Thursday, March 31, 2022

तीन युगों को सैंडविच की तरह मिला कर ट्रिपल आर परोस गए राजमौली

एस एस राजमौली की यह खासियत है कि वह स्क्रीन पर जो कुछ दिखाते हैं वो दर्शकों के सीधे दिमाग पर असर करता है।
फ़िल्म के अंत मे 'द सन नेवर सेट्स ऑन द ब्रिटिश अम्पायर' पर खून के छींटे वाला दृश्य इसका गवाह है।
इसके साथ ही फ़िल्म खत्म होते-होते भी वह जल-जंगल-जमीन का संदेश दे जाते हैं पर शायद इस पर ज्यादा बात हो क्योंकि मौजूदा समय में जनता की नीरसता की वजह से जल-जंगल-जमीन तीनों ही खतरे में दिखाई पड़ रहे हैं

ट्रिपल आर पूरी तरह से निर्देशक की फ़िल्म है, अंग्रेज़ शासन के अत्याचारों से मुक्ति पाने वाली पुरानी कहानी पर राजमौली ने दांव चला है।
अधर्म पर धर्म की जीत के बीच राजमौली का प्रस्तुतिकरण फ़िल्म को शानदार बना देता है।
राजमौली की ब्लॉकबस्टर फ़िल्म 'बाहुबली' की सफलता के पीछे उसके अभिनेता प्रभास और सेट की भव्यता महत्वपूर्ण कारण थे। इस फ़िल्म में भी दिल्ली का आलीशान सेट बनाया गया है, पुरानी कारें और भाप इंजन से चलने वाली ट्रेन बड़े पर्दे पर देखते ही बनती हैं।

फ़िल्म में राम और भीम की दोस्ती देख कभी आपको फ़िल्म 'शोले' के जय-वीरू याद आएंगे तो राम बने रामचरण का लुक देख 'पुष्पा' भी आपकी यादों में आ जाएगा।
किरदारों को राम, भीम और सीता नाम देकर राजमौली तीन युगों को साथ ले आए हैं। उन्होंने फ़िल्म में भारतीयों की देशभक्ति और आस्था को जमकर भुनाया है।

फ़िल्म 'मगाधीरा' से चर्चा में आए रामचरण ट्रिपल आर की जान हैं और वह अभिनय के मामले में जूनियर एनटीआर पर भी भारी पड़ते दिखते हैं।
जूनियर एनटीआर को हमने 'टेम्पर' में जिस रूप में देखा था ,यहां वह उससे बिल्कुल अलग हैं और राजमौली के निर्देशन में उन्होंने अपना आज तक का सबसे बेहतरीन अभिनय दिखाया है। अजय देवगन और आलिया भट्ट सहायक कलाकारों के रूप में हैं और अपने किरदारों को सही तरीके से निभाते हैं।

फ़िल्म की स्क्रिप्ट कसी हुई है और स्क्रिप्ट से जुड़ा सब कुछ बेहतरी से अंजाम दिया गया है। 
फ़िल्म में कोई भी संवाद ऐसा नही है जो याद रखा जाएगा।
 फ़िल्म में नाचो नाचो गाने की कोरियोग्राफी जबरदस्त है और यह गाना लंबे समय तक पार्टियों में बजता नज़र आ सकता है। बैकग्राउंड स्कोर इस फ़िल्म की जान है, बेहतरीन बैकग्राउंड स्कोर के ज़रिए फ़िल्म के हर दृश्य में मानो जान फूंक दी गई है।

फ़िल्म की शुरुआत में रामचरण का भीड़ के बीच से एक व्यक्ति को पुलिस थाने के अंदर खींच लाने वाला दृश्य सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। इसके बाद महल में ट्रक से जंगली जानवरों को छोड़ने वाला दृश्य भी दर्शकों पर प्रभाव डालता है।

फ़िल्म का छायांकन दिखने में अच्छा है, जंगल की हरियाली आंखों को प्रभावित करती है। फ़िल्म में कॉस्ट्यूम डिज़ाइनिंग पर भी अच्छा काम किया गया है। रामचरण, अंग्रेज़ सैनिकों और ओलिविया की ड्रेसों को अंग्रेज़ शासन के समय की तरह ही दिखाया गया है।

शुद्ध मनोरंजन के लिए थियेटर में जाकर एक बार तो इस फ़िल्म का आनंद लिया ही जा सकता है।

कलाकार- जूनियर एनटीआर, रामचरण, आलिया भट्ट, अजय देवगन
निर्देशक- एस एस राजमौली
छायांकन- सेंथिल कुमार
समीक्षक- हिमांशु जोशी

Tuesday, March 29, 2022

मर रहे हैं हमारे आदर्श

यही आजकल सुपरस्टार हैं।
मैं सोच रहा था हम दिन भर खुद को तपा कर, नींद हराम कर ये सोचते रहते हैं कि कैसे समाज बेहतर बने। जनता को उसके अधिकार मिलते रहें, गरीब और अधिक गरीब न रहे। 
ये सब सोच कर जो विचार मन में आते हैं , उन्हें लिख कर या बोल कर जनता तक पहुंचाने की कोशिश की जाती है पर नतीज़ा!!!
सैंकड़ा बड़ी मुश्किल से पार होता है, ज्यादा लोगों तक विचार पहुंच भी जाए तो हजारों में संख्या सिमट जाती है।

इनके जलवे खूब हैं, लाखों में फॉलोवर हैं।। 
कभी कभी तो लगता है कि 'बेबी को बेस पसंद है' तो उसे वही सुनाया जाए।

एक बड़े गायक को लाइव सुन रहा था, गाना कुछ नही लुक। युवा पागल हो रहे थे। यही आदर्श!

क्रिकेटर,अभिनेता

इंस्टा,ट्विटर पर सर्वाधिक फॉलोवर्स

मीडिया भी इन्ही को आगे बढ़ाती है

कोई लेखक, बुद्धिजीवी, आंदोलनकारी, नेता,
जड़ खोखली हो रही है।

Monday, March 28, 2022

डूबता सूरज


इस डूबते सूरज के साथ बहुत कुछ छूट गया,
किसी का घर छूट गया , 
तो कोई भारी कर्ज में डूब गया ।

किसी का रिश्ता टूट गया, 
तो किसी के घर का चिराग बुझ गया,
 इस डूबते सूरज के साथ बहुत कुछ छूट गया।

कोई अपनों से लुट गया ,
तो किसी का बरसों पुराना भरोसा टूट गया,
इस डूबते सूरज के साथ बहुत कुछ छूट गया।

ख्वाहिश तो बहुत थी इस सीने में,
पर अब उन्हें पूरा करने का जुनून कहीं खो सा गया
इस डूबते सूरज के साथ बहुत कुछ छूट गया।

उठो, अब वक्त वापस घर लौटने का भी है.
इस काली रात के बाद एक सवेरा भी है।
पक्षियों के वापस घर लौटने से एक बुरा दौर पीछे छूट गया।

Sunday, March 27, 2022

मैं चाहता हूं एक 'टीम' बनाने के लिए 'झुंड' जैसी फिल्में रोज़ बनें

ओलंपिक शुरू होते ही भारतीयों को ओलंपिक में हिस्सा लेने जा रहे अपने खिलाड़ियों से खूब सारे पदक जीतने की आस रहती है लेकिन हर बार ओलंपिक खत्म होते-होते फिर से वही पुरानी कहानी दोहराई जाती है। 
भारत से क्षेत्रफल और आबादी में काफी कम अन्य देश भारत से कहीं ज्यादा पदक जीत मेडल तालिका में भारत से ऊपर रहते हैं। शर्म के मारे हम एक-दो दिन तो भारत की खेल व्यवस्था पर जमकर चर्चा करते हैं लेकिन फिर सब भूल जाते हैं।

इतने विशाल देश में खेल प्रतिभाओं की कोई कमी नही है पर मौका न मिलने की वजह से हम मैरी कॉम और साक्षी मलिक जैसे एक दो नाम ही सुन पाते हैं जो गरीबी में रहकर भी हीरे से चमकते हैं।

मैंने हमेशा से चाहा है कि इस विषय पर ज्यादा बात हो, पिछड़े इलाके में रहने वाली खेल प्रतिभाओं को मौका देने के लिए सरकार ऐसे ज़मीनी कदम उठाए कि हमारा देश खेलों में खूब नाम कमाए। 

पिछले दिनों समाचार वेब पोर्टल सबलोग में पत्रकार रूबी सरकार की एक खबर आई थी कि मध्य प्रदेश के हरदा जिले में आजकल आदिवासी लड़कियों का क्रिकेट टूर्नामेंट चल रहा है, जो काफी चर्चा पा रहा है। कुछ ऐसी ही कहानी बॉलीवुड की नई आमद 'झुंड' की भी है।
अभावों के बीच कहीं खो रही खेल प्रतिभाओं पर बात करने के लिए निर्देशक नागराज मंजुले बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन के साथ 'झुंड' फ़िल्म दर्शकों के सामने लाए हैं।

निर्देशक नागराज मंजुले की जातिवाद विषय पर आधारित फिल्म 'सैराट' साल 2016 के राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों में विशेष उल्लेख पुरस्कार जीत चुकी है।



'झुंड' विषय आधारित फिल्म है, निर्देशक फ़िल्म में बाबा अंबेडकर के 'सभी को समानता का अधिकार' विषय को मुख्य रूप से दिखाना चाहते थे।
मौका न मिलने पर खत्म होती खेल प्रतिभाओं के साथ, प्रौढ़ शिक्षा, अकेली मां की समस्याओं के विषय को भी फ़िल्म में दिखाया गया है।
दुरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के सामने अपनी पहचान साबित करने की कितनी परेशानी है इस पर फ़िल्म में काफी समय दिया गया है।

अमिताभ की दमदार आवाज़ के साथ फ़िल्म की शुरुआत होती है , अपने गम्भीर हावभावों से ही दर्शकों के बीच जगह बना लेना ही अमिताभ के अभिनय का
 प्लस प्वाइंट है।
प्रोफेसर के पद से रिटायर होते होते झुग्गियों में रहने वाले युवाओं को फुटबॉल सिखाते अमिताभ ने एक कोच के किरदार को पूरी तरह से डूब कर निभाया है।

पहले हाफ में फ़िल्म की स्क्रिप्ट में कमी लगी है, यह विषय के अनुसार गम्भीर प्रभाव डालने में कामयाब नही हुई है। कहीं कहीं पर यह लगा है कि फ़िल्म के बैकग्राउंड स्कोर की टाइमिंग ठीक नही रही।
कहानी के शुरुआती एक घण्टे तक अमिताभ को छोड़ कोई भी कलाकार प्रभाव नही छोड़ता पर उसके बाद अमिताभ ने अपने साथ फ़िल्म की पूरी टीम से भी अच्छा अभिनय करवाया है, जिनमें अंकुश गेदाम विशेष रूप से प्रभावित करते हैं।
दूसरे हाफ में फ़िल्म की स्क्रिप्ट भी कसी हुई है और कहानी भी तेज चलती है।

फ़िल्म में कोई भी गाना ऐसा नही लगा जो लोगों की ज़ुबान पर लंबे समय तक रहेगा।
टिन डब्बा बजा निर्देशक ने दर्शकों को उसी संगीत की याद दिलाई है जो भारत के झुग्गियों में बजता है।

छायांकन की बात की जाए तो तेज़ी से मूव करता कैमरा अच्छा लगता है।
फुटबॉल मैच को बेहतरीन तरीके से दिखा पाना बड़ा मुश्किल काम है पर फ़िल्म में यह काम बड़ी खूबी के साथ किया गया है।

निर्देशक ने फुटबॉल का दूसरा हाफ अच्छा बनाया है और फुटबॉल मैच के बाद अमिताभ बच्चन के घर वाला दृश्य फ़िल्म का सबसे महत्वपूर्ण दृश्य है। इस दृश्य को देख आपको रंगीन बाल रंगे सड़क पर कूड़ा उठाने वाले, वाहनों का शीशा साफ करने वाले चेहरे याद आ जाएंगे और शायद आप उनसे मुंह न फेर उनकी कहानी सुनने लगेंगे।

टपोरी भाषा के प्रयोग की वजह से फ़िल्म आपको अपने बीच की ही लगेगी और झुग्गी में रहने वाले लोगों की तरह ही फ़िल्म के कलाकारों का किया गया मेकअप भी कमाल का है।
कुछ संवाद दिल से सुने जाएं तो बड़ा गहरा असर छोड़ते हैं। 
जैसे 'अबे ए नशापन्ती हम अपने पैसे की कर रहे हैं' संवाद नशा करने वालों के बीच आम है। 
'बाप तेरा खाने तो नही जाते हम कमाने को' गरीब बच्चों की मजबूरी दिखाता है।

निर्देशक फ़िल्म में उठाए गए इतने विषयों में से किसी एक विषय पर केंद्रित रख कर फ़िल्म बनाते तो और बेहतर रहता।  फिर भी हमें इस बात का जश्न मनाना होगा कि बॉलीवुड में विषय आधारित फिल्में बन रही हैं और उनमें अमिताभ जैसे बड़े अभिनेता शामिल हो रहे हैं।

 फ़िल्म में उठाए गए कई विषयों पर विचार करने के साथ ही फ़िल्म के अंत में अमिताभ का कोर्टरूम वाला दृश्य, वह वज़ह हैं जिनकी वजह से 'झुंड' एक बार देखी जा सकती है।

निर्देशक- नागराज मंजुले
छायांकन- सुधाकर रेड्डी यक्कांति
अभिनय- अमिताभ बच्चन, अंकुश गेदाम 
मेकअप- समीर कदम
समीक्षक- हिमांशु जोशी

Sunday, March 20, 2022

उसने ख़ाकी को जो चुना था..



खुद में वो खोया रहता था,
जाने क्या वो चाहता था बस अपनी उधेड़बुन में लगा रहता था।

शायद उसने अपनी मिट्टी को प्यार किया था, तभी तो उसने उस जैसी ही ख़ाकी को चुना था।

इक रात घोर अंधेरा था, कहीं वो अकेला खड़ा था।
रात घनी थी पर फिर भी कर्ज़ उसे चुकाना था, मिट्टी को जो चाहा था, हां उसने तभी तो ख़ाकी को चुना था।

मां का आंचल, पत्नी की इंतज़ार में थकी हुई आंखों में शायद उसने सालों से कभी झांका था।
शायद हां क्योंकि उन पथराई आंखों में कहीं तो अपनों का प्रेम छुपा था, पर दिखाता कैसे उसने ख़ाकी को जो चुना था।

शोर था, घबराहट भी, कुछ परायों को उसने अपना माना था।
अंजानों के लिए भी वो सीना फुलाए खड़ा था, उसने ख़ाकी को जो चुना था।

लिपटा तिरंगे में, मुस्कुराता चेहरा, अब कितना शांत है वो। 
जाते-जाते भी सबको दिलों में राज़ कर गया क्योंकि, उसने ख़ाकी को जो चुना था।

हिमांशु..

