Saturday, May 30, 2026

*हिंदी पत्रकारिता दिवस : बदलते मीडिया को समझने की एक जरूरी किताब*

*हिंदी पत्रकारिता दिवस : बदलते मीडिया को समझने की एक जरूरी किताब*

'न्यू मीडिया के विविध आयाम' दिखाती है कि कैसे डिजिटल दौर ने लोगों की आदतों और समाज को किस तरह बदल दिया है. हिंदी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर यह किताब बदलती पत्रकारिता और न्यू मीडिया की चुनौतियों को समझने का अच्छा अवसर देती है.

*न्यू मीडिया के बदलते दौर की पड़ताल*

मीडिया से जुड़ी एक महत्वपूर्ण किताब ‘न्यू मीडिया के विविध आयाम’ समय साक्ष्य प्रकाशन से प्रकाशित होकर आई है. मीडिया से जुड़े 23 लेखों से मिलकर बनी इस किताब का संपादन डॉ. सुशील उपाध्याय ने किया है. भाषा, मीडिया और साहित्य पर कई किताबें लिख चुके सुशील उपाध्याय इस पुस्तक में न्यू मीडिया के बदलते परिदृश्य को अलग-अलग दृष्टियों से सामने लाते हैं.
किताब का कवर पेज पहली नजर में ही ध्यान खींचता है. इसमें इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब और लिंक्डइन जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से जुड़े लोगो दिखाई देते हैं. कवर यह संकेत देता है कि यह किताब सोशल मीडिया के दौर में बदलते मीडिया के नए स्वरूप को समझने की कोशिश करती है.

*एआई और मीडिया की नई चुनौतियां*

किताब की भूमिका में कुछ वर्तनी संबंधी त्रुटियां भी दिखाई देती हैं. उदाहरण के तौर पर कई जगह “डिजिटल” की जगह “डिजीटल” लिखा गया है. हालांकि ये त्रुटियां पुस्तक की विषयवस्तु के महत्व को बहुत प्रभावित नहीं करतीं, लेकिन संपादन के स्तर पर थोड़ी और सावधानी बरती जाती तो किताब और अधिक प्रभावी बन सकती थी.

संपादक डॉ. सुशील उपाध्याय के लिखे पहले लेख में एआई के मीडिया में बढ़ते प्रयोगों और उससे जुड़ी वर्तमान व भविष्य की चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की गई है. लेख केवल तकनीक की संभावनाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके खतरों और दुरुपयोग की ओर भी ध्यान दिलाता है. “रजत शर्मा वियाग्रा का प्रचार करते दिखाई दे रहे हैं” जैसे उदाहरण के जरिए सुशील उपाध्याय यह दिखाते हैं कि एआई की मदद से किस तरह भ्रामक और कृत्रिम सामग्री तैयार की जा सकती है, जो मीडिया की विश्वसनीयता के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है.

*न्यू मीडिया और सामाजिक बदलाव*

किताब में न्यू मीडिया से जुड़े सामाजिक मुद्दों पर भी विस्तार से लिखा गया है और यही इसकी एक बड़ी खासियत बनकर सामने आती है. ‘न्यू मीडिया और महिलाएं’ शीर्षक लेख में बताया गया है कि सोशल मीडिया केवल मनोरंजन या सूचना का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि सामाजिक बदलाव में भी उसकी महत्वपूर्ण भूमिका दिखाई देती है. लेख में यह बात सामने आती है कि घरेलू हिंसा जैसे मुद्दों पर बनाए गए वीडियो और अभियानों का लोगों पर असर पड़ता है. कई लोग ऐसे वीडियो देखकर प्रभावित होते हैं और बाद में इस तरह की घटनाओं को रोकने या उनके खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश भी करते हैं.

हालांकि कई लेखों में मुख्य विषय पर आने से पहले लंबी भूमिका दी गई है, जो कुछ जगहों पर पढ़ने में थोड़ी बोझिल महसूस हो सकती है. कई बार पाठक को शीर्षक से जुड़े मूल मुद्दे तक पहुंचने में अपेक्षा से अधिक समय लगता है. फिर भी अकादमिक किताबों में संदर्भ और पृष्ठभूमि को विस्तार से रखना एक जरूरी हिस्सा माना जाता है, इसलिए इसे पूरी तरह कमजोरी भी नहीं कहा जा सकता.

*न्यूज अवॉइडेंस और बदलती मीडिया संस्कृति*

‘न्यू मीडिया की चुनौती : न्यूज अवॉइडेंस’ शीर्षक लेख पाठकों को सीधे संबोधित करता है और यही बात इसे दिलचस्प बनाती है. यह लेख किताब को पूरी तरह अकादमिक और बोझिल होने से बचाता है. लेख की शुरुआत ही इस पंक्ति से होती है, “आप यह किताब पढ़ रहे हैं, तब भी संभव है कि आपने आज का अखबार नहीं पढ़ा होगा.” यह शैली पाठक को सीधे चर्चा का हिस्सा बना देती है.

लेखों की प्रामाणिकता बनाए रखने के लिए कई जगह आंकड़ों और रिपोर्टों का भी सहारा लिया गया है. उदाहरण के तौर पर रॉयटर्स की डिजिटल न्यूज रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया है कि 2017 के सर्वे में 29 प्रतिशत लोग अक्सर या कभी-कभार चुनिंदा खबरों से परहेज करते थे, जबकि 2022 तक यह आंकड़ा बढ़कर 38 प्रतिशत हो गया. इस तरह के संदर्भ लेखों को केवल विचार आधारित नहीं रहने देते, बल्कि उन्हें तथ्यात्मक आधार भी प्रदान करते हैं.

साथ ही लेख में मीडिया की बदलती दुनिया और नए ट्रेंड को भी सामने रखा गया है. “पत्रकारों का यूट्यूबर बनना आम हो गया है. शिक्षक भी ऑनलाइन है, डॉक्टर भी ऑनलाइन...” जैसी पंक्तियां दिखाती हैं कि डिजिटल दौर ने केवल मीडिया ही नहीं, बल्कि पेशों और संवाद के तरीकों को भी बदल दिया है. यही वजह है कि यह लेख सिर्फ सूचना नहीं देता, बल्कि बदलती मीडिया संस्कृति पर सोचने के लिए भी मजबूर करता है.

*प्रिंट मीडिया के भविष्य पर सवाल*

किताब में ‘प्रिंट इज डेड!’ जैसा गंभीर विषय भी शामिल किया गया है. इस लेख में प्रिंट मीडिया के बदलते भविष्य और उसके सामने खड़ी चुनौतियों पर चर्चा की गई है. लेख में लिखा गया है, “प्रिंट के भविष्य पर बात करते समय दुनिया भर में हो रहे घटनाक्रमों पर भी नजर रखनी होगी. पिछले अस्सी वर्षों से प्रिंट मीडिया में एक दिग्गज की पहचान रखने वाले प्रमुख अमेरिकी समाचार पत्र वाशिंगटन पोस्ट की बिक्री से स्पष्ट है कि अब अखबारों के परंपरागत शैली में काम करने का जमाना तेजी से खत्म हो रहा है.”

यह लेख केवल प्रिंट मीडिया के संकट की बात नहीं करता, बल्कि यह भी दिखाता है कि डिजिटल दौर ने समाचारों के उपभोग और प्रस्तुति के तरीके को किस तेजी से बदल दिया है. यही वजह है कि किताब मीडिया के वर्तमान के साथ-साथ उसके भविष्य को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े करती है.

