Wednesday, August 16, 2023

बेटी दिवस : 641 मिलियन बेटियां मुश्किल में.

पिछले कुछ समय से पति पत्नी व लिव इन रिश्तों में रहने वालों के बीच हिंसक वारदातों में बढ़ोतरी हुई है. गूगल पर सर्च कीजिए 'पति ने पत्नी की हत्या की' तो आपको हर रोज नई घटना नजर आएगी. रिश्तों में दरार के बावजूद साथी एक दूसरे को नही छोड़ पाते, इसमें हो रही हिंसा को ( ipv ) अंतरंग साथी हिंसा कहा जाता है और वैश्विक स्तर पर लगभग 641 मिलियन महिलाएं और लड़कियां इससे प्रभावित हैं. बेटी दिवस पर मुश्किल में इन 641 बेटियों के बारे में सोचना जरूरी है.

पति, पत्नी या लिव इन पार्टनर की हत्या वाली खबरें आजकल आपको रोज़ सुनाई दे जाएंगी. यह कुछ घटनाएं हाल ही की हैं. कुशीनगर में पिता ने घरेलू कलह में बेटी और पत्नी की हत्या कर दी, उत्तर प्रदेश के बागपत में एक व्यक्ति ने आर्थिक कारणों से अपनी पत्नी की गला दबाकर हत्या कर दी. कुछ समय पहले श्रद्धा वाकर की हत्या ने देश को सन्न कर दिया था, उसके लिव-इन पार्टनर आफताब अमीन पूनावाला ने 18 मई, 2022 को श्रद्धा की हत्या कर दी थी. यह हत्या महीनों बाद तब सामने आई जब आफताब ने श्रद्धा के शरीर के सभी अंगों को नष्ट कर दिया और वह दूसरी लड़की को डेट कर रहा था.

भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के आंकड़ों की बात करें तो राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार साल 2021 में भारत के अंदर पति व अन्य रिश्तेदारों द्वारा महिलाओं के खिलाफ क्रूरता की 136234 घटनाएं सामने आई थी, जिसमें सबसे ज्यादा 19952 घटनाएं पश्चिम बंगाल की थी.

भारत में साल भर के अंदर लाखों महिलाएं हो रही हैं क्रूरता की शिकार पर अब भी 'छोड़ती' नही हैं महिलाएं.

रिश्ते की वजह से अवसाद में घिर जाने या मौत मिलने से बेहतर है समय से छोड़ देना लेकिन फिर भी भारत में यह 'छोड़' देना अब भी इतना आसान नही हुआ है. साल 2022 की बात करें तो भारत में तलाक लेने की दर विश्व में सबसे कम रही है. साल 2020 में भारत में जहां 315 तलाक हुए, वहीं साल 2021 में मात्र 108 तलाक हुए.