Tuesday, March 15, 2022

'द कश्मीर फाइल्स' की तरह सत्ता का पक्ष नही लेती 'सत्ता की सूली'

लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए यह भी जरूरी है कि उससे बार-बार सवाल किए जाते रहें। आज जब 'द कश्मीर फाइल्स' में कश्मीरी पंडितों पर किए गए अत्याचारों को याद किया जा रहा है तब ऐसे ही बहुत से सताए हुए पक्ष खुद याद आ जाते हैं। 'द कश्मीर फाइल्स' का विषय तो अच्छा है पर फ़िल्म में वास्तविकता से पूरी तरह परिचय नही कराया गया है और ये बात भी सत्य है कि फिल्मों की अपनी सीमा होती है। 'सत्ता की सूली' में कुछ रिपोर्ट्स को साथ ले रहस्य खोले गए हैं, जो महत्वपूर्ण हैं और इस किताब पर भी 'टैक्स फ्री' फ़िल्म बनाई जा सकती है।


चार खण्डों में बंटी इस किताब की शुरुआत क्रमशः भूमिका, आमुख, क़ानूनविद्व की नज़र और लेखकीय के साथ होती है।
हाईकोर्ट के एक पूर्व न्यायाधीश की लिखी भूमिका किताब की शुरुआत से ही आपको चौंकाने लगती है, भूमिका पढ़ आप शायद किताब को और अधिक गहराई से पढ़ना शुरू कर देंगे।

प्रशांत भूषण के लिखे आमुख में वह कहते हैं कि किताब देश के हालातों पर जो चर्चा करती है उसे जानने के लिए सब लोगों को किताब ध्यान से पढ़नी चाहिए।
सुप्रीम  कोर्ट की वरिष्ठ एडवोकेट इंदिरा जयसिंह से 'कानूनविद की नज़र' लिखाया गया है। इसके बाद लेखकीय में महेंद्र मिश्र किताब को लिखने का मकसद बताते हुए कहते हैं कि इसका मकसद लोया मामला और उससे जुड़ी पूरी गुत्थी को सामने लाना है।

खण्ड एक 'अरहम फॉर्म हाउस की दशहत' शीर्षक से शुरू होता है। सोहराबुद्दीन केस के बारे में पढ़ते यह भी पता चलता है कि इस केस से जुड़े लोग सत्ता की चोटी पर बैठे हुए हैं।
किताब में एक षडयंत्र को 80 के दशक से भी खतरनाक बताया गया है, वह वाकई में किताब को पढ़ने की शुरुआत में ही आपको ' इन्वेस्टिगेशन डिस्कवरी ' चैनल का कोई रहस्यमयी शो देखने सा अनुभव देने लगता है।
इसका उदाहरण है चलती बस से किसी को पकड़ने वाली घटना।

कौसर बी के साथ बलात्कार की दास्तां डरावनी है, सीबीआई जांच अधिकारी में अमिताभ ठाकुर का नाम पढ़ वर्तमान में उनके साथ हो रहे व्यवहार पर आपका ध्यान जरूर चले जाएगा।

पत्रकार प्रशांत दयाल की ख़बर, पुलिस अधिकारी रजनीश राय के साहस और उस साहस को दिखाने की सजा भुगतने की कहानी पर बात करती किताब आगे बढ़ती है।

प्रशांत दयाल का जागृति पंड्या को लिखा खुला पत्र खण्ड एक को समाप्त करने के साथ सत्ता के लोभ पर भी प्रकाश डाल जाता है।

जज जेटी उत्पट का 26 जून 2014 के दिन केस से जुड़े राजनेता को कोर्ट में पेश होने के लिए कहना और 25 जून को ही उनका ट्रांसफर होना, वह भी तब जब सुप्रीम कोर्ट का आदेश सुनवाई एक ही जज से कराने का था। जैसे तथ्यों को किताब में जोड़ना इसे सच के अधिक करीब लाते जाता है।

जज लोया के ऊपर पड़ रहे दबाव की बात करते किताब आपको जज लोया का चेहरा गूगल पर खोजने के लिए मजबूर कर देगी, जज लोया के शव के हालात बता लेखक ने इन हत्या के पीछे की गहरी साजिश का जैसे खुलासा ही कर दिया हो।

'द कारवां' , 'नागपुर टुडे' और 'नेशनल हेराल्ड' की रिपोर्टों के आधार पर किताब जज लोया की मौत पर सवाल उठाती आगे बढ़ती है।
आप किताब पर आंखे गढ़ाए रहेंगे जब आपको यह पता चलेगा कि लोया के परिवार पर किस तरह अपने बयान वापस लेने को लेकर दबाव बनाया जा रहा था।

मुकेश साहू का बयान और उनके साथ जो होता रहा, वह पढ़ आप व्यवस्था से डरने लगेंगे।

'जजमेंट ड्राफ़्ट और पूर्व जज प्रकाश थोंबरे की रहस्यमयी परिस्थितियों में मौत' हिस्सा बड़े विस्तार से पूरे घटनाक्रम को सामने लाता है और कुछ ऐसी बातें पता चलती हैं जो पहले कभी सुनी नही गई है।

किताब के बीच में इस पूरी गुत्थी से जुड़ी तस्वीरों को देख आप खुद को इस किताब से जुड़ा हुआ महसूस करने लगेंगे। 
खण्ड तीन की शुरुआत में पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल एल रामदास का चीफ जस्टिस को पत्र लोकतंत्र के ऊपर विचार करने वाले साथियों के लिए महत्वपूर्ण है।

किताब पूरे घटनाक्रम को क्रमानुसार जोड़ती हुई आगे बढ़ती है। 
वर्ष 2018 में केस को लेकर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई जबरदस्त तरीके से पेश की गई है।

 पृष्ठ संख्या 211 में 'पति के बारे' में का 'पति के बोर' छपना अखरता है।
खण्ड चार में केस से जुड़े महत्वपूर्ण लोगों के साक्षात्कार हैं, सतीश यूके और बाबाराव की कहानी किताब से पाठकों को जोड़े रखने में कामयाब है।

पेज नम्बर 280,281,282 और 283 में पूरी किताब का सार छुपा हुआ है। 

केस से जुड़े सबसे अहम शख़्स का बरी होना शायद ही मीडिया की सुर्खियों में आया और उसी दिन एक बड़े क्रिकेटर का सन्यास लेना खबरों में छाया हुआ था, इस प्रकार की पंक्तियों का प्रयोग कर मीडिया के दोगलेपन को भी दिखाया गया है।

जस्टिस अभय एम थिप्से द्वारा इस पूरे मामले पर इंडियन एक्सप्रेस को दिए साक्षात्कार को शामिल कर किताब लोकतंत्र के चारों स्तम्भों को साथ ही कटघरे में खड़ा कर समाप्त हुई है और लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए यह जरूरी भी है कि उससे बार-बार सवाल किए जाते रहें।

 किताब के आवरण पर भी बात कर ली जाए।
आवरण को अशोक भौमिक द्वारा तैयार किया गया है, आवरण चित्र जस्टिस लाया की छवि है, जिसे देखते ही कुछ रहस्यमयी सा महसूस होता है। बैक कवर पर प्रशांत भूषण और इंदिरा जयसिंह की किताब पर टिप्पणी के साथ-साथ लेखकों का परिचय भी है। 
इतनी महत्वपूर्ण किताब का इससे बेहतर आवरण बनाया भी नही जा सकता था।

पुस्तक- सत्ता की सूली
प्रकाशक- शब्दलोक प्रकाशन
मूल्य- ₹300
लेखक- महेंद्र मिश्र, प्रदीप सिंह, उपेन्द्र चौधरी

रुद्र रुद्र ही रहेगी.. पर मनोरंजन के नाम पर गाली गलौज कब तक!!

रुद्र का फ़िल्म स्कोर सबसे बेहतरीन है जो पूरी वेब सीरीज़ में रोमांच जगाए रखता है और इसे देखने का मज़ा दोगुना भी करता है

इसकी कहानी अंग्रेज़ी वेब सीरीज़ लूथर का रीमेक है।


वेब सीरीज़ की शुरुआत बड़ी तेज़ है और दर्शक इसकी शुरआत से ही खुद को भी कहानी का एक हिस्सा समझने लगेंगे।
छह भागो में बंटे इसके एपिसोड एक के बाद एक रहस्य गहराते है। निर्देशक हर एपिसोड में डर का माहौल बनाए रखने में कामयाब हुए हैं।
दर्शक भी खुद को अजय के साथ मर्डर मिस्ट्री को सुलझाने की कोशिश करता महसूस करेंगे।

धूम्रपान, शराब और गाली वेब सीरीज़ की जरूरत बन गई हैं और हर कोई इन पर अपनी आंखें मूंद कर बैठा हुआ है। फ़िल्म 'तेरे नाम' में सलमान के बाल हों या 'कबीर सिंह' में शाहिद का बिना हेलमेट बुलेट चलाना, हिंदी सिनेमा के दर्शकों ने इन्हें खूब कॉपी किया और अब इन वेब सीरीज़ में परोसी जा रही हिंसा, गालियों, अश्लीलता को भी दर्शक कॉपी करेंगे ही। सबसे दुख वाली बात तो ये है कि सीधे फोन के ज़रिए ये जहर हर उम्र के दर्शकों में मिल रहा है।

हालांकि रुद्र में ईशा देओल के साथी के किरदार में रहे सत्यदीप मिश्रा द्वारा सीट बेल्ट लगा कर कार चला एक अच्छा सन्देश देने की कोशिश भी करी गई है।
पुलिसकर्मियों के निजी जीवन में उनकी नौकरी की वजह से जो तनाव होते हैं, उन पर ज्यादा बात नही की जाती पर रुद्र इस विषय पर आवाज़ बुलंद करने में सहायक होगी।

वेब सीरीज़ के एक्शन सीन अच्छे हैं और सिनेमाटोग्राफी जबरदस्त है मुंबई की खूबसूरती दिखा, अंधेरे से उजाले की ओर ला दर्शकों की आंखों से खेला गया है।

इसकी एडिटिंग बहुत कसी हुई है, मर्डर मिस्ट्री में हर एक प्वाइंट जोड़े रखना बड़ा मुश्किल काम है पर उसमें सफलता हासिल की गई है।
गीत-संगीत की बात की जाए तो वेब सीरीज़ में इनकी ज्यादा जगह नही होती और यहां भी ऐसा ही कुछ है।

स्पेशल क्राइम यूनिट के अजय देवगन कहर ढा रहे हैं, एक भुक्तभोगी और हीरो दोनों बन उन्होंने अपना पात्र पूरा जिया है।
राशि खन्ना सरप्राइज हैं जो वेब सीरीज़ की जान हैं। तरुण गहलोत भी अपनी छाप छोड़ने में सफल रहे हैं।

ईशा देओल साधारण रही हैं तो अतुल कुलकर्णी ने दिखाया है कि फिल्मों के साथ वह वेब सीरीज़ में भी उपयोगी हैं। 
आशीष विद्यार्थी वेब सीरीज़ में हैं पर हमेशा लगा है कि  अश्विनी कालसेकर की तरह निर्देशक उनसे ज्यादा काम नही ले सके, बॉलीवुड में तीस दशक का अनुभव लिए आशीष को कैमरे पर ज्यादा समय दिए जाने की जरूरत थी। 
हेमंत खेर ने अपने छोटे से किरदार में प्रभावित किया है।

'पूरा सिस्टम ही जुमलों पर चल रहा है बोस।' संवाद प्रभावित करता है तो 'जहर है तू रुद्र, जो भी तेरे पास आते हैं। 
फैल जाता उनमें तू' वेब सीरीज़ का सार सामने रखता है।

पुलिसकर्मी द्वारा बारिश में रेनकोट पहना होना जैसी छोटी बात का ध्यान रखते हुए फ़िल्म की स्क्रिप्ट बड़े ध्यान से लिखी गई है।

पांच-पांच घण्टे की वेब सीरीज़ ने निर्देशकों के सामने नई चुनौती रखी है और यह हर निर्देशक के लिए खुद को साबित करने का मौका भी है। साल 2017 में मराठी फ़िल्म वेंटिलेटर के निर्देशन के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार जीत चुके राजेश मापुस्कर ने जिस तरह से रुद्र का निर्देशन करते सब कुछ मैनेज किया ,उनके काम की आपको तारीफ़ करनी ही पड़ेगी।
 उन्होंने राशि के आलीशान घर और मुंबई के अंधेरे-उजाले को भी कहानी का हिस्सा बना दिया गया है।

आप इसे लगातार 5 घण्टे बिना रोके देख सकते हैं और इसके बाद रुद्र को दृश्यम की तरह नही रुद्र के तौर पर ही याद रखेंगे।

वेब सीरीज़- रुद्र
अभिनय- अजय देवगन, ईशा देओल, राशि खन्ना
निर्देशक- राजेश मापुस्कर
ओटीटी- डिज़्नी हॉटस्टार
निर्माता- समीर नायर
समीक्षक- हिमांशु जोशी

किताबों में बेहतर पढ़ी समझी जा सकती है 'द कश्मीर फाइल्स.'

फिल्म के शुरुआती 20 मिनट ही कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचारों की याद दिला देते हैं। 
फ़िल्म में कश्मीरी पंडितों पर हुए वह ज़ुल्म दिखते हैं जिन्हें देखने की हिम्मत अक्सर कमज़ोर दिल वाले नही करते, जैसे एक दृश्य में कुछ शव पेड़ों पर लटके दिखाए गए हैं।
इंटरवल के बाद बंद कमरे की बहस बनावटी लगती है और फ़िल्म का अंतिम दृश्य ही वह वज़ह है जिससे दर्शकों की पिक्चर हॉल से बाहर निकलने पर रोने वाली खबरें सामने आ रही हैं।


द कश्मीर फाइल्स यह दिखाने में सफल हुई है कि जब भी समाज ऐसे काले अध्यायों से गुजरता है तब महिलाओं को ही सबसे ज्यादा सहना पड़ता है, उन पर अत्याचार बढ़ जाते हैं। उक्रेन में विस्थापित हो रही महिलाओं का ताजा उदाहरण हमारे सामने है, जिसमें गर्भवती महिलाओं के सामने खुद को ज़िंदा रखने का सवाल तो है ही साथ में अन्य महिलाओं पर भी वेश्यावृत्ति में धकेले जाने का खतरा बढ़ गया है।

फ़िल्म में एक संवाद है 'झूठी खबर दिखाना उतना बड़ा गुनाह नहीं है जितनी सच्ची खबर छुपाना है'।
जिन फैक्ट्स को लेकर यह फ़िल्म बनाई गई है, उन पर आंख मूंद कर विश्वास करना ठीक नही है क्योंकि सिनेमा इतिहास से छेड़छाड़ कर उन लोगों को बहकाने का आसान ज़रिया है जो कभी इतिहास समझने के लिए सही तथ्य वाली किताबों के पन्ने पलटना गंवारा नही समझते।
इतिहास के सही तथ्य लिखने वाले लेखक को कैसे पहचानें यह अपने आप में अलग मुद्दा है क्योंकि इतिहास के साथ छेड़छाड़ करना सबसे आसान काम है।
रिफ्रेंस देकर लिखने वाले लेखकों पर अधिक भरोसा किया जा सकता है।

अनुपम खेर ने अपने बेटे और घर को खोए इंसान का किरदार निभाते अवार्ड विनिंग अभिनय किया है, शायद यह उनका अब तक का बेस्ट है।
अनुपम खेर का अस्पताल में दर्शन कुमार से ये कहना कि कश्मीर वाले घर की खिड़की सही कराना , कश्मीरी पंडितों ने जो खोया उसकी याद दिलाता है।

मिथुन चक्रवर्ती निर्देशक विवेक रंजन अग्निहोत्री के पसंदीदा अभिनेताओं में से एक हैं, फ़िल्म में उनका अभिनय ठीक है लेकिन वह अपना सर्वश्रेष्ठ नही देते। पहले हाफ में उनकी आंखें ही बहुत कुछ कह जाती हैं लेकिन दूसरे हाफ में उनका अभिनय उस स्तर का नही लगता।

भाषा सुम्बली ने अपने अभिनय से प्रभावित किया है अपने पति के मरने पर उनके द्वारा किया गया विलाप फिल्म के बेहतरीन दृश्य में से एक है।

