Tuesday, March 30, 2021

1232 KMs समीक्षा : भूलना मत लॉकडाउन में असली भारत की यह कहानी।




⭐⭐⭐⭐⭐

स्वतंत्र भारत में सरकार की सबसे बड़ी भूल पर प्रकाश डालती एक वृतचित्र।

16 साल में अमर उजाला पर प्रकाशित स्टोरी से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाले विनोद कापड़ी ने इस वृतचित्र में अपने पत्रकारिता और फिल्मी कैरियर का पूरा अनुभव झोंक दिया है।

Can't take this shit anymore, मिस टनकपुर हाज़िर हो और पीहू डायरेक्ट करने के बाद देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान 12 अप्रैल 2020 को कुछ प्रवासियों द्वारा ट्विटर पर पोस्ट किए गए एक वीडियो से इस वृतचित्र को बनाने की नींव पड़ी।

हिमालय की पंचाचूली चोटी को देख उसकी जड़ में तीन चार-दिन बिता आए विनोद अपनी जिज्ञासु प्रवृत्ति की वज़ह से इन सात प्रवासियों के पीछे अपने एक सहयोगी के साथ उसकी कार पर चल पड़े।

वृतचित्र की शुरुआत अंधेरी रात में साइकिल से घर लौट रहे मज़दूरों के साथ होती है जो कहते हैं मरना है तो रास्ते में मरना है, बच गए तो घर जाएंगे । दिल्ली से सहरसा तक की दूरी 1232 किमी चल रहे इन सात प्रवासियों को गूगल मैप भटकाता भी है।

इस सफ़र में बहुत से लोगों ने इन प्रवासियों की निःस्वार्थ भाव से सेवा की जिनमें उन्हें लिफ्ट देने वाले ट्रक चालक, ढाबा मालिक और पुलिसकर्मी शामिल थे।
अपने परिवार से वीडियो कॉल पर बात और बिहार बॉर्डर पर पहुंच जश्न मनाने का दृश्य लाजवाब हैं।

उसके बाद सातवें दिन गृहराज्य पहुंच शासन के पचड़े में फंसने वाले दृश्य हमारे प्रशासनिक ढांचे की पोल खोलते हैं। खुद विनोद भी सिस्टम से परेशान होते दिखते हैं। उन्होंने इस वृतचित्र को सीमित संसाधनों रहते हुए न सिर्फ बनाया है बल्कि जिया भी है। 
अंत में प्रवासियों का अपने परिवार को देखने, मिलने का दृश्य भावुक कर देता है।

वृतचित्र के अभिनेता तीसरे स्तर के वह नागरिक हैं जिन्हें हमने कभी भारतीय माना ही नही जबकि उनसे ही असली भारत है।
बैकग्राउंड में बजता संगीत प्रवासियों के दर्द को उधेड़ कर सामने ले आता है। गुलज़ार, विशाल भारद्वाज, सुखविंदर और रेखा भारद्वाज की टीम ने यह सम्भव किया है।

1232 KMs देखने के बाद मुझे खुद से ग्लानि महसूस हो रही है कि लॉकडाउन में मैंने खुद किसी प्रवासी की इतनी मदद नही की और बिना उनकी वास्तविक दशा समझे यह सम्भव भी नही था। वृतचित्र देखने के बाद पुनः ऐसी स्थिति आने पर बहुत से दर्शक प्रवासियों की मदद के लिए आगे आएंगे।

यह वृतचित्र उन प्रवासियों के लिए एक श्रदांजलि है जो लॉकडाउन के बाद भूखे पेट की वज़ह से अपने घर के लिए तो निकले पर उनका वह सफ़र आखिरी सफ़र बन गया। कुछ रेलवे पटरियों में हमेशा के लिए सो गए तो कोई माँ मरने से पहले अपने बच्चे को खिलाने के लिए अपना पल्लू छोड़ गई।
चुनावी मौसम में रंगे देश में शायद ही कभी इन श्रमिकों की मौत के लिए किसी को जिम्मेदार ठहराया जाएगा।
 
डेढ़ घण्टे की यह वृतचित्र भारत को समझने का नया नज़रिया दे सकता है। सोशल मीडिया पर सरकारी नीतियों पर बहस करने वाले हर भारतीय को यह वृतचित्र देखना चाहिए।

