अशोक कुमार पांडे
रॉयल्टी को लेकर कई मित्रों की पोस्ट्स पढ़ीं। विनोद जी ने रायपुर में यह सब मुझे भी बताया था। मिलने पर सबसे पहले यही पूछा कि करते क्या हैं? और जब बताया तो यही कहा कि बिना नौकरी के लिखने के भरोसे ज़िंदगी कैसे चलेगी?
हिंदी के प्रकाशन जगत में दोनों तरफ़ से प्रोफ़ेशनलिज़्म का जो अभाव है उससे मेरा अपरिचय नहीं है। किताबों की बिक्री पर प्रकाशक का एकाधिकार होता है और लेखक को उसके दिए आँकड़ों पर भरोसा करना होता है।
निजी अनुभव…ठीकठाक हैं मेरे। इतिहास की किताबों की ठीक-ठाक रॉयल्टी मिलती रही है। लेकिन आसपास मित्रों परिचितों को देखा है। कविता-कहानी-उपन्यासों की रॉयल्टी या तो आती नहीं है या इतनी कम आती है कि एक बढ़िया पार्टी करना भी मुश्किल होता है।
शायद हिंदी का पूरा माहौल ऐसा बना दिया गया है कि पैसे माँगना, पैसों की उम्मीद करना यह सब बुरा माना जाता है। रॉयल्टी सीधे किताब के मूल्य से जुड़ी होती है और लेखक से लेकर पाठक तक सबकी माँग होती है कि किताब की क़ीमत कम से कम हो। अक्सर प्रकाशक लेखक सम्बंध लगातार निजी होते जाते हैं, किताबें अहसान की तरह छपती हैं और फिर किसी हिसाब-किताब की जगह पत्रम पुष्पम चलता है।
बहुत लम्बी बात की जगह बस इतना कि प्रकाशन के पूरे व्यवसाय को प्रोफेशनल होना पड़ेगा। दो हज़ार हो या दो लाख, हिसाब-किताब होना चाहिए…
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रॉयल्टी कथा पर आगे
नौकरी के साथी किताब आने पर बधाई देते थे (अक्सर उन्हें नवभारत वग़ैरह से सूचना मिलती थी) लेकिन इतने सालों में सिर्फ़ एक मौक़ा आया जब एक साथी ने किताब ख़रीदी और हस्ताक्षर करवाया। बाक़ी ढेरों लोग ‘एक कॉपी हमको भी दीजिएगा’ वाले रहे। अड़ोस-पड़ोस से भी ऐसी ही माँग आती रही, यहाँ तक कि रिश्तेदारों से भी।
एक पूर्व कलीग ने retire होने के बाद किताब छपवाई और भव्य विमोचन किया। मेरे ख़याल से लाख रुपए तो खर्च किए होंगे। सभी आने वालों को रिटर्न गिफ़्ट में किताब मिली।
जिन लोगों के यहाँ आना-जाना होता है, अक्सर किताबों की कोई अलमारी नहीं दिखती। मकान ख़रीदने जाओ तो बच्चों के कमरे के अलावा कहीं किताबों या स्टडी के लिए अलग इंतज़ाम नहीं दिखता। किराए के घरों में हम जैसों को एक स्टडी का इंतज़ाम बेहद मुश्किल हुआ करता है।
दो-ढाई सौ की किताबें हमारे समाज को बेकार का ख़र्च लगती हैं और लेखक/कवि बनना अक्सर थोड़ा महत्त्वपूर्ण बनने का उपक्रम ही होता है।
यक़ीन जानिए एक प्रकाशक के तौर पर किताबों के मुफ़्त माँगे जाने और बिक्री के अजीब-अजीब अनुभव ऐसे हैं कि मन खट्टा होता है।
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कुल मिलाकर हिंदी समाज की अभी की संरचना, लेखक और पाठक दोनों तरफ़ से ऐसी है कि रॉयल्टी का मुद्दा बासी कढ़ी में उबाल से ज़्यादा कुछ नहीं बनने वाला।
#Publication_debates
अशोक पांडे
फ़ेसबुक पर मानव कौल की अपनी किताब के रायल्टी के सम्बन्ध में लिखी एक पोस्ट के सिलसिले में प्रतिभा कटियार की एक पोस्ट के जवाब में।
यह सब सुनकर ख़राब ही लगता है खासकर तब जब आप खुद भी एक प्रकाशक हों । कुछ सलाहें हैं साथी लेखकों के लिए जिन्हे सूत्र रूप में लिख रहा हूँ। और कुछ बातें प्रकाशक की तरफ से भी।
१. किताब की पाण्डुलिपि पर आप वर्षों लगाते हैं तो थोड़ा समय अपने अनुबंध पर भी लगाएं।
