Tuesday, August 29, 2023

खेल दिवस के दिन आपको भारत में खेलों की वास्तविक स्थिति जाननी है तो अपने आसपास के किसी भी ऐसे स्कूल में घूम आइए जहां आम नागरिकों के बच्चे पढ़ते हैं, ब्रेक से लेकर स्पोर्ट्स के पीरियड तक में आपको वहां बच्चे एक दूसरे पर कूदते- फांदते दिख जाएंगे.
हमारे देश में बच्चों के खेल समय को इतनी गम्भीरता से लेने के कारण ही शायद पिछले सात ओलंपिक खेलों में भारत शीर्ष चालीस में भी जगह नही बना पाया है.

इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली के एक रिसर्च पेपर के अनुसार

बुधिया और फुटबॉलर ईंट ढोती

Thursday, August 24, 2023

मनिहार

रुद्रचन्द राजा को चूड़ी पहनाते थे। मदद मांगने मुगल दरबार वहां से पालमपुर मनिहार को ले आए।

चंद्रशेखर बिष्ट बताते हैं यहां कोई लड़ाई नही होती, कई साल से यहां कोई लड़ाई नही। एक दूसरे के निमंत्रण

Wednesday, August 16, 2023

बेटी दिवस : 641 मिलियन बेटियां मुश्किल में.

पिछले कुछ समय से पति पत्नी व लिव इन रिश्तों में रहने वालों के बीच हिंसक वारदातों में बढ़ोतरी हुई है. गूगल पर सर्च कीजिए 'पति ने पत्नी की हत्या की' तो आपको हर रोज नई घटना नजर आएगी. रिश्तों में दरार के बावजूद साथी एक दूसरे को नही छोड़ पाते, इसमें हो रही हिंसा को ( ipv ) अंतरंग साथी हिंसा कहा जाता है और वैश्विक स्तर पर लगभग 641 मिलियन महिलाएं और लड़कियां इससे प्रभावित हैं. बेटी दिवस पर मुश्किल में इन 641 बेटियों के बारे में सोचना जरूरी है.

पति, पत्नी या लिव इन पार्टनर की हत्या वाली खबरें आजकल आपको रोज़ सुनाई दे जाएंगी. यह कुछ घटनाएं हाल ही की हैं. कुशीनगर में पिता ने घरेलू कलह में बेटी और पत्नी की हत्या कर दी, उत्तर प्रदेश के बागपत में एक व्यक्ति ने आर्थिक कारणों से अपनी पत्नी की गला दबाकर हत्या कर दी. कुछ समय पहले श्रद्धा वाकर की हत्या ने देश को सन्न कर दिया था, उसके लिव-इन पार्टनर आफताब अमीन पूनावाला ने 18 मई, 2022 को श्रद्धा की हत्या कर दी थी. यह हत्या महीनों बाद तब सामने आई जब आफताब ने श्रद्धा के शरीर के सभी अंगों को नष्ट कर दिया और वह दूसरी लड़की को डेट कर रहा था.

भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के आंकड़ों की बात करें तो राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार साल 2021 में भारत के अंदर पति व अन्य रिश्तेदारों द्वारा महिलाओं के खिलाफ क्रूरता की 136234 घटनाएं सामने आई थी, जिसमें सबसे ज्यादा 19952 घटनाएं पश्चिम बंगाल की थी.

भारत में साल भर के अंदर लाखों महिलाएं हो रही हैं क्रूरता की शिकार पर अब भी 'छोड़ती' नही हैं महिलाएं.

रिश्ते की वजह से अवसाद में घिर जाने या मौत मिलने से बेहतर है समय से छोड़ देना लेकिन फिर भी भारत में यह 'छोड़' देना अब भी इतना आसान नही हुआ है. साल 2022 की बात करें तो भारत में तलाक लेने की दर विश्व में सबसे कम रही है. साल 2020 में भारत में जहां 315 तलाक हुए, वहीं साल 2021 में मात्र 108 तलाक हुए.