मराठी सिनेमा में अपनी खास पहचान रखने वाले चिन्मय मंडलेकर ने इस फ़िल्म के ज़रिए बॉलीवुड में अपना डंका पिटवा दिया है।

अपने पति विवेक अग्निहोत्री की अधिकतर फिल्मों में शामिल रहने वाली पल्लवी जोशी एक दमदार भाषण के साथ शुरुआत करती है। एक प्रोफेसर के रूप में उनका मेकअप ज्यादा प्रभावित करता है, ऐसा ही कुछ अनुपम खेर के साथ भी किया गया है। नीले रंग से पुता हुआ उनका चेहरा फ़िल्म का पोस्टर सीन बन चुका है।
 इससे साबित होता है कि बॉलीवुड में अभी भी मेकअप की महत्वता समाप्त नहीं हुई है।

फ़िल्म में घटनाक्रमों की क्रोनोलॉजी आगे पीछे है लेकिन पटकथा लिखते उन्हें इस तरह से प्रस्तुत किया गया है कि दर्शक भ्रमित ना हों।

फिल्म में मीडिया जगत पर बड़ी गहराई से चर्चा हुई है और कश्मीर की कवरेज पर भी सवाल उठाया गया है। जिसमें विदेशी मीडिया की कवरेज को गलत साबित करने की कोशिश की गई है, अब सवाल यह बनता है कि क्या दर्शक किसी एक फिल्म के द्वारा दिए गए संदेश के जरिए ही कश्मीर पर अपनी सोच बनाएंगे।

कश्मीर में 19 पत्रकारों के मारे जाने की बात भी कही गई है जो कश्मीर में पत्रकारिता के वास्तविक हालात बयां करने के लिए काफी है।

'पॉलिटिक्स समझ में आती है कश्मीर क्यों नहीं, क्या फर्क है दोनों में'  संवाद के जरिए कश्मीर की सच्चाई बयां करने की कोशिश करी गई है।

'अपने ही देश में पिछले तीस साल से रिफ्यूजी बने घूम रहे हैं' संवाद के जरिए कश्मीरी पंडितों के दर्द को बड़े पर्दे के जरिए पूरे देश के सामने रख दिया गया है।

फिल्म में साउंड का बहुत महत्व है हथियारों की आवाज दिल को दहलाती है तो बुलेट बाइक की आवाज भी एक धक सी पैदा कर देती है। बैकग्राउंड स्कोर यादों में डूबा और दर्द भरा अहसास देता है।

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की कविता 'हम देखेंगे' को बड़े पर्दे पर सुनना अलग ही अनुभव है।
कश्मीरी संगीत भी दिल पर असर करता है।

छायांकन की बात की जाए तो फिल्म में डल झील की खूबसूरती देखते ही बनती है और एंगल ऐसी जगह से लिए गए हैं जो आपसी संवाद के दौरान प्रभावित करते हैं।

फ़िल्म के वीएफएक्स दृश्य इतने प्रभावी नहीं लगे हैं जैसे एक जगह कश्मीर के घर जलते हुए दिखाए गए हैं तो वह पूरी तरह से बनावटी दृश्य लगता है।

निर्देशक ने फ़िल्म के सम्पादन की तरफ भी विशेष ध्यान दिया है, एयरफोर्स के जवानों पर हमले के बाद वहां दिखाए बिखरे हुए गुलाब वाला दृश्य इसका उदाहरण है।

निर्देशक ने फिल्म में बैनर के जरिए भी संदेश देने की कोशिश करी है जैसे बैकग्राउंड में मार्क्स और भगत सिंह का पोस्टर दिखा उस विचारधारा की तरफ इशारा किया गया है जो कश्मीरियों को उनके मूल अधिकारों पाने की स्वतंत्रता देना चाहती है।
निर्देशक का यह दिखाना कि उस स्वतंत्रता की मांग करने वाले सिर्फ हथियारों के भरोसे हैं और वह सिर्फ कश्मीरी हैं यह असंगत है।

फ़िल्म से हमें यह पता नही चलता कि कश्मीरियों की स्वतंत्रता पर जो बंदिश लगाई गई हैं उसका जिम्मेदार कौन है और दिल्ली से लेकर कश्मीर तक पूरा तंत्र कश्मीरी पंडितों की सुरक्षा करने में क्यों असफ़ल रहा ये सवाल भी अधूरा ही रह जाता है।

धारा 370 के ज़रिए सीधे तौर पर एक पॉलिटिकल पार्टी का सपोर्ट किया गया है।

कश्मीर में 'इंडियन डॉग्स' बैनर दिखाकर और कुछ पोस्टर जलाकर दर्शकों पर सीधे प्रभाव डालने की कोशिश की गई है। 
एक कमरे में कुछ लोगों द्वारा कश्मीर को लेकर की गई बहस के जरिए निर्देशक ने दर्शकों को भी फिल्म के विषय में शामिल कर लिया है, यह विवेक की निर्देशन कला का बेहतरीन नमूना है।

साल 2014 के बाद से बॉलीवुड में राष्ट्रवादी फिल्मों का एक दौर आया है 2019 में आई 'उरी द सर्जिकल स्ट्राइक' भी इसी का एक हिस्सा थी।
प्रधानमंत्री मोदी ने साल 2019 में इसके संवाद 'हाउज़ द जोश' का जमकर प्रयोग किया था और गुजरात के अहमदाबाद में भी अपनी एक सभा के दौरान उन्होंने बोला था कि 'हम घर में घुसकर मारेंगे'।

अगर निर्देशक विवेक रंजन अग्निहोत्री की कुछ पुरानी फिल्मों की ओर ध्यान दें तो है पता चलता है कि वह एजेंडों को लेकर बनाई गई फिल्मों के लिए मशहूर हैं, जैसे साल 2016 में आई उनकी फिल्म 'बुद्धा इन ए ट्रैफिक जाम' और 'द ताशकंद फाइल्स' इसका उदाहरण हैं।

यह फ़िल्म भी बॉलीवुड की राष्ट्रवादी फिल्मों का ही एक हिस्सा जान पड़ रही है, राष्ट्रवाद सांप्रदायिकता को जन्म देता है।
यहां पर मुंशी प्रेमचंद की एक पंक्ति का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है, उन्होंने कहा था कि सांप्रदायिकता को सीधे सामने आने में लाज लगती है इसलिए वह राष्ट्रवाद का चोला ओढ़कर आती है।

अनुपम खेर, दर्शन कुमार के कभी न भुलाने वाले अभिनय और कश्मीरी पंडितों के साथ हुई त्रासदी को देखने के लिए फ़िल्म देखी जा सकती है पर फ़िल्म देखने के बाद कश्मीर से जुड़ा कोई विश्वसनीय दस्तावेज पढ़ने की भी आवश्यकता है।

कलाकार- मिथुन, अनुपम खेर, दर्शन कुमार, पल्लवी जोशी
निर्देशक- विवेक रंजन अग्निहोत्री
छायांकन- उदय सिंह मोहिते
कहानी- विवेक रंजन अग्निहोत्री, सौरभ एम पांडे
समीक्षक- हिमांशु जोशी

Monday, March 14, 2022

पश्तून ऐ ख्वाब है..

पश्तून ऐ ख्वाब है..

पश्तून ऐ ख्वाब है, गर्द में कहीं खो जाता है.
आंखों में इक रोशनी का असर है, ज़रा-ज़रा मज़लूम सा नज़र आता है।

भीड़ में अब तो हर कोई महरूम सा नज़र आता है,
जिंदा गोश्त को टटोलते इब्लीस बैचैन हो जाता है।

अब्तर हो चुके इस ढेर में अख्ज़ भी कम न थे,
ख़त्म होती इस आदमियत में खुद को अकबर साबित करने वाले भी कम न थे।

ख़ैर होगा सवेरा, फ़िर तोपों को अंधड़ बुलबुल के शोर से कहीं दूर छूट जाएगा।

हिमांशु..


पश्तून- मुख्य रूप में अफगानिस्तान में हिन्दु कुश पर्वतों और पाकिस्तान में सिन्धु नदी के मध्य क्षेत्र में रहते हैं 
ज़रा-ज़रा- थोड़ा सा
मज़लूम- अत्याचार से पीड़ित
महरूम-अभागा
इब्लीस- शैतान
अब्तर- अस्त व्यस्त
अख्ज़- लालची
अकबर- महान

कैसे काबू होगा ये चुनावी जिन्न..

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले और अब भी उत्तर प्रदेश में कोरोना की वजह से कई घरों की आर्थिक हालत खराब है, महंगाई और बेरोज़गारी की वजह से गरीब तबका परेशान है। आवारा पशुओं से खेती का नाश हो रहा है और उन्हें भगाने के लिए परिवार के सदस्य बारी बारी से खेतों में जमे हुए थे।

चुनावों तक फिर भी लोग यह कहते रहे कि योगी ठीक है, जानवर हमने छोड़े हैं योगी ने नही। नतीज़े भी वही हुए, उत्तर प्रदेश में भी भाजपा फिर से सत्ता पर काबिज़ हुई।

सपा ने चुनाव लड़ने में अपनी पूरी ऊर्जा लगाई थी, टिकट बंटवारे में वह सही थे पर फिर भी उनकी हार हुई। 
चुनाव के नतीजों का विश्लेषण किया जाए तो पता चलता है कि सपा ने चुनाव की तैयारी चुनाव से दो-तीन महीने पहले से शुरू की थी। वहीं बीजेपी काफी समय पहले से ही चुनाव तैयारी में लग गई।
सपा के पास गांव वालों से संचार की कोई रणनीति नही थी जबकि बीजेपी जो कह रही थी वही शब्द गांव वाले भी बोलते थे।
जैसे बीजेपी ने गरीबों राशन दिया, सपा वाले सत्ता में आते हैं तो गुंडागर्दी करते हैं जैसे सन्देश जन-जन के बीच फैल चुके थे।

इसका मतलब बीजेपी के प्रचार तंत्र और उसमें खास तौर पर उनकी आईटी सेल का कोई तोड़ नही निकाल पाया।
यह बात तो तय है कि जियो क्रांति का फायदा बीजेपी ने जमकर उठाया है।

सपा, बसपा या कांग्रेस कोई भी पार्टी बीजेपी की तरह अपनी नीतियों को जनता के बीच नही पहुंचा सकी।
गरीबों को राशन पहले भी बांटे जाते थे पर उसके झोलों में प्रधानमंत्री की तस्वीर के साथ मुख्यमंत्री की तस्वीर कभी नही देखी गई थी।
उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश दोनों जगह इस तरह के झोले देखे गए। मेट्रो भी योगी-मोदी के बहुत से विज्ञापनों से भरी देखी गई थी।

भाजपा की जल्द तैयारी की वजह से सपा ने जब तक अपना चुनाव प्रचार शुरू किया चुनावी नतीजे तय हो चुके थे। बीजेपी ने अपना फोकस उन वोटरों पर रखा था जो बीजेपी के पारंपरिक वोटर कभी नही थे और सपा अपने पक्के वोटरों को ही पकड़ कर बैठे रही।

पूरे देश भर में यही बात अन्य पार्टियों पर भी लागू होती है, विपक्षी दलों के सभी सदस्य जनता के उसी हिस्से से बात करते हैं जो उनकी बातों या विचारों से हां में हां मिलाते हैं। विपक्षी दल उन लोगों से बात ही नही करते या यूं कहें कि उन विचारों में घुसपैठ नही कर पाते जो उनसे संवाद करने की इच्छा नही रखते।

भाजपा ने साधारण देश में अधिकांश व्यक्तियों के मन में जगह बना ली है, उन्होंने जनता के मन में एक लकीर सी खींच दी है, जो अब भाजपा को अपना और दूसरों को पराया समझने लगी है।

भारत में राजनीति तीन मुद्दों पर की जाती है। राष्ट्रवाद, धार्मिक विरासत और सांस्कृतिक विरासत।
आज आप गौर से देखेंगे तो बीजेपी ने इन तीनों पर अपना कब्ज़ा जमा लिया है।
आप देखेंगे कि राष्ट्रवाद को भाजपा जमकर भुनाती है , धार्मिक विरासतों पर नाम बदल-बदल कर धीरे-धीरे कब्ज़ा जमाया जा रहा है और सांस्कृतिक विरासतों को संभालने या विकसित करने के नाम पर जनता को साथ मिला दिया जाता है।

कांग्रेस व अन्य राजनीतिक दलों ने इन तीन मुद्दों को हमेशा से हल्के में लिया था पर भाजपा इन तीन मुद्दों पर ही केंद्रित रही ।

भाजपा के बेहतरीन होम वर्क को भी उनकी जीत का श्रेय जाता है। गुजरात में इस साल के अंत तक होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारी भाजपा ने अभी एक महीने पहले से ही शुरू कर ली है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी वहां चुनावी रैली निकाली थी।

विपक्ष पार्टियों को अगर एकजुट होना है तो उन्हें संसद से बाहर निकल कर सड़क पर जनता से संवाद स्थापित करना होगा।
यहां पर उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा का बयान महत्वपूर्ण हो जाता है कि 'कांग्रेस अब सड़क पर आने वाली पार्टी नही रही।' विपक्षी पार्टियों को ऐसी बातों पर भी गौर फरमाना होगा।

किसान आंदोलन से सीख ली जा सकती है

किसान आंदोलन जनता से संवाद स्थापित कर किला फ़तह करने का सबसे बड़ा उदाहरण रहा। 'आप' की पंजाब में जीत इसका उदाहरण है, हालांकि उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के विपक्षी दल इससे पूरा लाभ नही ले सके पर फिर भी एक ज़मीन तो तैयार हुई ही है।  
हम कह सकते हैं कि जनता किसी बात को समझती है तो विकल्प की तरफ जरूर जाती है।

गोदी मीडिया पर कई बार बात होती है कि मीडिया भी वोटरों को प्रभावित कर रही हैं लेकिन यहां यह बात गौर करने वाली है कि अभी वैकल्पिक मीडिया भी अच्छा काम कर रही है। 
वैकल्पिक मीडिया के ज़रिए आपके पास सच और झूठ में अंतर करने की समझ बनती है।

किसान आंदोलन में हमने देखा कि आपसी संवाद की वजह से गोदी मीडिया की हार हुई थी,लोगों ने गोदी मीडिया को दरकिनार कर दिया था। वहीं वैकल्पिक मीडिया से जुड़े किसान आंदोलन को निष्पक्ष तरीके से कवर कर रहे साक्षी जोशी और अजीत जैसे पत्रकारों का किसानों द्वारा दिल खोल कर स्वागत किया गया।

हिमांशु जोशी।

Friday, March 11, 2022

उत्तराखंड में कुर्सी तक कैसे पहुंची बीजेपी और कहां चूक गई कांग्रेस.