हिमांशु जोशी, उत्तराखंड।

Friday, March 12, 2021

सत्ता के भूखों से ठगे जाते उत्तराखंडी।

ब्रिटिश शासनकाल से पहले राजशाही काल में राजा अपनी प्रजा का दुखदर्द सुनते थे और बूढ़ा हो या जवान सबकी पहुंच अपने राजा तक आसानी से होती थी।
लेकिन अब उत्तराखंड के जिला पिथौरागढ़ में रह वृद्धावस्था पेंशन पाने वाला वृद्ध यदि अपने घर से 547 किमी दूर देहरादून बैठे मुख्यमंत्री से मिलना चाहे तो उसे अपनी 1200 रुपए प्रतिमाह मिलने वाली पेंशन से ज्यादा 1590 रुपए अपने प्रदेश मुख्या से मिलने के लिए आने-जाने पर ख़र्च करने होंगे।



अब बात करते हैं प्रदेश में चल रहे राजनीतिक घटनाक्रम की।
साल 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए 70 विधानसभा सीटों में से 56 सीटों में जीत हासिल की थी। इसी उपलब्धि के चार साल पूरे होने के जश्न में उत्तराखंड सरकार 18 मार्च को 'बातें कम काम ज्यादा' कार्यक्रम मनाने की तैयारी कर रही थी। 'हिंदुस्तान' की एक रिपोर्ट के अनुसार इस कार्यक्रम को धूमधाम से मनाने के लिए पर्वतीय और मैदानी क्षेत्रों में प्रति विधानसभा क्षेत्र लाखों रुपए जारी किए गए थे।

वहीं इसी बीच पार्टी में मुख्यमंत्री के खिलाफ बढ़ते असंतोष को देखते हुए बीजेपी आला कमान ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह और बीजेपी महासचिव दुष्यंत गौतम को पर्यवेक्षक के रूप में उत्तराखंड भेजा। जिनकी रिपोर्ट के आधार पर आनन-फानन में त्रिवेंद्र सिंह रावत को हटा तीरथ सिंह रावत को उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनाया गया।

अपने इस्तीफे का कारण पूछने पर त्रिवेंद्र का कहना था कि इसका जवाब जानने के लिए आपको दिल्ली जाना होगा।
  पद से इस्तीफा देते ही ट्विटर पर त्रिवेंद्र सिंह रावत ट्रेंड होने लगे थे और उनको लेकर मीम्स की बाढ़ आ गई थी।


आजकल किसी नेता, अभिनेताओं की लोकप्रियता का पैमाना उनका सोशल मीडिया पेज़ देता है। उत्तराखंड में विपक्ष के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के फ़ेसबुक पेज़ को 8,42,657 लोग लाइक करते हैं और नवनियुक्त मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के फ़ेसबुक पेज़ को 3,88,071 , वहीं उत्तराखंड के लगभग साथ में ही अस्तित्व में आए झारखंड के वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के पेज़ को 5,17,004 लाइक करते हैं। इन सबसे आगे त्रिवेंद्र सिंह रावत के फ़ेसबुक पेज़ को 15,11,421 लोग लाइक करते हैं, उत्तराखंड की राजनीतिक हस्तियों में सिर्फ केंद्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल ही 14,01,510 फ़ेसबुक लाइक के साथ उनके आस-पास ठहरते हैं। सोशल मीडिया पर इतनी लोकप्रियता के बाद वह ज़मीनी सच्चाई क्या रही जो इन चार साल में त्रिवेंद्र सुस्त मुख्यमंत्री घोषित हुए और पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रमों की वज़ह से उन्हें अपने पद से ही हाथ धोना पड़ गया।

28 जून 2018 को हुए जनता दरबार में एक शिक्षिका द्वारा अपनी समस्या बताने पर त्रिवेंद्र सिंह रावत द्वारा उसे सस्पेंड कराने के बात कह कस्टडी में भेज दिया गया था। पूरे प्रदेश में मुख्यमंत्री का यह तानाशाही रवैया चर्चा में रहा था।


सीएम की किसी भी सोशल मीडिया पोस्ट पर बेरोज़गारों द्वारा उन्हें नाक़ाबिल सीएम कहा जाता था। उत्तराखंड में बेरोज़गारों की फ़ौज तैयार हो गई है। ईटीवी की एक रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के सभी 13 जनपदों के क्षेत्रीय सेवायोजन कार्यालयों से प्राप्त आंकड़ो की ओर गौर करें तो पिछले 20 सालों में प्रदेश के पंजीकृत बेरोज़गारों की संख्या सात लाख पार कर चुकी है।

उत्तराखंड की बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं पर कैग की रिपोर्ट में वर्ष 2014-19 के बीच प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं में खामियों की ओर इशारा किया है। स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में उत्तराखंड 21 राज्यों की लिस्ट में 17 वें पायदान पर है। यह स्थिति तब हुई जब मुख्यमंत्री ने स्वास्थ्य विभाग अपने पास रखा था।

