों का वास्तव में भगवान ही मालिक है।

खैर अपनी समय- सारणी के अनुसार अनुशासन में रहते हुए आगे का दिन व्यतीत करना है, उम्मीद है अब यह स्वास्थ्य भी साथ देगा।
रात थोड़ा छाती में खिंचाव महसूस हुआ पर यह कोरोना के डर से उत्पन्न भ्रम भी हो सकता है।

डॉक्टर, दवाई, इलाज क्या होता है अब तक पता नही, वो तो मैं पूरब कोहली का अनुसरण कर रहा हूं और मेरी स्थिति गम्भीर नही है नही तो बिन इलाज के दम तोड़ते कोरोना मरीजों की जो वीडियो सोशल मीडिया पर देखी थी वह लाईव देखता।
पानी की गर्म बोतल से छाती सेकने के बाद अब सोने का समय हो गया है।

दरवाज़े की घण्टी के साथ चौथे दिन सुबह मेरी नींद खुली। आज चाय भी अच्छी लगी और स्वास्थ्य भी ठीक है।
छाती में खिंचाव ही पिछले दो दिन से समस्या बना हुआ है पर यह ज्यादा गम्भीर नही है। 

सुप्रीम कोर्ट ने कुछ राज्यों की नीट और जेईई पर छह राज्यों की पुनर्विचार याचिका खारिज़ कर परीक्षा को हरी झण्डी दे दी है, शायद सब मिल कोरोना मरीज़ों का आंकड़ा जल्द से जल्द एक करोड़ पहुंचाना चाहते हैं।
यूट्यूब में कुछ वीडियो देखें जिनमें पेट के बल लेटने से अच्छी श्वसन क्रिया होगी बताया है अतः अब यह प्रयास भी शुरू करूँगा।
शाम होते होते ज्यादा बोलने में खांसी होने लगी है और थोड़ा सा काम करते ही सांस फूल जाती है। 
खाने का मन बिल्कुल नही है और कमज़ोरी हावी होने लगी है, मुझे पता है खाया नही तो फिर अस्पताल का गलूकोज लेना होगा इसलिए रात जबरदस्ती खा सो गया।

पांचवां दिन सुबह आठ बजे दरवाज़े की घण्टी से शुरू हुआ। समय- सारणी के अनुसार उठ तो नही रहा हूँ पर उसका पालन जरूर कर रहा हूँ।
छाती में खिंचाव बढ़ता ही जा रहा है पर आराम से सांस ले पा रहा हूँ। आज खाना खाने में ज्यादा परेशानी नही हुई और कुछ चीनी फिल्मों को देख कर दिन व्यतीत किया। 
बुख़ार तो पिछले कुछ दिनों से गायब ही हो गया है। शाम होते-होते खाँसना बढ़ गया था और घुटने में हुए एक छोटे से दाने ने अब भयंकर फोड़े का रूप ले लिया है। नींद आना मुश्किल काम है पर गर्म बोतल से छाती पर सिकाई ने बहुत आराम दिया।

आज कोविड सेन्टर में छठे दिन की शुरुआत खांसी के प्रकोप से होगी सोचा था पर अब तक इतनी ज्यादा परेशानी नही हुई है। समय-सारणी के अनुसार सारे कार्य कर लिए हैं और दिन के भोजन का इंतज़ार है।
शाम तक छाती में कोई खास समस्या महसूस नही हुई है और न ही ज्यादा खांसी।
देश के लिए कोरोना, भारत- चीन सीमा विवाद, कश्मीर, बेरोज़गारी से ज्यादा कंगना, सुशांत विवाद ज्यादा महत्वपूर्ण है। मीडिया वही दिखाता है जो आप देखना चाहते हैं। सरकार वही करती है जिससे उसका नाम हो नही तो जो सुरक्षा कंगना को दी गई है वह उन्नाव रेप पीड़िता को मिलती तो उसकी जान न जाती।

दर्शकों की रुचि सुशांत विवाद में है इसलिए अर्नब जैसे पत्रकार अपना चैनल खोल आज देश के सर्वश्रेष्ठ पत्रकारों में शामिल हो गए हैं और रवीश दर्शकों की गाली खाते रह गए।
आज तीन दिन बाद सोने से पहले का सूरतेहाल लिख पाने में समर्थ हूं नही तो किसी तरह सांस चलते आंख लग जाए और अगली सुबह हो जाए सोचता था।
आज छाती में संक्रमण कम हुआ है जान पड़ता है और यहां का खाना तो किसी को एक महीने में कुपोषण का शिकार बना दे, पौष्टिक तत्व तो हैं पर जीभ में कोई स्वाद तो आए। 
खुद बनाए ऑमलेट से दो रोटी तोड़ पाया। 

कल सातवां दिन शायद मुझे बिल्कुल चंगा कर देगा, उसके लिए मुझे अब सोना होगा।
उम्मीद है सब ठीक रहेगा।