उत्तराखंड के विधानसभा चुनावों का नतीजा आ गया है, 70 विधानसभा सीटों में 47 सीटों पर कब्ज़ा जमा भारतीय जनता पार्टी फ़िर से उत्तराखंड की सत्ता पर काबिज़ होगी तो कांग्रेस पार्टी सिर्फ़ 19 सीटों पर सिमट गई, वहीं अन्य को 4 सीटें प्राप्त हुई।

उत्तराखंड में फिर से सत्ता पाने को लेकर भाजपा और कांग्रेस ने जो भी रणनीति अपनाई, अब चुनाव के बाद यह साबित हो गया है कि उनमें से भाजपा ने बेहतरीन चुनावी रणनीति अपनाई और वह उत्तराखंड की जनता के मूड को भांपने में कामयाब हुई।

भुकानून, बेरोज़गारी, स्वास्थ्य व्यवस्था और पर्यावरण से जुड़े जिन मुद्दों को उत्तराखंड के चुनावी दंगल में महत्वपूर्ण माना जा रहा था। उन्हें बिना साधे भाजपा कैसे जनता का विश्वास पाने में कामयाब रही, यह बहुत से चुनावी विश्लेषकों को हैरान कर गया।

केंद्र सरकार के मोदी मैजिक ने उत्तराखंड के चुनावी परिणाम में सबसे ज्यादा असर डाला, उत्तराखंड की टोपी पहनने भर से ही प्रधानमंत्री मोदी ने उत्तराखंड में वोट पड़ने से पहले ही आधा किला फ़तह कर लिया था। 
भाजपा ने ऑल वेदर रोड को अपनी सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि के तौर पर पेश किया और जनता भी पर्यावरण के नुकसान की बड़ी कीमत पर हुए इस विकास से खुश रही।

चारधाम परियोजना के लिए हाई पॉवर कमेटी के अध्यक्ष रवि चोपड़ा की रिपोर्ट में इस रोड की चौड़ाई से होने वाले नुकसान के बारे में बताया गया था पर कांग्रेस इस मुद्दे को पकड़ने और जनता को इसका महत्व समझाने में नाकामयाब रही।
यहां पर उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा का बयान महत्वपूर्ण हो जाता है कि 'कांग्रेस अब सड़क पर आने वाली पार्टी नही रही।'

उत्तराखंड की राजनीति पर क़रीबी से नज़र रहने वाले प्रोफेसर एस पी सती के अनुसार कांग्रेस आधा चुनाव सीटों के बंटवारे के वक्त ही हार गई थी। 

पिछले पांच सालों से कांग्रेस संगठन का एक दूसरे से जुड़ाव नही रहा, वरिष्ठ नेता हरीश रावत जहां अपनी ही पार्टी के राजनीतिक प्रतिद्वंदियों में उलझे रहे तो कांग्रेस आला कमान की तरफ से भेजे गए चुनाव प्रभारी दिल्ली के रहने वाले देवेंद्र यादव की एंट्री ने कांग्रेस की नैया पार लगने से पहले ही डुबा दी। उन पर प्रचार अभियान और टिकट बंटवारे में दखलंदाजी का आरोप लगता रहा।
चुनाव नतीज़ों के बाद उत्तराखंड की प्रसिद्ध लोक गायिका सोनिया आनन्द रावत ने भी देवेंद्र यादव पर उत्तराखंड में कांग्रेस का बेड़ा ग़र्क करने का आरोप लगाया है।

कांग्रेस प्रदेश में अपना नारा 'चार धाम चार काम' जनता को ठीक से समझाने में नाकामयाब रही। पांच सीटों में टिकट बंटवारे में परिवारवाद की झलक भी देखने को मिली। ज़मीन पर काम करने वाले बहुत से नेताओ को टिकट नही दिया गया जैसे कोरोना काल में लोगों की मदद करने वाले देहरादून के अभिनव थापर को दरकिनार कर दिया गया। यमुनोत्री के संजय डोभाल ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत दर्ज कर कांग्रेस को उनकी ऐसी ही गलती का अहसास कराया।

देहरादून में अपनी चुनावी रैली के दौरान भाजपा के मुख्य चुनावी रणनीतिकार अमित शाह ने कांग्रेस को मुस्लिम यूनिवर्सिटी, जुम्मे की छुट्टी की वज़ह से घेरा था। उन्होंने कांग्रेस के टिकट बंटवारे पर भी तीर चलाते हुए कहा था कि कांग्रेस ने राज्य आंदोलन के समय आरोपी रहे व्यक्ति को भी टिकट दिया।

प्रियंका गांधी की बात करें तो उनका खटीमा में दिया गया भाषण देखने में उसमें होमवर्क की कमी साफ झलक रही थी, उच्चारण गलत तो थे ही साथ-साथ वो उत्तराखंड की जनता के मूड को भांपने में भी नाकामयाब रही। उनका भाषण किसानों और रोज़गार पर केंद्रित था पर उत्तराखंड की जनता के मन में तो कुछ अलग ही चल रहा था। 
हरिद्वार में हुई धर्म संसद और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा उठाया गया जनसांख्यिकीय बदलाव वाला मुद्दा अपना काम कर चुका था।
राहुल गांधी के भाषणों का भी जनता पर कुछ खास असर नही हुआ, उनके भाषण ज्यादातर कृषि कानून तक ही सिमटे रहे जिसका असर सिर्फ़ उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्रों तक ही देखा गया था।

कई बुद्धिजीवी यह मानते हैं कि उत्तराखंड में यूपी की तरह हिंदू-मुस्लिम वाला कार्ड नही चलता तो इसका जवाब उन्हें कांग्रेसी वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद के नैनीताल जिले स्थित घर पर उनकी किताब को लेकर किए गए हमले के बाद मिल गया होगा।

भाजपा की आईटी सेल भी चुनाव में जबरदस्त तरीके से काम कर रही थी, भाजपा ने कोरोना काल से ही चुनावों के लिए कमर कस ली थी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उधम सिंह नगर में अपनी चुनावी रैली के दौरान कहा था कि 'कोरोना महामारी के दौरान देश के नागरिक को भूखा नही सोने दिया'।

गरीबों को राशन पहले भी बांटे जाते थे पर उसमें प्रधानमंत्री की तस्वीर के साथ मुख्यमंत्री की तस्वीर कभी नही देखी गई थी।


उत्तराखंड के नानकमत्ता, बाजपुर और खटीमा में सिख समुदाय की आबादी अपने खेतों पर आ धमके गोवंश से परेशान हैं क्योंकि यूपी में योगी सरकार द्वारा गोकशी पर प्रतिबंध तो लगाया गया लेकिन गोवंश के रहने का उचित इंतज़ाम नही किया गया। चुनाव से पहले खटीमा के गुरमीत सिंह इसी वज़ह से भाजपा से नाराज़ दिखे थे, इन सीटों पर कांग्रेस ने कब्ज़ा तो जमाया पर वह काफ़ी नही था। पहाड़ी जिलों में कांग्रेस बंदर और सुअरों से खेती को हो रहे नुकसान के मुद्दे को उठाना भूल गई।

हिमांशु जोशी।

Monday, March 7, 2022



अशोक कुमार पांडे

रॉयल्टी को लेकर कई मित्रों की पोस्ट्स पढ़ीं। विनोद जी ने रायपुर में यह सब मुझे भी बताया था। मिलने पर सबसे पहले यही पूछा कि करते क्या हैं? और जब बताया तो यही कहा कि बिना नौकरी के लिखने के भरोसे ज़िंदगी कैसे चलेगी? 

हिंदी के प्रकाशन जगत में दोनों तरफ़ से प्रोफ़ेशनलिज़्म का जो अभाव है उससे मेरा अपरिचय नहीं है। किताबों की बिक्री पर प्रकाशक का एकाधिकार होता है और लेखक को उसके दिए आँकड़ों पर भरोसा करना होता है। 

निजी अनुभव…ठीकठाक हैं मेरे। इतिहास की किताबों की ठीक-ठाक रॉयल्टी मिलती रही है। लेकिन आसपास मित्रों परिचितों को देखा है। कविता-कहानी-उपन्यासों की रॉयल्टी या तो आती नहीं है या इतनी कम आती है कि एक बढ़िया पार्टी करना भी मुश्किल होता है। 

शायद हिंदी का पूरा माहौल ऐसा बना दिया गया है कि पैसे माँगना, पैसों की उम्मीद करना यह सब बुरा माना जाता है। रॉयल्टी सीधे किताब के मूल्य से जुड़ी होती है और लेखक से लेकर पाठक तक सबकी माँग होती है कि किताब की क़ीमत कम से कम हो। अक्सर प्रकाशक लेखक सम्बंध लगातार निजी होते जाते हैं, किताबें अहसान की तरह छपती हैं और फिर किसी हिसाब-किताब की जगह पत्रम पुष्पम चलता है। 

बहुत लम्बी बात की जगह बस इतना कि प्रकाशन के पूरे व्यवसाय को प्रोफेशनल होना पड़ेगा। दो हज़ार हो या दो लाख, हिसाब-किताब होना चाहिए…

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रॉयल्टी कथा पर आगे 

नौकरी के साथी किताब आने पर बधाई देते थे (अक्सर उन्हें नवभारत वग़ैरह से सूचना मिलती थी) लेकिन इतने सालों में सिर्फ़ एक मौक़ा आया जब एक साथी ने किताब ख़रीदी और हस्ताक्षर करवाया। बाक़ी ढेरों लोग ‘एक कॉपी हमको भी दीजिएगा’ वाले रहे। अड़ोस-पड़ोस से भी ऐसी ही माँग आती रही, यहाँ तक कि रिश्तेदारों से भी। 

एक पूर्व कलीग ने retire होने के बाद किताब छपवाई और भव्य विमोचन किया। मेरे ख़याल से लाख रुपए तो खर्च किए होंगे। सभी आने वालों को रिटर्न गिफ़्ट में किताब मिली। 

जिन लोगों के यहाँ आना-जाना होता है, अक्सर किताबों की कोई अलमारी नहीं दिखती। मकान ख़रीदने जाओ तो बच्चों के कमरे के अलावा कहीं किताबों या स्टडी के लिए अलग इंतज़ाम नहीं दिखता। किराए के घरों में हम जैसों को एक स्टडी का इंतज़ाम बेहद मुश्किल हुआ करता है। 

दो-ढाई सौ की किताबें हमारे समाज को बेकार का ख़र्च लगती हैं और लेखक/कवि बनना अक्सर थोड़ा महत्त्वपूर्ण बनने का उपक्रम ही होता है। 

यक़ीन जानिए एक प्रकाशक के तौर पर किताबों के मुफ़्त माँगे जाने और बिक्री के अजीब-अजीब अनुभव ऐसे हैं कि मन खट्टा होता है। 

कुल मिलाकर हिंदी समाज की अभी की संरचना, लेखक और पाठक दोनों तरफ़ से ऐसी है कि रॉयल्टी का मुद्दा बासी कढ़ी में उबाल से ज़्यादा कुछ नहीं बनने वाला।

#Publication_debates 

अशोक पांडे

फ़ेसबुक पर मानव कौल की अपनी किताब के रायल्टी के सम्बन्ध में लिखी एक पोस्ट के सिलसिले में प्रतिभा कटियार की एक पोस्ट के जवाब में। 

यह सब सुनकर ख़राब ही लगता है खासकर तब जब आप खुद भी एक प्रकाशक हों ।   कुछ  सलाहें  हैं  साथी लेखकों के लिए जिन्हे  सूत्र रूप में लिख रहा हूँ। और कुछ बातें प्रकाशक की तरफ से भी।  

१. किताब की पाण्डुलिपि पर आप वर्षों लगाते हैं तो थोड़ा समय अपने अनुबंध पर भी लगाएं।  
२. यानी कि बिना अनुबंध के अपनी पाण्डुलिपि किसी को न सौपें।  
३. अनुबंध की बकायदा किसी प्रोफेशनल वकील से जांच कराएं। 
४. कई तरह के घपले होते रहते हैं।  एक नया घपला है अनुबंध में किताब की रायल्टी को मुद्रित मूल्य की बजाय किसी और केटेगरी के तहत रखना जिसमें लेखक की रायल्टी काफी काट -कूट कर हाथ में आती है। 
५. किताब के  संस्करण को तय करना यानी पेपरबैक और हार्डबाउंड में से क्या सिर्फ हार्डबाउंड प्रकाशित होगा या दोनों।  किताब के अच्छे प्रसार के लिए पेपरबैक होना अनिवार्य है।  
६. अनुबंध में हर तरह के अधिकार प्रकाशक को न दें।  
७. रायल्टी की दर।  

इस सूची में और भी कई बिंदु शामिल किये जा सकते हैं लेकिन ये सबसे अहम  बिंदु हैं।       

अब कुछ सलाहें लेखकों के लिए भी :

१. आपने एक अच्छा खासा समय अपनी पाण्डुलिपि में लगाया है कुछ समय प्रकाशक को भी उसपर काम करने के लिए दें। 
२. आपकी रचना महान होने के बावजूद सम्पादन की मांग करती है।  प्रकाशक को इसके लिए समय दें और अपने सम्पादक की सलाह पर भरोसा करें। 
३. किताब की न्यूनतम लेखकीय प्रतियों की अपेक्षा  रखें।  
४. अपनी पाण्डुलिपि में अनंत समय तक जुड़ाव -घटाव न करें।  
५. अपने कंटेंट के स्रोत का विवरण ईमानदारी से दें और उसे किताब का जरूरी हिस्सा बनाएं। 
६ . प्रकाशक की विज्ञापन योजना में पूरा सहयोग दें। 
७ . प्रकाशक को शुरू से ही बेईमान न समझें।  कई बार अच्छी किताबें भी धीरे -धीरे अपनी जगहें बनाती हैं और कई बार औसत किताब भी बहुत तेजी से चलन में आ जाती है।  बहुत से नए प्रकाशक जगह या संसाधनों की कमी की वजह से छोटे संस्करण ही प्रकाशित कर सकते हैं , मात्र इससे उनकी ईमानदारी पर शक न करें। हो सकता है वे साल में कई संस्करण कर डालें।  

इस सूची में भी कई और बिंदु शामिल किये जा सकते हैं जिन्हे हर प्रकाशक अपने अनुभव के हिसाब से जोड़ या घटा सकता है।  

अब एक डिसक्लेमर भी : 

ये बिंदु मेरे बतौर प्रकाशक छह वर्षों के अनुभव का निचोड़ है।  इससे आप सहमत /असहमत या तटस्थ भी हो सकते हैं।  मेरे विचार से हर प्रकाशक बेईमान नहीं है और न ही हर लेखक महान।  


संजय जोशी 
नवारुण, ग़ाज़ियाबाद 

( मानदेय )

कल दो प्रिय रचनाकारों ने विनोद कुमार शुक्ल की चौदह हजारी रॉयल्टी के मार्फ़त लेखकीय मुश्किलों पर लिखा था। प्रियंका दुबे और अणुशक्ति सिंह। अधिकतम लेखकों को मानदेय पर चर्चा हीनतर लगती है। वजह और कोई नहीं बस इतनी कि इससे प्रकाशकों से सम्बंध खराब होने के खतरे होते हैं। 

इससे पहले कि वि कु शु का खंडन या स्पष्टीकरण आये, आपको मैं रॉयल्टी बनने की प्रक्रिया समझाता हूँ।

मैं बीज व्यवसाय से जुड़ा हूँ। बीज बनाने वाली कुछ कम्पनियाँ खुद अनुसंधान कराती हैं तथा उनका विपणन करती हैं और कुछ कम्पनियाँ दूसरे सरकारी या अर्ध-सरकारी संस्थान द्वारा संशोधित बीज के 'अधिकार' लेकर बेचती हैं। 

सरकारी वैज्ञानिक संस्थान और कम्पनी के बीच 'करार' भी होता है। करार में रॉयल्टी का प्रतिशत तय होता है। वे वैज्ञानिक और उनके संस्थान लेखकों की तरह खुश हो जाते हैं। 

लेकिन, रुको जराs, सबर करोss।

रॉयल्टी के एवज में कम्पनी उस संस्थान से 'पैरेंट सीड' लेती है। यह 'पैरेंट सीड' लेना बहुत कुछ पाण्डुलिपि लेने की तरह होता है। करार होता है कि कम्पनी जितना बीज उत्पादित करेगी, उसका हिसाब संस्थान को देगी और फिर रॉयल्टी देगी।

कम्पनी उस बीज के दो सौ टन यानी दो लाख किलो एक मौसम में उत्पादित करती है। दूसरे मौसम में उसे बेच देती है। साल निकल जाता है। अनुसंधान संस्थान मेल और फोन करते करते थक जाते हैं। और फिर कम्पनी एक दिन हिसाब देती है कि उसने कुल नौ हजार छः सौ चौहत्तर किलो बीज उत्पादित किया और बेचा। और साथ में दस रुपये किलो, मान लीजिये, के हिसाब से छियानबे हजार सात सौ चालीस रुपये का चेक चला जाता है।

खेल खत्म। जहाँ पर दो सौ टन की रॉयल्टी बीस लाख बनती वहाँ एक लाख से भी कम का हिसाब हुआ। उन्नीस लाख जो वाजिब थे वह संस्थान को नहीं मिले। 

अगर रॉयल्टी बीस रुपये किलो की हुई तब फासले का अनुमान कर लीजिये।

फिर,

संस्थान उस वैज्ञानिक की सर्विस रिपोर्ट खराब करता है क्योंकि उसने अच्छा बीज बनाया होता तब अधिक बीज बिकते। जैसे सारे लेखन को खराब कहा जाता है ठीक वैसे ही। पैसे कम मिलने से वह संस्थान या प्रोजेक्ट बन्द हो जाता है। रिसर्च वाले खेतों में काम करने वाले जूनियर प्रशिक्षु और न जाने कितने मजदूर बेरोजगार हो जाते हैं।

उधर कम्पनी उस नौ हजार छः सौ चौहत्तर किलो बीज उत्पादन का विश्वसनीय आंकड़ा सामने रखती है जिसमें किसानों का नाम पता सब होता है जहाँ यह बीज उगाया गया होगा।

और वह वैज्ञानिक? 

