देवयानी मुंगली के पिता स्वामी राम के जीवन में साधना, सेवा और सादगी स्वाभाविक रूप से एक ही धारा में बहती थी। गढ़वाल की पहाड़ियों में पले-बढ़े स्वामी राम ने प्रारंभिक वर्षों से ही ध्यान, अनुशासन और प्रकृति से साक्षात्कार को जीवन का आधार बनाया। आगे चलकर यही अनुभव उनके कार्य, स्वभाव और सोच का मूल आधार बना।
स्वामी राम के नाम पर स्थापित हिमालयन इंस्टिट्यूट और बाद में विकसित हुआ Swami Rama Himalayan University उनके दूरदर्शी कार्य की जीवंत पहचान है। उन्होंने शिक्षा, चिकित्सा और योग-विज्ञान को एक साथ जोड़ा। उनका किया हुआ कार्य आज भी उत्तराखंड और भारत के अनेक हिस्सों में लोगों के जीवन को लाभांवित कर रहा है। स्वामी राम द्वारा बनाया गया संस्थान, उनके उस विचार का विस्तार है जो स्वामी राम ने जीवनभर जिया था।
परिवार के साथ स्वामी राम का रूप और भी सहज और आत्मीय था। वे कम बोलते थे, पर उनका हर शब्द गहरा अर्थ लिए होता था। देवयानी कहती हैं कि पिता ने उन्हें किसी उपदेश से नहीं, बल्कि अपने जीवन के व्यवहार से सिखाया। उनका स्वभाव शांत, निर्णय संतुलित और मन हमेशा स्थिर रहता था। वे घर में एक ऐसी उपस्थिति थे जिनके आसपास आत्मविश्वास, अनुशासन और सुरक्षा अपने आप बन जाती थी। स्वामी राम के यही संस्कार देवयानी के विचारों और कार्यशैली में दिखाई देते हैं।
संस्कृति स्कूल की संस्थापक और निदेशक के रूप में देवयानी मुंगली लंबे समय से साहित्यिक उत्कृष्टता और पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय रही हैं। उनकी पहल, लेखन और निरंतर कार्य ने नई पीढ़ी में पढ़ने, सोचने और लिखने की आदत को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
यह उपलब्धि न केवल उनकी व्यक्तिगत साहित्यिक यात्रा की पहचान है, बल्कि उन मूल्यों की भी पुष्टि करती है जिन्हें वे शिक्षा और साहित्य के माध्यम से आगे बढ़ाती रही हैं। उनके काम से प्रेरित होकर संस्कृति स्कूल के विद्यार्थी आज भी नए विचार, दृष्टिकोण और रचनात्मकता के साथ आगे बढ़ रहे हैं।
भानु बताते हैं कि उनके घर में किताब, विचार, दर्शन और समाचार पर चर्चा बहुत स्वाभाविक थी। यही माहौल बच्चों को दुनिया को समझने की एक अलग दृष्टि देता था। जब दद्दा दिल्ली से आते तो घर में एक अलग रौनक आ जाती। वे बताते हैं कि उनकी उम्र तब छह–सात साल रही होगी पर दद्दा का आना आज भी यादों में वैसे ही ताज़ा है।
एक पहली याद वह साझा करते हैं जब दद्दा लिवाइस की दो जीन्स लेकर आए। उस समय ऐसे कपड़े दुर्लभ थे और उन जीन्स को पहनना अपने आप में गर्व जैसा लगता था।
फिर भानु अपनी पहली अकेली दिल्ली यात्रा का ज़िक्र करते हैं। साल 1977 की सर्दियाँ थीं। पंजाबी बाग के पास उनका ठिकाना था और यहीं अख़बार पढ़ने की आदत पड़ी। दद्दा रोज़ उन्हें अख़बार पर बिठाकर देश–विदेश, गणतंत्र दिवस की तैयारियाँ, आने वाले राष्ट्राध्यक्षों से जुड़ी खबरों का मतलब समझाते। वे कहते कि परेड केवल प्रदर्शन नहीं होती, अनुशासन की धुन होती है।
उन्हीं दिनों दद्दा ने उन्हें बताया कि हरियाणा के एक गाँव का नाम अमेरिकी राष्ट्रपति की यात्रा के बाद कार्टरपुरी रखा गया।
