Sunday, August 28, 2022

रूठे हो तुम

बचपन के दिन थे, बड़े खूब थे।
गर्मियों की छुट्टियों में पांचवीं में पढ़ने वाली प्रीति बड़ी खुश रहती कि उसके हमउम्र चचेरे भाई बहन अमित, अंकेश, बिन्नी उसके घर आएंगे फिर सब खूब धमाल मचाएंगें।

गर्मियों में रामनगर का मौसम गर्म तो रहता है पर आम लीची के पेड़ों की छांव तले कैरम, चेस, लूडो खेलते बच्चों का वक्त कब बीत जाता था, उन्हें पता ही नही चलता था ।

प्रीति के पापा खड़क सिंह फौज में थे तो अक्सर ड्यूटी में ही बाहर रहते, बच्चों के साथ उनका रहना कम ही होता था। पति के सीमित वेतन में उनकी पत्नी अनामिका को बड़े हिसाब किताब से घर चलाना होता था। 
दो महीनों से पति की चिट्ठी नही आई तो अनामिका ने खुद ही चिट्ठी लिखते लिखा
 'रूठे हो तुम, 
मुझे समय नही मिल पाता इसलिए मैं भी चिट्ठी नही लिख पाई । आपके ही भाइयों के बच्चे आए थे, खातिरदारी नही करती तो बच्चे अपने घर कहते कि चाची ने ख्याल नही रखा। फिर भाईसाहब लोग रूठ जाते। किस किस को खुश रखूं, समझा करो। पिछले महीने खर्चा ज्यादा हो गया था, प्रीति की नई ड्रेस सिलानी है। रोज़ मुझसे कहती है कि मम्मी स्कूल की ड्रेस पुरानी हो गई नई सिलानी है। अब रूठने ज्यादा लगी है। हो सके तो इस बार मनीऑर्डर में थोड़ा बड़ा कर पैसे भेज देना।' 

पैसे आ गए और प्रीति की ड्रेस भी सिल गई। अनामिका प्लास्टिक वाले गुल्लक में पैसे भी जमा करती ताकी एक महीने पूरा होने पर उसे खोल घर में राशन जमा कर सके।

दीवाली नज़दीक थी, हर बार की तरह खड़क सिंह घर पर छुट्टी आए हुए थे और खड़क के पीछे पीछे उनके भाई भी परिवार सहित बरेली से अपने गांव आ गए थे। घर में फिर बच्चों की धमाचौकड़ी थी। कोई रूठे न इसलिए अनामिका भी दिन पर काम में लगी रहती, 34 की उम्र में ही इन जिम्मेदारियों से अनामिका पचास की लगने लगी थी।

इस बार खड़क सिंह से स्कूटर खरीद लाने की जिद करते अनामिका को बहुत बहुत दिन हो गए थे। प्रीति भी पापा से कहती स्कूटर ले आओ। मेरे सब दोस्तों के घर स्कूटर है। पीछे पीछे खड़क के भाई भी "हां भाईसाहब, कब तक साइकिल में घिसोगे। स्कूटर से हमारे बच्चे भी आराम से गर्जिया मंदिर तक घूम आएंगे।

रूठे को मनाना ही तो जिंदगी है, खड़क ले आए एक सेकेंडहैंड बजाज चेतक स्कूटर को घर लेकर। 
छुट्टी खत्म होने से पहले ही अनामिका ने खड़क से जिद करी कि "हल्द्वानी मेरे मम्मी लोग कब से रूठे हुए हैं , हमेशा कहते हैं इतने नज़दीक होकर भी बेटी मायके नही आती।'

खड़क पत्नी को बैठा हल्द्वानी निकले और बैलपड़ाव के नजदीक ही एक ट्रक ने स्कूटर को पीछे से टक्कर मार दी।
खड़क तो बच गए पर अनामिका अब इस दुनिया में नही रही।

तेरहवीं के दिन प्रीति के घर में सभी रिश्तेदारों का जमावड़ा था, खड़क ने अपनी छुट्टी बढ़वा ली थी और प्रीति भी माँ की असमय मौत से उबर रही थी।

तेरहवीं के लिए खड़क राशन देख रहे थे, उन्हें ये चिंता थी कि खाने में किसी कमी से कोई घर आया रूठ न जाए। प्रीति भी घर पर आए मेहमानों को चाय पिलाने में व्यस्त थी।

अनामिका भी कहीं दूर से अपने घर में आए मेहमानों को देख ,अपने पति से कहना चाहती थी कि एक बार सबसे पूछ जरूर लेना कि सब ठीक है! ये तो नही कि किसी बात से 'रूठे हो तुम!'

Saturday, August 27, 2022

महिला स्वतंत्रता पर सवाल बन खड़ी होती 'लाइगर'

लाइगर को प्रतिष्ठित धर्मा प्रोडक्शन द्वारा बनाया गया है. इसका इंट्रोडक्शन देख तो लगता है कि फिल्म कमाल होगी पर बहुत जल्द ही दर्शक निराश होने लगते हैं. 
एक्शन, लवस्टोरी और देशभक्ति को मिलाकर दिखाने के चक्कर में फिल्म एक खिचड़ी की तरह लगने लगती है और इसकी कहानी जबरदस्ती खींची हुई लगती है. फिल्म में माइक टायसन हों या चंकी पांडे इनका आना भी जबरदस्ती का ही लगता है.

औसत अभिनय, नीरस कहानी और कमजोर पटकथा

लाइगर का पहला हाफ पूरा होने तक भी दर्शक इसके पात्रों से जुड़ नही पाते और फिल्म खत्म होते भी उनके हाथ कुछ नही लगता. 'एमएमए' जैसी प्रतिष्ठित फाइट का बॉलीवुड रूपांतरण करते हुए फिल्म में इसे लगभग एक घण्टा दिया गया है पर दर्शक उससे बिल्कुल प्रभावित नही होंगे.

लाइगर के निर्देशक पुरी जगन्नाध सुपरहिट तेलुगु फिल्म 'टेम्पर' बना चुके हैं और बॉलीवुड में वह 'बुड्ढा होगा तेरा बाप' के लिए पहचाने जाते हैं. फिल्म में उन्होंने एक्शन वाले दृश्यों के पीछे उत्तेजक पार्श्व संगीत रखा है, जिसकी अति से दर्शक खीजने लगते हैं.

इन सब के बीच फिल्म में खेलों के विकास को लेकर हमारी सरकार के रुख को भी दिखाने की थोड़ी बहुत कोशिश की गई है.

'डीअर कॉमरेड' और 'अर्जुन रेड्डी' से दर्शकों के दिलों में राज करने वाले विजय देवरकोंडा की लाइगर पहली बॉलीवुड फिल्म है. अपने संवादों में कमी और पटकथा के कमजोर होने से विजय 'लाइगर' के जरिए अपनी छाप छोड़ने में असफल रहे हैं.

राम्या कृष्णन के लिए भी फिल्म विजय देवरकोंडा की तरह ही साबित हुई है, उन्हें देखकर लगता है कि निर्देशक उन्हें अब भी ब्लॉकबस्टर फिल्म बाहुबली की तरह ही एक दमदार किरदार में देखना चाहते हैं. इस चक्कर में उनके किरदार को ऐसी मां का लिख दिया गया जो अपने बेटे की जिंदगी में ज्यादा ही दखल देती है और ये दखल दर्शकों को भी भारी लगने लगती है.

अनन्या पांडे को फिल्म में दिखाने के लिए ही लाया गया है, अपने अभिनय से वह बिल्कुल प्रभावित नही करती. रोनित रॉय एक कोच की भूमिका में ठीक लगे हैं.

