Friday, August 14, 2020

उत्तराखंड को अपनी कर्मभूमि बना गांधीवादी विचारों को मूर्त रूप देते अनिरुद्ध जडेजा।

हाल ही में आपदा और राजनीतिक घटनाक्रमों को लेकर चर्चा में आए हिमालयी राज्य उत्तराखंड की भी अजब कहानी है, लोग यहां की खूबसूरती से आकर्षित हो इसकी ओर खिंचे चले आते हैं और हिमालय के स्थानीय निवासी सुविधाओं के अभाव में यहां से पलायन कर जाते हैं।

आज़ादी से पहले ही गांधीजी ने इस समस्या का समाधान ग्राम स्वराज के रूप में दिया था। बाद में विनोबा भावे द्वारा इसे विकसित किया गया। ग्राम स्वराज हर गांव को एक आत्म कुशल स्वायत्त इकाई में बदलने को बढ़ावा देता है जहाँ एक गरिमामयी जीवन के लिए सभी प्रणाली और सुविधाएं उपलब्ध हो।
यह स्वशासन के लिए स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता की दशा में किया गया प्रयास है।
ग्राम स्वराज विकेन्द्रीकृत, मानव केन्द्रित और गैर शोषणकारी है।

खुद को भगवान श्रीकृष्ण के वंशज होने का दावा करने वाले, कच्छ की रियासत पर शासन कर चुके जडेजा वंश में रणजीतसिंहजी विभाजी जडेजा ( जिनके सम्मान में एक क्रिकेट टूर्नामेंट को 'रणजी ट्रॉफी' नाम मिला है) क्रिकेटर अजय जडेजा, रविन्द्र जडेजा जैसे नामीगिरामी हस्तियां पैदा हुई हैं। इसी वंश के 'चंदू भा जडेजा' के घर में अनिरुद्ध जडेजा ने भी जन्म लिया।
जब महात्मा गांधी के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी विनोबा भावे 'भूदान आंदोलन' चला रहे थे तब चंदू भा भी उनके साथ थे और उन्होंने अपना एक बेटा विनोबा को दान कर दिया था।
विनोबा ने चंदू भा से उस पुत्र को ऐसा बनाने के लिए कहा कि वह देश के अच्छे भविष्य के लिए समाज सेवा करे। 
इसके बाद चंदू भा ने अपने पुत्र अनिरुद्ध को बचपन से ही समाज सेवा के लिए तैयार किया। बचपन में ही अनिरुद्ध को उनके पिताजी ने पढ़ने के लिए एक धार्मिक पुस्तक 'कथामृत' दे दी थी। उनका कहना था कि बिन धार्मिक ज्ञान के कोई भी सामाजिक कार्य नही किया जा सकता है। अनिरुद्ध को स्वामी विवेकानंद के एक विचार 'मातृभूमि के लिए हमारा कर्तव्य' पर चलने के लिए कहा गया।

किशोरावस्था में आते आते अनिरुद्ध ने विनोबा भावे की तरह ही गांवों में जाकर वहाँ के लोगों को उनका अधिकार दिलाने का निर्णय लिया।

इस बीच 1984-85 में गुजरात दंगे की आग में जल उठा। विमला ठाकर लोगों की मदद के लिए अहमदाबाद पहुंची। 
विमला ठाकर का दर्शन कृष्णमूर्ति की आध्यात्मिक शिक्षाओं और महात्मा गांधी, विनोबा के अहिंसक सामाजिक परिवर्तन दर्शन से प्रभावित था। उन्होंने पूरे विश्व भर में ध्यान सिखाया और ग्रामीण विकास पर कार्य किया।

विमला ठाकर के कहने पर गुजरातियों के कल्याण के लिए गुजरात विरादरी वालंटियर ऑर्ग बना।
अनिरुद्ध कॉलेज जाते ही इससे जुड़ गए।

शुरुआत में ही उन्होंने वोटरों को शिक्षित करने के अभियान में हिस्सा लिया ताकि जनता वोटिंग की अपनी शक्ति को समझें।
इसके बाद उन्होंने साईकिलों, बाइकों में 'ग्राम स्वराज यात्रा' नाम से गुजरात के अंदर छोटी छोटी जागरूकता यात्राएं की जिनका उद्देश्य ग्रामीण इलाकों में पानी और जैविक खेती  की महत्वत्ता समझाना था।