यह नई बात नही थी कि त्रिवेंद्र के खिलाफ़ पार्टी में विद्रोह हुआ हो, लोकसभा चुनाव 2019 से पहले बीजेपी के 18 विधायकों ने पार्टी नेतृत्व को मुख्यमंत्री बदलने के लिए पत्र लिखा था।
अब मार्च में हुए बजट सत्र के दौरान त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अपनी पार्टी के विधायकों को ही विश्वास में लिए बगैर गैरसैंण को उत्तराखंड का तीसरा मण्डल घोषित कर दिया। इसमें कुमाऊं की आत्मा कहे जाने वाले अल्मोड़ा को भी शामिल कर दिया गया जिससे अल्मोड़ा की स्थानीय जनता और विधायकों में रोष उत्पन्न हो गया था।

नन्दप्रयाग घाट के ग्रामीणों पर सड़क चौड़ीकरण से जुड़े आंदोलन के दौरान गैरसैंण में किया गया लाठीचार्ज भी उनके मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के मुख्य कारणों में शामिल हुआ।

20 वर्ष के हो चुके इस राज्य में अब तक सिर्फ़ एक मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने ही अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया है। इसका मुख्य कारण यह है कि इन 20 वर्षों में प्रदेश राजनीति में ऐसे बड़े चेहरे सामने नही आए हैं जो अपनी पार्टी और जनता का विश्वास जितने में सक्षम हुए हों।
नौकरशाही के खुद पर हावी होने की वज़ह से भी विधायकों को अपने काम पूरे करने में दबाव महसूस होने लगता है क्योंकि उन्हें जनता को अपना रिपोर्ट कार्ड दिखाने का दबाव भी रहता है।
अगस्त 2020 में त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुख्यमंत्री काल के दौरान दैनिक जागरण में छपी ख़बर 'उत्तराखंड में हावी नौकरशाही, कैबिनेट मंत्री करते रहे सचिवों का इंतजार; फिर बैठक करनी पड़ी निरस्त' से हम इसका अंदाज़ा लगा सकते हैं।
जिसमें कहा गया कि 'राज्य के सामाजिक राजनीतिक हालात के जानकारों का मानना है कि जब तक मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों और विधायकों का चयन योग्यता के बजाय व्यक्तिगत निष्ठा, क्षेत्र और जातियों के आधार पर होता रहेगा, तब तक नौकरशाही सिर चढ़कर बोलती रहेगी। योग्य और सक्षम जनप्रतिनिधि ही नौकरशाही पर लगाम लगा सकता है। अब यह बात भाजपा और कांग्रेस को कब समझ में आएगी कहा नहीं जा सकता, आएगी भी या नहीं, यह कहना तो और भी मुश्किल है।'

नतीज़न प्रदेश की राजनीतिक अस्थिरता की खबरें दिल्ली पहुंचती हैं फिर वहीं से पार्टी और प्रदेश के भाग्य का फैसला लिया जाता है।

बीच में मुख्यमंत्री बदलने से नए मुख्यमंत्री के लिए बहुत सी चुनोतियाँ सामने रहती हैं। पहले तो उन्हें अपने पूर्ववर्ती से पार्टी की छवि को हुए नुकसान की भरपाई करनी पड़ती है, फिर पूर्ववर्ती के छोड़े अधूरे कामों को नए सिरे से समझ आगे बढ़ाना होता है। इस कार्य में जनता के पैसे का नुक़सान तो है ही साथ में जो विकास पहले से ही धीमी गति से चल रहा होता है उस पर भी ब्रेक लग जाता है।

उत्तराखंड की भोली-भाली जनता कभी एक दल को पूर्ण बहुमत देती है तो कभी दूसरे को, पर विकास का लड्डू सिर्फ़ नेता और आला अधिकारियों को ही मिलता है। जनता में अपना सही प्रतिनिधि चुनने की सही समझ नही है या उसे सच कभी बताया ही नही जाता।

जनता को सही रास्ता दिखाने का कार्य मुख्यतः पत्रकारिता का होता है जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ यूं ही नही कहा गया है। यह आपको सरकार के अच्छे कार्यों के प्रति जागरूक भी करती है तो उसके हर गलत कदम की आलोचना भी करती है। 
कोरोना काल में पत्रकारिता धन के अभाव में कमज़ोर हुई है। उत्तराखंड में युगवाणी और नैनीताल समाचार के बाद ऐसा कोई समाचार पत्र या पोर्टल नही हुआ है जो जन से जुड़ा हो।
 इनकी संख्या ज्यादा होती तो आज उत्तराखंड में लोकतांत्रिक अस्थिरता की यह नौबत बार-बार नही आती।
पर्यावरणविद सुंदर लाल बहुगुणा की परछाई उनकी धर्मपत्नी विमला बहुगुणा से मिलना हुआ तो उन्होंने नैनीताल समाचार प्राप्त होते रहने के बारे में बताया। शायद ही वह अब नैनीताल समाचार पढ़ती हों पर समाचार पत्र से उनका प्रेम उत्तराखंड स्थापना के लिए बहाए गए खून-पसीने से जुड़ा है।