लेखक की तरह अगले अनुसंधान पर लग जाता है। जब नया बीज तैयार कर लेता है तब बहुत खुश होता है।

फिर वही चक्र। कम्पनी का दरवाजा खटखटाता है।

खट खट।

कम्पनी: कौन?
वैज्ञानिक: मैं।
कम्पनी: फिर मैं कौन?
वैज्ञानिक: वही जो रॉयल्टी देना पसंद नहीं करता।
कम्पनी: अरे वाह, नई पाण्डुलिपि सॉरी नये अनुसंधान का स्वागत है।

नया 'करारनामा' लिखा जाता है।

चंदन पांडे

कवि, कथाकार और उपन्यासकार यानी हर विधा में समान रूप से सक्षम हिंदी के एक सुपर स्टार (सही अर्थों में) लेखक ने मुझे कुछ साल पहले आपबीती सुनाई थी। रॉयल्टी हड़पे जाने को लेकर वयोवृद्ध साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल की पीड़ा जब सामने आई तो मुझे उस लेखक की कहानी याद आ गई। आप भी सुनिये..

" मैं लिखता गया, प्रकाशक छापता गया। अनुबंध वगैरह का कोई चक्कर उन दिनों होता नहीं था। मेरी किताबें खूब बिकती थीं। मुझे साहित्य अकादमी का पुरस्कार भी मिल गया। ना मैंने कभी रॉयल्टी के बारे में पूछा और ना प्रकाशक ने बताया।"

" संयोग से मुझे दिल्ली  में टू बीएचके का एक सेमी फर्निश फ्लैट अलॉट हुआ। जिसके बाथरूम और किचेन में दरवाज़े तक नहीं थे। मुझे रॉयल्टी का ख्याल आया और मैंने प्रकाशक को फोन मिलाया। प्रकाशक ने विनम्रता से कहा कि तत्काल चेक भिजवाता हूँ।"

" जल्द ही प्रकाशक ने चेक भिजवा दिया, जिसे देखकर मैं सन्न रह गया। हर लाइब्रेरी, साहित्य बेचने वाले हर स्टॉल पर नज़र आने वाली मेरी तमाम किताबों की कुल जमा रॉयल्टी सिर्फ ग्यारह हज़ार रुपये! वह मेरे जीवन भर के फुल टाइम राइटिंग की कमाई थी।"

"मैंने गुस्से में प्रकाशक को फोन किया और कहा कि रॉयल्टी के पैसे से मैं शौचालय का दरवाज़ा लगवाउंगा और उसपर आपके प्रकाशन संस्थान का नाम लिखवाउंगा।"

" दो दिन बाद प्रकाशक मेरे पास आया और कहने लगा कि भाई साहब आप तो बहुत ज्यादा नाराज़ हो गये। इसके बाद उसने पचास हज़ार रूपये का एक और चेक दिया। इसके कुछ समय बाद प्रकाशक का भाई मेरे पास आया जो खुद भी एक पब्लिशिंग हाउस चलाता है। उसने कहा कि आपके साथ बहुत गलत हुआ, आप अपनी तमाम किताबों के राइट मुझे दे दीजिये।"

" मैंने प्रकाशन के अधिकार बड़े भाई से लेकर छोटे भाई को दिये। बड़े भाई ने कहा कि आप पछताएंगे। उसकी बात ठीक निकली। छोटा भाई ने किताबों की रॉयल्टी के रूप में थोड़े-बहुत पैसे नियमित रूप से देने तो लगा लेकिन ऐसा लगा जैसे वो मुझे बंदर बनाना चाहता है। वह किसी भी चिरकुटपने वाले पीआर प्रोग्राम में मुझे साधिकार बुला लेता था, जहां मंच पर तीन ऐसे लोग बैठे होते थे, जिनका साहित्य से कुछ लेना-देना नहीं होता था।" 

" अगर विदेशी भाषाओं में मेरी रचनाओं का अनुवाद नहीं हुआ होता और मैं अंग्रेजी में ना लिख रहा होता तो `हिंदी के सबसे बड़े प्रकाशक' गले में झोला टांगकर भिक्षाटन को मेरी नियति बना देते।"

(निजी बातचीत को नाम के साथ सार्वजनिक करना उचित नहीं है, इसलिए लेखक का नाम नहीं लिख रहा हूँ। लेकिन मुझे यकीन है कि अगर ये कहानी मुझे सुनाई गई है तो हिंदी के समाज में उठने-बैठने वाले बहुत से और लोगों को भी पता होगी। वैसे भी बात महत्वपूर्ण है, व्यक्ति नहीं।)

राकेश कायस्थ

मेरी अभी विनोद कुमार शुक्ल जी के घर लम्बी बात हुई. उन्होंने रॉयल्टी स्टेटमेंट और प्रकाशक के साथ हुए पत्र मुझे भेजे हैं. उनकी इच्छानुसार कुछ तथ्य सार्वजनिक रहा हूँ.  

वाणी से उनकी तीन किताबें प्रकाशित हैं --- दीवार में एक खिड़की रहती थी, अतिरिक्त नहीं, कविता चयन. दो किताबों के ईबुक संस्करण भी हैं. मई १९९६ से लेकर अगस्त २०२१, यानी पच्चीस वर्षों में उन्हें वाणी से कुल १ लाख पैंतीस हजार, अर्थात सालाना करीब पाँच हजार मिले. इसमें से एक किताब को साहित्य अकादमी सम्मान मिला है, बेहिसाब हिंदी लेखकों-पाठकों के घर यह किताब मिल जायेगी. 

राजकमल से उनकी छह किताबें हैं --- हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़, नौकर की कमीज, सब कुछ होना बचा रहेगा, कविता से लम्बी कविता, प्रतिनिधि कवितायेँ, कभी के बाद अभी. (सातवीं हाल ही प्रकाशित हुई है.)
इनके अलावा ईबुक संस्करण भी हैं. 
उनके अनुसार राजकमल ने उन्हें अप्रैल २०१६ से मार्च २०२० तक, चार वर्षों में इतनी सारी किताबों के करीब ६७००० दिए हैं, यानी प्रतिवर्ष सत्रह हजार. पिछले कई वर्षों से रॉयल्टी स्टेटमेंट में कविता संग्रह ‘कभी के बाद अभी’ का जिक्र नहीं है. 
(मुझे लगता था कि 'नौकर की कमीज' बहुत अधिक बिकी होगी, हर जगह दिखाई दे जाती है.) 

लेकिन सबसे त्रासद यह कि वे छह वर्षों से प्रकाशक को लगातार लिख रहे हैं कि 'मेरी किताब न छापें', 'मेरी अनुमति के बगैर नया संस्करण न छापें क्योंकि प्रूफ की कई गलतियाँ हैं', 'मेरा अनुबंध समाप्त कर दें' --- लेकिन कोई सुनवाई नहीं. 
इन अति-सम्मानित बुजुर्ग लेखक की पीड़ा को समझने के लिए सितम्बर २०१९ के इस खत को पढ़ें: “मैंने आपको स्पीड-पोस्ट तथा ईमेल भेजा था कि बिना मेरी अनुमति के नया संस्करण नहीं निकालें. इस संबंध में मैंने जब तब फोन से भी अनुरोध किया था, लेकिन आपने फिर नया संस्करण निकाल दिया. इसके पूर्व भी जितने संस्करण निकले हैं, उसकी पूर्व-सूचना मुझे कभी नहीं दी गयी. मैं इससे दुखी हूँ.”

उनका यह भी कहना है कि प्रकाशकों के साथ ईबुक का अनुबंध नहीं हुआ है, लेकिन फिर भी प्रकाशकों ने ईबुक छाप दी.

आशुतोष भारद्वाज

मेरी अभी विनोद कुमार शुक्ल जी के घर लम्बी बात हुई. उन्होंने रॉयल्टी स्टेटमेंट और प्रकाशक के साथ हुए पत्र मुझे भेजे हैं. उनकी इच्छानुसार कुछ तथ्य सार्वजनिक रहा हूँ.  

वाणी से उनकी तीन किताबें प्रकाशित हैं --- दीवार में एक खिड़की रहती थी, अतिरिक्त नहीं, कविता चयन. दो किताबों के ईबुक संस्करण भी हैं. मई १९९६ से लेकर अगस्त २०२१, यानी पच्चीस वर्षों में उन्हें वाणी से कुल १ लाख पैंतीस हजार, अर्थात सालाना करीब पाँच हजार मिले. इसमें से एक किताब को साहित्य अकादमी सम्मान मिला है, बेहिसाब हिंदी लेखकों-पाठकों के घर यह किताब मिल जायेगी. 

राजकमल से उनकी छह किताबें हैं --- हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़, नौकर की कमीज, सब कुछ होना बचा रहेगा, कविता से लम्बी कविता, प्रतिनिधि कवितायेँ, कभी के बाद अभी. (सातवीं हाल ही प्रकाशित हुई है.)
इनके अलावा ईबुक संस्करण भी हैं. 
उनके अनुसार राजकमल ने उन्हें अप्रैल २०१६ से मार्च २०२० तक, चार वर्षों में इतनी सारी किताबों के करीब ६७००० दिए हैं, यानी प्रतिवर्ष सत्रह हजार. पिछले कई वर्षों से रॉयल्टी स्टेटमेंट में कविता संग्रह ‘कभी के बाद अभी’ का जिक्र नहीं है. 
(मुझे लगता था कि 'नौकर की कमीज' बहुत अधिक बिकी होगी, हर जगह दिखाई दे जाती है.) 

लेकिन सबसे त्रासद यह कि वे छह वर्षों से प्रकाशक को लगातार लिख रहे हैं कि 'मेरी किताब न छापें', 'मेरी अनुमति के बगैर नया संस्करण न छापें क्योंकि प्रूफ की कई गलतियाँ हैं', 'मेरा अनुबंध समाप्त कर दें' --- लेकिन कोई सुनवाई नहीं. 
इन अति-सम्मानित बुजुर्ग लेखक की पीड़ा को समझने के लिए सितम्बर २०१९ के इस खत को पढ़ें: “मैंने आपको स्पीड-पोस्ट तथा ईमेल भेजा था कि बिना मेरी अनुमति के नया संस्करण नहीं निकालें. इस संबंध में मैंने जब तब फोन से भी अनुरोध किया था, लेकिन आपने फिर नया संस्करण निकाल दिया. इसके पूर्व भी जितने संस्करण निकले हैं, उसकी पूर्व-सूचना मुझे कभी नहीं दी गयी. मैं इससे दुखी हूँ.”

उनका यह भी कहना है कि प्रकाशकों के साथ ईबुक का अनुबंध नहीं हुआ है, लेकिन फिर भी प्रकाशकों ने ईबुक छाप दी.

सत्य व्यास

किताबें, रॉयल्टी, प्रकाशक,‌ पाठक और अमेज़न

विनोद कुमार शुक्ल सर की कुल 15 किताबें मुझे अमेज़न पर दिखीं। मुझे पहले तो यही आश्चर्य हुआ कि उनकी इतनी किताबें हैं और मुझे केवल तीन-चार का ही नाम पता है। उस पर भी एक किताब किसी मित्र को देने के बाद केवल दो ही किताबें मेरे पास बची हैं। 

दो तीन दिन पहले मानव कौल सर का एक पोस्ट देखा तब से रॉयल्टी आदि की बहस और चर्चायें फेसबुक, इंस्टाग्राम आदि पर देख रहा हूँ। मानव कौल सर की उस पोस्ट में जो रॉयल्टी से पहले की बात मुझे खटकी वह थी पत्राचार का जवाब न देना। विनोद कुमार शुक्ल के पत्र का जवाब न देना कितना अचंभित करता है। है न! जिस लेखक को हिन्दी का साहित्यिक तबका सर माथे पर रखता हो उसको जवाब न देना बहुत आहत करने वाला लगा।  

अब रॉयल्टी वाले विषय पर आते हैं। जिसमें हम जैसे आम पाठकों का सीधा हस्तक्षेप होता है। मुझे लगता है कि जिस युग में हम रह रहे हैं उसमें बहुत हद तक किताबें ऑनलाइन ज़्यादा बिकने लगी हैं। बहुत कम लोग ऐसे हैं जो किताबें सीधा बुक स्टोर्स से लेना पसंद करते हैं। मुझे ये तो नहीं पता कि प्रकाशक आंकड़े‌ छिपाते हैं या नहीं, या अगर छिपाते हैं तो कितना। लेकिन मैंने कल विनोद कुमार शुक्ल सर की किताबों की अमेज़न रैंकिंग देखी। और इस अमेज़न रैंकिंग में किसी का भी हस्तक्षेप नहीं होता। किताब बिकती है तो उसमें अपने आप उसकी रैंक बेहतर होती है। 

उनकी 15 किताबों की रैंकिंग कल अमेज़न पर क्रमशः यूँ थी

१) दीवार में एक खिड़की रहती थी - 11826
२) कभी के बाद अभी - 127202
३) नौकर की कमीज - 153248
४) खिलेगा तो देखेंगे - 53200
५) हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़ - 10025
६) प्रतिनिधि कविताएँ - 17333
७) अतिरिक्त नहीं - 7403
८) कवि ने कहा - 53375
९) यासि रासा त - 19231
१०) महाविद्यालय - 6588
११) सबकुछ होना बचा रहेगा - 17423
१२) एक चुप्पी जगह - 54865
१३) कविता से लंबी कविता - 136319
१४) एक कहानी - 277400
१५) पचास कविताएँ - 157436

