Wednesday, October 18, 2023

पाताल ती

निर्देशक जो कुछ भी स्क्रीन पर दिखा रहा है, उसका महत्व होना चाहिए और वह दृश्य दिमाग में छप जाना चाहिए. नाली में भरी रेत और उससे निराश होते बच्चे का मुंह के हाव भाव पहाड़ में विकास की सच्चाई दिखाते हैं।
वहीं हाथ से छूट कर जाता छाता और उसे नीचे जाते देखती बेबस आंखें, हर उस बच्चे की आंखों की याद दिलाती हैं जो इतने कठिन जीवन में अपनी दिनचर्या पूरी करते हैं. ये दृश्य उन सभी बच्चों के जीवन की परछाई है जो रोज़ पहाड़ों को पार करते हुए अपने स्कूल जाते हैं और उसके बाद वापस आ कर ऐसे ही खतरों के बीच रहते हुए अपने परिवार के आसरे पशुओं को चराने जाते हैं.

पहाड़ में चढ़ते बच्चे से छाता, खाना छूट जाना।

कैमरे की अहमियत।

Friday, October 13, 2023

महात्मा गांधी जीवित होते तो मणिपुर के लिए क्या करते!

मणिपुर में हिंसा का दौर खत्म होने का नाम नही ले रहा है और मणिपुर में चल रही हिंसा ने हमें देश की आजादी के वक्त नोआखली में हुई हिंसा की याद दिला दी है। तब महात्मा गांधी ने नोआखली में जाकर हिंसा समाप्त करने के लिए प्रयास किए थे, यदि आज भी महात्मा गांधी जीवित होते तो मणिपुर के लिए भी वही करते। वह भटकाव के शिकार समुदाय को सद्भावना की ओर मोड़कर हिंसा की आग को बुझाने का हर संभव प्रयास करते।

मणिपुर में बीते आठ नौ महीने से जातीय हिंसा से गुजर रहा है, वहां पिछले साल से चल रही हत्याओं का दौर इस साल भी जारी है। मणिपुर में अब तक लगभग दो सौ लोगों की हत्या हो चुकी है। किसी भी जगह युद्ध और हिंसा के बीच सबसे ज्यादा अत्याचार महिलाओं पर किए जाते हैं और मणिपुर में भी यह हो रहा है, पिछले साल हुई एक वायरल वीडियो में पूरे देश ने यह देखा कि किस तरह मणिपुर में महिलाओं पर अत्याचार किए गए।

1946 में हुई नोआखली हिंसा रोकने के लिए महात्मा गांधी के प्रयास।

साल 1946 के दौरान भी भारत में मणिपुर की तरह ही हिंसा का दौर चला था और तब हिन्दू मुस्लिम दंगों में हजारों लोग मारे गए थे। महात्मा गांधी ने तब इन दंगों को समाप्त करने के लिए प्रयास किए, दिनेश चंद्र सिन्हा और अशोक दासगुप्ता की लिखी किताब '1946: द ग्रेट कलकत्ता किलिंग्स एंड नोआखली जेनोसाइड' में महात्मा गांधी के इन प्रयासों के बारे में लिखा है। किताब में लिखा है कि लगभग चार महीने तक गांधीजी दंगाग्रस्त इलाकों में रहे। गांवों में घूमे, वहां के निवासियों, हिंदुओं और मुसलमानों दोनों से बातचीत की। उन्होंने वहां प्रार्थना करने के साथ-साथ प्रेम, शांति और सहनशीलता का संदेश दिया। उन्होंने सात सप्ताह तक नंगे पैर चलते हुए 47 गांवों का दौरा किया, जिसमें उन्होंने 116 मील की दूरी तय की। 

फिलिप्स टेलबोट आजादी के दौरान शिकागो डेली के दक्षिण एशिया संवाददाता थे। उन्होंने नोआखाली, पश्चिम बंगाल की यात्रा की और वहां सांप्रदायिक हिंसा के दौरान महात्मा गांधी के साथ वक्त बिताया।
फिलिप्स ने दिल्ली से न्यूयॉर्क में अपने मित्र रोजर्स को एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने महात्मा गांधी के साथ अपनी मुलाकात के बारे में लिखा। यह पत्र रेडिफ डॉट कॉम पर उपलब्ध है, इस पत्र में उन्होंने लिखा कि दो सप्ताह पहले मैंने गांधी जी के साथ एक घंटा टहलने के लिए पांच दिनों की यात्रा की।
मेरी यात्रा इस प्रयास के लायक थी, गांधी को इस मुश्किल मौसम में हिंदू-मुस्लिम सौहार्द की तलाश में नंगे पैर गांव-गांव की यात्रा के लिए पूर्वी बंगाल के नोआखाली जिले की दूरदराज में खुद को झोंकते हुए देखना बहुत चौंकाने वाला था।

महात्मा गांधी जीवित होते तो मणिपुर पर क्या करते!