२. यानी कि बिना अनुबंध के अपनी पाण्डुलिपि किसी को न सौपें।
३. अनुबंध की बकायदा किसी प्रोफेशनल वकील से जांच कराएं।
४. कई तरह के घपले होते रहते हैं। एक नया घपला है अनुबंध में किताब की रायल्टी को मुद्रित मूल्य की बजाय किसी और केटेगरी के तहत रखना जिसमें लेखक की रायल्टी काफी काट -कूट कर हाथ में आती है।
५. किताब के संस्करण को तय करना यानी पेपरबैक और हार्डबाउंड में से क्या सिर्फ हार्डबाउंड प्रकाशित होगा या दोनों। किताब के अच्छे प्रसार के लिए पेपरबैक होना अनिवार्य है।
६. अनुबंध में हर तरह के अधिकार प्रकाशक को न दें।
७. रायल्टी की दर।
इस सूची में और भी कई बिंदु शामिल किये जा सकते हैं लेकिन ये सबसे अहम बिंदु हैं।
अब कुछ सलाहें लेखकों के लिए भी :
१. आपने एक अच्छा खासा समय अपनी पाण्डुलिपि में लगाया है कुछ समय प्रकाशक को भी उसपर काम करने के लिए दें।
२. आपकी रचना महान होने के बावजूद सम्पादन की मांग करती है। प्रकाशक को इसके लिए समय दें और अपने सम्पादक की सलाह पर भरोसा करें।
३. किताब की न्यूनतम लेखकीय प्रतियों की अपेक्षा रखें।
४. अपनी पाण्डुलिपि में अनंत समय तक जुड़ाव -घटाव न करें।
५. अपने कंटेंट के स्रोत का विवरण ईमानदारी से दें और उसे किताब का जरूरी हिस्सा बनाएं।
६ . प्रकाशक की विज्ञापन योजना में पूरा सहयोग दें।
७ . प्रकाशक को शुरू से ही बेईमान न समझें। कई बार अच्छी किताबें भी धीरे -धीरे अपनी जगहें बनाती हैं और कई बार औसत किताब भी बहुत तेजी से चलन में आ जाती है। बहुत से नए प्रकाशक जगह या संसाधनों की कमी की वजह से छोटे संस्करण ही प्रकाशित कर सकते हैं , मात्र इससे उनकी ईमानदारी पर शक न करें। हो सकता है वे साल में कई संस्करण कर डालें।
इस सूची में भी कई और बिंदु शामिल किये जा सकते हैं जिन्हे हर प्रकाशक अपने अनुभव के हिसाब से जोड़ या घटा सकता है।
अब एक डिसक्लेमर भी :
ये बिंदु मेरे बतौर प्रकाशक छह वर्षों के अनुभव का निचोड़ है। इससे आप सहमत /असहमत या तटस्थ भी हो सकते हैं। मेरे विचार से हर प्रकाशक बेईमान नहीं है और न ही हर लेखक महान।
संजय जोशी
नवारुण, ग़ाज़ियाबाद
( मानदेय )
कल दो प्रिय रचनाकारों ने विनोद कुमार शुक्ल की चौदह हजारी रॉयल्टी के मार्फ़त लेखकीय मुश्किलों पर लिखा था। प्रियंका दुबे और अणुशक्ति सिंह। अधिकतम लेखकों को मानदेय पर चर्चा हीनतर लगती है। वजह और कोई नहीं बस इतनी कि इससे प्रकाशकों से सम्बंध खराब होने के खतरे होते हैं।
इससे पहले कि वि कु शु का खंडन या स्पष्टीकरण आये, आपको मैं रॉयल्टी बनने की प्रक्रिया समझाता हूँ।
मैं बीज व्यवसाय से जुड़ा हूँ। बीज बनाने वाली कुछ कम्पनियाँ खुद अनुसंधान कराती हैं तथा उनका विपणन करती हैं और कुछ कम्पनियाँ दूसरे सरकारी या अर्ध-सरकारी संस्थान द्वारा संशोधित बीज के 'अधिकार' लेकर बेचती हैं।
सरकारी वैज्ञानिक संस्थान और कम्पनी के बीच 'करार' भी होता है। करार में रॉयल्टी का प्रतिशत तय होता है। वे वैज्ञानिक और उनके संस्थान लेखकों की तरह खुश हो जाते हैं।
लेकिन, रुको जराs, सबर करोss।
रॉयल्टी के एवज में कम्पनी उस संस्थान से 'पैरेंट सीड' लेती है। यह 'पैरेंट सीड' लेना बहुत कुछ पाण्डुलिपि लेने की तरह होता है। करार होता है कि कम्पनी जितना बीज उत्पादित करेगी, उसका हिसाब संस्थान को देगी और फिर रॉयल्टी देगी।