अगस्त में नागपुर निवासी 63 वर्षीय प्रसिद्ध लेखक मुकुल अमलास की उनके 66 वर्षीय पति ने कुल्हाड़ी से निर्मम हत्या कर दी थी, इसके बाद पत्रकार तसनीम खान ने लिखा था, 'थप्पड़' फिल्म याद है ना. उसे बार—बार देख लेना चाहिए कि हिंसा छोटे रूप में भी जिंदगी में आने लगे तो उसे वहीं रोक देना चाहिए. प्रेम, पति या कोई भी रिश्ता, जिंदगी से बेहतर नहीं हो सकता. मुकुल कुमारी का यों जाना तकलीफदेह है, लेकिन हैरानी नहीं. क्योंकि छोटी—छोटी हिंसा के बाद के 'सॉरी' में ही महिलाएं अपनी खुशी देख लेती हैं, ढक लेती हैं, जख्मों को और फिर चल पड़ती हैं, उसी व्यक्ति के साथ. माफ करने का यह कलेजा अब छोटा कर लीजिए या फिर किसी अच्छे लेप्रोस्कॉपिक सर्जन को देखकर उसे निकलवा ही दीजिए. रिश्ता निभाने से बेहतर है, अपने लिए हिंसा मुक्त जिंदगी चुनें. इसमें समाज की परवाह है तो आज ही उसे जीवन से निकाल दीजिए.
जब ऐसी मौत हो चुकी होती है तो समाज बस अफसोस जाहिर करने आता है. ​आपको दोबारा जिंदगी नहीं दे सकता.
 कम से कम इतना तो कर ही सकती हैं कि शादीशुदा जिंदगी को ग्लोरिफाई नहीं करें. यही वो संस्था है, जहां महिलाएं सबसे ज्यादा असु​रक्षित हैं. साथी अच्छा है तो ठीक है, यह कोई उपलब्धि तो नहीं.
सबसे बड़ी बात, परिवार यानी माता—पिता को अपने घरों में बेटियों के लिए स्पेस को पुख्ता कर देना चाहिए कि वो कभी भी लौट सके. बिना किसी एलुमनी के, सिर्फ अपनी जिंदगी लेकर आ जाए तो भी खैर मनाइए, जीने दीजिए अकेले ही. जहां मां—बाप की दिखावटी इज्जत आड़े आती हो तो उस दिखावे को तोड़ देना भी हर लड़की को आना ही चाहिए. अपने स्पेस और जिंदगी के लिए लड़िए, बाकी सब बाद में. याद रखें कि आज थप्पड़ मारा है तो यह सिलसिला यही नहीं रूकेगा. पहले जिंदगी, सब बाद में और इसमें कोई छूटे तो छूट जाए.

Ipv है इस हिंसा की मुख्य वजह, पहचान कर समाधान है जरूरी.

साथियों के बीच हिंसा को (intimate partner violence) अंतरंग साथी हिंसा कहा जाता है. इसमें साथी पति-पत्नी, पूर्व पति-पत्नी, लिव इन पार्टनर, समान लिंग के साथी कोई भी हो सकते हैं. साथी द्वारा शारीरिक शोषण, यौन शोषण, मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है. यह एक ऐसा चक्र होता है, जिससे बाहर निकलना बहुत मुश्किल होता है. पारिवारिक समस्या, काम से सम्बंधित समस्या और स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्या से साथियों के बीच यह तनाव बढ़ता जाता है. इसके बाद हिंसा का दौर शुरू होता है, अगले चक्र में दुर्व्यवहार करने वाला सुलह का प्रयास शुरू करता है और साथी फिर छोड़ने की स्थिति में नही रहता. थोड़े समय बाद यह हिंसा का दौर फिर शुरू हो जाता है और इस चक्र से बाहर निकलना असम्भव सा हो जाता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन भी 'अंतरंग साथी हिंसा' को गम्भीर समस्या मानता है, उनके अनुसार वैश्विक स्तर पर लगभग 641 मिलियन महिलाएं और लड़कियां इससे प्रभावित होती हैं. 