पढ़ाई को अपने समाज के प्रति कर्तव्य में बाधक मानते हुए अनिरुद्ध गुजरात विरादरी के संयोजक डॉ प्रफुल्ल दवे के पास गए और उन्होंने अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़ने की बात उनके सामने रखी पर प्रफुल्ल उनकी इस बात से असहमत थे।
बाद में अनिरुद्ध पढ़ाई पूरी कर अपनी डिग्री प्रफुल्ल दवे को सौंप आए।

गुजरात विरादरी के राज्य संयोजक बनने के साथ ही अनिरुद्ध को ऑफिस का काम मिला और उनकी पहली तनख़्वाह भी।
फील्ड में काम कर समाज सेवा की चाहत रखने वाले अनिरुद्ध ने एक ही साल बाद ऑफिस का काम छोड़ दिया और गुजरात में उपलेटा शहर के नज़दीक मुर्खडा गांव चले गए। वहां पहले से ही रह रहे अपने कुछ दोस्तों के साथ उन्होंने जल प्रबंधन, कचरा प्रबंधन पर कार्य किया।
गांव की बंजर पड़ी जमीन पर उन्होंने जैविक खेती की जिसकी वजह से गांव के लोग उनकी मज़ाक बनाने लगे पर जब उनकी वह खेती सफ़ल होने लगी तब वही लोग उनसे खुद भी खेती करने के लिए बीज मांगने लगे।

इसके बाद वह कुछ समय हिमाचल प्रदेश के खज्जियार में रहे पर हिमाचल पहले से ही विकसित प्रदेश है तो उन्होंने उत्तराखण्ड आने का निर्णय किया और विमला ताई से इस बारे में बात करने के लिए चले गए।

 'विमला ताई' ने अनिरुद्ध जडेजा को जीवन में सफलता प्राप्त करने के तीन मन्त्र 'मित्रता, सहयोग और सहजीवन' देने के साथ ही उत्तराखण्ड जाने की आज्ञा भी दी।

उत्तराखण्ड में गायत्री परिवार से जुड़ी अपनी बहन के साथ अनिरुद्ध  वर्ष 1997 में उत्तराखण्ड पहुँचे और वह अल्मोड़ा के मिरतोला जिसे उत्तर वृंदावन भी कहा जाता है जाना चाहते थे पर उत्तरकाशी में 'इंदु टेकेकर' जो विमला ताई की परिचित थी ने उन्हें टिहरी में सुंदर लाल बहुगुणा के साथ टिहरी बचाने के लिए चल रहे 'टिहरी बचाओ आंदोलन' में शामिल होने के लिए कहा।

आंदोलन में शामिल होने के साथ ही अनिरुद्ध 'पर्वतीय नवजीवन मंडल सिलियारा टिहरी (घनसाली)' संस्था के साथ जुड़ गए।
सिलियारा की बंजर भूमि पर उन्होंने लाइब्रेरी, गौशाला और विद्यालय खोला जिसमें पढ़ाई करने के लिए वह चीन बॉर्डर पर स्थित पिस्वाड़ गांव से भी बच्चे लाए।

इस बीच टिहरी में कौसानी से आए हुए राधा भट्ट, दीक्षा बिष्ट जैसे गांधीवादियों से उनकी मुलाकात हुई जिन्हें कौसानी में एक शिक्षक की आवश्यकता थी।

वर्ष 1999 में अल्पा के साथ गुजरात में विवाह के बाद अनिरुद्ध उन्हें गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ घुमाते हुए कौसानी पहुंचे।
जहां उन्होंने दस गाँव गोद लिए और महिला मंगल दल बनाया। 
बहुत से महिलाओं को स्वरोज़गार के लिए प्रेरित किया।
घराट की चक्की चला उसका आटा उत्तराखण्ड से दिल्ली तक बेचा।


उनकी पत्नी भी सरला बहन के 'कस्तूरबा महिला उत्थान मण्डल कौसानी' से जुड़ कर वहां संस्कृत पढ़ाने लगी।

वर्ष 2001 में उन्होंने अल्मोड़ा के कुछ 'ड्रॉपआउट' छात्रों को 'ब्रिज कोर्स' कराया जो अब अच्छी नौकरी कर रहे हैं।

