खुद में वो खोया रहता था,
जाने क्या वो चाहता था बस अपनी उधेड़बुन में लगा रहता था।
शायद उसने अपनी मिट्टी को प्यार किया था, तभी तो उसने उस जैसी ही ख़ाकी को चुना था।
इक रात घोर अंधेरा था, कहीं वो अकेला खड़ा था।
रात घनी थी पर फिर भी कर्ज़ उसे चुकाना था, मिट्टी को जो चाहा था, हां उसने तभी तो ख़ाकी को चुना था।
मां का आंचल, पत्नी की इंतज़ार में थकी हुई आंखों में शायद उसने सालों से कभी झांका था।
शायद हां क्योंकि उन पथराई आंखों में कहीं तो अपनों का प्रेम छुपा था, पर दिखाता कैसे उसने ख़ाकी को जो चुना था।
शोर था, घबराहट भी, कुछ परायों को उसने अपना माना था।
अंजानों के लिए भी वो सीना फुलाए खड़ा था, उसने ख़ाकी को जो चुना था।
लिपटा तिरंगे में, मुस्कुराता चेहरा, अब कितना शांत है वो।
जाते-जाते भी सबको दिलों में राज़ कर गया क्योंकि, उसने ख़ाकी को जो चुना था।
हिमांशु..
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