किताब का कवर पेज पहली नजर में ही ध्यान खींचता है. इसमें इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब और लिंक्डइन जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से जुड़े लोगो दिखाई देते हैं. कवर यह संकेत देता है कि यह किताब सोशल मीडिया के दौर में बदलते मीडिया के नए स्वरूप को समझने की कोशिश करती है.
किताब की भूमिका में कुछ वर्तनी संबंधी त्रुटियां भी दिखाई देती हैं. उदाहरण के तौर पर कई जगह “डिजिटल” की जगह “डिजीटल” लिखा गया है. हालांकि ये त्रुटियां पुस्तक की विषयवस्तु के महत्व को बहुत प्रभावित नहीं करतीं, लेकिन संपादन के स्तर पर थोड़ी और सावधानी बरती जाती तो किताब और अधिक प्रभावी बन सकती थी.
संपादक डॉ. सुशील उपाध्याय के लिखे पहले लेख में एआई के मीडिया में बढ़ते प्रयोगों और उससे जुड़ी वर्तमान व भविष्य की चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की गई है. लेख केवल तकनीक की संभावनाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके खतरों और दुरुपयोग की ओर भी ध्यान दिलाता है. “रजत शर्मा वियाग्रा का प्रचार करते दिखाई दे रहे हैं” जैसे उदाहरण के जरिए सुशील उपाध्याय यह दिखाते हैं कि एआई की मदद से किस तरह भ्रामक और कृत्रिम सामग्री तैयार की जा सकती है, जो मीडिया की विश्वसनीयता के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है.
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