सांतवा दिन सुबह से ही मारे भूख मेरा हाल बुरा होने लगा था। अब यह खाना मेरे लिए मुसीबत बन गया है।जैसा भी स्वाद है अब मुझे यह खाना जबर्दस्ती खाना होगा। 
खांसी की समस्या आज भी थोड़ी बहुत बनी हुई है पर यह गम्भीर नही है। अपने बनाए नियमों का पालन करना है।
पिछले तीन साल से मुझे हर साल एक महीने से ज्यादा खांसी हो रही है यह उससे कम है।
 मुझे नही पता कि सिर्फ खांसी तक सीमित मैं वास्तव में कोरोना संक्रमित हूं भी या नही क्योंकि मेरा सिर्फ एक बार टेस्ट हुआ वह भी तब जब मुझे भीग कर बुखार आया था, न मुझे ज़ुकाम हुआ, न मेरी सूंघने की क्षमता कम हुई और न ही कभी मेरी जिह्वा ने किसी चीज़ का स्वाद लेने से मना किया।
खैर कोविड सेंटर में सांतवां दिन भी समाप्त हुआ।

आज कोरोना सेंटर में आंठवा दिन है सुबह हल्की खांसी बनी हुई है पर सांस लेने में कोई दिक्कत नही है। टेस्ट से पहले जब मुझे बुखार आया था वह दिन बीते आज दस दिन हो गए हैं।
पूरे दिन अपनी बनाई समय सारणी के अनुसार चला और आज लम्बी सांस खींचने पर भी छाती में कोई ज़ोर नही पड़ रहा। आज यहां के बेस्वाद खाने में भी मैंने तीन रोटियां खाई।

कल कोविड सेंटर में मेरा नवां दिन होगा और कोरोना टेस्ट हुए दसवां। कोरोना संक्रमित होने के बाद बुखार आए हुए ग्यारवां। नियमानुसार टेस्ट से दसवें दिन कोविड सेंटर से छुट्टी मिल जा रही है और फिर कुछ दिन गृह संगरोध है। 

शायद अब मैं किसी को संक्रमित नही करूँगा पर कोरोना मेरे शरीर से तो चला गया लोगों के दिमाग से नही। अपने भी कोरोना मरीज़ को बुरी नज़र से देख रहे हैं जबकि आप किसी कोरोना मरीज़ का दूर से तो सामना तो कर ही सकते हैं। क्या मैं अछूत हूँ? क्या मैं ऐसे रोग से ग्रसित हूँ जो असाध्य है? 
शायद यह आलेख पूरे देश में लोगों की कोरोना मरीज़ के प्रति भावना को बदलेगा और लोगों को इससे लड़ने की हिम्मत देगा क्योंकि संख्या लगातार बढ़ ही रही है।

कल मिलते हैं और समाज से बहिष्कृत एक कोरोना मरीज़ की कहानी आप तक लगातार पहुँचेगी।
 शुभ रात्रि।

कोविड सेंटर में नवें दिन की शुरुआत कोविड सेंटर से आज़ादी के फरमान के साथ हुई। अब मुझे सात दिन के लिए होम आइसोलेशन में रहना है। कोविड सेंटर का बुरा खाना किसी भी स्वस्थ व्यक्ति को मरीज़ बना सकता है।
बाहर आकर मैं बिना किसी से सम्पर्क बनाए अपने घर पहुंच चुका हूं और रात मैंने ऐसे खाना खाया जैसे महीनों से भूखा हूँ। शरीर में ठीक से न खाने की वज़ह से कमज़ोरी महसूस हो रही है, यह कोरोना की नही होटल के खाने से उपजी कमज़ोरी है।

भूले भटके कभी कभी एक दो बार खांसी अब भी आ रही है और मैं पहले भी लिख चुका हूं कि यह समस्या मुझे बिन कोरोना के पिछले दो-तीन साल से लगातार है।

अब समय-सारणी भी निरस्त हो चुकी है, मैं रात जल्दी सो गया ।

होम आइसोलेशन का दूसरा दिन अच्छे नाश्ते के शुरू हुआ। अब मेरी पिछले कुछ बुरे दिनों की कमज़ोरी खुद जा रही है।
समय-सारणी का पालन तो अब बन्द हो गया है पर उसमें से योग अब भी जारी है और यह मेरी दिनचर्या में शायद लंबे दिनों तक रहेगा। आज कुछ लिखने के लिए क़लम भी उठाई है। मैं अब खाली समय का सदुपयोग करने की स्थिति में भी हूं।

होम आइसोलेशन का तीसरा दिन और आज महसूस होने लगा है कि मैं अब किसी खतरे में नही हूँ। 
शायद अपनी यह कहानी समाप्त करने का भी समय आ गया है।

अच्छे तरीके से मास्क पहन और सामाजिक दूरी की पालन कर आप खुद को कोरोना संक्रमित होने से बचा सकते हैं ।

अगर आपको कोरोना हो भी जाए तो घबराना बिल्कुल नही है, यह एक साधारण बुखार और खांसी की तरह ही है। घरेलू उपचार अपनाएं और कुछ दवा अपने पास पहले से ही संग्रहित कर अवश्य रखें। अपने विश्वासपात्रों से सम्पर्क में रहें वही इस मुसीबत की घड़ी में आपकी मदद कर सकते हैं।

भारत में मध्यमवर्गीय परिवार के पास हेल्थ इंश्योरेंस बहुत कम रहता है। यदि परिवार के किसी सदस्य को कभी कोई गम्भीर बीमारी हो जाए तो वह जमीन-जायजाद बिकवा कर ही दम लेती है। सम्भव हो तो हेल्थ इंश्योरेंस अवश्य लें।