अमर उजाला, सहारा, उत्तर उजाला, द वायर, न्यूज़लॉन्ड्री, सत्याग्रह, भड़ास4मीडिया, हस्तक्षेप, रीज़नल रिपोर्टर, सबलोग, लाइवएसकेजी, सत्या और कुछ समय पहले प्रवर्तन निदेशालय की रेड की जद में आए न्यूज़क्लिक जैसे कुछ समाचार पोर्टल भी हैं जो उत्तराखंड और देश भर में चल रही गोदी मीडिया के प्रभाव से दूर हैं, यह सभी राष्ट्रीय स्तर के समाचार परिवार हैं क्योंकि इंटरनेट युग में समाचार के परिपेक्ष्य में किसी राज्य की अवधारणा अब समाप्त हो चुकी है। 
इसमें साक्षी जोशी जैसे युट्यूबर भी हैं जो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चाटूकारिता माहौल से निकल यूट्यूब के माध्यम से स्वतंत्रता पुर्वक अपनी बात जनता तक पहुंचा रहे हैं।

ऐसे समाचार परिवार कभी भी सरकार की मेहरबानी से विज्ञापन नही पाते हैं, क्यों यह समझना मुश्किल नही है। यहां जागरूक जनता की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह सरकार गिरने-गिराने, मुख्यमंत्री बदलने जैसे खेलों को समझे , जहां जनता की सेवा के मुख्य लोकतांत्रिक धर्म को भुला दिया जाता है। 
इसके लिए आपको फ़ेसबुक, ट्विटर पर ऐसे घटनाक्रमों के हो जाने बाद विश्लेषक बनने की जगह इन समाचार परिवारों की सिर्फ़ रोज़ की चाय के खर्चें भर की मदद करनी है।

Saturday, March 6, 2021

अपनी लिपि तलाशती उत्तराखंड की दूधबोली।


कुछ वर्ष पहले दिल्ली मेट्रो में सफ़र करते दो लोग आपस में बातचीत करते सुनें, यह कुछ नया नही है हमारे चारों ओर बहुत से लोग आपस में बतियाते हैं पर मेरा ध्यान उनकी तरफ़ सिर्फ इसलिए गया क्योंकि वह मेरी दूधबोली में आपस में बात कर रहे थे। उन्हें कुमाउनी में बात करते सुन कुछ अपना सा लगा, जी कर रहा था कि उनसे बात कर लूं पर मेट्रो के संभ्रांत वर्ग वाले माहौल में मेरी हिम्मत नही हुई।

दूधबोली के प्रभाव का उदाहरण हम गिर्दा की कविताओं से ले सकते हैं । उनकी कविता 'जैंता इक दिन त आलो ऊ दिन यो दुनि में' '
जो अन्याय के खिलाफ़ संघर्ष करते रहने की प्रेरणा देती हैं की पंक्तियां
'ततुक नी लगा उदेख, घुनन मुनई नि टेक
जैंता इक दिन त आलो ऊ दिन यो दुनि में'
कुमाउनी लोगों के मष्तिष्क में ऐसा असर करती थी कि वह उन्हें सुन गिर्दा के साथ उत्तराखंड आंदोलन, प्रवासियों के दर्द को लेकर सड़कों पर उतर आते थे। 

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत भी अपनी दूधबोली के महत्त्व को समझते हैं। उनके द्वारा समय समय पर जनता से अपनी बोली के विकास को लेकर मत लिए गए हैं।

पर प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में नई पीढ़ी उन लोगों को समझती और जानती है जिन्होंने कुमाउनी या गढ़वाली भाषा के विकास में अपना योगदान दिया है।