भानु ने दद्दा के साथ ही जीवन में पहली बार चाइनीज़ फूड चखते हुए चाउमीन खाया। मद्रास होटल में डोसा खाते हुए लौटते समय दद्दा ने उन्हें दो अंग्रेज़ी किताबें पकड़ाईं। एक दिन बड़ा एटलस लाकर देशों की राजधानी और नक्शे याद कराए। यही अभ्यास बाद में उनकी सीडीएस परीक्षा में काम आया। आज भी वे यही आदत अपने बेटे को दे रहे हैं।
पहली बार लिफ्ट का अनुभव उन्हें बैंक ऑफ बड़ौदा की ऊँची इमारत में हुआ। ऐसे छोटे–छोटे अनुभव ही दद्दा ने उन्हें दिए, जो आगे चलकर उनका आत्मविश्वास बढ़ाते गए।
समय आगे बढ़ा। दद्दा फौज में चले गए और भानु स्कूल में थे। छुट्टियों में दद्दा आते तो झील के किनारे वॉक, तैराकी और पहाड़ों की ट्रेकिंग शुरू हो जाती। दद्दा के दोनों बच्चे बचपन से तैरते थे और यही उन्होंने भी अपने बच्चों को भी सिखाया।
भानु मानते हैं कि दद्दा हमेशा अनुशासित रहे। लंबी वॉक, पहाड़ पहुँच कर कुलदेवी मंदिर, चितई, जागेश्वर जाना, दद्दा की दिनचर्या थी और इसी का अनुसरण उन्होंने भी किया। एक किस्सा वे मुस्कुराते हुए बताते हैं, कोसी नदी के पास बच्चे पत्थरों से पानी में कूद रहे थे। दद्दा ने कहा चलो, हम भी कूदते हैं। जीवन को पूरे उत्साह से जीना ही मुंगली जी का स्वभाव रहा है।
कॉलेज के दिनों में भानु मुंगली अपने दद्दा की छुट्टियों का इंतज़ार करते। कॉलेज बंद होते ही आगरा का टिकट ले लेते। यहीं उन्हें पैराट्रूपिंग स्कूल जाने का मौका मिला। दद्दा अपने साथियों से कहते मेरे भाई को साथ ले जाओ। वहाँ पहली बार उन्होंने पैराशूट से उतरते जवान देखे और विमान को इतना पास से देखा।
पहली उड़ान भी उसी दौर में हुई। इंडियन एयरलाइंस फ्लाइट 408, आगरा से दिल्ली। भानु के लिए सत्रह–अठारह की उम्र के दौरान विमान में बैठना किसी सपने जैसा था।
भानु मुंगली कहते हैं जब उन्होंने दद्दा से पूछा कि आगे क्या करूँ तो उन्होंने कहा परीक्षा दे दो।
इसके बाद एक दोस्त ने उन्हें सीडीएस की किताब दिखाई तो उसका कोर्स देखकर भानु को लगा कि उन्हें सब आता है। उन्होंने परीक्षा दी और निकाल भी ली, इंटरव्यू और मेडिकल भी क्लियर हो गए। फिर उनका एयरफोर्स में चयन हो गया।
भानु बताते हैं कि घर से निकलते समय वे आज भी बैग में किताब रखना नहीं भूलते। यह आदत भी दद्दा की ही दी हुई है। गोल्फ उन्होंने दद्दा की वजह से सीखी। आगरा गोल्फ क्लब और राजभवन के मैदानों की सीख ने उन्हें आगरा ओपन कप और सेंट्रल कमांड ट्रॉफी दिलाई।
17 दिसंबर 1988 वह दिन था जब भानु मुंगली को अपना सर्विस नंबर मिला। ‘पायलट कोर्स 142’ और 15 फ़रवरी 2003 को उनका रिटायरमेंट दर्ज हुआ। इन वर्षों में उड़ान, प्रशिक्षण और अनुशासन ही जीवन का मूल आधार रहे।
हैदराबाद–सिकंदराबाद की अकादमी में ट्रेनिंग कठिन थी। सुबह पाँच बजे से फिजिकल, फिर ग्राउंड स्कूल, फिर सिम और सॉर्टीज़। जेट स्टेज में 20 घंटों में नियंत्रण न साध पाने पर ग्राउंडिंग का खतरा था। कई साथी इसी मोड़ पर रास्ता बदलते गए। भानु हर हफ्ते दद्दा को चिट्ठियाँ लिखते और हर हफ्ते जवाब आता था कि ध्यान रखो, शांत रहो, मेहनत करो।
एयरफोर्स ने उन्हें मजबूत संबंध दिए। इंस्ट्रक्टर वी.पी. लाल, पैराजम्प इंस्ट्रक्टर्स और दद्दा के साथी अफसर उनके परिवार जैसे हो गए। पहली ऑपरेशनल पोस्टिंग आगरा में मिली, जहाँ भानु उन अफसरों के साथ काम करने लगे, जिनको वह अपने कॉलेज के दिनों में दूर से देखते थे।