औसत संवाद और आफत बनकर बरसता गाना

फिल्म में सिर्फ एक संवाद 'माता पिता नाम देते हैं लेकिन बेटे को नाम कमाना पड़ता है' थोड़ा बहुत प्रभावित करता है, बाकी संवाद औसत ही हैं.
 'उनकी एक्टिंग के लिए ऑस्कर अवॉर्ड उनके हाथ में रखकर बुर्ज खलीफा भी उनके नाम कर देना चाहिए' इसका उदाहरण है.

फिल्म का गाना 'आफत' दर्शकों पर आफत बन कर ही टुटा हुआ लगता है, 'अकड़ी बकड़ी' गाना कुछ महीनों के लिए पार्टियों में बज सकता है पर इसकी कोरियोग्राफी कमाल की है और लंबे समय तक आजमाई जाएगी.

महिलाओं की छवि पर कुछ तो सोचे केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड

राम्या ने जिस तरह से अनन्या पांडे के कपड़े का वर्णन फिल्म लाइगर में किया है, वह बिल्कुल ठीक नही लगता. " छोटी चड्डी या फटी मिडी पहनकर आड़ी टेढ़ी लिपिस्टिक लगाकर और अपने बालों को खुला छोड़कर मटक मटक कर जो आती है न वही चुड़ैल है " संवाद आज महिला स्वतंत्रता पर सवाल की तरह है. आज हम महिलाओं की स्वतंत्रता पर बात तो करते हैं पर फिल्मों में ऐसे संवाद समाज पर असर डालते हैं.
 
"मंदिर में आकर लाली पाउडर पोतकर वीडियो बनाती है। थू । शर्म नही आती तुझे। तेरे मां बाप का न मुंह तोड़ देना चाहिए, जो तुझे इस तरह से बड़ा किया है" संवाद भी इसी कड़ी का हिस्सा. इक्कीसवीं शताब्दी में बन रही फिल्मों में ऐसे संवादों की कितनी जगह है , इसका फैसला केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को लेना ही होगा.

क्या भारत के कानून इतने कच्चे हैं!

फिल्म की शूटिंग जब भारत में की जाती है तो नायक अपनी नायिका को बाइक में बिना हेलमेट अपने आगे बैठा कर बाइक चला सकता है पर अमरीका में शूटिंग पर पहुंचते ही यही नायक कार चलाने से पहले सीट बेल्ट लगाना नही भूलते, फिल्म बनाने वालों की यह सोच समझ नही आती.

@himanshu28may

एक उपन्यास के पन्नों में दर्ज 'मेकिंग ऑफ उत्तराखंड'

देवभूमि डेवलपर्स उपन्यास में नायक और नायिका अपने-अपने सफर पर निकलते हैं, उनका ये सफर बाद में एक बन जाता है. नायक नायिका के इस सफर को 'दावानल' उपन्यास के लिए मशहूर लेखक नवीन जोशी ने उत्तराखंड के पिछले कुछ सालों में महत्वपूर्ण रहे जनांदोलनों के साथ जोड़ते हुए लिखा है. लेखक इस किताब को लिखते हुए उत्तराखंड के राजनीतिक और सामाजिक ढांचे पर भी पाठकों की समझ बनाने में कामयाब रहे हैं.

'लपूझन्ना' के लेखक अशोक पांडे द्वारा खींचा गया चित्र इस किताब का आवरण चित्र है. बर्फ से लदे हिमालय, रोलर, सड़क और बच्चे के साथ साधारण कपड़ों में खड़ी महिला को देख कर ,यह अनुमान लगाया जा सकता है कि किताब हिमालय के साथ हो रही छेड़छाड़ और पहाड़ों में रहने वाले लोगों के कठिन जीवन पर लिखी गई है.

किताब का पिछला आवरण, लेखक नवीन जोशी के बारे में जानकारी देता है. किताब खोलने के बाद सामने आने वाले 'क्रम' से पता चलता है कि लेखक द्वारा इस उपन्यास को नौ भागों में बांटा गया है.

'कूच करो भई कूच करो' इस किताब का पहला भाग है, जो हमें साल 1984 के उत्तराखंड में पहुंचा देता है. लेखक द्वारा यह किताब बहुत ही आसान भाषा में लिखी गई है , जिसकी वजह से पाठक किताब की शुरुआत में इसे पढ़ने में रुचि लेने लगते हैं.
शराब के विरुद्ध आंदोलनों के दौर के साथ दुनिया भर में मशहूर चिपको आंदोलन पर लिखते हुए लेखक अपनी कहानी के मुख्य पात्र पुष्कर से पाठकों का परिचय कराते हैं. कहानी पढ़ते हुए आपकी समझ में आने लगेगा कि इसमें शामिल बहुत से पात्र और घटनाएं वास्तविक हैं.

किताब के दूसरे भाग में पुष्कर की पत्नी कविता के जरिए हम सच्चे और अच्छे पत्रकार के गुण जान सकते हैं. कविता के जरिए लेखक ने पत्रकारिता के छात्रों को बहुत सारी सीखें देने की कोशिश करी है.

'बहुत सुंदर है हमारा गांव. कविता की नजरें हिमालय के शिखरों पर टिकी थी. काश,जीवन भी सुंदर होता. पुष्कर ने आह भरी' यह पंक्ति पहाड़ में रहने वाले लोगों के द्वारा उठाए जा रहे कष्टों की तरफ इशारा करती है.

इस भाग को आगे पढ़ते हुए हमें पहाड़ों में पिनालु का साग उगाने और मधुमक्खी पालन जैसे स्वरोजगारों के बारे में जानकारी मिलती है.

' कोई कह रहा है छोटी जात की है. किसी ने चला दी, मुशई (मुसलमान) से ब्या किया है. मैंने बता रखा है, देसी है मगर बामण है. तू यही कहना' पंक्ति पहाड़ में व्याप्त जातिवाद को दर्शाती हैं.

इस किताब में अन्य कई जगह भी उत्तराखंड में व्याप्त जातिवाद के कारणों को गहराई से समझाया गया है, पुष्कर का जातिवाद के खिलाफ आवाज उठाना कहानी का सबसे जरूरी हिस्सा भी जान पड़ता है.

किताब का तीसरा भाग 'बाँध दी गई नदी में डूबता समाज' है.
 यह उत्तराखंड के निर्भीक पत्रकार उमेश डोभाल के बारे  में बहुत सी जानकारी देता है. यहां पर उत्तराखंड में जल-जंगल-जमीन के लिए सालों से लड़ रहे लोगों के आपसी सम्बन्धों के बारे में भी लिखा है.
टिहरी बांध बनने से रोकने के लिए चले संघर्ष और उस संघर्ष की नाकामी पर लेखक ने यहां बहुत कुछ लिखा है. 

'विस्थापन सिर्फ मकान और आदमी का नही होता, पूरी सभ्यता, समाज, संस्कृति और जीवन स्त्रोतों से उखड़ जाना होता है' पंक्ति लिख कर लेखक ने विस्थापितों का दर्द समझाने की कोशिश की है.

'राजधानी से राज्य छुड़ाकर लाना है' इस रोचक उपन्यास का अगला भाग है और इस भाग में शराब से पहाड़ के जीवन पर पड़ते बुरे असर की शुरुआत को सामने लाया गया है. खटीमा, मसूरी गोलीकांड के समय में मीडिया की क्या भूमिका रही थी,  किताब पढ़ते हमें इसकी जानकारी भी मिलती जाती है.

'शांत हिमालय धधक रहा है' किताब का पांचवा भाग है और इसे पढ़ते कहानी के समय में उत्तराखंड को लेकर चल रही फेक न्यूज बनाम 'समाचार' के बारे में जानकारी मिलती है. समाचार द्वारा साल 1994 में जनता तक सही खबरें पहुंचाए जाने का तरीका पढ़ने योग्य है.