अनिरुद्ध को अपने सामाजिक कार्यों की वजह से अब आर्थिक समर्थन भी मिलने लगा था जिस कारण धन का हिसाब रखने के लिए उन्हें 'जीवन मांगल्य ट्रस्ट' का गठन करना पड़ा।

अनिरुद्ध जडेजा 'उत्तराखण्ड सर्वोदय मण्डल' के पहले सचिव थे और इसी के साथ उन्होंने कंधार (बागेश्वर) में शराब का विरोध किया। जिसमें इनके साथ सरला बहन की छात्रा दीक्षा बिष्ट भी 'शराब नही रोज़गार दो, स्वदेशी अपनाओ' नारे के साथ शामिल हुई। कंधार में सत्याग्रह के दौरान उनका अस्सी प्रतिशत शरीर लकवाग्रस्त हो गया।

अनिरुद्ध के परिवार जन उनकी इस स्थिति का समाचार सुन उन्हें जबरदस्ती वर्ष 2003 में गुजरात वापस ले गए। वहीं अनिरुद्ध और अल्पा को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।

अनिरुद्ध की तबियत में अब सुधार आने लगा था तो समाजसेवी अनिरुद्ध भला कैसे शांत बैठ सकते थे। इस बीच 'गुजरात स्वराज संघ' गुजरात में भूकम्प के बाद पुनर्वासन का कार्य कर रहा था। 
अनिरुद्ध उन्हीं से जुड़ गए और फिर वह वर्ष 2004 में 33 लोगों की टीम के साथ सुनामी से ग्रसित तमिलनाडु के नागपट्टनम जिले में रह कर पुनर्वासन एवं राहत कार्य में लग गए।

उन्होंने उड़ीसा में चक्रवात तूफान के बाद के राहत कार्यों में भी हिस्सा लिया।

विमला ठाकर ने पूरे एशिया में समाजसेवा के लिए एशियन बिरादरी बनाई थी। वर्ष 2005 में विनाशकारी भूकम्प आने पर पाकिस्तान से अनिरुद्ध को मदद के लिए बुलाया गया पर उन्होंने पाकिस्तान जाने के बजाए सेवा करने के लिए अपने देश को चुना और वह 'ग्राम स्वराजय संघ' के साथ कश्मीर चले गए।
वहां उन्होंने 56 राष्ट्रीय राईफल्स के साथ बारामूला के नावा रुण्डा गांव में भूकम्प से तबाह घरों को फिर से बनाने में मदद की। 
उसके बाद गुजरात भूकम्प के पुनर्वासन अभियान में उनके साथ काम कर चुकी वृंदा डार ने कश्मीर में नए मकान बनाने के एक प्रोजेक्ट 'कश्मीर प्रोजेक्ट ऑक्सफेम' का कार्यभार उन्हें सौंपा जिसकी तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ एपीजे कलाम ने भी तारीफ़ की थी।

गुजरात वापस आ अनिरुद्ध जडेजा ने प्राकृतिक संसाधनों पर मालिकाना हक के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की मदद से 19 सत्याग्रह आंदोलन किए और सब में जीत हासिल की। यह सारे आंदोलन उन्होंने 'सौराष्ट्र लोक समिति' के बैनर तले लड़े जिसके वह संयोजक भी थे।
इनमें से एक महुआ,जिला भावनगर में निरमा सीमेंट फैक्ट्री के स्थान को लेकर किया गया आंदोलन भी था। जिसके लिए उन्हें तीन महीने की जेल भी हुई थी।

गुजरातियों में गांव के प्रति कम होते लगाव से व्यथित हो अनिरुद्ध वर्ष 2016 में फिर से वापस उत्तराखण्ड आ गए।
वर्ष 2019 में पानी की बर्बादी पर उन्होंने भीमताल में 'जल पंचायत' भी की थी।

वर्तमान में वह अपनी सोच से मिलते जुलते 'अवनी' एनजीओ के साथ कार्य कर रहे हैं।
अवनी ग्रामीण महिलाओं और पुरुषों के लिए आत्मनिर्भर और पर्यावरण की दृष्टि से स्थायी आपूर्ति श्रृंखला के माध्यम से व्यवहार्य रोज़गार खोजने के अवसर पैदा करती है।