भानु बताते हैं कि दद्दा ने उनकी जीवन–रुचियाँ भी तय कीं। गोल्फ के अलावा बर्ड वॉचिंग की शुरुआत कोटा के जंगलों से हुई। दद्दा ने टेंट लगवाकर घर के बच्चों के साथ Birds of India जैसी किताबों के सहारे पक्षियों की पहचान कराई। यह शौक आज भी चला आ रहा है।
विदेश यात्राओं ने भानु की दृष्टि और विस्तृत करी। लंदन में संग्रहालयों को उन्होंने अकेले ही देखा, उसके बाद वह अमेरिका में तीन महीने तक रहे। बाद में एयरफोर्स की फ्लाइट्स पर क़तर, रूस और यूक्रेन तक गए। उनसे दद्दा कहते रहते थे कि भानु दुनिया देखो, दृष्टि खुलेगी।
करियर के हर मोड़ पर दद्दा साथ रहे। जब भानु ने कहा कि वह एयरफोर्स छोड़ना चाहते हैं, तो दद्दा ने उनसे बस ये कहा कि निर्णय लो पर किसी योजना के साथ। मुंगली जी ने अपने भाई को पुणे में काम और सीखने के अवसर दिलाए।
बचपन में किताबों के साथ पुरानी दोस्ती और एटलस वाली आदत की वजह से पुणे में रहते भानु की किताबों के साथ और भी गहरी दोस्ती हो गई। भानु कहते हैं कि उनका परिवार बड़ा है। वह छह भाई और एक बहन हैं। उनमें कुछ हल्द्वानी हैं तो कुछ विदेश में भी रहते हैं।
साल 1997 में माता–पिता के जाने का दुख गहरा था, पर भाई एक–दूसरे के सहारे बने। दद्दा घर में पिता, मित्र और शिक्षक जैसे रहे।
अपने भाई की विशेषता बताते हुए भानु कहते हैं कि आज भी गिरिजा शंकर मुंगली जी इतिहास पढ़ते हैं। वे कहते हैं कि चीज़ों को वैसा ही देखना चाहिए जैसी वे हैं। एक ही आईने से देखने पर समझ सीमित हो जाती है।
अंत में वे उसी आरंभिक सीख को दोहराते हैं।
किताब, अख़बार और एटलस।
चलना, तैरना और यात्रा।
योजना और साहस।
और सबसे महत्वपूर्ण, खुले मन की बहस। यही वह विरासत है जो उन्हें दद्दा ने दी हैं।
सम्मान, स्नेह और मानवीय जुड़ाव की कहानी
प्रो. गणेश हिंग्मिरे भारत में बौद्धिक संपदा अधिकारों और खासकर भौगोलिक संकेतकों के क्षेत्र में एक प्रमुख विशेषज्ञ माने जाते हैं। उन्हें भारत सरकार ने वर्ष 2015 और 2016 में लगातार दो बार राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा पुरस्कार दिया। वे पुणे के ILS लॉ कॉलेज के पूर्व छात्र हैं और कार्डिफ यूनिवर्सिटी, यूनाइटेड किंगडम से एलएलएम की उपाधि प्राप्त कर चुके हैं। अर्थशास्त्र में एमफिल कर उन्होंने बौद्धिक संपदा के आर्थिक और सामाजिक प्रभावों को समझने के लिए मजबूत आधार तैयार किया। उनकी सेवाएँ दो दशकों से भी अधिक समय से उद्योगों, किसानों और छोटे उत्पादक समूहों को पहचान दिलाने में लगी हैं। आज वे भारत में GI के सबसे विश्वसनीय नामों में से एक हैं।
इतनी बड़ी उपलब्धियों के बावजूद प्रो. गणेश हिंग्मिरे का व्यक्तित्व सरल है और मुंगली जी का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव है।
मुंगली जी की पुणे पोस्टिंग के दौरान दोनों की पहली मुलाकात एनडीए में हुई थी।
गणेश हिंग्मिरे बताते हैं कि उस समय ही मुंगली जी के साथ उन्हें एक अलग तरह का अपनापन महसूस हुआ।
मुंगली जी के साथ उनका पहला परिचय औपचारिकता भर नहीं रहा, गणेश को ऐसा लगा जैसे कई वर्षों पुराना संबंध दोबारा सामने आ गया हो।
मुंगली जी का व्यक्तित्व, उनका स्वभाव और उनका व्यवहार इतना सहज था कि जुड़ाव अपने आप बन गया।