कम्पनी उस बीज के दो सौ टन यानी दो लाख किलो एक मौसम में उत्पादित करती है। दूसरे मौसम में उसे बेच देती है। साल निकल जाता है। अनुसंधान संस्थान मेल और फोन करते करते थक जाते हैं। और फिर कम्पनी एक दिन हिसाब देती है कि उसने कुल नौ हजार छः सौ चौहत्तर किलो बीज उत्पादित किया और बेचा। और साथ में दस रुपये किलो, मान लीजिये, के हिसाब से छियानबे हजार सात सौ चालीस रुपये का चेक चला जाता है।
खेल खत्म। जहाँ पर दो सौ टन की रॉयल्टी बीस लाख बनती वहाँ एक लाख से भी कम का हिसाब हुआ। उन्नीस लाख जो वाजिब थे वह संस्थान को नहीं मिले।
अगर रॉयल्टी बीस रुपये किलो की हुई तब फासले का अनुमान कर लीजिये।
फिर,
संस्थान उस वैज्ञानिक की सर्विस रिपोर्ट खराब करता है क्योंकि उसने अच्छा बीज बनाया होता तब अधिक बीज बिकते। जैसे सारे लेखन को खराब कहा जाता है ठीक वैसे ही। पैसे कम मिलने से वह संस्थान या प्रोजेक्ट बन्द हो जाता है। रिसर्च वाले खेतों में काम करने वाले जूनियर प्रशिक्षु और न जाने कितने मजदूर बेरोजगार हो जाते हैं।
उधर कम्पनी उस नौ हजार छः सौ चौहत्तर किलो बीज उत्पादन का विश्वसनीय आंकड़ा सामने रखती है जिसमें किसानों का नाम पता सब होता है जहाँ यह बीज उगाया गया होगा।
और वह वैज्ञानिक?
लेखक की तरह अगले अनुसंधान पर लग जाता है। जब नया बीज तैयार कर लेता है तब बहुत खुश होता है।
फिर वही चक्र। कम्पनी का दरवाजा खटखटाता है।
खट खट।
कम्पनी: कौन?
वैज्ञानिक: मैं।
कम्पनी: फिर मैं कौन?
वैज्ञानिक: वही जो रॉयल्टी देना पसंद नहीं करता।
कम्पनी: अरे वाह, नई पाण्डुलिपि सॉरी नये अनुसंधान का स्वागत है।
नया 'करारनामा' लिखा जाता है।
चंदन पांडे
कवि, कथाकार और उपन्यासकार यानी हर विधा में समान रूप से सक्षम हिंदी के एक सुपर स्टार (सही अर्थों में) लेखक ने मुझे कुछ साल पहले आपबीती सुनाई थी। रॉयल्टी हड़पे जाने को लेकर वयोवृद्ध साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल की पीड़ा जब सामने आई तो मुझे उस लेखक की कहानी याद आ गई। आप भी सुनिये..
" मैं लिखता गया, प्रकाशक छापता गया। अनुबंध वगैरह का कोई चक्कर उन दिनों होता नहीं था। मेरी किताबें खूब बिकती थीं। मुझे साहित्य अकादमी का पुरस्कार भी मिल गया। ना मैंने कभी रॉयल्टी के बारे में पूछा और ना प्रकाशक ने बताया।"
" संयोग से मुझे दिल्ली में टू बीएचके का एक सेमी फर्निश फ्लैट अलॉट हुआ। जिसके बाथरूम और किचेन में दरवाज़े तक नहीं थे। मुझे रॉयल्टी का ख्याल आया और मैंने प्रकाशक को फोन मिलाया। प्रकाशक ने विनम्रता से कहा कि तत्काल चेक भिजवाता हूँ।"
" जल्द ही प्रकाशक ने चेक भिजवा दिया, जिसे देखकर मैं सन्न रह गया। हर लाइब्रेरी, साहित्य बेचने वाले हर स्टॉल पर नज़र आने वाली मेरी तमाम किताबों की कुल जमा रॉयल्टी सिर्फ ग्यारह हज़ार रुपये! वह मेरे जीवन भर के फुल टाइम राइटिंग की कमाई थी।"
"मैंने गुस्से में प्रकाशक को फोन किया और कहा कि रॉयल्टी के पैसे से मैं शौचालय का दरवाज़ा लगवाउंगा और उसपर आपके प्रकाशन संस्थान का नाम लिखवाउंगा।"
" दो दिन बाद प्रकाशक मेरे पास आया और कहने लगा कि भाई साहब आप तो बहुत ज्यादा नाराज़ हो गये। इसके बाद उसने पचास हज़ार रूपये का एक और चेक दिया। इसके कुछ समय बाद प्रकाशक का भाई मेरे पास आया जो खुद भी एक पब्लिशिंग हाउस चलाता है। उसने कहा कि आपके साथ बहुत गलत हुआ, आप अपनी तमाम किताबों के राइट मुझे दे दीजिये।"
