Tuesday, March 15, 2022

'द कश्मीर फाइल्स' की तरह सत्ता का पक्ष नही लेती 'सत्ता की सूली'

लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए यह भी जरूरी है कि उससे बार-बार सवाल किए जाते रहें। आज जब 'द कश्मीर फाइल्स' में कश्मीरी पंडितों पर किए गए अत्याचारों को याद किया जा रहा है तब ऐसे ही बहुत से सताए हुए पक्ष खुद याद आ जाते हैं। 'द कश्मीर फाइल्स' का विषय तो अच्छा है पर फ़िल्म में वास्तविकता से पूरी तरह परिचय नही कराया गया है और ये बात भी सत्य है कि फिल्मों की अपनी सीमा होती है। 'सत्ता की सूली' में कुछ रिपोर्ट्स को साथ ले रहस्य खोले गए हैं, जो महत्वपूर्ण हैं और इस किताब पर भी 'टैक्स फ्री' फ़िल्म बनाई जा सकती है।


चार खण्डों में बंटी इस किताब की शुरुआत क्रमशः भूमिका, आमुख, क़ानूनविद्व की नज़र और लेखकीय के साथ होती है।
हाईकोर्ट के एक पूर्व न्यायाधीश की लिखी भूमिका किताब की शुरुआत से ही आपको चौंकाने लगती है, भूमिका पढ़ आप शायद किताब को और अधिक गहराई से पढ़ना शुरू कर देंगे।

प्रशांत भूषण के लिखे आमुख में वह कहते हैं कि किताब देश के हालातों पर जो चर्चा करती है उसे जानने के लिए सब लोगों को किताब ध्यान से पढ़नी चाहिए।
सुप्रीम  कोर्ट की वरिष्ठ एडवोकेट इंदिरा जयसिंह से 'कानूनविद की नज़र' लिखाया गया है। इसके बाद लेखकीय में महेंद्र मिश्र किताब को लिखने का मकसद बताते हुए कहते हैं कि इसका मकसद लोया मामला और उससे जुड़ी पूरी गुत्थी को सामने लाना है।

खण्ड एक 'अरहम फॉर्म हाउस की दशहत' शीर्षक से शुरू होता है। सोहराबुद्दीन केस के बारे में पढ़ते यह भी पता चलता है कि इस केस से जुड़े लोग सत्ता की चोटी पर बैठे हुए हैं।
किताब में एक षडयंत्र को 80 के दशक से भी खतरनाक बताया गया है, वह वाकई में किताब को पढ़ने की शुरुआत में ही आपको ' इन्वेस्टिगेशन डिस्कवरी ' चैनल का कोई रहस्यमयी शो देखने सा अनुभव देने लगता है।
इसका उदाहरण है चलती बस से किसी को पकड़ने वाली घटना।

कौसर बी के साथ बलात्कार की दास्तां डरावनी है, सीबीआई जांच अधिकारी में अमिताभ ठाकुर का नाम पढ़ वर्तमान में उनके साथ हो रहे व्यवहार पर आपका ध्यान जरूर चले जाएगा।

पत्रकार प्रशांत दयाल की ख़बर, पुलिस अधिकारी रजनीश राय के साहस और उस साहस को दिखाने की सजा भुगतने की कहानी पर बात करती किताब आगे बढ़ती है।

प्रशांत दयाल का जागृति पंड्या को लिखा खुला पत्र खण्ड एक को समाप्त करने के साथ सत्ता के लोभ पर भी प्रकाश डाल जाता है।

जज जेटी उत्पट का 26 जून 2014 के दिन केस से जुड़े राजनेता को कोर्ट में पेश होने के लिए कहना और 25 जून को ही उनका ट्रांसफर होना, वह भी तब जब सुप्रीम कोर्ट का आदेश सुनवाई एक ही जज से कराने का था। जैसे तथ्यों को किताब में जोड़ना इसे सच के अधिक करीब लाते जाता है।