मैदान से पहाड़ जाने के दौरान बदलती दशा को सामने लाने के लिए किताब की यह पंक्ति 'हल्द्वानी से आगे पहाड़ चढ़ने पर प्राकृतिक दृश्य ही नही बदलता, आबादी की संरचना और हालात भी बहुत बदल जाते हैं' महत्वपूर्ण है.
किताब के इस भाग में अतुल शर्मा और नरेंद्र सिंह नेगी जैसे जन कवियों की कविताओं के साथ ही उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था, राजनीति के बारे में भी लिखा गया है.
किताब में बहुत सी जगह ऐसी हैं जहां लेखक ने अपने शब्दों के जरिए उत्तराखंड के पहाड़ों की खूबसूरती का मनमोहक दृश्य पाठकों की आंखों के सामने साक्षात रख दिया है.

अगला भाग आपको उत्तराखंड राज्य गठन के आसपास वाले समय में पहुंचा देता है और इसकी शुरुआत पुष्कर द्वारा नए राज्य को लेकर बुने गए सपनों के टूटने से शुरू होती है.
 उत्तराखंड गठन के दिन को लेखक ने बड़े बेहतरीन तरीके से लिखा है. इसे पढ़ते नायक की उधेड़बुन पाठक को खुद की उधेड़बुन महसूस होने लगती है.

पृष्ठ संख्या 205 में लिखी हुई पंक्ति 'कुंदन को अफसोस हुआ कि वह लखनऊ में उत्तराखण्डियों को सस्ते प्लॉट दिखाने में इतना व्यस्त रहा कि अपनी मातृभूमि की ओर उसका ध्यान ही नही गया' उत्तराखंड में भूमाफियाओं के कब्जे की शुरुआती दिनों की स्थिति दर्शाती है.

इस कहानी की मदद से आप उत्तराखंड की राजनीति में दो पार्टियों के बढ़ते वर्चस्व और क्षेत्रीय पार्टियों के पतन की गणित भी समझ सकते हैं.
किताब में लेखक ने उत्तराखंड से पलायन करने के नुकसान और पलायन रोकने के समाधान को भी बड़े ही रोचक तरीके से लिखा है.
'श्याम दत्त जी के लिए सबसे पीड़ादायक अपने बैल से बिछड़ना रहा। उनसे अपने कान खुजलाए बिना वह गोठ में  बंधता न था' पंक्ति को पलायन झेलने वाला ही समझ सकता है.

पृष्ठ संख्या 227 और 228 में गैरसैंण राजधानी आंदोलन की घटना को इस तरह से लिखा गया है ,मानों वह सब आंखों के सामने ही घटित हो रहा हो.

अगले भाग 'विकास अर्थात ट्रिकल डाउन इकोनॉमी' में कहानी डाम से जूझते हुए उत्तराखंड पर पहुंचती है और फिर त्रेपन सिंह चौहान द्वारा चलाए गए फलेण्डा आंदोलन पर लिखा गया है. 

किताब का अंतिम भाग 'देवी का थान पतुरिया नीचे' कुछ सालों पहले घटित नानीसार की घटनाओं पर केंद्रित है और इसे पढ़ाते हुए लेखक आपको उत्तराखंड के आज तक पहुंचा देते हैं.

लेखक नवीन जोशी ने इस उपन्यास के जरिए पाठकों को अपने लोगों और उनके साथ अपनी धरती से जो प्रेम करने की सीख दी है, उसके लिए यह उपन्यास खरीदना आवश्यक है.

मूल्य- ₹ 249 
प्रकाशक- हिन्द युग्म
समीक्षक- हिमांशु जोशी

Wednesday, August 24, 2022

उत्तराखंड स्वास्थ्य व्यवस्था : ढांचा खोखला रहेगा तो धड़ाम से ही गिरेगा.

उत्तराखंड की स्वास्थ्य सुविधाओं में आभाव के दृष्टिगत स्वास्थ्य सुविधाओं को बढ़ाने के लिए देहरादून निवासी सामाजिक कार्यकर्ता अभिनव थापर की जनहित याचिका पर हाईकोर्ट नैनीताल ने सख्त रुख अपनाया है. कोर्ट ने सरकार को छह हफ्ते में अपना पक्ष रखने का आदेश दिया. इससे पहले भी हाईकोर्ट नैनीताल ने जुलाई 2021 में जनहित याचिका पर सरकार से एक हफ्ते के भीतर जवाब मांगा था. एक साल बीतने के बाद भी सरकार ने इस पर कोई जवाब नहीं दिया.

प्रदेश की लचर स्वास्थ्य व्यवस्था

मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र चम्पावत में जिला अस्पताल से 45 किलोमीटर दूर पार्टी ब्लॉक से आई महिलाओं को बीते मंगलवार अल्ट्रासाउंड तक की सुविधा नहीं मिली. वहीं रीठा साहिब में भी पिछले कुछ दिनों से आपात चिकित्सा सेवा 108 एंबुलेंस खराब है.

उत्तराखंड में पहाड़ों से मैदानी क्षेत्रों या मैदानी क्षेत्रों से दूसरे राज्यों की तरफ पलायन के प्रमुख कारणों में से एक यहां की लचर स्वास्थ्य व्यवस्था भी है. इन्हीं लचर स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की वजह से हम उत्तराखंड में अक्सर गर्भवती महिलाओं की मृत्यु की खबर पढ़ते रहते हैं. इस जुलाई मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के क्षेत्र खटीमा से 75 किलोमीटर दूर हल्द्वानी रेफर की गई महिला को सरकारी अस्पताल में भर्ती नहीं किया गया था और उसने अस्पताल के गेट पर ही मोबाइल की रोशनी में बच्चे को जन्म दिया था. कुमाऊं क्षेत्र में हल्द्वानी तो गढ़वाल में देहरादून, ऋषिकेश के अस्पताल ही उत्तराखंड की जनता के लिए मुश्किल हालातों में सहारा होते हैं पर ये अस्पताल भी कई बार उनका साथ नही देते. कई बार मरीज इन अस्पतालों में ज्यादा मरीजों की वजह से भर्ती नही हो पाते तो कभी अस्पतालों में सुविधाओं की कमी इन मरीजों को निराश कर देती है.

उत्तराखंड के चिकित्सक भी प्रदेश की व्यवस्था से परेशान हैं और अपनी लंबित मांगों के समाधान को लेकर 29 अगस्त तक सांकेतिक धरना-प्रदर्शन करते हुए काली पट्टी बांधकर काम करेंगे. इसके बाद उनके द्वारा 30 अगस्त से बेमियादी कार्य बहिष्कार शुरू किया जाएगा.

आंकड़ों में स्वास्थ्य व्यवस्था की कहानी

युवा शोधार्थियों का पिथौरागढ़ में रहने वाला 'उत्तराखंड रिसर्च ग्रुप' नाम का स्वतंत्र समूह, पिछले 8 माह से उत्तराखंड की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के वर्तमान हालातों पर शोध कर रहा है. उन्होंने उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था पर शोध करते हुए पिछले कुछ महीनों में तीन सौ से अधिक ‘सूचना का अधिकार’ आवेदन पत्रों के माध्यम से अस्पतालों से जुड़ी विभिन्न जानकरी एकत्र की है. साथ ही, उत्तराखंड की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर आयी नीति आयोग, कैग रिपोर्ट एवं अन्य सरकारी-गैर सरकारी रिपोर्ट्स का भी संज्ञान लिया है.


पद रहेंगे खाली तो इलाज कौन करेगा?

उत्तराखंड रिसर्च ग्रुप द्वारा लिए गए एक आरटीआई से राज्य के सभी सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में प्रसूति/स्त्री रोग विशेषज्ञों की तैनाती के बारे में यह जानकारी मिलती है कि राज्य में प्रसूति/स्त्री रोग विशेषज्ञों के 171 पद सृजित हैं, जिनमें से वर्तमान में 78 पद रिक्त हैं.
सबसे ज्यादा रिक्त पदों के संख्या नैनीताल जिले में है. इन रिक्त पदों का असर सीधे तौर पर माताओं और शिशुओं पर दिखना लाजमी है.