Friday, May 29, 2026

कम होती बर्फबारी और बढ़ते प्रदूषण की मार झेलता बद्रीनाथ

*कम होती बर्फबारी और बढ़ते प्रदूषण की मार झेलता बद्रीनाथ*

*बद्रीनाथ में बढ़ते धार्मिक पर्यटन और प्लास्टिक कचरे के कारण पारंपरिक जीवनशैली बदल रही है और अलकनंदा समेत आसपास के प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ता जा रहा है.*

उत्तराखंड के बद्रीनाथ धाम में बदलता मौसम, घटती बर्फबारी और बढ़ता धार्मिक पर्यटन अब स्थानीय लोगों के लिए चिंता का कारण बनता जा रहा है. बद्रीनाथ मंदिर के पीछे स्थित झंडा मोहल्ला गांव के निवासी अंबिका प्रसाद कोटियाल के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में यहां के मौसम, पर्यावरण और जीवनशैली में तेजी से बदलाव आया है.

अंबिका प्रसाद कोटियाल (छह भाई) के पिता की बद्रीनाथ में कपड़ों की दुकान और रेस्टोरेंट था, जिसे अब वह संभाल रहे हैं. उनके अनुसार पहले यहां बादलों की गर्जना सुनाई नहीं देती थी, लेकिन पिछले दस-पंद्रह वर्षों में मौसम का स्वरूप बदल गया है. अब यहां अक्सर बादलों की तेज आवाज सुनाई देती है और बेमौसम बारिश भी होने लगी है.

*बर्फबारी घटी, नदियों में पानी कम हुआ*

अंबिका प्रसाद कोटियाल के अनुसार लगभग चालीस साल पहले मंदिर के पीछे की पहाड़ियों में अप्रैल और मई में एक से डेढ़ फुट बर्फ गिरती थी. अब बर्फबारी केवल अक्टूबर, नवंबर, दिसंबर और जनवरी तक सीमित रह गई है और अप्रैल मई में बर्फबारी होती भी है तो वह चार-पांच इंच तक ही होती है. उनका मानना है कि बर्फ कम पड़ने का असर नदियों के जलस्तर पर भी दिखाई दे रहा है और पानी की मात्रा पहले की तुलना में काफी घट गई है.

धार्मिक पर्यटन बढ़ने के साथ यहां के बाजार का स्वरूप भी बदला है. उनके अनुसार पहले श्रद्धालु मुख्य रूप से मंदिर और पूजा-पाठ से जुड़े सामान खरीदते थे, लेकिन अब गर्म कपड़ों का कारोबार तेजी से बढ़ा है.

*खेती बदली, खेतों में बने किराये के ढांचे*

खेती में आए बदलाव को लेकर अंबिका प्रसाद कोटियाल के अनुसार आसपास के गांवों में पहले आलू, फाफर जैसे मोटे अनाज और मूली की खेती बड़े पैमाने पर होती थी. हालांकि पिछले करीब दस वर्षों में खेती का दायरा लगातार घटा है. अब कई लोगों ने अपने खेतों में अस्थायी झुग्गियां और कमरे बनाकर उन्हें किराये पर देना शुरू कर दिया है.

उनके अनुसार पर्यटन आधारित गतिविधियां अब स्थानीय अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा बनती जा रही हैं और पारंपरिक खेती धीरे-धीरे पीछे छूट रही है.

*प्लास्टिक, कूड़ा और बदलते पर्यावरण के साथ दूषित होती अलकनंदा*

अलकनंदा नदी, कूड़े और बढ़ते निर्माण को लेकर भी स्थानीय लोग चिंता जता रहे हैं. अंबिका प्रसाद कोटियाल के अनुसार लगभग तीस साल पहले यहां बहुत कम कूड़ा निकलता था और उसमें अधिकतर मालू के पत्तों से बनी प्लेटें जैसी प्राकृतिक चीजें होती थीं, जो पर्यावरण के लिए नुकसानदेह नहीं थीं. स्थानीय लोग उसे जमीन में दबा देते थे. अब स्थिति यह है कि बद्रीनाथ से ट्रकों में भरकर प्लास्टिक का कूड़ा बाहर ले जाना पड़ रहा है.

उन्होंने तप्त कुंड को लेकर भी चिंता व्यक्त की. उनके अनुसार तप्त कुंड का गर्म पानी प्राकृतिक रूप से औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है, जिसमें श्रद्धालु दर्शन से पहले स्नान करते हैं. लेकिन अब कई लोग वहां साबुन और शैंपू का इस्तेमाल करने लगे हैं. यह पानी सीधे अलकनंदा नदी में जाकर मिल रहा है, जिससे नदी के प्रदूषण को लेकर स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ती जा रही है.

*तुलसी की महक हुई है कम और बद्रीनाथ में दिखने लगी मक्खियां*

भास्कर डिमरी, बद्रीनाथ-केदारनाथ समिति के पूर्व सदस्य भी रह चुके हैं, उनके अनुसार पिछले पंद्रह वर्षों में यहां की तुलसी में भी बदलाव देखने को मिला है. उनका कहना है कि पहले यहां उगने वाली तुलसी की महक दूर तक महसूस होती थी, लेकिन अब उसकी खुशबू और आकार दोनों कम हो गए हैं.

भास्कर डिमरी के अनुसार पिछले दो वर्षों से यहां मक्खियां और उनसे मिलते-जुलते अन्य कीट-पतंगे भी दिखाई देने लगे हैं. उनका मानना है कि बढ़ते कूड़े और बदलते पर्यावरणीय हालात इसके पीछे की एक वजह हो सकते हैं.

Friday, May 22, 2026

तड़ियाल सिस्टर्स

*धाकड़ हैं छोरियां पौड़ी की : दिल्ली के जूडो मैट से अंतरराष्ट्रीय एरीना तक तड़ियाल सिस्टर्स*

माता-पिता की जिद और बेटियों के समर्पण ने भारत को चार ऐसी खिलाड़ी दी हैं, जो आज दुनिया भर में देश का नाम रोशन कर रही हैं. दूरस्थ क्षेत्रों में खेल सुविधाओं की सीमित पहुंच के बीच यह कहानी लाखों युवाओं को खेलों में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है.

*घर से बाहर सीमित खर्चे के बावजूद पदक*

मूल रूप से उत्तराखंड के पौड़ी जिले की रहने वाली तड़ियाल बहनों का सफर दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम से शुरू होकर अब अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच गया है. हरियाणा की फोगट बहनों की तरह खेल जगत में ‘तड़ियाल सिस्टर्स’ के नाम से मशहूर इन चार बहनों के पिता राजेंद्र सिंह तड़ियाल डिफेंस में रहे हैं और राष्ट्रीय स्तर पर हॉकी खेल चुके हैं. मां लाजवंती तड़ियाल भी पौड़ी की ही हैं और एथलेटिक्स से जुड़ी रही हैं.

उस दौर में लड़कियों का जूडो और मार्शल आर्ट्स जैसे खेलों में जाना आम बात नहीं थी. लेकिन स्पोर्ट्स बैकग्राउंड वाले इस परिवार ने सामाजिक सोच से ज्यादा अपनी बेटियों के सपनों को महत्व दिया और खेल से जुड़ी सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए दिल्ली में शिफ्ट हो गया. अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए स्नेहा तड़ियाल बताती हैं कि दिल्ली जैसे शहर में पिता की सीमित कमाई के साथ खेल को चुनना आसान नहीं था. कई बार चारों बहनें केवल दो सौ रुपये लेकर घर से बाहर किसी चैंपियनशिप में हिस्सा लेने जाती थीं और वहां से पदक जीतकर लौटती थीं.

*सुचिका तड़ियाल ने सबसे पहले रास्ता बनाया*

https://www.instagram.com/suchika_tariyal

सुचिका तड़ियाल ने कम उम्र में ही जूडो में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनानी शुरू कर दी थी. बाद में वह आठ बार की राष्ट्रीय जूडो चैंपियन बनीं. उन्होंने कॉमनवेल्थ जूडो चैंपियनशिप और साउथ एशियन गेम्स में भी भारत के लिए पदक जीते.