लगभग 2003 या 2004 के आसपास गणेश हिंग्मिरे की मां समान चाची की मृत्यु हो गई, उस वक्त उनका परिवार वहाँ मौजूद नहीं था। चाची की मृत्यु का समाचार मिलते ही मुंगली जी अपनी सैन्य वर्दी में ही अंतिम संस्कार स्थल पर पहुँच गए।
यह गणेश हिंग्मिरे के लिए बहुत बड़ी थी। उनकी आवाज़ आज भी भर जाती है जब वे बताते हैं कि उस कठिन घड़ी में मुंगली जी ने जैसे उन्हें सहारा दिया, वैसा सहारा उन्हें कभी किसी और से नहीं मिला।
उन दिनों गणेश हिंग्मिरे एक छोटे से कमरे में किराए पर रहते थे और उनको पढ़ाई पूरी करने के लिए अक्सर सड़क किनारे लगे खंभे की रोशनी का सहारा लेना पड़ता था।
मुंगली जी कई बार वहाँ पहुँचे, उनके संघर्ष को अपनी आँखों से देखा और उन्हें आगे बढ़ने की ताकत दी।
गणेश हिंग्मिरे आज भी कहते हैं कि मुंगली जी उनके जीवन में पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने उनके संघर्ष को समझा और सम्मान दिया।
GI प्रदर्शनी और पुणे में बैठक की व्यवस्था
भौगोलिक संकेतकों की दिशा में गणेश हिंग्मिरे की यात्रा की शुरुआत भी कहीं न कहीं मुंगली जी की सहायता से ही हुई।
पुणे में जब उन्हें अपनी पहली GI प्रदर्शनी आयोजित करनी थी, तब अचानक कार्यक्रम स्थल की व्यवस्था करना उनके लिए मुश्किल था।
उन्होंने मुंगली जी को जब अपनी समस्या बताई तो मुंगली जी ने तुरंत मीटिंग के लिए उपयुक्त जगह का इंतजाम कर दिया। मुंगली जी की तत्परता ने वह कार्यक्रम सफल बनाया। उस शानदार शुरुआत से आगे बढ़ते हुए आज गणेश भारत में सर्वाधिक GI पंजीकरण कराने वालों में शामिल है।
गणेश कहते हैं कि मुंगली जी के साथ उनका संबंध इतना आत्मीय है कि जब उनके बच्चे हुए तब मुंगली जी ने ही उनके नाम रखे थे।
गणेश ने कहा कि मेरा मानना था कि बच्चे का नाम ऐसे व्यक्ति से प्रेरित होना चाहिए जिसने उनके जीवन में दिशा, समर्थन और प्रेरणा दी हो।
जब गणेश हिंग्मिरे राष्ट्रीय मंचों पर जाने लगे तब उनकी पहचान भी बढ़ने लगी और उनके कार्यक्रमों में वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित होने लगे, ऐसे समय में मुंगली जी ने ही उन्हें अधिकारियों के साथ सही तरीके से पेश होना सिखाया।
गणेश याद करते हैं कि एक सामाजिक कार्यक्रम में कई आईएएस, आईपीएस अधिकारी और डॉक्टर मौजूद थे। वातावरण गरिमामय था और हर तरफ सम्मान और आदर की भावना दिख रही थी। उसी मंच पर मुंगली जी ने सबके सामने गर्व से कहा कि गणेश उनके लिए बेटे समान हैं।
गणेश उस पल को आज भी नहीं भूल पाते, मुंगली जी के ये शब्द उन्हें भीतर तक छू गए थे। उन्हें ऐसा लगा जैसे एक पिता अपने पुत्र को पूरे समाज के सामने सम्मान दे रहा हो। उस क्षण गणेश की आँखें नम हो गई थीं। यह केवल एक वाक्य नहीं था, बल्कि वह अपनापन था जिसने उनके जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया।
दिव्यांशी: परिवार की आँखों से मुंगली जी
नैनीताल में मेरी मुलाकात मुंगली जी के बचपन में साथी रहे विजय मोहन खाती से हुई। मुंगली जी की जीवनी के लिए जब मैंने उनसे बात की तो उन्होंने वर्षों पुराने अनुभवों को सहजता से मेरे सामने रख दिया। विजय मोहन खाती ने बताया कि मुंगली जी उनके बचपन के मित्र हैं। मुंगली जी का परिवार नैनीताल कैंटोनमेंट क्षेत्र में रहता था। समय के साथ उन दोनों के जीवन की राहें अलग हुईं पर अब भी उनके बीच निकटता बनी हुई है।