दो दिन पहले दीवार में एक खिड़की रहती थी की रैंक 14000 के ऊपर थी। उससे पहले शायद और ज़्यादा रही हो। रोज़ की 8-10 किताबें अगर अमेज़न पर बिकती रहें तो किताबों की कैटेगरी में आपकी रैंक 3-4 हज़ार के आसपास होती है। अब आप ऊपर जो रैंक लिखी हुई हैं इनसे अंदाज़ा लगाइये कि विनोद सर की कितनी किताबें बिक रही होंगी आजकल। उसके अलावा आप अपनी बुक सेल्फ खोलकर देखिए उसमें विनोद जी की कितनी किताबें हैं। एक सवाल और ये कि क्या आपको ऊपर जितनी किताबें लिखीं हैं सबके बारे में पता था। अगर नहीं तो क्यों? ये सब चीज़ें मिलकर ही एक लेखक को उसका हक दिलवा सकती हैं। वरना बड़े लेखक, बहुत बड़े तो बन जाते हैं लेकिन उनतक ऐसा कुछ नहीं पहुँचता कि केवल लेखन से ही उनका गुजर बसर हो सके। इसलिए हमें प्रकाशकों के छल के अलावा ख़ुद से भी ये सवाल करना ही होगा कि हम किताबें क्यों नहीं ख़रीदते हैं। क्यों आज भी किताबें हमारी प्राथमिकता का हिस्सा नहीं हैं। अगर हमने आज नहीं सोचा तो कल को मानव कौल सर की जगह कोई और किसी और लेखक के बारे में ऐसी पोस्ट लिख रहा होगा और हम लेखक के लिए दुखी हो रहे होंगे।

अंकुश कुमार

रॉयल्टी-

एक लेखक बंधु थे, उनकी किताब कानपुर के कोई अनाम प्रकाशक छाप देते हैं। प्रकाशक ने बताया कि 500 प्रतियाँ प्रकाशित की हैं। लेखक पहली किताब के उत्साह में हर जगह किताबें बाँटते नज़र आते हैं। 

 लेखक फिर से मेहनत करते हैं और भोपाल के एक गुमनाम प्रकाशक छाप देते हैं। प्रकाशक बताते हैं कि उनकी किताब के तीन संस्करण छप चुके हैं और किताब भी अन्य भाषा मे अनूदित हो चुकी है। फिर भी लेखक को कहीं किसी लिटरेचर फेस्ट से बुलावा नहीं मिलता और किसी बुकस्टाल पर उनकी किताब नहीं दिखती।

लेकिन लेखक निराश नहीं होते, बड़ी शिद्दत से एक किताब लिखते हैं जिसे एक ट्रस्ट छापकर 51000 प्रतियाँ अपने ट्रस्ट से जुड़े लोगों में बाँट देते हैं। फिर भी उनके बगल वाला उन्हें नहीं जानता। 

लेखक अब भी निराश नहीं होते और अंतिम प्रयास करते हैं। इस बार उन्हें सफलता मिलती है और दिल्ली के एक बड़े प्रकाशक किताब प्रकाशित करने को राजी हो जाते हैं। किताब प्रकाशित होते ही चर्चा में आ जाती है। मोहल्ले वाले सब उनका सम्मान करने लगते हैं। हर बुक स्टाल पर किताब दिखने लगती है। प्रकाशक बताते हैं कि उन्होंने 1100 प्रतियों का संस्करण प्रकाशित किया है। अब ये 1100 प्रतियाँ अर्जुन के गांडीव धनुष के तीरों की तरह काम करती हैं। देश भर के 2000 बुकस्टाल पर दिखती हैं, लिटरेचर फेस्ट में दिखती हैं, पुस्तक मेला में दिखती हैं लेकिन 1100 प्रतियाँ खत्म होने का नाम नहीं लेती।

भगवंत अनमोल

रॉयल्टी पर आखिरी बात। 

मुझे रॉयल्टी जैसी किसी भी संस्था पर कोई विश्वास नहीं है। मुझे आजीवन किताब बिक्री का कोई भरोसा नहीं है। इसलिए रॉयल्टी के परसेंटेज पर मैं कभी झिकझिक नहीं करता। एडवांस रॉयल्टी की मांग करता हूँ। एकबार एकमुश्त एडवांस मिल जाये फिर ज़िन्दगी भर रॉयल्टी से काटते रहो।

हाल फिलहाल कानपुर में प्रॉपर्टी खरीदा है। सोचा इस बड़े यज्ञ में एक आहुति अपने लेखन के राशि की पड़ जाए तो कितना अच्छा हो। प्रकाशक से इस बार पिछली किताब से अधिक एडवांस की मांग की। जब तीन किताबें एक प्रकाशक से प्रकाशित हो चुकी हों तो हर किताब के साथ मांग बढ़ती है। प्रकाशक ने कोरोना का हवाला देकर सिर्फ उतना ही अग्रिम भुगतान देने के लिए हामी भरी जितना पिछली किताब में दिया था। उनकी भी सीमा है और हमारी भी महत्वाकांक्षाएं हैं। 

मैंने दूसरे प्रकाशन में संभावना तलाश करने की कोशिश की। थोड़ी बहुत मशक्कत के बाद अंग्रेजी के एक प्रकाशक जो अभी हिंदी किताबें प्रकाशित करना शुरू किए थे, वहां बात बन गयी। मार्च अंत तक पांडुलिपि देने की बात तय हुई। अपना दुर्भाग्य देखो फरवरी में प्रकाशन ही बंद हो गया। मैंने भी किताब साइड में रख दी है। जब कोई प्रकाशक एडवांस देकर किताब लिखने का आदेश देगा तो ही लिखा जाएगा। 

असल मे हिंदी प्रकाशक खुद नहीं चाहते कोई लेखक पेशेवर लेखन करे। पेशेवर लेखन उनकी जेब ढीली कर सकता है। हिंदी वरिष्ठ लेखक भी नहीं चाहते कि कोई युवा लेखक पेशेवर लेखन करे। इसके पीछे उनका तर्क वही सास बहू के रवैये जैसा रहता है। सास के साथ जैसा हुआ, बहू के साथ भी वैसा ही होना चाहिए। महान से महान और साधारण से साधारण लेखक ने इस कठिन राह को चुना है। हम अकेले नहीं हैं, न यह अंतिम दौर है। लेकिन हमारी कोशिश हमेशा यही रहेगी कि आने वाली पीढ़ी को एक ऐसा प्लेटफार्म दिया जाए ताकि वह इस राह में कठिनाई न महसूस करें।

भगवंत अनमोल



रॉयल्टी का रोना न जाने कितने सालों से रोया जा रहा। आज हम तकनीक के उस दौर में जहां हमारे फ़ोन बस आस-पास रहकर हमें सुन रहे हैं और उस आधार पर हमें विज्ञापन सुझा रहे हैं। हमारे एक क्लिक पर हज़ारों का आदान-प्रदान पलक झपकते ही हो जा रहा है। लक्ज़री होटल से लेकर सड़क पर टिक्की बेचने वाले तक के पास यूपीआई जैसी सुविधाएँ मौजूद हैं जहां हर एक लेन-देन का हिसाब उँगलियों के स्पर्श भर से सामने होता है। 

ऐसे दौर में किताबों की बिक्री का संसार आज भी गूढ़ रहस्य बना हुआ है। यह बात समझ से परे है। दुनिया मेटावर्स की कल्पना को सच होते देखने के क़रीब जा पहुँची है लेकिन उस दुनिया को रचने वाला लेखक आज भी यह कल्पना नहीं कर पा रहा कि उसकी किताबें कितनी ऑनलाइन-ऑफ़लाइन बिकी, कितनी औडियो जैसे दूसरे माध्यमों में बेची गयी, कितना मुनाफ़ा प्रकाशक को हुआ और कितनी रॉयल्टी लेखक की बनी, यह बात पारदर्शिता के साथ उसे पता चल सके। यह रहस्यलोक एक अदना से रहस्योद्घाटन के लिए जाने कितने बरसों से तड़प रहा है। 

कोई एक ऐसी केंद्रीय तकनीक (ऐप, वेबसाइट वग़ैरह) क्यों नहीं बनाई जा सकती जिसपर लेखक और प्रकाशक दोनों, किताबों की बिक्री को ट्रेक कर सकें। जिसपर आँकड़े सही-सही दर्ज करना उसी तरह ज़रूरी हो जिस तरह किताबों के प्रकाशन के लिए आईएसबीएन नंबर लेना ज़रूरी होता है। ऑनलाइन और ऑफ़लाइन बिक्री का एक ऐसा सेंट्रलाइज चैनल क्यों नहीं बनाया जा सकता जहां सबकुछ पारदर्शी हो। 
विनोद कुमार शुक्ल जैसे लेखक अगर रॉयल्टी को लेकर परेशान हैं तो हिंदी में संभावना देख रहे नए लेखक क्या ख़ाक उम्मीद करें। 

2007 में बीबीसी हिंदी पर लिखे अपने लेख में वरिष्ठ साहित्यकार असग़र वजाहत ने कहा था, "समाज में लोगों के बीच होने वाले महत्त्वपूर्ण समझौतों को निर्देशित करने तथा उन्हें सही ढंग से लागू करने की ज़िम्मेदारी सरकार की होती है। सरकार से लेखक यह माँग कर सकते हैं लेखक-प्रकाशक के प्रकाशन, रॉयल्टी संबंधों पर क़ानून बनना चाहिए। इसके अंतर्गत ‘रजिस्ट्रार ऑफ रॉयल्टी’ का विभाग खोला जा सकता है। इसके बारे में नियम-क़ानून बनाए जा सकते हैं। इस विभाग को प्रकाशक और लेखक दोनों मान्यता दे सकते हैं तथा यह संस्था दोनों के हितों को देख सकती है।" 

"हमारे देश में लेखकों के अनेक संगठन हैं और लगभग सभी संगठन कॉपी राइट और रॉयल्टी के मुद्दे को प्रमुख मुद्दा मानते हैं लेकिन आज तक इन दोनों मुद्दों पर राष्ट्रीय बहस नहीं चली है और न इसको सुलझाने का कोई रास्ता ही नज़र आया है।"

वजाहत साहब यह आज से लगभग पंद्रह साल पहले कह रहे थे। आज एक बार फिर इस पर बस बहस हो रही है। जो फिर थम जाएगी और फिर वही ढ़ाक के तीन पात।
मेरा निजी अनुभव यही है कि एडवांस रॉयल्टी हिंदी में आज भी गिनती के लेखकों को मिल रही है। ये वो लेखक हैं जिनकी सोशल मीडिया पर ज़बरदस्त फ़ॉलोइंग है, जिन्हें मार्केटिंग का हुनर अच्छे से आता है (इसमें मेरे ख़याल से कुछ ग़लत भी नहीं है)। प्रकाशक जानते हैं कि उनके पास हिंदी के सलमान खान हैं। उनका बिकना तय है। अगर आप एक लेखक के तौर पर खुद अपनी किताबें बेचने में सक्षम नहीं हैं तो प्रकाशक को आपकी कुछ ख़ास पड़ी नहीं है। 

यहाँ कैच यह है कि जो प्रकाशक आपकी किताब छापने में बड़ी रुचि दिखाते हैं, बाक़ायदा अपना हज़ारों का निवेश करते हैं वो आपकी किताब को बेचने को लेकर इतना ठंडा रवैया क्यों अपनाते हैं? इतना खर्च करके किताब को लेकर निष्क्रिय हो जाने में उनका लाभ क्या है? क्या वो यही चाहते हैं कि बिकें तो सिर्फ़ हिंदी के सलमान खान? उन्हीं को आयोजनों में बुलाया जाय। उन्हीं की अपने पुस्तक मेलों में ज़बरदस्त मार्केटिंग की जाए। मतलब यह कि मुंबई की फ़िल्म इंडस्ट्री का एक बेहद सस्ता मॉडल हिंदी प्रकाशन जगत में बनाया जा रहा है? या फिर मामला कुछ और भी है। कुछ चुनिंदा लेखकों की किताबों की बिक्री को बढ़ाकर दिखाया जाय ताकि शेष लेखकों की बिक्री को घटाकर दिखाने पर भी संतुलन बना रहे? 

यह भी हो ही सकता है किताबें वाकई उतनी ही बिक रही हैं जितनी दिखाई जा रही हैं, हांलाकि किताबों के छपने की रफ़्तार देखते हुए इसमें कुछ शक ज़रूर होता है। लेकिन जो भी हो ऐसे तकनीकी प्रयास होने चाहिए जिनमें बिक्री के संदर्भ में दूध का दूध और पानी का पानी सब स्पष्ट हो सके। और यह भी पता लग सके कि हिंदी प्रकाशन जगत में मलाई आख़िर खा कौन रहा है? क्योंकि फ़िलहाल तो दूध के प्रचुर उत्पादन के बावजूद लेखक-प्रकाशक हर कोई यही कह रहा है कि मैं नहीं माखन खायो।

#रॉयल्टी

उमेश पंत

Saturday, March 5, 2022

दुष्प्रचार के मैदान पर लड़ा जाता रूस-उक्रेन युद्ध.

रूस ने बहुत से पश्चिमी मिडिया संगठनों तक अपनी जनता की पहुंच प्रतिबंधित कर दी है। रूस की तरफ़ से कहा गया कि यह कदम यूक्रेन पर रिपोर्टिंग के दौरान इन संगठनों तरफ़ से झूठी जानकारियां फैलाने के लिए उठाया गया है। 

रूस ने पश्चिमी मीडिया पर बार-बार आरोप लगाया है कि वह दुनिया के बारे में आंशिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं और अक्सर यह रूस विरोधी होता है। वह अपने नेताओं से ईराक जैसे विनाशकारी युद्ध और भ्रष्टाचार को लेकर सवाल नहीं पूछते। 


अगर हम इतिहास के पन्नों को उठा कर देखें तो विश्व के सामने पश्चिमी मीडिया द्वारा युद्ध से पहले यह नायक और खलनायक वाली जो छवि गढ़ दी जाती है, यही युद्ध का प्रमुख कारण भी बनती है या इसी की आड़ में युद्ध लड़ा जाता है।

नायक और खलनायक के बीच हमेशा युद्ध होता है, इस बात से कोई इंकार नही किया जा सकता। जंग को बेचकर उससे लाभ उठाने की पुरानी परंपरा रही है।


नब्बे के दशक में अमेरिकी मीडिया द्वारा इराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन की छवि हिटलर से भी बुरी बना दी गई थी, उनके राष्ट्रपति जॉर्ज बुश सीनियर ने खुद सद्दाम की यह छवि गड़ी थी।
बाद में अमेरिका ने सामूहिक विनाश के हथियार रखने का आरोप लगा इराक़ पर हमला कर दिया था।


लेकिन जांच के बाद यह सामने आया कि इराक के पास ऐसे कोई हथियार नही थे।

युद्ध के बीच संचार और दुष्प्रचार के इस खेल को समझना जरूरी

संचार के बारे में अगर बात की जाए तो यह सूचना देता है, यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मज़बूत बनाता है। रूस हो या अमेरिका, युद्ध हो या शांति, संचार ईमानदारी से हो यह आवश्यक है।
प्रचार भी संचार के ज़रिए ही किया जाता है पर इसका सदुपयोग और दुरुपयोग हमारे हाथों में होता है।

दुष्प्रचार अलोकतांत्रिक तरीके से कार्य करता है, इसमें रणनीतियों का प्रयोग कर लोकतंत्र को प्रभावित किया जाता है। युद्ध में इस तरह के दुष्प्रचार का जमकर प्रयोग किया जाता है।

इंटरनेशनल इनसाइक्लोपीडिया ऑफ द फर्स्ट वर्ल्ड वॉर की स्टीफन बैडसे द्वारा लिखी एक रिपोर्ट के अनुसार दुष्प्रचार तकनीक का प्रयोग प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हुआ था। इसमें पोस्टर ,फोटो, मूवी शामिल थी।

 इसी का उन्नत रूप आज हम ट्विटर, फेसबुक में भी देख रहे हैं। जिसमें फ़ोटो, वीडियो सब एक ही प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है।
इनको रीट्वीट, साझा कर हम सब भी उस दुष्प्रचार तंत्र का हिस्सा बन जाते हैं और यही कारण रहा कि इस युद्ध में रूस ने फेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर भी प्रतिबंध लगा दिया है।