" मैंने प्रकाशन के अधिकार बड़े भाई से लेकर छोटे भाई को दिये। बड़े भाई ने कहा कि आप पछताएंगे। उसकी बात ठीक निकली। छोटा भाई ने किताबों की रॉयल्टी के रूप में थोड़े-बहुत पैसे नियमित रूप से देने तो लगा लेकिन ऐसा लगा जैसे वो मुझे बंदर बनाना चाहता है। वह किसी भी चिरकुटपने वाले पीआर प्रोग्राम में मुझे साधिकार बुला लेता था, जहां मंच पर तीन ऐसे लोग बैठे होते थे, जिनका साहित्य से कुछ लेना-देना नहीं होता था।"
" अगर विदेशी भाषाओं में मेरी रचनाओं का अनुवाद नहीं हुआ होता और मैं अंग्रेजी में ना लिख रहा होता तो `हिंदी के सबसे बड़े प्रकाशक' गले में झोला टांगकर भिक्षाटन को मेरी नियति बना देते।"
(निजी बातचीत को नाम के साथ सार्वजनिक करना उचित नहीं है, इसलिए लेखक का नाम नहीं लिख रहा हूँ। लेकिन मुझे यकीन है कि अगर ये कहानी मुझे सुनाई गई है तो हिंदी के समाज में उठने-बैठने वाले बहुत से और लोगों को भी पता होगी। वैसे भी बात महत्वपूर्ण है, व्यक्ति नहीं।)
राकेश कायस्थ
मेरी अभी विनोद कुमार शुक्ल जी के घर लम्बी बात हुई. उन्होंने रॉयल्टी स्टेटमेंट और प्रकाशक के साथ हुए पत्र मुझे भेजे हैं. उनकी इच्छानुसार कुछ तथ्य सार्वजनिक रहा हूँ.
वाणी से उनकी तीन किताबें प्रकाशित हैं --- दीवार में एक खिड़की रहती थी, अतिरिक्त नहीं, कविता चयन. दो किताबों के ईबुक संस्करण भी हैं. मई १९९६ से लेकर अगस्त २०२१, यानी पच्चीस वर्षों में उन्हें वाणी से कुल १ लाख पैंतीस हजार, अर्थात सालाना करीब पाँच हजार मिले. इसमें से एक किताब को साहित्य अकादमी सम्मान मिला है, बेहिसाब हिंदी लेखकों-पाठकों के घर यह किताब मिल जायेगी.
राजकमल से उनकी छह किताबें हैं --- हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़, नौकर की कमीज, सब कुछ होना बचा रहेगा, कविता से लम्बी कविता, प्रतिनिधि कवितायेँ, कभी के बाद अभी. (सातवीं हाल ही प्रकाशित हुई है.)
इनके अलावा ईबुक संस्करण भी हैं.
उनके अनुसार राजकमल ने उन्हें अप्रैल २०१६ से मार्च २०२० तक, चार वर्षों में इतनी सारी किताबों के करीब ६७००० दिए हैं, यानी प्रतिवर्ष सत्रह हजार. पिछले कई वर्षों से रॉयल्टी स्टेटमेंट में कविता संग्रह ‘कभी के बाद अभी’ का जिक्र नहीं है.
(मुझे लगता था कि 'नौकर की कमीज' बहुत अधिक बिकी होगी, हर जगह दिखाई दे जाती है.)
लेकिन सबसे त्रासद यह कि वे छह वर्षों से प्रकाशक को लगातार लिख रहे हैं कि 'मेरी किताब न छापें', 'मेरी अनुमति के बगैर नया संस्करण न छापें क्योंकि प्रूफ की कई गलतियाँ हैं', 'मेरा अनुबंध समाप्त कर दें' --- लेकिन कोई सुनवाई नहीं.
इन अति-सम्मानित बुजुर्ग लेखक की पीड़ा को समझने के लिए सितम्बर २०१९ के इस खत को पढ़ें: “मैंने आपको स्पीड-पोस्ट तथा ईमेल भेजा था कि बिना मेरी अनुमति के नया संस्करण नहीं निकालें. इस संबंध में मैंने जब तब फोन से भी अनुरोध किया था, लेकिन आपने फिर नया संस्करण निकाल दिया. इसके पूर्व भी जितने संस्करण निकले हैं, उसकी पूर्व-सूचना मुझे कभी नहीं दी गयी. मैं इससे दुखी हूँ.”
उनका यह भी कहना है कि प्रकाशकों के साथ ईबुक का अनुबंध नहीं हुआ है, लेकिन फिर भी प्रकाशकों ने ईबुक छाप दी.