कोरोना की दवा आने तक अपना और अपने परिवार का ख्याल रखिए। पड़ोस में कोई कोरोना संक्रमित हो जाए तो उसके साथ मंगल ग्रह वासी जैसा व्यवहार बिल्कुल न करें, उनका साथ दें।

अब अप्रैल 2021 और कोरोना।

कोरोना की पहली लहर के बाद 2020 के अंतिम महीने और 2021 की शुरुआत में जनवरी, फरवरी माह में प्रतिदिन कोरोना मरीज़ों की संख्या कम रही तो इस बार कोरोना पिछली बार से ज्यादा खतरनाक साबित हो रहा है और सीधे फेफड़ों पर वार कर रहा है। आज भारत में कोरोना संक्रमितों की संख्या पन्द्रह मिलियन पार कर चुकी है और प्रतिदिन 3 लाख के आसपास लोग कोरोना संक्रमित हो रहे हैं।
भारतीय जनता को भी कोरोना से डर मीडिया में कोरोना की खबरों के बाद लगता है। पुलिस की सख्ती के बाद ही मास्क निकलता है। 
हरिद्वार में हुए कुंभ के दौरान सामाजिक दूरी का पालन करने के सभी नियमों की धज्जियां उड़ाई गई तो दर्शकों की मौजूदगी में हुए 'रोड सेफ्टी वर्ल्ड सीरीज़' और भारत और इंग्लैंड के बीच हुए शुरुआती क्रिकेट मैचों में दर्शक बिन मास्क के जिस तरह से बैठे थे उससे लगता है कि कोरोना सिर्फ़ दिल्ली के मरकज़ में शामिल कुछ जमातियों के लिए ही था।

                  पिक्चर क्रेडिट न्यूज़18 हिंदी

किसान आंदोलन और पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाड, पुडुचेरी विधान सभा के चुनाव प्रचारों में कोरोना को दरकिनार कर दिया गया।

बच्चों के स्कूल खुलने पर चर्चा, युवाओं की नौकरियां तो अब दूर की बात लगने लगी हैं अभी जान बचाना मुश्किल है। विनोद कापड़ी की डॉक्यूमेंट्री 1232 KMs की कहानी फिर दोहराई जा रही है।

देश के अस्पतालों में ऑक्सीजन और प्लाज़्मा की कमी होने की खबरें सामने आने लगी है। सोशल मीडिया में प्लाज़्मा डोनर ट्रेंड कर रहा है, कोरोना से ठीक हो चुके लोग प्लाज़्मा दान करने के लिए सामने नही आ रहे हैं। मैंने पिछले साल दिसंबर फिर जनवरी और अब अप्रैल में तीन बार प्लाज़्मा दान किया है। देहरादून के मोहित शेट्टी और हल्द्वानी के अभिनव जैसे ऐसे बहुत से भारतीय हैं जिन्होंने प्लाज़्मा दान कर इंसानियत को जिंदा रखा हुआ है।

देश के अस्पताल और श्मशान दोनों जगह भर गई हैं। देश की डगमगाती अर्थव्यवस्था को देख अभी पूर्ण लॉकडाउन न लगाना सरकार की मज़बुरी है। राज्यों ने संक्रमण को देखते हुए अपने स्तर से आंशिक लॉकडाउन लगाना शुरू किया है।

अब घर-घर के दरवाजे पर पहुंच गई इस बीमारी की गम्भीरता को समझ इससे बचने के सुरक्षा उपाए अपनाने जरूरी है क्योंकि जिस तेज़ी से यह महामारी फैल रही है उससे बचाव ही आने वाले भारत का भविष्य निर्धारित करेगा।

Friday, April 16, 2021

समुदाय से ही हारेगा कोरोना।

स्थिति गम्भीर है। 

दैनिक भास्कर भोपाल संस्करण के मुखपृष्ठ की तस्वीर डराने वाली हैं। श्मशान में चिता जलाने की जगह नही हैं।
 आज तक की ख़बर के अनुसार लखनऊ में श्मशान को चारों ओर से ढका जा रहा है ताकि वास्तविक तस्वीरों को छुपाया जा सके।
अस्पतालों में जगह नही है। देश के कई हिस्सों में कोरोना से मारे जा चुके लोगों की चिता जलाने के लिए इंतज़ार करना पड़ रहा है । 

कोरोना की पहली लहर के बाद वर्ष 2021 की शुरुआत में जनवरी, फरवरी माह में प्रतिदिन कोरोना मरीज़ों की संख्या कम रही तो अप्रैल आते-आते अब एक दिन में दो लाख से ज्यादा कोरोना पॉजिटिव सामने आ रहे हैं।

भारतीय जनता को भी कोरोना से डर मीडिया में कोरोना की खबरों के बाद लगता है। पुलिस की सख्ती के बाद ही मास्क निकलता है। 
हरिद्वार में हुए कुंभ के दौरान सामाजिक दूरी का पालन करने के सभी नियमों की धज्जियां उड़ाई गई तो दर्शकों की मौजूदगी में हुए 'रोड सेफ्टी वर्ल्ड सीरीज़' और भारत और इंग्लैंड के बीच हुए शुरुआती क्रिकेट मैचों में दर्शक बिन मास्क के जिस तरह से बैठे थे उससे लगता है कि कोरोना सिर्फ़ दिल्ली के मरकज़ में शामिल कुछ जमातियों के लिए ही था।