 हमने देशभर में महात्मा गांधी को मानने वाले कुछ महत्वपूर्ण लोगों से दो अक्टूबर 2023 में बात की थी और उनसे सवाल किया कि अगर आज महात्मा गांधी जीवित होते तो वह क्या करते!

इस पर सामाजिक कार्यकर्ता प्रोफेसर आनन्द कुमार का कहना था कि अगर आज गांधी जी हमारे बीच  होते तो वही करते जो उन्होंने नोआखली में किया था। तत्काल मणिपुर जाकर पीड़ित स्त्री - पुरुषों के आंसू पोंछते, हमलावर समुदाय को आइना दिखाते। सर्व धर्म समभाव की राह पर चलते और भटकाव के शिकार समुदाय को सद्भावना की ओर मोड़कर हिंसा की आग को बुझाने का हर संभव प्रयास करते। सरकार चला रहे लोगों को राजधर्म की याद दिलाने के लिए राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से लेकर राज्यपाल और मुख्यमंत्री को सचेत करते। 

गांधीवादी और बीबीसी के पूर्व पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी ने इस सवाल पर कहा कि गांधी जीवित होते तो खामोश नही रहते। गांधी ने अपने बारे में लिखा है कहीं आई हैव बीन फाइटर ऑल थ्रू माय लाइफ। तो गांधी वहां जाते ,दोनों कम्युनिटी के लीडर से बात करते, पता लगाने की कोशिश करते कि झगड़ा किस बात का है और कोई सर्वसम्मति बनाते। फिर भी लोग उस सर्वसम्मति को नही मानते तो शायद उपवास भी करते क्योंकि गांधी के अंदर इतना नैतिक बल था कि उनको लगता था कि वह उस नैतिक बल से लोगों का ह्रदय परिवर्तन कर सकते थे। 
वह अपनी जान जोखिम में डालकर भी समाज में सद्भाव कायम करने का पूरा प्रयास करते।

जानेमाने इतिहासकार प्रोफेसर शेखर पाठक ने महात्मा गांधी से जुड़े इस सवाल पर कहा कि वे किसी भी तरह मणिपुर जाते। मैतेई, कुकी और नागाओं से संवाद करते। उनको समझाते, सरकार के खिलाफ हड़ताल करते। सरकार को सामान्य स्थिति लाने को विवश करते। वे सभी समुदायों को हिंसा और घृणा से उबारने में जुट जाते।

सोसाइटी फॉर कम्युनल हार्मनी से जुड़े शशि शेखर सिंह ने कहा गांधी जब देश को आजादी मिल रही थी तब भी सांप्रदायिक हिंसा और दंगाग्रस्त क्षेत्रों में हिंदू मुस्लिम समुदाय के लोगों के बीच सद्भावना बनाने के लिए जान की बाज़ी लगाकर कोशिश कर रहे थे। हिंदू मुस्लिम सद्भाव के दुश्मनों ने गांधी की हत्या की, आज अगर गांधी होते तो तुरंत मणिपुर पहुंचते और कुकी, मैतेई समुदाय के बीच हिंसाग्रस्त क्षेत्र में तब तक रहते जब तक, वहां शांति और सद्भाव स्थापित नही हो जाता।

हिमांशु जोशी।
@Himanshu28may

Tuesday, October 10, 2023

पोस्टपार्टम का इलाज

जनवरी 2022 में एक खबर आई थी कि कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा की नातिन सौंदर्या ने आत्महत्या कर ली. अपनी मृत्यु से चार महीने पहले ही मां बनी सौंदर्या पोस्टमार्टम डिप्रेशन से जूझ रही थी.


इस साल अगस्त में अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने पोस्टमार्टम डिप्रेशन के इलाज के लिए पहली मौखिक दवा ज़ुर्ज़ुवे को मंजूरी दी.