आशुतोष भारद्वाज
मेरी अभी विनोद कुमार शुक्ल जी के घर लम्बी बात हुई. उन्होंने रॉयल्टी स्टेटमेंट और प्रकाशक के साथ हुए पत्र मुझे भेजे हैं. उनकी इच्छानुसार कुछ तथ्य सार्वजनिक रहा हूँ.
वाणी से उनकी तीन किताबें प्रकाशित हैं --- दीवार में एक खिड़की रहती थी, अतिरिक्त नहीं, कविता चयन. दो किताबों के ईबुक संस्करण भी हैं. मई १९९६ से लेकर अगस्त २०२१, यानी पच्चीस वर्षों में उन्हें वाणी से कुल १ लाख पैंतीस हजार, अर्थात सालाना करीब पाँच हजार मिले. इसमें से एक किताब को साहित्य अकादमी सम्मान मिला है, बेहिसाब हिंदी लेखकों-पाठकों के घर यह किताब मिल जायेगी.
राजकमल से उनकी छह किताबें हैं --- हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़, नौकर की कमीज, सब कुछ होना बचा रहेगा, कविता से लम्बी कविता, प्रतिनिधि कवितायेँ, कभी के बाद अभी. (सातवीं हाल ही प्रकाशित हुई है.)
इनके अलावा ईबुक संस्करण भी हैं.
उनके अनुसार राजकमल ने उन्हें अप्रैल २०१६ से मार्च २०२० तक, चार वर्षों में इतनी सारी किताबों के करीब ६७००० दिए हैं, यानी प्रतिवर्ष सत्रह हजार. पिछले कई वर्षों से रॉयल्टी स्टेटमेंट में कविता संग्रह ‘कभी के बाद अभी’ का जिक्र नहीं है.
(मुझे लगता था कि 'नौकर की कमीज' बहुत अधिक बिकी होगी, हर जगह दिखाई दे जाती है.)
लेकिन सबसे त्रासद यह कि वे छह वर्षों से प्रकाशक को लगातार लिख रहे हैं कि 'मेरी किताब न छापें', 'मेरी अनुमति के बगैर नया संस्करण न छापें क्योंकि प्रूफ की कई गलतियाँ हैं', 'मेरा अनुबंध समाप्त कर दें' --- लेकिन कोई सुनवाई नहीं.
इन अति-सम्मानित बुजुर्ग लेखक की पीड़ा को समझने के लिए सितम्बर २०१९ के इस खत को पढ़ें: “मैंने आपको स्पीड-पोस्ट तथा ईमेल भेजा था कि बिना मेरी अनुमति के नया संस्करण नहीं निकालें. इस संबंध में मैंने जब तब फोन से भी अनुरोध किया था, लेकिन आपने फिर नया संस्करण निकाल दिया. इसके पूर्व भी जितने संस्करण निकले हैं, उसकी पूर्व-सूचना मुझे कभी नहीं दी गयी. मैं इससे दुखी हूँ.”
उनका यह भी कहना है कि प्रकाशकों के साथ ईबुक का अनुबंध नहीं हुआ है, लेकिन फिर भी प्रकाशकों ने ईबुक छाप दी.
सत्य व्यास
किताबें, रॉयल्टी, प्रकाशक, पाठक और अमेज़न
विनोद कुमार शुक्ल सर की कुल 15 किताबें मुझे अमेज़न पर दिखीं। मुझे पहले तो यही आश्चर्य हुआ कि उनकी इतनी किताबें हैं और मुझे केवल तीन-चार का ही नाम पता है। उस पर भी एक किताब किसी मित्र को देने के बाद केवल दो ही किताबें मेरे पास बची हैं।
दो तीन दिन पहले मानव कौल सर का एक पोस्ट देखा तब से रॉयल्टी आदि की बहस और चर्चायें फेसबुक, इंस्टाग्राम आदि पर देख रहा हूँ। मानव कौल सर की उस पोस्ट में जो रॉयल्टी से पहले की बात मुझे खटकी वह थी पत्राचार का जवाब न देना। विनोद कुमार शुक्ल के पत्र का जवाब न देना कितना अचंभित करता है। है न! जिस लेखक को हिन्दी का साहित्यिक तबका सर माथे पर रखता हो उसको जवाब न देना बहुत आहत करने वाला लगा।
अब रॉयल्टी वाले विषय पर आते हैं। जिसमें हम जैसे आम पाठकों का सीधा हस्तक्षेप होता है। मुझे लगता है कि जिस युग में हम रह रहे हैं उसमें बहुत हद तक किताबें ऑनलाइन ज़्यादा बिकने लगी हैं। बहुत कम लोग ऐसे हैं जो किताबें सीधा बुक स्टोर्स से लेना पसंद करते हैं। मुझे ये तो नहीं पता कि प्रकाशक आंकड़े छिपाते हैं या नहीं, या अगर छिपाते हैं तो कितना। लेकिन मैंने कल विनोद कुमार शुक्ल सर की किताबों की अमेज़न रैंकिंग देखी। और इस अमेज़न रैंकिंग में किसी का भी हस्तक्षेप नहीं होता। किताब बिकती है तो उसमें अपने आप उसकी रैंक बेहतर होती है।