जनता के दुष्प्रचार तंत्र का हिस्सा बनने का उदाहरण हम अमेरिकियों द्वारा अमेरिका की राजधानी में किए गए हमले से ले सकते हैं। ट्रम्प के समर्थकों ने सोशल मीडिया की मदद से जनता के मन में चुनाव के बारे में संदेह बढ़ाया था, जिसके प्रभाव में आकर अमेरिकी स्वतंत्रता की रक्षा के नाम पर हिंसा करने व्हाइट हाउस पहुंच गए थे।

शीत युद्ध की अवधारणा को पेश करने वाले पहले व्यक्तियों में से एक वाल्टर लिपमान कहते हैं कि हमें यह याद रखना चाहिए कि युद्ध के समय दुश्मन की तरफ़ से जो कहा जाता है वह हमेशा प्रचार होता है और हमारे मोर्चे पर जो कहा जाता है वह सत्य और धार्मिकता, मानवता का कारण और अशांति के लिए धर्मयुद्ध है।

इसे हम अभी चल रहे यूक्रेन-रूस युद्ध में रूस की तरफ़ से जारी बयान को पढ़ समझ सकते हैं। पुतिन अपने मोर्चे पर युद्ध को अशांति के लिए धर्मयुद्ध साबित करते कहते हैं इस ऑपरेशन को यूक्रेन में सैन्यीकरण और नाजीकरण ख़त्म करने के लिए शुरू किया जा रहा है।

पश्चिमी मीडिया अपने वास्तविक कार्य में विफ़ल रही है

' द गार्जियन' की दुष्प्रचार अभियान पर साल 2001में लिखी रिपोर्ट 'दुष्प्रचार अभियान' को समझने में मददगार है।
 इसमें लिखा है कि जब किसी संघर्ष के लिए तैयारी की बात आती है तब पश्चिमी मीडिया निराशाजनक रूप से 'दुष्प्रचार अभियान' का सहारा लेती है। 
इसके पहले चरण में संकट पर बात की जाती है, दूसरे चरण में वह दुश्मन देश के नेता का चरित्र हनन करते हैं, तीसरे चरण में वह शत्रु का दानवीकरण करते हैं और चौथे चरण में अत्याचार पर बात करी जाती है।

दूसरे चरण में आम तौर पर दुश्मन की तुलना हिटलर से करना आसान रहता है। सद्दाम हुसैन के बारे में आप पढ़ ही चुके हैं और अब पुतिन को भी हिटलर की तरह दिखाया जा रहा है।

अमेरिकी मीडिया कैसे अपने देश का बचाव करती है ये आप इन खबरों से समझ सकते हैं।

अमेरिकी समाचार चैनल सीएनएन की इस ख़बर को देखें तो पता चलता है कि इराक और अफगानिस्तान में (घुसपैठिया) बने एक अमेरिकी सैनिक को अमेरिकी मीडिया इराक वार हीरो की पदवी से नवाज़ रही है। 


वहीं रूसी सैनिकों के लिए पश्चिमी मीडिया ने पुतिन के जुल्मों से परेशान होने वाली छवि बनाई है।

आखिर पाठक करें क्या

हमारी मीडिया की पश्चिमी मीडिया पर अत्यधिक निर्भरता ने हम भारतीयों की सोच को भी काफ़ी हद तक प्रभावित किया है।
 इसलिए सवाल यह उठता है कि भारतीय दर्शक सही सूचना के लिए भरोसा किस पर करें। ट्विटर, फेसबुक, यूट्यूब व अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का सम्बंध भी पश्चिम से है तो यहां पर सूचना के साथ छेड़छाड़ की संभावना बन सकती है। यह मुमकिन है कि आप तक सही सूचना न पहुंचे या सही सूचना की पहुंच कम कर दी जाए।
एक सुधि पाठक,दर्शक को सही ख़बर समझने की क्षमता विकसित करनी सीखनी होगी। जैसे किसी देश की सेना के जवान से जुड़ी ख़बर की वास्तविकता जानने के लिए उस देश के सैनिकों की वर्दी जानना जरूरी है।
ऐसे ही किसी मीडिया की ख़बर पर विश्वास करने से पहले उसके स्वामित्व के बारे में जानना जरूरी है, जिससे पता चल सके कि ख़बर का फायदा किसे है। ख़बर सिर्फ़ पाठकों के लिए है या किसी दुष्प्रचार का हिस्सा होकर अपने स्वामी को लाभ पहुंचा रही है।

हिमांशु जोशी।


Friday, March 4, 2022

मानव सभ्यता के 'विकास' का आईना 'काली-वार काली-पार'


ये किताब हिमालय में रहने वाली राजी जनजाति की परंपरागत जीवन शैली की अंतिम सांसे गीनने और उनकी पहचान मिटने की कहानी है।
 तीसरे खण्ड में इसकी कहानी बहुत तेज़ी के साथ बढ़ती लगती है, उसे पढ़ते पाठक ऐसा महसूस करेंगे मानो वह किसी मरुस्थल घूमते-घूमते हिम प्रदेश में प्रवेश कर गए हैं।
किताब पूरी पढ़ने के बाद आपको यह पता चल जाएगा कि पृथ्वी में कोई सभ्यता कैसे खुद को बचाए रखने के लिए अनवरत संघर्ष ज़ारी रखती है।

किताब के आवरण चित्र को देखें तो हिमालय के तले बैठे लोग आपको रहस्मयी लग सकते हैं, पिछले आवरण पर लेखक का परिचय है। लेखक ने उत्तराखंड की संस्कृति पर बहुत काम किए हैं जो महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक हैं।
किताब की शुरूआत 'समर्पण' से होती है जो छोटे-छोटे आदिम समुदायों के लिए लिखा गया है।

'भूमिका जैसा कुछ' में 'जंगल के बेदखल' राजा शीर्षक है। यह साल 1962 , भारत-चीन सीमा संघर्ष के दिनों से शुरू होता है। लेखक इसमें बताते हैं कि कैसे उन्हें काली नदी के आर-पार उत्तराखंड और नेपाल के जंगलों में रहने वाली राजी नामक अल्पसंख्यक जनजाति की बोली पर शोध करने की प्रेरणा मिली। लेखक ने इसमें उनसे अपनी पहली मुलाकात, उनके शारीरिक बनावट और उनकी बोली पर अपने विचार भी रखे हैं। 

तीन खण्डों में बंटी इस क़िताब का पहला खण्ड 'काली-वार', दूसरा खण्ड 'काली-आर-पार' और तीसरा खण्ड 'काली-पार' है।
अलग-अलग कालखंड में राजी जनजाति के अलग-अलग परिवारों की कहानी को तरीके से सम्पादित कर यह किताब लिखी गई है।

पहले खण्ड में राजी का इतिहास 'इनरुआ' द्वारा मंडुवा खोजने की कहानी के साथ शुरू होता है। भाषा सरल है पर यहीं किताब की पहली और आखिरी गलती दिखती है खुराक को खूराक लिखा गया है।

मानव प्रकृति के साथ-साथ एक दूसरे से दोस्ती कर कैसे समृद्ध होता गया यह किताब में बखूबी बताया गया है। रोटी के अविष्कार की कहानी और 'अपने तार के सहारे दो पेड़ों की दूरी नापती एक मकड़ी को देखा' पंक्ति इसका उदाहरण हैं।
यह सब क़िताब के प्रति आपकी रुचि को भी जगा देगा।

नराई की मां बनने की कहानी को लेखक ने बड़े ही मर्मस्पर्शी तरीके से लिखा है।
'धरती तो हम सब की मां है, उस पर अकेला अपना हक जता कर जो खूनी खेल खेला जाता है, हम जंगल वासियों को कभी रास नही आया' पंक्ति रूस-यूक्रेन के बीच चल रहे वर्तमान युद्ध की याद दिला देती है।

'भलमन साहत' , 'दंत-क्षतों' जैसे कम दिखने वाले शब्द समझने में दिमाग पर ज़ोर तो पड़ेगा पर वह किताब का आकर्षण भी बढ़ाते हैं।

राजी के साहसिक और बुद्धिमानी भरे कारनामों की कहानी लिए किताब आगे बढ़ी है।

दूसरा खण्ड 'काली-आर-पार' राजी जनजाति के बर्तन के बदले अनाज वाले रिवाज़ से शुरु होता है। काखड़ के शिकार को ऐसे लिखा गया है जैसे वो सामने ही घटित हो रहा हो।

गुफा में ठंडी से ठिठुरते गमेर का 'बाप रे! ये हाल तो हमारा है, बेचारे गरीब-गुरबों का क्या होगा' कहना राजी जनजाति का अपनी दुनिया में मग्न रहना दर्शाता है।
किताब पढ़ते आप उत्तराखंड के इतिहास से भी परिचित होते चले जाएंगे।
 अंग्रेज़ों के दौर में कहानी पहुंचने पर यह पता चलता है कि राजी जनजाति संख्या में बढ़ते हुए महापंचायत भी कराने लगी थी।

बिरमा और नरुवा की मुलाकात फ़िल्मी है और किताब पहली बार एक अलग पहलू को छूती है।

जमीन को लेकर दिया गया नोटिस और उसमें लिखी भाषा पढ़ने लायक है। किताब में राजी जनजाति की कहानी अब आगे बढ़ते हुए अंग्रेज़ों के ज़माने से आज़ादी के बाद पहुंचती है।
धमुवा रौत और मथुरा रौत के बीच का वार्तालाप बड़े ही निराले अंदाज में लिखा गया है।
मथुरा बणरौत के द्वारा अदालत में कहे शब्द वन संपदा के अधिकारों को लेकर सवाल खड़े कर देते हैं, यह आज की वन नीति पर भी सवाल हैं। उन्हें पढ़ने मात्र के लिए ही किताब खरीदी जा सकती है।

पृष्ठ 146 में लेखक ने आपदा वाली रात को जिस तरह से लिखा है वह वाकई में पहाड़ में घटित होने वाली किसी आपदा का सजीव प्रसारण जान पड़ता है।

शेर सिंह की कहानी के ज़रिए लेखक ने राजी जनजाति के बीच की सामाजिक कुरीतियों को लिखा है। 
'पटौवा परिवार को हमारी सात वर्षीय बहन भा गई। उन्होंने अपने लड़के के लिए प्रस्ताव किया तो पिताजी ने स्वीकार कर लिया' पंक्ति इसका उदाहरण है।

पंचाक की जड़, अपामार्ग, रतपतियां जड़ीबूटियों के बारे में बताया गया है जिनका इस्तेमाल राजी जनजाति द्वारा किया जाता था, आज अगर उत्तराखंड के बेरोजगार युवा इन जड़ी बूटियों से स्वरोज़गार प्राप्त करना चाहते हैं तो उन्हें ऐसी ही किताबों से जानकारी जुटानी चाहिए।

जंगल पर जनता के अधिकार की कहानी लिए किताब तीसरे खण्ड 'काली-पार' पर पहुंचती है। यह खण्ड किताब का सबसे बेहतरीन हिस्सा है।
लेखक ने हर घटना को बड़ी बारीकी से लिखा है जैसे  'जैसिंह ने चूल्हा जलाया, पानी से भरी पतीली चूल्हें पर रखी। मानसिंह मुर्गों के सिर और पंजे काटकर अलग करने लगा, फिर साबुत मुर्ग़े खोलते पानी में डाले। जैसिंह मसाले घोट चुका था'।

पृष्ठ 187 और 188 ज्ञान का अनमोल खज़ाना लिए हैं, अब आप किताब के उस हिस्से में हैं जहां उसका एक शब्द छोड़ना भी बहुत कुछ छोड़ने जैसा है। नेपाली मज़दूरों का संवाद पढ़ने के बाद मेरी ये गारंटी है कि आपका उनके प्रति नज़रिया बदल जाएगा। विश्व के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर यह संवाद सटीक बैठता है।
मर्डर कर भागे हुए जैसिंह का अपनी जनजाति के बारे में इतनी गहराई से सोचना अचम्भित करता है।

'नई-नई कोमल पंक्तियों से ढकी वानावलि हवा के झोंकों में जैसे झूला झूल रही थी। फ्यूली के पीले-पीले और गुलबनफ्शां के किंचित हल्के नीले फूलों से लगता था कि जैसे धरती ने रंग-बिरंगी ओढ़नी ओढ़ ली हो' पंक्ति किताब पढ़ते-पढ़ते ही पाठकों को प्रकृति की अद्वितीय सुंदरता की अनुभूति दे देती है।

कहानी में आगे बढ़ते विधवा पुनर्विवाह की कहानी समाज के लिए एक सबक है।
बहुत सी कहानियां साथ पढ़ते पाठक उलझ न जाएं, इसके लिए लेखक फिर से कहानी याद दिला देते हैं और यह पुनरावृत्ति भी नही लगता।

जैसिंह का सालों बाद भारत वापस आना और बसावट पर उस क्षेत्र की स्थिति का वर्णन करना पढ़ने योग्य है।
अपने आखिरी हिस्से में किताब मेहनतकशों और रईसों का बीच की जो लड़ाई दिखाती है, वही आज के समाज की सच्चाई है, पृष्ठ 264 पढ़ते आपको फिर से रूस-यूक्रेन याद आ जाएंगे। आपकी आंखों के सामने युद्ध में वीरगति प्राप्त कर रहे सैंकडों सैनिकों की सोशल मीडिया पर घूम रही तस्वीरें घूमने लगेंगी।

किताब शुरुआत में जैसी लगती है उतनी साधारण है नही, यह बहुत ही बड़ा विषय खुद में समेटे हुए है।
पूंजीपतियों की वज़ह से आम नागरिक दबा हुआ है और उनके लिए उम्मीदों की किरण ढूंढती किताब समाप्त होती है।

पुस्तक- काली-वार काली-पार (उपन्यास)
लेखक- शोभाराम शर्मा
प्रकाशक- न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन
मूल्य- 350
मेल- newworldpublication14@gmail.com
समीक्षक- हिमांशु जोशी।

'शेन बॉलिंग' चैंपियन जाता कहां है वो तो अमर रहता है..