इसके बाद उन्होंने जू-जित्सु और फिर मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स की तरफ कदम बढ़ाया. ग्रीस में आयोजित JJIF जू-जित्सु वर्ल्ड चैंपियनशिप में उन्होंने गोल्ड मेडल जीता.

अब वह अंतरराष्ट्रीय MMA सर्किट में भी भारत का प्रतिनिधित्व कर रही हैं. BRAVE Combat Federation जैसे मंचों पर उतरकर उन्होंने भारतीय महिला फाइटर्स की नई पहचान बनाई है.

उनकी खासियत ग्रैपलिंग और सबमिशन तकनीक मानी जाती है. यही वजह है कि उन्हें भारत की उभरती हुई महिला MMA फाइटर्स में गिना जाता है. दिल्ली के जूडो मैट से शुरू हुआ उनका सफर अब अंतरराष्ट्रीय फाइट एरीना तक पहुंच चुका है.

*एक और तड़ियाल का शांत स्वभाव लेकिन आक्रामक खेल*

ताइविथा तड़ियाल ने भी जूडो में अपनी अलग पहचान बनाई. उन्होंने 2018 में जयपुर में आयोजित कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप में अंडर-44 किलोग्राम वर्ग में गोल्ड मेडल जीता था. इसके बाद 2019 में विशाखापट्टनम इंडिया चैंपियनशिप में उन्होंने ब्रॉन्ज मेडल भी हासिल किया.

उनकी फाइटिंग शैली में संतुलन और ग्रिप कंट्रोल को खास माना जाता है.

*कोचिंग की दुनिया में नाम बना रही एक तड़ियाल सिस्टर*

शालिनी तड़ियाल ने शुरू से ही दिल्ली के जेएलएन स्टेडियम में ट्रेनिंग के दौरान तकनीक और फिटनेस पर लगातार काम किया.

राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते हुए उन्होंने खेल की तकनीकी बारीकियों पर ज्यादा ध्यान दिया. उन्होंने जापान में हुई एशियन जूनियर चैंपियनशिप में भी भाग लिया, हालांकि वहां उन्हें पदक हासिल नहीं हो सका. आज वह जूडो कोच के तौर पर अपनी पहचान बना रही हैं.

*स्नेहा तड़ियाल ने खेल से वर्दी तक का सफर तय किया*

स्नेहा तड़ियाल ने भी अपनी बड़ी बहनों की तरह जूडो से खेल सफर शुरू किया. पिता राजेंद्र सिंह उन्हें हॉकी का गोलकीपर बनते देखना चाहते थे, लेकिन दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में ट्रेनिंग के दौरान स्नेहा ने प्रतियोगी जूडो में हिस्सा लिया और जूडो के दांव-पेंच में महारत हासिल कर ली.

उन्होंने 13वीं विश्व सीनियर कुराश चैंपियनशिप 2022 (पुणे, महाराष्ट्र) में +87 किलोग्राम भार वर्ग में रजत पदक जीतकर भारत का नाम रोशन किया. स्नेहा ने जिम्नास्टिक में भी हाथ आजमाया है. खेलो इंडिया के तहत प्रशिक्षण प्राप्त करते हुए उन्होंने 38वें राष्ट्रीय खेलों में असंगत बार्स (Uneven Bars) में रजत और फ्लोर एक्सरसाइज (Floor Exercise) में कांस्य पदक जीता.

इन दिनों स्नेहा तड़ियाल उत्तराखंड पुलिस में सब इंस्पेक्टर के तौर पर सेवाएं दे रही हैं.

Thursday, May 21, 2026

धाकड़ हैं - धाकड़ हैं : छोरी तो पौढ़ी की भी धाकड़ हैं

*धाकड़ हैं छोरियां पौड़ी की : दिल्ली के जूडो मैट से अंतरराष्ट्रीय एरीना तक तड़ियाल सिस्टर्स*

माता - पिता की जिद और बेटियों के समर्पण ने भारत को चार ऐसी खिलाड़ी दी हैं, जो आज दुनिया भर में भारत का नाम रोशन कर रही हैं. दूरस्थ क्षेत्रों में स्पोर्ट्स की सीमित पहुंच के बीच ऐसी कहानी लाखों युवाओं को खेल में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं.

*घर से बाहर सीमित खर्चे के बावजूद पदक*

मूल रूप से उत्तराखंड के पौड़ी जिले की रहने वाली तड़ियाल बहनों का सफर दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम से शुरू होकर अब अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच गया है. हरियाणा की फोगट बहनों की तरह ही खेल जगत में 'तड़ियाल सिस्टर्स' के नाम से मशहूर इन चार बहनों के पौड़ी में रहने वाले पिता राजेंद्र सिंह तड़ियाल डिफेंस में रहे और राष्ट्रीय स्तर पर हॉकी खेल चुके हैं. मां लाजवंती तड़ियाल भी पौड़ी की ही हैं और एथलेटिक्स से जुड़ी रहीं.

उस दौर में लड़कियों का जूडो और मार्शल आर्ट्स जैसे खेलों में जाना आम बात नहीं थी. लेकिन स्पोर्ट्स बैकग्राउंड वाले इस परिवार ने सामाजिक सोच से ज्यादा अपनी बेटियों के सपनों को महत्व दिया और खेल से जुड़ी सभी सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए दिल्ली में शिफ्ट हो गए. अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए स्नेहा तड़ियाल ने बताया कि दिल्ली जैसे शहर में पिता की सीमित कमाई के साथ स्पोर्ट्स को चुनना आसान नहीं था, कई बार हम चारों बहनें दो सौ रुपए लेकर भी घर से बाहर किसी चैंपियनशिप में हिस्सा लेने गए हैं और वहां से पदक जीतकर भी आते थे.

*सुचिका तड़ियाल ने सबसे पहले रास्ता बनाया*

https://www.instagram.com/suchika_tariyal

उन्होंने कम उम्र में ही जूडो में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनानी शुरू कर दी थी. बाद में वह आठ बार की राष्ट्रीय जूडो चैंपियन बनीं. कॉमनवेल्थ जूडो चैंपियनशिप और साउथ एशियन गेम्स में भी भारत के लिए पदक जीते.

इसके बाद उन्होंने जू जित्सु और फिर मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स की तरफ कदम बढ़ाया. ग्रीस में आयोजित JJIF जू जित्सु वर्ल्ड चैंपियनशिप में उन्होंने गोल्ड मेडल जीता.

अब वह अंतरराष्ट्रीय MMA सर्किट में भी भारत का प्रतिनिधित्व कर रही हैं. BRAVE Combat Federation जैसे मंचों पर उतरकर उन्होंने भारतीय महिला फाइटर्स की नई पहचान बनाई है.

उनकी खासियत ग्रैपलिंग और सबमिशन तकनीक मानी जाती है. यही वजह है कि उन्हें भारत की उभरती हुई महिला MMA फाइटर्स में गिना जाता है.

दिल्ली के जूडो मैट से शुरू हुआ उनका सफर अब अंतरराष्ट्रीय फाइट एरीना तक पहुंच चुका है.

*एक और तड़ियाल का शांत स्वभाव लेकिन आक्रामक खेल*

ताइविथा तड़ियाल ने भी जूडो में अपनी अलग पहचान बनाई. उन्होंने 2018 में जयपुर में आयोजित कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप में U-44 किलोग्राम वर्ग में गोल्ड मेडल जीता था और इसके बाद 2019 में विशाखापट्टनम इंडिया चैंपियनशिप में उन्होंने ब्रॉन्ज मेडल भी जीता. 