                  पिक्चर क्रेडिट न्यूज़18 हिंदी

किसान आंदोलन और पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाड, पुडुचेरी विधान सभा के चुनाव प्रचारों में कोरोना को दरकिनार कर दिया गया।

इस बार कोरोना पिछली बार से ज्यादा खतरनाक साबित हो रहा है और सीधे फेफड़ों पर वार कर रहा है। 
बच्चों के स्कूल खुलने पर चर्चा, युवाओं की नौकरियां तो अब दूर की बात लगने लगी हैं अभी जान बचाना मुश्किल है। विनोद कापड़ी की डॉक्यूमेंट्री 1232 KMs की कहानी फिर दोहराई जा रही है।

सरकार जब कोरोना से लड़ने के हर मोर्चे पर विफल साबित रही है तो अब समुदाय को ही समुदाय की रक्षा के लिए आगे आना होगा। अपनी ही जनता जिन्हें पिछले साल हमने प्रवासी मज़दूर बोल कर रास्तों में छोड़ दिया था अब हमें उनकी हर कदम पर सहायता करनी होगी।

कोरोना मरीज़ों को गम्भीर स्थिति में अब भी प्लाज़्मा थेरेपी दी जा रही है।

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत उत्तराखंड, किच्छा निवासी अलीम खान द्वारा लोक सूचना अधिकारी , राजकीय मेडिकल कॉलेज हल्द्वानी से यह जानकारी मांगी गई थी कि दिनांक 13/11/2020 तक सुशीला तिवारी में कितने मरीज़ों को प्लाज़्मा थेरेपी दी गई तथा उन मरीज़ो में से कितनों की प्लाज़्मा थेरेपी के बाद मृत्यु हुई और कितने मरीज़ो को बचाया जा सका । इसकी सूचना यह प्राप्त हुई थी कि दिनांक 13/11/2020 तक कुल 172 रोगियों को प्लाज़्मा थेरेपी प्रदान की थी जिसमें से 142 रोगी जीवित रहे और 30 रोगियों की मृत्यु हुई।

देहरादून में मोहित शेट्टी और आकाश छाबड़ा द्वारा सोशल मीडिया पर 'रक्तमित्र उत्तराखंड परिवार देहरादून' नाम से ग्रुप बनाए गए हैं जो कोरोना के गम्भीर मरीज़ों के परिवारों का प्लाज़्मा दानदाताओं से सम्पर्क करवा रहे हैं।
मोहित बताते हैं कि पहली लहर के दौरान एक दिन में प्लाज़्मा की जरूरत वाली 40-50  कॉल आती थी, पिछले 4 दिनों से यह आंकड़ा 400-500 पहुंच गया है।  प्लाज़्मा दानदाताओं की इतनी मांग होने के बावजूद दिन के सिर्फ 4-5 डोनर प्लाज़्मा दान के लिए आगे रहे हैं। उनमें से पहली लहर के दौरान प्लाज़्मा दान करने वाले ही ज़्यादा लोग आगे आए हैं। नए प्लाज़्मा दानदाता आगे नही आ रहे हैं। बार-बार प्लाज़्मा दान करने के कारण एक ही प्लाज़्मा दानदाता के स्वास्थ्य पर भी असर पड़ सकता है।

हल्द्वानी के रहने वाले अभिनव वार्ष्णेय और शैलेन्द्र सिंह दानू भी इसी तरह का एक ग्रुप 'वन्देमातरम ग्रुप हल्द्वानी' चला रहे हैं जो कोरोना के गम्भीर मरीज़ों के लिए प्लाज़्मा दानदाताओं की पहुंच आसान कर रहे हैं। अभिनव बताते हैं कि कुमाऊं क्षेत्र में अभी स्थिति इतनी गम्भीर नही हुई है, बरेली से प्लाज़्मा दानदाताओं की मांग बहुत अधिक आ रही है। उत्तराखंड से बाहर जाकर इलाज करा रहे मरीज़ों के परिवार वाले वहां सम्पर्क न होने की वज़ह से प्लाज़्मा के लिए वापस इन्हीं समाजसेवियों को कॉल कर रहे हैं।

देहरादून के रहने वाले अंकुर अग्रवाल के पिता राकेश कुमार कोरोना पॉजिटिव होने के बाद देहरादून के सिनर्जी अस्पताल में भर्ती हैं। वह बताते हैं कि शहर में न तो रेमडेसिवर उपलब्ध है और न ही प्लाज़्मा दानदाता मिल रहे हैं।
देहरादून के ही अक्षय नेगी के माता-पिता कोरोना पॉजिटिव होने के बाद दून अस्पताल में भर्ती हैं, उनके पिता को प्लाज़्मा की जरूरत थी। रक्तमित्र ग्रुप की मदद से प्राप्त हुए प्लाज़्मा में से एक - एक यूनिट अक्षय के पिता और दूसरे मरीज़ को चढ़ाई गई, अब तीन- चार दिन बाद चढ़ने वाली दूसरी यूनिट की व्यवस्था 'रक्तमित्र उत्तराखंड परिवार देहरादून' और 'वन्देमातरम ग्रुप हल्द्वानी' जैसे सोशल मीडिया ग्रुपों के हवाले है।
पहले से ही रक्त की कमी से जूझने वाले ब्लडबैंकों के पास कोरोना से उबर चुके लोगों के प्लाज़्मा की भारी कमी बनी हुई है।