पण्डित लोकरत्न पन्त 'गुमानी' का जन्म वर्ष 1791 में कूर्मांचल में चंद राजाओं के राजवैद्य पण्डित पुरुषोत्तम पन्त के पौत्र रूप में हुआ। लोकरत्न पन्त 'गुमानी' के पिता पण्डित देवनिधि पन्त काशीपुर में रहते थे।
 उनकी प्रारंभिक शिक्षा घर में ही हुई। विवाह उपरांत वह देशाटन पर निकले और इसी काल में वह एक कवि के रूप में प्रतिष्ठित हुए। उनका संस्कृत, हिंदी, बृज , फ़ारसी, कुर्मांचली और नेपाली भाषाओं पर असाधारण अधिकार था।
'गुमानी' को खड़ी बोली हिंदी का प्रथम कवि स्थापित करने के प्रयास वर्ष 1950 के बाद हुए। उन्हें डॉ भगत सिंह ने खड़ी बोली का प्रथम कवि ही नही अपितु प्रथम राष्ट्रीय कवि घोषित किया है।

कवि गुमानी के उपलब्ध साहित्य का संग्रह टनकपुर निवासी कैलाश चन्द्र लोहनी ने किया है। कैलाश चन्द्र लोहनी का जन्म 20 अप्रैल 1942 को सतराली गांव अल्मोड़ा में हुआ । उनके पिता का नाम प्रेम वल्लभ लोहनी और माता का नाम नंदी था। पांच वर्ष की उम्र में माता का देहांत होने पर कैलाश अपने पिता के साथ उनके कार्यक्षेत्र नैनीताल रहने लगे। अपनी प्रारंभिक और उच्च शिक्षा उन्होंने नैनीताल से ही प्राप्त की और इसी दौरान उन्होंने वहां होने वाले विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों में भाग लेना शुरू कर दिया था। कैलाश की रुचि साहित्य सृजन, शोध और पांडुलिपियों के संग्रहण में होने लगी थी। वर्ष 1964 में उन्हें बतौर शिक्षक जीआईसी श्रीनगर में नियुक्ति मिल गई थी। वहां रहते हुए ही वह नजीबाबाद रेडियो स्टेशन से भी जुड़ गए और वहां अपनी कविताओं की प्रस्तुति देने लगे थे। वर्ष 1967 में उनका विवाह अल्मोड़ा निवासी कमला से हुआ। अब नौकरी में आ रही अड़चनों की वज़ह से कैलाश चन्द्र लोहनी की लेखनी प्रभावित हो रही थी, पर उनसे बाहर निकलते ही उन्होंने महाकवि कालिदास की संस्कृत साहित्य में विश्व प्रसिद्ध अनुपम उपलब्धि ' अभिज्ञान शाकुन्तलम् ' का मूल कृति की आत्मा सुरक्षित रखते हुए कुमाउनी अनुवाद ' शकुन्तलाकि पछाण ' के रुप में किया।
इसके अलावा उन्होंने नाटककार भास के ' कर्णभारम ' का कुर्मांचली में अनुवाद किया। 

'उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान' हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए कार्यरत प्रमुख संस्था है। यह वही संस्था है जो पत्रकारिता के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए गणेशशंकर विद्यार्थी पुरस्कार देती है। वर्ष 1994 में कैलाश चन्द्र लोहनी को उनकी कृति ' शकुन्तलाकि पछाण ' के लिए इसी संस्था द्वारा ' सुमित्रानंदन पंत नामित ' पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया।

उत्तराखंड भाषा संस्थान देहरादून द्वारा वर्ष 2010-11 में भाषा एवं साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट रचनात्मक अवदान के लिए उन्हें 'मौलाराम सम्मान' दिया गया।
कुमाउनी भाषा के संरक्षण और विकास के सवाल पर कैलाश चन्द्र लोहनी कहते हैं कि इस भाषा के मानकीकरण से पहले कुमाउनी लिपि का मानकीकरण हो।

मूल रूप से कुमाऊँ और वर्तमान में देहरादून निवासी चंद्रशेखर तिवारी ने अपनी पुस्तक ' लोक में पर्व और परंपरा ' के अंदर हमारी कुमाउनी पहचान को लिपिबद्ध किया है।

कुमाउनी भाषा का इतिहास इतना समृद्ध रहा है कि चन्द्रलाल वर्मा ने कुमाउनी भाषा की कहावतों पर पूरी पुस्तक ही प्रकाशित की है।

कुमाउनी के प्रभाव को स्वीकारते हुए 'साहित्य अकादमी' ने कुमाउनी के दो लेखकों मथुरादत्त मठपाल और चारु चन्द्र पाण्डे को ' भाषा सम्मान ' दिया था। यह दोनों उत्तर प्रदेश के हिंदी संस्थान के साथ अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों से भी पुरस्कृत हो चुके हैं।

2 अगस्त 2015 में टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार यूनेस्को द्वारा गढ़वाली को विलुप्त होने की कगार पर बताया गया है।