उनकी फाइटिंग शैली में संतुलन और ग्रिप कंट्रोल को खास माना जाता है. 

*कोचिंग की दुनिया में नाम बना रही एक तड़ियाल सिस्टर*

शालिनी तड़ियाल ने शुरू से ही दिल्ली के जेएलएन स्टेडियम में ट्रेनिंग के दौरान तकनीक और फिटनेस पर लगातार काम किया.

राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते हुए उन्होंने खेल की तकनिकी बारीकियों पर ज्यादा ध्यान दिया, उन्होंने जापान में हुए एशियन चैंपियनशिप जूनियर में भाग लिया पर वहां शालिनी को कोई पदक हासिल नहीं हुआ. आज वह जूडो कोच के तौर पर स्थापित हैं.

*स्नेहा तड़ियाल ने खेल से वर्दी तक का सफर तय किया*

स्नेहा तड़ियाल ने भी अपनी बड़ी बहनों की तरह जूडो से खेल सफर शुरू किया. पिता राजेंद्र सिंह उन्हें हॉकी का गोलकीपर बनते देखना चाहते थे लेकिन दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में ट्रेनिंग के दौरान स्नेहा ने प्रतियोगी जूडो में हिस्सा लिया और जुडो के दांवपेंच में परफेक्ट बन गईं. 

उन्होंने 13वीं विश्व सीनियर कुराश चैंपियनशिप 2022 (पुणे, महाराष्ट्र) में +87 किग्रा भार वर्ग में रजत (Silver) पदक जीतकर भारत का नाम रोशन किया था. स्नेहा जिम्नास्टिक में हाथ आजमा रही हैं और उन्होंने खेलो इंडिया (Khelo India) के तहत प्रशिक्षण प्राप्त करते हुए 38वें राष्ट्रीय खेलों में असंगत बार्स (Uneven Bars) में रजत और फ्लोर एक्सरसाइज (Floor Exercise) में कांस्य पदक जीता है.

इन दिनों स्नेहा तड़ियाल उत्तराखंड पुलिस में सब इंस्पेक्टर के तौर पर सेवाएं दे रही हैं.

Saturday, May 16, 2026

माणा

  • प्रधानमंत्री द्वारा माणा को “देश का पहला गांव” कहे जाने और सोशल मीडिया पर लोकप्रिय होने के बाद यहां पर्यटकों की संख्या कितनी बढ़ी है, और इसका गांव की रोजमर्रा की जिंदगी पर क्या असर पड़ा है?

  • क्या बढ़ते पर्यटन के साथ कूड़ा, प्लास्टिक, पानी और सफाई जैसी समस्याएं भी बढ़ी हैं, और क्या गांव की व्यवस्था इस दबाव को संभाल पा रही है?

  • स्थानीय लोग मौसम में क्या बदलाव महसूस कर रहे हैं — जैसे कम बर्फबारी, अनियमित बारिश, तेजी से बदलता मौसम या बढ़ती गर्मी?

  • क्या जलवायु परिवर्तन का असर खेती और पारंपरिक फसलों पर पड़ा है, और क्या गांव अब पहले से ज्यादा पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था पर निर्भर हो गया है?

  • क्या सड़क चौड़ीकरण, होटल, होमस्टे और दूसरे निर्माण कार्यों ने पर्यावरणीय दबाव और भूस्खलन जैसे खतरों को बढ़ाया है?

  • गांव के बुजुर्ग और युवा माणा के बदलते स्वरूप को कैसे देखते हैं — क्या उन्हें लगता है कि पर्यटन अवसर भी लाया है और पारंपरिक जीवनशैली और प्रकृति पर दबाव भी बढ़ा है?


Friday, May 15, 2026

*जलवायु परिवर्तन और धार्मिक पर्यटन से जूझता त्रियुगी नारायण*

उत्तराखंड में राजधानी देहरादून से लगभग 255 किलोमीटर दूर स्थित त्रियुगी नारायण गांव, त्रियुगी नारायण मंदिर के लिए प्रसिद्ध है. श्री केदारनाथ जी आने वाले यात्री सोनप्रयाग से होकर लगभग तेरह किलोमीटर दूर त्रियुगी नारायण पहुंचते हैं. रुद्रप्रयाग जिले की ऊखीमठ तहसील में समुद्र तल से करीब 1,980 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह गांव पौराणिक मान्यताओं, धार्मिक आस्था और हिमालयी संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है.

मान्यता है कि इसी स्थान पर भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था और मंदिर परिसर में जल रही अखंड धूनी को उसी विवाह की अग्नि माना जाता है. हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंचते हैं, लेकिन बढ़ता धार्मिक पर्यटन और बदलता मौसम अब गांव के सामने नई चुनौतियां भी खड़ी कर रहा है.

*पांच फीट बर्फ से आधे फीट तक सिमटा पहाड़ का मौसम*

मंदिर के तीर्थ पुरोहित कैलाश चंद्र गैरोला के अनुसार लगभग तीन हजार की आबादी वाले त्रियुगी नारायण गांव का मौसम पिछले चार पांच वर्षों में काफी बदल गया है. कभी दिसंबर, जनवरी और फरवरी में यहां पांच छह फीट तक बर्फ गिरती थी और उसकी वजह से लोग अपने घरों से बाहर तक नहीं निकल पाते थे. अब हालात यह हैं कि इस साल फरवरी में मुश्किल से एक से डेढ़ फीट बर्फ ही गिरी.

उनका मानना है कि मौसम का चक्र तेजी से बदल रहा है. जून जैसी गर्मी अब मई में ही महसूस होने लगी है.

गांव से करीब पांच किलोमीटर दूर तोषी क्षेत्र में कभी कभी भूस्खलन होता रहता है. वहां सड़क के पास एक जगह पानी के स्त्रोत से निकलकर जमा हो रहा पानी लगातार बढ़ रहा है. स्थानीय लोगों के अनुसार सड़क निर्माण के दौरान उस जगह पर मिट्टी डाल दी गई है, लेकिन गांव वाले इसे भविष्य के खतरे के रूप में देख रहे हैं.

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) से जुड़े वैज्ञानिकों के एक अध्ययन के अनुसार गंगोत्री क्षेत्र में गर्मियों के दौरान ब्लैक कार्बन जैसे प्रदूषक कणों की मात्रा बढ़ जाती है. वैज्ञानिकों का मानना है कि ये कण हिमालयी ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की एक बड़ी वजह बन रहे हैं.

*खेती सिकुड़ी, राजमा और आलू तक सिमटा गांव*

कैलाश चंद्र गैरोला के अनुसार गांव की खेती भी पहले जैसी नहीं रही. कभी यहां कई तरह की फसलें होती थीं, लेकिन अब गांव मुख्य रूप से आलू और राजमा तक सिमट गया है. हालांकि गांव के आसपास जंगलों में आग की घटनाएं अपेक्षाकृत कम हैं और पानी के स्रोत अभी भी ठीक ठाक स्थिति में माने जाते हैं.

त्रियुगी नारायण में पलायन भी बहुत कम देखने को मिलता है. गांव के अधिकांश परिवार मंदिर और उससे जुड़े धार्मिक कार्यों पर निर्भर हैं. तीर्थ यात्रियों की आवाजाही यहां की स्थानीय अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार बन चुकी है.