भारतीय जनता को अब कोरोना के साथ जीना सीखना होगा और इससे बचने के उपाए सामाजिक दूरी का पालन करने के साथ ही मास्क से दोस्ती करनी होगी। देश की स्वास्थ्य सेवाएं ध्वस्त हो चुकी हैं, योग करते हुए सुरक्षित रहकर कोशिश करिए कि आपको अस्पताल जाने की जरूरत ही न पड़े।

Tuesday, April 13, 2021

जाने क्यों इस शहर में मुझे सब मुर्दे जान पड़ते हैं।

बात शुरू होती है अरस्तु ने बोला लोकतंत्र से ही तानाशाही की शुरुआत होती है और अब जाने क्यों मुझे इस शहर में सब मुर्दे जान पड़ते हैं।

बात होती है रामलला की पर इस राज्य में शतरंज की चालों पर सबको खुलेआम मात दी जाती है और अब जाने क्यों मुझे इस शहर में सब मुर्दे जान पड़ते हैं।

कानून थोप आम को तुम संगरोध करते रहे हो पर साथ ही मुखनग्न हो प्रचार खुद का भी करते रहे हो और अब जाने क्यों मुझे इस शहर में सब मुर्दे जान पड़ते हैं।

देश को आंदोलित देख तो गोरे भी भाग खड़े हुए थे पर उन्हें वह सिर्फ़ आन्दोलनजीवी नज़र आते हैं और अब जाने क्यों मुझे इस शहर में सब मुर्दे जान पड़ते हैं।

सैंकड़ो सिपाही खो यहां के मंत्री अब भी सत्ता में रहते हैं, देख पूरे हिन्द के आंसू भर आते हैं और अब जाने क्यों मुझे इस शहर में सब मुर्दे जान पड़ते हैं।

धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ फिर मरकज़-कुम्भ में दाढ़ी-दाढ़ी का अंतर देख सुन्न हूं मैं और अब जाने क्यों मुझे इस शहर में सब मुर्दे जान पड़ते हैं।

इस बेलगाम घोड़े की चाबुक किनके हाथों में है जानता हूं मैं और अब जाने क्यों मुझे इस शहर में सब मुर्दे जान पड़ते हैं।

हिमांशु

Sunday, April 11, 2021

समाचार को अब खुद समाचार बनने की जरूरत।

श्रीमान हम आपको इस आलेख के कोई पैसे नही दे सकते।
सहयोग के लिए सम्पादक के धन्यवाद सहित

सादर।

किसी स्वतन्त्र पत्रकार के लिए उसके किसी आलेख पर यह जवाब अब आम हो चुका है।

स्वतन्त्र पत्रकार ही नही किसी न किसी संस्थान से जुड़े बहुत से पत्रकार भी कोरोना के दौरान अपनी नौकरी खोने के बाद अब उस दिन को कोस रहे है जिस दिन उन्होंने पत्रकारिता को अपने पेशे के रूप में अपनाया था।

पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा गया है।यही स्तम्भ अब हिल रहा है पर शायद ही इसकी किसी को चिंता है।
पत्रकारों की इस दुर्दशा के लिए किसी मीडिया संस्थान को सीधे जिम्मेदार ठहराना भी ग़लत है।


 भारतीय मिडिया अपने अस्तित्व के लिए विज्ञापन राजस्व पर निर्भर हैं। कोरोना में लॉकडाउन की वज़ह से पूरा भारत घर में बंद था, कम्पनियों के उत्पाद बिकने बंद हो गए थे तो उनका विज्ञापन करना भी बेकार हो गया था। विज्ञापन न मिलने की वज़ह से बड़े-बड़े समाचार पत्र भी पांच से दस पन्नों में सिमट गए थे। छोटे मीडिया संस्थान तो अपनी पत्रकारिता समेट दूसरे कामों में लग गए। इसमें बहुत से ऐतिहासिक समाचार परिवार भी शामिल थे।

वर्ष 2021 आते आते बहुत से पत्रकार अपनी संस्था से निकाले जा चुके थे और जो पत्रकार किसी संस्थान से जुड़े भी थे उनके लिए उनमें टिके रहने की चुनौती सामने आने लगी।
कोरोना काल के दौरान अपनी जान गंवाने वाले पत्रकारों की संख्या भी कम नही है।