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एक पिरूल के प्लांट में सात-आठ लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोज़गार मिलता है। इस प्लांट से यूपीसीएल को प्रतिदिन 300-400 यूनिट बिजली बेची जाती है। साल भर में एक प्लांट से चार से पांच लाख तक कि कमाई की जा सकती है। 
इस प्रोजेक्ट पर जिला उद्योग केंद्र, उरेडा, यूपीसीएल और अवनी मिलकर कार्य कर रहे हैं।
 यूपीसीएल अगले बीस वर्षों तक इससे बिजली खरीदेगा।
अनिरुद्ध का काम इस प्रोजेक्ट पर लोगों को जागरूक करने का है। वह इसके जमीनी कार्य देखने के साथ-साथ जनता और सरकार के बीच संचार का जरिया भी हैं।


निगराड़, अल्मोड़ा में पिरूल से बिजली के उत्पादन वाले एक प्लांट में अनिरुद्ध कहते हैं कि "पहले पिरूल से जंगलों में आग लगती थी अब उसका सदुपयोग हो रहा है। जो युवा बेरोज़गार हो आत्महत्या की सोच रहे थे वह अब इस पर रुचि ले रहे हैं। ग्रामोद्योग से देश आगे बढ़ेगा"।

अवनी के काम से प्रेरित हो उत्तराखण्ड सरकार ने वर्ष 2018 में पिरूल नीति बनाई।

अनिरुद्ध का सपना उत्तराखण्ड में हुनर स्कूल खोलने का है जिसमें स्किल सीख उत्तराखण्ड के छात्र भविष्य में पलायन नही करेंगे। इसके साथ ही वह उत्तराखण्ड के युवाओं में देश के प्रति समर्पण को देखते हुए एक रक्षा यूनिवर्सिटी भी खोलना चाहते हैं जिसमें युवाओं को सेना में भर्ती होने की ट्रेनिंग दी जाएगी।

अनिरुद्ध उत्तराखण्ड के राजकीय इंटर कॉलेजों में कम्प्यूटर की शिक्षा देना चाहते हैं ताकि इस ऑनलाइन जमाने में यहां के छात्रों को कम्प्यूटर की जानकारी रहे और उन्होंने रामगढ़ ब्लॉक से इस पर काम भी शुरू कर लिया है।

वह उत्तराखण्ड के हर जिले में गोसेवा समिति भी खोलना चाहते हैं जो लावारिस और बूढ़े पशुओं के लिए होगी और वहां पशुओं के मलमूत्र से जैविक खेती की जाएगी।

गुजरात का होकर वहां से सैंकड़ो किलोमीटर दूर उत्तराखण्ड को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले अनिरुद्ध में आप गांधीजी, विनोबा भावे, रामकृष्ण परमहंस और विमला ठाकर की छवि देख सकते हैं यह आप उनके पास थोड़ी देर बैठकर खुद ही  पहचान लेंगे। 

'अवनी' के पिरूल प्लांट पर ट्रेनिंग के लिए आए युवाओं को बिना शर्त अपने कमरे में रहने की इजाजत देना हो या मेरे लिए दिन का भोजन तैयार करना और शाम को विदाई पर नाशपाती के फल उपहार स्वरूप देना। यह सब उनके अद्भुत व्यक्ति होने का छोटा सा प्रमाण है।

कोरोना काल में कोरोना संक्रमित होने के बाद अनिरुद्ध गम्भीर रूप से बीमार भी हुए थे पर उससे विजय पाने के बाद वह जनसेवा के अपने कार्य को फिर से आगे बढ़ा रहे हैं और नौलों धारों के संरक्षण पर भी कार्य कर रहे हैं।

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Thursday, August 6, 2020

कोरोना में बेरोज़गारी और प्रवासियों को रोकने का समाधान है स्वरोजगार।

अजय और रामप्रसाद नैनीताल में वर्षों से बोट चलाने का काम करते हैं। कोरोना की वजह से बोटिंग का काम ठप है और अब पुरानी कमाई से ही उनका काम चल रहा है। कोरोना काल ज्यादा समय तक खिंचने पर कब तक रोटी नसीब होगी यह पता नही।