दुर्भाग्य यह है कि इतनी गम्भीर समस्या को आज तक नजरअंदाज ही किया गया है. भारत में सबसे बड़ी समस्या यह है कि महिलाएं स्वयं के ऊपर हो रहे अत्याचारों के बारे में बात भी नहीं कर पाती हैं, फिर वह आर्थिक रुप से सशक्त महिला ही क्यों न हो. इसके समाधान हेतु महिलाओं के स्वयं सहायता समूह मंच बनाने होंगे, जहां वह शोषण की पहचान और इनसे निपटने की योजना बना सकती हैं. शोषण की पहचान इसलिए क्योंकि अधिकांश महिलाओं को यह समझने में ही वक्त लग जाता है कि हिंसा अस्वीकार्य है इसलिए उन्हें सक्षम बनाने हेतु एक विशिष्ट प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाने की आवश्यकता है. शिक्षा ऐसा माध्यम है जिसके जरिए पुरुषों को महिलाओं की इज्ज़त करना सिखाया जा सकता है और यह काम पुरुषों को बचपन से सिखाना होगा. समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार से यह कार्य शुरू किया जा सकता है.

हिमांशु जोशी.


Monday, August 14, 2023

सलीम नाई।

बचपन में जब किसी हरे भरे पेड़ के नीचे कुर्सी लगाकर खड़े नाई के पास बाल कटवाने मम्मी ले जाती थी तो खूब रोता था। वक्त आगे बढ़ा और उस पेड़ के नीचे वाली कुर्सी की जगह चारदीवारी के अंदर खिसक गई, अब इन दुकानों में मैं अकेले जाने लगा और रोना भी बन्द हो गया। घर से बाहर निकलने पर गर्मी बढ़ने लगी, राह चलते आंखों में चुभने वाली धूल और भी ज्यादा बढ़ने लगी। पेड़ गायब होना इसकी मुख्य वजह रहा है, आंकड़े बताते हैं कि भारत ने पिछले 30 वर्षों में वनों की कटाई में सबसे अधिक वृद्धि देखी है। 
हमारे देश ने साल 1990 से साल 2000 के बीच 3,84,000 हेक्टेयर जंगलों को खो दिया पर यह आंकड़ा और भी खतरनाक लगता है जब यह जानकारी हमारे सामने आती है कि साल 2015 और साल 2020 के बीच बढ़कर जंगल खोने का आंकड़ा लगभग दोगुना होकर 6,68,400 हेक्टेयर हो गया।

नाई की वह लकड़ी की सख्त कुर्सी आरामदायक गद्दीदार कुर्सी बन गई और इन दुकानों को अब हेयर सैलून कहा जाने लगा। एक बात जो बदली नही वो थी इन दुकानों में लगे कलेंडर, उर्दू में छपे इन कलेंडर के बिना कोई भी नाई की दुकान अधूरी लगती है।

आज देहरादून में एक नई खुली नाई की दुकान में पहुंचा तो उसमें कुछ अधूरा सा लगा।
सवाल पूछने से पहले नाई को विश्वास में लेना जरूरी था तो मैंने उनसे पानी मांगा, पानी इसलिए क्योंकि आजकल कुछ हिंदुओं का मुस्लिमों से पानी मांग कर पीना भी बन्द हो चला है, पानी पीते ही मैंने नाई से उनका नाम पूछा। 'सलीम', मुझे जो जानना था वो मैं समझ चुका था।

कोरोना काल के दौरान 30 मार्च 2020 को दिल्ली में तब्लीगी जमात के धार्मिक आयोजन में शामिल लोगों में से कुछ लोगों की कोरोना से मौत की ख़बर जैसे ही सामने आई, उसके बाद से पूरे देश में मुसलमानों के खिलाफ फेक न्यूज़ की भरमार हो गई। उन्हें कोरोना का वाहक बोला गया और उनसे नफरत का दौर शुरू हो गया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ मीडिया आउटलेट्स द्वारा तब्लीगी जमात की घटना को सांप्रदायिक रंग देने की आलोचना की थी पर तब तक इससे होने वाला नुकसान हो चुका था। उत्तराखंड के हल्द्वानी में मुस्लिम ठेले वाले के साथ दुव्यर्वहार का मामला पूरे देश भर में चर्चा में रहा था। अभी भी उत्तराखंड के पुरोला में नफरत की इसी कड़ी से जुड़ी घटना देखने को मिली , जब एक प्रेम प्रसंग से जुड़े एक मामले में मुस्लिमों को दुकान खाली करने के लिए कहा गया।