दिव्य भास्कर समाचार पत्र ने जिस तरह से रेमडेसिवर की कमी होने के बाद भी भाजपा कार्यालय में उसके मौजूद होने पर गुजरात प्रदेश अध्यक्ष को उनका नबंर प्रकाशित कर घेरा है उससे पता चलता है कि लोकतंत्र के तीन स्तम्भ को मजबूत रखने के लिए यह चौथा स्तम्भ कितना जरूरी है।
लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की रक्षा करने वाले पत्रकारों को सीमा पर अपनी जान देने वाले सिपाहियों की तरह शहीद का दर्जा कभी नही मिलता है। शहीद तो दूर की बात अब पत्रकारों को देश के नेताओं और अधिकारियों से गाली मिलनी भी शुरू हो गई हैं।

जेनेवा स्थित एनजीओ प्रेस एम्बलम कैम्पेन (पी.ई.सी)  के अनुसार 72 देशों में कोरोना की वज़ह से 1अप्रैल 2021 तक 970 पत्रकारों की मौत हो गई है। जिसमें पेरू के सबसे अधिक 135 पत्रकारों की मौत हुई है और वहां कुल कोरोना संक्रमित मरीज़ों की संख्या 1.64 मिलियन है।

 भारत में 13.4 मिलियन आबादी कोरोना संक्रमित होने के बाद यह संख्या 58 है तो अमरीका में 31.2 मिलियन आबादी के कोरोना संक्रमित होने के बाद 46 पत्रकार मौत की नींद सो गए।

केबल टीवी और डिजिटल मीडिया के आगमन के बाद से भारत में पत्रकारिता सोने के अंडे देने वाली चिड़िया बन गई। विश्व भर के बड़े-बड़े उद्योगपतियों ने भारतीय मीडिया जगत में अपना निवेश शुरू किया।
गांव के साथ बड़े-बड़े शहरों में दसवीं, बारहवीं पास युवाओं को इन समाचर घरानों ने कम वेतन पर अपने साथ जोड़ना शुरू किया। कम वेतन तो ठीक था अब अवैतनिक तौर पर भी ऐसे पत्रकारों की नियुक्ति होने लगी है जो अपने मीडिया कार्ड का उपयोग वसूली, रसूख बढ़ाने जैसे कार्यों में करने लगे हैं।

बहुत से पत्रकार अब भी विपरीत परिस्थितियों में काम करते हुए अपने पत्रकारिता धर्म का पालन कर रहे हैं। हाल ही में छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ कमांडो राकेश्वर सिंह को नक्सलियों के कब्जे से छुड़ाने में कुछ पत्रकारों ने अहम भूमिका निभाई थी।

आज़ादी के बाद भारत में पत्रकारिता के स्तर को बनाए रखने के लिए दो प्रेस आयोगों की स्थापना की गई। वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी के साथ अन्य बहुत से पत्रकार भी समय-समय पर तीसरे प्रेस आयोग की स्थापना की मांग उठाते आए हैं। भारतीय पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति की वज़ह से इस आयोग का गठन बहुत ही आवश्यक हो गया है।

भारतीय मीडिया का एक बहुत बड़ा धड़ा अब गोदी मीडिया बन गया है। गोदी मीडिया वह है जिसमें पत्रकार ईमानदार पत्रकारिता का अभ्यास करने के बजाए, फर्जी खबरें और भड़काऊ कहानियां चलाते हैं, जो कि प्रायः असत्य होती हैं और शासन करने वाली सरकार को लाभ पहुंचाती है। इसका प्रमुख कारण सम्पादकों पर मीडिया घरानों के मालिकों का बढ़ता हुआ दबाव है।

सुशांत केस पर भारतीय मीडिया की बहुत किरकिरी हुई।बॉम्बे हाई कोर्ट ने मीडिया घरानों को नसीहत दी कि आत्महत्या के मामलों की रिपोर्टिंग के दौरान संयम बरते। कोर्ट ने दो चैनलों की रिपोर्टिंग को मानहानिकारक बताते हुए कहा, ''मीडिया ट्रायल से न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप और बाधा उत्पन्न होती है।'' 
पुलवामा हमले और उसके मीडिया से सम्बन्धों पर भी उंगली उठी।

टीवी चैनलों में लाईव वाद-विवाद के दौरान कभी-कभी स्तर इतना गिरा दिया जाता है कि वह समाचार चैनल कम और दंगल का चैनल ज्यादा लगता है। दूरदर्शन के शांत समाचारों से इन समाचारों तक का सफ़र अब बहुत ही स्तरहीन बन गया है।

अमरीका में लोकतंत्र की मज़बूती का एक बहुत बड़ा कारण वहां की पत्रकारिता को दिए गए अधिकारों को माना जाता है। मीडिया पर किए गए शोधों के साथ मीडिया से जुड़े शिक्षण संस्थानों की स्थापना में भी अमरीका हम से बहुत आगे रहा है।

वर्ष 2017 में पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या ने बता दिया था कि भारतीय लोकतंत्र में अब पत्रकार सुरक्षित नही हैं। हाल ही में मीडिया सेंसरशिप बढ़ने के साथ ही किसान आंदोलन के दौरान भी बहुत से पत्रकारों को जेल में डालने की ख़बर आई।

तीसरे प्रेस आयोग में पत्रकारिता के स्तर को सुधारने के किए कार्य करने की आवश्यकता तो है ही साथ ही मीडियाकर्मियों के कैरियर और जानमाल की सुरक्षा पर भी ध्यान देना होगा।