नैनीताल जिला मुख्यालय से छह किलोमीटर दूर स्थिति ग्राम अधौड़ा (गैरीखेत) के गोविंद सिंह बिष्ट और गांव के ही अन्य 15-20 बच्चे रोज़ सुबह पैदल मार्ग से नैनीताल तक कंधों में बोझ ले सब्जी बेचने आते हैं। बड़े होने पर यही बच्चे हल्द्वानी, रुद्रपुर, देहरादून और दिल्ली जैसे शहरों के लिए पलायन कर जाते हैं। कोरोना काल में 200-250 प्रवासी गांव वापस आए हैं जो दाने-पानी के लिए अब सीमित जनों के लिए उपलब्ध मनरेगा पर निर्भर हैं।

कोरोना ने उत्तराखंड वासियों को स्वरोजगार के बारे में सोचने पर विवश किया है क्योंकि बड़े शहरों में जाकर इन प्रवासियों में कुछ ही होते हैं जो सफलता पाते हैं बाकियों के पास सिर्फ पेट पालने लायक ही धन रहता है जिससे वह अपने जीवन को एक बोझ की तरह ढोते हुए साल दर साल खींचते रहते है।

उत्तराखण्ड में चाय बागानों की स्थिति

कृषि विज्ञान के अंतरराष्ट्रीय जर्नल की एक रिपोर्ट 'ग्रीन फार्मिंग' के अनुसार वर्ष 1824 में बिशप हेबर ने उत्तराखंड में चाय बागानों पर चर्चा शुरू की थी। जिसके बाद लॉर्ड वेंटिंग ने इस पर विचार करने के लिए वर्ष 1834 में एक कमेटी बनाई परिणामस्वरूप वर्ष 1835 में कोलकाता से लगभग 2000 चाय के पौधे उत्तराखंड पहुंचे थे।
वर्ष 1880 तक उत्तराखण्ड में 63 चाय बागान थे जो 10937 एकड़ भूमि पर फैले हुए थे।
मज़दूरों की कमी, परिवहन के उचित साधन न होने, लोकल बाज़ारों की अरुचि व चाय की लोकप्रियता न होने के कारण इसकी लोकप्रियता कम होते गई और वर्ष 1949 तक यह काम लुप्त होते गया।
वर्तमान समय में उत्तराखंड में गिने-चुने चाय बागान हैं पर यहां की चाय को विदेशों में भी पसंद किया जाता है।
अब अंग्रेज़ी शासन की तरह मज़दूरों और परिवहन के साधनों की कमी नही है और चाय की लोकप्रियता के कारण इसका बाज़ार भी बहुत बड़ा है।
जनता और सरकार की सामूहिक भागीदारी से चाय का स्वरोज़गार फिर से लोकप्रिय कर उत्तराखण्ड में पलायन को रोक सकता है।

गांव से सीधे बाज़ार

पहाड़ में रहकर ही अच्छी कमाई करने के लिए 'जसपुर उद्यान विकास समिति अल्मोड़ा' मॉडल हमारे लिए आदर्श है।
प्रवासी भारतीय 'बी एन बलोदी' ने अपने गांव से पलायन को रोकने के लिए 4 अप्रैल 2018 में इसका गठन किया। बीसएफ से रिटायर जसपुर गांव के ही आनंद पंचोली इसकी देखरेख करते हैं।
इस समिति में गांव के लोगों की ही 20 हेक्टेयर जमीन पर कागज़ी नींबू के पौधे लगाए गए हैं। यह नींबू गाज़ीपुर मंडी दिल्ली के लिए भेजे जाते हैं। इस समिति द्वारा नींबू के छिलकों का प्रयोग भी खाद बनाने के लिए किया जाता है। 
कोरोना काल में लगभग 20 प्रवासियों को समिति द्वारा रोज़गार दिया गया है। 
आनन्द पंचोली कहते हैं कि उन्होंने गांव के ऐसे 20 परिवार पलायन करने से रोके जो बिल्कुल ही असहाय हो चुके थे। मुख्य समस्या सिंचाई के लिए पानी प्राप्त करने की है जिसके लिए अभी वह पानी के टैंकरों का प्रयोग करते हैं ।