उनकी 15 किताबों की रैंकिंग कल अमेज़न पर क्रमशः यूँ थी
१) दीवार में एक खिड़की रहती थी - 11826
२) कभी के बाद अभी - 127202
३) नौकर की कमीज - 153248
४) खिलेगा तो देखेंगे - 53200
५) हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़ - 10025
६) प्रतिनिधि कविताएँ - 17333
७) अतिरिक्त नहीं - 7403
८) कवि ने कहा - 53375
९) यासि रासा त - 19231
१०) महाविद्यालय - 6588
११) सबकुछ होना बचा रहेगा - 17423
१२) एक चुप्पी जगह - 54865
१३) कविता से लंबी कविता - 136319
१४) एक कहानी - 277400
१५) पचास कविताएँ - 157436
दो दिन पहले दीवार में एक खिड़की रहती थी की रैंक 14000 के ऊपर थी। उससे पहले शायद और ज़्यादा रही हो। रोज़ की 8-10 किताबें अगर अमेज़न पर बिकती रहें तो किताबों की कैटेगरी में आपकी रैंक 3-4 हज़ार के आसपास होती है। अब आप ऊपर जो रैंक लिखी हुई हैं इनसे अंदाज़ा लगाइये कि विनोद सर की कितनी किताबें बिक रही होंगी आजकल। उसके अलावा आप अपनी बुक सेल्फ खोलकर देखिए उसमें विनोद जी की कितनी किताबें हैं। एक सवाल और ये कि क्या आपको ऊपर जितनी किताबें लिखीं हैं सबके बारे में पता था। अगर नहीं तो क्यों? ये सब चीज़ें मिलकर ही एक लेखक को उसका हक दिलवा सकती हैं। वरना बड़े लेखक, बहुत बड़े तो बन जाते हैं लेकिन उनतक ऐसा कुछ नहीं पहुँचता कि केवल लेखन से ही उनका गुजर बसर हो सके। इसलिए हमें प्रकाशकों के छल के अलावा ख़ुद से भी ये सवाल करना ही होगा कि हम किताबें क्यों नहीं ख़रीदते हैं। क्यों आज भी किताबें हमारी प्राथमिकता का हिस्सा नहीं हैं। अगर हमने आज नहीं सोचा तो कल को मानव कौल सर की जगह कोई और किसी और लेखक के बारे में ऐसी पोस्ट लिख रहा होगा और हम लेखक के लिए दुखी हो रहे होंगे।
अंकुश कुमार
रॉयल्टी-
एक लेखक बंधु थे, उनकी किताब कानपुर के कोई अनाम प्रकाशक छाप देते हैं। प्रकाशक ने बताया कि 500 प्रतियाँ प्रकाशित की हैं। लेखक पहली किताब के उत्साह में हर जगह किताबें बाँटते नज़र आते हैं।
लेखक फिर से मेहनत करते हैं और भोपाल के एक गुमनाम प्रकाशक छाप देते हैं। प्रकाशक बताते हैं कि उनकी किताब के तीन संस्करण छप चुके हैं और किताब भी अन्य भाषा मे अनूदित हो चुकी है। फिर भी लेखक को कहीं किसी लिटरेचर फेस्ट से बुलावा नहीं मिलता और किसी बुकस्टाल पर उनकी किताब नहीं दिखती।
लेकिन लेखक निराश नहीं होते, बड़ी शिद्दत से एक किताब लिखते हैं जिसे एक ट्रस्ट छापकर 51000 प्रतियाँ अपने ट्रस्ट से जुड़े लोगों में बाँट देते हैं। फिर भी उनके बगल वाला उन्हें नहीं जानता।
लेखक अब भी निराश नहीं होते और अंतिम प्रयास करते हैं। इस बार उन्हें सफलता मिलती है और दिल्ली के एक बड़े प्रकाशक किताब प्रकाशित करने को राजी हो जाते हैं। किताब प्रकाशित होते ही चर्चा में आ जाती है। मोहल्ले वाले सब उनका सम्मान करने लगते हैं। हर बुक स्टाल पर किताब दिखने लगती है। प्रकाशक बताते हैं कि उन्होंने 1100 प्रतियों का संस्करण प्रकाशित किया है। अब ये 1100 प्रतियाँ अर्जुन के गांडीव धनुष के तीरों की तरह काम करती हैं। देश भर के 2000 बुकस्टाल पर दिखती हैं, लिटरेचर फेस्ट में दिखती हैं, पुस्तक मेला में दिखती हैं लेकिन 1100 प्रतियाँ खत्म होने का नाम नहीं लेती।