3295 शिशुओं की मौत का जिम्मेदार कौन!

उत्तराखंड में बढ़ रहे असुरक्षित प्रसवों पर इस ग्रुप की रिपोर्ट चौंकाने वाले खुलासे करती है. रिपोर्ट के अनुसार मई 2019 से जनवरी 2022 तक  उत्तराखंड की 272 एम्बुलेंस वाहनों (108 एम्बुलेंस) में ही 1625 प्रसव हुए.
राष्ट्रीय ट्रेंड्स के विपरीत उत्तराखंड में मातृ मृत्यु और नवजात मृत्यु दर में बढ़ोत्तरी देखने को मिली है. वर्ष 2016-17 से वर्ष 2020-21 के बीच उत्तराखंड में मातृ मृत्यु की संख्या 798 रही और इसी दौरान 3295 शिशुओं को भी लचर स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की वजह से  इस दुनिया में सांस लेने से वंचित होना पड़ा.

एक पक्ष यह भी.

ग्रुप की रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड के जिला चिकित्सालयों में वर्ष 2016-17 से वर्ष 2020-21 के बीच सिजेरियन प्रसव की दर चिंताजनक रूप से बढ़ी है. अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य समुदाय ने सिजेरियन प्रसव के लिए आदर्श दर 10-15 प्रतिशत के बीच मानी है, लेकिन जिला महिला चिकित्सालय पिथौरागढ़ में वर्ष 2016-17 से वर्ष 2020-21 के बीच राज्य में सबसे अधिक 25 प्रतिशत से अधिक सिजेरियन प्रसव हुए हैं. पहाड़ों में सिजेरियन प्रसव होने का एक बड़ा कारण वहां अनुभवी डॉक्टरों का न होना भी है. 

अपनी एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने के बाद उत्तराखंड के अधिकतर डॉक्टर पहाड़ में ड्यूटी नही करना चाहते हैं और उनको एमबीबीएस के बाद पहाड़ चढ़ाने के लिए एक बॉन्ड भराया जाता है, जिसमें उन्हें कम फीस के बदले पढ़ाई के बाद कुछ सालों के किए पहाड़ में सेवा देनी अनिवार्य होती है. कुछ डॉक्टर यह बॉन्ड भरने के बावजूद पहाड़ नही जाते और जो जाते हैं वह अनुभव के मामले में पुराने डॉक्टरों से कम ही रहते हैं. जिस वजह से थोड़े से भी मुश्किल प्रसव मामलों में यह सिजेरियन या रेफर करने का विकल्प ही चुनते हैं.

 डीडीहाट निवासी रमेश कहते हैं कि वह अपनी गर्भवती पत्नी को प्रसव पीड़ा होने के बाद सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र डीडीहाट ले गए. जहां शाम पांच बजे पहुंचने के बाद डॉक्टर न होने की वजह से, उसे रात आठ बजे 70 किलोमीटर दूर 108 एम्बुलेंस से जिला महिला चिकित्सालय पिथौरागढ़ रेफर किया गया.  प्रसव पीड़ा के बावजूद उनकी पत्नी को कनालीछीना के आसपास बीच रास्ते में ही दूसरी 108 एम्बुलेंस में जाने के लिए मजबूर किया गया.
पिथौरागढ़ पहुंचने पर अस्पताल प्रशासन की तरफ से रमेश को सिजेरियन प्रसव की स्वीकृति के लिए हस्ताक्षर करने के लिए कहा गया. रमेश अस्पताल की इस आदत से परिचित थे और उनका पहला शिशु, पत्नी की नॉर्मल डिलीवरी से ही हुआ था इसलिए रमेश ने हस्ताक्षर करने से मना कर दिया. बाद में उनका दूसरा शिशु भी पत्नी की नॉर्मल डिलीवरी से ही हुआ.

आशा कार्यकत्रियों के ऊपर गर्भवती महिलाओं की देखरेख की बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है लेकिन प्रदेश में आशा कार्यकत्रियों से पांच-छह हजार के मामूली वेतन में बहुत काम की उम्मीद रखी जाती है.

होना तो यह था कि इन लचर स्वास्थ्य व्यवस्थाओं के ढांचे को मजबूती देने के लिए प्रदेश के अस्पतालों को मिलने वाले अनुदान को बढ़ाया जाना था पर इसके उलट यह लगातार घटाया जा रहा है.

बिगड़ते स्वास्थ्य ढांचे के बीच अनुदान में भी भारी कमी

दिसम्बर 2021 में उत्तराखंड रिसर्च ग्रुप द्वारा महानिदेशक, चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण से आरटीआई आवेदन के जरिए प्रदेश में स्वास्थ्य निदेशालय से जिला चिकित्सालय को प्राप्त अनुदान के बारे में जानकारी जुटाई गई. इससे यह मालूम चला कि चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग उत्तराखंड की ओर से जिला चिकित्सालयों एवं जिला महिला चिकित्सालयों को दी जाने वाली अनुदान राशि में वर्ष 2015-16 के बाद से लगातार कमी दर्ज की गई है.
साल 2015-16 में इन अस्पतालों को स्वास्थ्य विभाग की तरफ से 29 करोड़ 1 लाख 25 हजार की धनराशि आवंटित की गई थी, यह राशि साल 2018-19 तक घटाते घटाते मात्र 6 करोड़ 49 लाख कर दी गई.
कोरोना से प्रभावित साल 2020-21 में अनुदान की इस राशि को बढ़ाकर 14 करोड़ 72 लाख 50 हजार किया , बावजूद इसके यह राशि साल 2015-16 की अनुदान राशि की लगभग आधी थी.

उत्तराखंड की जनता सालों से स्वास्थ्य व्यवस्था पर सिर्फ वादे ही सुनते आई है और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की उम्मीद लगा रही उत्तराखंड की जनता को इस लचर व्यवस्था में उम्मीद की कोई छोटी चिंगारी मिलना भी मुश्किल पड़ रहा है.

हिमांशु जोशी
@himanshu28may

Saturday, August 20, 2022

'जिंदा है दहेज रूपी दानव' याद दिलाती फिल्म रक्षाबंधन.

 आज के दौर में समाज के अंदर व्याप्त कुप्रथाओं पर बहुत कम फिल्में बन रही हैं. दहेज रूपी दानव हमारे समाज में आज भी पल बढ़ रहा है और निर्देशक आंनद एल राय ने इसी विषय पर हल्की फुल्की कॉमेडी के साथ फिल्म 'रक्षाबंधन' बनाई है.

दर्शकों को किस तरह हंसाया और रुलाया जाता है, ये कला आंनद एल राय को अच्छी तरह से आती है. रक्षाबंधन से पहले वह इस काम को 'तनु वेड्स मनु' और 'अतरंगी रे' फिल्मों में कर चुके हैं.

अक्षय कुमार के दम पर टिकी फिल्म

 अक्षय कुमार के अभिनय का ही कमाल है कि फिल्म अपनी शुरुआत से ही दर्शकों को खुद से जोड़ लेती है.

अक्षय कुमार द्वारा बोला गया संवाद 'सारा पैसा जो मैंने तुम्हारे दहेज के लिए जोड़ रखा है, वो मैं तुमपे लगाऊंगा. तुम्हें इस काबिल बनाऊंगा कि तुम खड़े होके उल्टा दहेज मांग सको' भारत के हर माता-पिता, भाई द्वारा अपनी बेटियों और बहनों से बोला जाना चाहिए.