*सोशल मीडिया से बढ़ा धार्मिक पर्यटन, गांव पर बढ़ा दबाव*

उत्तराखंड पर्यटन विभाग के आंकड़ों के अनुसार चारधाम यात्रा में श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है. 2024 में चारधाम यात्रा में लगभग 45 लाख से अधिक यात्री पहुंचे थे, जबकि 2025 में यह संख्या बढ़कर करीब 51 लाख तक पहुंच गई. अकेले केदारनाथ धाम में 2025 में 16 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने दर्शन किए. केदारनाथ मार्ग से जुड़े त्रियुगी नारायण जैसे छोटे हिमालयी गांवों पर भी बढ़ते धार्मिक पर्यटन का सीधा दबाव पड़ रहा है. 

गांव के लोगों को लगता है कि सोशल मीडिया ने त्रियुगी नारायण को नई पहचान दी है. पिछले कुछ सालों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंच रहे हैं, लेकिन इसके साथ समस्याएं भी बढ़ी हैं. गांव के आसपास गंदगी और बदबू की शिकायत अब आम होती जा रही है. कई जगह कूड़ा जमा रहता है.

स्थानीय निवासी राजेश भट्ट के मुताबिक साफ सफाई की व्यवस्था सीमित है. जिला पंचायत की ओर से पंद्रह बीस दिन में सफाई के लिए कर्मचारी आते हैं, लेकिन लगातार बढ़ती भीड़ के सामने यह व्यवस्था काफी नहीं पड़ती.

Thursday, May 14, 2026

जलवायु परिवर्तन और धार्मिक पर्यटन से जूझता त्रियुगी नारायण

*जलवायु परिवर्तन और धार्मिक पर्यटन से जूझता त्रियुगी नारायण*


उत्तराखंड में राजधानी देहरादून से लगभग 255 किलोमीटर दूर स्थित त्रियुगी नारायण गांव, त्रियुग नारायण मंदिर के लिए प्रसिद्ध है. श्री केदारनाथ जी आने वाले यात्री सोनप्रयाग से होकर लगभग तेरह किलोमीटर दूर त्रियुगी नारायण पहुंचते हैं. रुद्रप्रयाग जिले की ऊखीमठ तहसील में समुद्र तल से करीब 1,980 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह गांव पौराणिक मान्यताओं, धार्मिक आस्था और हिमालयी संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है.

मान्यता है कि इसी स्थान पर भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था और मंदिर परिसर में जल रही अखंड धूनी को उसी विवाह की अग्नि माना जाता है. हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंचते हैं, लेकिन बढ़ता धार्मिक पर्यटन और बदलता मौसम अब गांव के सामने नई चुनौतियां भी खड़ी कर रहा है.

*पांच फीट बर्फ से आधे फीट तक सिमटा पहाड़ का मौसम*


मंदिर के तीर्थ पुरोहित कैलाश चंद्र गैरोला के अनुसार लगभग तीन हजार की आबादी वाले त्रियुग नारायण गांव का मौसम पिछले चार पांच वर्षों में काफी बदल गया है. कभी दिसंबर, जनवरी और फरवरी में यहां पांच छह फीट तक बर्फ गिरती थी और उसकी वजह से लोग अपने घरों से बाहर तक नहीं निकल पाते थे. अब हालात यह हैं कि इस साल फरवरी में मुश्किल से एक से डेढ़ फीट बर्फ ही गिरी.

उनका मानना है कि मौसम का चक्र तेजी से बदल रहा है. जून जैसी गर्मी अब मई में ही महसूस होने लगी है.

गांव से करीब पांच किलोमीटर दूर तोषी क्षेत्र में कभी कभी भूस्खलन होता रहता है. वहां सड़क के पास एक जगह पानी के स्त्रोत से जमा हो रहा पानी लगातार बढ़ रहा है. स्थानीय लोगों के अनुसार सड़क निर्माण के दौरान उस जगह पर मिट्टी डाल दी गई है, लेकिन गांव वाले इसे भविष्य के खतरे के रूप में देख रहे हैं.


*खेती सिकुड़ी, राजमा और आलू तक सिमटा गांव*


कैलाश चंद्र गैरोला के अनुसार गांव की खेती भी पहले जैसी नहीं रही. कभी यहां कई तरह की फसलें होती थीं, लेकिन अब गांव मुख्य रूप से आलू और राजमा तक सिमट गया है. हालांकि गांव के आसपास जंगलों में आग की घटनाएं अपेक्षाकृत कम हैं और पानी के स्रोत अभी भी ठीक ठाक स्थिति में माने जाते हैं.

त्रियुग नारायण में पलायन भी बहुत कम देखने को मिलता है. गांव के अधिकांश परिवार मंदिर और उससे जुड़े धार्मिक कार्यों पर निर्भर हैं. तीर्थ यात्रियों की आवाजाही यहां की स्थानीय अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार बन चुकी है.


*सोशल मीडिया से बढ़ा धार्मिक पर्यटन, गांव पर बढ़ा दबाव*


गांव के लोगों को लगता है कि सोशल मीडिया ने त्रियुग नारायण को नई पहचान दी है. पिछले कुछ सालों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंच रहे हैं, लेकिन इसके साथ समस्याएं भी बढ़ी हैं. गांव के आसपास गंदगी और बदबू की शिकायत अब आम होती जा रही है.

कैलाश चंद्र गैरोला के मुताबिक साफ सफाई की व्यवस्था सीमित है. जिला पंचायत की ओर से पंद्रह बीस दिन में सफाई के लिए कर्मचारी आते हैं, लेकिन लगातार बढ़ती भीड़ के सामने यह व्यवस्था काफी नहीं पड़ती.


*परंपराएं अब भी कायम, वन्यजीवों का बढ़ता खतरा*


त्रियुग नारायण में महिलाओं से जुड़ी कई पारंपरिक मान्यताएं अब भी निभाई जाती हैं. पीरियड्स के दौरान महिलाएं तीन दिन तक रसोई से अलग रहती हैं. पहले प्रसव के समय महिलाओं को इक्कीस दिन तक घर से अलग रखने की परंपरा है, जबकि दूसरे प्रसव में अठारह दिन तक अलग रखा जाता है.

मंदिर के तीर्थ पुरोहित राजेश भट्ट के अनुसार गांव में वन्यजीवों का खतरा लगातार बढ़ रहा है. भालू और शेर अक्सर पशुओं पर हमला कर रहे हैं. इस साल एक ही गौशाला में सात मवेशियों को मार दिया गया, जबकि पूरे गांव में पंद्रह बीस मवेशी वन्यजीवों का शिकार हो चुके हैं.



Wednesday, May 13, 2026

170 साल पुराना हिमालय जर्मनी से खोजकर लाए शेखर पाठक

*170 साल पुराना "हिमालय" जर्मनी से खोजकर लाए शेखर पाठक*

दिल्ली, देहरादून के बाद अब नैनीताल की प्रदर्शनी में दिख रही हैं "विकास" वाले हिमालय से पुरानी तस्वीर

*19वीं सदी के हिमालय की दुर्लभ झलक*

नैनीताल में इन दिनों Himalaya Encounters नाम से एक प्रदर्शनी लगी है, दर्शकों को यह प्रदर्शनी 19वीं सदी के हिमालय में ले जाती है. प्रदर्शनी में जर्मन खोजकर्ता और वैज्ञानिक भाइयों एडॉल्फ, हरमन और रॉबर्ट श्लागिंटवाइट की दुर्लभ पेंटिंग्स, स्केच और वैज्ञानिक दस्तावेज प्रदर्शित किए गए हैं. इस प्रदर्शनी को खास बनाने में इतिहासकार Shekhar Pathak की बड़ी भूमिका रही है, वह इन दुर्लभ कलाकृतियों को जर्मनी से खोजकर नैनीताल तक लाए हैं.
श्लागिंटवाइट बंधुओं का हिमालयी अभियान 1855 से 1857 के बीच नैनीताल से शुरू हुआ था. भूगोल और भूविज्ञान में प्रशिक्षित इन खोजकर्ताओं ने ईस्ट इंडिया कंपनी के सहयोग से असम की खासी पहाड़ियों से लेकर लद्दाख और बाल्टिस्तान तक लंबी यात्राएं कीं. उस दौर में कैमरे आसानी से उपलब्ध नहीं थे, इसलिए यात्राओं के दौरान हिमालय को दर्ज करने के लिए स्केच, वॉटरकलर और ऑयल पेंटिंग्स का सहारा लिया गया. कठिन परिस्थितियों में पहले फील्ड स्केच और नोट्स तैयार किए जाते थे, जिन्हें बाद में विस्तार देकर कलाकृतियों में बदला जाता था.