भविष्य सुधारने की ललक

जिला अल्मोड़ा के बिल्लेख गांव में रहने वाले गोपाल उप्रेती ने 7.1 फुट धनिया का पौधा उगा कर अपना नाम 'गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड' में दर्ज कराया है। हॉलैंड से बागवानी का प्रशिक्षण प्राप्त कर गोपाल उप्रेती सेब, आड़ू, खुमानी की जैविक खेती भी करते हैं। पूरे उत्तराखण्डवासियों के लिए वह एक आदर्श हैं।

टिहरी जिले के भैंसकोटी के रहने वाले कुलदीप ने आईएमटी गाज़ियाबाद से एमबीए के बाद कुछ वर्ष बैंक में नौकरी की पर जल्द ही उन्हें स्वरोजगार का महत्व समझ में आ गया और अब वह देहरादून में रह कर मशरूम से बने आचार, बिस्कुट एवं नमकीन सहित अन्य वस्तुओं का निर्माण कर रहे हैं और अन्य युवाओं को भी स्वरोज़गार सम्बंधित निःशुल्क प्रशिक्षण देते हैं।

द्वाराहाट के कन्थयाड़ी गांव के शेखर बिष्ट ने बीटेक के बाद गांव में ही रहकर चीड़ की पत्तियों (पिरूल) से बिजली के उत्पादन के लिए संयंत्र स्थापित किया है।
इससे वह 250 यूनिट प्रतिदिन बिजली का उत्पादन करते हैं। चीड़ को अन्य कार्यों में भी लाया जा सकता है जैसे इसका लीसा बिकता है, इसकी लकड़ी से फर्नीचर बनाए जा सकते हैं और इससे हेंडीक्राफ्ट भी बनाए जाते हैं।

काकड़ीघाट की दीपा खनायत ने नमक में विभिन्न उत्पाद पीसकर 20-25 प्रकार के पीसे हुए नमक को बेचना शुरू किया। यह नमक स्वास्थय के लिए भी लाभदयक है।
 उनसे प्रभावित हो अन्य महिलाएँ भी समूह के रूप में उनसे जुड़ी हैं जिसका नाम उन्होंने 'विवेकानंद उत्पादक समूह' रखा है।

देहरादून की शिल्पा भट्ट बहुगुणा ने दिल्ली के प्रतिष्ठित इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की शिक्षा प्राप्त करने के बाद पत्रकारिता को अपने कैरियर के रूप में चुना था।
उसके बाद उन्होंने देहरादून में 20 लोगों के साथ मिलकर एक रेस्टोरेंट से पिज़्ज़ा का स्टार्टअप शुरू किया। 
आज उनके देहरादून में 'पिज़्ज़ा इटालिया' नाम से 7 रेस्टोरेंट चल रहे हैं। वह इससे 120 अन्य लोगों को भी रोज़गार दे रही हैं।
उत्तराखण्ड के अन्य युवा भी इनसे सीख ले दुरस्थ पहाड़ी क्षेत्रों में दिल्ली मेट्रो स्टेशन की तरह ही पहाड़ियों को पिज़्ज़ा का स्वाद चखा सकते हैं।

चंपावत जिले के किस्कोट गांव के दो भाइयों ने चप्पल बनाने का कारखाना शुरू कर आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दिया है। पीतांबर जोशी और बलदेव जोशी ने आगरा से इस काम का अनुभव लिया और ग्राम उद्योग योजना की मदद से इस फैक्ट्री को शुरू किया। इन चप्पलों को बनाने के लिए कच्चा माल दिल्ली और हरियाणा से मंगाया जाता है। 
अच्छी आमदनी होने पर दोनों भाइयों ने अपने साथ ही गांव के कुछ अन्य लोगों को भी रोज़गार उपलब्ध कराया है।

'उत्तराखण्ड रैबार' की एक खबर के अनुसार टिहरी के दुवाकोटी गांव की सीता देवी चौहान ने कीवी की खेती का उदाहरण सामने रखा है। उन्होंने हिमाचल से कीवी की खेती की ट्रेनिंग ले अब तक एक कुंतल कीवी बेच दी है और उन्हें टिहरी में ही इसके खरीददार मिल रहे हैं। टिहरी जिले के डीएम भी उनकी इस पहल की तारीफ़ कर चुके हैं।