भूमि पेडनेकर का बॉलीवुड में अब तक का सफर किसी परी कथा से कम नही है. इस फिल्म में वह अक्षय कुमार की प्रेमिका बनी नजर आई हैं और जितनी बार भी स्क्रीन पर दिखती हैं , प्रभावित ही करती हैं.
 वेब सीरीज गिल्टी माइंड्स में दिख चुके अभिनेता अरुण कालरा इस फिल्म में एक दहेजलोभी पिता बने हैं, वह अपनी संवाद अदाएगी से प्रभावित करते हैं. उम्मीद है कि अब उन्हें स्क्रीन पर अधिक समय मिलने लगेगा.

इंटरवल तक फिल्म की कहानी बिखरी हुई सी लगती है पर इसके बाद फिल्म अपने मुख्य विषय पर ही चलती है.

'कंगन रूबी' गीत इस सीजन की शादी बारातों में खूब बजता सुनाई देगा. फिल्म का पार्श्व संगीत भी सही काम कर गया है.

दिल्ली में दहेज की बात होगी तो सुनाई देगी ही

'रक्षाबंधन' में एक बात बार-बार अखरती है कि इसके सेट को कुछ ज्यादा ही चहल पहल वाला बना दिया गया है. 
निर्देशक ने फिल्म की कहानी का केंद्र दिल्ली को चुनकर बहुत अच्छा किया, एक जगह बैकग्राउंड में लाल किला भी दिखता है. दहेज प्रथा रोकने का सन्देश देने के लिए दिल्ली से बेहतर जगह कोई और हो ही नही सकती थी. इससे दर्शकों तक यह सन्देश जाता है कि अगर हमारी राजधानी जैसी जगह में भी दहेज प्रथा चल रही है तो बाकी जगह का क्या हाल होगा.

महिलाओं का रंग और साइज जरूरी नही

दहेज प्रथा निभाने के साथ-साथ हमारे समाज में महिलाओं के लिए कई मापदंड भी बनाए गए हैं, जिनमें उनका खरा उतरना जरूरी होता है. महिलाओं के रंग और साइज के अनुसार ही समाज में उनको जाना जाता है. फिल्म में इस विषय पर भी बड़ी बारीकी से काम हुआ है.

हिमांशु जोशी.
@himanshu28may

घरेलू हिंसा से पर्दा उठाती एक फिल्म.

बॉलीवुड का बॉयकॉट नया ट्रेंड बन गया है, किसी नई फिल्म का बहिष्कार करने के लिए हैशटैग बना सोशल मीडिया पर उसे ट्रेंड करवाया जाता है।
बहुत से दर्शक बिना फिल्म देखे इस बॉयकॉट ट्रेंड का हिस्सा बन जाते हैं।

बॉयकॉट ट्रेंड की इस आंधी में आमिर खान की 'लाल सिंह चड्डा' पर तो बात होती रही पर महिलाओं के विषय पर नेटफ्लिक्स में आई फिल्म 'डार्लिंगस' कहीं खो सी गई।

हम बचपन से अपनी बेटियों को पितृसत्तात्मक समाज में संघर्ष करके हिम्मत से खड़ा रहना तो सिखाते हैं पर फिर भी शादी के बाद हमारी बेटियां इसमें असफल हो जाती हैं। फिल्म 'डार्लिंगस' भी एक ऐसी ही बेटी की कहानी है।

पहली बार हाथ उठाने पर ही कदम उठा लेना चाहिए था जैसे सन्देश के साथ फिल्म में हिंसा का जवाब हिंसा को ही दिखाया गया है। इसे सही तो नही कहा जा सकता पर महिलाओं के प्रति बढ़ती हिंसा का समाधान खोजने की शुरुआत करने में यह फिल्म सहायक हो सकती है।

निर्देशक का कमाल

फिल्म की शुरुआत में आलिया भट्ट, विजय वर्मा के कंधों का सहारा लिए एक टांग मोड़ कर खड़ी दिखती है। कई सालों से कैमरे के सामने प्रेमियों की यह फेवरेट पोज रही है और निर्देशक जसमीत के रीन ने इस दृश्य को खूबसूरती के साथ फिल्माया है। निर्देशक यहीं प्रभावित करना नही छोड़ती टेडी बीयर को एक जगह रखने भर से ही उन्होंने टेडी को कहानी का हिस्सा बना दिया है।

पति के खाने में पत्थर आने पर आज भी न जाने कितनी पत्नियां उसके झूठे को अपने हाथ पर रख कर फेंक आती हैं, इसी हकीकत को दिखाते फिल्म की कहानी बुनी गई है। पति से पिटते हुए भी पतिव्रता धर्म का पालन करने वाली स्त्री के रूप में आलिया भट्ट का अभिनय देखने लायक है। कुछ ही सालों में वो अपने इसी दमदार अभिनय की वजह से बॉलीवुड की टॉप अभिनेत्रियों में शामिल हो गई हैं। 'हाईवे' और 'उड़ता पंजाब' में आलिया का अभिनय याद करने लायक रहा तो एक घरेलू भारतीय पत्नी की तरह कपड़े पहने दिखी आलिया इस फिल्म से भी सालों साल तक दर्शकों की यादों में ताजा रहेंगी।

वास्तविकता के करीब संवाद

वास्तविक जीवन में महिलाओं पर अपना अधिकार जताते, बहुत से पुरुष फिल्म का संवाद 'पॉनी खोलो न डार्लिंगस' बोलते दिख जाते हैं।
इसी तरह महिलाओं का गला पकड़ने, उनके साथ घरेलू हिंसा करने के बाद फिल्म के संवाद  'छोड़ो न डार्लिंगस कल रात थोड़ा ज्यादा हो गई' की तरह ही पुरुषों द्वारा अपने किए पर पर्दा डालना आम बात है।

महिलाओं पर हिंसा करने वाले पुरुषों में आज की पीढ़ी के युवा भी हैं, जिनकी हल्की हल्की मूंछे होती हैं। नशे में डूबकर रहने वाले इन युवाओं पर काम का दबाव बढ़ता ही जाता है और इस दबाव का गुस्सा वह घर आकर अपनी पत्नी पर निकालते हैं। निर्देशक ने अपनी फिल्म के लिए ठीक ऐसे ही दिखने वाले युवा की तलाश अभिनेता विजय वर्मा पर जाकर खत्म करी। नेटफ्लिक्स के एक एड में पप्पू पॉकेटमार बन विजय वर्मा ने जो धमाल मचाया था, उसके सबूत आज भी यूट्यूब पर मौजूद हैं। विजय वर्मा 'पिंक' में तापसी पन्नू पर तो 'गली ब्वॉय' में रणवीर पर भी भारी पड़ते नजर आए थे। इस फिल्म में उन्होंने धमाल काम किया है।

शैफाली शाह की होगी तारीफ

शैफाली शाह फिल्म की शुरुआत में तो ढीली नजर आती हैं पर हाफटाइम के बाद उनके मुंह से निकले संवाद एक मां का दर्द दर्शकों तक पहुंचाने में कामयाब रहे हैं। बॉलीवुड की बहुत सी अदाकारा 49 की उम्र तक आते-आते खुद को एक ऐसी मां के किरदार में बांध लेना सही समझती हैं ,जो बस फिल्म में जगह भर रही हों पर फिल्म में रोशन मैथ्यू के साथ किस सीन करने वाली शैफाली के इस किरदार में बहुत रंग हैं।
शैफाली इस फिल्म में मुस्लिम महिलाओं के आधुनिक रूप का प्रतिनिधित्व भी करती हैं, यह वह रूप है जो घर की चारदीवारी से निकल अब स्वरोजगार के जरिए अपनी जमीन तलाश कर रहा है।