Saturday, April 10, 2021

ऐसा लगता है अब मुझे उठना चाहिए।


सुबह आंख खुली तो ऐसा लगा मुझे अब उठना चाहिए।

किसानों का आंदोलन कब से ज़ारी है, कोई सड़कों पर अब तक सोता है याद कर मुझे लगा अब उठना चाहिए।

दिल्ली में पति ने पत्नी को शक में चाकू से मारा , बीच बाजार, वहां बहुत लोग सोए थे, इसलिए मुझे लगा अब उठना चाहिए।

भूल गया था ये वही दिल्ली है जो पिछले साल जल रही थी, क्यों वहां चिताएं जली जानने के लिए मुझे लगा अब उठना चाहिए।

पूरे देश में अब भी बहुत सी बेटियां नोची जाती हैं पर फिर भी बात फ़टी जीन्स पर होती है इसलिए मुझे लगा अब उठना चाहिए।

छत्तीसगढ़ में हमारे जवान शहीद हुए, आज हल्ला है कल फिर पश्चिम बंगाल में दीदी और मोदी की खबरें होंगी, जवानों के घर दिवाली नही मनेगी इसलिए मुझे लगा अब उठना चाहिए।

उत्तराखंड आपदा में चिपको वाला गांव बहा सैंकडों बेवाओं की मांगें अब सुनी है पर फिर भी कातिल आबाद है ये सोच मुझे लगा अब उठना चाहिए।

विनोद कापड़ी वाली फ़िल्म की कहानी फिर दोहराई जानी है क्योंकि फिर ख़ज़ाने भरने वालों का पेट खाली है इसलिए मुझे लगा अब उठना चाहिए।

बेरोज़गार मर रहे हैं उनकी अब भीख मांगने की तैयारी है पर अब तो आईपीएल भी जारी है, उसे देखने मुझे लगा अब उठना चाहिए।

हिमांशु।

Friday, April 9, 2021

पर्यावरण हलचल : समुदाय के बिना नही बुझाई जा सकती हिमालय की यह आग।

एमआई 17 हेलीकॉप्टरों की मदद से उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग बुझाई जा रही है। 
जंगलों में आग मुख्यतः जमीन पर गिरी सुखी घास-पत्तियों से फ़ैलती है। उत्तराखंड के पहाड़ों में चीड़ के पेड़ों की अधिकता यहां के पहाड़ों में आग फैलने का मुख्य कारण है। चीड़ की पत्तियां जिन्हें पिरूल भी कहा जाता है अपनी अधिक ज्वलनशीलता की वजह से हिमालय की बहुमूल्य वन संपदा खत्म कर रही हैं।


यूकेफॉरेस्ट वेबसाइट के अनुसार वर्ष 2021 में अब तक जंगल में आग लगने की 1635 घटनाएं सामने आ चुकी हैं। जिस वजह से 4 लोगों की मौत के साथ ही 17 जानवरों की मौत भी हुई है। जंगल में आग लगने की वजह से 6158047.5 रुपए की वन संपदा जल कर ख़ाक हो गई।  
https://forest.uk.gov.in/contents/view/6/53/75-forest-fire-info
इसी वेबसाइट पर आप जंगल में आग से प्रभावित स्थानों की लाइव जानकारी भी ले सकते हैं।

3 मई 2016 में टाइम्स ऑफ इंडिया में विनीत उपाध्याय की छपी एक रिपोर्ट के अनुसार जंगल की आग से निकला स्मॉग और राख 'ब्लैक कार्बन' बना रहा है जो ग्लेशियरों को कवर कर रहा है, जिससे उन्हें पिघलने का खतरा है।  गंगोत्री, मिलम, सुंदरडुंगा, नयाला और चेपा जैसे अपेक्षाकृत कम ऊंचाई पर स्थित ग्लेशियर सबसे अधिक खतरे में हैं और यही ग्लेशियर बहुत सी नदियों के स्रोत भी हैं।
इस आग की वज़ह से पहले ही उत्तर भारत के तापमान में 0.2 डिग्री सेल्सियस की छलांग से मानसून पर हानिकारक प्रभाव पड़ सकता है।

चीड़ के पेड़ जहां हिमालय में आग फ़ैलाने के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी हैं वहीं उन्हें कई रोगों के इलाज में भी उपयोगी पाया गया है जैसे इसकी लकडियां, छाल आदि मुंह और कान के रोगों को ठीक करने के अलावा अन्य कई समस्याओं में भी उपयोगी हैं।

चीड़ की पत्तियों से कोयला बना और बिजली उत्पादन कर आजीविका भी चलाई जा सकती है।

ऊर्जा एवं संसाधन संस्थान ( टेरी ) के जैवविविधता विशेषज्ञ डॉ.योगेश गोखले चीड़ के जंगलों में हर वर्ष लगने वाली आग की समस्या पर कहते हैं कि पिरूल के बढ़ने से आग लगने का ख़तरा भी बढ़ जाता है। नमी की वज़ह से आग को फैलने से रोका जा सकता है। जलती बीड़ी जंगलों में फेंक देना भी जंगल की आग के लिए उत्तरदायी है।