मैंने सलीम से पूछा आपने दुकान में कोई कलेंडर नही लगाया है जबकि यह किसी भी नाई की दुकान में आम होता है, क्या आजकल एक दूसरे के प्रति फैलाई जा रही नफरत इसके लिए जिम्मेदार है! जिस वजह से अब हम हिन्दू नाई, हिन्दू मीट की दुकान जैसे नाम देख रहे हैं।
सलीम का जवाब था, जी। बिल्कुल यही बात है। कलेंडर देख कर कई लोगों के वापस जाने का डर है, इन आठ सालों में जाने क्या हो गया जो हम सब एक दूसरे से इतनी दूर हो गए हैं। हिन्दू धर्म खतरे में है जैसी लाइन पता नही कैसे सुनाई देने लगी है। पहले से तो हम सब आपस में बहुत प्रेम के साथ रहते आए हैं, अब भी रहते हैं पर इंसान अच्छे बुरे होते हैं। आजकल युवाओं में यह नफरत ज्यादा दिख रही है।

सलीम ने साल 1983 से बाल काटने का काम शुरू किया, वह बताते हैं कि उनके पिता भी यही काम करते थे। 1950 के आसपास उन्होंने देहरादून में यह काम शुरू किया था। मैं हाईस्कूल में था और पापा को खाना पहुंचाने आता था तो ये काम सीख लिया।

सलीम की दो लड़की और एक लड़का है, वह कहते हैं कि अब अपने लड़के को इस पेशे में नही लाएंगे क्योंकि इस काम में अब पहले जैसी कमाई नही रह गई है। उन्होंने पुरानी जगह छोड़कर नई जगह दुकान किराए पर ली है। आठ हजार किराया उन्हें अभी अपनी जेब से भरना पड़ रहा है। अब नाई को एक दुकान खोलने के लिए लाखों रुपए चाहिए,पहले की तरह लोग कम आकर्षक दुकानों में नही आना चाहते हैं। 
उनके पिता ने इसी काम से देहरादून में अपना घर बनाया पर अब महंगाई इतनी है कि घर का खर्चा भी बड़ी मुश्किल से चल पाता है और फिर बच्चों की पढ़ाई पर खर्च भी है ही। सब्जियों के दाम आसमान छू रहे हैं, दिन भर में कभी कभी नौ- दस ग्राहक तक आ जाते हैं तो कभी कोई नही आता। महीने की सात आठ हज़ार बचत से आजकल क्या होता है।

आमतौर पर यह माना जाता है कि जिन मुस्लिम परिवारों में ज्यादा कमाई नही होती वहां लड़कियों की शिक्षा पर कम खर्च किया जाता है लेकिन सलीम की बच्चों की पढ़ाई लिखाई में सब पैसा लगता है, बात पर मैंने इस विषय में गहराई से पूछा।
उन्होंने कहा कि उनकी बड़ी लड़की ने बीकॉम किया और उसकी शादी हो गई है। छोटी अभी बीएससी कर रही है, जब उन्होंने दुकान बदली तो घर की माली हालत बहुत ही खराब हो गई थी। ऐसे वक्त में उनकी लड़की ने उनका सहारा बन कर एक गिफ्ट शॉप में काम करना शुरू किया, जिससे घर संभल गया। अब वो पढ़ाई के साथ काम भी करती है।

भारतीय मुस्लिम महिलाएं हमारे देश के कार्यबल में व्यावहारिक रूप से लगभग अदृश्य ही हैं। भारत में लगभग सात करोड़ शिक्षित मुस्लिम महिलाएं हैं । यह देखते हुए कि भारत की महिला श्रम बल भागीदारी दर लगातार गिर रही है, शिक्षित मुस्लिम महिलाओं को कार्यबल में लाने से देश की जीडीपी में लगभग 770 बिलियन अमेरिकी डॉलर का योगदान हो सकता है। सलीम की तरह स्वतंत्र विचारों के पिता हों, जो अपनी बेटी को उसके पंख फैलाने से न रोकें और उसे बेटे से कमतर न समझें तो भारतीय मुस्लिम महिलाओं की स्थिति सुधरने से कोई नही रोक सकता।

हिमांशु जोशी।

Saturday, August 12, 2023

आज़ादी की राह खोजती भारतीय महिलाएं.