आत्महत्या की बात करती, भूलने ज्यादा लगी थी, मुझपर विश्वास नही करती थी। मुझे ये लक्षण कुछ अजीब लगे और इस बारे में मैंने इंटरनेट खंगाला तो बेबी ब्लूज़ और पोस्टपार्टम डिप्रेशन के बारे में जानकारी मिली। यह सब मेरे लिए नया था, तुम्हें सम्भालने की चुनौती भी और तुम्हारी मां को भी। नवजात शिशु थोड़ी देर भीगे कपड़ों में रहे, भूखी रही तो सीधे उसके स्वास्थ्य पर असर पड़ता है। एक दिन सांस लेने में थोड़ी आवाज आने पर ही मम्मी और मैं, तुम्हें लेकर अस्पताल दौड़े थे।
तुम्हारी मां की स्थिति के बारे में, मैं तुम्हारी नानी को बता चुका था और तुम्हारी मौसी भी तब घर ही थी,जब मैं तुम्हें मनोचिकित्सक के पास दिखाने लेकर गया। मौसी के साथ तुम्हारी मम्मी को मनोचिकित्सक के पास दिखाने पर दो हफ्ते की दवाई मिली और तुम्हारी मां के जल्द ठीक होने का आश्वासन भी। खैर, यह खुशी तब चले गई जब मनोचिकित्सक को दिखाने के अगले दिन ही तुम्हारी मां ने बाथरूम में फिनाइल पी लिया। यह सब तब हुआ जब तुम्हारा पहला महीना पूरा होने पर तुम्हारी मां और मैं बाजार से केक लेकर आए ही थे। मैं, तुम्हारी मां को नदी किनारे घुमा रहा था, हमेशा की तरह अच्छा खिला रहा था, हर बात समझा रहा था पर फिर भी उसने बिना सोचे यह निर्णय लिया।
उसका दिमाग, उसके बस में नही था। खैर, समय पर उल्टी कराने से तुम्हारी मां बच गई पर अब मैं भारतीय समाज की बनावट के एक ऐसे ढांचे से गुजरने वाला था,जिससे हर पुरुष बचना चाहता है। तुम्हारी मां को कुछ होता तो ससुराल पक्ष उसकी बीमारी बताने के बावजूद मुझे उसकी मृत्यु के लिए कसूरवार ठहराता। अब उनकी तरफ से मुझसे मनोचिकित्सक की पर्ची मांगी जाने लगी, कभी तुम्हें और तुम्हारी मां को अपने घर बुलाने की बात कही जाती। इन 39 दिनों में तुम्हारी मां को छोड़कर शायद ही हमारे घर में कोई सोया हो, पहले पोस्टपार्टम हैमरेज में तुम्हारी मां का जीवन बचाने की कोशिश और फिर इस डिप्रेशन से। समाज की हर समस्या पर नजर रखने और उस पर लिखने की वजह से जो हिम्मत हमेशा मुझमें रहती थी, उसी हिम्मत ने यहां मुझे मजबूत बनाया।
हां, भारत में महिलाओं पर अत्याचार ज्यादा हैं पर ससुराल पक्ष के न जाने कितने परिवार सही होने के बावजूद मेरी जैसे स्थिति से गुजरते हैं,मुझे नही पता। मैंने तुम्हें यह सब बताना इसलिए जरूरी समझा क्योंकि तुम एक लड़की हो, बिन पिता की लड़की को समाज एक अवसर समझता है। उसके अपने ही उसका शोषण कर सकते हैं। अब मां बनने की बात, एक लड़की अपनी मां से सिर्फ अपने कैरियर और शरीर को ठीक रखने की सीख सीखी हो तो उसके लिए एक शिशु की मां बनना बड़ी चुनौती है।
मुझे नही पता कि कल क्या होगा, तुम्हारी मां कब ठीक होगी। मैं कब तक अपना सारा काम छोड़ उस पर नजर रख सकूंगा! अगर सब कुछ ठीक नही रहा और तुम्हें अपनी नानी के घर रहना पड़ा तो कल मुझे कसूरवार मत ठहराना। इस बीमारी के बारे में समझना, पुरुषों पर कानून के गलत उपयोग के बारे में समझना और तुम अपनी राह खुद बनाना। ऐसी राह, जिसे तुम समझदार होते ही अपना लो। यह ऐसी राह न हो , जहां हर मां बाप अपने अनुसार, अपने बच्चों को चलाना चाहता है। जहां माता पिता फैसला लेते हैं कि मेरी बेटी क्या पढ़े, पहने, खाए, किससे शादी करे।
 यह वह राह हो जहां तुम अपना सही गलत खुद समझो और मानसिक रूप से इतनी मजबूत बनो कि तुम किसी पोस्टपार्टम डिप्रेशन जैसी बीमारी की जद में न आओ।

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...