जज लोया के ऊपर पड़ रहे दबाव की बात करते किताब आपको जज लोया का चेहरा गूगल पर खोजने के लिए मजबूर कर देगी, जज लोया के शव के हालात बता लेखक ने इन हत्या के पीछे की गहरी साजिश का जैसे खुलासा ही कर दिया हो।

'द कारवां' , 'नागपुर टुडे' और 'नेशनल हेराल्ड' की रिपोर्टों के आधार पर किताब जज लोया की मौत पर सवाल उठाती आगे बढ़ती है।
आप किताब पर आंखे गढ़ाए रहेंगे जब आपको यह पता चलेगा कि लोया के परिवार पर किस तरह अपने बयान वापस लेने को लेकर दबाव बनाया जा रहा था।

मुकेश साहू का बयान और उनके साथ जो होता रहा, वह पढ़ आप व्यवस्था से डरने लगेंगे।

'जजमेंट ड्राफ़्ट और पूर्व जज प्रकाश थोंबरे की रहस्यमयी परिस्थितियों में मौत' हिस्सा बड़े विस्तार से पूरे घटनाक्रम को सामने लाता है और कुछ ऐसी बातें पता चलती हैं जो पहले कभी सुनी नही गई है।

किताब के बीच में इस पूरी गुत्थी से जुड़ी तस्वीरों को देख आप खुद को इस किताब से जुड़ा हुआ महसूस करने लगेंगे। 
खण्ड तीन की शुरुआत में पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल एल रामदास का चीफ जस्टिस को पत्र लोकतंत्र के ऊपर विचार करने वाले साथियों के लिए महत्वपूर्ण है।

किताब पूरे घटनाक्रम को क्रमानुसार जोड़ती हुई आगे बढ़ती है। 
वर्ष 2018 में केस को लेकर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई जबरदस्त तरीके से पेश की गई है।

 पृष्ठ संख्या 211 में 'पति के बारे' में का 'पति के बोर' छपना अखरता है।
खण्ड चार में केस से जुड़े महत्वपूर्ण लोगों के साक्षात्कार हैं, सतीश यूके और बाबाराव की कहानी किताब से पाठकों को जोड़े रखने में कामयाब है।

पेज नम्बर 280,281,282 और 283 में पूरी किताब का सार छुपा हुआ है। 

केस से जुड़े सबसे अहम शख़्स का बरी होना शायद ही मीडिया की सुर्खियों में आया और उसी दिन एक बड़े क्रिकेटर का सन्यास लेना खबरों में छाया हुआ था, इस प्रकार की पंक्तियों का प्रयोग कर मीडिया के दोगलेपन को भी दिखाया गया है।

जस्टिस अभय एम थिप्से द्वारा इस पूरे मामले पर इंडियन एक्सप्रेस को दिए साक्षात्कार को शामिल कर किताब लोकतंत्र के चारों स्तम्भों को साथ ही कटघरे में खड़ा कर समाप्त हुई है और लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए यह जरूरी भी है कि उससे बार-बार सवाल किए जाते रहें।

 किताब के आवरण पर भी बात कर ली जाए।
आवरण को अशोक भौमिक द्वारा तैयार किया गया है, आवरण चित्र जस्टिस लाया की छवि है, जिसे देखते ही कुछ रहस्यमयी सा महसूस होता है। बैक कवर पर प्रशांत भूषण और इंदिरा जयसिंह की किताब पर टिप्पणी के साथ-साथ लेखकों का परिचय भी है। 
इतनी महत्वपूर्ण किताब का इससे बेहतर आवरण बनाया भी नही जा सकता था।

पुस्तक- सत्ता की सूली
प्रकाशक- शब्दलोक प्रकाशन
मूल्य- ₹300
लेखक- महेंद्र मिश्र, प्रदीप सिंह, उपेन्द्र चौधरी

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