Sunday, May 3, 2026

स्मृति से आगे बढ़कर उत्तराखंड के मुद्दों को सामने लाती स्मारिका

*स्मृति से आगे बढ़कर उत्तराखंड के मुद्दों को सामने लाती स्मारिका*

स्मारिका अपने समय और समाज दोनों को दर्ज करने की कोशिश करती है. इसमें सामग्री की विविधता और सरोकार साफ दिखाई देते हैं. हालांकि संपादन की छोटी गलतियां इसके प्रभाव को थोड़ा कम कर देती हैं.

33वां उमेश डोभाल स्मृति सम्मान समारोह इस बार अल्मोड़ा में हुआ. 1988 में शराब माफियाओं द्वारा पौड़ी में पत्रकार उमेश डोभाल की हत्या कर दी गई थी और उन्हीं की याद में पत्रकारिता सहित सामाजिक कार्यों से जुड़े अन्य क्षेत्रों में यह प्रतिष्ठित पुरस्कार साल 1991 से लगभग हर साल प्रदान किया जाता है. इस साल प्रिंट मीडिया के लिए यह राजू सजवाण को दिया गया. समारोह के दौरान शामिल लोगों को उमेश डोभाल स्मृति ट्रस्ट की तरफ से प्रकाशित स्मारिका भी दी जाती है.

*उत्तराखंड को समझने के लिए आकर्षित करता कवर पेज*


स्मारिका का कवर पेज उत्तराखंड को समझने वाले हर व्यक्ति को आकर्षित करता है. आवरण चित्र में उत्तराखंड के पहाड़ों की सुंदरता दिखाई देती है और साथ ही उमेश डोभाल पर लिखा वाक्य “उमेश डोभाल एक व्यक्ति नहीं एक धारा थी..” पाठकों को उमेश डोभाल के योगदान की याद दिलाने में सफल रहा है. पिछले आवरण के पोस्टर को आशीष नेगी ने तैयार किया है, जिस पर पुस्तकालय के महत्व को सामने रखती एक कविता लिखी है और यह पत्रकारिता से जुड़ी किताब के लिए परफेक्ट आवरण बन जाता है.

*पुरस्कार की सार्थकता को सिद्ध करते लेख*


किताब में लिखे लेख उत्तराखंड की सामाजिक और बौद्धिक परंपरा को समृद्ध करने वाले कुछ लोगों के जीवन के संस्मरण हैं.

शुरुआत में उमेश डोभाल और ट्रस्ट के बारे में जानकारी देते हुए किताब पाठकों को पूर्व और वर्तमान पुरस्कार विजेताओं के बारे में जानकारी देती है. यह किसी स्मारिका को स्मारिका सा अहसास देने का महत्वपूर्ण हिस्सा है. राजेंद्र रावत राजू जनसरोकार सम्मान वर्ष 2026 किशन सिंह मलड़ा को दिया गया और उनके बारे में किताब में लिखा है कि बंजर भूमि में पौधरोपण करते हुए अब तक 'दस लाख पचहत्तर हजार' से अधिक पौधों का उत्पादन, प्रत्यारोपण और निशुल्क वितरण कार्य संपन्न किया जा चुका है. ऐसा परिचय पुरस्कार की सार्थकता को सिद्ध करने में सफल रहा है.

किताब के अंत में ट्रस्ट द्वारा आय विवरण भी दिया गया है, जो ट्रस्ट की तरफ से खर्चे को लेकर अपनाई गई पारदर्शिता को दिखाता है.

क्रम सूची में मात्राओं की गलती से अर्थ का अनर्थ हुआ है, जैसे कॉरपोरेट घरानों के कब्जे में 'मीडिया' की जगह 'कीडिया' लिखा है. इसे सुधारा जाना चाहिए था क्योंकि स्मारिका में अगले संस्करण तक सुधार के लिए लंबा समय लग जाता है.

*स्मारिका में दर्ज याद और विचार*


कई आलेखों के मिश्रण से तैयार इस स्मारिका का पहला आलेख रमेश पहाड़ी का लिखा है, 'उमेश जिनकी मौत से एकजुट हुआ था समाज', पत्रकार उमेश डोभाल की हत्या से लेकर समारोह की शुरुआत तक का पूरा घटनाक्रम इस आलेख में विस्तार से लिखा गया है.

रविन्द्र सिंह के लिखे अगले आलेख में एक पत्रकार कैसे समाज के लिए उदाहरण बन सकता है, इसे सहज भाषा में रखा गया है. 'अपने जीवन काल में उमेश डोभाल भले ही अकेले रहे थे, पर आज उनकी सोच को सैंकड़ों उमेश आगे बढ़ा रहे हैं'.

'गिर्दा और संघर्षों के वे दिन' आलेख में लेखक पी. सी. तिवारी ने उत्तराखंड के आंदोलनों की कुछ कहानियों को नई पीढ़ी के सामने रखा है. कैसे एक व्यक्ति ने वनों की नीलामी को रोक दिया था, यह किस्सा पढ़ने में बेहद रोचक है. 'लोगों पर नैनीताल की ठंड में पानी की बौछारें पड़ रही थीं, लाठी-डंडे चल रहे थे और गिर्दा गा रहे थे हमर हड़िकनै कि कुर्सी छू तुमरी'.

किताब में उत्तराखंड के जनकवि गिर्दा पर भी खूब जानकारी मिलती है, उनके निजी और सार्वजनिक जीवन पर बेहतरीन ढंग से लिखा गया है. 'यह कोठरी सब आंदोलनकारियों, रंगकर्मियों...'
'गिर्दा अब घर पर खुलेआम बीड़ी भी नहीं पी पाता था'.

*उत्तराखंड के मुद्दों को सामने लाते आलेख*


किताब के आलेखों से हमें उत्तराखंड की समस्याओं को समझने का मौका भी मिलता है, जैसे पृष्ठ संख्या 37 में लिखा है 'काश, पौड़ी अस्पताल में ऐसी गंभीर अवस्था का सामना करने के आवश्यक इंतजामात होते'.

उत्तराखंड के पच्चीस वर्षों पर लिखे आलेख भी किताब में शामिल हैं. जिनमें जय सिंह रावत के लिखे आलेख में पहाड़ की आर्थिक स्थिति पर गंभीरता से सोचने पर मजबूर करते हुए आंकड़े दिए गए हैं, 'पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि का योगदान राज्य की जीडीपी में लगातार गिरकर 2 प्रतिशत के आसपास सिमट जाना...'.

चारु तिवारी के लिखे आलेख में राज्य की बदहाल शिक्षा व्यवस्था को पाठकों के सामने रखा गया है. चारु लिखते हैं, 'इन पच्चीस सालों में 22 पॉलीटेक्निक और 45 आईटीआई सरकारें बंद कर चुकी हैं या वे जर्जर हालत में हैं'.

*समस्याओं पर सीधी बात करते लेख*


'मनोहर चमोली के नरभक्षी जीव को हमेशा के लिए हटाना जरूरी' आलेख में पहाड़ों में गुलदार के मानव पर हमले की महत्वपूर्ण समस्या पर विस्तार से लिखा गया है और गुलदार के शिकार के कारणों को समझने के लिए यह आलेख बेहद महत्वपूर्ण है. जैसे उन्होंने लिखा है, '80 फीसदी का भूभाग छोड़कर कोई गुलदार 20 फीसदी में आए और निरपराध को अपना भोजन बना ले तो यह किस सूरत में स्वीकार्य होगा?'.

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