गाना 'लाइलाज' सुनने में बड़ा प्यारा है और यूट्यूब पर इसे अब तक एक करोड़ से ज्यादा बार देखा गया है।
फिल्म का पार्श्वसंगीत एक तरफ मां-बेटी के रिश्ते को मजबूत करता है तो दूसरी तरफ पति से डरती एक पत्नी का खौफ हमारे सामने लाता है। टिफिन के सीढ़ी से टकराने की आवाज से फिल्म में आलिया तो खौफ खाने लगती हैं पर इस काम से निर्देशक दर्शकों के दिल में जगह बनाने में कामयाब हो जाती हैं।

हिमांशु जोशी।

Tuesday, August 16, 2022

मेरा कुछ सामान

रिया आज बड़ी जल्दी में थी, रूद्रपुर सिडकुल स्थित अपने ऑफिस से घर आते उसे आज हल्द्वानी बस अड्डे ही उतर जाना था।

"अरे भैया आपने बस आगे रोक दी" रिया ने ऑफिस बस के ड्राइवर पर लगभग चींखते हुए कहा। बस से बाहर निकल कर अब रिया की नजरें अल्का को ढूंढ रही थी, "मैं बस अड्डे के बाहर ही हूँ, तू कहां रह गई" रिया ये बोल ही रही थी कि अल्का को सामने खड़ी देख उसने फोन काट दिया।

"जल्दी चल वैसे ही देर हो रही है, तुझे पक्का पता है न कि वहां लहंगा सही दाम में मिला जाएगा! मेरी शादी का कुछ सामान तो पापा मम्मी ले ही आएंगे, अपने कपड़े मैं खुद ही लूंगी" 
 
अपनी बहन अल्का को हाथ पकड़ बस अड्डे की पीछे कपड़ों के बाजार की तरफ ले जाते रिया ने कहा।

रिया की शादी उसके मम्मी पापा ने बड़ी जल्दबाजी में तय कर दी थी। लड़की की उम्र बड़ रही थी, 32 की हो चली रिया के चक्कर में 28 की हो चली अल्का भी कुंवारी थी। कई लड़के रिया के वजन को देख, उसे शादी के लिए न कह देते।
एमबीए पढ़ी और चालीस हजार महीना कमा रही रिया के लिए ये रिश्ता बड़ी मुश्किल से रिया की मौसी ने तय कराया था। 

लड़का थोड़ा लंगड़ाता था पर 32 की रिया अब सबको बूढ़ी लगने लगी थी, इसलिए 10 दिन के अंदर ही शादी के डेट निकाल ,एक महीने के अंदर ही रिया का बैंड बाजा बजाने की तैयारी कर ली गई थी।

नए जमाने की लड़की रिया ने पहले तो इसका विरोध किया पर घर वालों के 'अच्छा कमाता है' वाले डायलॉग के आगे उसकी एक न चली। रिया ने भी सोचा मेरा कुछ सामान इस घर में है उसे समेट लूंगी बाकी अब नए घर में एक नए आदमी के साथ ही एडजस्ट होगा।

"भैया ये नही वो नीला वाला" नीले लहंगे की तरफ इशारा करती रिया बोली। अल्का ने भी उस लहंगे को देख अपनी आंखें चमका दी थी।

बारात घर के बाहर थी, बाराती नाच रहे थे। शादी के लिए नौकरी छोड़ चुकी रिया आज सुबह ऑफिस के ब्लैक सूट की जगह नीले लहंगे में तैयार होकर बड़ी खूबसूरत लग रही थी।
रिया को आज लग रहा था, जिस घर में वो बचपन से पली बढ़ी क्या वो उसका कभी था भी या नही। वो बस यहां मेहमान थी, कितने समय से उसे इस घर से भेजे जाने के प्रयास चल रहे थे। 

फिर खुद को समझाते उसने सोचा, यही तो एक लड़की की किस्मत है। मेरा कुछ सामान ही तो इस घर में है, ले चलती हूं। नए सिरे से जिंदगी शुरु करूंगी।

शादी को दो साल हो चुके थे, कुशल के ऑफिस जाने के बाद रिया कमरे को चारों तरफ देख रही थी। पापा की दी अलमारी, श्रृंगार दान, पलंग, रिया का बचपन से कॉलेज तक इनामों से भरा बक्सा और उसके ऑफिस टाइम का एलबम यही कुछ एक कमरे में रिया का सामान था।

शादी के शुरुआती दिनों में ही सास के तानों से तंग आकर रिया कुशल को किसी तरह मना कर अलग से किराए के कमरे में रहने ले आई थी।
उसके कुछ महीने बाद से ही कुशल के साथ कोई भी विचार न मिलने के कारण रिया की उससे बातचीत अब लगभग न के बराबर ही होती थी।

रिया ने कुशल से रिश्ता सुधारने की बहुत कोशिश की, वो दोनों मनोचिकित्सक के पास भी गए पर दिल न जुड़ने की भी क्या वजह हो सकती है!! इस थोपी गई शादी में रिया कुशल के साथ कभी प्रेम में पड़ी ही नही।

उसने रिश्ता निभाने की खूब कोशिश करी पर नाकामयाब रही।

तलाक की सारी कारवाई पूरी होने के बाद रिया फिर से अपने कुछ सामान के साथ बेघर हो गई थी। एक बार छूट चुके पापा के घर वह दोबारा नही जाना चाहती थी। समाज के सामने अपने पापा को उसकी वजह से सर झुकाते चलते देखने की रिया में अब हिम्मत नही थी।

रिया ने अब दिल्ली बसने का निर्णय ले लिया था, ट्रेन में रुद्रपुर से दिल्ली आते रिया सोच रही थी "पुरानी नौकरी के आधार पर नई मिल ही जाएगी, मेरा कुछ सामान ही तो है। फिर जिंदगी शुरु करूंगी।"

Thursday, August 11, 2022

रचनात्मकता का सम्मान कीजिए, बॉयकॉट पर फैसला लीजिए.

बॉलीवुड का बॉयकॉट नया ट्रेंड बन गया है, किसी नई फिल्म का बहिष्कार करने के लिए हैशटैग बना सोशल मीडिया पर उसे ट्रेंड करवाया जाता है।
बहुत से दर्शक बिना फिल्म देखे इस बॉयकॉट ट्रेंड का हिस्सा बन जाते हैं।

बॉयकॉट ट्रेंड की इस आंधी में आमिर खान की 'लाल सिंह चड्डा' उड़ गई तो महिलाओं से सम्बंधित विषय पर आई 'रक्षाबंधन' और 'डार्लिंगस' भी इससे अछूती नही रही।


नेटफ्लिक्स पर आई फिल्म 'डार्लिंगस' के बॉयकॉट की अपील करते हुए यह कहा गया कि यह फिल्म पुरुषों के खिलाफ घरेलू हिंसा को बढ़ावा दे रही है।

जानें कैसी है फिल्म डार्लिंगस

हम बचपन से अपनी बेटियों को पितृसत्तात्मक समाज में संघर्ष करके हिम्मत से खड़ा रहना तो सिखाते हैं पर फिर भी शादी के बाद हमारी बेटियां इसमें असफल हो जाती हैं। फिल्म 'डार्लिंगस' भी एक ऐसी ही बेटी की कहानी है।

पहली बार हाथ उठाने पर ही कदम उठा लेना चाहिए था जैसे सन्देश के साथ फिल्म में हिंसा का जवाब हिंसा को ही दिखाया गया है। इसे सही तो नही कहा जा सकता पर महिलाओं के प्रति बढ़ती हिंसा का समाधान खोजने की शुरुआत करने में यह फिल्म सहायक हो सकती है।