मुंगली परिवार उस दौर में नैनीताल और हल्द्वानी में प्रतिष्ठित परिवार था। उनके पास इलाके में खूब जमीन जायदाद थी और अब भी है पर मुंगली जी में उन्होंने कभी किसी प्रकार का दिखावा नहीं देखा है।
उनके परिवार में शुरूआत से ही धार्मिक और सामाजिक चेतना थी। मुंगली जी के परिवार द्वारा हनुमान गढ़ी में मंदिर का निर्माण करवाया गया।
विजय मोहन ने कॉलेज के दिनों का जिक्र करते हुए कहा कि मुंगली जी पढ़ाई में ठीक थे, उन्हें हम औसत छात्र कह सकते हैं। ऐसा छात्र जो पढ़ाई के लिए बहुत गंभीर नहीं होता पर हम उसे लापरवाह भी नहीं कह सकते। मुंगली जी अंग्रेज़ी संगीत और बीटल्स सुनने का शौक था और वह गिटार भी बजाते थे, उन्होंने कॉलेज के फंक्शन में प्रस्तुतियाँ दी थी।
मुंगली जी की एक आदत को याद करते हुए विजय मोहन कहते हैं कि उन्हें फिल्मों का शौक इतना था कि पैसे कम होने पर भी वह फिल्में देखने चले जाते थे।
मुंगली जी हमेशा से ‘दोस्ती करेगा तो निभाएगा’ वाले दोस्त रहे हैं और वह बिना कहे काम कर देते हैं। उनकी मित्र मंडली समय के साथ बदलती रहती थी। कई दोस्त होते थे, फिर कुछ और हो जाते। लेकिन जिनसे पक्की दोस्ती होती थी, वह मुंगली जी से आज तक दूर नहीं होंगे।
उन्होंने बताया कि पुणे में स्कूल का काम शुरू करने के बाद मुंगली जी में एक परिवर्तन यह आया कि उन्होंने अपनी जीवनशैली बदल दी। वह अधिक धार्मिक, अनुशासित और अपने कार्य के प्रति पूर्ण समर्पित हो गए। मुंगली जी की जो ऊर्जा पहले घूमने-फिरने में थी, वह अब समाज और शिक्षा की दिशा में मुड़ चुकी थी।
मुंगली जी के पारिवारिक जीवन का जिक्र करते हुए खाती जी ने उनकी पत्नी का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि देवयानी पढ़ी-लिखी, सुदृढ़ स्वभाव वाली हैं।
मेजर जनरल ए. एस. कार्की के लिए मुंगली जी
मेजर जनरल ए. एस. कार्की बताते हैं कि उनकी मुंगली जी से जुड़ी सबसे पहली यादें 1960 के आसपास की हैं, तब मुंगली जी नैनीताल के तल्लीताल में रहते थे। संयुक्त परिवार में बीते उस बचपन के दिनों में मुंगली जी शांत स्वभाव वाले बच्चों के बीच समय बिताते थे।
घर के बगीचे में टिन शेड के नीचे बना ‘जिप्पी क्लब’ उनका पसंदीदा ठिकाना था। यह एक पुस्तकालय था और वहीं से आसपास के बच्चों के साथ मुंगली जी की आत्मीयता शुरू होती है। मुंगली जी वहां सभी बच्चों को नैनीताल की झील और आसपास की जगहों के किस्से सुनाते थे।
उन्हें आज भी याद है कि कैसे हर बातचीत के अंत वह बच्चों को टॉफी दिया करते थे। इसके सालों बाद, जब ए. एस. कार्की देहरादून स्थित IMA में प्रशिक्षण ले रहे थे तब युवा कैप्टन मंगली जी देहरादून में पोस्टेड थे।
जीवन के इस नए अध्याय ने दोनों को फिर करीब ला दिया। कार्की बताते हैं कि उनके रविवार मुंगली जी के घर पर बीतते थे। वहां मुंगली जी अपने हाथों से बना भोजन उन्हें अपने सैन्य जीवन के किस्से सुनाते हुए खिलाया करते थे।
मेजर जनरल कार्की एक प्रसंग आज याद करते हुए कहते हैं कि एक बार उनकी IMA वाली साइकिल का टायर पंचर हो गया और मंगली जी ने मुझसे अपनी वेस्पा में साथ चलने की ज़िद कर दी। साइकिल का फ्लैट टायर मेरे कंधों पर टांगकर, हम दोनों अँधेरी सड़क पर IMA पहुँचे।
उन्होंने बताया कि उसी दौर में मुंगली जी को एक पैराट्रूपर और एडवेंचर-उत्साही के रूप में देखकर उन्हें भी IMA Golden Jubilee में पैराशूट डेमो टीम में शामिल होने की प्रेरणा मिली और उनकी ‘पैरा विंग्स’ आज भी उनके पास सुरक्षित है।