दुधबोलियों को तभी बचाया जा सकता है अगर इन्हें भी बच्चों के पाठ्यक्रम में शुरू से ही सम्मिलित किया जाए। भारतीय स्कूली शिक्षा प्रणाली में सुधार लाने के लिए गठित कोठारी आयोग (1964-66) ने भी स्थानीय भाषा में शिक्षण को प्रोत्साहन दिए जाने का सुझाव दिया था। नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020 में शिक्षा मातृभाषा में भी हो सकती है।

 ऑनलाइन माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने के जमाने में 'गूगल इंडिक कीबोर्ड एप' ने हमारे स्मार्टफोन में यह सुविधा दी है कि अब हम गढ़वाली और कुमाउनी में भी टाइप कर सकते हैं।
जून 2018 से गुजरात में पहली से आठवीं कक्षा तक गुजराती अनिवार्य है।
पंजाब में भी दसवीं कक्षा तक पंजाबी भाषा को अनिवार्य विषय पढ़ाए जाने सम्बंधी आदेश पारित हुआ है।
उत्तराखंड सरकार ने कक्षा एक से पांच तक गढ़वाली और कुमाउनी भाषा में पाठ्यक्रम तैयार किया है। समस्या यह है कि पंजाबी तो गुरुमुखी लिपि में पढ़ाई जाएगी, गुजराती को गुजराती लिपि में पढ़ाया जाएगा पर हमारी दुधबोलियों को देवनागरी लिपि में ही सिखाए जाने की तैयारी है।

नैनीताल समाचार में देवेंद्र नैनवाल के लिखे एक आलेख के अनुसार कुमाउनी भाषा की अपनी स्वतंत्र लिपि का न होना उसके लिए अभिशाप सिद्ध हुआ है। देवनागरी के मूल अक्षर कुमाउनी भाषा हेतु पूर्णतया सक्षम नही हैं। कुमाउनी में अपने ऐसे कुछ विशिष्ट स्वर एवं ऐसी ध्वनियां हैं जिनके लिए देवनागरी लिपि में कोई स्वर या मात्राएं नही हैं और इसके बाद देवनागरी लिपि में लिखे जाने पर यह हिंदी से प्रभावित होती जाती है और अपना मूल खोते जाती है।

कुल्लू , हिमाचल प्रदेश के रहने वाले यतिन पण्डित पुरानी लिपियों के संरक्षण में लगे हुए हैं। वर्तमान में वह टांकरी लिपि के लिए नई वर्णमाला बना रहे हैं। स्वरों की बहुतायत होने के कारण टांकरी उनकी स्थानीय बोली की ध्वनियों को आराम से पूरा कर देती है। वह कहते हैं कि प्राचीन काल में टांकरी लिपि हिमाचल के साथ गढ़वाल, जौनसार और कुमाऊँ में भी प्रचलित थी। 

कुमाउनी के संरक्षण के लिए वह लिच्छवि लिपि के उपयोग को सबसे उपयुक्त बताते हैं क्योंकि लिच्छवि लिपि शारदा लिपि और सिद्धमातृका लिपि के तत्वों को समेटे हुए है जो कुमाउनी के लिए उपयुक्त है।


लिपि, भाषा किसी भी संस्कृति की पहचान होती हैं और पहचान ही किसी व्यक्ति या समाज को परिभाषित करती है। कोई भी भाषा बिना लिपिबद्ध हुए ज्यादा समय तक प्रचलन में नही रह सकती।

Friday, March 5, 2021

सड़क सुरक्षा की महत्वत्ता याद दिलाती 'अनएकेडमी रोड सेफ्टी वर्ल्ड सीरीज़'।



2008 में तड़क-भड़क के साथ आईपीएल की शुरुआत हुई। सेट मैक्स में आने वाले आईपीएल को सोचकर ही मन रोमांचित हो रहा था।

 इंटरनेट से पहले वाले काल में किताबों के पन्नों में खिलाड़ियों की लिस्ट बना पन्ने पलट पेज़ नम्बर के हिसाब से चौके छक्के मारने से लेकर क्रिकेट ग्राउंड तक क्रिकेट ही क्रिकेट था। सचिन, सहवाग और धोनी को एकदूसरे के खिलाफ़ खेलते देख दर्शकों के बीच आईपीएल की लोकप्रियता बढ़ती गई। रिकी पोंटिंग, शेन वार्न ,फ्लिंटॉफ से लेकर विश्व का हर बड़ा क्रिकेटर इस लीग में शामिल हुआ। अपने तेरह वर्षों के सफर में आईपीएल ने लोकप्रियता के साथ बहुत से विवाद देखे, आईपीएल के शुरुआती सितारों में अब कुछ ही अपने आखिरी वर्षों का क्रिकेट खेल रहे हैं।