इस साल हम अपना 77वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं और
देश आजाद होने के सालों बाद भी भारतीय महिलाएं वर्तमान माहौल में खुद को गुलाम महसूस करती हैं. आजाद भारत में महिलाओं को आज भी अपनी आजादी मांगने के लिए घर के पुरुषों का मुंह ताकना पड़ता है, घर के बाहर और अंदर दोनों ही जगह महिलाएं असुरक्षित हैं और उनके खिलाफ यौन अपराधों में बढ़ोतरी होती ही जा रही है. भारत में शायद ही किसी लड़की का पिता उसे घर से बाहर अकेले भेजते चिन्तामुक्त रहता हो.

तीन चार दिन पहले पुरुषों से भरी एक बस में खीरा बेचने वाला 15-16 साल का लड़का चढ़ा और कहने लगा 'अरे यहां एक लड़की तो होती सबका सफर बढ़िया होता', देश के भविष्य से ऐसे शब्द की मुझे बिल्कुल उम्मीद नही थी. मुझे उसमें और महिलाओं के खिलाफ अपराध करने वाले लोगों के चेहरे में कोई अंतर नही लग रहा था, चौंकाने वाली बात यह थी कि उसके इन शब्दों का बस में किसी ने विरोध तक नही किया. इस घटना से यह तो साबित हो गया कि हमारे समाज में महिलाओं के प्रति क्या सोच रखी जाती है.

महिलाओं के खिलाफ हाल ही में घटी आपराधिक घटनाएं.

मणिपुर की घटना में हमने देखा कि कैसे महिलाओं की इज्ज़त को तार तार करते हुए, उन्हें निवस्त्र घुमाया गया. इतनी बड़ी घटना के बाद भी महिलाओं की सुरक्षा के लिए जिस तरह के कदम उठाए जाने थे वह नही दिखाई दिए, घटना का ज्यादा विरोध सोशल मीडिया तक ही सीमित रहा. उत्तर प्रदेश में प्रेमी के साथ घर छोड़ कर जाने की वजह से एक युवती की उसके सगे भाई ने ही गर्दन धड़ से अलग कर दी और गर्दन के साथ वह सड़क पर घूमता रहा.
दिल्ली में कई लोगों की मौजूदगी में एक युवक ने असफल प्रेम कहानी की वजह से युवती की चाकू से गोदकर हत्या कर दी.

महिलाओं के खिलाफ यह अपराध कोई नई घटना नही हैं, निर्भया कांड के बाद महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों पर सजा को सख्त कर दिया गया था पर आंकड़े बताते हैं कि भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराध हर साल बढ़ते ही जा रहे हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार भारत में साल 2019 में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों की संख्या 405326 थी, जो साल 2021 में बढ़कर 428278 हो गई.

महिलाओं को शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत बनाना भी जरूरी.

हिंदी की लेखक और महिला अधिकारों के लिए हमेशा खुलकर अपनी बात कहने वाली सुप्रिया पुरोहित महिलाओं की स्वतंत्रता पर कहती हैं कि स्वतंत्र होने की परिभाषा क्या है? कपड़े चुनने की आजादी, पढ़ाई की आजादी या कैरियर चुनने की आजादी. महिलाओं के लिए अभी तक स्वतंत्र होने के मायने कदाचित इतने ही हों जबकि स्वतंत्रता विचारों की होनी चाहिए और इस सदी की त्रासदी है कि महिलाएं स्वतंत्र नहीं.
महिलाओं के साथ यौन हिंसा आज से नहीं बहुत पहले से चली आ रही है. किंतु पिछले चालीस सालों में अपने वीभत्स रूप में आ गई. इसके लिए कोई भी सरकार कितने ही कानून बना ले पर वह ना ही हर अपराधी तक जा सकती है ना ही हर महिला की पीड़ा को जान सकती है. इसके लिए समाज को आगे आना होगा, सामाजिक व्यवस्था को बदलना होगा. सामाजिक व्यवस्था ही आठवीं कक्षा में गृह विज्ञान जैसी विषय जोड़ती है क्योंकि सुंदर, सुशील, गृह कार्य में दक्ष कन्या ही चाहिए सभी को, क्यों इसके साथ जूडो जैसे आत्मरक्षात्मक कोर्स नहीं जोड़ा जाता? बारहवीं तक खेल जरूरी विषय क्यों नहीं हैं! जिससे लड़कियां शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत रहे। उनमें आत्मविश्वास रहे.