अपनी लंबी सैन्य सेवा के दौरान भी मेजर जनरल कार्की कई बार पर मुंगली जी से मिलते रहे और उनसे मिलने पर हमेशा ऊर्जा का संचार हो जाता था।
उन्होंने देखा कि किस सहजता और गरिमा के साथ मुंगली जी ने फौजी जीवन से नागरिक जीवन में प्रवेश किया। कभी उन्हें पुणे जाना हो तो मुंगली जी का घर उनके लिए पड़ाव होता था।
बाद के वर्षों में साल 2018 की पोस्टिंग उन्हें फिर पुणे ले आई और इस बार उनका परिवार भी मुंगली जी के स्नेह को महसूस कर सका। कार्की बताते हैं कि जब भी उनके वृद्ध माता-पिता अस्पताल में भर्ती रहे, मुंगली जी बिना बताए वहां पहुँच जाते और हाथ थामकर चुपचाप अपनी ऊर्जा उनके माता–पिता में भरते रहते। इससे हर बार उनकी रिकवरी उम्मीद से तेज़ हुई, ऐसा लगता था मानो मुंगली जी का स्नेह दवा का काम करता हो।
उन्होंने बताया कि मुंगली जी के घर में आज भी कुमाऊँनी बोली जाती है। उनके साथ बातचीत करते-करते वह और उनकी पत्नी भी कुमाऊँनी में सहज हो गए। मुंगली जी का घर, स्टाफ सबमें पहाड़ शामिल है।
मुंगली जी: आध्यात्मिक निकटता और उत्तराखंड से आत्मीय संबंध
उत्तराखंड में मेरी पुस्तक के सिलसिले में आईपीएस अनन्त शंकर ताकवाले से बातचीत हुई। उन्होंने क्रमवार बताया कि मुंगेर से बने आध्यात्मिक संपर्कों और स्वामी राम जी की परंपरा के माध्यम से उनका संबंध मुंगली जी से जुड़ा। गणेश हिंगमिरे उन्हें स्वयं देहरादून ले गए और कहा कि यह परिवार उत्तराखंड से है और स्वामी राम जी के बहुत निकट रहा है। ताकवाले उस समय चम्पावत जिले में स्थित ताड़केश्वर महादेव मंदिर जाते रहते थे जहाँ से स्वामी राम जी का भी संबंध रहा है। इसके बाद उनकी मुंगली से पहली मुलाकात संस्कृति स्कूल में हुई।
संस्कृति स्कूल में प्रवेश करते ही उन्हें भारतीय संस्कृति और साधना का स्पष्ट वातावरण मिला। परिसर में अनुशासन था, शांति थी और शिक्षकों के व्यवहार में विनम्रता थी। वहीं पहली बार मुंगली जी के परिवार से उनका विस्तृत परिचय हुआ। पत्नी देवयानी मुंगली और पुत्र प्रणीत से मुलाकात हुई।
परिवार से बातचीत में उन्हें वही आध्यात्मिकता अनुभव हुई, जिसका संकेत उन्हें पहले से मिलता रहा था। आईपीएस अनन्त शंकर ताकवाले ने आगे कहा कि ऐसे अवसरों पर उन्हें मुंगली परिवार के साथ एक अदृश्य जुड़ाव महसूस होता है। जैसे नियति तय कर देती है कि किससे और कब मिलना है। ठीक वैसे ही यहाँ भी उन्हें सहज निकटता का अनुभव हुआ।
पहली भेंट के बाद मुंगली जी के स्कूल में उनका आना जाना बना रहा। स्कूल के कार्यक्रमों में भागीदारी हुई। नदियों की स्वच्छता पर आयोजित एक पहल में वे विशेष रूप से स्कूल पहुँचे। उस दिन भी उन्हें वही संवेदनशील वातावरण मिला और विषय पर गंभीर चर्चा हुई। बच्चों के समूह ने स्थानीय जलधाराओं के संदर्भ और जिम्मेदार नागरिकता पर प्रस्तुति दी। शिक्षकों ने अनुशासन को व्यवहार में उतारा हुआ था। उन्हें लगा कि शिक्षा यहाँ केवल पाठ्यपुस्तक नहीं है बल्कि जीवन पद्धति है। मुंगली जी ने जिस कार्य को अपने हाथ में लिया है, वह संस्थान चलाने भर का काम नहीं बल्कि मूल्य आधारित शिक्षा का सतत अभ्यास है।