निर्देशक का कमाल

फिल्म की शुरुआत में आलिया भट्ट, विजय वर्मा के कंधों का सहारा लिए एक टांग मोड़ कर खड़ी दिखती है। कई सालों से कैमरे के सामने प्रेमियों की यह फेवरेट पोज रही है और निर्देशक जसमीत के रीन ने इस दृश्य को खूबसूरती के साथ फिल्माया है। निर्देशक यहीं प्रभावित करना नही छोड़ती टेडी बीयर को एक जगह रखने भर से ही उन्होंने टेडी को कहानी का हिस्सा बना दिया है।

पति के खाने में पत्थर आने पर आज भी न जाने कितनी पत्नियां उसके झूठे को अपने हाथ पर रख कर फेंक आती हैं, इसी हकीकत को दिखाते फिल्म की कहानी बुनी गई है। पति से पिटते हुए भी पतिव्रता धर्म का पालन करने वाली स्त्री के रूप में आलिया भट्ट का अभिनय देखने लायक है। कुछ ही सालों में वो अपने इसी दमदार अभिनय की वजह से बॉलीवुड की टॉप अभिनेत्रियों में शामिल हो गई हैं। 'हाईवे' और 'उड़ता पंजाब' में आलिया का अभिनय याद करने लायक रहा तो एक घरेलू भारतीय पत्नी की तरह कपड़े पहने दिखी आलिया इस फिल्म से भी सालों साल तक दर्शकों की यादों में ताजा रहेंगी।

वास्तविकता के करीब संवाद

वास्तविक जीवन में महिलाओं पर अपना अधिकार जताते, बहुत से पुरुष फिल्म का संवाद 'पॉनी खोलो न डार्लिंगस' बोलते दिख जाते हैं।
इसी तरह महिलाओं का गला पकड़ने, उनके साथ घरेलू हिंसा करने के बाद फिल्म के संवाद  'छोड़ो न डार्लिंगस कल रात थोड़ा ज्यादा हो गई' की तरह ही पुरुषों द्वारा अपने किए पर पर्दा डालना आम बात है।

महिलाओं पर हिंसा करने वाले पुरुषों में आज की पीढ़ी के युवा भी हैं, जिनकी हल्की हल्की मूंछे होती हैं। नशे में डूबकर रहने वाले इन युवाओं पर काम का दबाव बढ़ता ही जाता है और इस दबाव का गुस्सा वह घर आकर अपनी पत्नी पर निकालते हैं। निर्देशक ने अपनी फिल्म के लिए ठीक ऐसे ही दिखने वाले युवा की तलाश अभिनेता विजय वर्मा पर जाकर खत्म करी। नेटफ्लिक्स के एक एड में पप्पू पॉकेटमार बन विजय वर्मा ने जो धमाल मचाया था, उसके सबूत आज भी यूट्यूब पर मौजूद हैं। विजय वर्मा 'पिंक' में तापसी पन्नू पर तो 'गली ब्वॉय' में रणवीर पर भी भारी पड़ते नजर आए थे। इस फिल्म में उन्होंने धमाल काम किया है।

शैफाली शाह की होगी तारीफ

शैफाली शाह फिल्म की शुरुआत में तो ढीली नजर आती हैं पर हाफटाइम के बाद उनके मुंह से निकले संवाद एक मां का दर्द दर्शकों तक पहुंचाने में कामयाब रहे हैं। बॉलीवुड की बहुत सी अदाकारा 49 की उम्र तक आते-आते खुद को एक ऐसी मां के किरदार में बांध लेना सही समझती हैं ,जो बस फिल्म में जगह भर रही हों पर फिल्म में रोशन मैथ्यू के साथ किस सीन करने वाली शैफाली के इस किरदार में बहुत रंग हैं।
शैफाली इस फिल्म में मुस्लिम महिलाओं के आधुनिक रूप का प्रतिनिधित्व भी करती हैं, यह वह रूप है जो घर की चारदीवारी से निकल अब स्वरोजगार के जरिए अपनी जमीन तलाश कर रहा है।

गाना 'लाइलाज' सुनने में बड़ा प्यारा है और यूट्यूब पर इसे अब तक एक करोड़ से ज्यादा बार देखा गया है।
फिल्म का पार्श्वसंगीत एक तरफ मां-बेटी के रिश्ते को मजबूत करता है तो दूसरी तरफ पति से डरती एक पत्नी का खौफ हमारे सामने लाता है। टिफिन के सीढ़ी से टकराने की आवाज से फिल्म में आलिया तो खौफ खाने लगती हैं पर इस काम से निर्देशक दर्शकों के दिल में जगह बनाने में कामयाब हो जाती हैं।

अब बात #boycottBollywood ट्रेंड की शिकार एक और फिल्म 'रक्षाबंधन' की.

फिल्म रक्षाबंधन के बारे में बात की जाए तो आज के दौर में समाज के अंदर व्याप्त कुप्रथाओं पर बहुत कम फिल्में बन रही हैं। दहेज रूपी दानव हमारे समाज में आज भी पल बढ़ रहा है और निर्देशक आंनद एल राय ने इसी विषय पर हल्की फुल्की कॉमेडी के साथ फिल्म रक्षाबंधन बनाई है।

दर्शकों को किस तरह हंसाया और रुलाया जाता है, ये कला आंनद एल राय को अच्छी तरह से आती है। रक्षाबंधन से पहले वह इस काम को 'तनु वेड्स मनु' और 'अतरंगी रे' फिल्मों में कर चुके हैं।

अक्षय कुमार के दम पर टिकी फिल्म

 अक्षय कुमार के अभिनय का ही कमाल है कि फिल्म अपनी शुरुआत से ही दर्शकों को खुद से जोड़ लेती है।

अक्षय कुमार द्वारा बोला गया संवाद 'सारा पैसा जो मैंने तुम्हारे दहेज के लिए जोड़ रखा है, वो मैं तुमपे लगाऊंगा। तुम्हें इस काबिल बनाऊंगा कि तुम खड़े होके उल्टा दहेज मांग सको' भारत के हर माता-पिता, भाई द्वारा अपनी बेटियों और बहनों से बोला जाना चाहिए।

भूमि पेडनेकर का बॉलीवुड में अब तक का सफर किसी परी कथा से कम नही है। इस फिल्म में वह अक्षय कुमार की प्रेमिका बनी नजर आई हैं और जितनी बार भी स्क्रीन पर दिखती हैं , प्रभावित ही करती हैं।
 वेब सीरीज गिल्टी माइंड्स में दिख चुके अभिनेता अरुण कालरा इस फिल्म में एक दहेजलोभी पिता बने हैं, वह अपनी संवाद अदाएगी से प्रभावित करते हैं। उम्मीद है कि अब उन्हें स्क्रीन पर अधिक समय मिलने लगेगा।

इंटरवल तक फिल्म की कहानी बिखरी हुई सी लगती है पर इसके बाद फिल्म अपने मुख्य विषय पर ही चलती है।

'कंगन रूबी' गीत इस सीजन की शादी बारातों में खूब बजता सुनाई देगा। फिल्म का पार्श्व संगीत भी सही काम कर गया है।

दिल्ली में दहेज की बात होगी तो सुनाई देगी ही

'रक्षाबंधन' में एक बात बार-बार अखरती है कि इसके सेट को कुछ ज्यादा ही चहल पहल वाला बना दिया गया है।
निर्देशक ने फिल्म की कहानी का केंद्र दिल्ली को चुनकर बहुत अच्छा किया, एक जगह बैकग्राउंड में लाल किला भी दिखता है। दहेज प्रथा रोकने का सन्देश देने के लिए दिल्ली से बेहतर जगह कोई और हो ही नही सकती थी। इससे दर्शकों तक यह सन्देश जाता है कि अगर हमारी राजधानी जैसी जगह में भी दहेज प्रथा चल रही है तो बाकी जगह का क्या हाल होगा।

महिलाओं का रंग और साइज जरूरी नही

दहेज प्रथा निभाने के साथ-साथ हमारे समाज में महिलाओं के लिए कई मापदंड भी बनाए गए हैं, जिनमें उनका खरा उतरना जरूरी होता है। महिलाओं के रंग और साइज के अनुसार ही समाज में उनको जाना जाता है। फिल्म में इस विषय पर भी बड़ी बारीकी से काम हुआ है।

हिमांशु जोशी
@himanshu28may

Thursday, August 4, 2022

एक बार गुड लक तो मांगती ही है ये जैरी.

