Monday, May 4, 2026

जब पहाड़ को मिला अपना सारथी

*जब पहाड़ को मिला अपना सारथी*


अस्कोट आराकोट यात्रा ने न केवल पहाड़ के जीवन को करीब से दिखाया, बल्कि एक ऐसे रिश्ते को भी जन्म दिया जो समय के साथ और गहरा होता चला गया। उमेश को किस्मत से मिली इस यात्रा ने परंपराओं, संघर्षों और बदलाव की संभावनाओं पर सोचने को मजबूर किया।

*यात्रा में बना जीवन भर का साथ*


लीती गाँव से उमेश सिंह कोरंगा अस्कोट आराकोट यात्रा में जुड़े, यात्रा में शामिल एक गाड़ी खराब होने पर 'पहाड़' द्वारा उमेश से टैक्सी के लिए संपर्क किया गया था। 'पहाड़' (PAHAR - People’s Association for Himalaya Area Research) हिमालय के पर्यावरण, संस्कृति, इतिहास और पारिस्थितिकी के अध्ययन, संरक्षण और शोध के लिए समर्पित एक गैर-सरकारी और गैर-लाभकारी संस्था है। 

उस समय न तो उमेश और न ही शेखर पाठक को यह अंदाज़ा था कि उनका साथ इतना लंबा चलेगा। वे एक महीने से अधिक समय तक इस यात्रा का हिस्सा रहे। अब, यात्रा के लगभग दो वर्ष बाद, उमेश ‘पहाड़’ की तरफ से दून लाइब्रेरी, देहरादून में आयोजित "द श्लागिंटवाइट ड्रॉइंग्स" (The Schlagintweit Drawings) नामक एक ऐतिहासिक प्रदर्शनी में काम कर रहे हैं।

उमेश अस्कोट आराकोट यात्रा को याद करते हुए बताते हैं कि यह देखकर अच्छा लगा कि लोग अब भी जल, जंगल और जमीन से गहराई से जुड़े हुए हैं।
यात्रा के दौरान उन्हें केदारनाथ और गंगोत्री जाने का अवसर भी मिला। हालांकि खच्चरों की दयनीय स्थिति और नदियों में कपड़े फेंकने की परंपरा ने उन्हें व्यथित किया।

*पहाड़, परंपराएँ और बदलती सोच*


उमेश कहते हैं कि प्रोफेसर शेखर पाठक से लोगों की पहले से पहचान है, इसलिए जहाँ भी वे जाते हैं, यात्रियों का गर्मजोशी से स्वागत होता है। नए लोगों से मिलकर भी शेखर दा हमेशा उत्साहित रहते हैं। उमेश के अनुसार, शेखर दा स्वयं हिमालय जैसे हैं। वे जहाँ भी जाते हैं, कुछ नहीं भूलते। जगहों और लोगों के नाम उन्हें वर्षों बाद भी याद रहते हैं।

उमेश के गाँव में आज भी पीरियड्स के दौरान महिलाओं को तीन दिन तक गोठ में रखा जाता है। यह एक अलग कमरा होता है, जहाँ कोई नहीं रहता। इस दौरान वे रसोई में नहीं जातीं और पूजा पाठ में भी शामिल नहीं होतीं। पहाड़ की कुछ चोटियों पर जाना भी महिलाओं के लिए प्रतिबंधित है, क्योंकि वहाँ देवी देवताओं का वास माना जाता है।
लेकिन गढ़वाल में अपेक्षाकृत कम प्रतिबंध देखकर उमेश के मन में यह विचार आया कि ये परंपराएँ गलत हैं। वे कहते हैं कि वे अपनी पत्नी के साथ ऐसा व्यवहार नहीं चाहते, लेकिन समाज के डर से खुलकर विरोध भी नहीं कर पाते।

*पलायन, चुनौतियाँ और नई उम्मीदें*


पलायन के सवाल पर उमेश ने बताया कि यात्रा के दौरान उन्होंने चमोली के हिमनी गाँव में देखा कि वहाँ युवा लगभग नहीं थे और गाँव में अधिकतर बुजुर्ग ही रह गए हैं। युवाओं का एक बड़ा हिस्सा तीन महीने तक बुग्यालों में जाकर कीड़ा जड़ी की तलाश करता है। उमेश का मानना है कि सरकार को ऐसे क्षेत्रों में युवाओं के लिए स्थायी रोजगार के अवसर पैदा करने चाहिए।


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