च्यूरा से स्वरोज़गार

च्युरा उत्तराखण्ड में बहुतायात मात्रा में मिलने वाला एक बहुउद्देशीय वृक्ष है। इसको उगा कर स्वरोज़गार प्राप्त किया जा सकता है।
इसकी पत्तियां चारे के लिए उपयोग की जाती हैं।
लकड़ी गुणवत्ता वाले ईंधन प्रदान करती है ।
इसका बीज घी के निष्कर्षण के लिए उपयोग किया जाता है।
तेल केक का उपयोग कीटनाशक, मछली फ़ीड और उर्वरकों के रूप में भी किया जा रहा है। 
यह अच्छा साबुन बनाता है और यह सिरदर्द के लिए एक बाहरी अनुप्रयोग के रूप में और गठिया के लिए भी प्रयोग किया जाता है।
इसकी छाल का उपयोग गठिया, अल्सर के उपचार के रूप में किया जाता है। 
 च्यूरा का पेड़ आमतौर पर अपनी उम्र के 6 वें वर्ष से फूलना शुरू कर देता है और इसका आर्थिक जीवन लगभग 40 वर्ष का होता है।

नवीकरणीय साधनों का सही प्रयोग

उत्तराखण्ड सरकार को नवीकरणीय ऊर्जा के विकास पर भी कार्य करना होगा। नवीकरणीय ऊर्जा वह है जिसे प्रकृति में नियमित रूप से बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है और यह प्रकृति में बहुतायत मात्रा में उपलब्ध है।

पवन ऊर्जा से चलने वाली हवा टरबाइन अपने खेतों में लगवाकर किसान उससे अच्छा किराया कमा सकते हैं और इससे फसलों में भी कोई व्यवधान नही आता है।
हवा टरबाइन के टेक्नीशियनों की भी बहुत आवश्यकता है। इस क्षेत्र में युवाओं के लिये रोज़गार के बहुत से अवसर हैं।

जलशक्ति ऊर्जा जो नदी और बहते पानी से उपलब्ध होती है यह भी ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार का अच्छा साधन साबित हो सकती है। इईएसआई जो पर्यावरण पर अध्ययन करने वाली एक अमेरिकी संस्था है के अनुसार चीन ने जलशक्ति ऊर्जा का सही उपयोग कर  रोज़गार के बहुत से अवसर उपलब्ध कराए हैं।

भूतापीय ऊर्जा जिसे पृथ्वी के अंदर संग्रहित ताप से प्राप्त किया जाता है उसमें चीन में वर्तमान समय में 2500 लोगों ने रोज़गार प्राप्त किया है और भारत में यह संख्या ना के बराबर है।

सौर ऊर्जा का उपयोग चीन ने बहुतायत मात्रा में किया है और भारत का चीन से पिछड़ने का मुख्य कारण यह भी है कि चीन ने नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग सुनियोजित तरीके से किया है। 
उत्तराखण्ड में इसका इस्तेमाल कर रोज़गार के बहुत से अवसर पैदा किए जा सकते हैं।

वर्षा जल संरक्षण

सिंचाई की समस्या वर्षा जल सरंक्षण कर हल की जा सकती है।
 बग्वालीपोखर स्थित 'नौला फाउंडेशन' के अध्यक्ष बिशन सिंह बनेशी पिछले तीन साल से इस पर कार्य कर रहे हैं। नौला फाउंडेशन के मीडिया इंचार्ज संदीप मनराल बताते हैं कि थामण गांव से इसकी शुरुआत हुई। वहाँ नौलों के चारों ओर गड्ढे बनाए गए और पौधरोपण किया गया। परिणामस्वरूप अब वहां सूखे नौलों में पानी आ गया है। पानी की समस्या से जूझ रहे अन्य गांवों के लिए यह सर्वोत्तम उदाहरण है।

जहां चाह वहां राह। 
कोरोना काल में देशभर के लाखों युवा बेरोजगार हो गए हैं और कुंठा का सामना कर रहे हैं। पूरे देश से आत्महत्या की खबरों में बढ़ोतरी हो गई है।  सबको यह समझना होगा कि कहानियों का वह राजा वापस नही आ सकता जिसके छूने भर से हर वस्तु सोने की बन जाती थी।
हमारे चारों ओर ऐसे बहुत से अवसर उपलब्ध हैं जिनसे हम अच्छी कमाई कर अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपना आत्मविश्वास न डगमगाने दें और अवसरों को भुनाना सीख लें।

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...