चीड़ के जंगल से पर्यावरण को पहुंच रहे नुकसान पर डॉ गोखले कहते हैं अक्सर यह माना जाता है कि जहां चीड़ होगा वहां पानी सूख जाता है और देवदार के पेड़ों वाली जगह पानी के स्रोत मिलते हैं। चीड़ की वजह से जंगल में आग लगने से कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ जाती है।

आग लगने की वजह से पर्यावरण को जो नुकसान पहुंच रहा है उसे बचाने के लिए डॉ गोखले पिरूल के अधिक से अधिक इस्तेमाल को बढ़ावा देना चाहते हैं क्योंकि पिरूल हटने से बाकि वनस्पतियों का विकास होगा और मिश्रित जंगल बनने की वज़ह से भविष्य में आग लगने की घटनाओं में भी कमी आएगी। पालतू जानवरों के लिए चारा उपलब्ध होगा तो ग्रामीण इसके लिए पिरूल के जंगलों में आग भी नही लगाएंगे।

आईएफएस एडिशनल प्रिंसिपल, चीफ़ कनसर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट उत्तराखंड डॉ. एस डी सिंह से जब यह पूछा गया कि चीड़ के जंगलों में आग न लगे सरकार इसके लिए क्या कदम उठा रही है तो उन्होंने बताया कि इसके लिए हर वर्ष कार्य योजना बनाई जाती है। फ़रवरी और मार्च में ही तय कर लिया जाता है कि कहां पर फ़ायर क्रू स्टेशन बनाए जाने हैं और साथ में ही संचार साधन भी दुरस्त कर लिए जाते हैं।
जंगल मे फ़ायर लाइन बनाते रहते हैं और झाड़ी नही होने देते। किसानों को भी साथ लेकर पत्तियां इकट्ठा की जाती हैं और खेतों के किनारे सफ़ाई की जाती है ताकि आग खेतों तक न फैले।

पत्रिका की एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग की घटनाओं को नैनीताल हाईकोर्ट ने गंभीरता से लिया है। कोर्ट ने इसके स्थाई समाधान के लिए जंगलों में पहले से चाल व खाल बनाने के निर्देश दिए हैं। 
उत्तराखंड में पारंपरिक रूप से पानी रोकने के लिए बनाए जाने वाले तालाबों को चाल व खाल कहते हैं, इनकी वज़ह से जमीन में नमी बनी रहती है और आग कम फ़ैलती है।

भारत में औपनिवेशिक काल से पहले लोग वनों का उपभोग भी करते थे और रक्षा भी। अंग्रेज़ों ने आते ही वनों की कीमत को समझा, जनता के वन पर अधिकारों में कटौती की और वनों का दोहन शुरू किया।

जनता के अधिकारों में कटौती की व्यापक प्रतिक्रिया हुई और समस्त कुमाऊँ में व्यापक स्तर पर आन्दोलन शुरू हो गए। शासन ने दमन नीति अपनाते हुए प्रारम्भ में कड़े कानून लागू किए, परन्तु लोगों ने इन कानूनों की अवहेलना करते हुए यहाँ के जंगलों को आग के हवाले करना आरम्भ किया। फलस्वरूप शासन ने समझौता करते हुए एक समिति का गठन किया।
1921 में गठित कुमाऊँ फॉरेस्ट ग्रीवेंस कमेटी का अध्यक्ष तत्कालीन आयुक्त पी.विंढम को चुना गया तथा इसमें तीन अन्य सदस्यों को शामिल किया गया। समिति ने एक वर्ष तक पर्वतीय क्षेत्र का व्यापक भ्रमण किया। समिति द्वारा यह सुझाया गया कि ग्रामीणों की निजी नाप भूमि से लगी हुई समस्त सरकारी भूमि को वन विभाग के नियंत्रण से हटा लिया जाए।

स्वतन्त्र भारत में वनों को लेकर बहुत से नए-नए नियम कानून बनाए गए।
वर्तमान समय में उत्तराखंड की वन पंचायत जो पंचायती वनों का संरक्षण और संवर्धन खुद करती है उन्हें अधिक शक्ति दिए जाने की आवश्यकता है।

डाउन टू अर्थ में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व में आदिवासी बहुल क्षेत्र सबसे कम कार्बन उत्सर्जित करते हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि समुदाय के पास जंगल का नियंत्रण रहने से वहां आग भी कम लगती है क्योंकि वह ही जंगल की रक्षा भी करते हैं।

जंगल में लग रही इस आग के समाधान पर वरिष्ठ पत्रकार और पर्यावरणविद राजीव नयन बहुगुणा कहते हैं कि उत्तराखंड के गांवों की चार किलोमीटर परिधि में जंगलों से सरकारी कब्ज़ा हटा कर उन्हें ग्राम समुदाय के सुपुर्द किया जाना चाहिए।

मई-जून की गर्मियों में उत्तराखंड के जंगलों में आग सबसे ज्यादा फैलेगी और हेलीकॉप्टर से पानी गिरा आग बुझाना इस समस्या का स्थाई समाधान नही है। न ही चीड़ के पेड़ों को काट-काट कर हम अपने कृत्यों से लगी इस आग को रोक सकते हैं। समुदाय ने मिल कर ही मानव जाति का निर्माण किया है और वह ही इसे और अपने पर्यावरण को बचा भी सकता है।

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

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