आईपीएस ताकवाले ने स्पष्ट किया कि उत्तराखंड में उनकी सेवा के वर्षों में जहाँ भी मुंगली जी और उनके परिवार से मुलाकात हुई वहाँ हिमालय की आध्यात्मिकता जैसे आसपास घिर आती है। यह अनुभव उन्हें बार बार हुआ। इसलिए उत्तराखंड से दूर रहते हुए भी जब वे इस परिवार के सान्निध्य में आए तो उन्हें लगा कि वे अपने ही प्रदेश की सांस्कृतिक धारा में हैं। मुंगली जी के विचारों में और संवादों में वही सरलता रहती है जो पहाड़ की हवा में मिलती है।
जनरल एम एल दर की नजरों में मुंगली जी
जनरल एम एल दर से मुलाकात के दौरान वह मुंगली जी को उन अधिकारियों की श्रेणी में रखते हैं जो सेना में सिर्फ अपने पद से नहीं, बल्कि अपने आचरण, दृष्टि और ज़मीनी काम से पहचान बनाते हैं। जनरल दर कहते हैं कि मुंगली जी को याद करते ही सबसे पहले एक ऐसा चेहरा सामने आता है जो दृढ़ता, सादगी और ईमानदार नेतृत्व के गुण लिए हुए है।
जनरल दर बताते हैं कि सेना में मुंगली जी की कार्यशैली अत्यंत व्यावहारिक थी। वे लंबे भाषण नहीं देते थे। वे सीधे काम की बात करते थे। उन्हें बेकार की बातचीत पसंद नहीं थी। जिस काम का जिम्मा लिया, उसे समय से और पूरी गंभीरता से पूरा करवाते थे। अधीनस्थों से भी यही अपेक्षा रखते थे। जनरल दर के अनुसार मुंगली जी को जो भी जानता है, यही कहेगा कि वे कम बोलने वाले और बहुत काम करने वाले अधिकारी थे। जिस काम को करते, उसमें कोई लापरवाही नहीं होती।
मुंगली जी का प्रशासनिक कौशल इतना मजबूत था कि वे कठिन से कठिन काम भी स्थानीय प्रशासन से निकलवा लेते थे। जनरल दर कहते हैं कि जहाँ किसी सामान्य अधिकारी को महीनों लगते, वहाँ मुंगली जी एसएसपी और डीएम से तुरन्त काम करवा लेते थे। यह उनकी व्यक्तिगत छवि, भरोसे और वर्षों के विकसित संबंधों का परिणाम था। हर अधिकारी उन्हें सम्मान से देखता और उनके कार्यों में सहयोग देता।
उन्होंने सिर्फ सैन्य क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि समाज और पर्यावरण में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। जनरल दर एक महत्वपूर्ण घटना बताते हैं कि सन 1983 में एक रेतीले फायरिंग रेंज में वृक्षारोपण का काम असंभव माना जाता था। उस इलाके में पेड़ लगाना किसी चुनौती से कम नहीं था क्योंकि मिट्टी रेतीली थी और पानी दूर-दूर तक नहीं मिलता था। लेकिन मुंगली जी ने वहाँ सैकड़ों पेड़ लगवाए। स्थानीय प्रशासन, सैनिकों और युवाओं को जोड़कर उन्होंने एक ऐसा प्रयास शुरू किया, जो वहाँ की प्रकृति के लिए नई शुरुआत जैसा था। जनरल दर कहते हैं कि जहाँ लोग पेड़ लगाना भी नहीं सोचते थे, वहाँ मुंगली जी ने पूरा हरा क्षेत्र तैयार कर दिया। यह उनके साहस और लगन का उदाहरण है।
कोटा में उनके काम के दौरान उन्होंने कई ऐतिहासिक मंदिरों और स्थलों का विस्तृत अध्ययन किया। वे सिर्फ काग़ज़ी निरीक्षण करने वाले अधिकारी नहीं थे। वे खुद उन स्थानों पर जाते, इतिहास समझते और स्थानीय लोगों से बात करते। कई मंदिरों के पुरातात्विक और सांस्कृतिक महत्व को उन्होंने अपनी रिपोर्टों में दर्ज किया, जो आगे चलकर प्रशासनिक निर्णयों में उपयोगी साबित हुईं। जनरल दर कहते हैं कि मुंगली जी में ज्ञान की भूख थी। किसी भी क्षेत्र में जाएँ, वह क्षेत्र उनका जीवन अनुभव बन जाता था।