प्रदर्शनी में कुल 77 दुर्लभ चित्र और ड्रॉइंग्स रखी गई हैं, जिनमें से 67 मूल पेंटिंग्स श्लागिंटवाइट बंधुओं द्वारा बनाई गई हैं. कुछ चित्र ऐसे भी हैं, जिनमें शुरुआती फोटोग्राफी और पेंटिंग का अनोखा मिश्रण दिखाई देता है. ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरों पर हाथ से रंग और बारीक विवरण जोड़कर उन्हें अधिक जीवंत बनाया गया था. नैनीताल से पहले यह प्रदर्शनी दिल्ली और देहरादून में भी लगी थी और वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार ने इस पर एक पोस्ट भी साझा की.

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*तस्वीरों में नैन सिंह रावत की ऐतिहासिक भूमिका*

इस अभियान की सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि यूरोपीय खोजकर्ताओं के साथ इसमें भारतीय सहयोगियों, खासकर पंडित नैन सिंह रावत की भूमिका भी अहम रही. शुरुआत में वह इस यात्रा में सहायक और कुली के रूप में जुड़े थे, लेकिन आगे चलकर हिमालय और मध्य एशिया के सबसे बड़े खोजकर्ताओं में गिने गए.  नैन सिंह ने प्रतिबंधित शहर ल्हासा तक की यात्राएं कीं और ट्रांस हिमालयी व्यापार मार्गों का दस्तावेजीकरण किया, जिसने बाद में मध्य एशिया के नक्शों और गजेटियर तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
शेखर पाठक ने अपने संबोधन में विस्तार से बताया कि नैन सिंह रावत का इस अभियान में कितना बड़ा योगदान था. उन्होंने यह भी बताया कि एक समय हिमालय की एक पूरी पर्वत श्रृंखला का नाम नैन सिंह रावत के नाम पर रखा गया था, जिसे बाद में प्रशासनिक बदलावों के कारण बदल दिया गया. वर्षों बाद नैनीताल में लगी यह प्रदर्शनी नैन सिंह रावत के योगदान को फिर से याद करने का एक महत्वपूर्ण अवसर बन गई है.

*बदलते हिमालय का दस्तावेज है प्रदर्शनी*

इन पेंटिंग्स की सबसे खास बात यह है कि इनमें दिखने वाला हिमालय आज "विकास" वाले हिमालय से बिल्कुल अलग नजर आता है.
प्रोफेसर क्रेट्ज़मान के अनुसार भूगर्भीय समय में 170 साल भले “पलक झपकने जितना समय” हो, लेकिन इन चित्रों और आज के हिमालय के बीच का अंतर बताता है कि पर्यावरण और बुनियादी ढांचे में कितने तेज बदलाव आए हैं.

छात्रों, शोधकर्ताओं और इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए यहां एक विस्तृत कैटलॉग भी उपलब्ध कराया गया है. 

Wednesday, May 6, 2026

बदलते मीडिया पर आई एक जरूरी किताब

मीडिया से जुड़ी एक महत्वपूर्ण किताब ‘न्यू मीडिया के विविध आयाम’ समय साक्ष्य प्रकाशन से प्रकाशित होकर आई है. मीडिया से जुड़े 23 लेखों से मिलकर बनी इस किताब का संपादन डॉ. सुशील उपाध्याय ने किया है. भाषा, मीडिया और साहित्य पर कई किताबें लिख चुके सुशील उपाध्याय इस पुस्तक में न्यू मीडिया के बदलते परिदृश्य को अलग-अलग दृष्टियों से सामने लाते हैं.

किताब का कवर पेज पहली नजर में ही ध्यान खींचता है. इसमें इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब और लिंक्डइन जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से जुड़े लोगो दिखाई देते हैं. कवर यह संकेत देता है कि यह किताब सोशल मीडिया के दौर में बदलते मीडिया के नए स्वरूप को समझने की कोशिश करती है.

किताब की भूमिका में कुछ वर्तनी संबंधी त्रुटियां भी दिखाई देती हैं. उदाहरण के तौर पर कई जगह “डिजिटल” की जगह “डिजीटल” लिखा गया है. हालांकि ये त्रुटियां पुस्तक की विषयवस्तु के महत्व को बहुत प्रभावित नहीं करतीं, लेकिन संपादन के स्तर पर थोड़ी और सावधानी बरती जाती तो किताब और अधिक प्रभावी बन सकती थी.

संपादक डॉ. सुशील उपाध्याय के लिखे पहले लेख में एआई के मीडिया में बढ़ते प्रयोगों और उससे जुड़ी वर्तमान व भविष्य की चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की गई है. लेख केवल तकनीक की संभावनाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके खतरों और दुरुपयोग की ओर भी ध्यान दिलाता है. “रजत शर्मा वियाग्रा का प्रचार करते दिखाई दे रहे हैं” जैसे उदाहरण के जरिए सुशील उपाध्याय यह दिखाते हैं कि एआई की मदद से किस तरह भ्रामक और कृत्रिम सामग्री तैयार की जा सकती है, जो मीडिया की विश्वसनीयता के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है.

Monday, May 4, 2026

जब पहाड़ को मिला अपना सारथी

*जब पहाड़ को मिला अपना सारथी*


अस्कोट आराकोट यात्रा ने न केवल पहाड़ के जीवन को करीब से दिखाया, बल्कि एक ऐसे रिश्ते को भी जन्म दिया जो समय के साथ और गहरा होता चला गया। उमेश को किस्मत से मिली इस यात्रा ने परंपराओं, संघर्षों और बदलाव की संभावनाओं पर सोचने को मजबूर किया।

*यात्रा में बना जीवन भर का साथ*


लीती गाँव से उमेश सिंह कोरंगा अस्कोट आराकोट यात्रा में जुड़े, यात्रा में शामिल एक गाड़ी खराब होने पर 'पहाड़' द्वारा उमेश से टैक्सी के लिए संपर्क किया गया था। 'पहाड़' (PAHAR - People’s Association for Himalaya Area Research) हिमालय के पर्यावरण, संस्कृति, इतिहास और पारिस्थितिकी के अध्ययन, संरक्षण और शोध के लिए समर्पित एक गैर-सरकारी और गैर-लाभकारी संस्था है। 

उस समय न तो उमेश और न ही शेखर पाठक को यह अंदाज़ा था कि उनका साथ इतना लंबा चलेगा। वे एक महीने से अधिक समय तक इस यात्रा का हिस्सा रहे। अब, यात्रा के लगभग दो वर्ष बाद, उमेश ‘पहाड़’ की तरफ से दून लाइब्रेरी, देहरादून में आयोजित "द श्लागिंटवाइट ड्रॉइंग्स" (The Schlagintweit Drawings) नामक एक ऐतिहासिक प्रदर्शनी में काम कर रहे हैं।