बात 1994-95 की है, दुनिया समझ तो नही आती थी पर हां क्रिकेट जरूर समझ में आने लगा था। मैं हाथ घुमा कर गेंदबाजी करते हुए शेन वार्न का गेंदबाज़ी एक्शन भी जरूर कॉपी कर लिया करता था और मेरे जैसे क्रिकेट के शौकीन लाखों हिंदुस्तानी लड़के भी यही किया करते होंगे। 'शेन बॉलिंग' एक जुमला बन गया था जो हर नए गेंदबाज़ को बेहतर गेंदबाजी करने के लिए प्रेरित करता रहा।

बॉल ऑफ द सेंचुरी का वो दिन

4 जून 1993 का दिन था इंग्लैंड के मैनचेस्टर में एशेज सीरीज़ का पहला टेस्ट मैच चल रहा था और ऑस्ट्रेलिया की पहली पारी 289 रन में सिमटने के बाद अंग्रेज़ों का 71 रन पर पहला विकेट गिरने के बाद स्पिन को अच्छे तरीके से खेलने वाले विश्व के बेहतर बल्लेबाज़ों में से एक माइक गैटिंग बल्लेबाज़ी करने आए थे। वह चार रन पर थे जब अंग्रेजों की पारी का 28 वां ओवर लेकर मात्र 11 टेस्ट खेले शेन वॉर्न उनके सामने गेंद लिए खड़े थे।लगभग दस कदमों का रन अप ले उन्होंने गेंद डाली जो कमेंटेटर के अनुसार लेग स्टम्प से लगभग ढाई फीट दूर टप्पा खाई थी। अगले ही पल गेंद ऑफ स्टम्प से जा टकराई और माइक गैटिंग लगभग दस सेकेंड तक विकेट के सामने अचंभित होकर खड़े थे। 

सचिन और वॉर्न

सचिन और वॉर्न जब तक खेले तब तक मैदान में उन्हें एक दूसरे के ख़िलाफ़ खेलते देखना हमेशा पैसा वसूल रहता था।
सचिन ने साल 1998 की सीरीज के दौरान शेन वार्न की गेंदों पर खूब रन बटोरे थे।
शारजाह की उस वनडे सीरीज में सचिन तेंदुलकर ने लगभग हर ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजों की धुनाई की, तब वार्न ने कहा था कि जब मैं बेड पर जाता हूं मुझे सपने आते हैं कि सचिन मेरे सिर के ऊपर से छक्का मार रहे हैं। उन्हें रोक पाना मुश्किल है। मुझे नहीं लगता कि डॉन ब्रैडमैन के अलावा कोई उस क्लास में है, जिसमें सचिन हैं, वह एक शानदार खिलाड़ी हैं।

सचिन भी मैदान के बाहर इस महान स्पिनर की हमेशा इज़्ज़त करते दिखे। इसी साल जनवरी 25 को शेन वॉर्न पर अमेज़न प्राइम में एक डॉक्यूमेंट्री आई थी, जिसमें सचिन कहते हैं कि मुझे कभी हिचकिचाहट नही होगी जब मैं शेन का नाम अब तक खेले सभी स्पिनरों में सबसे ऊपर रखूंगा।

आज शेन वॉर्न के जाने पर सचिन ने उन्हें याद करते ट्वीट किया 'शॉक्ड, स्तब्ध और दुखी हूं। आपको याद करेंगे वॉर्नी। आपके साथ मैदान पर उसके बाहर कोई भी पल खराब नहीं रहा। हमेशा आपकी ऑन फील्ड और ऑफ फील्ड यादों को संजोए रखेंगे।
भारत और भारतीयों के दिलों में आपके लिए खास स्थान रहा है।
बहुत जल्दी चले गए'

वर्ल्ड कप से बाहर होना

साल 2003 में दक्षिण अफ्रीका की ज़मीन पर खेले जाने वाले क्रिकेट विश्व कप के लिए ऑस्ट्रेलियाई टीम में उन्हें शामिल किया गया था। ऑस्ट्रेलिया कप की प्रबल दावेदार भी थी, दक्षिण अफ्रीका पहुंचने के बाद ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ियों का डोप टेस्ट हुआ जिसमें शेन वॉर्न फेल हो गए थे। इसके चलते उन पर एक साल का प्रतिबंध लगाया गया। अपने बचाव में उन्होंने कहा कि मैंने मां के कहने पर यह दवा ली, जो वज़न घटाने के लिए थी। 
वह वर्ल्ड कप ऑस्ट्रेलिया ही जीता और हारने वाली टीम थी भारत।
श्रीलंका के ख़िलाफ़ खेले टेस्ट में उन्होंने विकेटों की झड़ी लगा प्रतिबंध से एक साल बाद हुई अपनी वापसी को यादगार बना दिया।

टेस्ट और वनडे में शानदार रिकॉर्ड

शेन वॉर्न ने जिस समय क्रिकेट खेला तब वनडे सीमित संख्या में होते थे और वेस्टइंडीज के बाद ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट की महाशक्ति बन गया था। उसे हराना असम्भव सा होता था, ऑस्ट्रेलिया की उस महान टीम में शेन वॉर्न मानो रीढ़ की हड्डी थे। उन्होंने कुल 145 टेस्ट मैच खेले। इस दौरान वॉर्न ने 25.41 की औसत से 708 विकेट चटकाए, जो मुथैया मुरलीधरन के बाद टेस्ट क्रिकेट में सर्वाधिक हैं। 
शेन वॉर्न का वनडे करियर भी काफी शानदार रहा। वॉर्न ने 194 वनडे इंटरनेशनल में 293 विकेट चटकाए थे। इस दौरान उनका औसत 25.73 एवं स्ट्राइक रेट 36.3 का रहा था। वह साल 1999 की वनडे विश्व विजेता ऑस्ट्रलियाई क्रिकेट टीम के सदस्य भी रहे थे।

जनवरी 2007 में खेली गई एशेज सीरीज़ ऑस्ट्रेलिया ने इंग्लैंड को 5-0 से हराकर जीती थी, तभी शेन ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अभी अलविदा कह दिया था।  

निजी जीवन में अनुशासित नही रह पाए वॉर्न

साल 2000 में एक ब्रिटिश नर्स ने शेन पर आरोप लगाते हुए कहा था कि वॉर्न द्वारा उन्हे अश्लील मैसेज भेजे गए है।  इस आरोप के बाद उनसे उप-कप्तानी भी छीन ली गई थी।
वॉर्न की आशिकमिजाजी की वजह से ही उनका तलाक हो गया, जिसके बाद वह ब्रिटिश अभिनेत्री लिज हर्ले के साथ सम्बन्ध में रहे पर बाद में उनसे भी अलग हो गए।

साल 2019 में उन पर एक साल के लिए ड्राइविंग प्रतिबंध भी लगा था। द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार, वॉर्न पर यह प्रतिबंध दो साल के दौरान छठी बार गति का उल्लंघन करने के बाद लगाया गया था।

पिछले साल वॉर्न के दोस्त ट्रिपल एम सिडनी रेडियो के होस्ट लॉरेंस मूने ने उनको लेकर कुछ नए खुलासे किए थे। डेलीमेल से बात करते मूने ने कहा कि वॉर्न 'लेडीज मैन' हैं। उनको बेड पर अकेले जाना बिल्कुल पसंद नहीं है। मूने ने बताया कि 51 साल की उम्र में भी वॉर्न डेटिंग एप टिंडर यूज करते हैं। उसकी लाइफ टिंडर, शराब, डार्ट, गैंबलिंग और क्रिकेट ही है। इन पांच चीजों के अलावा उसकी जिंदगी में कुछ नहीं है।

आईपीएल और बिग बैश

शेन वॉर्न नए जमाने के क्रिकेट ट्वेंटी-ट्वेंटी में भी काफ़ी साल क्लब क्रिकेट खेलते रहे। आईपीएल के पहले सीज़न में उन्होंने अपनी टीम राजस्थान रॉयल्स को खिताब दिलवाया।
ऑस्ट्रेलिया में खेले जाने वाली बिग बैश लीग में वह मेलबर्न स्टार्स की तरफ़ से खेलते थे और वहां भी उनका नाता विवादों से नही छूटा। मेलबर्न रेनेगेड्स के लिए खेलने वाले वेस्टइंडीज के क्रिकेटर मार्लोन सैमुअल्स से 6 जनवरी 2013 में मैच के दौरान वॉर्न ने अपशब्द कहे, बाद में इस वज़ह से उन्हें एक मैच का प्रतिबंध लगा।
साल 2013 में ही वॉर्न ने घोषणा करी कि वह अब बिग बैश लीग में भी नही खेलेंगे। इस तरह प्रतियोगी क्रिकेट में उनका सफ़र ख़त्म हुआ था।

साल 2014 में लॉर्ड्स के ऐतिहासिक मैदान में उन्होंने एक प्रदर्शनी मैच भी खेला था पर ब्रेट ली की गेंद हाथ पर लगने के कारण वह गेंदबाजी करने नही उतरे थे। इस मैच में सचिन, सहवाग और युवराज जैसे खिलाड़ी भी शामिल थे।

कमेंटेटर के रूप में कैसे रहे थे वॉर्न

कमेंट्री को पेशे के रूप में चुनने के बाद शेन वॉर्न कमेंट्री बॉक्स में भी चर्चा में रहते थे।

दिसम्बर 2020 में शेन ने कमेंट्री के दौरान पुजारा का विवादित निकनेम लिया, जिसके बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने उनको जमकर ट्रोल किया था।
साल 2021 के दौरान बिग बैश लीग में हुए एडिलेड स्ट्राइकर्स और मेलबर्न रेनेगेड्स के बीच मैच की शुरुआत से पहले वॉर्न और एंड्र्यू सायमंड्स लाबुशेन की बल्लेबाजी को लेकर चर्चा कर रहे थे, जिसमें उन्होंने लाबुशेन को अपशब्द भी कहे थे।

अपने देश में स्पिनरों के गिरते स्तर से दुखी थे वॉर्न

शेन वॉर्न के साथ क्रिकेट खेले रिकी पोंटिंग, ग्लेन मैकग्रा, मैथ्यू हैडन, जस्टिस लेंगर, एडम गिलक्रिस्ट, डैमियन मार्टिन, ब्रैट ली, एंड्र्यू साइमंड्स ने जब से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से सन्यास लिया तब से ऑस्ट्रलियाई टीम ने विश्व क्रिकेट में अपना दबदबा भी खो दिया।
उनके बाद नाथन लियोन ही एक अच्छे ऑस्ट्रेलियाई स्पिनर के तौर पर कुछ नाम कमा सके।

शेन वॉर्न अपने देश में स्पिन गेंदबाज़ों के गिरते स्तर से अनजान नही थे, उन्होंने ‘द वेस्ट ऑस्ट्रेलियन’ को दिए एक साक्षात्कार में कहा था ‘स्पिनर को हर मैच खेलना चाहिये, चाहे हालात कैसे भी हो। ताकि स्पिनर समझ सके कि पहले या चौथे दिन कैसी गेंद डालनी है। इस समय हालात अनुकूल होने पर ही प्रांतीय टीमें उन्हें चुनती हैं।
अगर वे प्रांतीय स्तर पर नहीं खेलेंगे तो सीखेंगे कैसे। प्रदेश की टीमों को हर मैच में एक विशेषज्ञ स्पिनर रखना चाहिए। क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया को इसमें प्रयास करने होंगे। नाथन लियोन की जगह लेने के लिए प्रतिभाशाली स्पिनर की कमी है।'

कैसे याद किए जाएंगे वॉर्न

मैदान के बाहर वो जैसे भी थे पर मैदान के अंदर उन्होंने जो कुछ किया था, उसकी वज़ह से हर कोई उनसे प्यार करता था। जिस तेज़ी के साथ आजकल क्रिकेट खेला जा रहा है और खिलाड़ियों को मशीन समझा जाने लगा है, उसे देख यह नही लगता कि आने वाले समय में कोई भी क्रिकेटर 1000 विकेट लेने का कारनामा फ़िर से दोहरा भी पाएगा। 

शेन वॉर्न ने कुछ दिन पहले साझा की अपनी इंस्टाग्राम पोस्ट में लिखा था कि जुलाई तक वह फिर से फिट होना चाहते हैं।
उनसे क्रिकेट जगत को भी अभी काफ़ी कुछ सीखना था पर वो इस दुनिया से चले गए।
चैंपियन जाता कहां है वो तो अमर रहता है, वॉर्न इस दुनिया से जाने के बाद भी दूसरी दुनिया से उभरते क्रिकेटरों को प्रेरित करते रहेंगे। 'शेन बॉलिंग' से न जाने कितने खिलाड़ी भविष्य में भी अपनी कलाई घुमाएंगे और ज़ोर से घुमाएंगे।

हिमांशु जोशी @himanshu28may

ये 'लव हॉस्टल' लव नही बांटती.

फिल्म के निर्देशक शंकर रमन को लगभग दो दशक तक बॉलीवुड में काम करने का अनुभव है, उन्होंने फ्रोज़न, हरूद ,पिपली लाइव, रॉकी हैंडसम में छायांकन तो गुड़गांव में निर्देशक का काम किया है। सान्या मल्होत्रा के चेहरे पर खून के छींटे दिखा शंकर ने दर्शकों को फिल्म के डर से जोड़े रखा है ,वहीं वह थार में घूमते बढ़ती उम्र वाले बॉबी देओल से उनका बेस्ट भी निकलवाने में कामयाब हुए हैं।
वेब सीरीज़ आश्रम के बाद लगता है कि बॉबी का एक अभिनेता के तौर पर पुनर्जन्म हुआ है।

फिल्म की शुरुआत एक नए तरीके से हुई है। स्क्रिप्ट सही तरह से लिखे होने के साथ-साथ संपादन भी ठीक है।

लैंगिक भेदभाव, लव जिहाद, खाप पंचायत, समलैंगिकता जैसे मुद्दे को हल्का सा छू लिया गया है। कहानी में इनमें से किसी एक पर ही फोकस रखा जाता तो अच्छा होता। फ़िल्म में संवेदनशील मुद्दों पर पुलिस के गैरजिम्मेदाराना व्यवहार पर भी बात करने की कोशिश की गई है।

टेलिविज़न से पक कर आए विक्रांत मैसी बॉलीवुड के लिए लंबी रेस के घोड़े हैं और सारी भाव-भंगिमाओं को बेहतरीन तरीके से निभाते हैं।
फ़िल्म मीनाक्षी सुंदरेश्वर से फ़िल्म जगत में ज़ोरदार एंट्री मार चुकी सान्या मल्होत्रा अभिनय के दुसरे पायदान पर सफलतापूर्वक चढ़ी नज़र आती है।
नेत्री के किरदार में स्वरूपा घोष अपने मेकअप मात्र से ही खतरनाक लगी हैं। अपने भाई की मौत का भार कंधे में ढोते पुलिस अफ़सर बने राज अर्जुन ने भी अपने अभिनय की छाप छोड़ने में कामयाबी पाई है।

छायांकन की बात करी जाए तो कैमरा को चेहरे पर नज़दीक से फोकस कर भावों को बेहतरीन तरीके से प्रदर्शित किया गया है। छायांकन बहुत ही नैसर्गिक लगा है, अंत में बर्फबारी वाला दृश्य शानदार है।

'अब पा लिया तुझे बाक़ी सब बेमानी है' संवाद ठीक है और इसके अलावा 'मारे यहां कुंवारियों से पैर न छुआते' जैसे संवादों के साथ फ़िल्म के ज्यादातर संवाद हरियाणवीं में हैं।

इस फ़िल्म के साथ ओटीटी पर आने वाले अन्य कंटेंट में गालियों की भरमार है, घर पर यह नियंत्रित करना कि बच्चे इन सब से दूर रहें अब मुश्किल हो चला है। इन सब पर लगाम कसने के लिए केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड बेअसर साबित होता नज़र आ रहा है। इसके लिए नए तरीके खोजने होंगे जैसे कि ओटीटी एप के लिए अनिवार्य लॉक।

क्लिंटन सेरेज़ो का गाया 'बस में नही' सुनने में अच्छा लगता है और मोहित चौहान के 'डूबा डूबा रहता हूं' की याद दिलाता है।

बैकग्राउंड स्कोर और फ़िल्म स्कोर लव हॉस्टल की जान हैं। बैकग्राउंड स्कोर की बात करें तो झींगुर, चिड़ियों, पंखे, गन की आवाज़ खौफ़ सा बनाए रखती हैं। थूकने तक की आवाज़ से भी दिल झटक जाता है।
अहम दृश्यों में फ़िल्म स्कोर दर्शकों की धड़कनें बढ़ाने में कामयाब रहा है।

एक कोर्ट मैरिज और फिर उसके बाद हिंसक दृश्यों से भरपूर फिल्म को उसके बैकग्राउंड स्कोर और फिल्म स्कोर की वजह से वयस्कों द्वारा एक बार तो देखा ही जा सकता है।

फ़िल्म- लव हॉस्टल
निर्देशक- शंकर रमन
निर्माता- रेड चिलीज़ एंटरटेनमेंट, दृश्यम फिल्म्स
कलाकार- विक्रांत मैसी, सान्या मल्होत्रा, बॉबी देओल, राज अर्जुन
ओटीटी- ज़ी5
स्कोर- क्लिंटन सेरेजो
छायांकन- विवेक शाही
समीक्षक- हिमांशु जोशी

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...