भगवंत अनमोल
रॉयल्टी पर आखिरी बात।
मुझे रॉयल्टी जैसी किसी भी संस्था पर कोई विश्वास नहीं है। मुझे आजीवन किताब बिक्री का कोई भरोसा नहीं है। इसलिए रॉयल्टी के परसेंटेज पर मैं कभी झिकझिक नहीं करता। एडवांस रॉयल्टी की मांग करता हूँ। एकबार एकमुश्त एडवांस मिल जाये फिर ज़िन्दगी भर रॉयल्टी से काटते रहो।
हाल फिलहाल कानपुर में प्रॉपर्टी खरीदा है। सोचा इस बड़े यज्ञ में एक आहुति अपने लेखन के राशि की पड़ जाए तो कितना अच्छा हो। प्रकाशक से इस बार पिछली किताब से अधिक एडवांस की मांग की। जब तीन किताबें एक प्रकाशक से प्रकाशित हो चुकी हों तो हर किताब के साथ मांग बढ़ती है। प्रकाशक ने कोरोना का हवाला देकर सिर्फ उतना ही अग्रिम भुगतान देने के लिए हामी भरी जितना पिछली किताब में दिया था। उनकी भी सीमा है और हमारी भी महत्वाकांक्षाएं हैं।
मैंने दूसरे प्रकाशन में संभावना तलाश करने की कोशिश की। थोड़ी बहुत मशक्कत के बाद अंग्रेजी के एक प्रकाशक जो अभी हिंदी किताबें प्रकाशित करना शुरू किए थे, वहां बात बन गयी। मार्च अंत तक पांडुलिपि देने की बात तय हुई। अपना दुर्भाग्य देखो फरवरी में प्रकाशन ही बंद हो गया। मैंने भी किताब साइड में रख दी है। जब कोई प्रकाशक एडवांस देकर किताब लिखने का आदेश देगा तो ही लिखा जाएगा।
असल मे हिंदी प्रकाशक खुद नहीं चाहते कोई लेखक पेशेवर लेखन करे। पेशेवर लेखन उनकी जेब ढीली कर सकता है। हिंदी वरिष्ठ लेखक भी नहीं चाहते कि कोई युवा लेखक पेशेवर लेखन करे। इसके पीछे उनका तर्क वही सास बहू के रवैये जैसा रहता है। सास के साथ जैसा हुआ, बहू के साथ भी वैसा ही होना चाहिए। महान से महान और साधारण से साधारण लेखक ने इस कठिन राह को चुना है। हम अकेले नहीं हैं, न यह अंतिम दौर है। लेकिन हमारी कोशिश हमेशा यही रहेगी कि आने वाली पीढ़ी को एक ऐसा प्लेटफार्म दिया जाए ताकि वह इस राह में कठिनाई न महसूस करें।
भगवंत अनमोल
रॉयल्टी का रोना न जाने कितने सालों से रोया जा रहा। आज हम तकनीक के उस दौर में जहां हमारे फ़ोन बस आस-पास रहकर हमें सुन रहे हैं और उस आधार पर हमें विज्ञापन सुझा रहे हैं। हमारे एक क्लिक पर हज़ारों का आदान-प्रदान पलक झपकते ही हो जा रहा है। लक्ज़री होटल से लेकर सड़क पर टिक्की बेचने वाले तक के पास यूपीआई जैसी सुविधाएँ मौजूद हैं जहां हर एक लेन-देन का हिसाब उँगलियों के स्पर्श भर से सामने होता है।
ऐसे दौर में किताबों की बिक्री का संसार आज भी गूढ़ रहस्य बना हुआ है। यह बात समझ से परे है। दुनिया मेटावर्स की कल्पना को सच होते देखने के क़रीब जा पहुँची है लेकिन उस दुनिया को रचने वाला लेखक आज भी यह कल्पना नहीं कर पा रहा कि उसकी किताबें कितनी ऑनलाइन-ऑफ़लाइन बिकी, कितनी औडियो जैसे दूसरे माध्यमों में बेची गयी, कितना मुनाफ़ा प्रकाशक को हुआ और कितनी रॉयल्टी लेखक की बनी, यह बात पारदर्शिता के साथ उसे पता चल सके। यह रहस्यलोक एक अदना से रहस्योद्घाटन के लिए जाने कितने बरसों से तड़प रहा है।