 पिछले कुछ वर्षों में विश्व क्रिकेट के पटल पर ऐसे बड़े खिलाड़ी कम ही हुए हैं जो सिर्फ अपने नाम से ही भीड़ खींचने में समर्थ हों। इस बीच पिछले कुछ वर्षों से सड़क सुरक्षा को लेकर एक क्रिकेट सीरीज़ खेली जा रही है 'अनएकेडमी रोड सेफ्टी वर्ल्ड सीरीज़'।
 5 मार्च से शुरू हुई इस सीरीज में पिछले साल कोरोना से पहले खेली जा रही अधूरी 'अनएकेडमी रोड सेफ्टी वर्ल्ड सीरीज़' के आगे का हिस्सा खेला जा रहा है। 
इस सीरीज़ को सड़क सुरक्षा के प्रति जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से खेला जा रहा है जहां आप सचिन, सहवाग, जोंटी रोड्स, युवराज, इऱफान पठान जैसे अपने पसंदीदा खिलाड़ियों को खेलते देख सकते हैं।

बीसीसीआई द्वारा जिस तरीके से आईपीएल का प्रचार प्रसार किया जाता है वैसा इस सीरीज़ के लिए नही किया जाता। इसके पीछे कारण यही है कि यह सीरीज़ बीसीसीआई को वैसा राजस्व नही दे सकती जैसा आईपीएल देता है। 
किसी भी खेल को दर्शक ही बड़ा छोटा बनाते हैं। भारत में क्रिकेट आज जहां है उसका कारण है कि वह भारतीयों के बीच सबसे ज्यादा देखा और खेला जाने वाला खेल है। एक अच्छे उद्देश्य और लोगों के बीच सड़क सुरक्षा को लेकर जागरूकता लाने के लिए यह सीरीज़ देखी जा सकती है।

क्यों जरूरी है सड़क सुरक्षा के प्रति जागरूकता

कार में खड़े होकर नाच रही दुल्हन के साथ बाकि बारातियों की खुशी तब मातम में बदल गई जब सड़क पर चल रही बारात को चीरते हुए एक अनियंत्रित कार तेज़ी से निकल गई, इस दुर्घटना में एक बाराती की मौत हो गई थी। सोशल मीडिया पर वायरल इस वीडियो में हमें भारतीयों की सड़क सुरक्षा के प्रति लापरवाही का एक उदाहरण भर मिलता है।

भारतीय सड़क परिवहन मंत्रालय के वर्ष 2018 के सड़क हादसों के आंकड़े से हमें इनकी भयावहता का अनुमान लग जाता है। जिसके अनुसार वर्ष 2018 में लगभग डेढ़ लाख लोगों ने सड़क हादसों में अपनी जान गंवायी थी।

सड़क पर वाहन चलाने की बात हो तो सीधी सड़क को सबसे सुरक्षित माना जाता है पर आंकड़ों के अनुसार उन डेढ़ लाख लोगों में से 97 हज़ार चालकों ने सीधी सड़क पर ही अपनी जान गंवाई थी। मोड़ों पर अपनी जान गंवाने वाले 20 हज़ार चालक थे।

पुरुषों को वाहन चलाने में अधिक निपुण समझा जाता है और वाहन चालन में महिलाओं से अधिक संख्या पुरुषों की ही है। सड़क हादसों में मरने वाले 85 फीसदी पुरुष थे।
सड़क पर चलते हुए हम किसी उम्रदराज चालक की धीमी गति का उपहास उड़ाते हैं पर आंकड़ो के अनुसार तेज़ गति के कारण ही सबसे अधिक सड़क हादसे होते हैं। इन आंकड़ों के अनुसार डेढ़ लाख में से 98 हज़ार लोगों ने तेज़ गति के कारण ही अपनी जान गंवायी थी और उसमें 25-45 आयु वर्ग के युवा सबसे अधिक थे।

ड्राईविंग लाइसेंस मिलने की आसान प्रकिया के कारण अप्रशिक्षित वाहन चालक सड़क पर उतर अन्य वाहनों के लिये खतरा बन जाते हैं। हाईवे पर हल्के और धीरे चलने वाले वाहनों को अपनी बायीं ओर चलना चाहिए पर ऐसे चालक अपनी लेन के मध्य और दायीं ओर तेज़ गति में चलते हैं।