अगस्त में नागपुर निवासी 63 वर्षीय प्रसिद्ध लेखक मुकुल अमलास की उनके 66 वर्षीय पति ने कुल्हाड़ी से निर्मम हत्या कर दी थी, इसके बाद पत्रकार तसनीम खान ने लिखा था, 'थप्पड़' फिल्म याद है ना. उसे बार—बार देख लेना चाहिए कि हिंसा छोटे रूप में भी जिंदगी में आने लगे तो उसे वहीं रोक देना चाहिए. प्रेम, पति या कोई भी रिश्ता, जिंदगी से बेहतर नहीं हो सकता. मुकुल कुमारी का यों जाना तकलीफदेह है, लेकिन हैरानी नहीं. क्योंकि छोटी—छोटी हिंसा के बाद के 'सॉरी' में ही महिलाएं अपनी खुशी देख लेती हैं, ढक लेती हैं, जख्मों को और फिर चल पड़ती हैं, उसी व्यक्ति के साथ. माफ करने का यह कलेजा अब छोटा कर लीजिए या फिर किसी अच्छे लेप्रोस्कॉपिक सर्जन को देखकर उसे निकलवा ही दीजिए. रिश्ता निभाने से बेहतर है, अपने लिए हिंसा मुक्त जिंदगी चुनें. इसमें समाज की परवाह है तो आज ही उसे जीवन से निकाल दीजिए.
जब ऐसी मौत हो चुकी होती है तो समाज बस अफसोस जाहिर करने आता है. ​आपको दोबारा जिंदगी नहीं दे सकता.
 कम से कम इतना तो कर ही सकती हैं कि शादीशुदा जिंदगी को ग्लोरिफाई नहीं करें. यही वो संस्था है, जहां महिलाएं सबसे ज्यादा असु​रक्षित हैं. साथी अच्छा है तो ठीक है, यह कोई उपलब्धि तो नहीं.
सबसे बड़ी बात, परिवार यानी माता—पिता को अपने घरों में बेटियों के लिए स्पेस को पुख्ता कर देना चाहिए कि वो कभी भी लौट सके. बिना किसी एलुमनी के, सिर्फ अपनी जिंदगी लेकर आ जाए तो भी खैर मनाइए, जीने दीजिए अकेले ही. जहां मां—बाप की दिखावटी इज्जत आड़े आती हो तो उस दिखावे को तोड़ देना भी हर लड़की को आना ही चाहिए. अपने स्पेस और जिंदगी के लिए लड़िए, बाकी सब बाद में. याद रखें कि आज थप्पड़ मारा है तो यह सिलसिला यही नहीं रूकेगा. पहले जिंदगी, सब बाद में और इसमें कोई छूटे तो छूट जाए.

Ipv है इस हिंसा की मुख्य वजह, पहचान कर समाधान है जरूरी.

साथियों के बीच हिंसा को (intimate partner violence) अंतरंग साथी हिंसा कहा जाता है. इसमें साथी पति-पत्नी, पूर्व पति-पत्नी, लिव इन पार्टनर, समान लिंग के साथी कोई भी हो सकते हैं. साथी द्वारा शारीरिक शोषण, यौन शोषण, मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है. यह एक ऐसा चक्र होता है, जिससे बाहर निकलना बहुत मुश्किल होता है. पारिवारिक समस्या, काम से सम्बंधित समस्या और स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्या से साथियों के बीच यह तनाव बढ़ता जाता है. इसके बाद हिंसा का दौर शुरू होता है, अगले चक्र में दुर्व्यवहार करने वाला सुलह का प्रयास शुरू करता है और साथी फिर छोड़ने की स्थिति में नही रहता. थोड़े समय बाद यह हिंसा का दौर फिर शुरू हो जाता है और इस चक्र से बाहर निकलना असम्भव सा हो जाता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन भी 'अंतरंग साथी हिंसा' को गम्भीर समस्या मानता है, उनके अनुसार वैश्विक स्तर पर लगभग 641 मिलियन महिलाएं और लड़कियां इससे प्रभावित होती हैं. 

दुर्भाग्य यह है कि इतनी गम्भीर समस्या को आज तक नजरअंदाज ही किया गया है. भारत में सबसे बड़ी समस्या यह है कि महिलाएं स्वयं के ऊपर हो रहे अत्याचारों के बारे में बात भी नहीं कर पाती हैं, फिर वह आर्थिक रुप से सशक्त महिला ही क्यों न हो. इसके समाधान हेतु महिलाओं के स्वयं सहायता समूह मंच बनाने होंगे, जहां वह शोषण की पहचान और इनसे निपटने की योजना बना सकती हैं. शोषण की पहचान इसलिए क्योंकि अधिकांश महिलाओं को यह समझने में ही वक्त लग जाता है कि हिंसा अस्वीकार्य है इसलिए उन्हें सक्षम बनाने हेतु एक विशिष्ट प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाने की आवश्यकता है. शिक्षा ऐसा माध्यम है जिसके जरिए पुरुषों को महिलाओं की इज्ज़त करना सिखाया जा सकता है और यह काम पुरुषों को बचपन से सिखाना होगा. समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार से यह कार्य शुरू किया जा सकता है.

हिमांशु जोशी.


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