कोई एक ऐसी केंद्रीय तकनीक (ऐप, वेबसाइट वग़ैरह) क्यों नहीं बनाई जा सकती जिसपर लेखक और प्रकाशक दोनों, किताबों की बिक्री को ट्रेक कर सकें। जिसपर आँकड़े सही-सही दर्ज करना उसी तरह ज़रूरी हो जिस तरह किताबों के प्रकाशन के लिए आईएसबीएन नंबर लेना ज़रूरी होता है। ऑनलाइन और ऑफ़लाइन बिक्री का एक ऐसा सेंट्रलाइज चैनल क्यों नहीं बनाया जा सकता जहां सबकुछ पारदर्शी हो।
विनोद कुमार शुक्ल जैसे लेखक अगर रॉयल्टी को लेकर परेशान हैं तो हिंदी में संभावना देख रहे नए लेखक क्या ख़ाक उम्मीद करें।
2007 में बीबीसी हिंदी पर लिखे अपने लेख में वरिष्ठ साहित्यकार असग़र वजाहत ने कहा था, "समाज में लोगों के बीच होने वाले महत्त्वपूर्ण समझौतों को निर्देशित करने तथा उन्हें सही ढंग से लागू करने की ज़िम्मेदारी सरकार की होती है। सरकार से लेखक यह माँग कर सकते हैं लेखक-प्रकाशक के प्रकाशन, रॉयल्टी संबंधों पर क़ानून बनना चाहिए। इसके अंतर्गत ‘रजिस्ट्रार ऑफ रॉयल्टी’ का विभाग खोला जा सकता है। इसके बारे में नियम-क़ानून बनाए जा सकते हैं। इस विभाग को प्रकाशक और लेखक दोनों मान्यता दे सकते हैं तथा यह संस्था दोनों के हितों को देख सकती है।"
"हमारे देश में लेखकों के अनेक संगठन हैं और लगभग सभी संगठन कॉपी राइट और रॉयल्टी के मुद्दे को प्रमुख मुद्दा मानते हैं लेकिन आज तक इन दोनों मुद्दों पर राष्ट्रीय बहस नहीं चली है और न इसको सुलझाने का कोई रास्ता ही नज़र आया है।"
वजाहत साहब यह आज से लगभग पंद्रह साल पहले कह रहे थे। आज एक बार फिर इस पर बस बहस हो रही है। जो फिर थम जाएगी और फिर वही ढ़ाक के तीन पात।
मेरा निजी अनुभव यही है कि एडवांस रॉयल्टी हिंदी में आज भी गिनती के लेखकों को मिल रही है। ये वो लेखक हैं जिनकी सोशल मीडिया पर ज़बरदस्त फ़ॉलोइंग है, जिन्हें मार्केटिंग का हुनर अच्छे से आता है (इसमें मेरे ख़याल से कुछ ग़लत भी नहीं है)। प्रकाशक जानते हैं कि उनके पास हिंदी के सलमान खान हैं। उनका बिकना तय है। अगर आप एक लेखक के तौर पर खुद अपनी किताबें बेचने में सक्षम नहीं हैं तो प्रकाशक को आपकी कुछ ख़ास पड़ी नहीं है।
यहाँ कैच यह है कि जो प्रकाशक आपकी किताब छापने में बड़ी रुचि दिखाते हैं, बाक़ायदा अपना हज़ारों का निवेश करते हैं वो आपकी किताब को बेचने को लेकर इतना ठंडा रवैया क्यों अपनाते हैं? इतना खर्च करके किताब को लेकर निष्क्रिय हो जाने में उनका लाभ क्या है? क्या वो यही चाहते हैं कि बिकें तो सिर्फ़ हिंदी के सलमान खान? उन्हीं को आयोजनों में बुलाया जाय। उन्हीं की अपने पुस्तक मेलों में ज़बरदस्त मार्केटिंग की जाए। मतलब यह कि मुंबई की फ़िल्म इंडस्ट्री का एक बेहद सस्ता मॉडल हिंदी प्रकाशन जगत में बनाया जा रहा है? या फिर मामला कुछ और भी है। कुछ चुनिंदा लेखकों की किताबों की बिक्री को बढ़ाकर दिखाया जाय ताकि शेष लेखकों की बिक्री को घटाकर दिखाने पर भी संतुलन बना रहे?
यह भी हो ही सकता है किताबें वाकई उतनी ही बिक रही हैं जितनी दिखाई जा रही हैं, हांलाकि किताबों के छपने की रफ़्तार देखते हुए इसमें कुछ शक ज़रूर होता है। लेकिन जो भी हो ऐसे तकनीकी प्रयास होने चाहिए जिनमें बिक्री के संदर्भ में दूध का दूध और पानी का पानी सब स्पष्ट हो सके। और यह भी पता लग सके कि हिंदी प्रकाशन जगत में मलाई आख़िर खा कौन रहा है? क्योंकि फ़िलहाल तो दूध के प्रचुर उत्पादन के बावजूद लेखक-प्रकाशक हर कोई यही कह रहा है कि मैं नहीं माखन खायो।
#रॉयल्टी
उमेश पंत