सड़क कानून पालन का सख्ती से पालन ना करवाए जाने के कारण बहुत से नाबालिग सड़क पर खतरनाक तरीके से वाहन चलाते दिख जाते हैं।
युवाओं को महंगी और शक्तिशाली इंजन की बाइकों को चलाने का शौक़ होता है। बाइकों में पीछे से आते वाहनों को देखने के लिए प्रयोग में आने वाले शीशों को निकालकर और सिर की सुरक्षा के लिये प्रयोग में आने वाले हेलमेट का प्रयोग ना कर बहुत से बाइक चालक अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं।

 तेज़ गति में चलते वाहन ट्रैफिक सिग्नलों पर रेड लाइट तोड़कर दुर्घटनाओं में शामिल होते हैं तो बहुत से वाहन सड़क पर लगे बैरियरों से टकरा जाते हैं। गलत दिशा में चलते वाहन भी बहुत सी दुर्घटनाओं के लिये जिम्मेदार होते हैं।

चार पहिया वाहन चालक सीट बेल्ट का प्रयोग नही करते हैं जो दुर्घटना होने पर उनके लिये जानलेवा साबित होता है। वाहन चलाते समय मोबाइल का प्रयोग करने की वजह से कई दुर्घटनाएं होती हैं।
वाहन के इंडिकेटरों का प्रयोग ना करने के कारण या गलत इंडिकेटर प्रयोग के कारण भी कई वाहन दुर्घटनाग्रस्त होते हैं।

शराब पीकर वाहन चलाने पर चालकों की सही समय पर निर्णय लेने की क्षमता समाप्त हो जाती है जिस कारण जरूरत पड़ने पर वाहन चालक सही समय पर ब्रेकों का इस्तेमाल करने में असमर्थ हो जाता है और तेज़ गति में अपनी लेन से हटकर वाहन चलाने पर अन्य लोगों के लिए भी खतरा बन जाता है।

सरकारी तंत्र की असफलता के कारण अपनी समयावधि पार कर चुके कामचलाऊ वाहन भी सडकों पर दौड़ते दिखते हैं। इनमें से बहुत से वाहनों का प्रयोग सवारियों को ढोने के लिए भी किया जाता है।
सड़क पर अतिक्रमण तब तक नही हटता जब तक उसकी वजह से बहुत से वाहन दुर्घटनाग्रस्त ना हो जाएं।

ख़राब गुणवत्ता से बनी सड़कों पर समय से पहले ही गहरे गड्ढे बन जाते हैं और उसके आस-पास के लोग भी उनसे होने वाली दुघर्टनाओं पर उन गड्डों को भरने की जगह मूकदर्शक बन सरकार द्वारा उन्हें भरने का इंतज़ार करते हैं।

बहुत से ड्राइवर हाई और लो बीम की सही जानकारी नही रखते हैं और ना ही इनका प्रयोग करते हैं। लम्बी दृश्यता के लिये हाई बीम का प्रयोग किया जाता है।
 रात्रि में सामने से गाड़ी आने पर लो बीम कर उसको अच्छी दृश्यता दी जाती है क्योंकि हाई बीम की वजह से अंधेरे में सामने से आने वाले वाहन चालक को कुछ देर की लिए कुछ नही दिखता है । 
शहरों में लो बीम और हाईवे में हाई बीम का प्रयोग किया जाना चाहिए।

ट्रैफिक पुलिस सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए सड़क पर चलने के नियमों का पालन करवाती है। ट्रैफिक पुलिस को बहुत से बाहरी दबाव में भी काम करना पड़ता है और यदि इन अनावश्यक दबावों से पुलिस को मुक्त रखा जायेगा तो सड़क दुर्घटनाओं में आसानी से कमी लायी जा सकती है।

मोटर यान संशोधित बिल 2019 में ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर जुर्माने और सजा को और भी कड़ा कर दिया गया है जिससे भविष्य में इन दुघर्टनाओं में कमी की उम्मीद की जा सकती है।

सड़क पर चल रहे पैदल राहगीरों के साथ होने वाले हादसों को सड़क के दोनों ओर अधिक से अधिक फुटपाथ बना कर कम किया जा सकता है। सड़क पार करने के लिये जेब्रा क्रॉसिंग का प्रयोग किया जाना चाहिए।
 ज्यादा भीड़भाड़ वाली जगह पर फुटओवर ब्रिज बनाए जाने चाहिए। साइकिल में चलने वालों के लिए पुरे भारत में चंडीगढ़ की तर्ज़ पर अलग लेन बनायी जा सकती हैं।

प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में हो रहे इन हादसों को रोकने के लिए जनता को सड़क सुरक्षा पर जल्द जागरूक होना होगा।

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