उमेश अस्कोट आराकोट यात्रा को याद करते हुए बताते हैं कि यह देखकर अच्छा लगा कि लोग अब भी जल, जंगल और जमीन से गहराई से जुड़े हुए हैं।
यात्रा के दौरान उन्हें केदारनाथ और गंगोत्री जाने का अवसर भी मिला। हालांकि खच्चरों की दयनीय स्थिति और नदियों में कपड़े फेंकने की परंपरा ने उन्हें व्यथित किया।

*पहाड़, परंपराएँ और बदलती सोच*


उमेश कहते हैं कि प्रोफेसर शेखर पाठक से लोगों की पहले से पहचान है, इसलिए जहाँ भी वे जाते हैं, यात्रियों का गर्मजोशी से स्वागत होता है। नए लोगों से मिलकर भी शेखर दा हमेशा उत्साहित रहते हैं। उमेश के अनुसार, शेखर दा स्वयं हिमालय जैसे हैं। वे जहाँ भी जाते हैं, कुछ नहीं भूलते। जगहों और लोगों के नाम उन्हें वर्षों बाद भी याद रहते हैं।

उमेश के गाँव में आज भी पीरियड्स के दौरान महिलाओं को तीन दिन तक गोठ में रखा जाता है। यह एक अलग कमरा होता है, जहाँ कोई नहीं रहता। इस दौरान वे रसोई में नहीं जातीं और पूजा पाठ में भी शामिल नहीं होतीं। पहाड़ की कुछ चोटियों पर जाना भी महिलाओं के लिए प्रतिबंधित है, क्योंकि वहाँ देवी देवताओं का वास माना जाता है।
लेकिन गढ़वाल में अपेक्षाकृत कम प्रतिबंध देखकर उमेश के मन में यह विचार आया कि ये परंपराएँ गलत हैं। वे कहते हैं कि वे अपनी पत्नी के साथ ऐसा व्यवहार नहीं चाहते, लेकिन समाज के डर से खुलकर विरोध भी नहीं कर पाते।

*पलायन, चुनौतियाँ और नई उम्मीदें*


पलायन के सवाल पर उमेश ने बताया कि यात्रा के दौरान उन्होंने चमोली के हिमनी गाँव में देखा कि वहाँ युवा लगभग नहीं थे और गाँव में अधिकतर बुजुर्ग ही रह गए हैं। युवाओं का एक बड़ा हिस्सा तीन महीने तक बुग्यालों में जाकर कीड़ा जड़ी की तलाश करता है। उमेश का मानना है कि सरकार को ऐसे क्षेत्रों में युवाओं के लिए स्थायी रोजगार के अवसर पैदा करने चाहिए।


करुणा और आक्रोश के बीच चक्रव्यूह टूटेगा

*करुणा और आक्रोश के बीच चक्रव्यूह टूटेगा*


किताब की एक कविता में लिखा है, 'कच्ची पगडंडी पर नापा था रास्ता'. इससे यह पता चलता है कि यह कविताएं उन अनुभवों से निकली हैं, जिन्हें कवि ने खुद जिया है. कवि ने गांव से शहर तक का रास्ता किसी पक्की सड़क से नहीं, बल्कि कच्ची पगडंडी पर चलकर तय किया था और वह अपने जैसे लाखों लोगों की कहानी इन कविताओं के जरिए लिखते हैं.

*चक्रव्यूह तोड़ती कविताओं की रचना*


समय साक्ष्य प्रकाशन से आई नई किताब 'चक्रव्यूह टूटेगा' ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविताओं का संकलन है और इसका संपादन डॉ. नरेन्द्र वाल्मीकि ने किया है. कथाक्रम सम्मान, डॉ. अम्बेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार सहित कई पुरस्कार प्राप्त ओमप्रकाश वाल्मीकि का नाम हिंदी साहित्य में दलित विमर्श के अग्रणी हस्ताक्षरों में प्रमुखता से लिया जाता है. देहरादून में रहने वाले शिक्षाविद प्रोफेसर राजेश पाल ने किताब की भूमिका लिखी है. उन्होंने किताब में शामिल लगभग हर कविता का विश्लेषण किया है और इससे किताब को पढ़ने की इच्छा और भी बढ़ जाती है. किताब के शीर्षक 'चक्रव्यूह टूटेगा' कविता पर वह लिखते हैं 'यहां कवि और उसकी भाषा उस परंपरा को छद्म घोषित करती है, जो सदियों से उत्पीड़न को धर्म, मर्यादा और...'

संपादकीय में डॉ. नरेन्द्र वाल्मीकि लिखते हैं कि यह किताब ओमप्रकाश वाल्मीकि की बाईस असंकलित कविताओं का संग्रह है. ये रचनाएं उनके अब तक प्रकाशित चार काव्य संग्रहों में संकलित नहीं हुई हैं. संपादक का यह लिखना महत्वपूर्ण है क्योंकि यही इस किताब के महत्व को बढ़ाता है.

*शब्दों की चोट और समाज का सच*


'शब्द बोध' कविता ओमप्रकाश वाल्मीकि की इस किताब में पहले नंबर पर आती है. इसमें करुणा के साथ आक्रोश भी दिखाई देता है. “पीठ पीछे दिए गए विशेषण” और “फुसफुसाहटों” को कवि ने बिंब की तरह इस्तेमाल किया है. “शब्द बेधी बाणों की तरह” वाला बिंब दिखाता है कि शब्द भी चोट पहुंचाते हैं. हंसों की शक्ल में गिद्धों का बिंब उन लोगों की ओर इशारा करता है जो बाहर से साफ दिखते हैं लेकिन भीतर से हिंसा और शोषण में शामिल हैं. “बारूद” का बिंब कविता को और तीखा बना देता है, यह दबा हुआ गुस्सा कभी भी विस्फोट में बदल सकता है.

*भूख का अनुभव और यथार्थ*

इसके बाद किताब में 'भूख' कविता भी आती है, जिसमें करुण रस प्रमुख है. कविता भूख को बताती नहीं, दिखाती है. “पेड़ की तरह हिलता है” और “हवा की तरह चलता है” जैसे बिंब आदमी की कमजोरी को सामने लाते हैं. “पेट की आग में झुलसकर राख की तरह ठंडा हो जाता है” कविता का सबसे मजबूत बिंब है, यह भूख को पूरी तरह तोड़ देने वाली स्थिति बना देता है.

*संवेदना का दिखावा और यथार्थ*


'मेरे किस काम के' कविता में कवि उन लोगों पर तंज कसते हैं, जिन्हें दूर की चीजों की चिंता तो है लेकिन अपने आसपास के इंसान के दर्द से उनका कोई संबंध नहीं बन पाता.

नर्म हाथों से पोंछते हैं आंसू अपने प्रकृति विनाश पर
वे आंसू : जो कभी नहीं बहे
किसी निर्दोष की हत्या पर

इन पंक्तियों में कवि समाज की दोहरी संवेदना को सामने लाते हैं. यहां करुणा का दिखावा है लेकिन असली करुणा गायब है. प्रकृति के नाम पर बहाए जा रहे आंसू और इंसान की हत्या पर न बहने वाले आंसू के बीच का यह विरोध कविता को अधिक पठनीय बना देता है.

कविता का असर इसी विरोध में है कि संवेदना भी चयनित हो गई है, जहां कुछ दुख दिखाई देते हैं और कुछ को नजरअंदाज कर दिया जाता है.

*करुणा और आक्रोश से बनी कविताएं*


चक्रव्यूह टूटेगा’ सिर्फ कविताओं का संग्रह न होकर जीवन के उस सत्य का बयान है जिसे अक्सर दबा दिया जाता है. इन कविताओं में करुणा है, आक्रोश है, जो पाठक को असहज करने के साथ सोचने पर मजबूर कर देता है.
हालांकि कुछ जगहों पर बिंबों की समानता दिखती है लेकिन यह बात इन कविताओं के प्रभाव को बहुत कम नहीं करती. कुल मिलाकर यह संग्रह हिंदी कविता में उन आवाजों को मजबूती से सामने लाता है, जिन्हें लंबे समय तक हाशिए पर रखा गया.