ये तो है छोटे और बड़े शहरों की बात. छोटे गांव कस्बों में पहले ऐसी घटनाएं नगण्य होती थी, जो होती थी उसके लिए गांव की पंचायत सजा का प्रावधान रखती थी. पर अब वहां के हालात भी चिंताजनक है. सरकार से पहले समाज को जागना होगा. अपनी बेटियों को चाकू से सब्जी काटने के साथ साथ आत्मरक्षा भी सिखानी होगी. समाज को खुद को सुधारना होगा. देश से पहले समाज का सुधार जरूरी है उससे भी पहले परिवार समाज की प्रथम इकाई का सुधार जरूरी है. जिन पुरुषों को महिलाएं जन्म देती है उनको उन्हें अच्छी परवरिश भी देनी होगी. लड़कियां तभी सुरक्षित होगी जब समाज अपने आप को सुधरेगा. समाज के साथ के बिना हर सरकार पंगु है हमारी बेटियों को बचाने में.

घर के संस्कार ही बदलेंगे लड़कियों के प्रति व्यवहार.

उत्तरा महिला पत्रिका और नैनीताल समाचार से जुड़ी फोटोग्राफी की शौकीन विनीता यशस्वी ट्रैकिंग में भी करती हैं, विनीता उत्तराखंड में महिला अधिकारों के लिए हमेशा सक्रिय रही हैं. भारत में महिलाओं की स्वतंत्रता पर वह कहती हैं कि यह बात बिल्कुल सही है कि आजाद भारत में भी अभी तक महिलाएं पूर्ण रूप से आज़ाद नहीं हो पाई हैं. आज भी महिलाओं को अपने मर्ज़ी की शिक्षा या रोजगार चुनने में सबसे पहले परिवार वालों की सहमति लेनी होती है. मान लीजिए यदि कोई लड़की एडवेंचर जैसे फील्ड में जाना चाहे तो पहले उसे अपने परिवार को मनाने में मेहनत करनी पड़ती है और अगर परिवार वाले इजाज़त दे भी दें तो फिर समाज उसे बार-बार सुनाता रहता है कि ये तो कई-कई दिन तक घर से गायब रहती है. महिला की समाज में स्वीकृति तब तक नहीं होती जब तक वो अपना एक अलग नाम और ओहदा न बना ले. ऐसे ही कई और भी फील्ड हैं जिनमें जाने से पहले उसे बहुत सोचना पड़ता है.

महिला और उसके परिवार के दिमाग में एक डर यह भी रहता है कि क्या वो घर के बाहर सुरक्षित है कि नहीं. पिछले कुछ समय में महिलाओं के साथ जिस तरह यौन हिंसा बढ़ी है, उसने इस डर को और ज़्यादा पुख्ता कर दिया है और ये तब तक नहीं रुक सकता जब तक कि महिला को भी एक इंसान के रूप में नहीं देखा जाएगा. उसे उसकी तरह जीने और उसकी मर्जी से शिक्षा और रोजगार चुनने की आजादी नहीं होगी. समाज खासतौर पर पुरुष वर्ग को भी यह समझना होगा कि दुनिया जितनी उसकी है उतनी ही एक महिला की भी है इसलिए उसे उपभोग की वस्तु के रूप में देखने से बाज़ आना होगा और साथ ही परिवार की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि लड़के और लड़की दोनों को एक समान संस्कार दें. लड़कों को विशेष रूप से यह सिखाएं कि किसी लड़की या महिला चाहे वो घर की हो या बाहर की हो उसके साथ सभ्य व्यवहार करें.

जिस दिन यह संभव होने लगेगा उस दिन शायद महिला आज़ाद भी होने लगे और उसके ऊपर होने वाली यौन हिंसा भी रुके.

हिमांशु जोशी
@himanshu28may

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...