आपको अपनी गली में चलती वो लड़की याद है, जो उस पर गीदड़ जैसी नजर गड़ाए लोगों से बचने का बहाना खोजते फोन पर बात करती जाती है या जमीन पर नजरें गड़ा कुछ ढूंढते रहती है!
ऐसी लड़कियां अगर हिम्मत दिखा दे तो क्या कर सकती हैं, यह हॉटस्टार पर आई फिल्म 'गुड लक जैरी' में जान्हवी कपूर ने बखूबी कर दिखाया है.
ऐसी दबी सी दिखनी वाली लड़कियां हिम्मती बन कैसे बड़ा काम कर सकती है, निर्देशक सिद्धार्थ सेनगुप्ता ने
इसका फिल्मांकन बखूबी करने में कामयाबी पाई है. सिद्धार्थ को एसिड फैक्ट्री और अग्निपथ जैसी फिल्मों में सहायक निर्देशक के रूप में काम करने का अनुभव रहा है.



कैसी है कहानी 

यह फिल्म साल 2018 में आई तमिल फिल्म 'कोलामावु कोकिला' पर आधारित है. 
इसमें पंजाब के अंदर चल रहे नशे के कारोबार को दिखाया गया है, फिल्म शुरुआत में ही एक सन्देश लिखा दिखाती है जिसे पढ़ा जाना आवश्यक है 'नशा चाहे जैसा हो, होता ये बेकार, शरीर तोड़ता, बिमारी लाता, कर लेता लाचार'.
फिल्म के इंट्रोडक्शन को बड़े रचनात्मक तरीके से कहानी का हिस्सा बनाया गया है. इसकी कहानी दर्शकों को थोड़ा सा उलझाती और थोड़ा सा गुदगुदाती भी है.

अभिनय के लिए वाहवाही बटोरेंगे जान्हवी और दीपक

फिल्म में दिखे लगभग सभी कलाकारों का अभिनय कमाल है, बिना बोले अपना परिचय देने वाला दृश्य इसे साबित करता है.
जान्हवी कपूर शुरू से अंत तक अपने किरदार में डूबी हुई लगती हैं, अगर आज श्रीदेवी जीवित होती तो एक आम लड़की की जिंदगी को पर्दे पर हूबहू उतारती अपनी बेटी पर उन्हें गर्व होता.
मीता वशिष्ट को फिल्म की शुरुआत में तो अपने अभिनय का जौहर दिखाने का मौका दिया गया है, जहां वह जान्हवी पर भारी पड़ती भी दिखी हैं पर बाद में उनके किरदार को सही तरीके से नही बुना गया.
 सुशांत सिंह और जसवंत सिंह बड़े ही गम्भीर अभिनेता हैं पर फिल्म में जान्हवी के मुकाबले उन्हें कैमरे के सामने बहुत कम आने का मौका मिला है.
दीपक डोबरियाल और साहिल मेहता को आप इस फिल्म के बाद हर फिल्म में देखना चाहेंगे. ओंकारा और हिंदी मीडियम में काम कर चुके दीपक डोबरियाल के लिए यह फिल्म पुनर्जन्म के समान है, उन्होंने कई दृश्यों में दर्शकों का दिल जीता है. 

प्रयोग कर बनाई गई यह फिल्म

फिल्म की स्क्रिप्ट और संवादों में प्रयोग जम कर किया गया है. इसके हर दृश्य को देखते और सुनते आपको कुछ नयापन सा हमेशा महसूस होगा.
साहिल मेहता द्वारा बोला गया संवाद 'हमने पुलिस को चारों तरफ से घेर लिया है, अपने अपने हथियार डाल दो' एक पारंपरिक संवाद को तोड़ता नजर आता है.

फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके दृश्य कुछ इस तरह से बनाए गए हैं कि वह दर्शकों को हंसाने के साथ उनकी रूढ़िवादी सोच को भी हिला दें.

'हां पढ़ी लिखी है, बिहार की नही है' संवाद, बिहार को लेकर कई लोगों की छोटी मानसिकता वाली सोच को सामने रखने में कामयाब रहा है.

इसी तरह बिहार को केंद्र में रखकर फिल्म में एक दृश्य फिल्माया गया है, इस दृश्य में निर्देशक का कमाल दिखता है. बैकग्राउंड में मुर्गे की आवाज के साथ जान्हवी अपने सामने बैठे जसवंत सिंह से कहती हैं 'हम काम करना चाहते हैं'. चौंकाने वाले पार्श्व संगीत के साथ जसवंत सिंह बोलते हैं 'हम! कितने बंदे आए हो?'
बीच में साहिल मेहता कहते हैं 'पाजी, दीदी बिहार की हैं, उधर मैं, हम होता है'.
अब रोमांटिक हो चले पार्श्व संगीत को एक भोंपू खत्म करता है और फिर कानों में मुर्गे की आवाज आने लगती है.

महिलाओं से जुड़ा एक गम्भीर विषय

बिहार को लेकर लोगों की सोच पर मार तो फिल्म के जरिए निर्देशक का एक छोटा सा कारनामा है, असली काम तो महिलाओं के सौंदर्य के प्रति हमारे समाज की रूढ़िवादी धारणा को लेकर किया गया है.
फिल्म में एक संवाद है 'दांत देखे हैं उसके, मिक्सर ग्राइंडर जैसी शक्ल है. हंसती है तो लगता है अभी चटनी कूटेगी, रिंकू को मना करेगी!' यह संवाद उन लोगों को आईना दिखाता है जो किसी महिला को उसके गुणों से न जानकर उसके रूपरंग के अनुसार उसे तोलते हैं.

जिस घर में पुरुष नही होते उस घर के प्रति लोगों की क्या मानसिकता रहती है, हल्की फुल्की कॉमेडी के साथ फिल्म में इस विषय को भी स्पष्टता के साथ दिखाया गया है.

छायांकन और बैकग्राउंड स्कोर पर अच्छा काम

फिल्म की पटकथा अच्छी बन पाई है तो उसका मुख्य कारण इसका छायांकन और बैकग्राउंड स्कोर ही है. छायांकन हमें घर बैठे पंजाब की गलियों के दर्शन करा देता है, पलंग सहित मीता वशिष्ठ को घर से बाहर निकालने वाला दृश्य कमाल दिखता है.

गुड लक जैरी के गाने सुनने में तो बड़े प्यारे लगते हैं पर यह लंबे समय के लिए जुबान पर नही चढ़ते. 'मोर-मोर' गाना डीजे पर बजती हुआ जरूर दिखेगा.

फिल्म में कपड़ों के चयन की बात की जाए तो यह हर किरदार पर उसके चरित्र के अनुसार सही लगते हैं. मेकअप भी सही लगता है, खासतौर दीपक डोबरियाल का रंग रूप बिल्कुल ही बदल दिया गया है.
साहिल मेहता पर भी मेकअप ने अपना कमाल दिखाया है.

शीर्षक कुछ जमा नही

फिल्म का 'गुड लक जैरी' नाम इसकी कहानी के साथ न्याय करता नही दिखता, इसकी जगह फिल्म का नाम कुछ और रखा जाता तो शायद दर्शक फिल्म को देखने के लिए ज्यादा आकर्षित हुए होते.

हिमांशु जोशी
@himanshu28may

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...