Sunday, May 3, 2026

स्मृति से आगे बढ़कर उत्तराखंड के मुद्दों को सामने लाती स्मारिका

*स्मृति से आगे बढ़कर उत्तराखंड के मुद्दों को सामने लाती स्मारिका*

स्मारिका अपने समय और समाज दोनों को दर्ज करने की कोशिश करती है. इसमें सामग्री की विविधता और सरोकार साफ दिखाई देते हैं. हालांकि संपादन की छोटी गलतियां इसके प्रभाव को थोड़ा कम कर देती हैं.

33वां उमेश डोभाल स्मृति सम्मान समारोह इस बार अल्मोड़ा में हुआ. 1988 में शराब माफियाओं द्वारा पौड़ी में पत्रकार उमेश डोभाल की हत्या कर दी गई थी और उन्हीं की याद में पत्रकारिता सहित सामाजिक कार्यों से जुड़े अन्य क्षेत्रों में यह प्रतिष्ठित पुरस्कार साल 1991 से लगभग हर साल प्रदान किया जाता है. इस साल प्रिंट मीडिया के लिए यह राजू सजवाण को दिया गया. समारोह के दौरान शामिल लोगों को उमेश डोभाल स्मृति ट्रस्ट की तरफ से प्रकाशित स्मारिका भी दी जाती है.

*उत्तराखंड को समझने के लिए आकर्षित करता कवर पेज*


स्मारिका का कवर पेज उत्तराखंड को समझने वाले हर व्यक्ति को आकर्षित करता है. आवरण चित्र में उत्तराखंड के पहाड़ों की सुंदरता दिखाई देती है और साथ ही उमेश डोभाल पर लिखा वाक्य “उमेश डोभाल एक व्यक्ति नहीं एक धारा थी..” पाठकों को उमेश डोभाल के योगदान की याद दिलाने में सफल रहा है. पिछले आवरण के पोस्टर को आशीष नेगी ने तैयार किया है, जिस पर पुस्तकालय के महत्व को सामने रखती एक कविता लिखी है और यह पत्रकारिता से जुड़ी किताब के लिए परफेक्ट आवरण बन जाता है.

*पुरस्कार की सार्थकता को सिद्ध करते लेख*


किताब में लिखे लेख उत्तराखंड की सामाजिक और बौद्धिक परंपरा को समृद्ध करने वाले कुछ लोगों के जीवन के संस्मरण हैं.

शुरुआत में उमेश डोभाल और ट्रस्ट के बारे में जानकारी देते हुए किताब पाठकों को पूर्व और वर्तमान पुरस्कार विजेताओं के बारे में जानकारी देती है. यह किसी स्मारिका को स्मारिका सा अहसास देने का महत्वपूर्ण हिस्सा है. राजेंद्र रावत राजू जनसरोकार सम्मान वर्ष 2026 किशन सिंह मलड़ा को दिया गया और उनके बारे में किताब में लिखा है कि बंजर भूमि में पौधरोपण करते हुए अब तक 'दस लाख पचहत्तर हजार' से अधिक पौधों का उत्पादन, प्रत्यारोपण और निशुल्क वितरण कार्य संपन्न किया जा चुका है. ऐसा परिचय पुरस्कार की सार्थकता को सिद्ध करने में सफल रहा है.

किताब के अंत में ट्रस्ट द्वारा आय विवरण भी दिया गया है, जो ट्रस्ट की तरफ से खर्चे को लेकर अपनाई गई पारदर्शिता को दिखाता है.

क्रम सूची में मात्राओं की गलती से अर्थ का अनर्थ हुआ है, जैसे कॉरपोरेट घरानों के कब्जे में 'मीडिया' की जगह 'कीडिया' लिखा है. इसे सुधारा जाना चाहिए था क्योंकि स्मारिका में अगले संस्करण तक सुधार के लिए लंबा समय लग जाता है.

*स्मारिका में दर्ज याद और विचार*


कई आलेखों के मिश्रण से तैयार इस स्मारिका का पहला आलेख रमेश पहाड़ी का लिखा है, 'उमेश जिनकी मौत से एकजुट हुआ था समाज', पत्रकार उमेश डोभाल की हत्या से लेकर समारोह की शुरुआत तक का पूरा घटनाक्रम इस आलेख में विस्तार से लिखा गया है.

रविन्द्र सिंह के लिखे अगले आलेख में एक पत्रकार कैसे समाज के लिए उदाहरण बन सकता है, इसे सहज भाषा में रखा गया है. 'अपने जीवन काल में उमेश डोभाल भले ही अकेले रहे थे, पर आज उनकी सोच को सैंकड़ों उमेश आगे बढ़ा रहे हैं'.

'गिर्दा और संघर्षों के वे दिन' आलेख में लेखक पी. सी. तिवारी ने उत्तराखंड के आंदोलनों की कुछ कहानियों को नई पीढ़ी के सामने रखा है. कैसे एक व्यक्ति ने वनों की नीलामी को रोक दिया था, यह किस्सा पढ़ने में बेहद रोचक है. 'लोगों पर नैनीताल की ठंड में पानी की बौछारें पड़ रही थीं, लाठी-डंडे चल रहे थे और गिर्दा गा रहे थे हमर हड़िकनै कि कुर्सी छू तुमरी'.

किताब में उत्तराखंड के जनकवि गिर्दा पर भी खूब जानकारी मिलती है, उनके निजी और सार्वजनिक जीवन पर बेहतरीन ढंग से लिखा गया है. 'यह कोठरी सब आंदोलनकारियों, रंगकर्मियों...'
'गिर्दा अब घर पर खुलेआम बीड़ी भी नहीं पी पाता था'.

*उत्तराखंड के मुद्दों को सामने लाते आलेख*


किताब के आलेखों से हमें उत्तराखंड की समस्याओं को समझने का मौका भी मिलता है, जैसे पृष्ठ संख्या 37 में लिखा है 'काश, पौड़ी अस्पताल में ऐसी गंभीर अवस्था का सामना करने के आवश्यक इंतजामात होते'.

उत्तराखंड के पच्चीस वर्षों पर लिखे आलेख भी किताब में शामिल हैं. जिनमें जय सिंह रावत के लिखे आलेख में पहाड़ की आर्थिक स्थिति पर गंभीरता से सोचने पर मजबूर करते हुए आंकड़े दिए गए हैं, 'पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि का योगदान राज्य की जीडीपी में लगातार गिरकर 2 प्रतिशत के आसपास सिमट जाना...'.

चारु तिवारी के लिखे आलेख में राज्य की बदहाल शिक्षा व्यवस्था को पाठकों के सामने रखा गया है. चारु लिखते हैं, 'इन पच्चीस सालों में 22 पॉलीटेक्निक और 45 आईटीआई सरकारें बंद कर चुकी हैं या वे जर्जर हालत में हैं'.

*समस्याओं पर सीधी बात करते लेख*


'मनोहर चमोली के नरभक्षी जीव को हमेशा के लिए हटाना जरूरी' आलेख में पहाड़ों में गुलदार के मानव पर हमले की महत्वपूर्ण समस्या पर विस्तार से लिखा गया है और गुलदार के शिकार के कारणों को समझने के लिए यह आलेख बेहद महत्वपूर्ण है. जैसे उन्होंने लिखा है, '80 फीसदी का भूभाग छोड़कर कोई गुलदार 20 फीसदी में आए और निरपराध को अपना भोजन बना ले तो यह किस सूरत में स्वीकार्य होगा?'.

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...