वे सैनिकों के परिवारों और बच्चों के विषय में हमेशा सजग रहते। सेना में कई ऐसे अवसर आते हैं जब एक सैनिक का परिवार मुश्किल में पड़ जाता है। मुंगली जी ऐसी परिस्थितियों को व्यक्तिगत जिम्मेदारी की तरह लेते थे। जनरल दर बताते हैं कि एक बार एक सैनिक की बेटी के स्कूल में समस्या आई। मुंगली जी स्वयं स्कूल गए, प्रिंसिपल से बात की और उसी समय व्यवस्था ठीक करवाई। उनका मानना था कि सैनिक के परिवार की चिंता दूर करना भी नेतृत्व का हिस्सा है।
आर्मी पब्लिक स्कूलों में सुधार और निगरानी के काम में भी उन्होंने गहरी रुचि ली। वे चाहते थे कि सैनिकों के बच्चों की शिक्षा किसी भी तरह से पीछे न रहे। चाहे संसाधन कम हों या इलाका दूरदराज का हो, वे स्कूल का निरीक्षण करते, शिक्षकों से बात करते और बच्चों की पढ़ाई का मानक ऊँचा रखने का प्रयास करते।
जनरल दर की दृष्टि में मुंगली जी का सबसे महत्वपूर्ण गुण यह था कि वे अपने काम का श्रेय कभी नहीं लेते थे। वे चुपचाप काम करके आगे बढ़ जाते थे। जनरल दर के शब्दों में मुंगली जी जैसा अधिकारी सेना की परंपरा को मजबूत करता है। उनके जैसे लोग अपनी संस्था को अपनी उपस्थिति से समृद्ध कर देते हैं।
रश्मि शुक्ला का कथन
महाराष्ट्र पुलिस की पहली महिला डीजीपी IPS रश्मि शुक्ला आज देश की सबसे चर्चित और प्रतिष्ठित महिला अधिकारियों में गिनी जाती हैं। तेजतर्रार छवि, सख्त प्रशासनिक निर्णय और निर्भीक कार्यशैली ने उन्हें लेडी सिंघम की उपाधि दिलाई है। 1988 बैच की इस अधिकारी ने सशस्त्र सीमा बल की महानिदेशक के रूप में भी कार्य किया। केवल 22 वर्ष की आयु में आईपीएस बनने का उनका रिकॉर्ड उनकी प्रतिभा और परिश्रम को रेखांकित करता है।
इन्हीं घटनाओं और उपलब्धियों के बीच मुंगली जी के साथ उनका रिश्ता एक विशेष अध्याय की तरह उभरता है। मुंगली जी से मेरी बातचीत के दौरान जब उनका नाम आया तो स्वाभाविक था कि मैं उनसे भी इस संबंध पर बात करूँ। रश्मि शुक्ला ने बेहद स्नेह और स्वाभाविकता से उन दिनों को याद किया जब वह पहली बार मुंगली जी से मिली थीं। उन्होंने बताया कि वर्ष 2016 के आसपास दोनों का परिचय हुआ और यह परिचय धीरे-धीरे एक ऐसी आत्मीयता में बदल गया जिसे वह भाई-बहन का अनमोल बंधन कहती हैं।
उन्होंने एक घटना साझा की जिसे वह आज भी अपनी स्मृतियों का सबसे विश्वासपूर्ण पल मानती हैं। जब उनका तबादला सीआरपीएफ में हुआ था तब उन्हें तत्काल मुंबई पहुँचना था। फ्लाइट उपलब्ध नहीं थी और समय बेहद कम था। उस कठिन क्षण में मुंगली जी ही थे जिन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी कार लेकर उन्हें मुंबई पहुँचाया।
उन्होंने बताया कि कई बार ऐसा हुआ जब वे किसी गंभीर निर्णय, उलझन या प्रशासनिक दबाव से गुजर रही होती हैं। उन्हें जब भी स्पष्ट मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है तब मुंगली जी एक ऐसे व्यक्ति के रूप में सामने आते हैं, जिनकी बातों में केवल सलाह नहीं, बल्कि विश्वास और समाधान की वास्तविक तस्वीर छिपी होती है। वे बिना किसी दिखावे के स्पष्ट, संतुलित और विचारशील दृष्टिकोण रखते हैं, जिससे सबसे कठिन परिस्थितियाँ भी सहज लगने लगती हैं।
रश्मि शुक्ला के शब्दों में मुंगली जी मेरे लिए ऐसे भाई हैं जिन पर मैं हर परिस्थिति में भरोसा कर सकती हूँ। उनकी शांत आवाज और संतुलित सोच किसी भी चुनौती को हल्का कर देती है।