Monday, May 4, 2026

करुणा और आक्रोश के बीच चक्रव्यूह टूटेगा

*करुणा और आक्रोश के बीच चक्रव्यूह टूटेगा*


किताब की एक कविता में लिखा है, 'कच्ची पगडंडी पर नापा था रास्ता'. इससे यह पता चलता है कि यह कविताएं उन अनुभवों से निकली हैं, जिन्हें कवि ने खुद जिया है. कवि ने गांव से शहर तक का रास्ता किसी पक्की सड़क से नहीं, बल्कि कच्ची पगडंडी पर चलकर तय किया था और वह अपने जैसे लाखों लोगों की कहानी इन कविताओं के जरिए लिखते हैं.

*चक्रव्यूह तोड़ती कविताओं की रचना*


समय साक्ष्य प्रकाशन से आई नई किताब 'चक्रव्यूह टूटेगा' ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविताओं का संकलन है और इसका संपादन डॉ. नरेन्द्र वाल्मीकि ने किया है. कथाक्रम सम्मान, डॉ. अम्बेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार सहित कई पुरस्कार प्राप्त ओमप्रकाश वाल्मीकि का नाम हिंदी साहित्य में दलित विमर्श के अग्रणी हस्ताक्षरों में प्रमुखता से लिया जाता है. देहरादून में रहने वाले शिक्षाविद प्रोफेसर राजेश पाल ने किताब की भूमिका लिखी है. उन्होंने किताब में शामिल लगभग हर कविता का विश्लेषण किया है और इससे किताब को पढ़ने की इच्छा और भी बढ़ जाती है. किताब के शीर्षक 'चक्रव्यूह टूटेगा' कविता पर वह लिखते हैं 'यहां कवि और उसकी भाषा उस परंपरा को छद्म घोषित करती है, जो सदियों से उत्पीड़न को धर्म, मर्यादा और...'

संपादकीय में डॉ. नरेन्द्र वाल्मीकि लिखते हैं कि यह किताब ओमप्रकाश वाल्मीकि की बाईस असंकलित कविताओं का संग्रह है. ये रचनाएं उनके अब तक प्रकाशित चार काव्य संग्रहों में संकलित नहीं हुई हैं. संपादक का यह लिखना महत्वपूर्ण है क्योंकि यही इस किताब के महत्व को बढ़ाता है.

*शब्दों की चोट और समाज का सच*


'शब्द बोध' कविता ओमप्रकाश वाल्मीकि की इस किताब में पहले नंबर पर आती है. इसमें करुणा के साथ आक्रोश भी दिखाई देता है. “पीठ पीछे दिए गए विशेषण” और “फुसफुसाहटों” को कवि ने बिंब की तरह इस्तेमाल किया है. “शब्द बेधी बाणों की तरह” वाला बिंब दिखाता है कि शब्द भी चोट पहुंचाते हैं. हंसों की शक्ल में गिद्धों का बिंब उन लोगों की ओर इशारा करता है जो बाहर से साफ दिखते हैं लेकिन भीतर से हिंसा और शोषण में शामिल हैं. “बारूद” का बिंब कविता को और तीखा बना देता है, यह दबा हुआ गुस्सा कभी भी विस्फोट में बदल सकता है.

*भूख का अनुभव और यथार्थ*

इसके बाद किताब में 'भूख' कविता भी आती है, जिसमें करुण रस प्रमुख है. कविता भूख को बताती नहीं, दिखाती है. “पेड़ की तरह हिलता है” और “हवा की तरह चलता है” जैसे बिंब आदमी की कमजोरी को सामने लाते हैं. “पेट की आग में झुलसकर राख की तरह ठंडा हो जाता है” कविता का सबसे मजबूत बिंब है, यह भूख को पूरी तरह तोड़ देने वाली स्थिति बना देता है.

*संवेदना का दिखावा और यथार्थ*


'मेरे किस काम के' कविता में कवि उन लोगों पर तंज कसते हैं, जिन्हें दूर की चीजों की चिंता तो है लेकिन अपने आसपास के इंसान के दर्द से उनका कोई संबंध नहीं बन पाता.

नर्म हाथों से पोंछते हैं आंसू अपने प्रकृति विनाश पर
वे आंसू : जो कभी नहीं बहे
किसी निर्दोष की हत्या पर

इन पंक्तियों में कवि समाज की दोहरी संवेदना को सामने लाते हैं. यहां करुणा का दिखावा है लेकिन असली करुणा गायब है. प्रकृति के नाम पर बहाए जा रहे आंसू और इंसान की हत्या पर न बहने वाले आंसू के बीच का यह विरोध कविता को अधिक पठनीय बना देता है.

कविता का असर इसी विरोध में है कि संवेदना भी चयनित हो गई है, जहां कुछ दुख दिखाई देते हैं और कुछ को नजरअंदाज कर दिया जाता है.

*करुणा और आक्रोश से बनी कविताएं*


चक्रव्यूह टूटेगा’ सिर्फ कविताओं का संग्रह न होकर जीवन के उस सत्य का बयान है जिसे अक्सर दबा दिया जाता है. इन कविताओं में करुणा है, आक्रोश है, जो पाठक को असहज करने के साथ सोचने पर मजबूर कर देता है.
हालांकि कुछ जगहों पर बिंबों की समानता दिखती है लेकिन यह बात इन कविताओं के प्रभाव को बहुत कम नहीं करती. कुल मिलाकर यह संग्रह हिंदी कविता में उन आवाजों को मजबूती से सामने लाता है, जिन्हें लंबे समय तक हाशिए पर रखा गया.

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